NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 9 कवित्त (घनानंद) की प्रश्न-अभ्यास (7 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (2 प्रश्न) के सभी प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. कवि ने ‘चाहत चलन ये संदेसो ले सुजान को’ क्यों कहा है?
उत्तर: यह पंक्ति कवित्त (1) के अंत में आती है। कवि के प्राण बहुत दिनों से विरह में व्याकुल होकर अब देह छोड़ने, यानी प्रस्थान करने को तैयार हैं। इतना होने पर भी कवि चाहता है कि जाते-जाते उसके प्राण सुजान तक एक अंतिम संदेसा पहुँचा दें। इसीलिए कवि कहता है कि ये जाते हुए प्राण भी सुजान को एक संदेसा ले जाना चाहते हैं।
प्र. कवि मौन होकर प्रेमिका के कौन से प्रण पालन को देखना चाहता है?
उत्तर: कवित्त (2) में कवि कहता है, ‘मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू’। कवि चुपचाप यह देखना चाहता है कि सुजान अपनी उपेक्षा और मौन धारण करने के हठ (प्रण) को कब तक निभाती है, यानी वह कब तक कवि की पुकार अनसुनी करके अपनी उदासीनता और टालमटोल का व्रत बनाए रखती है।
प्र. कवि ने किस प्रकार की पुकार से ‘कान खोलि है’ की बात कही है?
उत्तर: कवि ने अपनी ही पुकार से ‘कान खोलि है’ की बात कही है: “कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै”, अर्थात कभी तो मेरी (कवि की) ही पुकार सुजान के कान खोलेगी। सुजान कानों में रुई डाले बहरी बनी है (“रुई दिए रहौगे कहाँ लौ बहरायबे की?”), पर कवि को आशा है कि उसकी पुकार कभी तो सुनी जाएगी। इसी कवित्त में कवि अपनी ‘कूकभरी’ (पुकार भरी) मूकता की बात भी करता है; इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि यह पुकार कवि की चुप्पी में भरी वेदना की पुकार है।
प्र. घनानंद की रचनाओं की भाषिक विशेषताओं को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है। वे भाषा की व्यंजकता (संकेत करके गहरा अर्थ बताने की क्षमता) बढ़ाने में अत्यंत कुशल थे। घनानंद केवल ब्रजभाषा के प्रवीण कवि ही नहीं थे, बल्कि सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता भी थे। उनकी कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्ति और वाग्विदग्धता के साथ अलंकारों का कुशल प्रयोग मिलता है, और उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल है।
प्र. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कीजिए।
(क) कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दैं दैं सनमान को।
(ख) कूक भरी मूकता बुलाय आप बोलि है।
(ग) अब न घिरत घन आनंद निदान को।
उत्तर (क): इसमें पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है, ‘कहि कहि’, ‘गहि गहि’ और ‘दैं दैं’ शब्दों की सार्थक आवृत्ति से भाव पर ज़ोर पड़ता है।
उत्तर (ख): इसमें विरोधाभास अलंकार है, ‘मूकता’ (चुप्पी) और ‘पुकार भरी होना’ दो विपरीत भाव हैं, फिर भी दोनों एक साथ सच हैं।
उत्तर (ग): इसमें श्लेष अलंकार है, ‘घन आनंद’ के दो अर्थ एक साथ निकलते हैं, बादल का सुख और कवि का अपना नाम।
प्र. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए,
(क) बहुत दिनान को अवधि आसपास परे / खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को
(ख) मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू / कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।
उत्तर (क): इसका आशय है कि कवि के प्राण बहुत दिनों से मिलन की तय अवधि के आसपास व्याकुल होकर देह छोड़ जाने को तैयार बैठे हैं, यानी विरह की पीड़ा इतनी असहनीय हो चुकी है कि प्राण अब प्राण-त्याग की कगार पर पहुँच चुके हैं।
उत्तर (ख): इसका आशय है कि कवि चुपचाप यह देखना चाहता है कि सुजान कितने दिन अपना प्रण (पन), यानी मौन और उपेक्षा का हठ, निभाती है। “कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै”: कवि कहता है कि पुकार से भरी मूकता (चुप्पी) बुलाकर आप ही बोल उठेगी। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि कवि की वेदना चुप रहकर भी अंततः मुखर हो उठेगी और सुजान तक पहुँचेगी।
प्र. संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए,
(क) झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास है, कै —— चाहत चलन ये संदेसो लै सुजान को।
(ख) जान घनआनंद यों मोहि तुम्है पैज परी —— कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलि है।
उत्तर (क): यह पंक्ति घनानंद के कवित्त (1) के अंत की है। कवि कहता है कि झूठी बातों पर बार-बार विश्वास करते-करते उसके प्राण उदास हो चुके हैं, और अब ऐसा कोई सुख का बादल (यहाँ ‘घन आनंद’ में श्लेष है, बादल का सुख और कवि का अपना नाम, दोनों अर्थ) इस पीड़ा का अंत करने के लिए नहीं घिरता। होंठों तक मानो प्राणों की अंतिम यात्रा की घड़ी आ पहुँची है, फिर भी ये जाते हुए प्राण चाहते हैं कि सुजान तक एक अंतिम संदेसा पहुँचाकर ही जाएँ। यह पंक्ति विरह की चरम व्याकुलता और अंत तक बना रहने वाला प्रेम दोनों को एक साथ व्यक्त करती है।
उत्तर (ख): यह पंक्ति घनानंद के कवित्त (2) के अंत की है। कवि सुजान से कहता है कि जान लो कि घनानंद से तुम्हारी यह पैज (बहस) ठन गई है; अब जाना जाएगा कि टेक (हठ) टलने पर कौन “मलोलिहै” (यह शब्द पाठ की शब्दार्थ-सूची में नहीं है)। कवि आगे पूछता है कि सुजान कब तक कानों में रुई डालकर बहरी बनी रहेगी (“रुई दिए रहौगे कहाँ लौ बहरायबे की?”); कभी तो मेरी (कवि की) ही पुकार सुजान के कान खोलेगी (“कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै”)। यह पंक्ति कवित्त (1) की व्याकुलता से हटकर हठ और आत्मविश्वास भरी चुनौती का भाव दिखाती है।
2 योग्यता-विस्तार
प्र. निम्नलिखित कवियों के तीन-तीन कवित्त एकत्रित कर याद कीजिए, तुलसीदास, रसखान, पद्माकर, सेनापति।
उत्तर: (यह एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी पुस्तकालय या इंटरनेट से इन चारों कवियों के कवित्त एकत्रित करके स्वयं याद करें और अध्यापक को दिखाएँ।) मार्गदर्शन के लिए, तुलसीदास राम-भक्ति और रसखान कृष्ण-भक्ति परंपरा के कवि हैं, पद्माकर और सेनापति रीतिकाल के कवि माने जाते हैं। इन सभी के कवित्त एकत्रित करते समय ध्यान दें कि हर कवि की भाषा, छंद-विधान और भाव-शैली घनानंद से किस प्रकार मिलती-जुलती या अलग है।
प्र. पठित अंश में से अनुप्रास अलंकार की पहचान कर एक सूची तैयार कीजिए।
उत्तर: पठित दोनों कवित्तों में अनुप्रास अलंकार के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, ‘घिरत घन’ और ‘पयान प्रान’ (कवित्त 1), ‘आनाकानी आरसी’, ‘पन पालिहौ’, ‘मौन … मूकता’ और ‘टेक टरें’ (कवित्त 2)। विद्यार्थी पूरे पाठ को ध्यान से पढ़कर, आस-पास के शब्दों में एक जैसे व्यंजन-वर्णों की आवृत्ति ढूँढ़कर अपनी सूची में जोड़ें।