कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 2 का त्वरित पुनरीक्षण। प्रमुख तथ्य और सभी शब्दार्थ एक ही जगह। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, फिर परीक्षा से पहले यह पढ़ें।
1 कवि-परिचय एक नज़र में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| नाम | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ |
| जन्म | महिषादल गाँव, मेदिनीपुर ज़िला, बंगाल |
| पितृग्राम | गढ़कोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश |
| बचपन का नाम | सूर्य कुमार |
| जीवनकाल | सन् 1898 – 1961 |
| विद्यालयी शिक्षा | विधिवत स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक ही |
| पहचान | मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं; छायावाद और हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ |
| देहांत | इलाहाबाद |
2 जीवन-कालक्रम
1898जन्म, महिषादल गाँव (बंगाल)
1916“जूही की कली” लिखी; इससे बाद में प्रसिद्धि मिली और मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने गए
1918पत्नी का देहांत
1922“समन्वय” पत्रिका के संपादन से जुड़े
1923-24“मतवाला” के संपादक मंडल में शामिल
1961देहांत, इलाहाबाद
3 रचनाएँ
| विधा | रचनाएँ |
|---|---|
| काव्य-कृतियाँ | परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज आदि |
| उपन्यास | बिल्लेसुर बकरिहा (विशेष चर्चित) |
| कहानियाँ | कविता के अतिरिक्त कहानियाँ भी लिखीं |
| संकलन | निराला रचनावली (आठ खंड) |
| प्रबंधात्मक कविताएँ | राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास |
4 सरोज स्मृति: प्रसंग एक-नज़र
मुख्य बिंदु
- निराला की दिवंगत पुत्री सरोज पर लिखा गया शोकगीत, पिता का विलाप
- यह पूरी कविता नहीं, एक अंश है: पाठ्यपुस्तक में 4 पद (48 पंक्तियाँ)
- कवि को कभी शकुंतला की याद आती है, कभी स्वर्गीय पत्नी की
- भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध और पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता-बोध भी इस कविता में प्रकट हुआ है
5 चारों पदों का सार
| पद | मुख्य कथ्य |
|---|---|
| पद 1 | सरोज के विवाह का दृश्य: मंद हँसी, “होठों में बिजली फँसी स्पंद”, नव-वधू “मेरे वसंत की प्रथम गीति” |
| पद 2 | सादा विवाह: कोई आत्मीय स्वजन नहीं, न आमंत्रण; स्वर्गीय पत्नी की स्मृति के साथ यह भाव साकार होना |
| पद 3 | माँ की कुल शिक्षा पिता ने स्वयं दी; “वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला”; नानी-मामा-मामी का स्नेह; नानी की उसी गोद में अंत |
| पद 4 | “दुख ही जीवन की कथा रही”; अपने कर्म पर वज्रपात भी हो तो धर्म-पथ पर सिर नत रखना; अंतिम तर्पण |
6 पात्र/संदर्भ-सूची
| नाम | परिचय |
|---|---|
| सरोज | निराला की दिवंगत पुत्री, कविता की केंद्रीय पात्र |
| शकुंतला | कालिदास की “अभिज्ञान शाकुंतलम्” की नायिका; कवि को सरोज के प्रसंग में उसका ध्यान आता है |
| स्वर्गीय पत्नी | निराला की मृत पत्नी, जिनकी याद बेटी के रूप-रंग में आती है |
| नानी, मामा-मामी | जिनके स्नेह में सरोज पली; नानी की उसी गोद में उसका अंत भी हुआ |
7 सभी शब्दार्थ एक जगह
सरोज स्मृति (21 शब्द)
आमूलमूल अथवा जड़ तक, पूरी तरह
नवलनया
स्पंदकंपन
उरहृदय, मन
स्तब्धस्थिर, दृढ़
उच्छ्वासआह भरना
धीतिप्यास, पान
निराकारजिसका कोई आकार न हो
रति-रूपकामदेव की पत्नी के रूप जैसी, अत्यंत सुंदर
महीपृथ्वी
सेजशय्या, बिस्तर
शकुंतलाकालिदास की नाट्यकृति “अभिज्ञान शाकुंतलम्” की नायिका
समोदहर्षसहित, खुशी के साथ
जलदबादल
न्यस्तनिहित
संबलसहारा
बज्रपात (कविता में: वज्रपात)भारी विपत्ति, कठोर
स्वजनआत्मीय, अपने लोग
शतदलकमल
अर्पणदेना, अर्पित करना, चढ़ाना
तर्पणदेवताओं, ऋषियों और पितरों को तिल या तंडुल-मिश्रित जल देने की क्रिया
8 काव्य-सौंदर्य एक नज़र में
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| रस | करुण रस (विवाह-वर्णन में शृंगारिक चित्रण) |
| प्रमुख अलंकार | रूपक (आकाश बदल कर बना मही), उपमा (शीत के-से शतदल) |
| भाषा-शैली | खड़ी बोली, तत्सम-प्रधान शब्दावली; पंक्तियाँ जोड़ों में तुक मिलाती हैं (नवल-जल, मंद-स्पंद); पाठ्यपुस्तक छंद का नाम नहीं बताती |
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1898-1961), जन्म महिषादल (बंगाल), मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं
- सरोज स्मृति: दिवंगत पुत्री सरोज पर शोकगीत, पिता का विलाप; पाठ्यपुस्तक में 4 पद का अंश
- पद 1-2: नव-वधू “मेरे वसंत की प्रथम गीति”; सादा विवाह, बिना आत्मीय स्वजन और आमंत्रण के; स्वर्गीया पत्नी की याद
- पद 3: माँ की कुल शिक्षा पिता ने दी, शकुंतला का ध्यान (“पर पाठ अन्य यह, अन्य कला”), नानी-मामा-मामी का स्नेह, नानी की उसी गोद में अंत
- पद 4: भाग्यहीन पिता का दुख, अकर्मण्यता-बोध, अंतिम तर्पण
- रस: करुण; अलंकार: रूपक, उपमा; पंक्तियाँ जोड़ों में तुक मिलाती हैं (छंद का नाम पाठ्यपुस्तक में नहीं)
इसी अध्याय की बाक़ी सामग्री