NCERT की पुस्तक अंतराल भाग 2 के अध्याय 3 «अपना मालवा: खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में» (प्रभाष जोशी) की प्रश्न-अभ्यास (7 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी दस प्रश्न, पुस्तक के अपने शब्दों में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. मालवा में जब सब जगह बरसात की झड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?
उत्तर:
बरसात की झड़ी लगने पर मालवा में जहाँ-जहाँ भी पानी भरा रह सकता था, वहाँ मटमैला बरसाती पानी लबालब भर जाता है और छोटे-मोटे सभी नदी-नाले बहने लगते हैं। पाठ के अनुसार गए महीने टीवी पर ख़बर थी कि उज्जैन में शिप्रा का पानी घरों में घुस गया, और भोपाल, इंदौर, धार, देवास सब में झड़ी लगी थी। लेखक ने सब जगह फ़ोन लगाकर हाल पूछा; “खतरा कहीं न था, लेकिन सब को पुराने दिन याद आ गए थे।” खेती पर भी असर पड़ता है: नागदा के मीणा जी के अनुसार किसान कहते हैं कि ज़्यादा पानी से सोयाबीन की फ़सल गल गई, पर अब गेहूँ-चना अच्छा होगा। दूसरी ओर, कुएँ-बावड़ी और तालाब-तलैया लबालब भर जाते हैं, नदी-नाले बहते हैं और फ़सलें लहराती हैं, जिससे “विपुलता की आश्वस्ति” मिलती है; लेखक कहते हैं: “खूब मनाओ दसेरा-दिवाली। अबकी मालवो खूब पाक्यो हे।” यानी जनजीवन में पुरानी यादें और संपन्नता का आश्वासन साथ-साथ आते हैं, हालाँकि खतरा कहीं न था।
प्र. अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था। उसके क्या कारण हैं?
उत्तर:
पाठ में अब कम वर्षा का कोई सीधा कारण नहीं लिखा है। लेखक इतना बताते हैं कि अब मालवा में वैसा पानी नहीं गिरता जैसा गिरा करता था, इसलिए पहले का औसत पानी भी गिरे तो लोगों को लगता है कि ज़्यादा गिर गया। पाठ के आधार पर दो बातें इस बदलाव से जोड़कर समझी जा सकती हैं। पहली, स्थानीय जल-प्रबंधन का बिगड़ना: मालवा के राजाओं (जैसे विक्रमादित्य, भोज, मुंज) ने तालाब और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाई थीं ताकि बरसात का पानी रुका रहे, पर “हमारे आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन के पानी को पाताल से भी निकाल लिया”; इससे नदी-नाले सूख गए और पग-पग नीरवाला मालवा सूखा हो गया। दूसरी, धरती का वातावरण गरम होना: ‘नयी दुनिया’ की लाइब्रेरी की कतरनें “बताने को काफ़ी हैं कि मालव धरती गहन गंभीर क्यों नहीं है और क्यों यहाँ डग-डग रोटी और पग-पग नीर नहीं है”; उनके अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है और मौसमों का चक्र बिगड़ रहा है।
प्र. हमारे आज के इंजीनियर ऐसा क्यों समझते हैं कि वे पानी का प्रबंध जानते हैं और पहले ज़माने के लोग कुछ नहीं जानते थे?
उत्तर:
यह लेखक का व्यंग्य है। आज के इंजीनियर ऐसा इसलिए समझते हैं क्योंकि उनके अनुसार “ज्ञान तो पश्चिम के रिनेसां के बाद ही आया न!” (रिनेसां = पुनर्जागरण), इसलिए पहले ज़माने के लोग कुछ नहीं जानते थे। लेखक इसी सोच का खंडन करते हैं: मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए, फिर भी वे और मालवा के सब राजा जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोक के रखना होगा, और उन्होंने तालाब और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं। इसके उलट, आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन के पानी को पाताल से भी निकाल लिया।
प्र. ‘मालवा में विक्रमादित्य और भोज और मुंज रिनेसां के बहुत पहले हो गए।’ पानी के रखरखाव के लिए उन्होंने क्या प्रबंध किए?
उत्तर:
विक्रमादित्य, भोज और मुंज, और मालवा के सब राजा, जानते थे कि इस पठार पर पानी को रोक के रखना होगा। इसके लिए सबने तालाब बनवाए और बड़ी-बड़ी बावड़ियाँ बनवाईं, ताकि बरसात का पानी रुका रहे और धरती के गर्भ के पानी को जीवंत रख सकें।
प्र. ‘हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है।’ क्यों और कैसे?
उत्तर:
क्यों: लेखक के अनुसार “नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया”, पर हमारी आज की सभ्यता इन नदियों को अपने गंदे पानी के नाले बना रही है। आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन के पानी को पाताल से भी निकाल लिया, जिससे नदी-नाले सूख गए। कैसे: इंदौर के बीच से निकलने और मिलनेवाली नदियाँ (खान, सरस्वती) कभी उसे हरा-भरा और गुलज़ार रखती थीं; आज वे सड़े नालों में बदल दी गई हैं, और शिप्रा, चंबल, गंभीर, पार्वती, कालीसिंध, चोरल सबके यही हाल हो रहे हैं। ये सदानीरा नदियाँ अब चौमासे में चलती हैं; बाक़ी के महीनों में बस्तियों के नालों का पानी ढोती हैं। यानी आज की सभ्यता में इन नदियों में बस्तियों के नालों का पानी बहाया जाने लगा है।
प्र. लेखक को क्यों लगता है कि ‘हम जिसे विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं वह उजाड़ की अपसभ्यता है’? आप क्या मानते हैं?
उत्तर:
लेखक को यह इसलिए लगता है क्योंकि जिसे हम विकास कहते हैं, उसी के चलते मालवा के तालाब गाद से भरने दिए गए, ज़मीन का पानी पाताल से निकाल लिया गया, नदी-नाले सूख गए और इंदौर की नदियाँ सड़े नालों में बदल दी गईं। वैश्विक स्तर पर, कतरनों के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है, समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, ध्रुवों की बरफ़ पिघल रही है और मौसमों का चक्र बिगड़ रहा है। पाठ-परिचय के अनुसार यह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है, जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता बन गई है। (विद्यार्थी अपने विचार लिखें, जैसे यह भी जोड़ा जा सकता है कि विकास और पर्यावरण-संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते हम पुरानी समझ, जैसे तालाब-बावड़ी की परंपरा, को नए विकास के साथ जोड़ें।)
प्र. धरती का वातावरण गरम क्यों हो रहा है? इसमें यूरोप और अमेरिका की क्या भूमिका है? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
वातावरण को गरम करनेवाली कार्बन डाइऑक्साइड गैसों ने मिलकर धरती के तापमान को तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया है। “नयी दुनिया” की लाइब्रेरी में कमलेश सेन और अशोक जोशी द्वारा निकालकर रखी गई कतरनें बताती हैं कि इसी कारण समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, ध्रुवों पर जमी बरफ़ पिघल रही है, मौसमों का चक्र बिगड़ रहा है, लद्दाख में बरफ़ के बजाय पानी गिरा, बाड़मेर में गाँव डूब गए और यूरोप-अमेरिका में इतनी गरमी पड़ रही है। यूरोप और अमेरिका की भूमिका: ये गैसें सबसे ज़्यादा अमेरिका और फिर यूरोप के विकसित देशों से निकलती हैं। अमेरिका इन्हें रोकने को तैयार नहीं है, वह नहीं मानता कि धरती के वातावरण के गरम होने से सब गड़बड़ी हो रही है, और उसकी घोषणा है कि वह अपनी खाऊ-उजाड़ू जीवन पद्धति पर कोई समझौता नहीं करेगा। इस तरह यूरोप और अमेरिका इस संकट के सबसे बड़े स्रोत हैं, और अमेरिका ने इन गैसों को रोकने से इनकार किया है।
2 योग्यता-विस्तार
प्र. क्या आपको भी पर्यावरण की चिंता है? अगर है तो किस प्रकार? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
(यह एक व्यक्तिगत विचार वाला प्रश्न है, विद्यार्थी अपने अनुभव से उत्तर लिखें। नमूने के तौर पर) हाँ, मुझे पर्यावरण की चिंता है। अपने आसपास पेड़ों की कटाई, पानी की बर्बादी और प्लास्टिक कचरे को देखकर लगता है कि हम भी उसी खाऊ-उजाड़ू जीवन पद्धति की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी बात इस पाठ में की गई है। इसलिए मैं पानी और बिजली का उपयोग सोच-समझकर करने, कम प्लास्टिक इस्तेमाल करने और पेड़ लगाने जैसी छोटी-छोटी कोशिशें करने की कोशिश करता/करती हूँ।
प्र. विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता है। खाऊ-उजाड़ू सभ्यता के संदर्भ में हो रहे पर्यावरण के विनाश पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पाठ-परिचय के अनुसार यह खाऊ-उजाड़ू सभ्यता यूरोप और अमेरिका की देन है, जिसके कारण विकास की औद्योगिक सभ्यता उजाड़ की अपसभ्यता बन गई है, और इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई है, पर्यावरण बिगड़ा है। पाठ के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड गैसों से धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है, समुद्रों का पानी गरम हो रहा है, ध्रुवों की बरफ़ पिघल रही है और मौसम-चक्र बिगड़ रहा है; लद्दाख में बरफ़ के बजाय पानी गिरा और बाड़मेर में गाँव डूब गए। मालवा में भी नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और ज़मीन का पानी पाताल से निकाल लिया; नदी-नाले सूख गए और इंदौर की नदियाँ सड़े नालों में बदल दी गईं। इस तरह पर्यावरण का विनाश स्थानीय (मालवा की नदियाँ-तालाब) और वैश्विक (धरती का गरम होना), दोनों स्तर पर दिखता है। लेखक का अंतिम प्रश्न है: “हम अपनी जीवन पद्धति को क्या समझते हैं!”
प्र. पर्यावरण को विनाश से बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उसे कैसे बचाया जा सकता है? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
(यह भी एक व्यक्तिगत विचार वाला प्रश्न है, विद्यार्थी अपने विचार लिखें। नमूने के तौर पर) पाठ की सीख है: “अपने नदी, नाले, तालाब सँभाल के रखो तो दुष्काल का साल मज़े में निकल जाता है।” मैं अपने स्तर पर पानी बचाने, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने, पेड़ लगाने और कम कार्बन उत्सर्जन वाली आदतें (जैसे साइकिल चलाना, बिजली की बचत) अपनाने की कोशिश कर सकता/सकती हूँ। इसके अलावा बड़े स्तर पर सरकारों और उद्योगों को कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करने और पुराने जल-स्रोतों (तालाब, बावड़ी, नदी) की देखभाल करने के लिए ज़िम्मेदार बनाया जाना चाहिए।
प्रश्न 4, 6 और 7 में पाठ का मूल भाव (जल-प्रबंधन का इतिहास, खाऊ-उजाड़ू सभ्यता, वैश्विक पर्यावरण संकट) है।