NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 8 पद (विद्यापति) की प्रश्न-अभ्यास (8 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी ग्यारह प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?
उत्तर: पद (1) में प्रियतमा (विरहिणी नायिका) के दुख का मुख्य कारण उसके प्रियतम (हरि) का उसे छोड़कर चले जाना है। हरि उसका मन हर ले गए और स्वयं भी गोकुल छोड़कर मधुपुर (मथुरा) जा बसे, जिसे कवि “अपजस” (अपयश) कहते हैं। इसी वियोग के कारण सावन के महीने में उसका हृदय असह्य दुख नहीं सह पा रहा। वह अकेले घर में प्रिय के बिना नहीं रह पाती, और सखी से कहती है कि दूसरे का (अनकर) दारुण दुख जग में कौन विश्वास करे (“सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए”)। वह पूछती है कि प्रियतम के पास उसका पत्र कौन ले जाएगा (“के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास”)।
प्र. कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?
उत्तर: ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से कवि नायिका की अतृप्ति की मनोदशा व्यक्त करना चाहते हैं। नायिका जन्म भर अपने प्रियतम का रूप निहारती रही, फिर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए (“जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल”)। इससे उसकी अतृप्त चाह प्रकट होती है। इसे प्रेम की गहराई दिखाने वाली मनोदशा के रूप में पढ़ा जा सकता है, जिसमें देखने से भी मन नहीं भरता।
प्र. नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण यह है कि उसका प्रेम-अनुभव उसे कभी पूरा नहीं लगता। वह कहती है कि प्रीति-अनुराग का बखान करने पर वह तिल-तिल (हर क्षण) नया होता जाता है। जन्म भर प्रियतम का रूप निहारा, फिर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए; वही मधुर बोल कानों से सुने, फिर भी वे श्रुति-पथ (कान के मार्ग) को छू न सके (“स्रुति पथ परस न गेल”), अर्थात सुनने से भी तृप्ति नहीं मिली। कितनी ही मधुर रातें मिलन के आनंद में बिता दीं, पर पता ही न चला कि वह मिलन कैसा था (“कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन केलि”)। लाखों युगों तक प्रियतम को हृदय से लगाकर रखा, फिर भी हृदय की जलन नहीं गई (“लाख लाख जुग हिअ हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल”)। अंत में विद्यापति कहते हैं कि प्राणों को जुड़ाने (शीतल करने) के लिए लाखों में एक भी न मिला (“प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक”)। प्रेम की यही अतृप्ति उसके प्राणों को तृप्त नहीं होने देती।
प्र. ‘सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर: इस पंक्ति से आशय यह है कि नायिका के प्रीति-अनुराग का बखान करने पर वह तिल-तिल (हर क्षण) नया लगता है (“तिल तिल नूतन होए”)। नायिका जितनी बार अपने प्रेम-अनुभव का बखान करती है, वह उसे उतना ही नया लगता है। इसलिए वह सखी से कहती है कि तुम मेरा अनुभव क्या पूछती हो (“सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए”)।
प्र. कोयल और भौंरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: पद (3) के अनुसार कोयल की कूक (कोकिल-कलरव) और भौंरों की गुनगुनाहट (मधुकर-धुनि) सुनकर नायिका अपने हाथों से अपने कान ढँक लेती है (“कर देइ झाँपइ कान”)। इसी तरह फूलों से भरे वन को देखकर वह अपने दोनों नेत्र मूँद लेती है। पद में इसका कारण नहीं कहा गया, पर संदर्भ से यही भाव निकलता है कि विरह में डूबी नायिका को ये मधुर ध्वनियाँ सुखद नहीं लगतीं और प्रियतम की अनुपस्थिति का दुख बढ़ाती हैं।
प्र. कातर दृष्टि से चारों तरफ़ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?
उत्तर: कवि ने इस मनोदशा को इन शब्दों में व्यक्त किया है, “कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि नयन गरए जल-धारा”, अर्थात नायिका दुखी (कातर) दृष्टि से चारों दिशाओं में देख-देखकर (हेरि-हेरि) रह जाती है और उसके नेत्रों से अश्रुधारा गिरती है। यह पंक्ति नायिका की व्याकुलता और गहरी वेदना, दोनों को एक साथ चित्रित करती है।
प्र. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए, ‘तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिक’
उत्तर:
| पाठ का शब्द | तत्सम रूप |
|---|---|
| तिरपित | तृप्त |
| छन | क्षण |
| बिदगध | विदग्ध |
| निहारल | निरीक्षित |
| पिरित | प्रीति |
| साओन | श्रावण |
| अपजस | अपयश |
| छिन | क्षीण |
| तोहारा | तव |
| कातिक | कार्तिक |
प्र. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए,
(क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।।
(ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।। सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल।।
(ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान। कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।
उत्तर (क): इस पंक्ति में नायिका कहती है कि अकेले घर में प्रिय के बिना उससे रहा नहीं जाता। वह सखी से यह भी कहती है कि दूसरे का (अनकर) दुख कितना भी दारुण (गहरा) क्यों न हो, जग में कौन उस पर विश्वास करता है (“जग के पतिआए”)। इससे नायिका का गहरा अकेलापन और यह लाचारी झलकती है कि उसकी पीड़ा दूसरों के लिए पराया दुख है।
उत्तर (ख): इस पंक्ति का आशय है कि नायिका जन्म भर अपने प्रियतम का रूप देखती रही, फिर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए। वही मधुर बोल उसने कानों से सुने, फिर भी वे श्रुति-पथ (कान के मार्ग) तक पूरी तरह नहीं पहुँचे (“स्रुति पथ परस न गेल”), अर्थात सुनने से भी तृप्ति नहीं मिली। इससे नायिका के प्रेम की अतृप्ति प्रकट होती है।
उत्तर (ग): इस पंक्ति का आशय है कि फूलों से भरे वन को देखकर कमल-सी मुखवाली नायिका अपने दोनों नेत्र मूँद लेती है, और कोयल की कूक तथा भौंरों की गुनगुनाहट सुनकर अपने हाथों से कान ढँक लेती है। पद में इसका कारण नहीं कहा गया; संदर्भ से भाव यह निकलता है कि विरह में प्रकृति का यह सुंदर दृश्य और मधुर ध्वनि भी उसे सुख नहीं देते, यह उसकी पीड़ा की गहनता को दर्शाता है।
2 योग्यता-विस्तार
प्र. पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य में प्रयुक्त भाषा की पाँच विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर: (यह एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है, मार्गदर्शन के लिए) पठित तीनों पदों के आधार पर विद्यापति की भाषा (मैथिली) की पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. कोमलकांत पदावली, जैसे “कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि”।
2. मैथिली के क्रिया-रूप, जैसे “लए जाएत”, “बइसइ”, “गेल”, “भेल”।
3. तद्भव व देशज शब्दों की बहुलता, जैसे तिरपित, पिरित, बिदगध, जरनि।
4. लोक-बिंबों और उपमानों का प्रयोग, जैसे “चौदसि-चाँद-समान”।
5. संबोधन और आत्मकथन शैली, जैसे “माधब, सुन-सुन बचन हमारा”।
प्र. विद्यापति के गीतों का आडियो रिकार्ड बाज़ार में उपलब्ध है, उसको सुनिए।
उत्तर: (यह एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी स्वयं विद्यापति की पदावली के उपलब्ध आडियो/संगीत रिकार्ड सुनें और अपने अध्यापक को अपना अनुभव बताएँ। मार्गदर्शन के लिए) पदावली मूलतः गेय रचना है, इसे सुनने से इसकी लय, संगीतात्मकता और भणिता-पंक्तियों का प्रभाव पढ़ने से कहीं अधिक स्पष्ट होता है।
प्र. विद्यापति और जायसी प्रेम के कवि हैं। दोनों की तुलना कीजिए।
उत्तर: विद्यापति और मलिक मुहम्मद जायसी, दोनों प्रेम के कवि हैं, पर दोनों की परंपरा और भाषा अलग-अलग हैं। इस पाठ के अनुसार विद्यापति ने “राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों का चित्रण” किया; इस अध्याय के तीनों पद मैथिली में हैं। वे आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि कहे जा सकते हैं और मिथिला नरेश राजा शिवसिंह के राजकवि थे। जायसी के बारे में यह पाठ कुछ नहीं बताता; इसी पुस्तक के अध्याय 7 (“बारहमासा”) के कवि-परिचय के अनुसार जायसी “सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं”, उनकी “भाषा ठेठ अवधी है”, और उनके प्रबंधकाव्य पद्मावत में राजकुमारी पद्मावती और राजा रत्नसेन के प्रेम की कथा है, जिसमें “लौकिक कथा का वर्णन इस प्रकार किया है कि अलौकिक और परोक्ष सत्ता का आभास होने लगता है”। दोनों में विरह का मार्मिक चित्रण है: विद्यापति के पद (1) और (3) की विरहिणी नायिका और जायसी के “बारहमासा” में नागमती का विरह। इस तरह दोनों प्रेम और विरह के चित्रण में समान हैं, पर विद्यापति पदावली के गीत-पदों में और जायसी प्रबंधकाव्य (दोहा-चौपाई शैली) में लिखते हैं, और दोनों की भाषा (मैथिली और अवधी) भिन्न है।