इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. तुलसीदास का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: तुलसीदास का जन्म बाँदा ज़िले के राजापुर गाँव में हुआ था (कुछ विद्वान सोरों, एटा को भी मानते हैं)।
प्र. तुलसीदास के गुरु कौन थे?
उत्तर: कहा जाता है, गुरु नरहरिदास की कृपा से तुलसीदास को रामभक्ति का मार्ग मिला।
प्र. रामचरितमानस की रचना कब और कहाँ आरंभ हुई?
उत्तर: सन् 1574 में अयोध्या में रामचरितमानस की रचना आरंभ हुई।
प्र. रामचरितमानस किस भाषा और छंद में रचित है?
उत्तर: रामचरितमानस अवधी भाषा में, मुख्यतः दोहा-चौपाई छंद में रचित है।
प्र. तुलसीदास को किन दो उपाधियों से जाना जाता है?
उत्तर: तुलसीदास को “लोकमंगल की साधना के कवि” और “समन्वय का कवि” कहा जाता है।
प्र. “भरत-राम का प्रेम” किस ग्रंथ और कांड से लिया गया है?
उत्तर: “भरत-राम का प्रेम” रामचरितमानस के अयोध्या कांड से लिया गया है।
प्र. “पद” किस ग्रंथ से संकलित हैं?
उत्तर: दोनों “पद” गीतावली से संकलित हैं।
प्र. “कोदव” और “संबुक” शब्दों के अर्थ बताइए।
उत्तर: कोदव का अर्थ है एक जंगली कंद मूल/मोटे चावल की किस्म; संबुक का अर्थ है घोंघा।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. तुलसीदास की जीवन-यात्रा संक्षेप में बताइए।
उत्तर: तुलसीदास का बचपन कष्टमय था, बालपन में ही माता-पिता से बिछोह हुआ और भिक्षाटन करना पड़ा। कहा जाता है, गुरु नरहरिदास की कृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला। रत्नावली से विवाह और गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध है, किंतु इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता। तीर्थाटन के बाद सन् 1574 में अयोध्या में रामचरितमानस आरंभ की, बाद में काशी में निधन हुआ।
प्र. तुलसीदास की प्रमुख रचनाओं की सूची और उनकी विशेषता बताइए।
उत्तर: रामचरितमानस (दोहा-चौपाई छंद, अवधी भाषा), कवितावली (कवित्त-सवैया छंद), गीतावली/कृष्ण गीतावली/विनयपत्रिका (पद शैली) और दोहावली (स्फुट दोहों का संकलन) तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ हैं।
प्र. रामचरितमानस, गीतावली और दोहावली के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रामचरितमानस दोहा-चौपाई छंद में रचित महाकाव्य है; गीतावली पद-शैली की गेय रचना है; दोहावली में कोई सतत कथा नहीं, केवल स्फुट (बिखरे हुए) दोहों का संकलन है।
प्र. “भरत-राम का प्रेम” अंश की पृष्ठभूमि (संदर्भ) स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह अंश राम के वनगमन के पश्चात् भरत की मनोदशा का वर्णन करता है, भरत साधु-सभा में मुनिनाथ और राम के समक्ष अपने मन की बात कहते हैं, राम के प्रेमभाव और माता के व्यवधान का उल्लेख करते हैं।
प्र. “हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही” पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: बचपन में खेलते समय भरत हार भी जाते तो राम अपनी जीत छोड़कर उन्हें ही जितवा देते थे, यह राम के भरत के प्रति असीम स्नेह और उदारता को दर्शाता है।
प्र. “फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली” का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: भरत पूछते हैं कि क्या कोदो कभी अच्छा धान फल सकता है, क्या काला घोंघा कभी मोती दे सकता है। भाव यह है कि यदि माता को दोषी मानें तो पुत्र (भरत स्वयं) कैसे अच्छा हो सकता है, यह गहरी आत्मग्लानि है।
प्र. “महीं सकल अनरथ कर मूला” कहकर भरत क्या व्यक्त करते हैं?
उत्तर: भरत स्वयं को समस्त अनर्थ (राम के वनगमन, राजा की मृत्यु, नगरवासियों के दुख) की जड़ मानते हैं, यह उनकी गहरी आत्मग्लानि और आत्मत्याग को दर्शाता है।
प्र. पद 1 में कौशल्या की मनोदशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: कौशल्या राम के धनुष-बाण और जूतियाँ देखकर बार-बार हृदय से लगाती हैं, कभी “उठहु तात” कहकर जगाने का भाव व्यक्त करती हैं, वनगमन याद आते ही “रहि चकि चित्रलिखी सी” स्तब्ध रह जाती हैं।
प्र. पद 2 में घोड़ों की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: जिन घोड़ों को राम स्वयं दूध पिलाकर, हाथों से सहलाकर पालते थे, राम के वियोग में वे दिन-प्रतिदिन मुरझा रहे हैं, भरत सौ गुना देखभाल करते हैं फिर भी उनका यह हाल है।
प्र. निषाद-प्रसंग का भरत पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: निषाद का राम के प्रति स्नेह देखकर भी भरत का वज्र-सा कठोर हृदय फट न गया, भरत इसे अपने ही दुर्भाग्य पर स्वयं को धिक्कारते हुए कहते हैं, इतना स्नेह देखकर भी उनका हृदय क्यों नहीं टूटा।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. तुलसीदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय और प्रमुख उपाधियाँ लिखिए।
उत्तर: • जीवनकाल सन् 1532-1623, जन्म राजापुर (बाँदा), वैकल्पिक मत सोरों (एटा), विद्वानों में मतभेद।
• बचपन कष्टमय, माता-पिता से बिछोह, भिक्षाटन; कहा जाता है, गुरु नरहरिदास की कृपा से रामभक्ति का मार्ग मिला।
• रत्नावली से विवाह और गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध है, किंतु इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता।
• सन् 1574 में अयोध्या में रामचरितमानस आरंभ, काशी में निधन।
• “लोकमंगल की साधना के कवि” और “समन्वय का कवि” कहे जाते हैं।
प्र. तुलसीदास की रचनाओं को छंद और भाषा के आधार पर वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर: • रामचरितमानस: दोहा-चौपाई छंद, अवधी भाषा, हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य।
• कवितावली: कवित्त-सवैया छंद।
• गीतावली, कृष्ण गीतावली, विनयपत्रिका: पद शैली (गेय रचनाएँ)।
• दोहावली: स्फुट दोहों का संकलन।
• कुल बारह प्रामाणिक कृतियाँ, इनमें से चार (रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली, विनयपत्रिका) ख्याति के आधार।
प्र. “भरत-राम का प्रेम” खंड 1 और खंड 2 में भरत के भावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: • खंड 1: भरत राम के स्वभाव की प्रशंसा करते हैं, राम अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते, बचपन से साथ नहीं छोड़ा, “हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही”।
• खंड 2: भरत भाग्य और माता को दोष देते हैं (“नीच बीचु जननी मिस पारा”, “मातु मंदि”), फिर तुरंत स्वयं को टोकते हैं (“यहउ कहत मोहि आजु न सोभा”), “फरइ कि कोदव बालि सुसाली” के दृष्टांत से आत्मग्लानि व्यक्त करते हैं।
• अंततः कहते हैं कि उनके गुरु गोसाईं और स्वामी सीता-राम हैं, इसलिए परिणाम उन्हें अच्छा लगता है (“लागत मोहि नीक परिनामू”); उनका प्रेम सच्चा है या प्रपंच, यह मुनि रघुराउ (राम) ही जानते हैं।
प्र. “भरत-राम का प्रेम” खंड 3 की विषय-वस्तु विस्तार से लिखिए।
उत्तर: • राजा दशरथ ने मरकर प्रेम का प्रण निभाया, माता की कुबुद्धि का सारा जगत साक्षी है।
• “महीं सकल अनरथ कर मूला” कहकर भरत स्वयं को अनर्थ की जड़ मानते हैं।
• राम मुनि-वेष में लक्ष्मण-सीता सहित बिना जूतों के, पैदल वन गए, इसके साक्षी स्वयं शंकर हैं।
• निषाद का स्नेह देखकर भी भरत का वज्र-सा कठोर हृदय फट न गया, भरत स्वयं को इसके लिए धिक्कारते हैं।
• साँप-बिच्छू भी विष त्याग दें, यह राम की महिमा दर्शाता है।
प्र. पद 1 और पद 2 की तुलना कीजिए।
उत्तर: • पद 1: कौशल्या राम की वस्तुएँ (धनुष-बाण, जूतियाँ) देखकर विरह-वेदना अनुभव करती हैं, “रहि चकि चित्रलिखी सी” स्तब्ध रह जाती हैं।
• पद 2: कौशल्या घोड़ों की दुर्दशा देखकर राम से लौट आने का निवेदन करती हैं, “मनहुँ कमल हिममारे”।
• समानता: दोनों गीतावली से, दोनों में कौशल्या का वात्सल्य और विरह।
• अंतर: पद 1 निर्जीव वस्तुओं पर केंद्रित, पद 2 सजीव प्राणियों (घोड़ों) पर।
प्र. “भरत-राम का प्रेम” और “पद” के अलंकार व भाषा-शैली की तुलना कीजिए।
उत्तर: • भरत-राम का प्रेम: अवधी भाषा, चौपाई-दोहा छंद, संबोधनात्मक कथन (साधु-सभा में, गुरु और राम के निकट: “साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ”)।
• पद: गीतावली से, गेय पद-शैली, उपमा (“चित्रलिखी सी”, “सिखी सी”) और उत्प्रेक्षा (“मनहुँ कमल हिममारे”) अलंकार प्रमुख।
• दोनों में तुलसी की भाषा पर असाधारण अधिकार झलकता है, भाव के अनुरूप शब्द-चयन किया गया है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “भरत-राम का प्रेम” के आधार पर भरत के चरित्र की विशेषताएँ विस्तार से लिखिए।
उत्तर: • राम के प्रति असीम श्रद्धा और प्रेम, बचपन के खेल की स्मृति द्वारा व्यक्त।
• गहरी आत्मग्लानि, स्वयं को समस्त अनर्थ की जड़ मानना (“महीं सकल अनरथ कर मूला”)।
• आत्म-संयम: माता को दोष देकर भी (“मातु मंदि”, “जननी कुमति जगतु सबु साखी”) तुरंत स्वयं को टोकना कि यह कहना भी उन्हें शोभा नहीं देता, और स्वयं को साधु मानना करोड़ों कुचालों के समान है।
• विनम्रता: अपना प्रेम सच्चा है या प्रपंच, इसका निर्णय स्वयं न करके “मुनि रघुराउ” (राम) पर छोड़ना।
• संवेदनशील हृदय, निषाद का स्नेह देखकर भी अपना वज्र-सा कठोर हृदय न फटने पर स्वयं को धिक्कारना, भीतर से अत्यंत द्रवित होना।
• इन विशेषताओं से भरत का चरित्र उदात्त रूप में सामने आता है।
प्र. “पद” के आधार पर माता कौशल्या के वात्सल्य और विरह-भाव को विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: • पद 1 में कौशल्या राम की वस्तुओं (धनुष-बाण, जूतियाँ) को बार-बार हृदय-नेत्रों से लगाती हैं।
• कभी पहले की तरह जगाने का भाव, “उठहु तात” कहकर मीठे बोल बोलतीं।
• वनगमन याद आते ही स्तब्ध रह जातीं, “रहि चकि चित्रलिखी सी”।
• पद 2 में घोड़ों को देखकर राम से लौट आने का निवेदन, “राघौ! एक बार फिरि आवौ”।
• घोड़ों की दुर्दशा (“मनहुँ कमल हिममारे”) के माध्यम से माता की गहरी चिंता व्यक्त होती है।
• अंत में पथिक से संदेश भेजने का प्रयास, यह मातृ-हृदय की व्याकुलता की पराकाष्ठा है।
• अंतिम पंक्ति “तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो” में माता कहती हैं कि उन्हें और सबसे बढ़कर इन घोड़ों की बड़ी चिंता है, यही वात्सल्य की गहराई है।
प्र. तुलसीदास के जीवन, रचनाओं और “भरत-राम का प्रेम”/”पद” के साहित्यिक महत्व पर विस्तृत निबंध लिखिए।
उत्तर: जीवन-परिचय:
• जीवनकाल सन् 1532-1623, जन्म राजापुर (बाँदा), गुरु नरहरिदास (कहा जाता है), रत्नावली से विवाह और गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध (पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता), निधन काशी में।
रचनाएँ:
• रामचरितमानस (अवधी, दोहा-चौपाई), कवितावली (कवित्त-सवैया), गीतावली/विनयपत्रिका (पद शैली), दोहावली (दोहा-संकलन), बारह प्रामाणिक कृतियाँ।
साहित्यिक महत्व:
• “लोकमंगल की साधना के कवि” व “समन्वय का कवि” की उपाधि, विश्वबोध और आत्मबोध का समन्वय।
• “भरत-राम का प्रेम” में भ्रातृ-प्रेम, आत्मग्लानि और त्याग का उदात्त चित्रण।
• “पद” में मातृ-वात्सल्य और विरह-वेदना का मार्मिक चित्रण, उपमा-उत्प्रेक्षा अलंकारों से समृद्ध भाषा।
• दोनों अंश तुलसी की भाषा पर असाधारण अधिकार और भावाभिव्यक्ति की गहनता प्रमाणित करते हैं।
5 केस स्टडी
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।।
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।
(क) 1 अंक भरत प्रारंभ में सारा दोष किस पर डालते हैं?
उत्तर: भरत प्रारंभ में विधाता (भाग्य) पर, और माता के बहाने पर दोष डालते हैं।
(ख) 1 अंक भरत अपने गुरु और स्वामी किसे बताते हैं, और परिणाम उन्हें कैसा लगता है?
उत्तर: उनके गुरु गोसाईं (प्रसंग से वशिष्ठ) हैं और स्वामी सीता-राम (“गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू”), इसलिए परिणाम उन्हें अच्छा लगता है (“लागत मोहि नीक परिनामू”)।
(ग) 2 अंक “फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली” का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: भरत पूछते हैं कि क्या कोदो (मोटे चावल की एक किस्म) में कभी उत्तम धान फल सकता है, क्या काला घोंघा कभी मोती उत्पन्न कर सकता है। भाव यह है कि बुरी माता का पुत्र स्वयं अच्छा कैसे हो सकता है; यह भरत की गहरी आत्मग्लानि है।
(घ) 2 अंक इस काव्यांश के आधार पर भरत के चरित्र की कौन-सी विशेषता उभरती है?
उत्तर: भरत की आत्मग्लानि और आत्म-संयम उभरता है। वे माता को बुरा कहते भी हैं (“मातु मंदि”), पर तुरंत स्वयं को टोकते हैं कि ऐसा कहना भी उन्हें शोभा नहीं देता (“यहउ कहत मोहि आजु न सोभा”); किसी और को लेशमात्र दोष न देकर अपने दुर्भाग्य को ही अथाह सागर मानते हैं।
ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।।
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज वार वार चुचुकारे।
क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले! ते अब निपट बिसारे।।
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे।
तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।।
सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो।
तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो।।
(क) 1 अंक कौशल्या राम से क्या निवेदन करती हैं?
उत्तर: कौशल्या राम से एक बार फिर अयोध्या लौट आने का निवेदन करती हैं, अपने घोड़ों को देखकर फिर वन को चले जाने की बात कहती हैं।
(ख) 1 अंक घोड़ों की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: घोड़ों की तुलना पाले (हिम) से मारे हुए कमल से की गई है, “मनहुँ कमल हिममारे”।
(ग) 2 अंक भरत के प्रयासों के बावजूद घोड़ों की दशा क्यों नहीं सुधरती?
उत्तर: भरत “सौगुनी सार” (सौ गुना देखभाल) करते हैं, “तदपि” (फिर भी) घोड़े दिन-प्रतिदिन मुरझाते जा रहे हैं। पाठ्यपुस्तक इन्हें राम के वियोग में दुखी अश्व कहती है, और कौशल्या कहती हैं “ते अब निपट बिसारे” (राम ने उन्हें बिल्कुल भुला दिया); इसलिए भरत की देखभाल से भी उनकी दशा नहीं सुधरती।
(घ) 2 अंक इस काव्यांश से कौशल्या के स्वभाव की कौन-सी विशेषता प्रकट होती है?
उत्तर: कौशल्या का गहन वात्सल्य और ममता प्रकट होती है, वे अपने पुत्र के वियोग में मूक प्राणियों (घोड़ों) तक की पीड़ा को भी अपनी पीड़ा मानती हैं।