- घनानंद कौन थे, उनका मुहम्मद शाह के दरबार से क्या संबंध था और वे वृंदावन क्यों गए
- “रीतिमुक्त काव्यधारा” का मतलब और घनानंद इसके प्रतिनिधि कवि क्यों माने जाते हैं
- दोनों कवित्तों का पूरा पाठ, कठिन शब्दों का अर्थ और सरल भावार्थ
- दोनों कवित्तों में छिपे अलंकारों को पहचानना और उदाहरण सहित समझाना
- घनानंद की भाषा-शैली और काव्य-सौंदर्य की मुख्य विशेषताएँ बताना
1 घनानंद का जीवन परिचय
पाठ घनानंद को “मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि” कहता है। वे रीतिकाल (लगभग 17वीं-18वीं शताब्दी की हिंदी कविता का दौर) के कवि थे, पर उस दौर के ज़्यादातर कवियों से अलग, वे अलंकार-शास्त्र के बने-बनाए नियमों में बंधकर नहीं लिखते थे। इसीलिए उन्हें उस धारा का कवि कहा जाता है जिसे किताब खुद “रीतिमुक्त” या “स्वच्छंद” काव्यधारा कहती है, और घनानंद को इस धारा का प्रतिनिधि कवि (यानी इस काव्यधारा का मुख्य नाम) मानती है।
रीतिमुक्त (स्वच्छंद) काव्यधारा रीतिकाल की वह काव्य-परंपरा है जिसके कवि अलंकार-शास्त्र के बंधे हुए नियमों को मानने के बजाय अपने मन के सच्चे भाव को सीधे, अपनी शैली में व्यक्त करते हैं। घनानंद इसी धारा के प्रतिनिधि कवि हैं।

घनानंद का जीवनकाल सन् 1673 से 1760 तक माना जाता है। पाठ यह नहीं बताता कि वृंदावन जाने का कारण कौन-सी घटना थी; वह इतना कहता है कि बादशाह ने उन्हें दरबार से निकाल दिया, साथ ही सुजान की बेवफ़ाई ने भी उन्हें निराश और दुखी किया, और फिर वे वृंदावन चले गए। ये दो अलग-अलग घटनाएँ हैं, इन्हें एक न समझें।
2 काव्यगत विशेषताएँ
2.1 भाव-पक्ष: वियोग और पीड़ा के कवि
घनानंद मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं। संयोग (मिलन) से ज़्यादा उनका मन वियोग वर्णन में रमा है, यानी प्रेमी-प्रेमिका के बिछड़ने के दुख को लिखने में। उनकी रचनाओं में प्रेम का जो रूप व्यक्त हुआ है वह अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय (भावनाओं से भरा) और व्याकुल कर देने वाला है। इसीलिए किताब घनानंद को “साक्षात रसमूर्ति” कहती है, यानी वे स्वयं मानो रस (काव्य में भाव का आनंद) की साक्षात मूर्ति हैं।
वियोग वर्णन (विप्रलंभ शृंगार) श्रृंगार रस का वह भेद है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका के बिछड़ जाने पर होने वाली विरह-वेदना (बिछड़ने का दुख) का वर्णन किया जाता है। पाठ के अनुसार “वियोग वर्णन में उनका मन अधिक रमा है”। कवित्त (1) में यही विरह-भाव प्रमुख है; कवित्त (2) में यह विरह हठ और चुनौती का रूप ले लेता है।
2.2 कला-पक्ष: भाषा और शिल्प
घनानंद के काव्य में भाव जितना गहरा है, कला उतनी ही बारीक है। उनकी कविता में तीन चीज़ें साथ-साथ मिलती हैं: लाक्षणिकता (लक्षणा शब्द-शक्ति का कुशल प्रयोग), वक्रोक्ति (बात कहने का घुमावदार, चतुर ढंग) और वाग्विदग्धता (वाणी की चतुराई)। इसके साथ अलंकारों का कुशल प्रयोग भी मिलता है। उनकी काव्य-कला में एक अनोखी बात यह है कि सहजता (सरलता) और वचन-वक्रता (कहने की चतुर घुमावदार शैली) का अद्भुत मेल है, यानी बात सीधी भी लगती है और चतुराई-भरी भी।
घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है। इसमें कोमलता और मधुरता (मिठास) का चरम विकास दिखाई देता है। वे भाषा की व्यंजकता (संकेत करके गहरा अर्थ बताने की क्षमता) बढ़ाने में बहुत कुशल थे। किताब यह भी कहती है कि घनानंद केवल ब्रजभाषा के प्रवीण (दक्ष) कवि ही नहीं थे, बल्कि सर्जनात्मक (नई रचना करने वाली) काव्यभाषा के प्रणेता (जनक) भी थे।
“घनानंद की रचनाओं की भाषिक विशेषताओं को अपने शब्दों में लिखिए” पाठ के प्रश्न-अभ्यास (प्रश्न 4) में है। पाठ में भाषा के लिए ये शब्द आए हैं: परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा, कोमलता और मधुरता, व्यंजकता, सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता।
“सुजान सागर, विरह लीला” (याद रखने की तरकीब, नाम यही हैं)
पाठ के अनुसार घनानंद की रचनाओं में सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध, रसकेलि वल्ली आदि प्रमुख हैं। पहले दो नाम (“सुजान सागर”, “विरह लीला”) मिलकर एक याद रखने लायक वाक्य बनाते हैं, बाकी दो नाम (“कृपाकंड निबंध”, “रसकेलि वल्ली”) को इसी क्रम में जोड़ लें।
3 कवित्त (1): मूल पाठ, शब्दार्थ और भावार्थ
सुजान के दर्शन की अभिलाषा। पाठ का परिचय कहता है: “कवित्त में कवि ने अपनी प्रेमिका सुजान के दर्शन की अभिलाषा प्रकट करते हुए कहा है कि सुजान के दर्शन के लिए ही ये प्राण अब तक अटके हुए हैं।”
बहुत दिनान को अवधि आसपास परे,
खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को।
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को।।
झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,
अब ना घिरत घन आनंद निदान को।
अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,
चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।।
घनानंद, कवित्त (1)
कवि के प्राण बहुत दिनों से मिलन की तय अवधि के आसपास व्याकुल होकर देह छोड़ जाने को तैयार बैठे हैं। बार-बार यह कहकर कि “वह सुंदर, मन को भाने वाली सुजान आने ही वाली है”, इन प्राणों को पकड़-पकड़कर, सम्मान दे-देकर रोका जाता रहा है। पर अब झूठी बातों पर बार-बार विश्वास करते-करते ये प्राण उदास हो चुके हैं, और अब ऐसा कोई सुख का बादल (यहाँ “घन आनंद” में दोहरा अर्थ है, बादल का सुख और कवि का अपना नाम) इस पीड़ा का अंत करने नहीं आता। होंठों तक मानो प्राणों की अंतिम यात्रा की घड़ी आ पहुँची है, फिर भी ये जाते हुए प्राण चाहते हैं कि सुजान तक एक अंतिम संदेसा पहुँचाकर ही जाएँ।
3.1 कवित्त (1) का काव्य-सौंदर्य
- प्राणों के जाने और सुजान को संदेसा भेजने की कल्पना में विरह की पराकाष्ठा (सबसे ऊँचा स्तर) दिखाई गई है
- “घन आनंद” शब्द में श्लेष अलंकार है, बादल और कवि के अपने नाम का एक साथ बोध होता है
- “कहि कहि”, “गहि गहि”, “दै दै” में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है, एक ही शब्द की बार-बार आवृत्ति से बात पर ज़ोर पड़ता है
- भाषा परिष्कृत ब्रजभाषा है, भाव अत्यंत गंभीर और आवेगमय
4 कवित्त (2): मूल पाठ, शब्दार्थ और भावार्थ
आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं?
कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै?
मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू,
कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।
जान घनआनंद यों मोहिं तुम्हैं पैज परी,
जानियैगो टेक टरें कौन धौ मलोलिहै।।
रुई दिए रहौगे कहाँ लौ बहरायबे की?
कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै।
घनानंद, कवित्त (2)
कवि सुजान से पूछता है कि वह कब तक टालमटोल करके अपनी आरसी (अँगूठे की मुद्रिका में जड़ा शीशा) ही निहारती रहेगी। मेरी चकित (हैरान, व्याकुल) दशा देखकर भी उसकी दृष्टि उस ओर क्यों नहीं मुड़ती। कवि कहता है कि वह चुपचाप देखता रहेगा कि सुजान कितने दिन यह मौन और उपेक्षा का हठ निभाती है, पर एक दिन पुकार से भरी उसकी यह चुप्पी खुद-ब-खुद बोल उठेगी। हे सुजान, जान लो कि घनानंद से तुम्हारी यह पैज (बहस) ठन गई है; अब जाना जाएगा कि टेक (हठ) टलने पर कौन “मलोलिहै” (यह शब्द पाठ की शब्दार्थ-सूची में नहीं है)। कवि पूछता है कि वह कब तक कानों में रुई डालकर बहरी बनी रहेगी; कभी तो मेरी (कवि की) ही पुकार सुजान के कान खोल देगी (“कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै”)।
4.1 कवित्त (2) का काव्य-सौंदर्य
- “कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै” में विरोधाभास अलंकार है, चुप्पी में पुकार भरी होना और उसका स्वयं बोल उठना, दो विपरीत भावों का अनोखा मेल
- पहले कवित्त की व्याकुलता यहाँ हठ और चुनौती (पैज) के भाव में बदल जाती है; इसे इस तरह भी पढ़ा जा सकता है कि विरह की पीड़ा अब मान (नाराज़गी जताने) का रूप ले लेती है
- “आनाकानी आरसी”, “पन पालिहौ”, “टेक टरें” में अनुप्रास अलंकार है, आस-पास के शब्दों में एक जैसे व्यंजन-वर्णों की आवृत्ति
5 दोनों कवित्तों की तुलना
कवित्त (1)
- प्राण जाने की घड़ी, मृत्यु के निकट का भाव
- स्वर व्याकुलता का है
- अंत में एक अंतिम संदेसा भेजने की चाह
कवित्त (2)
- सुजान की उपेक्षा को सीधी चुनौती
- स्वर हठ और दृढ़ता (पैज) का है
- अंत में विश्वास कि पुकार कभी तो सुनी जाएगी
6 अलंकार-विवेचन
| अलंकार | अर्थ | इस अध्याय की पंक्ति |
|---|---|---|
| श्लेष | एक ही शब्द के एक साथ दो अर्थ निकलना | “घन आनंद” (बादल का सुख + कवि का नाम) |
| विरोधाभास | ऊपर से विरोधी दिखने वाली दो बातों का सच में मेल होना | “कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै” |
| पुनरुक्तिप्रकाश | एक ही शब्द की सार्थक आवृत्ति, जिससे भाव पर ज़ोर पड़े | “कहि कहि”, “गहि गहि”, “दै दै” |
| अनुप्रास | आस-पास के शब्दों में एक जैसे व्यंजन-वर्णों की आवृत्ति | “आनाकानी आरसी”, “पन पालिहौ”, “टेक टरें” |
“घन आनंद” में दो अर्थ छिपे हैं: बादल का सुख और कवि का नाम, इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है; इसे केवल कवि का नाम न समझें। जब भी “घन आनंद निदान को” जैसी पंक्ति में अलंकार पूछा जाए, दोनों अर्थ लिखें।
अलंकार-पहचान का प्रश्न पाठ के प्रश्न-अभ्यास (प्रश्न 5) में है। उत्तर में पहले अलंकार का नाम, फिर परिभाषा, फिर पाठ की पंक्ति लिखें।
योग्यता-विस्तार (पाठ्यपुस्तक): (1) तुलसीदास, रसखान, पद्माकर, सेनापति के तीन-तीन कवित्त एकत्रित कर याद कीजिए; (2) पठित अंश में से अनुप्रास अलंकार की पहचान कर एक सूची तैयार कीजिए। ऊपर की अलंकार-तालिका के अनुप्रास उदाहरण सूची की शुरुआत हैं।
- घनानंद (सन् 1673-1760) रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं
- वे मुहम्मद शाह के दरबार में मीर मुंशी थे, सुजान के प्रेम में बे-अदबी के कारण दरबार से निकाले गए
- साथ ही सुजान की बेवफ़ाई ने भी उन्हें निराश और दुखी किया; वे वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित हुए
- फिर भी सुजान को नहीं भुला पाए, अपनी रचनाओं में उसके नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते रहे
- वे मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं, वियोग वर्णन में उनका मन अधिक रमा है; रचनाओं में प्रेम का गंभीर, निर्मल, आवेगमय रूप व्यक्त हुआ है, इसीलिए उन्हें “साक्षात रसमूर्ति” कहा गया
- भाषा परिष्कृत साहित्यिक ब्रजभाषा है, कोमलता-मधुरता और व्यंजकता इसकी पहचान है
- प्रमुख रचनाएँ: सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध, रसकेलि वल्ली आदि
- केंद्रीय भाव (पाठ के अनुसार): सुजान के दर्शन की अभिलाषा; सुजान के दर्शन के लिए ही प्राण अब तक अटके हुए हैं
- कवित्त (1) में प्राण-त्याग की घड़ी में सुजान को अंतिम संदेसा भेजने की चाह है
- कवित्त (2) में सुजान की उपेक्षा को चुनौती देते हुए हठ (पैज) का भाव है
- मुख्य अलंकार: श्लेष (घन आनंद), विरोधाभास (मूकता बुलाय बोलिहै), पुनरुक्तिप्रकाश, अनुप्रास
- क्या मैं घनानंद के जीवन की पूरी कहानी क्रम से (दरबार → निष्कासन → वृंदावन → दीक्षा) बिना देखे बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मुझे दोनों कवित्तों के छह शब्दार्थ (किताब की अपनी सूची वाले) याद हैं?
- क्या मैं दोनों कवित्तों का भावार्थ अपने शब्दों में लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं “घन आनंद” में छिपा श्लेष अलंकार बिना भूले बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मुझे पाठ में नामित घनानंद की चारों रचनाओं के नाम क्रम से याद हैं?