कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 3 का त्वरित पुनरीक्षण। हर परिभाषा, हर शब्दार्थ और हर नामित तथ्य एक ही जगह, बीच का कुछ नहीं। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, यह परीक्षा की सुबह पढ़ें।
1 कवि-परिचय एक नज़र में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मूल नाम | सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन |
| कलम-नाम | अज्ञेय |
| जीवनकाल | सन् 1911 – 1987 |
| जन्मस्थान | कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) |
| शिक्षा | अंग्रेज़ी-संस्कृत में प्रारंभिक शिक्षा; बी.एससी. के बाद एम.ए. अंग्रेज़ी (क्रांतिकारी आंदोलन के कारण अधूरी) |
| पत्रिका | “दिनमान” के संस्थापक संपादक |
| परंपरा | सप्तक परंपरा के जनक (तार सप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक) |
| पुरस्कार | साहित्य अकादमी, भारत भारती, भारतीय ज्ञानपीठ |
| काव्य-संकलन | सदानीरा (दो भागों में) |
| साहित्यिक आंदोलन | प्रयोगवाद के प्रवर्तक |
2 रचनाएँ, विधा-अनुसार
| विधा | रचनाएँ |
|---|---|
| उपन्यास | शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने-अपने अजनबी |
| यात्रा-वृत्तांत | अरे यायावर रहेगा याद, एक बूँद सहसा उछली |
| निबंध | त्रिशंकु, आत्मने पद |
| कहानी संग्रह | विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप |
| काव्य-कृतियाँ | भग्नदूत, चिंता, हरी घास पर क्षणभर, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार |
3 दोनों कविताओं की मूल जानकारी
| यह दीप अकेला | मैंने देखा, एक बूँद | |
|---|---|---|
| केंद्रीय प्रतीक | दीप (व्यष्टि) और पंक्ति (समष्टि) | बूँद (क्षणभंगुरता) और सागर/विराट (बहुत बड़ा, ब्रह्म) |
| विषय | व्यक्ति का समाज से जुड़ाव | जीवन के एक क्षण का महत्त्व |
| संरचना | टेक + 3 अंतरे | कोई पद-विभाजन नहीं, 10 पंक्तियाँ |
| भाव | आत्म-समर्पण, समाज के प्रति निष्ठा | क्षणभंगुरता पर दार्शनिक चिंतन |
| छंद व भाषा | मुक्त छंद, खड़ी बोली | मुक्त छंद, खड़ी बोली |
| नाटकीय पात्र | कोई नहीं (कवि की सीधी आवाज़) | कोई नहीं (कवि की सीधी आवाज़) |
4 टेक (अपरिवर्तित) और हर अंतरे की अपनी माँग
टेक (4 बार, हमेशा एक-सी)है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो
अंतरा 1 की अंतिम पंक्ति“… यह मैं स्वयं विसर्जित”, फिर टेक दोहराई जाती है
अंतरा 2 की अंतिम पंक्तियह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो, फिर टेक दोहराई जाती है
अंतरा 3 की अंतिम पंक्तिजिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो, फिर टेक दोहराई जाती है
5 सभी शब्दार्थ एक जगह
यह दीप अकेला
कृतीभाग्यवान, कुशल
पनडुब्बागोताखोर, एक जलपक्षी जो पानी में डूब-डूबकर मछलियाँ पकड़ता है
समिधायज्ञ की सामग्री
बिरलाबहुतों में एक
विसर्जितत्यागा हुआ
गोरसदूध, दही
निर्भयभय रहित, निडर
प्रकृतप्रकृति से उत्पन्न, प्रकृति के अनुरूप, स्वाभाविक
स्वयंभूब्रह्मा, स्वयं पैदा हुआ
अयुतः10 हज़ार की संख्या, असंबद्ध, पृथक
अमृत-पूत-पयअमृत रूपी पवित्र दूध
कुत्सानिंदा, घृणा
उल्लंब-बाहुउठी हुई बाँह वाला
मौनाटोकरा, पिटारा
मैंने देखा, एक बूँद
विराट्बहुत बड़ा, ब्रह्म
उन्मोचनमुक्त करना, ढीला करना
नश्वरतानाशशीलता, मिटना
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रयोगवाद | छायावाद के बाद की धारा, तार सप्तक (1943) से आरंभ, नए प्रयोग और बौद्धिकता पर बल |
| लघु मानव | साधारण आम इंसान, जो किसी महानायक जैसा नहीं फिर भी अपने आप में पूरा और सार्थक है |
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
- अज्ञेय, मूल नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन (1911-1987), जन्म कुशीनगर में
- “दिनमान” के संस्थापक संपादक; सप्तक परंपरा के जनक; पुरस्कार: साहित्य अकादमी, भारत भारती, ज्ञानपीठ
- “यह दीप अकेला”: दीप = व्यष्टि, पंक्ति = समष्टि; टेक अपरिवर्तित; अंतरों के आख़िरी वाक्य क्रमशः “यह मैं स्वयं विसर्जित”, “इसको भी शक्ति को दे दो”, “इसको भक्ति को दे दो”
- “मैंने देखा, एक बूँद”: बूँद = क्षणभंगुरता, सागर/विराट = बहुत बड़ा, ब्रह्म; नष्ट होने के बोध से मुक्ति का अहसास; क्षण का महत्त्व
- प्रयोगवाद: तार सप्तक (1943) से आरंभ; लघु मानव: साधारण व्यक्ति भी अपने आप में पूर्ण है
- दोनों कविताएँ मुक्त छंद, खड़ी बोली में; इनमें कोई नाटकीय पात्र नहीं
इसी अध्याय की बाक़ी सामग्री