NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 6 भरत-राम का प्रेम / पद के प्रश्न-अभ्यास (दोनों अंशों के 10 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी तेरह प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ्यपुस्तक के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 भरत-राम का प्रेम
प्र. ‘हारेंहु खेल जितावहिं मोही’ भरत के इस कथन का क्या आशय है?
उत्तर: इस पंक्ति में भरत कहते हैं कि बचपन में खेलते समय वे स्वयं हार भी जाते तो भी राम अपनी जीत छोड़कर उन्हें ही जितवा देते थे। इस कथन का आशय यह है कि राम का भरत के प्रति स्नेह इतना असीम और उदार था कि वे कभी अपनी विजय को महत्त्व नहीं देते थे, बल्कि छोटे भाई का मन रखने और उसे प्रसन्न देखने को ही अधिक महत्त्व देते थे। पाठ्यपुस्तक भी कहती है कि राम “बचपन से ही भरत को खेल में भी सहयोग देते रहते थे और उनका मन कभी नहीं तोड़ते थे।” यह राम के सहज, निश्छल और त्यागमय स्वभाव का प्रमाण है, वे बचपन से ही भरत के प्रति कभी क्रोधित नहीं हुए और सदैव उनका मन जीतने का प्रयास करते रहे।
प्र. ‘मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ।’ में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर: इस पंक्ति में भरत राम के स्वभाव की दो प्रमुख विशेषताओं की ओर संकेत करते हैं। पहली, राम अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते (“अपराधिहु पर कोह न काऊ”), यानी वे अत्यंत क्षमाशील स्वभाव के हैं। दूसरी, भरत के प्रति राम की कृपा और स्नेह विशेष रूप से अधिक रहा है, खेलते समय भी भरत ने कभी उन्हें अप्रसन्न (खुनिस) होते नहीं देखा। इस तरह यह पंक्ति राम के क्षमाशील, स्नेहिल और सहज स्वभाव को स्पष्ट करती है, जिसे भरत बचपन से देखते-अनुभव करते आए हैं।
प्र. राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: भरत साधु-सभा में मुनिनाथ और राम के समक्ष खड़े होकर, पुलकित शरीर और प्रेम के आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ अपना श्रद्धाभाव प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि उन्हें जो कहना था, वह गुरु (मुनिनाथ) पहले ही कह चुके हैं, इससे अधिक वे और क्या कहें। वे बचपन की स्मृतियाँ याद करते हैं, राम ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा, कभी उनका मन नहीं तोड़ा, और खेल में हार जाने पर भी उन्हें ही जितवा दिया। भरत यह भी स्वीकार करते हैं कि स्नेह और संकोच के कारण वे राम के सम्मुख कभी कुछ कह नहीं पाए, और आज तक उनके प्रेम-प्यासे नेत्र राम के दर्शन से तृप्त नहीं हुए (“दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन”)। इस प्रकार भरत अपनी विनम्रता, कृतज्ञता और अटूट श्रद्धा के माध्यम से राम के प्रति अपना भाव प्रकट करते हैं।
प्र. ‘महीं सकल अनरथ कर मूला’ पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति में भरत स्वयं को इस सारे अनर्थ (राजा दशरथ की मृत्यु, राम का वनगमन, अयोध्या के नगरवासियों का दुख) की जड़ मानते हैं। यह भरत की गहरी आत्मग्लानि और आत्मत्याग को दर्शाता है, माता की कुबुद्धि का उल्लेख करके भी (“जननी कुमति जगतु सबु साखी”) वे अंततः समस्त उत्तरदायित्व स्वयं पर लेते हैं। इसी भाव के कारण वे राजा की मृत्यु पर व्याकुल माताओं और दुखी नगरवासियों को देखकर भी अपनी सारी पीड़ा सहन करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यह सब उन्हीं के कारण हुआ है। यह पंक्ति भरत के उदात्त और निःस्वार्थ चरित्र का स्पष्ट प्रमाण है।
प्र. ‘फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली’। पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति में भरत पूछते हैं कि क्या कोदो (मोटे चावल की एक किस्म) में कभी उत्तम धान फल सकता है? क्या काला घोंघा कभी मोती उत्पन्न कर सकता है? इससे ठीक पहले भरत कहते हैं “मातु मंदि मैं साधु सुचाली”, यानी माता बुरी है और मैं साधु-सदाचारी हूँ, ऐसा मन में लाना ही करोड़ों कुचालों के समान है। इसका भाव यह है कि बुरी माता की संतान (भरत स्वयं) अच्छी कैसे हो सकती है; भरत माता को दोष देकर भी स्वयं को उससे अलग या निर्दोष नहीं मानते, यह भरत की गहरी आत्मग्लानि को व्यक्त करता है। शिल्प-सौंदर्य की दृष्टि से यह पंक्ति दो सुंदर दृष्टांतों (कोदो-धान और घोंघा-मोती) के माध्यम से एक गूढ़ भाव को अत्यंत सरल और प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है, प्रश्न-शैली में कहे जाने से भाव और भी मार्मिक बन जाता है।
2 पद
प्र. राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या कैसा अनुभव करती हैं? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर: राम के वनगमन के बाद माँ कौशल्या उनकी वस्तुओं, धनुष-बाण और सुंदर छोटी जूतियों (पनहियाँ), को देखकर बार-बार अपने हृदय और आँखों से लगाती हैं। कभी वे पहले की तरह ही राम को जगाने जाती हैं और प्रिय वचन कहती हैं, “उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे”, यानी उठो बेटा, भाई और सखा सब द्वार पर खड़े हैं। कभी वे कहती हैं कि देर हो गई है, राजा (पिता) के पास जाओ। पर जैसे ही उन्हें राम का वनगमन याद आता है, वे चित्र में खींची हुई-सी स्तब्ध और निश्चल रह जाती हैं। इस प्रकार कौशल्या का अनुभव गहरे वात्सल्य और असहनीय विरह-वेदना का मिश्रण है, वे राम की वस्तुओं में अपने पुत्र को खोजती रहती हैं।
प्र. ‘रहि चकि चित्रलिखी सी’ पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि जब भी कौशल्या को राम के वनगमन की याद आती है, तो वे चित्र में खींची हुई आकृति की तरह चकित होकर स्तब्ध रह जाती हैं, मानो उनकी सारी गतिविधि, सारा भाव-प्रवाह एक क्षण के लिए रुक जाता है। इस पंक्ति का मर्म यह है कि दुख इतना गहरा और असहनीय है कि वह शब्दों या हरकतों में नहीं, बल्कि पूर्ण स्तब्धता में व्यक्त होता है। तुलसीदास आगे कहते हैं कि उस क्षण का वर्णन करते समय भी मानो प्रेम फिर से नए सिरे से सीखा जा रहा हो, इतना गहरा और अवर्णनीय है यह भाव।
प्र. गीतावली से संकलित पद ‘राघौ एक बार फिरि आवौ’ में निहित करुणा और संदेश को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पद में कौशल्या राम से अत्यंत करुण भाव से निवेदन करती हैं कि वे एक बार फिर अयोध्या लौट आएँ, अपने प्रिय घोड़ों को देख लें, फिर चाहे वापस वन को चले जाएँ। जिन घोड़ों को राम स्वयं दूध पिलाकर, अपने हाथों से सहलाकर, प्यार से पालते थे, वे अब राम के वियोग में दिन-प्रतिदिन मुरझाते जा रहे हैं, मानो पाले से मारे हुए कमल हों। भरत उनकी सौ गुना देखभाल करते हैं, फिर भी उनका यह हाल है। अंत में कौशल्या किसी राहगीर से निवेदन करती हैं कि यदि वन में राम मिलें तो उन्हें यह संदेश पहुँचा दें। पद की अंतिम पंक्ति में माता कहती हैं, “तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो”, अर्थात उन्हें और सबसे बढ़कर इन घोड़ों की बड़ी चिंता है। इस पद में निहित करुणा यह है कि राम का वियोग केवल मनुष्यों को ही नहीं, मूक प्राणियों (घोड़ों) को भी दुखी कर रहा है। इसका संदेश माता का यही निवेदन है कि राम एक बार लौटकर अपने घोड़ों को देख लें, फिर भले ही वन को चले जाएँ।
प्र. (क) उपमा अलंकार के दो उदाहरण छाँटिए।
(ख) उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग कहाँ और क्यों किया गया है? उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
उत्तर (क): उपमा अलंकार के दो उदाहरण हैं, “रहि चकि चित्रलिखी सी” (कौशल्या की तुलना चित्र में खींची हुई आकृति से “सी” उपमा-वाचक शब्द के साथ की गई है) और “लागति प्रीति सिखी सी” (प्रेम की तुलना नए सिरे से सीखे गए भाव से की गई है)।
उत्तर (ख): उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग “तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे” पंक्ति में हुआ है। घोड़ों के दिन-प्रतिदिन मुरझाने की कल्पना पाले (हिम) से मारे हुए कमल जैसी की गई है, “मनहुँ” (मानो) वाचक शब्द से यह एक संभावना के रूप में व्यक्त होती है। यह प्रयोग घोड़ों की दयनीय दशा को अधिक मार्मिक और सजीव बनाने के लिए किया गया है।
प्र. पठित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास का भाषा पर पूरा अधिकार था?
उत्तर: पठित पदों में तुलसीदास की भाषा पर असाधारण पकड़ स्पष्ट झलकती है। पहले, उन्होंने अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं में समान दक्षता से रचना की, “भरत-राम का प्रेम” अवधी में और “पद” गीतावली की भाषा में रचित है। दूसरे, उन्होंने भाव के अनुरूप सटीक शब्द चुने हैं, “चित्रलिखी सी” और “मनहुँ कमल हिममारे” जैसे उपमा-उत्प्रेक्षा अलंकार भाव को अत्यंत सजीव बनाते हैं। तीसरे, बोलचाल के करुण संबोधन (“उठहु तात”, “राघौ! एक बार फिरि आवौ”) भाव को सीधे हृदय तक पहुँचाते हैं। चौथे, चौपाई-दोहा और गेय पद-शैली दोनों में उन्होंने समान प्रवाह और लय बनाए रखी है। इन सभी विशेषताओं से सिद्ध होता है कि तुलसीदास का भाषा और छंद-विधान दोनों पर पूरा और असाधारण अधिकार था।
3 योग्यता-विस्तार
प्र. ‘महानता लाभलोभ से मुक्ति तथा समर्पण त्याग से हासिल होता है’ को केंद्र में रखकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर: (यह विचार-आधारित प्रश्न है, उत्तर पाठ के प्रसंगों से पुष्ट करें।) भरत इस कथन के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। उन्हें अयोध्या का राज्य मिल सकता था, पर वे लाभ-लोभ से पूरी तरह मुक्त हैं: साधु-सभा में वे स्वयं को ‘महीं सकल अनरथ कर मूला’ कहकर सारा दोष अपने ऊपर लेते हैं, माता को दोषी ठहराकर स्वयं को साधु मानने को भी ‘कोटि कुचाली’ कहते हैं, और अंत में कहते हैं कि उनके गुरु गोसाईं और स्वामी सीता-राम हैं, इसलिए परिणाम उन्हें अच्छा लगता है (“लागत मोहि नीक परिनामू”)। पद 2 के अनुसार वे राम के घोड़ों की भी सौ गुना देखभाल करते हैं। यही त्याग और समर्पण भरत को महान बनाता है, इसलिए कथन पूरी तरह सही है।
प्र. भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को भी जानिए।
उत्तर: (यह खोज-आधारित गतिविधि है, विद्यार्थी रामचरितमानस या रामकथा से स्वयं प्रसंग खोजें।) मार्गदर्शन के लिए: पाठ में भरत का साधु-सभा में, गुरु और राम के निकट, आत्मग्लानि से भरा कथन और पद 2 में राम के घोड़ों की सौ गुना देखभाल, दोनों उनके त्याग के प्रसंग हैं। रामकथा में इसके अलावा प्रसिद्ध प्रसंग है कि भरत राम की खड़ाऊँ (पादुका) लेकर लौटे और उन्हें सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन किया, तथा स्वयं तपस्वी की तरह रहे। ऐसे प्रसंगों को अध्यापक की सहायता से पढ़कर सूची बनाइए।
प्र. आज के संदर्भ में राम और भरत जैसा भ्रातृप्रेम क्या संभव है? अपनी राय लिखिए।
उत्तर: (यह राय-आधारित प्रश्न है, इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है; तर्क सहित अपनी राय लिखें।) एक संभावित उत्तर: आज के समय में संपत्ति और अधिकार के कारण भाइयों में विवाद अधिक सुनाई देते हैं, इसलिए राम-भरत जैसा निःस्वार्थ प्रेम दुर्लभ लगता है। फिर भी यह असंभव नहीं है। पाठ में राम बचपन से भरत का साथ नहीं छोड़ते, ‘हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही’, और भरत राज्य का लोभ छोड़कर सारा दोष अपने ऊपर लेते हैं। यदि परिवार में बचपन से एक-दूसरे का मन रखने, त्याग करने और लोभ से दूर रहने के संस्कार दिए जाएँ, तो आज भी ऐसा भ्रातृप्रेम संभव है।