कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 2 सरोज स्मृति NCERT समाधान

NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 2 सरोज स्मृति के प्रश्न-अभ्यास (7 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी दस प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 सरोज स्मृति

प्रश्न 1

प्र. सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: सरोज का विवाह उसके जीवन का बिलकुल नया अनुभव था, विवाह की रस्म में उस पर शुभ कलश का जल डाला गया। वह अपने पिता को देखकर हल्की मुस्कान दे रही थी, उसके होठों में बिजली जैसा हल्का कंपन फँसा हुआ था। उसके हृदय में अपने प्रिय (पति) की सुंदर छवि झूल रही थी, यह सुंदरता शब्दों में नहीं बल्कि उसकी खामोश भाव-भंगिमा में ही प्रकट हो रही थी। वह एक ही साँस के साथ मानो खुल उठी, विश्वास से उसका पूरा शरीर स्थिर था, और उसकी झुकी आँखों से उतरती चमक उसके काँपते होठों तक पहुँच रही थी। कवि कहते हैं “देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति” (धीति = प्यास, पान), और उसे “मेरे वसंत की प्रथम गीति” मानते हैं।

प्रश्न 2

प्र. कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?

उत्तर: कवि को अपनी बेटी सरोज के विवाह के अवसर पर अपनी दिवंगत पत्नी की याद आई, क्योंकि बेटी के रूप-रंग में उन्हें अपनी पत्नी का ही रूप-रंग दिखाई देता था। जो सुंदरता (शृंगार) अब तक अमूर्त भाव में, केवल कविता में बहती भावधारा के रूप में थी, वही अब अपनी स्वर्गीय प्रिया की याद के साथ गाई जा रही थी और प्राणों में राग-रंग भर रही थी। यही अमूर्त भाव अब सरोज के साकार रूप में प्रकट हो गया, इसलिए बेटी को देखकर कवि को पत्नी की याद स्वाभाविक रूप से आई।

प्रश्न 3

प्र. ‘आकाश बदल कर बना मही’ में ‘आकाश’ और ‘मही’ शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?

उत्तर: ‘आकाश’ उस सुंदरता (शृंगार) की ओर संकेत करता है जो अब तक कवि के मन और उनकी कविता में केवल अमूर्त, निराकार भाव के रूप में थी। ‘मही’ (पृथ्वी) उसी भाव के साकार, मूर्त रूप की ओर संकेत करता है, यानी वह भाव अब बेटी सरोज के वास्तविक रूप में धरती पर प्रकट हो गया। इस तरह यह पंक्ति कल्पना के साकार होकर वास्तविकता बनने की प्रक्रिया को दर्शाती है।

प्रश्न 4

प्र. सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर: सरोज का विवाह बिना किसी आत्मीय स्वजन और बिना आमंत्रण के हुआ: “हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन, कोई थे नहीं, न आमंत्रण था भेजा गया”। घर में विवाह का उत्सव-राग दिन-रात जागकर नहीं भर रहा था। इसके बजाय, प्रिय मौन में भरा एक संगीत ही नए जीवन के स्वर पर उतर आया था, यानी यह विवाह बाहरी दिखावे से रहित पर भीतरी भावनाओं से भरपूर था।

प्रश्न 5

प्र. ‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली’ पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?

उत्तर: इस पंक्ति के द्वारा सरोज के पालन-पोषण के प्रसंग को उद्घाटित किया गया है। सरोज नानी के घर, मामा-मामी के अपार स्नेह में, लता की कली की तरह खिली, स्नेह से हिली-पली; कविता यह नहीं बताती कि वह वहाँ किस कारण रही। कवि यह भी बताते हैं कि सरोज का अंत भी नानी की उसी गोद में हुआ: “अंत भी उसी गोद में शरण ली, मूँदे दृग वर महामरण!” इस तरह यह पंक्ति सरोज के जीवन के आरंभ और अंत, दोनों को एक ही स्थान से जोड़ती है।

प्रश्न 6

प्र. ‘मुझ भाग्यहीन की तू संबल’ निराला की यह पंक्ति क्या ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रम की माँग करती है?

उत्तर: हाँ, यह पंक्ति परोक्ष रूप से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रम की माँग करती है। निराला कहते हैं कि उनकी बेटी सरोज उनके भाग्यहीन जीवन का संबल (सहारा) थी, यानी एक बेटी अपने पिता के लिए शक्ति और आधार बन सकती है। यह भाव बेटियों के परिवार में सहारा होने की ओर संकेत करता है। इसीलिए बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य-सुविधा और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कार्यक्रम आज भी उतने ही ज़रूरी हैं, ताकि हर बेटी को अपनी क्षमता दिखाने और परिवार का संबल बनने का पूरा मौका मिल सके।

प्रश्न 7

प्र. निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए:
(क) नत नयनों से आलोक उतर
(ख) शृंगार रहा जो निराकार
(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला
(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ

उत्तर (क): इस पंक्ति में सरोज की झुकी हुई आँखों (नत नयनों) से एक चमक (आलोक) उतरने का वर्णन है, जो थर-थर काँपते हुए उसके होठों तक पहुँचती है। यह उसके संकोच, लज्जा और भीतरी सौंदर्य, दोनों को एक साथ दर्शाती है।

उत्तर (ख): यह पंक्ति उस सुंदरता (शृंगार) की बात करती है जो अब तक बिना किसी आकार के थी, यानी केवल कवि की कल्पना और कविता में बहती भावधारा के रूप में मौजूद थी, अभी तक किसी वास्तविक रूप में साकार नहीं हुई थी।

उत्तर (ग): कवि मन में सोचते हैं “वह शकुंतला”, यानी उन्हें कालिदास की शकुंतला का ध्यान आता है, पर तुरंत कहते हैं कि सरोज का पाठ और कला अलग है (“पर पाठ अन्य यह, अन्य कला”)। पाठ इस अंतर का ब्योरा नहीं देता।

उत्तर (घ): कवि कहते हैं कि मेरे इसी कर्म पर भले ही वज्रपात (भारी विपत्ति) हो; यदि यही धर्म है, तो इस पथ पर मेरा माथा सदा झुका रहे, यानी वे अपने कर्तव्य-पथ पर आने वाले हर दुख को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं, भले ही उनके सारे कार्य शीत से नष्ट कमलों (शतदल) की तरह भ्रष्ट हो जाएँ। इसमें उनकी गहरी वेदना झलकती है।

2 योग्यता-विस्तार

प्रश्न 8

प्र. निराला के जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘महाकवि निराला’ पढ़िए।

उत्तर: (यह एक पठन-गतिविधि है, विद्यार्थी पुस्तकालय से पुस्तक लेकर स्वयं पढ़ें।) पढ़ते समय उन तथ्यों को नोट करें जो पाठ्यपुस्तक के कवि-परिचय में भी दिए गए हैं: महिषादल (बंगाल) में जन्म, पितृग्राम गढ़कोला (उन्नाव), बचपन में माँ का निधन, सन् 1918 में पत्नी का देहांत और उसके बाद पिता, चाचा, चचेरे भाई का एक-एक कर चले जाना, सन् 1922 में ‘समन्वय’ और सन् 1923-24 में ‘मतवाला’ से जुड़ना, और पुत्री सरोज की मृत्यु। इससे ‘सरोज स्मृति’ की पंक्ति ‘दुख ही जीवन की कथा रही’ का संदर्भ और गहराई से समझ में आएगा।

प्रश्न 9

प्र. अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।

उत्तर: (यह एक रचनात्मक गतिविधि है, इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है।) विद्यार्थी अपने बचपन की किसी एक घटना, व्यक्ति या स्थान (जैसे नानी का घर, पहला विद्यालय, कोई त्योहार) को चुनें और उसे एक छोटी कविता के रूप में लिखें। ‘सरोज स्मृति’ की तरह सरल बिंब (जैसे ‘वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली’) और तुक का प्रयोग करने से कविता अधिक प्रभावी बनेगी। लिखकर अपने अध्यापक को दिखाएँ।

प्रश्न 10

प्र. ‘सरोज स्मृति’ पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: (यह कक्षा-चर्चा की गतिविधि है।) चर्चा के लिए पाठ्यपुस्तक से ये बिंदु लिए जा सकते हैं: कविता में एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध और पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता-बोध प्रकट हुआ है; सरोज का विवाह बिना आत्मीय स्वजनों और बिना आमंत्रण के हुआ; कवि स्वयं कहते हैं ‘दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!’। इन बिंदुओं को आज के आम परिवार की आर्थिक कठिनाइयों, बेटियों की शिक्षा-स्वास्थ्य और सामाजिक दिखावे के दबाव से जोड़कर चर्चा करें।