कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 8 पद (विद्यापति) नोट्स

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • कवि विद्यापति का जीवन-परिचय, उनकी तीन रचना-भाषाएँ और छह प्रमुख कृतियाँ बता पाएँगे
  • तीनों पदों का शब्द-दर-शब्द भावार्थ आधुनिक हिंदी में लिख पाएँगे
  • “भणिता” क्या होती है और तीनों पदों में यह किस रूप में आती है, समझा पाएँगे
  • पदों में प्रयुक्त अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश और उपमा अलंकार को उदाहरण सहित पहचान पाएँगे
  • पाठ के कठिन मैथिली शब्दों के अर्थ बिना भूले याद रख पाएँगे
  • प्रश्न-अभ्यास के तत्सम-रूप वाले प्रश्न को सही ढंग से हल कर पाएँगे
विद्यापतिपदावलीमैथिली भाषाभणितासंधिकविअनुप्रास अलंकारराजा शिवसिंहवियोग शृंगार

1 कवि-परिचय: विद्यापति

तीनों पदों में जाने से पहले कवि को जान लेते हैं।

चित्र 1: महाकवि कोकिल विद्यापति की प्रतिमा, बिस्पी (मधुबनी, बिहार), कवि का जन्मस्थान। चित्र: Bijay chaurasia / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0
चित्र 1: महाकवि कोकिल विद्यापति की प्रतिमा, बिस्पी (मधुबनी, बिहार), कवि का जन्मस्थान। चित्र: Bijay chaurasia / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0
1380-1460अनुमानित जीवनकाल (सन्)
3रचना-भाषाएँ
6प्रमुख कृतियाँ
3पद इस अध्याय में
  • विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिस्पी गाँव के एक ऐसे परिवार में हुआ जो विद्या और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था।
  • उनके जन्मकाल के संबंध में प्रामाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है। उनके रचनाकाल और आश्रयदाता के राज्यकाल के आधार पर उनके जन्म और मृत्यु वर्ष का अनुमान किया गया है।
  • विद्यापति मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार थे।
  • बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील व्यक्ति थे। साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि के वे प्रकांड पंडित थे।
कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

संधिकवि उस कवि को कहते हैं जो साहित्य के दो कालों की संधि (जोड़) पर खड़ा होकर दोनों की विशेषताएँ अपनी रचनाओं में लिए हुए हो। पाठ के अनुसार विद्यापति “आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं”। इसका आधार यह है कि उनकी कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी रचनाओं पर दरबारी संस्कृति और अपभ्रंश काव्य-परंपरा (आदिकाल की विशेषताएँ) का प्रभाव है, तो उनकी पदावली के गीतों में भक्ति और शृंगार की गूँज (भक्तिकाल की विशेषता) सुनाई देती है।

1.1 तीन भाषाएँ, छह कृतियाँ

विद्यापति और भी कई भाषाओं-उपभाषाओं को जानते थे, पर रचनाएँ उन्होंने तीन भाषाओं में कीं:

विद्यापति की रचना-भाषाएँ
संस्कृतशास्त्रीय रचनाओं की भाषा
अवहट्ट (अपभ्रंश)कीर्तिलता, कीर्तिपताका जैसी रचनाओं की भाषा
मैथिलीपदावली: इसी अध्याय के तीनों पद इसी भाषा में हैं
भ्रम में न पड़ें

इस अध्याय के तीनों पदों की भाषा मैथिली है। जायसी (जिनसे तुलना योग्यता-विस्तार में पूछी गई है) की भाषा इस पाठ में नहीं बताई गई; इसी पुस्तक के अध्याय 7 (“बारहमासा”, जो पद्मावत का अंश है) के कवि-परिचय के अनुसार उनकी “भाषा ठेठ अवधी है”। दोनों कवियों की भाषा को आपस में न मिलाएँ।

पाठ विद्यापति की इन छह महत्त्वपूर्ण कृतियों के नाम देता है (पाठ में केवल नाम दिए गए हैं):

1

कीर्तिलता

पाठ के अनुसार इस पर दरबारी संस्कृति और अपभ्रंश काव्य परंपरा का प्रभाव है।

2

कीर्तिपताका

पाठ इसे कीर्तिलता के साथ गिनाता है: दोनों पर दरबारी संस्कृति और अपभ्रंश काव्य परंपरा का प्रभाव है।

3

पुरुष परीक्षा

महत्त्वपूर्ण कृतियों की सूची में तीसरा नाम।

4

भू-परिक्रमा

महत्त्वपूर्ण कृतियों की सूची में चौथा नाम।

5

लिखनावली

महत्त्वपूर्ण कृतियों की सूची में पाँचवाँ नाम।

6

पदावली

पाठ के अनुसार “विद्यापति की पदावली ही उनके यश का मुख्य आधार है“। इसके गीतों में भक्ति और शृंगार की गूँज है।

क्या आप जानते हैं?

विद्यापति हिंदी साहित्य के मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं जिनकी पदावली में जनभाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। मिथिला क्षेत्र के लोक-व्यवहार और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में उनके पद इतने रच-बस गए हैं कि पदों की पंक्तियाँ अब वहाँ के मुहावरे बन गई हैं।

विद्यापति के पदों के विषय तीन प्रकार के हैं: राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों का चित्रण, स्तुति-पदों में विभिन्न देवी-देवताओं की भक्ति, और प्रकृति संबंधी पदों में प्रकृति की मनोहर छवि। इस अध्याय के तीनों पद प्रेम के पद हैं। पद (1) और पद (3) में नायिका विरहिणी है; पद (2) में प्रेम की अतृप्ति का वर्णन है।

पाठ के शब्दों में, “पद लालित्य, मानवीय प्रेम और व्यावहारिक जीवन के विविध रंग इन पदों को मनोरम और आकर्षक बनाते हैं” और “उनके पदों में प्रेम और सौंदर्य की अनुभूति की जैसी निश्छल और प्रगाढ़ अभिव्यक्ति हुई है वह अन्यत्र दुर्लभ है”।

2 भणिता: कवि अपना नाम कैसे लिखते थे

कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

भणिता मध्यकालीन भक्ति-काव्य की वह शैली है जिसमें कवि अपने पद के अंतिम छंद में स्वयं का नाम लेकर पद को अपना प्रमाणित करता है (जैसे किसी पत्र के अंत में हस्ताक्षर)। “भनइ” या “कह” शब्द के साथ कवि अपना नाम जोड़ता है, जैसे “भनइ विद्यापति” या “विद्यापति कह”।

तीनों पदों में भणिता अलग-अलग रूप में आती है: कहीं केवल कवि-नाम, तो कहीं आश्रयदाता राजा और रानी का नाम भी:

पद भणिता-पंक्ति इसमें क्या है
पद (1) “विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस” केवल कवि-नाम
पद (2) “विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक” केवल कवि-नाम
पद (3) “भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति लखिमादेइ-रमान” कवि-नाम + आश्रयदाता राजा शिवसिंह + रानी लखिमा देवी का नाम
परीक्षा संकेत

पद (3) की भणिता में आश्रयदाता राजा शिवसिंह का नाम आता है, जिससे उनके आश्रय का संकेत मिलता है। पाठ का कवि-परिचय उन्हें राजा शिवसिंह का “अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार” बताता है। उदाहरण प्रश्न: “किस पद की भणिता में राजा शिवसिंह का नाम आता है?”

3 पद (1): विरह-पत्र और मधुपुर-गमन

पृष्ठभूमि समझें

यह पद राधा-कृष्ण प्रेम-परंपरा से जुड़ा है। कृष्ण बचपन में गोकुल में रहते थे, बड़े होकर मथुरा (पद में “मधुपुर”) चले गए। पद में विरहिणी नायिका (परंपरा में जिन्हें राधा माना जाता है) अपने प्रियतम (कृष्ण, पद में “हरि”) के वियोग में तड़प रही है।

मूल पद (मैथिली) भावार्थ (आधुनिक हिंदी)
के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास।
हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास।।
मेरा पत्र (पतिआ) प्रियतम तक कौन ले जाएगा? हृदय अब असह्य दुख नहीं सह पा रहा, सावन का महीना आ गया है।
एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।।
अकेले घर में प्रिय के बिना मुझसे रहा नहीं जाता। हे सखी, दूसरे का दुख कितना दारुण है, यह भला जगत में कौन विश्वास करे।
मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनो मन गेल।
गोकुल तेजि मधुपुर बस रे कन अपजस लेल।।
मेरा मन “हरि” (कृष्ण) हर ले गए, अपना मन भी साथ ले गए। गोकुल छोड़कर मथुरा में जा बसे और अपयश लिया।
विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस।
आओत तोर मन भावन रे एहि कातिक मास।।
कवि विद्यापति गाते हैं: हे नारी, मन में आशा रखो, तुम्हारे मन को भाने वाले (प्रियतम) इसी कार्तिक मास में आएँगे।
कंठस्थ करेंपरिभाषा 3

अनुप्रास अलंकार वह अलंकार है जिसमें एक ही वर्ण (अक्षर) की बार-बार आवृत्ति से पंक्ति में ध्वनि-सौंदर्य आता है। पद (1) की पंक्ति “मोर मन हरि हर लए गेल” में “म”, “ह” और “र” वर्णों की आवृत्ति है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है। (“हरि” कृष्ण का नाम है और “हर” क्रिया है, हर लेना; ये दो अलग शब्द हैं, एक ही शब्द का भिन्न अर्थों में दोहराव नहीं, इसलिए इसे यमक न कहें।) इसी तरह “तिल तिल”, “सुन-सुन”, “गुनि-गुनि”, “हेरि-हेरि” और “छन-छन” में एक ही शब्द के दोहराव से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

शब्द अर्थ
पतिआ पत्र, चिट्ठी
लए जाएत ले जाए
सहए सहना
साओन मास सावन का महीना
एक सरि अकेली
अनकर अन्यतम (दूसरे का)
पतिआए विश्वास करे
मधुपुर मथुरा
अपजस अपयश
मन भावन मन को भाने वाला
कातिक मास कार्तिक का महीना
परीक्षा संकेत

“नायिका के दुख का क्या कारण है?” जैसे प्रश्न में केवल “विरह” न लिखें, पूरा उत्तर दें: प्रियतम गोकुल छोड़कर मथुरा जा बसे हैं, इसी कारण सावन के महीने में नायिका असह्य दुख में अकेली है।

4 पद (2): जिसकी नज़र कभी तृप्त नहीं होती

मूल पद (मैथिली) भावार्थ (आधुनिक हिंदी)
सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए।
सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल तिल नूतन होए।।
हे सखी, तुम मुझसे (मेरा) अनुभव क्या पूछती हो? वह प्रीति-अनुराग बखान करने पर हर क्षण नया-सा लगता है।
जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।
जन्म भर मैंने (उनका) रूप निहारा, फिर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए। वही मधुर बोल कानों में सुना, फिर भी वे श्रुति-पथ (कान के मार्ग) को छू न सके, अर्थात सुनने से भी तृप्ति नहीं मिली।
कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन केलि।।
लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल।।
कितनी ही मधुर रात्रियाँ रमण-आनंद में बिता दीं, पता ही नहीं चला कैसे मिलन हुआ। लाखों युगों तक हृदय में उन्हें बसाए रखा, फिर भी हृदय की जलन नहीं गई।
कत बिदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख।।
विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक।।
कितने ही विदग्ध (रसिक) जन इस प्रेम-रस की सराहना करते हैं, पर (मेरे जैसा) अनुभव किसी ने नहीं देखा। विद्यापति कहते हैं: प्राणों को शांति देने वाला व्यक्ति लाखों में एक भी नहीं मिला।
शब्द अर्थ
पिरित प्रीत
बखानिअ बखान करना
सेहो वही
निहारल देखा
तिरपित तृप्त, संतुष्ट
भेल हुए
स्रवनहि कानों में
स्रुति श्रुति
कत कितनी
मधु जामिनि मधुर रात्रियाँ
रभस (शब्दार्थ-सूची में “रमस”) रमण
गमाओलि गँवा दी, बिता दी
कइसन कैसा
केलि मिलन का आनंद
जरनि जलन
बिदगध विदग्ध, दुखी (पाठ्यपुस्तक का शब्दार्थ); इस पंक्ति के भावार्थ में “रसिक” के अर्थ में
अनुमोदए अनुमोदन
पेख देख
जुड़ाइते जुड़ाने के लिए
याद रखने की तरकीब

नयन न तिरपित, हिय न जरनि जाए

पद (2) का केंद्रीय भाव इस एक पंक्ति में झलकता है: जन्म भर रूप निहारने पर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए; लाखों युगों तक हृदय में रखने पर भी हृदय की जलन नहीं गई। इस पद का केंद्रीय भाव प्रेम की अतृप्ति है; इसे याद रखने का सरल तरीका यही है।

5 पद (3): दुखभरा चित्र और आश्रयदाता का नाम

मूल पद (मैथिली) भावार्थ (आधुनिक हिंदी)
कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान।
कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।
फूलों से भरे वन को देखकर कमल-सी मुखवाली नायिका अपने दोनों नेत्र मूँद लेती है। कोयल की कूक और भौंरों की गुनगुनाहट सुनकर वह हाथों से कान ढँक लेती है।
माधब, सुन-सुन बचन हमारा।
तुअ गुन सुंदरि अति भेल दूबरि
गुनि-गुनि प्रेम तोहारा।।
हे माधव (कृष्ण), हमारी बात सुनो-सुनो। तुम्हारे गुणों के कारण सुंदरी (नायिका) अत्यंत दुर्बल हो गई है, तुम्हारे प्रेम को सोच-सोचकर।
धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा।
कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि नयन गरए जल-धारा।।
धरती को पकड़कर स्त्री (नायिका) कितनी ही बार बैठ जाती है, फिर वहाँ से उठ नहीं पाती। दुखी दृष्टि से चारों दिशाओं में देख-देखकर नेत्रों से अश्रुधारा गिरती है, जिससे (पाठ की भूमिका के अनुसार) उसके नेत्र खुल नहीं पा रहे।
तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन
चौदसि-चाँद-समान।
भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति लखिमादेइ-रमान।।
तुम्हारे विरह में उस (नायिका) का शरीर क्षण-क्षण क्षीण होता जा रहा है, चौदहवीं (चतुर्दशी) के चाँद के समान। भणिता में विद्यापति कहते हैं और लखिमा देवी के रमण (पति) राजा शिवसिंह का नाम लेते हैं।
कंठस्थ करेंपरिभाषा 4

उपमा अलंकार वह अलंकार है जिसमें एक वस्तु (उपमेय) की तुलना उसके किसी गुण के कारण किसी दूसरी, अधिक प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से की जाती है। पद (3) की पंक्ति “तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन / चौदसि-चाँद-समान” में नायिका के क्षीण होते शरीर की तुलना चौदहवीं (चतुर्दशी) के चाँद से की गई है। यही उपमा अलंकार है।

शब्द अर्थ
कमलमुख कमल के समान मुख वाले
कानन वन
नयान नयन, नेत्र
झाँपइ बंद कर दे
सुंदरि सुंदरी, नायिका
गुनि-गुनि सोच-सोचकर
धरनि धरणी, धरती
धनि स्त्री
धरि (शब्दार्थ-सूची में “धारि”) धरकर, पकड़कर
कातर दुखी
दिठि दृष्टि
हेरि-हेरि देख रही है
बइसइ बैठ जाती है
चौदसि चौदहवीं, चतुर्दशी
गरए गिरना
जलधारा अश्रुधारा
रमान रमण
परीक्षा संकेत

“किस पंक्ति में राजा शिवसिंह का नाम आता है?” इसका उत्तर पद (3) की अंतिम भणिता-पंक्ति है, जिससे उनके आश्रय का संकेत मिलता है (पाठ उन्हें शिवसिंह का “राजकवि” बताता है): “भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति लखिमादेइ-रमान”।

6 तीनों पदों की तुलना: एक नज़र में

बिंदु पद (1) पद (2) पद (3)
मुख्य भाव विरह-पत्र भेजने की इच्छा, आने की आशा देखने-सुनने पर भी न तृप्त होने वाला प्रेम विरह में कोयल-भौंरों की ध्वनि से कान ढँकना, अश्रुधारा, क्षण-क्षण क्षीणता
नामित पात्र हरि (कृष्ण), गोकुल, मधुपुर (मथुरा) – माधव (कृष्ण)
मुख्य अलंकार अनुप्रास (“मोर मन हरि हर”) पुनरुक्ति प्रकाश (“तिल तिल”) उपमा (“चौदसि-चाँद-समान”)
भणिता में नाम केवल कवि-नाम केवल कवि-नाम कवि + राजा शिवसिंह + लखिमा देवी
अंत में भाव आशा (आओत तोर मन भावन) अतृप्ति (लाखे न मीलल एक) क्षीणता (तनु छिन, चाँद-समान)
परीक्षा संकेत

पाठ की भूमिका पद (1) और पद (3) की नायिका को स्पष्ट रूप से विरहिणी कहती है (वियोग शृंगार), और पद (2) प्रेम की अतृप्ति का पद है। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है (यह क्रम पाठ में नहीं दिया गया है): पद (1) आशा पर, पद (2) अतृप्ति पर और पद (3) क्षीणता पर ध्यान दिलाता है। यह क्रम बताने से उत्तर में भाव-विकास स्पष्ट दिखता है।

7 तत्सम रूप: प्रश्न-अभ्यास प्रश्न 7 की तैयारी

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास में इन दस मैथिली/तद्भव शब्दों के तत्सम (मूल संस्कृत) रूप पूछे गए हैं:

पाठ का शब्द तत्सम रूप
तिरपित तृप्त
छन क्षण
बिदगध विदग्ध
निहारल निरीक्षित
पिरित प्रीति
साओन श्रावण
अपजस अपयश
छिन क्षीण
तोहारा तव
कातिक कार्तिक
आम ग़लती

“छन” (क्षण) और “छिन” (क्षीण) एक जैसे दिखते हैं पर अलग शब्द हैं। पद (3) की पंक्ति “दिन छन-छन तनु छिन” में दोनों साथ आए हैं: “छन-छन” यानी क्षण-क्षण (हर पल), और “तनु छिन” यानी शरीर क्षीण (कमज़ोर)। परीक्षा में इन्हें आपस में न बदलें।

त्वरित पुनरीक्षण, परीक्षा से एक रात पहले यह ज़रूर पढ़ें
  • विद्यापति (सन् 1380-1460), बिस्पी गाँव, मधुबनी (बिहार); राजा शिवसिंह के राजकवि और सलाहकार
  • तीन रचना-भाषाएँ: संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश), मैथिली। पदावली मैथिली में है, अवधी में नहीं
  • आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं; छह कृतियाँ: कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली, पदावली
  • भणिता = पद के अंतिम छंद में कवि द्वारा स्वयं का नाम लेना; पद (3) में आश्रयदाता राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी का नाम भी है
  • पद (1): “मोर मन हरि हर लए गेल”, अनुप्रास अलंकार; गोकुल छोड़कर मधुपुर (मथुरा) जाने का प्रसंग
  • पद (2): जन्म भर रूप निहारने पर भी नेत्र तृप्त न होना; प्रेम की अतृप्ति केंद्रीय भाव
  • पद (3): “चौदसि-चाँद-समान”, उपमा अलंकार; कोयल-भौंरों की ध्वनि सुनकर कान ढँकना
  • पद (1) और (3): विरहिणी नायिका, वियोग शृंगार; पद (2): प्रेम की अतृप्ति
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं विद्यापति का जीवनकाल, जन्मस्थान और तीनों रचना-भाषाएँ बिना देखे बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं तीनों पदों की भणिता-पंक्तियाँ और उनमें आए नामों में अंतर बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं “मोर मन हरि हर लए गेल” में अनुप्रास अलंकार समझा सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं तत्सम रूप वाले सभी दस शब्द बिना ग़लती के लिख सकता/सकती हूँ?