कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 7 बारहमासा महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. मलिक मुहम्मद जायसी का जीवनकाल क्या है?

उत्तर: मलिक मुहम्मद जायसी का जीवनकाल सन् 1492 से 1542 तक माना जाता है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. जायसी मूल रूप से कहाँ के निवासी थे?

उत्तर: जायसी अमेठी (उत्तर प्रदेश) के निकट जायस नामक स्थान के निवासी थे, इसी से इन्हें जायसी कहा गया।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. जायसी की तीन प्रमुख काव्य-कृतियाँ कौन-सी हैं?

उत्तर: जायसी की तीन प्रमुख कृतियाँ हैं, पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. प्रस्तुत पाठ पद्मावत के किस खंड से लिया गया है?

उत्तर: प्रस्तुत पाठ पद्मावत के ‘नागमती वियोग खंड’ से लिया गया है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. पाठ्यपुस्तक में बारहमासा के कितने और किन महीनों के अंश दिए गए हैं?

उत्तर: पाठ्यपुस्तक में केवल 4 महीनों, अगहन, पूस, माघ और फागुन के अंश दिए गए हैं।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. नागमती किसकी पत्नी है और वह किसके वियोग में है?

उत्तर: नागमती राजा रत्नसेन की पत्नी है और वह पद्मावती को पाने गए रत्नसेन के वियोग में विरह-वेदना सह रही है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. जायसी को किस काव्यधारा का कवि माना जाता है और इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: जायसी को सूफ़ी प्रेममार्गी काव्यधारा का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। इस धारा में कवि किसी लौकिक (सांसारिक) प्रेम-कथा के माध्यम से आध्यात्मिक और रहस्यमय भावों को व्यक्त करते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. जायसी ने अपने गुरुओं के रूप में किनका उल्लेख किया है?

उत्तर: जायसी ने अपने गुरुओं के रूप में सैयद अशरफ़ और शेख बुरहान का उल्लेख किया है। वे स्वयं भी अपने समय के सिद्ध और पहुँचे हुए फ़कीर माने जाते थे।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. ‘बारहमासा’ काव्य-शैली की परिभाषा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: बारहमासा मध्यकालीन हिंदी काव्य की वह शैली है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों के क्रम में किसी विरहिणी नायिका की मनोदशा का वर्णन किया जाता है। हर महीने की प्रकृति और ऋतु को उसके विरह-भाव को गहरा बनाने वाले उद्दीपन विभाव के रूप में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. पद्मावत की रचना-शैली और छंद-शैली स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जायसी ने पद्मावत की रचना फ़ारसी की मसनवी शैली में की है, जिसमें कथा सर्गों या अध्यायों में बँटी नहीं होती, बल्कि निरंतर चलती है। छंद-शैली दोहा-चौपाई की है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. अगहन अंश में नायिका की विरह-वेदना का चित्रण किन दो बिंबों से हुआ है?

उत्तर: अगहन अंश में नायिका के विरह की तुलना दीपक की जलती बाती से की गई है (‘जरै बिरह ज्यों दीपक बाती’, उपमा), और सर्दी की ठंड को ही आग कहकर (सियरि अगिनि, विरोधाभास) उसके हृदय के जलने का वर्णन किया गया है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. पूस अंश में चकई-चकवा के प्रतीक से नायिका की स्थिति की तुलना किस प्रकार की गई है?

उत्तर: चकई-चकवा सामान्यतः रात में बिछुड़ते हैं और दिन में मिल जाते हैं, परंतु नागमती इसके विपरीत, कोयल की तरह रात और दिन दोनों में ही विरह में रहती है। यह तुलना उसकी स्थिति को चकई-चकवा से भी अधिक कष्टकारी दिखाता है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. माघ अंश में ‘रसमूलू’ शब्द का क्या महत्त्व है?

उत्तर: ‘रसमूलू’ का अर्थ है मूल रस, अर्थात शृंगार रस। पंक्ति ‘एहि मास उपजै रस मूलू’ के अनुसार इसी मास में रस का मूल उपजता है, और नागमती प्रियतम को भँवरा तथा अपने यौवन को फूल कहती है। पर नागमती को इस महीने अपने शृंगार की इच्छा नहीं है: ‘केहिक सिगार को पहिर पटोरा’, वह किसके लिए शृंगार करे, किसके लिए रेशमी वस्त्र पहने; गले में हार नहीं रहा, बस डोरा रह गया है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. फागुन अंश में बाहरी और भीतरी भाव के बीच कौन-सा विरोधाभास दिखाया गया है?

उत्तर: फागुन में चारों ओर वनस्पति उल्लास में है, लोग फाग और चाँचरि खेल रहे हैं, पर नागमती के लिए संसार दुगुना उदास हो गया है। इस अंश को बाहर उल्लास और भीतर विषाद के विरोधाभास के रूप में पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. फागुन अंश में हवा के झोंकों का नागमती पर क्या प्रभाव दिखाया गया है?

उत्तर: फागुन अंश में हवा के तेज़ झोंके (झँकोरै) ठंड को चौगुना बढ़ा देते हैं, नागमती का शरीर पीले पत्ते जैसा पीला पड़ जाता है, और विरह के कारण वह हवा के इन झोंकों में भी टिक नहीं पाती।

प्रश्न 10 (2 अंक)

प्र. ‘सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है और क्यों?

उत्तर: इस पंक्ति में विरोधाभास अलंकार है, क्योंकि ठंड (सियरि) को आग (अगिनि) कहा गया है, जो ऊपर से विपरीत लगता है, पर अत्यधिक ठंड भी आग जैसी जलन देती है, इसलिए यह सत्य भी है।

प्रश्न 11 (2 अंक)

प्र. पूस अंश में विरह को बाज पक्षी (सचान) क्यों कहा गया है?

उत्तर: पूस अंश की चौपाई में विरह को सीधे बाज पक्षी (सचान) कहा गया है, जो प्रचंड (चाँड़ा) होकर शरीर पर मँडराता है (भँवै), जीते-जी खाता है और मरने पर भी नहीं छोड़ता। यह रूपक विरह की क्रूरता और उसकी अंतहीन पीड़ा को दिखाने के लिए प्रयोग किया गया है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. पंक्तियों की व्याख्या कीजिए, ‘पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।’

उत्तर: यह दोहा अगहन अंश के अंत में आता है। विरहिणी नागमती भँवरे और कौवे को संबोधित करते हुए कहती है, हे भँवरे, हे कौवे, तुम मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम तक पहुँचा देना, कि वह स्त्री विरह में जलकर मर चुकी है, अब उसका धुआँ ही हमें लग रहा है। यहाँ भँवरे-काग को संदेशवाहक (दूत) बनाया गया है, और ‘धुआँ लगना’ का बिंब बताता है कि वह विरह में जलकर मर चुकी है (‘जरि मुई’), अब केवल उसका धुआँ ही हम तक पहुँच रहा है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. पंक्तियों की व्याख्या कीजिए, ‘रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।’

उत्तर: यह दोहा पूस अंश के अंत में आता है। नागमती कहती है कि विरह की पीड़ा से उसका खून (रकत) बहकर ढल गया है (ढरा), मांस गल गया है और हड्डियाँ शंख जैसी दिखने लगी हैं। वह सारस पक्षी की तरह रट-रटकर (बार-बार पुकारकर) मर चुकी है, अब कोई आकर उसके पंख समेट ले। इसमें सारस पक्षी का बिंब नायिका की चरम विरह-वेदना और मृत्यु-तुल्य दशा को गहराई से व्यक्त करता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. पंक्तियों की व्याख्या कीजिए, ‘तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल।।’

उत्तर: यह दोहा माघ अंश के अंत में आता है। नागमती अपने प्रियतम को संबोधित करते हुए कहती है, हे प्रिय, तुम्हारे बिना यह शरीर तिनके जैसा हल्का हो गया है। इस पर भी विरह की आग इसे जलाकर हवा में उड़ा देना चाहती है। यहाँ शरीर के तिनके जैसा हल्का हो जाने का बिंब नायिका के दुर्बल शरीर और उसकी असहनीय विरह-वेदना, दोनों को एक साथ व्यक्त करता है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. पंक्तियों की व्याख्या कीजिए, ‘यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ।।’

उत्तर: यह दोहा फागुन अंश के अंत में आता है। नागमती कहती है, इस शरीर को जलाकर राख कर दो और उस राख को हवा में उड़ा दो, ताकि वह राख उसी मार्ग में जा गिरे जहाँ मेरे प्रियतम के चरण पड़ें। यह पंक्ति नायिका के आत्म-समर्पण और प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है, वह मृत्यु के बाद भी किसी न किसी रूप में प्रियतम के निकट रहना चाहती है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. ‘बारहमासा’ काव्य-शैली की विशेषताएँ उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: बारहमासा मध्यकालीन हिंदी काव्य की वह शैली है जिसमें वर्ष के बारह महीनों के क्रम में विरहिणी नायिका की मनोदशा का वर्णन किया जाता है। इस शैली की मुख्य विशेषताएँ हैं, हर महीने की प्रकृति और ऋतु को उद्दीपन विभाव के रूप में प्रयोग करना (जैसे यहाँ अगहन, पूस, माघ और फागुन की प्रकृति विरह बढ़ाने का कारण बनती है), और इस पाठ में पशु-पक्षियों को संदेशवाहक या तुलना का माध्यम बनाया गया है (भँवरा-काग, चकई-चकवा, सारस), तथा हर अंश के अंत में एक दोहा आता है। पाठ्यपुस्तक में जायसी की बारहमासा के केवल अगहन, पूस, माघ और फागुन महीनों के अंश दिए गए हैं, बारहों महीनों का नहीं।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. जायसी के कवि-परिचय और उनकी रचनाओं के बारे में विस्तार से लिखिए।

उत्तर: मलिक मुहम्मद जायसी (सन् 1492-1542) अमेठी के निकट जायस नामक स्थान के निवासी थे। वे अपने समय के सिद्ध और पहुँचे हुए फ़कीर माने जाते थे, और अपने गुरुओं के रूप में सैयद अशरफ़ तथा शेख बुरहान का उल्लेख करते हैं। वे सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी तीन प्रमुख कृतियाँ हैं, पद्मावत (प्रसिद्धि का मुख्य आधार, सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन की प्रेम-कथा), अखरावट और आखिरी कलाम। पद्मावत फ़ारसी मसनवी शैली और दोहा-चौपाई छंद में रचित है, और इसकी भाषा ठेठ अवधी है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. चारों अंशों के अंत में आने वाले दोहों के काव्य-सौंदर्य और महत्व पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: प्रत्येक अंश (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के अंत में एक दोहा आता है, जो उस अंश की समूची चौपाई-पंक्तियों में व्यक्त भाव का सार एक-दो पंक्तियों में समेट देता है। अगहन के दोहे में भँवरे-काग को संदेशवाहक बनाकर विरह की चरम पीड़ा (धुआँ लगना) व्यक्त होती है, पूस के दोहे में सारस पक्षी के बिंब से मृत्यु-तुल्य दशा, माघ के दोहे में शरीर के तिनके जैसा हल्का होने से दुर्बलता, और फागुन के दोहे में राख होकर प्रियतम के मार्ग में बिखरने की कामना से आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा। इस तरह ये चारों दोहे हर अंश को एक सशक्त, यादगार समापन देते हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘बारहमासा’ पाठ के आधार पर नागमती की विरह-वेदना का सम्पूर्ण मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: 1. नागमती अपने पति राजा रत्नसेन के पद्मावती को पाने चले जाने पर उनके वियोग में अत्यंत तीव्र विरह-वेदना सहती है।
2. अगहन में उसकी पीड़ा दीपक की बाती के समान जलने और सर्दी को आग समान महसूस होने (विरोधाभास) से व्यक्त होती है।
3. पूस में यह वेदना और बढ़ जाती है, चकई-चकवा तो दिन में मिल जाते हैं पर वह रात-दिन दोनों में विरह में रहती है, और विरह उसे बाज की तरह जीते-जी खाता है।
4. माघ में, जब रस का मूल (शृंगार रस) उपजता है, उसका अपना शृंगार छूट गया है, और उसका शरीर तिनके जैसा हल्का हो जाता है।
5. फागुन में उसकी विरह-वेदना अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है, वह अपने शरीर को राख करके प्रियतम के मार्ग में बिखेर देने की कामना करती है, यह आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा है।
6. इस तरह चारों अंश मिलकर नागमती की विरह-वेदना की एक क्रमिक और गहराती हुई तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो वियोग शृंगार रस का उदाहरण है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. पाठ में प्रयुक्त प्रमुख अलंकारों और रस पर विस्तार से टिप्पणी कीजिए, उदाहरण सहित।

उत्तर: 1. विरोधाभास अलंकार, ‘सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा’ में ठंड को आग कहा गया है, यह अगहन अंश में आता है।
2. उत्प्रेक्षा अलंकार, ‘जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी’ में ‘जानहुँ’ (मानो) से संभावना व्यक्त की गई है कि सेज मानो बर्फ़ में डूबी हो; फागुन अंश में बाहर उल्लास और भीतर विषाद का विरोधी चित्रण भी ध्यान देने योग्य है।
3. पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार, ‘अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई’ में ‘फिरै’ शब्द की आवृत्ति एक ही अर्थ में बार-बार लौट आने के भाव पर बल देने के लिए हुई है।
4. उपमा अलंकार, ‘जरै बिरह ज्यों दीपक बाती’ और ‘मोहि जिय लाइ दीन्हि जसि होरी’ में ‘ज्यों’, ‘जसि’ वाचक शब्दों के साथ तुलना की गई है।
5. रूपक अलंकार, ‘बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा’ में विरह को सीधे बाज पक्षी (सचान) कह दिया गया है।
6. अनुप्रास अलंकार, ‘दूभर दुख’ और ‘बिरह बाढ़ि’ में वर्णों की आवृत्ति है; ‘सुलगि सुलगि’, ‘हहलि हहलि’ में पूरे शब्द की आवृत्ति पुनरुक्तिप्रकाश है, जिससे लयबद्धता उत्पन्न हुई है।
7. प्रधान रस वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार) है, जिसमें स्थायी भाव रति वियोगावस्था में है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. जायसी की भाषा और शैली की विशेषताएँ ‘बारहमासा’ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 1. जायसी की भाषा ठेठ अवधी है, जो मध्यकालीन अवधी है और आज की बोलचाल की हिंदी से काफ़ी अलग है, इसीलिए पाठ में अनेक शब्दों (देवस, सीऊ, कंतू, सचान, माँहुट आदि) का अलग से अर्थ देना पड़ता है।
2. रचना-शैली फ़ारसी की मसनवी शैली है, जिसमें कथा सर्गों/अध्यायों में विभाजित नहीं होती बल्कि निरंतर चलती है, यद्यपि स्थान-स्थान पर घटनाओं के शीर्षक अवश्य मिलते हैं।
3. छंद-शैली दोहा-चौपाई की है, प्रत्येक अंश में कई चौपाई पंक्तियों के बाद अंत में एक दोहा आता है जो भाव का सार प्रस्तुत करता है।
4. जायसी की भाषा का आधार लोकजीवन का व्यापक अनुभव है, इसमें प्रयुक्त उपमा, रूपक, लोकोक्तियाँ और मुहावरे सभी लोक-संस्कृति से प्रभावित हैं।
5. काव्य में लौकिक कथा का वर्णन इस प्रकार हुआ है कि पाठक को अलौकिक और परोक्ष सत्ता का आभास होने लगता है, इसी में रहस्यवाद का पुट छिपा है।
6. इस तरह जायसी की भाषा-शैली सरल होते हुए भी गहन भाव और लोक-संस्कृति से समृद्ध है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
लागेउ माँह परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड़काला।।
पहल पहल तन रुई जो झाँपै। हहलि हहलि अधिकौ हिय काँपै।।
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ।।
एहि मास उपजै रस मूलू। तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू।।
नैन चुवहि जस माँहुट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू।।
टूटहि बुंद परहि जस ओला। बिरह पवन होइ मारैं झोला।।
केहिक सिगार को पहिर पटोरा। गियँ नहि हार रही होइ डोरा।।

(क) 1 अंक माघ महीने में विरह किस रूप में बदल गया है?
उत्तर: ‘बिरहा काल भएउ जड़काला’, यानी माघ में विरह काल बनकर जड़काला (मृत्यु) हो गया है।

(ख) 1 अंक नायिका अपने पति से क्या बनकर आने को कहती है?
उत्तर: नायिका अपने पति (नाहाँ) से सूर्य (सूर) बनकर आने और तपने को कहती है, क्योंकि उसके बिना माघ में जाड़ा नहीं छूटता (‘तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ’)।

(ग) 2 अंक ‘रसमूलू’ शब्द का यहाँ क्या महत्त्व है और नायिका की दशा इससे कैसे विपरीत है?
उत्तर: ‘रसमूलू’ का अर्थ है मूल रस, अर्थात शृंगार रस। पंक्ति कहती है ‘एहि मास उपजै रस मूलू’, यानी इसी मास में रस का मूल उपजता है। पर नायिका का अपना शृंगार छूट गया है: ‘केहिक सिगार को पहिर पटोरा। गियँ नहि हार रही होइ डोरा’, वह किसके लिए शृंगार करे, किसके लिए रेशमी वस्त्र पहने; गले में हार नहीं रहा, बस डोरा रह गया है। फिर भी वह प्रियतम को अपना भँवरा और अपने यौवन को फूल कहती है।

(घ) 2 अंक इस पद्यांश के आधार पर बताइए कि माघ अंश किस भाव-वैषम्य को उजागर करता है?
उत्तर: यह पद्यांश माघ में उपजने वाले रस के मूल (रसमूलू, शृंगार रस) और नायिका की विरह-दशा के बीच के भाव-वैषम्य को उजागर करता है: इस मास में शृंगार रस का मूल उपजता है, पर नायिका का अपना शृंगार छूट गया है, आँसू माँहुट की वर्षा जैसे बह रहे हैं और विरह पवन बनकर उसे झकझोर रहा है।

केस स्टडी
फागुन पवन झँकोरै बहा। चौगुन सीउ जाइ किमि सहा।।
तन जस पियर पात भा मोरा। बिरह न रहै पवन होइ झोरा।।
तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।।
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।।
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहि जिय लाइ दीन्हि जसि होरी।।
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।।

(क) 1 अंक फागुन में नायिका का शरीर कैसा हो गया है?
उत्तर: ‘तन जस पियर पात भा मोरा’, यानी फागुन में नायिका का शरीर पीले पत्ते (पियर पात) जैसा पीला पड़ गया है।

(ख) 1 अंक सब लोग फागुन में क्या खेल रहे हैं, जो नायिका को पीड़ा देता है?
उत्तर: ‘फाग करहि सब चाँचरि जोरी’, सब लोग मिलकर फाग और चाँचरि (होली का रंग-खेल) खेल रहे हैं, पर नायिका को लगता है मानो उसके मन (जिय) में होली जला दी गई हो।

(ग) 2 अंक पद्यांश के आधार पर बताइए कि नायिका को जलते-मरते हुए भी रोष क्यों नहीं आता?
उत्तर: पंक्ति है ‘जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।।’ यानी यदि प्रियतम (पियहि) को उसका इस तरह जलना अच्छा लगे, तो जलते-मरते हुए भी उसे कोई रोष नहीं आता। इसे उसके आत्म-समर्पित प्रेम की चरम अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है, यह उदासीनता नहीं है।

(घ) 2 अंक इस पद्यांश के आधार पर फागुन अंश के केंद्रीय विरोधाभास को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पद्यांश में बाहर वनस्पति (बनाफति) उल्लास (हुलासू) में है और सब फाग-चाँचरि खेल रहे हैं, जबकि नायिका कहती है ‘मो कहँ भा जग दून उदासू’, यानी उसके लिए संसार दुगुना उदास हो गया है। बाहरी उल्लास और भीतरी विषाद के इस भाव-वैषम्य को ही इस अंश का केंद्रीय विरोधाभास माना जा सकता है।