- मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख कृतियाँ बता पाएँगे
- “बारहमासा” काव्य-शैली को उदाहरण सहित समझा पाएँगे
- नागमती वियोग खंड के चारों अंशों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) का भावार्थ अपने शब्दों में लिख पाएँगे
- पाठ के कठिन अवधी शब्दों के अर्थ बिना भूले याद रख पाएँगे
- पाठ में प्रयुक्त अलंकार पहचानकर काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कर पाएँगे
- पाठ का प्रधान रस बता पाएँगे और उसका कारण समझा पाएँगे
1 कवि-परिचय: मलिक मुहम्मद जायसी
बारहमासा को समझने से पहले इसके रचयिता को जान लेते हैं।

- मलिक मुहम्मद जायसी का जीवनकाल सन् 1492 से 1542 तक माना जाता है।
- ये अमेठी (उत्तर प्रदेश) के निकट जायस नामक स्थान के रहने वाले थे। इसी कारण इन्हें “जायसी” कहा गया।
- ये अपने समय के सिद्ध और पहुँचे हुए फ़कीर माने जाते थे।
- इन्होंने अपने गुरुओं के रूप में सैयद अशरफ़ और शेख बुरहान का उल्लेख किया है।
- जायसी सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।
सूफ़ी प्रेममार्गी काव्यधारा (शाखा) मध्यकालीन हिंदी साहित्य की वह परंपरा है जिसमें मुसलमान सूफ़ी कवियों ने लौकिक (सांसारिक) प्रेम-कथाओं के माध्यम से आध्यात्मिक और रहस्यमय भावों को व्यक्त किया। इस धारा के कवि किसी लोकप्रिय प्रेम-कहानी को चुनकर उसमें ईश्वर-प्रेम और आत्मा-परमात्मा के मिलन का संकेत छिपा देते हैं। मलिक मुहम्मद जायसी इसी धारा के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं।
1.1 पद्मावत: जायसी की सबसे प्रसिद्ध रचना
- जायसी का पद्मावत, प्रेमाख्यान परंपरा (प्रेम-कथा वाले महाकाव्यों की परंपरा) का सर्वश्रेष्ठ प्रबंधकाव्य (लंबी कथात्मक कविता) माना जाता है।
- यह भारतीय लोककथा पर आधारित है। इसमें सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के प्रेम की कथा है।
- जायसी ने इसमें लौकिक (सांसारिक) कथा का वर्णन इस प्रकार किया है कि पाठक को अलौकिक और परोक्ष (परे, छिपी हुई) सत्ता का आभास होने लगता है। इसी में काव्य का रहस्यवादी पुट (गहरा रंग) छिपा है।
- प्रेम का यह लोकधर्मी (आम जन-जीवन से जुड़ा) स्वरूप संपूर्ण मानवमात्र के लिए प्रेरणादायी माना जाता है।
सूफ़ी प्रेमाख्यान काव्यों में प्रेम-कथा के पात्र अक्सर आध्यात्मिक प्रतीक भी बन जाते हैं, जैसे नायक को आत्मा और नायिका को ईश्वर/परमतत्व का प्रतीक माना जाता है। पद्मावत की कथा को लेकर भी आलोचकों ने ऐसी प्रतीकात्मक व्याख्याएँ की हैं। इस अध्याय के लिए यह पृष्ठभूमि-ज्ञान है, इसे परीक्षा-उत्तर में तभी लिखें जब प्रश्न स्पष्ट रूप से रहस्यवाद या प्रतीकवाद पर पूछा जाए।
1.2 प्रमुख काव्य-कृतियाँ
1.3 भाषा और शैली की तीन पहचान
- रचना-शैली: जायसी ने पद्मावत की रचना फ़ारसी की मसनवी शैली में की है। इस शैली में कथा सर्गों या अध्यायों में बँटी हुई नहीं होती, बल्कि लगातार चलती रहती है। हाँ, स्थान-स्थान पर शीर्षक के रूप में घटनाओं और प्रसंगों का उल्लेख अवश्य मिलता है।
- छंद-शैली: जायसी ने इस काव्य-रचना के लिए दोहा-चौपाई की शैली अपनाई है।
- भाषा: जायसी की भाषा ठेठ अवधी है, यह मध्यकालीन अवधी है, आज की बोलचाल की हिंदी से काफ़ी अलग, इसलिए इस पाठ का हर कठिन शब्द नीचे अलग से समझाया गया है। इनकी काव्य-शैली अत्यंत प्रौढ़ (परिपक्व) और गंभीर है।
जायसी की कविता का आधार लोकजीवन का व्यापक अनुभव है। इनके द्वारा प्रयुक्त उपमा, रूपक, लोकोक्तियाँ और मुहावरे, यहाँ तक कि पूरी काव्य-भाषा पर ही लोक-संस्कृति का गहरा प्रभाव है, यही प्रभाव इनकी रचनाओं को नया अर्थ और सौंदर्य प्रदान करता है।
कवि-परिचय के लिए ये बातें याद रखें: जीवनकाल (1492-1542), मूल स्थान (जायस, अमेठी के निकट), काव्यधारा (सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा) और तीन कृतियों के नाम (पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम)।
2 बारहमासा: काव्य-शैली और प्रसंग
बारहमासा मध्यकालीन हिंदी काव्य की वह शैली है, जिसमें वर्ष के बारह महीनों के क्रम में किसी विरहिणी नायिका की मनोदशा का वर्णन किया जाता है। हर महीने की प्रकृति, ऋतु और मौसम को नायिका के विरह-भाव को और गहरा बनाने के लिए उद्दीपन विभाव (भावनाओं को भड़काने वाला कारण) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
- प्रस्तुत पाठ जायसी की प्रसिद्ध रचना पद्मावत के “नागमती वियोग खंड” से लिया गया “बारहमासा” शीर्षक अंश है।
- कथा-प्रसंग: राजा रत्नसेन पद्मावती को पाने के लिए घर से दूर चले जाते हैं, इसी दौरान उनकी पहली रानी नागमती विरह में तड़पती है। प्रस्तुत पाठ में इसी नागमती के विरह का वर्णन है।
- पाठ्यपुस्तक में पूरे बारह महीनों में से केवल 4 महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के अंश दिए गए हैं, ऐसा न सोचें कि यहाँ बारहों महीने दिए गए हैं।
2.1 चारों अंशों की एक झलक
अगहन
रात बड़ी, दिन असहनीय। भँवरे-काग के माध्यम से प्रियतम को संदेश।
पूस
भीषण सर्दी, चकई-चकवा से तुलना, विरह को बाज पक्षी जैसा बताया।
माघ
पाला (कड़ाके की ठंड), आँसू माघ की वर्षा जैसे, रस का मूल (शृंगार) उपजता है पर नायिका को अपने शृंगार की इच्छा नहीं।
फागुन
सब फाग खेल रहे हैं, नायिका का विरह-ताप उलटे और बढ़ता जाता है।
बहुत-से छात्र मान लेते हैं कि “बारहमासा” यानी बारह महीनों का पूरा वर्णन इसी पाठ में है। पाठ्यपुस्तक में केवल 4 महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) के अंश ही संकलित हैं, यह “बारहमासा” काव्य-शैली का नाम है, इस पाठ में दिए गए अंशों की संख्या नहीं।
3 अंश (1): अगहन मास
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती।।
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।।
घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रँग लै गा नाहू।।
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई।।
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा।।
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै भसमंतू।।
पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।।
स्रोत : पद्मावत, नागमती वियोग खंड
भावार्थ: अगहन महीने में दिन घटते जाते हैं और रात (निसि) बढ़ती जाती है। यह दुर्भर (दूभर, कठिन) दुख किसी तरह काढ़ना (सहना) मुश्किल है। अब तो विरहिणी नायिका को दिन (देवस) भी रात जैसा लगने लगा है, वह दीपक की बाती की तरह विरह में जलती (जरै) जा रही है। हृदय (हिया) काँपा तो शीत (सीऊ) प्रतीत हुआ (जनावा); यह शीत तभी (तौ) जाए, जब प्रियतम (पीऊ) साथ हो। घर-घर में सबने (जाड़े के) वस्त्र (चीर) तैयार कर लिए हैं, पर नायिका का तो रूप-रंग ही उसका पति (नाहू) अपने साथ ले गया है। जो एक बार बिछड़कर (बिछोई) गया, वह पलटकर नहीं लौटा; यदि वह अब भी लौट आए, तो नायिका का वही रूप-रंग फिर लौट आए। ठंड की आग (सियरि अगिनि, यह एक विरोधाभास है, ठंड को आग कहा गया है) ने विरहिणी के हृदय को जला दिया है, वह सुलग-सुलगकर राख हो चली है। प्रियतम (कंतू) को यह दहन (जलन) मालूम ही नहीं, नायिका का पूरा यौवन (जोबन) ही मानो भस्म हो रहा है। अंत के दोहे में विरहिणी भँवरे और कौवे से कहती है, मेरा यह संदेश प्रियतम तक पहुँचा देना, वह स्त्री विरह में जलकर मर चुकी है, अब उसका धुआँ ही हमें लग रहा है।
“सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा” पंक्ति में विरोधाभास अलंकार है, ठंड (सियरि) को आग (अगिनि) कहा गया है, क्योंकि अत्यधिक ठंड भी आग की तरह जलन पैदा करती है। इस अंश में भँवरे और कौवे को संदेशवाहक (दूत) बनाया गया है।
4 अंश (2): पूस मास
बिरह बाढ़ि भा दारुन सीऊ। कँपि कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ।।
कंत कहाँ हौं लागौं हियरै। पंथ अपार सूझ नहि नियरें।।
सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी।।
चकई निसि बिछुरैं दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला।।
रैनि अकेलि साथ नहि सखी। कैसें जिऔं बिछोही पँखी।।
बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहि छाँड़ा।।
रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।
स्रोत : पद्मावत, नागमती वियोग खंड
भावार्थ: पूस महीने की जाड़े में शरीर थर-थर काँप रहा है, सूरज (सुरुज) भी मानो जाड़े से ठिठुरकर (जड़ाइ) लंका की ओर (लंक दिसि), यानी दक्षिण दिशा में तापता है। विरह इतना बढ़ गया है कि भयंकर (दारुन) शीत बन गया है, नायिका कहती है, मैं काँप-काँपकर मरी जा रही हूँ, यह (शीत और विरह) मेरे प्राण (जीऊ) हरे ले रहा है (“लेहि हरि जीऊ”)। कुछ व्याख्याओं में “हरि” को ईश्वर का संबोधन मानकर इसका अर्थ “हे हरि, मेरे प्राण ले लो” भी किया जाता है। प्रियतम (कंत) कहाँ हैं कि मैं उनके हृदय (हियरै) से लगूँ, रास्ता इतना अपार है कि पास कुछ भी नहीं सूझता। ओढ़ने-बिछाने के जाड़े के वस्त्र (सौर-सुपेती) भी जूड़ी (जाड़े की कँपकँपी) ले आते हैं, मानो सेज (शय्या) हिमाचल के हिम (बरफ़) में डूब गई हो। चकवा-चकवी रात में बिछड़ते हैं और दिन में मिल जाते हैं, पर नायिका तो कोयल (कोकिला) की तरह रात-दिन दोनों में विरह में है, यानी नायिका की दशा चकई से भी कठिन है। रात में कोई सखी साथ नहीं है, ऐसे बिछड़े पंछी की तरह वह कैसे जिए। विरह मानो एक बाज पक्षी (सचान) है, जो प्रचंड (चाँड़ा) होकर शरीर पर मँडराता है (भँवै), यह जीते-जी खा जाता है और मरने पर भी नहीं छोड़ता। अंत के दोहे में नायिका कहती है, खून (रकत) बहकर ढल गया है (ढरा), मांस गल गया है (गरा), हड्डियाँ शंख जैसी दिखने लगी हैं, वह सारस पक्षी की तरह रट-रटकर मर गई है, अब कोई आकर उसके पंख समेट ले।
चकई (चकवी) और कोकिला के प्रतीकों से नायिका के विरह की तुलना, और सचान (बाज़) व सारस के बिंब, दोनों ही “पूस” अंश के बिंब हैं, इन्हें पंक्ति के साथ समझाएँ। ध्यान रहे, चकवा-चकवी सामान्यतः रात में बिछुड़ते हैं, नायिका की स्थिति इससे भी बदतर है, वह रात-दिन दोनों में विरह में है।
5 अंश (3): माघ मास
पहल पहल तन रुई जो झाँपै। हहलि हहलि अधिकौ हिय काँपै।।
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ।।
एहि मास उपजै रस मूलू। तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू।।
नैन चुवहि जस माँहुट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू।।
टूटहि बुंद परहि जस ओला। बिरह पवन होइ मारैं झोला।।
केहिक सिगार को पहिर पटोरा। गियँ नहि हार रही होइ डोरा।।
तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल।
तेहि पर बिरह जराइ कै, चहै उड़ावा झोल।।
स्रोत : पद्मावत, नागमती वियोग खंड
भावार्थ: माघ महीने में अब पाला (कड़ाके की ठंड) पड़ने लगा है, विरह काल बनकर जड़काला (मृत्यु) हो गया है। शरीर को पहले-पहल (पहल पहल) रुई से ढकने पर भी हृदय बुरी तरह (हहलि हहलि) काँपता है। नायिका कहती है, हे पति (नाहाँ), आकर सूर्य (सूर) बनकर तपो, उसके बिना माघ में यह जाड़ा नहीं छूटता। इसी मास में रस का मूल (रसमूलू, शृंगार रस) उपजता है, नायिका कहती है, तुम ही मेरे भँवरे हो और मेरा यौवन (जोबन) फूल है। आँखों से आँसू माघ की वर्षा (माँहुट) के पानी जैसे बह रहे हैं, वह पानी अंगों पर बाणों (सर) की तरह चुभता है। बूँदें ओलों की तरह टूटकर गिरती हैं, विरह-रूपी हवा झकझोरकर मारती है। किसके लिए शृंगार (सिगार) करूँ, किसके लिए रेशमी वस्त्र (पटोरा) पहनूँ, गले (गियँ) में हार नहीं रहा, बस डोरा रह गया है। यानी इस मास में शृंगार रस का मूल तो उपजता है, पर नायिका का अपना शृंगार छूट गया है। अंत के दोहे में नायिका कहती है, हे प्रियतम, तुम्हारे बिना यह शरीर तिनके जितना हल्का हो गया है, विरह की आग इसे जलाकर हवा में उड़ा देना चाहती है।
“रसमूलू” शब्द का अर्थ है मूल रस, अर्थात शृंगार रस (ध्यान रहें, सही वर्तनी “शृंगार” है, “श्रृंगार” नहीं)। माघ में उपजने वाले रसमूलू (शृंगार रस) और नायिका के अपने शृंगार के छूट जाने के बीच का विरोधाभास इस अंश में स्पष्ट दिखता है।
6 अंश (4): फागुन मास
तन जस पियर पात भा मोरा। बिरह न रहै पवन होइ झोरा।।
तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।।
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।।
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहि जिय लाइ दीन्हि जसि होरी।।
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।।
रातिहु देवस इहै मन मोरें। लागौं कंत छार जेऊँ तोरें।।
यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ।।
स्रोत : पद्मावत, नागमती वियोग खंड
भावार्थ: फागुन में हवा के तेज़ झोंके (झँकोरै) चलने लगे हैं, ठंड चौगुनी बढ़ गई है, यह कैसे सही जाए। नायिका का शरीर पीले पत्ते (पियर पात) जैसा पीला पड़ गया है, विरह के कारण वह हवा के झोंकों में भी टिक नहीं पा रही। पेड़ों (तरिवर) से पत्ते झड़ रहे हैं, वन में ढाँखा भी झड़ रहे हैं, और शाखाएँ (साखा) अनपत्त (पत्ते रहित) हो गई हैं (“भइ अनपत्त फूल फर साखा”)। वनस्पति (करिन्ह बनाफति) में उल्लास (हुलासू) छाया है, यानी फागुन में प्रकृति खिल उठी है, पर नायिका के लिए संसार दुगुना उदास हो गया है। इस अंश को बाहरी उल्लास और भीतरी विषाद के विरोधाभास के रूप में पढ़ा जा सकता है। सब लोग फाग और चाँचरि (होली का रंग-खेल) खेल रहे हैं, पर यही होली नायिका के मन को पीड़ा दे रही है। नायिका कहती है, यदि प्रियतम को मेरा इस तरह जलना ही अच्छा लगता है, तो जलते-मरते हुए भी मुझे कोई रोष (गुस्सा) नहीं आता; इसे उसके प्रेम की पराकाष्ठा (चरम सीमा) के रूप में पढ़ा जा सकता है। रात-दिन उसके मन में यही बात रहती है कि वह प्रियतम के लिए राख होकर भी लगी रहे। अंत के दोहे में वह कहती है, इस शरीर को जलाकर राख कर दो और उस राख को हवा में उड़ा दो, ताकि वह राख उसी रास्ते पर गिरे जहाँ प्रियतम के चरण (पाउ) पड़ें, यह आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा दिखाती है।
फागुन अंश में बाहरी उल्लास और भीतरी विषाद का विरोधी (विपरीत) चित्रण स्पष्ट है, बाहर सब उल्लास में हैं (फाग खेल रहे हैं) पर नायिका का विषाद दुगुना हो गया है। अंतिम दोहे की “राख होकर प्रियतम के मार्ग में गिरने” की कामना को आत्म-समर्पण की चरम अभिव्यक्ति के रूप में पंक्तियों के साथ समझाएँ।
7 काव्य-सौंदर्य: अलंकार और रस
यह खंड चारों अंशों में प्रयुक्त अलंकारों और प्रधान रस को एक साथ समेटता है। इनमें से अलंकार पहचानकर पंक्ति के साथ उनसे बने काव्य-सौंदर्य को समझाएँ।
| अलंकार | उदाहरण (पंक्ति) | क्यों यह अलंकार है |
|---|---|---|
| विरोधाभास अलंकार | “सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा” | ठंड (सियरि) को आग (अगिनि) कहा गया, ऊपर से विरोधी लगने वाली बात वास्तव में सच है, अत्यधिक ठंड भी आग जैसी जलन देती है |
| पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार | “अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई” | “फिरै” शब्द की आवृत्ति एक ही अर्थ में हुई है, लौट-लौटकर आने के भाव पर बल देने के लिए |
| उपमा अलंकार | “जरै बिरह ज्यों दीपक बाती” (अगहन); “मोहि जिय लाइ दीन्हि जसि होरी” (फागुन) | “ज्यों” और “जसि” (जैसी) उपमा-वाचक शब्द हैं: विरह में जलती नायिका की तुलना दीपक की बाती से, और मन में लगी आग की तुलना होली से |
| रूपक अलंकार | “बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा” | विरह को सीधे बाज पक्षी (सचान) कह दिया गया, बिना “जैसा/समान” शब्द के |
| उत्प्रेक्षा अलंकार | “जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी” (पूस) | “जानहुँ” (मानो) वाचक शब्द से संभावना व्यक्त की गई है कि ठंडी सेज मानो बर्फ़ (हिमाचल) में डूबी हो |
| अनुप्रास अलंकार | “दूभर दुख”, “बिरह बाढ़ि”, “हहलि हहलि अधिकौ हिय” | “द”, “ब”, “ह” जैसे वर्णों की आवृत्ति से लयबद्धता उत्पन्न होती है (“सुलगि सुलगि”, “हहलि हहलि” में पूरे शब्द की आवृत्ति पुनरुक्तिप्रकाश भी है) |
वियोग शृंगार रस (विप्रलंभ शृंगार) वह रस है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका के बिछड़ जाने पर उत्पन्न विरह-वेदना का वर्णन होता है। इस पाठ में नागमती के वियोग का वर्णन होने के कारण यहाँ वियोग/विप्रलंभ शृंगार रस प्रधान है। स्थायी भाव रति है, जो यहाँ वियोगावस्था में है।
बहुत-से छात्र “शृंगार” को “श्रृंगार” लिख देते हैं। पाठ्यपुस्तक की सही वर्तनी शृंगार (श + ृ की मात्रा + ंगार) है, परीक्षा में यही वर्तनी लिखें।
8 शब्दार्थ: कठिन अवधी शब्द
जायसी की भाषा मध्यकालीन अवधी है, आज की हिंदी से बहुत अलग। पाठ्यपुस्तक में दिए गए सभी कठिन शब्दों के अर्थ यहाँ एक साथ दिए गए हैं, ताकि पंक्तियों की व्याख्या करते समय कोई शब्द अटका हुआ न रहे।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| देवस | दिवस, दिन |
| निसि, निशा | रात्रि, रात |
| दूभर | कठिन, मुश्किल |
| हिया | हृदय |
| जनावा | प्रतीत हुआ |
| सीऊ | शीत |
| तौ | तब |
| पीऊ | प्रिय, प्रेमी |
| नाहू | नाथ |
| बहुरा | लौटकर |
| बिछोई | बिछुड़ना |
| सियरि | ठंडी |
| दगधै | दग्ध, जलना |
| भै | हुई |
| कंतू | प्रिय |
| भसमंतू | भस्म |
| सँदेसड़ा | संदेश |
| धनि | पत्नी, प्रिया |
| सुरुज | सूरज |
| लंक | लंका की ओर, दक्षिण दिशा |
| दिसि | दिशा |
| भा | हो गया |
| दारुन | कठिन, अधिक |
| हियरै | हियरा, हृदय |
| सौर-सुपेती | जाड़े के ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र |
| हिवंचल | हिमाचल, हिम (बरफ़) से ढकी हुई |
| बूढ़ी | डूबी हुई |
| बासर | दिन |
| पँखी | पक्षी |
| सचान | बाज पक्षी |
| चाँड़ा | प्रचंड |
| रकत | रक्त, खून |
| गरा | गल गया |
| ररि | रट-रट कर |
| माँह | माघ का महीना |
| जड़काला | मृत्यु |
| सूर | सूर्य, सूरज |
| नाहाँ | पति |
| रसमूलू | मूल रस (शृंगार रस) |
| माँहुट | महावट, माघ मास की वर्षा |
| नीरू | जल |
| झोला | झकझोरना |
| पटोरा | रेशमी वस्त्र |
| गियँ | गरदन |
| तिनुवर | तिनका |
| अनपत्त | पत्ते रहित |
| बनाफति | वनस्पति |
| हुलासू | उत्साह सहित, उल्लास |
| चाँचरि | होली के समय खेले जाने वाला चरचरि नामक एक खेल, जिसमें सभी एक-दूसरे पर रंग डालते हैं |
| पियहि | पिया |
| मकु | कदाचित, मानो |
- क्या मैं जायसी का जीवनकाल, मूल स्थान और तीनों कृतियों के नाम बिना देखे लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं “बारहमासा” की परिभाषा और यह किस खंड से लिया गया है, बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं चारों अंशों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) का भावार्थ अपने शब्दों में लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं कम से कम 3 अलंकार, उदाहरण सहित, पहचान सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं पाठ का प्रधान रस और उसका कारण बता सकता/सकती हूँ?
- मलिक मुहम्मद जायसी (1492-1542) जायस, अमेठी के निवासी, सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि
- प्रमुख कृतियाँ: पद्मावत (सबसे प्रसिद्ध), अखरावट, आखिरी कलाम
- पद्मावत, फ़ारसी मसनवी शैली और दोहा-चौपाई छंद में रचित, भाषा ठेठ अवधी
- बारहमासा: बारह महीनों में विरहिणी की मनोदशा वर्णित करने वाली काव्य-शैली
- प्रस्तुत अंश पद्मावत के “नागमती वियोग खंड” से, राजा रत्नसेन के वियोग में रानी नागमती की व्यथा
- पाठ में केवल 4 महीने: अगहन (दीपक-बाती उपमा), पूस (चकई-चकवा, सारस बिंब), माघ (रसमूलू उपजता है पर नायिका का अपना शृंगार छूटा, माँहुट वर्षा), फागुन (बाहर उल्लास भीतर विषाद)
- प्रमुख अलंकार: विरोधाभास (“सियरि अगिनि”), पुनरुक्तिप्रकाश (“फिरै फिरै”), उपमा (“ज्यों दीपक बाती”), उत्प्रेक्षा (“जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी”) और रूपक (“बिरह सचान”)
- प्रधान रस: वियोग/विप्रलंभ शृंगार, स्थायी भाव रति