इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. विद्यापति का अनुमानित जीवनकाल क्या है?
उत्तर: विद्यापति का अनुमानित जीवनकाल सन् 1380 से 1460 तक माना जाता है।
प्र. विद्यापति का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिस्पी गाँव में हुआ था।
प्र. विद्यापति किस राजा के राजकवि थे?
उत्तर: विद्यापति मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार थे।
प्र. विद्यापति की किस रचना को उनके यश का मुख्य आधार माना जाता है?
उत्तर: विद्यापति की पदावली को उनके यश का मुख्य आधार माना जाता है।
प्र. पद (1) में प्रियतम गोकुल छोड़कर कहाँ जा बसे?
उत्तर: पद (1) के अनुसार प्रियतम गोकुल छोड़कर मधुपुर (मथुरा) में जा बसे।
प्र. पद (3) की भणिता में किस रानी का नाम आता है?
उत्तर: पद (3) की भणिता में रानी लखिमा देवी का नाम आता है।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. विद्यापति को “संधिकवि” क्यों कहा जा सकता है?
उत्तर: पाठ के अनुसार विद्यापति आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं। इसका आधार यह है कि उनकी कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी रचनाओं पर दरबारी संस्कृति और अपभ्रंश काव्य-परंपरा (आदिकाल की विशेषता) का प्रभाव है, जबकि उनकी पदावली के गीतों में भक्ति और शृंगार की गूँज (भक्तिकाल की विशेषता) है। इस तरह वे दोनों कालों की विशेषताएँ अपनी रचनाओं में साथ लिए हुए हैं।
प्र. विद्यापति ने किन तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं?
उत्तर: विद्यापति ने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली, इन तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं। इसके अतिरिक्त उन्हें और भी कई भाषाओं-उपभाषाओं का ज्ञान था।
प्र. भणिता किसे कहते हैं? पद (2) की भणिता-पंक्ति लिखिए।
उत्तर: भणिता मध्यकालीन भक्ति-काव्य की वह शैली है जिसमें कवि अपने पद के अंतिम छंद में स्वयं का नाम लेकर पद को अपना प्रमाणित करता है। पद (2) की भणिता-पंक्ति है, ‘विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक।’
प्र. पद (1) की पंक्ति “मोर मन हरि हर लए गेल” में कौन-सा अलंकार है और क्यों?
उत्तर: इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है, क्योंकि इसमें ‘म’, ‘ह’ और ‘र’ वर्णों की बार-बार आवृत्ति हुई है। (‘हरि’ कृष्ण का नाम है और ‘हर’ का अर्थ है हर लेना; ये दो अलग शब्द हैं, इसलिए इसे यमक नहीं कहा जा सकता।)
प्र. पद (2) के अनुसार नायिका जन्म भर क्या करती रही, फिर भी क्या नहीं हुआ?
उत्तर: पद (2) के अनुसार नायिका जन्म भर अपने प्रियतम का रूप निहारती रही और उनके मधुर बोल कानों में सुनती रही, फिर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए और वे मधुर बोल श्रुति-पथ (कान के मार्ग) को छू न सके (“स्रुति पथ परस न गेल”), अर्थात सुनने से भी तृप्ति नहीं मिली।
प्र. पद (3) में नायिका फूलों से भरे वन को देखकर क्या करती है और क्यों?
उत्तर: पद (3) में नायिका फूलों से भरे वन को देखकर अपने दोनों नेत्र मूँद लेती है और कोयल की कूक तथा भौंरों की गुनगुनाहट सुनकर हाथों से कान ढँक लेती है। पद में इसका कारण नहीं कहा गया; संदर्भ से यही भाव निकलता है कि विरह में प्रकृति का यह सुंदर दृश्य और मधुर ध्वनि भी उसे सुख नहीं देते।
प्र. “चौदसि-चाँद-समान” उपमा से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर: इस उपमा से कवि कहना चाहता है कि विरह में नायिका का शरीर क्षण-क्षण क्षीण होता जा रहा है (“छन-छन तनु छिन”), और उसकी तुलना चौदहवीं (चतुर्दशी) के चाँद से की गई है।
प्र. विद्यापति की छह प्रमुख कृतियों में से कोई चार के नाम लिखिए।
उत्तर: विद्यापति की छह प्रमुख कृतियाँ हैं: कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और पदावली। (इनमें से कोई चार लिखी जा सकती हैं।)
प्र. तत्सम शब्द किसे कहते हैं? “तिरपित” और “छन” के तत्सम रूप लिखिए।
उत्तर: जो शब्द संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी (या अन्य भाषा) में ज्यों-के-त्यों आ जाते हैं, उन्हें तत्सम शब्द कहते हैं। ‘तिरपित’ का तत्सम रूप ‘तृप्त’ है और ‘छन’ का तत्सम रूप ‘क्षण’ है।
प्र. पद (2) की भणिता से हमें क्या पता चलता है?
उत्तर: पद (2) की भणिता-पंक्ति ‘विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक’ से पता चलता है कि यह पद स्वयं विद्यापति की रचना है, हालाँकि इसमें किसी आश्रयदाता राजा या रानी का नाम नहीं है, केवल कवि का अपना नाम है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. विद्यापति के जीवन-परिचय के आधार पर उनकी विद्वत्ता (बहुज्ञता) पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: 1. विद्यापति बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील व्यक्ति थे।
2. वे साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय और भूगोल आदि अनेक विषयों के प्रकांड पंडित थे।
3. उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली, तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं, और इसके अतिरिक्त उन्हें कई अन्य भाषाओं-उपभाषाओं का भी ज्ञान था।
4. इसके साथ ही वे मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार भी थे (पाठ इन दोनों बातों में कोई कारण-संबंध नहीं बताता)।
प्र. पद (1) का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: 1. नायिका पूछती है कि उसका पत्र प्रियतम तक कौन ले जाएगा, क्योंकि सावन के महीने में उसका दुख असह्य हो गया है।
2. अकेले घर में प्रिय के बिना उससे रहा नहीं जाता, और वह जानती है कि दूसरे का दुख जगत में कोई सच नहीं मानता।
3. उसका मन ‘हरि’ हर ले गए, वे गोकुल छोड़कर मधुपुर (मथुरा) जा बसे, जिसे कवि ‘अपयश’ कहते हैं।
4. अंत में विद्यापति नायिका को मन में आशा रखने को कहते हैं (“धनि धरु मन आस”); पाठ की भूमिका के अनुसार कवि ने कार्तिक मास में प्रियतम के आने की संभावना प्रकट की है।
प्र. पद (2) का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: 1. सखी के पूछने पर नायिका कहती है कि उसका प्रेम-अनुभव बखान करने पर हर क्षण नया-सा लगता है।
2. जन्म भर प्रियतम का रूप निहारने पर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए, और वही मधुर बोल कानों से सुनने पर भी वे श्रुति-पथ को छू न सके।
3. कितनी ही मधुर रात्रियाँ मिलन में बिता दीं, पर उसे पता ही नहीं चला कैसे वह मिलन हुआ, और लाखों युगों तक हृदय में प्रियतम को बसाए रखने पर भी हृदय की जलन नहीं गई।
4. विद्यापति कहते हैं कि ऐसे प्रियतम, जो प्राणों को शांति दे सकें, लाखों में एक भी नहीं मिलते।
प्र. पद (3) का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: 1. फूलों से भरे वन को देखकर और कोयल-भौंरों की मधुर ध्वनि सुनकर नायिका अपने नेत्र मूँद लेती है और हाथों से कान ढँक लेती है (पद इसका कारण नहीं बताता)।
2. माधव को संबोधित करके बताया जाता है कि उनके गुणों और प्रेम को सोच-सोचकर सुंदरी (नायिका) अत्यंत दुर्बल हो गई है।
3. वह धरती को पकड़कर कितनी ही बार बैठ जाती है, फिर उठ नहीं पाती, और चारों दिशाओं में दुखी दृष्टि से देखकर उसके नेत्रों से अश्रुधारा बहती है।
4. उसका शरीर क्षण-क्षण क्षीण होता जा रहा है, चौदहवीं (चतुर्दशी) के चाँद के समान, और भणिता में विद्यापति लखिमा देवी के रमण (पति) राजा शिवसिंह का नाम लेते हैं।
प्र. पद (3) की भणिता के आधार पर विद्यापति के राजा शिवसिंह से संबंध पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: 1. पद (3) की अंतिम पंक्ति ‘भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति लखिमादेइ-रमान’ में विद्यापति स्वयं अपना नाम लेने के साथ राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी का नाम भी जोड़ते हैं।
2. इससे राजा शिवसिंह के आश्रय का संकेत मिलता है; पाठ का कवि-परिचय विद्यापति को राजा शिवसिंह का “अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार” बताता है। भणिता में राजा शिवसिंह को ‘लखिमादेइ-रमान’ अर्थात लखिमा देवी का रमण (पति) कहा गया है।
3. पद (1) और पद (2) की भणिता में केवल कवि का नाम है; आश्रयदाता राजा-रानी का नाम केवल पद (3) की भणिता में आता है।
4. यह विद्यापति और राजा शिवसिंह के घनिष्ठ संबंध से मेल खाता है, जो पाठ के आरंभिक कवि-परिचय में बताया गया है।
प्र. विद्यापति की भाषा (मैथिली) और मलिक मुहम्मद जायसी की भाषा (अवधी) में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 1. विद्यापति ने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली, तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं; इस अध्याय के तीनों पद मैथिली में हैं।
2. जायसी की भाषा इस पाठ में नहीं दी गई है। इसी पुस्तक के अध्याय 7 (जायसी, पद्मावत का ‘बारहमासा’) के कवि-परिचय के अनुसार जायसी की “भाषा ठेठ अवधी है”।
3. दोनों कवियों की भाषाएँ अलग हैं: विद्यापति की मैथिली (जैसे ‘लए जाएत’, ‘बइसइ’, ‘भेल’) और जायसी की अवधी; इसलिए दोनों की शब्दावली और क्रिया-रूप भी भिन्न हैं।
4. रचना-रूप भी अलग है: विद्यापति के गीत-पद पदावली में हैं, जबकि अध्याय 7 के अनुसार जायसी ने पद्मावत के लिए दोहा-चौपाई की शैली अपनाई।
प्र. “भणिता” शैली को तीनों पदों के उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: 1. भणिता मध्यकालीन भक्ति-काव्य की वह शैली है जिसमें कवि पद के अंतिम छंद में स्वयं का नाम लेकर पद को प्रमाणित करता है।
2. पद (1) की भणिता ‘विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस’ में केवल कवि का नाम है।
3. पद (2) की भणिता ‘विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक’ में भी केवल कवि का नाम है।
4. पद (3) की भणिता ‘भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति लखिमादेइ-रमान’ में कवि-नाम के साथ आश्रयदाता राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी का नाम भी जुड़ा है, जिससे राजा शिवसिंह के आश्रय का संकेत मिलता है (पाठ उन्हें शिवसिंह का “राजकवि” बताता है)।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. तीनों पदों में वर्णित नायिका की मनोदशा का सम्पूर्ण मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: 1. पद (1) में नायिका अपने प्रियतम के गोकुल छोड़कर मधुपुर जा बसने के वियोग में असह्य दुख में है; सावन में वह पूछती है कि प्रियतम के पास पत्र कौन ले जाएगा, और कवि उसे मन में आशा रखने को कहते हैं कि प्रियतम इसी कार्तिक मास में आएँगे।
2. पद (2) में प्रेम की अतृप्ति है: जन्म भर प्रियतम का रूप निहारने पर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए, मधुर बोल श्रुति-पथ को छू न सके, और लाखों युगों तक हृदय में रखने पर भी हृदय की जलन नहीं गई।
3. पद (3) में विरहिणी का दुखभरा चित्र है: फूलों से भरा वन देखकर वह नेत्र मूँद लेती है, कोयल-भौंरों की ध्वनि सुनकर कान ढँक लेती है, धरती पकड़कर बार-बार बैठ जाती है और उठ नहीं पाती, और उसका शरीर क्षण-क्षण क्षीण होता जाता है, चौदहवीं के चाँद के समान।
4. इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है (यह क्रम पाठ में नहीं दिया गया): पद (1) आशा पर, पद (2) अतृप्ति पर और पद (3) क्षीणता पर ध्यान दिलाता है।
5. पाठ की भूमिका पद (1) और पद (3) की नायिका को विरहिणी कहती है, इसलिए ये दोनों वियोग शृंगार के उदाहरण हैं; पद (2) प्रेम की अतृप्ति का पद है।
6. पाठ के अनुसार विद्यापति ने “राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों का चित्रण” किया है, और उनके पदों में प्रेम और सौंदर्य की अनुभूति की “निश्छल और प्रगाढ़ अभिव्यक्ति” हुई है।
प्र. विद्यापति के जीवन-परिचय, भाषा और प्रमुख कृतियों का सम्पूर्ण वर्णन कीजिए।
उत्तर: 1. विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिस्पी गाँव में हुआ, अनुमानित जीवनकाल सन् 1380 से 1460 तक माना जाता है।
2. वे मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार थे।
3. बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और तर्कशील, साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय और भूगोल के प्रकांड पंडित थे।
4. उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली, तीन भाषाओं में रचनाएँ कीं।
5. उनकी छह प्रमुख कृतियाँ हैं: कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और पदावली, जिनमें पदावली ही उनके यश का मुख्य आधार है।
6. वे आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं और हिंदी साहित्य के मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं जिनकी पदावली में जनभाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। मिथिला क्षेत्र के लोक-व्यवहार में उनके पद इतने रच-बस गए हैं कि पदों की पंक्तियाँ अब वहाँ के मुहावरे बन गई हैं।
प्र. तीनों पदों में प्रयुक्त अलंकार और भणिता-शैली का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
उत्तर: 1. पद (1) में अनुप्रास अलंकार है, ‘मोर मन हरि हर लए गेल’ में ‘म’, ‘ह’ और ‘र’ वर्णों की आवृत्ति है। पद (2) में ‘तिल तिल’ और पद (3) में ‘सुन-सुन’, ‘गुनि-गुनि’, ‘हेरि-हेरि’, ‘छन-छन’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
2. पद (3) में उपमा अलंकार है, ‘तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन / चौदसि-चाँद-समान’ में नायिका के क्षीण होते शरीर की तुलना चौदहवीं (चतुर्दशी) के चाँद से की गई है।
3. भणिता की दृष्टि से पद (1) और पद (2), दोनों में केवल कवि विद्यापति का अपना नाम आता है, कोई आश्रयदाता नाम नहीं।
4. पद (3) की भणिता में कवि-नाम के साथ राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी का नाम भी जुड़ा है, जिससे राजा शिवसिंह के आश्रय का संकेत मिलता है (पाठ उन्हें शिवसिंह का “राजकवि” बताता है)।
5. इस तरह तीनों पद अलंकार और भणिता दोनों में विविधता दिखाते हैं, फिर भी तीनों प्रेम (शृंगार) की गहरी अनुभूति में बँधे हैं; पद (1) और (3) की नायिका को पाठ स्वयं विरहिणी कहता है।
6. यह विविधता के भीतर एकता विद्यापति के काव्य-कौशल की विशेषता है।
5 केस स्टडी
सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल तिल नूतन होए।।
जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।।
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।
कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन केलि।।
लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल।।
कत बिदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख।।
विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक।।
(क) 1 अंक नायिका के नेत्र कब से प्रियतम का रूप निहार रहे हैं?
उत्तर: नायिका के नेत्र जन्म भर (जनम अबधि से) प्रियतम का रूप निहार रहे हैं।
(ख) 1 अंक नायिका के अनुसार उसके हृदय की जलन कब तक नहीं गई?
उत्तर: लाखों युगों तक हृदय में प्रियतम को बसाए रखने पर भी नायिका के हृदय की जलन नहीं गई।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश के आधार पर नायिका की प्रेम-अनुभूति की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर: नायिका की प्रेम-अनुभूति की मुख्य विशेषता यह है कि वह कभी तृप्त नहीं होती, चाहे वह जन्म भर प्रियतम को निहारे, उनके बोल सुने या लाखों युगों तक उन्हें हृदय में बसाए रखे, उसकी चाहत और हृदय की जलन बनी रहती है।
(घ) 2 अंक “प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक” पंक्ति का क्या भाव है?
उत्तर: इस पंक्ति का भाव है कि जो व्यक्ति सचमुच प्राणों को शांति और चैन दे सके, ऐसा प्रियतम लाखों में भी एक नहीं मिलता, अर्थात सच्चा और संतोषदायक प्रेम पाना अत्यंत दुर्लभ है।