NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 3 यह दीप अकेला / मैंने देखा, एक बूँद के प्रश्न-अभ्यास (दोनों कविताओं के 11 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी चौदह प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ्यपुस्तक के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 यह दीप अकेला
प्र. ‘दीप अकेला’ के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि उसे कवि ने स्नेह भरा, गर्व भरा एवं मदमाता क्यों कहा है?
उत्तर: “दीप” यहाँ अकेले व्यक्ति (व्यष्टि) का प्रतीक है। कवि दीप को स्नेह भरा, गर्व भरा और मदमाता कहते हैं, फिर भी वह अकेला है। दीप (दीया) स्नेह अर्थात् तेल से भरा होता है, और व्यक्ति के संदर्भ में इसे प्रेम से भरा होना पढ़ा जा सकता है। पाठ के अनुसार “दीप सब कुछ है, सारे गुण एवं शक्तियाँ उसमें हैं, उसकी व्यक्तिगत सत्ता भी कम नहीं है”, इसलिए उसमें गर्व और मद है। पाठ यह भी कहता है कि “अहंकार का मद हमें अपनों से अलग कर देता है”, इसी से दीप अकेला रह जाता है। इसीलिए कवि कहते हैं कि इसको भी पंक्ति को दे दो।
प्र. यह दीप अकेला है ‘पर इसको भी पंक्ति को दे दो’ के आधार पर व्यष्टि का समष्टि में विलय क्यों और कैसे संभव है?
उत्तर: दीप में अपने आप में सारे गुण और सारी शक्तियाँ मौजूद हैं, उसकी अपनी सत्ता भी कम नहीं है, फिर भी पंक्ति की तुलना में वह एक है, एकाकी है। दीप का पंक्ति में विलय इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि पाठ के अनुसार पंक्ति या समूह में विलय ही उसकी ताकत का, उसकी सत्ता का सार्वभौमीकरण (सबके लिए साझा हो जाना) है और उसके लक्ष्य एवं उद्देश्य का सर्वव्यापीकरण है। ठीक यही स्थिति मनुष्य की भी है: व्यक्ति सर्वशक्तिमान और सर्वगुणसंपन्न होते हुए भी, जब समाज (समष्टि) में विलीन होता है, तो समाज के साथ उसकी अंतरंगता से समाज मज़बूत होगा, राष्ट्र मज़बूत होगा। यह विलय तब संभव है जब व्यक्ति अपना अहंकार छोड़कर स्वयं को समाज को सौंप दे, जैसे कवि कहते हैं, “पर इसको भी पंक्ति को दे दो”।
प्र. ‘गीत’ और ‘मोती’ की सार्थकता किससे जुड़ी है?
उत्तर: “गीत” की सार्थकता इस बात से जुड़ी है कि इसे गाने वाला दीप (जन) ऐसे गीत गाता है, जिन्हें “फिर और कौन गाएगा?”, यानी उसकी अपनी विशिष्ट अभिव्यक्ति में ही गीत की सार्थकता है। “मोती” की सार्थकता इस बात से जुड़ी है कि दीप एक गोताखोर (पनडुब्बा) की तरह ऐसे सच्चे मोती लाता है, जिन्हें लाने वाला “फिर कौन कृती” (भाग्यवान, कुशल व्यक्ति) होगा। दोनों ही, गीत और मोती, दीप की अपनी विशिष्ट, अद्वितीय क्षमता को दर्शाते हैं; कवि इसी अद्वितीय दीप को पंक्ति को सौंपने की बात कहते हैं।
प्र. “यह अद्वितीय–यह मेरा–यह मैं स्वयं विसर्जित” पंक्ति के आधार पर व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता बताइए।
उत्तर: इस पंक्ति में दीप को अद्वितीय (बेजोड़), “मेरा” (अपना) और “मैं स्वयं विसर्जित” कहा गया है; विसर्जित का अर्थ है “त्यागा हुआ”, यानी स्वयं को त्यागकर समाज में मिला देने वाला। व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता यह है कि जब तक व्यक्ति अपनी अद्वितीयता को केवल अपने तक सीमित रखता है, तब तक वह अकेला रहता है। जब वही अद्वितीय व्यक्ति स्वयं को समाज (पंक्ति) को सौंप देता है, तो पाठ के अनुसार उसकी महत्ता एवं सार्थकता बढ़ जाती है, उसकी सत्ता का सार्वभौमीकरण होता है, और समाज के साथ उसकी अंतरंगता से समाज और राष्ट्र मज़बूत होते हैं।
प्र. ‘यह मधु है ———— तकता निर्भय’ पंक्तियों के आधार पर बताइए कि ‘मधु’, ‘गोरस’ और ‘अंकुर’ की क्या विशेषता है?
उत्तर: “मधु” (शहद) की विशेषता यह है कि वह “स्वयं काल की मौना का युग-संचय” है, यानी मानो समय ने युगों-युगों से अपनी टोकरी (मौना) में उसे संचित किया हो। “गोरस” (दूध, दही) की विशेषता है कि वह “जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय” है, यानी जीवन-रूपी कामधेनु गाय का अमृत रूपी पवित्र दूध; इसे जीवनदायी और पोषक कहा जा सकता है। “अंकुर” की विशेषता है कि वह धरती को फोड़कर बाहर निकलता है और निर्भय होकर सीधे सूरज (रवि) की ओर देखता है, यानी वह साहसी और निर्भय है। तीनों ही दीप के भीतर मौजूद अलग-अलग गुणों (युगों का संचित मधु, पोषण और साहस) को दर्शाते हैं।
प्र. भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए:
(क) यह प्रकृत, स्वयंभू ———— शक्ति को दे दो।
(ख) यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक ———— चिर-अखंड अपनापा।
(ग) जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो।
उत्तर (क): भाव: दीप अपने आप में स्वाभाविक (प्रकृत), स्वयं पैदा हुआ (स्वयंभू) और ब्रह्म-तुल्य है, फिर भी कवि कहते हैं, इस दीप को भी शक्ति (सामूहिक सामर्थ्य) को सौंप देना चाहिए। शिल्प-सौंदर्य: तत्सम शब्दावली (प्रकृत, स्वयंभू, अयुतः) का प्रयोग है, इस अंतरे की अपनी अंतिम पंक्ति में (अपरिवर्तित टेक से ठीक पहले) “शक्ति” शब्द का प्रयोग, दीप की माँग को एक कदम आगे ले जाता है।
उत्तर (ख): भाव: कुत्सा (निंदा, घृणा), अपमान और अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे अँधेरे में भी यह दीप सदा-द्रवित (हमेशा पिघलता हुआ), चिर-जागरूक (हमेशा जागा हुआ), अनुरक्त-नेत्र (प्रेम से भरी आँखों वाला) और उल्लंब-बाहु (उठी हुई बाँह वाला) है; यह चिर-अखंड (कभी न टूटने वाला) अपनापा है। शिल्प-सौंदर्य: “चिर-जागरूक … चिर-अखंड” में ‘चिर’ शब्द की पुनरुक्ति से पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है, “सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, उल्लंब-बाहु” में सामासिक पदों का सुंदर प्रयोग है, भाषा तत्सम-प्रधान है।
उत्तर (ग): भाव: यह दीप जिज्ञासु, प्रबुद्ध (ज्ञान से जागा हुआ) और सदा श्रद्धामय है; कवि माँग करते हैं कि इसे भक्ति को भी सौंप दिया जाए (“इसको भक्ति को दे दो”)। शिल्प-सौंदर्य: “जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय” जैसे विशेषणों की शृंखला दीप के गुणों को क्रम से सामने रखती है, तीसरे अंतरे की अपनी अंतिम पंक्ति में (टेक से ठीक पहले) “भक्ति” शब्द आता है; पंक्ति → शक्ति → भक्ति के इस क्रम को समर्पण के एक-एक कदम आगे बढ़ने के रूप में पढ़ा जा सकता है, जबकि टेक खुद चारों बार अपरिवर्तित रहती है।
प्र. ‘यह दीप अकेला’ एक प्रयोगवादी कविता है। इस कविता के आधार पर ‘लघु मानव’ के अस्तित्व और महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: “यह दीप अकेला” में दीप कोई देवता या महानायक नहीं, बल्कि एक साधारण, अकेला दीप है, फिर भी कवि उसमें सारे गुण, सारी शक्तियाँ, एक पूरी सत्ता होने की बात कहते हैं। इसे “लघु मानव” (साधारण, आम इंसान) की दृष्टि से पढ़ा जा सकता है: प्रयोगवादी कविता किसी बड़े नायक की जगह साधारण मनुष्य के अनुभवों और भावनाओं को केंद्र में रखती है, और पाठ के अनुसार अज्ञेय की कविता में “व्यक्ति की स्वतंत्रता का आग्रह है”। दीप का पंक्ति से जुड़ना यह भी दिखाता है कि व्यक्ति की समाज के साथ अंतरंगता से समाज मज़बूत होता है, राष्ट्र मज़बूत होता है। इस तरह “लघु मानव” का अस्तित्व अपने आप में पूर्ण और सार्थक है, और उसका महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब वह समाज के साथ जुड़ता है।
2 मैंने देखा, एक बूँद
प्र. ‘सागर’ और ‘बूँद’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर: “सागर” से कवि का आशय विराट् (बहुत बड़ा, ब्रह्म) से है, जिसके सम्मुख बूँद दिखाई देती है। “बूँद” से कवि का आशय क्षणभंगुरता से है: बूँद सागर के झाग से ही सहसा उछलती है और केवल क्षणभर के लिए सागर से अलग दिखती है। पाठ के अनुसार “यह क्षणभंगुरता बूँद की है, समुद्र की नहीं।” इस तरह बूँद को व्यक्ति के क्षणिक अस्तित्व का और सागर को उस विराट् सत्ता का प्रतीक माना जा सकता है।
प्र. ‘रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से’ पंक्ति के आधार पर बूँद के क्षणभर रंगने की सार्थकता बताइए।
उत्तर: बूँद का क्षण-भर के लिए ढलते सूरज की आग से रंग जाना, उसे उसी एक क्षण में एक अलग, विशिष्ट पहचान दे देता है। क्षणभर का यह दृश्य देखकर कवि को एक दार्शनिक तत्व भी दीखने लग जाता है: विराट् के सम्मुख बूँद का समुद्र से अलग दिखना नश्वरता के दाग से, नष्ट होने के बोध से मुक्ति का अहसास है। यही बूँद के क्षणभर रंगने की सार्थकता है; इसके माध्यम से कवि ने जीवन में क्षण के महत्त्व को प्रतिष्ठापित किया है।
प्र. ‘सूने विराट् के सम्मुख ———— दाग से!’ पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इन पंक्तियों का भावार्थ है: इस सूने, असीम विराट् (बहुत बड़ा, ब्रह्म) के सम्मुख, हर वह अपनापन जिसे आलोक (रोशनी) ने छुआ है, नश्वरता (नाशशीलता) के दाग से उन्मोचन (मुक्ति) पाता है। पाठ के शब्दों में, विराट् के सम्मुख बूँद का समुद्र से अलग दिखना “नश्वरता के दाग से, नष्ट होने के बोध से मुक्ति का अहसास है।” वह आलोक-छुआ क्षण बूँद की अपनी सार्थक पहचान बन जाता है।
प्र. ‘क्षण के महत्त्व’ को उजागर करते हुए कविता का मूल भाव लिखिए।
उत्तर: पाठ के अनुसार, इस कविता के माध्यम से कवि ने “जीवन में क्षण के महत्त्व को, क्षणभंगुरता को प्रतिष्ठापित किया है।” समुद्र के झाग से सहसा उछली एक बूँद क्षणभर के लिए ढलते सूरज की आग से रंग जाती है और उसी क्षण में अपनी अलग पहचान पा लेती है। यह क्षणभंगुरता बूँद की है, समुद्र की नहीं। विराट् के सम्मुख बूँद का यह क्षणभर अलग दिखना नश्वरता के दाग से, नष्ट होने के बोध से मुक्ति का अहसास है। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि जीवन का एक क्षण भी, यदि वह आलोक से छुआ हुआ है, अपने आप में मूल्यवान है।
3 योग्यता-विस्तार
प्र. अज्ञेय की कविताएँ ‘नदी के द्वीप’ व ‘हरी घास पर क्षणभर’ पढ़िए और कक्षा की भित्ति पत्रिका पर लगाइए।
उत्तर: (यह एक पठन और प्रस्तुति-गतिविधि है, विद्यार्थी स्वयं पुस्तकालय से कविताएँ खोजकर पढ़ें।) पाठ्यपुस्तक के कवि-परिचय में ‘हरी घास पर क्षणभर’ अज्ञेय की मुख्य काव्य-कृतियों में गिनाई गई है (जबकि ‘नदी के द्वीप’ नाम से उनका एक उपन्यास भी है)। भित्ति पत्रिका के लिए कविता को सुंदर अक्षरों में लिखें, नीचे कवि का नाम लिखें और दो-तीन पंक्तियों में उसका भाव भी दें। ‘यह दीप अकेला’ की तरह इन कविताओं में भी व्यक्ति और समाज, या क्षण के महत्त्व जैसे विचार खोजने की कोशिश करें।
प्र. ‘मानव और समाज’ विषय पर परिचर्चा कीजिए।
उत्तर: (यह कक्षा-परिचर्चा की गतिविधि है।) परिचर्चा का आधार ‘यह दीप अकेला’ हो सकती है: पाठ्यपुस्तक के अनुसार व्यक्ति सब कुछ है, सर्वशक्तिमान है, सर्वगुणसंपन्न है, फिर भी समाज में उसका विलय, समाज के साथ उसकी अंतरंगता से समाज मज़बूत होगा, राष्ट्र मज़बूत होगा। पक्ष और विपक्ष में तर्क रखें, जैसे व्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्त्व और समाज के प्रति उसका दायित्व, और अंत में व्यष्टि के समष्टि में विलय (आत्मबोध का विश्वबोध में रूपांतरण) वाले निष्कर्ष पर पहुँचें।
प्र. भारतीय दर्शन में ‘सागर’ और ‘बूँद’ का संदर्भ जानिए।
उत्तर: (यह खोज-आधारित गतिविधि है, विद्यार्थी अध्यापक या पुस्तकालय की सहायता से जानकारी एकत्र करें।) भारतीय दर्शन में सागर को प्रायः विराट, असीम सत्ता (ब्रह्म) का और बूँद को उससे निकली व्यक्तिगत आत्मा (जीव) का प्रतीक माना जाता है: बूँद सागर से अलग दिखती है, पर उसी का अंश है। ‘मैंने देखा, एक बूँद’ में भी शब्दार्थ के अनुसार विराट् का अर्थ ‘बहुत बड़ा, ब्रह्म’ है, और कविता बूँद के क्षणभर सागर से अलग दिखने को नश्वरता के दाग से मुक्ति (उन्मोचन) के रूप में देखती है।