- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख रचनाएँ बता पाएँगे
- सरोज स्मृति किस घटना पर आधारित है और यह किस तरह की कविता है, समझा पाएँगे
- कविता के चारों पद (हिस्सों) की हर पंक्ति का भावार्थ अपने शब्दों में लिख पाएँगे
- कविता के कठिन शब्दों के अर्थ बिना भूले लिख पाएँगे
- कविता में प्रयुक्त अलंकार और रस पहचान पाएँगे
- “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे समकालीन-मुद्दे वाले प्रश्न का उत्तर तर्कसहित लिख पाएँगे
1 कवि-परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

निराला छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ हैं, और वे मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं। इस अध्याय की कविता “सरोज स्मृति” उनकी अपनी बेटी सरोज की मृत्यु पर लिखा गया शोकगीत (विलाप की कविता) है, इसलिए कविता में उतरने से पहले निराला के अपने जीवन को जान लेना ज़रूरी है, क्योंकि इस कविता में उनका निजी दुख और जीवन-संघर्ष भी प्रकट हुआ है।
पत्नी की प्रेरणा से निराला की साहित्य और संगीत में रुचि पैदा हुई। सन् 1918 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया, और उसके बाद पिता, चाचा और चचेरे भाई एक-एक कर चल बसे। अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। निराला ने अपने जीवन में मृत्यु का जैसा साक्षात्कार (सामना) किया, उसकी अभिव्यक्ति उनकी कई कविताओं में दिखाई देती है, और “सरोज स्मृति” इसका एक उदाहरण है। वे जीवनभर पारिवारिक और आर्थिक कष्टों से जूझते रहे, और अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण कहीं टिककर काम नहीं कर पाए।
- निराला छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ माने जाते हैं।
- उनका काव्य-संसार बहुत व्यापक है, उनमें भारतीय इतिहास, दर्शन और परंपरा का गहरा बोध है, साथ ही समकालीन जीवन के यथार्थ का चित्रण भी है।
- भावों और विचारों की जितनी विविधता, व्यापकता और गहराई निराला की कविताओं में मिलती है, वैसी बहुत कम कवियों में मिलती है। उन्होंने भारतीय किसान-जीवन से जुड़ाव भी अपनी कई कविताओं में व्यक्त किया।
- यद्यपि वे मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं, तथापि उन्होंने विभिन्न छंदों में भी कविताएँ लिखीं। उनके काव्य-संसार में काव्य-रूपों की भी विविधता है: एक ओर “राम की शक्ति पूजा” और “तुलसीदास” जैसी प्रबंधात्मक (कथा जैसी लंबी) कविताएँ।
- उन्होंने प्रगीतों (गीत जैसी छोटी कविताओं) की भी रचना की, और हिंदी भाषा में ग़ज़लों की भी रचना की।
- उनकी सामाजिक आलोचना व्यंग्य के रूप में जगह-जगह उनकी कविताओं में प्रकट हुई है।
- उनकी काव्य-भाषा के कई रूप हैं: “राम की शक्ति पूजा” और “तुलसीदास” में तत्सम-प्रधान (संस्कृतनिष्ठ) पदावली है, तो “भिक्षुक” जैसी कविता में बोलचाल की भाषा का सृजनात्मक प्रयोग मिलता है। भाषा का कसाव, शब्दों की मितव्ययिता (कम शब्दों में गहरी बात) और अर्थ की प्रधानता उनकी काव्य-भाषा की पहचान है।
कवि-परिचय के मुख्य तथ्य: जन्म-मृत्यु वर्ष (1898-1961), जन्मस्थान (महिषादल, बंगाल) और “मुक्त छंद के प्रवर्तक” वाली पहचान। “जूही की कली” (1916) और पुत्री सरोज की मृत्यु, ये दोनों तथ्य कवि-परिचय और कविता, दोनों को जोड़ने वाली कड़ी हैं।
बहुत-से छात्र सोचते हैं कि मुक्त छंद के प्रवर्तक होने के कारण निराला ने सिर्फ़ मुक्त छंद में लिखा। यह ग़लत है: पाठ्यपुस्तक स्पष्ट कहती है, “यद्यपि निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं तथापि उन्होंने विभिन्न छंदों में भी कविताएँ लिखी हैं।”
2 सरोज स्मृति: प्रसंग
सरोज स्मृति निराला की दिवंगत (मृत) पुत्री सरोज पर केंद्रित एक शोकगीत है। यह कविता एक बेटी के गुज़र जाने पर उसके पिता का विलाप (गहरा शोक-प्रकाशन) है। इस विलाप में कवि को कभी कालिदास की नायिका शकुंतला की याद आती है, तो कभी अपनी स्वर्गीय (मृत) पत्नी की। पाठ्यपुस्तक के अनुसार बेटी के रूप-रंग में पत्नी का रूप-रंग दिखाई पड़ता है, जिसका चित्रण निराला ने किया है।
- यह कविता सिर्फ़ एक पिता की व्यक्तिगत वेदना नहीं है, इसमें एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसका संबंध, और पुत्री के लिए बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता-बोध (कुछ न कर पाने का एहसास) भी प्रकट होता है।
- इस कविता के माध्यम से निराला का जीवन-संघर्ष भी प्रकट हुआ है। वे कहते हैं: “दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!”
सरोज स्मृति एक लंबी कविता है और यह इस पाठ्यपुस्तक में छपे हिस्से से कहीं बड़ी है। पाठ्यपुस्तक में इसका एक अंश, 4 पद (48 पंक्तियाँ), छपा है, और कविता के अंत में स्वयं छपा है: “(‘सरोज स्मृति’ कविता का अंश)”। पाठ इसी छपे हुए अंश तक सीमित है।
यह जानकारी NCERT के इस अंश में सीधे नहीं दी गई है, इसलिए यह केवल सामान्य ज्ञान के लिए है: निराला की पुत्री सरोज का देहांत सन् 1935 में हुआ था, और यह शोकगीत उसके बाद लिखा गया।
2.1 चरित्र और संदर्भ जिनसे कविता की तुलना होती है
सरोज
निराला की दिवंगत पुत्री, इस पूरी कविता की केंद्रीय पात्र। उसका विवाह और उसकी मृत्यु, दोनों इस अंश में हैं।
शकुंतला
कालिदास की नाट्यकृति “अभिज्ञान शाकुंतलम्” की नायिका, जो (पाठ से बाहर की जानकारी के अनुसार) कण्व ऋषि के आश्रम में पली-बढ़ी थी। निराला मन में सोचते हैं “वह शकुंतला”, पर तुरंत कहते हैं “पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।”
स्वर्गीय पत्नी
निराला की मृत पत्नी, जिनका रूप-रंग कवि को अपनी बेटी सरोज में दिखाई देता है। पद 2 में उनकी याद के साथ ही यह गीत गाया जाता है।
नानी, मामा-मामी
सरोज इन्हीं के स्नेह में “खिली, स्नेह से हिली, पली”; कविता यह नहीं बताती कि वह ननिहाल में किस कारण रही। कविता में सरोज की अंतिम शरण भी नानी की उसी गोद में बताई गई है।
3 मूल काव्यांश: सरोज स्मृति (4 पद)
तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।
देखती मुझे तू हँसी मंद,
होठों में बिजली फँसी स्पंद
उर में भर झूली छबि सुंदर
प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति
मेरे वसंत की प्रथम गीति–
भावार्थ: निराला कहते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी सरोज का विवाह देखा, जो उसके जीवन में बिलकुल नया और पहला अनुभव था (आमूल नवल)। विवाह की रस्म में शुभ कलश का जल उस पर डाला गया। सरोज उन्हें देखकर हल्की-सी मुस्कान (हँसी मंद) दे रही थी, मानो उसके होठों में बिजली ही फँसकर काँप (स्पंद) रही हो। उसके हृदय (उर) में अपने प्रिय (पति) की सुंदर छवि झूल रही थी, यह सुंदरता (शृंगार) शब्दों में नहीं, बल्कि खामोश भाव में ही मुखर (प्रकट) हो रही थी। वह एक ही साँस के साथ मानो खुल उठी, विश्वास से उसका पूरा शरीर स्तब्ध (स्थिर) था। उसकी झुकी हुई आँखों से एक चमक उतर रही थी, जो थर-थर काँपते हुए उसके होठों तक पहुँच रही थी। निराला कहते हैं, “देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति” (धीति = प्यास, पान) और उसे “मेरे वसंत की प्रथम गीति” कहते हैं। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि नव-वधू सरोज में कवि को अपने वसंत (यौवन) का पहला गीत दिखता है; अगले पद में यह भाव स्वर्गीया प्रिया की स्मृति से जुड़ता है।
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग-
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदल कर बना मही।
हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन,
कोई थे नहीं, न आमंत्रण
था भेजा गया, विवाह-राग
भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;
प्रिय मौन एक संगीत भरा
नव जीवन के स्वर पर उतरा।
भावार्थ: वह सुंदरता (शृंगार) जो अब तक बिना किसी आकार के थी, जो अब तक सिर्फ़ कविता में बहती हुई भावधारा (रस) के रूप में थी, वही अब अपनी स्वर्गीय प्रिया (मृत पत्नी) की याद के साथ गाई जा रही थी, और प्राणों में संगीत व रंग भर रही थी। यही अमूर्त सुंदरता अब एक सुंदर, साकार रूप (रति-रूप) पा गई, मानो आकाश बदलकर धरती (मही) बन गया हो, यानी जो कल्पना और भावना में था, वह अब सरोज के रूप में असली दुनिया में साकार हो गया। विवाह तो हो गया, पर इसमें कोई अपने रिश्तेदार (आत्मीय स्वजन) नहीं थे, न किसी को आमंत्रण भेजा गया था। घर में विवाह का उत्सव-राग दिन-रात जागकर नहीं भर रहा था, बल्कि प्रिय मौन में भरा एक संगीत ही नए जीवन के स्वर पर उतर आया था, यानी यह एक सादा, बिना दिखावे का विवाह था, फिर भी भावनाओं से भरा हुआ।
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में, ‘वह शकुंतला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।’
कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जलद धरा को ज्यों अपार;
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त;
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूँदे दृग वर महामरण!
भावार्थ: एक माँ जो भी शिक्षा देती (“माँ की कुल शिक्षा”), वह सब निराला ने खुद अपनी बेटी को दी (पद 2 में पत्नी को “स्वर्गीया-प्रिया” कहा गया है)। उसकी शादी की सेज (बिस्तर) भी उन्होंने खुद ही सजाई। वे मन में सोचते हैं, “वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।” यानी उन्हें कालिदास की शकुंतला का ध्यान आता है, पर तुरंत लगता है कि सरोज का पाठ और कला अलग है। पाठ यह नहीं बताता कि शकुंतला का ध्यान क्यों आया, और न ही इस अंतर का ब्योरा देता है। सरोज कुछ दिन घर में खुशी-खुशी (समोद) रहकर फिर अपनी नानी की स्नेह भरी गोद में जा बैठी। मामा-मामी का प्यार उस पर बादल की तरह अपार बरसा। वही लोग उसके सुख-दुख में सदा न्यस्त (निहित) रहे, और उसके हित में सदा व्यस्त रहे। निराला कहते हैं, वह वही बेल (लता) थी जहाँ वह कली खिली थी, यानी सरोज वहीं (नानी के घर में) स्नेह से पली-बढ़ी, और अंत में भी उसी गोद में शरण लेकर, आँखें मूँदकर उसने महान मृत्यु (महामरण) को प्राप्त किया, यानी सरोज का अंत भी नानी की उसी गोद में हुआ, जहाँ वह पली थी।
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
(‘सरोज स्मृति’ कविता का अंश)
भावार्थ: निराला कहते हैं, तू (सरोज) मेरे जैसे भाग्यहीन (दुर्भाग्यशाली) पिता का सहारा (संबल) थी, और लंबे समय बाद जब तू व्याकुल (विकल) हुई, तब भी दुख ही मेरे जीवन की पूरी कहानी रही। वे कहते हैं, आज मैं क्या कहूँ, जो पहले कभी कहा ही नहीं गया! वे कहते हैं: मेरे इसी कर्म पर भले ही वज्रपात (बिजली गिरना, यानी भारी विपत्ति) हो; यदि यही धर्म है, तो इस पथ पर मेरा माथा सदा झुका रहे, यानी मैं हर दुख सिर झुकाकर स्वीकार करूँगा; भले ही मेरे सारे कार्य ठंड से मुरझाए हुए कमल के फूलों (शतदल) की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ। अंत में वे कहते हैं, हे बेटी (कन्ये), मैं अपने बीते हुए कर्मों को तुझे अर्पित करता हूँ, और यही तेरा तर्पण (अंतिम विदाई की रस्म) करता हूँ। इस पद में एक भाग्यहीन पिता का दुख, प्रेम और अंतिम विदाई एक साथ प्रकट होते हैं।
4 शब्दार्थ: सरोज स्मृति
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आमूल | मूल अथवा जड़ तक, पूरी तरह |
| नवल | नया |
| स्पंद | कंपन |
| उर | हृदय, मन |
| स्तब्ध | स्थिर, दृढ़ |
| उच्छ्वास | आह भरना (गहरी साँस) |
| धीति | प्यास, पान |
| निराकार | जिसका कोई आकार न हो |
| रति-रूप | कामदेव की पत्नी रति के रूप जैसी, अत्यंत सुंदर |
| मही | पृथ्वी |
| सेज | शय्या, बिस्तर |
| शकुंतला | कालिदास की नाट्यकृति “अभिज्ञान शाकुंतलम्” की नायिका |
| समोद | हर्षसहित, खुशी के साथ |
| जलद | बादल |
| न्यस्त | निहित |
| संबल | सहारा |
| बज्रपात (कविता में: वज्रपात) | भारी विपत्ति, कठोर |
| स्वजन | आत्मीय, अपने लोग |
| शतदल | कमल |
| अर्पण | देना, अर्पित करना, चढ़ाना |
| तर्पण | देवताओं, ऋषियों और पितरों को तिल या तंडुल-मिश्रित जल देने की क्रिया |
रस: पूरी कविता में करुण रस की प्रधानता है (विवाह-वर्णन वाले अंश में सरोज के सौंदर्य का शृंगारिक चित्रण भी है), एक पिता अपनी दिवंगत बेटी को याद करते हुए गहरा विलाप कर रहा है।
अलंकार: “आकाश बदल कर बना मही” में रूपक अलंकार है, अमूर्त भाव (आकाश) को सीधे साकार वस्तु (मही) के रूप में बता दिया गया है। “मेरे कार्य सकल हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल” में उपमा अलंकार है, कवि के कार्यों की तुलना ठंड से मुरझाए कमल से की गई है। “वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली” में सरोज की तुलना कली से और परिवार की तुलना लता (बेल) से करके रूपक अलंकार रचा गया है।
भाव: पिता की ममता, पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता-बोध, और अंत में तर्पण, ये कविता के प्रमुख भाव हैं।
भाषा-शैली: कविता खड़ी बोली में है, शब्दावली तत्सम-प्रधान और संस्कृतनिष्ठ (जैसे निराकार, न्यस्त, वज्रपात) है, और पंक्तियाँ दो-दो के जोड़ों में तुक मिलाती दिखती हैं (जैसे नवल-जल, मंद-स्पंद)। पाठ्यपुस्तक इस कविता के छंद का नाम नहीं बताती।
NCERT का एक प्रश्न पूछता है कि क्या “मुझ भाग्यहीन की तू संबल” पंक्ति “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे कार्यक्रम की माँग करती है। ऐसे प्रश्न का उत्तर देते समय दो बातें लिखें: पहला, निराला अपनी बेटी को अपना “संबल” (सहारा) कहते हैं, यानी बेटी पिता का सहारा बन सकती है; दूसरा, इसीलिए बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा के लिए ऐसे कार्यक्रम ज़रूरी हैं, ताकि हर बेटी को अपनी क्षमता दिखाने और परिवार का सहारा बनने का मौका मिले। अपने विचार तर्क के साथ लिखें, सिर्फ़ “हाँ” या “नहीं” न लिखें।
- निराला के जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए रामविलास शर्मा की पुस्तक ‘महाकवि निराला’ पढ़िए।
- अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।
- ‘सरोज स्मृति’ पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।
- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1898-1961), जन्म महिषादल गाँव (बंगाल), विधिवत स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक ही, मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं
- प्रसिद्ध रचनाएँ: जूही की कली (1916), परिमल, अनामिका, तुलसीदास, राम की शक्ति पूजा, बिल्लेसुर बकरिहा (उपन्यास)
- सरोज स्मृति: निराला की दिवंगत पुत्री सरोज पर लिखा गया शोकगीत, पिता का विलाप
- पाठ्यपुस्तक में कविता का एक अंश है, 4 पद (48 पंक्तियाँ); पूरी कविता कहीं बड़ी है
- पद 1-2: सरोज का सादा विवाह, बिना रिश्तेदारों और आमंत्रण के; नव-वधू “मेरे वसंत की प्रथम गीति”; स्वर्गीया पत्नी की स्मृति
- पद 3: माँ की कुल शिक्षा पिता ने स्वयं दी; “वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला”; नानी-मामा-मामी के स्नेह में पली, और नानी की उसी गोद में अंत हुआ
- पद 4: भाग्यहीन पिता का दुख (“दुख ही जीवन की कथा रही”), और बेटी का तर्पण
- रस: करुण; प्रमुख अलंकार: रूपक और उपमा; पंक्तियाँ जोड़ों में तुक मिलाती हैं (छंद का नाम पाठ्यपुस्तक में नहीं)