कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 8 का त्वरित पुनरीक्षण। हर परिभाषा, हर शब्दार्थ और हर नामित तथ्य एक ही जगह, बीच का कुछ नहीं। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, यह परीक्षा की सुबह पढ़ें।
1 कवि-परिचय एक नज़र में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जीवनकाल | सन् 1380-1460 (अनुमानित) |
| जन्मस्थान | बिस्पी गाँव, मधुबनी (बिहार) |
| आश्रयदाता | मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार |
| विद्वता | साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल के प्रकांड पंडित |
| रचना-भाषाएँ (3) | संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश), मैथिली, अवधी नहीं |
| विशेषता | आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं |
| प्रमुख कृतियाँ (6) | कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली, पदावली |
| यश का आधार | पदावली |
| विशेष पहचान | जनभाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति करने वाले मध्यकाल के पहले कवि; पद मिथिला के मुहावरे बन गए |
परिभाषाएँ
संधिकविदो कालों की संधि पर खड़ा कवि जो दोनों की विशेषताएँ अपनी रचनाओं में लिए हो
भणितापद के अंतिम छंद में कवि द्वारा स्वयं का नाम लेने की मध्यकालीन भक्ति-काव्य शैली
अनुप्रास अलंकारएक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति (“मोर मन हरि हर लए गेल” में म, ह, र)
उपमा अलंकारएक वस्तु की तुलना उसके किसी गुण के कारण किसी दूसरी, अधिक प्रसिद्ध वस्तु से करना
2 तीनों पद एक नज़र में
| बिंदु | पद (1) | पद (2) | पद (3) |
|---|---|---|---|
| मुख्य भाव | विरह-पत्र, आने की आशा | देखने-सुनने पर भी न तृप्त होना | विरह में कान ढँकना, अश्रुधारा, क्षीणता |
| नामित पात्र | हरि, गोकुल, मधुपुर | – | माधव |
| अलंकार | अनुप्रास (“मोर मन हरि हर”) | पुनरुक्ति प्रकाश (“तिल तिल”) | उपमा (“चौदसि-चाँद-समान”) |
| भणिता | केवल कवि-नाम | केवल कवि-नाम | कवि + राजा शिवसिंह + लखिमा देवी |
पद (1)प्रियतम तक पत्र कौन ले जाए, यह प्रश्न; सावन का असह्य दुख; “मोर मन हरि हर लए गेल” (अनुप्रास); गोकुल छोड़कर मधुपुर जाना; भणिता में कार्तिक मास की आशा
पद (2)प्रीति-अनुराग हर पल नया; जन्म भर रूप निहारकर भी नेत्र अतृप्त; मधु-रजनी और लाखों युग हृदय में रखने पर भी जलन न जाना; भणिता में लाखों में एक न मिलने का दुख
पद (3)कुसुमित कानन देखकर भी नेत्र मूँदना; माधव को संबोधन; धरती पकड़कर बार-बार बैठ जाना, फिर उठ न पाना; अश्रुधारा; “चौदसि-चाँद-समान” (उपमा); भणिता में राजा शिवसिंह और लखिमा देवी का नाम
3 तत्सम रूप (प्रश्न 7)
| पाठ का शब्द | तत्सम रूप |
|---|---|
| तिरपित | तृप्त |
| छन | क्षण |
| बिदगध | विदग्ध |
| निहारल | निरीक्षित |
| पिरित | प्रीति |
| साओन | श्रावण |
| अपजस | अपयश |
| छिन | क्षीण |
| तोहारा | तव |
| कातिक | कार्तिक |
4 पूरी शब्दार्थ सूची
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| पतिआ | पत्र, चिट्ठी |
| लए जाएत | ले जाए |
| सहए | सहना |
| साओन मास | सावन का महीना |
| एक सरि | अकेली |
| अनकर | अन्यतम (दूसरे का) |
| पतिआए | विश्वास करे |
| मधुपुर | मथुरा |
| अपजस | अपयश |
| मन भावन | मन को भाने वाला |
| पिरित | प्रीत |
| बखानिअ | बखान करना |
| निहारल | देखा |
| तिरपित | तृप्त, संतुष्ट |
| भेल | हुए |
| सेहो | वही |
| स्रवनहि | कानों में |
| स्रुति | श्रुति |
| कत | कितनी |
| मधु जामिनि | मधुर रात्रियाँ |
| रमस (पद में “रभस”) | रमण |
| गमाओलि | गँवा दी, बिता दी |
| कइसन | कैसा |
| केलि | मिलन का आनंद |
| जरनि | जलन |
| बिदगध | विदग्ध, दुखी (पाठ्यपुस्तक का शब्दार्थ); पद (2) की पंक्ति में “रसिक” के अर्थ में |
| अनुमोदए | अनुमोदन (सराहना) |
| पेख | देख |
| जुड़ाइते | जुड़ाने के लिए |
| कमलमुख | कमल के समान मुख वाले |
| कानन | वन |
| नयान | नयन, नेत्र |
| झाँपइ | बंद कर दे |
| सुंदरि | सुंदरी, नायिका |
| गुनि-गुनि | सोच-सोचकर |
| धरनि | धरणी, धरती |
| धनि | स्त्री |
| धारि (पद में “धरि”) | धरकर, पकड़कर |
| कातर | दुखी |
| दिठि | दृष्टि |
| हेरि-हेरि | देख रही है |
| बइसइ | बैठ जाती है |
| चौदसि | चौदहवीं, चतुर्दशी |
| गरए | गिरना |
| जलधारा | अश्रुधारा |
| रमान | रमण |
परीक्षा से एक रात पहले
- विद्यापति (सन् 1380-1460), बिस्पी गाँव मधुबनी; राजा शिवसिंह के राजकवि; तीन भाषाएँ; छह कृतियाँ; आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं
- पद (1): अनुप्रास, गोकुल-मधुपुर, भणिता में केवल कवि-नाम
- पद (2): प्रेम की अतृप्ति (केंद्रीय भाव), भणिता में केवल कवि-नाम
- पद (3): उपमा, माधव को संबोधन, भणिता में राजा शिवसिंह + लखिमा देवी का नाम
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