इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. घनानंद का जीवनकाल क्या माना जाता है?
उत्तर: घनानंद का जीवनकाल सन् 1673 से 1760 तक माना जाता है।
प्र. घनानंद दिल्ली के किस बादशाह के दरबार में मीर मुंशी थे?
उत्तर: घनानंद दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के दरबार में मीर मुंशी थे।
प्र. घनानंद किस काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं?
उत्तर: घनानंद रीतिकाल की रीतिमुक्त (स्वच्छंद) काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।
प्र. घनानंद को किस विशेषण से पुकारा गया है और क्यों?
उत्तर: घनानंद को ‘साक्षात रसमूर्ति’ कहा गया है, क्योंकि उनकी रचनाओं में प्रेम का अत्यंत गंभीर, निर्मल और आवेगमय रूप व्यक्त हुआ है।
प्र. वृंदावन जाकर घनानंद किस संप्रदाय में दीक्षित हुए?
उत्तर: वृंदावन जाकर घनानंद निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित हुए।
प्र. प्रस्तुत पाठ में कवि घनानंद के कितने कवित्त दिए गए हैं?
उत्तर: प्रस्तुत पाठ में कवि घनानंद के दो कवित्त दिए गए हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. घनानंद को बादशाह के दरबार से क्यों निकाला गया?
उत्तर: सुजान नाम की स्त्री के प्रेम के कारण घनानंद बादशाह के दरबार में बे-अदबी कर बैठे, जिससे नाराज़ होकर बादशाह मुहम्मद शाह ने उन्हें दरबार से निकाल दिया।
प्र. पाठ के अनुसार वृंदावन जाने से पहले घनानंद के जीवन में कौन-सी दो दुखद घटनाएँ हुईं?
उत्तर: पाठ के अनुसार दो घटनाएँ हुईं: बादशाह द्वारा दरबार से निकाला जाना, और सुजान की बेवफ़ाई से निराश और दुखी होना। इसके बाद वे वृंदावन चले गए। पाठ इन्हें वृंदावन जाने का कारण स्पष्ट रूप से नहीं बताता।
प्र. ‘रीतिमुक्त (स्वच्छंद) काव्यधारा’ किसे कहते हैं?
उत्तर: रीतिमुक्त काव्यधारा रीतिकाल की वह परंपरा है जिसके कवि अलंकार-शास्त्र के बंधे हुए नियमों को मानने के बजाय अपने मन के सच्चे भाव को सीधे, अपनी शैली में व्यक्त करते हैं। घनानंद इसी धारा के प्रतिनिधि कवि हैं।
प्र. ‘वियोग वर्णन (विप्रलंभ शृंगार)’ की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: वियोग वर्णन शृंगार रस का वह भेद है जिसमें प्रेमी-प्रेमिका के बिछड़ जाने पर होने वाली विरह-वेदना का वर्णन किया जाता है। पाठ के कवित्त (1) में यही विरह-भाव मुख्य है, जबकि कवित्त (2) में विरह हठ और चुनौती (पैज) के रूप में आता है।
प्र. घनानंद की भाषा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है, और वे भाषा की व्यंजकता बढ़ाने में अत्यंत कुशल थे।
प्र. कवित्त (1) में कवि के प्राण किस दशा में दिखाए गए हैं?
उत्तर: कवित्त (1) में कवि के प्राण बहुत दिनों से मिलन की अवधि के आसपास व्याकुल होकर देह छोड़ जाने को तैयार हैं, फिर भी वे जाते-जाते सुजान तक एक अंतिम संदेसा पहुँचाना चाहते हैं।
प्र. ‘घन आनंद’ शब्द में कौन-सा अलंकार है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: ‘घन आनंद’ शब्द में श्लेष अलंकार है, क्योंकि इस एक ही शब्द के दो अर्थ एक साथ निकलते हैं, बादल का सुख, और कवि का अपना नाम घनआनंद।
प्र. कवित्त (2) में कवि ‘आरसी’ का उल्लेख किस संदर्भ में करता है?
उत्तर: कवि सुजान से पूछता है कि वह कब तक टालमटोल करके अपनी आरसी (अँगूठे की मुद्रिका में जड़ा शीशा) ही निहारती रहेगी, और कवि की व्याकुल दशा की ओर ध्यान नहीं देगी।
प्र. ‘कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै’ पंक्ति में कौन-सा अलंकार है और क्यों?
उत्तर: इसमें विरोधाभास अलंकार है, क्योंकि ‘मूकता’ (चुप्पी) और ‘पुकार’ (बोलना) दो विपरीत भाव हैं, फिर भी कवि कहता है कि यह पुकार से भरी चुप्पी खुद-ब-खुद बोल उठेगी, जो सुनने में विरोधाभासी लगकर भी सच है।
प्र. घनानंद अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का उपयोग किस प्रकार करते रहे?
उत्तर: दरबार से निकाले जाने और वृंदावन जाकर भक्त बन जाने के बाद भी घनानंद सुजान को भूल नहीं पाए, वे अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का प्रतीकात्मक (सांकेतिक) प्रयोग करते हुए काव्य-रचना करते रहे।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. घनानंद का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
उत्तर: घनानंद (सन् 1673-1760) रीतिकाल के रीतिमुक्त या स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि थे और दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे। कहा जाता है कि सुजान नाम की एक स्त्री से उनका अटूट प्रेम था। उसी के प्रेम के कारण वे बादशाह के दरबार में बे-अदबी कर बैठे, जिससे नाराज़ होकर बादशाह ने उन्हें दरबार से निकाल दिया। साथ ही सुजान की बेवफ़ाई ने भी उन्हें निराश और दुखी किया। वे वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित होकर भक्त के रूप में जीवन-निर्वाह करने लगे, पर सुजान को भूल नहीं पाए और अपनी रचनाओं में उसके नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हुए काव्य-रचना करते रहे।
प्र. घनानंद की काव्यगत विशेषताओं (भाव-पक्ष) पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: घनानंद मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं। संयोग से अधिक उनका मन वियोग वर्णन (विप्रलंभ शृंगार) में रमा है। उनकी रचनाओं में प्रेम का अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय और व्याकुल कर देने वाला उदात्त रूप व्यक्त हुआ है, इसीलिए उन्हें साक्षात रसमूर्ति कहा गया है।
प्र. घनानंद की भाषा-शैली (कला-पक्ष) पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: घनानंद की कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्ति और वाग्विदग्धता के साथ अलंकारों का कुशल प्रयोग मिलता है। उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल है। उनकी भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है। वे भाषा की व्यंजकता बढ़ाने में अत्यंत कुशल थे और केवल ब्रजभाषा-प्रवीण ही नहीं, सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता भी थे।
प्र. कवित्त (1) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: कवित्त (1) में कवि के प्राण बहुत दिनों से मिलन की अवधि के आसपास व्याकुल होकर देह छोड़ जाने को तैयार बैठे हैं। बार-बार सुजान के आने की झूठी बात कहकर उन्हें रोका जाता रहा, पर अब वे इन झूठी बातों पर विश्वास करते-करते उदास हो चुके हैं और कोई सुख का बादल इस पीड़ा का अंत करने नहीं आता। प्राणों की अंतिम यात्रा की घड़ी आ पहुँची है, फिर भी वे सुजान तक एक अंतिम संदेसा पहुँचाकर ही जाना चाहते हैं।
प्र. कवित्त (2) का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: कवित्त (2) में कवि सुजान से पूछता है कि वह कब तक टालमटोल करके अपनी आरसी ही निहारती रहेगी और कवि की चकित दशा की ओर उसकी दृष्टि क्यों नहीं मुड़ती। कवि कहता है कि वह चुपचाप देखेगा कि सुजान कितना प्रण (पन) निभाती है; पुकार से भरी मूकता बुलाकर आप ही बोल उठेगी। कवि कहता है कि घनानंद और सुजान के बीच पैज (बहस) ठन गई है, अब देखा जाएगा कि टेक टलने पर कौन “मलोलिहै”। अंत में वह पूछता है कि सुजान कब तक कानों में रुई डालकर बहरी बनी रहेगी; कभी तो मेरी (कवि की) ही पुकार सुजान के कान खोलेगी।
प्र. दोनों कवित्तों के भाव में क्या अंतर है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कवित्त (1) में विरह अपनी अंतिम घड़ी तक पहुँच चुका है, स्वर व्याकुलता का है, और अंत में सुजान को एक अंतिम संदेसा भेजने की चाह है। कवित्त (2) में स्वर हठ और चुनौती (पैज) का है; कवि सुजान की उपेक्षा को सीधी चुनौती देता है और आशा करता है कि कभी तो उसकी पुकार सुनी जाएगी (“कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै”)। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि पहला कवित्त निराशा की पराकाष्ठा दिखाता है, तो दूसरा दृढ़ता भरी आशा।
प्र. संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए, ‘झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै, अब ना घिरत घन आनंद निदान को।’
उत्तर: यह पंक्ति घनानंद के कवित्त (1) से ली गई है। कवि कहता है कि झूठी बातों पर बार-बार विश्वास करते-करते उसके प्राण उदास हो चुके हैं, और अब ऐसा कोई सुख का बादल इस पीड़ा का अंत करने के लिए नहीं घिरता। यहाँ ‘घन आनंद’ में श्लेष अलंकार है, इसका अर्थ बादल का सुख भी है और कवि का अपना नाम भी।
प्र. संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए, ‘जान घनआनंद यों मोहिं तुम्हैं पैज परी, जानियैगो टेक टरें कौन धौ मलोलिहै।’
उत्तर: यह पंक्ति घनानंद के कवित्त (2) से ली गई है। कवि सुजान से कहता है कि जान लो कि घनानंद से तुम्हारी यह पैज (बहस) ठन गई है; अब जाना जाएगा कि टेक (हठ) टलने पर कौन “मलोलिहै” (यह शब्द पाठ की शब्दार्थ-सूची में नहीं है)। यह पंक्ति कवित्त (1) की व्याकुलता से हटकर हठ और चुनौती का भाव दिखाती है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. घनानंद के जीवन और उनकी कविता में विरह-भाव के संबंध पर विस्तार से टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: 1. कहा जाता है कि घनानंद सुजान नाम की स्त्री से अटूट प्रेम करते थे; उसी के प्रेम के कारण वे दरबार में बे-अदबी कर बैठे और बादशाह ने उन्हें निकाल दिया।
2. साथ ही सुजान की बेवफ़ाई ने भी उन्हें निराश और दुखी किया।
3. वे वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित होकर भक्त के रूप में जीवन-निर्वाह करने लगे, पर सुजान को भूल नहीं पाए और अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते रहे।
4. पाठ के अनुसार घनानंद मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं और वियोग वर्णन में उनका मन अधिक रमा है। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि जीवन की यह विरह-पीड़ा उनकी कविता का मूल स्वर बनी (पाठ यह संबंध स्वयं नहीं बताता)।
5. कवित्त (1) में विरह प्राण-त्याग की घड़ी तक पहुँचता दिखता है, तो कवित्त (2) में यही विरह हठ और चुनौती का रूप ले लेता है।
6. उनकी रचनाओं में प्रेम का अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय और व्याकुल कर देने वाला उदात्त रूप व्यक्त हुआ है, इसीलिए घनानंद को साक्षात रसमूर्ति कहा गया है।
प्र. घनानंद की भाषा, अलंकार और काव्य-सौंदर्य की विशेषताओं पर विस्तृत टिप्पणी कीजिए, उदाहरण सहित।
उत्तर: 1. घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है, जिसमें कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है।
2. वे भाषा की व्यंजकता बढ़ाने में कुशल थे और केवल ब्रजभाषा-प्रवीण ही नहीं, सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता भी थे।
3. उनकी कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्ति और वाग्विदग्धता के साथ अलंकारों का कुशल प्रयोग मिलता है, सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल है।
4. श्लेष अलंकार का उदाहरण ‘घन आनंद’ शब्द में है, जिसके दो अर्थ हैं, बादल का सुख और कवि का नाम।
5. विरोधाभास अलंकार ‘कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै’ में है, चुप्पी में पुकार भरी होना और उसका स्वयं बोल उठना।
6. पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘कहि कहि’, ‘गहि गहि’, ‘दै दै’ जैसे शब्दों की सार्थक आवृत्ति में है, और अनुप्रास अलंकार ‘आनाकानी आरसी’, ‘पन पालिहौ’ जैसी पंक्तियों में है।
प्र. घनानंद के दोनों कवित्तों की तुलना उनके भाव, भाषा और अलंकार के आधार पर कीजिए।
उत्तर: 1. भाव की दृष्टि से कवित्त (1) में विरह अपनी अंतिम घड़ी तक पहुँच चुका है, प्राण देह छोड़ने को तैयार हैं, जबकि कवित्त (2) में विरह हठ और चुनौती (पैज) का रूप ले लेता है।
2. स्वर की दृष्टि से कवित्त (1) व्याकुलता और अंतिम संदेसा भेजने की चाह का है, कवित्त (2) दृढ़ता और इस आशा का है कि पुकार कभी तो सुनी जाएगी।
3. भाषा दोनों में परिष्कृत ब्रजभाषा है, पर कवित्त (2) में प्रश्नवाचक शैली अधिक है, जबकि कवित्त (1) कथनात्मक शैली में है।
4. अलंकार की दृष्टि से कवित्त (1) में श्लेष (घन आनंद) और पुनरुक्तिप्रकाश (कहि कहि, गहि गहि, दै दै) प्रमुख हैं, जबकि कवित्त (2) में विरोधाभास (कूकभरी मूकता बुलाय बोलिहै) और अनुप्रास (आनाकानी आरसी) प्रमुख हैं।
5. इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि दोनों कवित्त घनानंद के विरह-भाव के दो अलग-अलग पड़ाव दिखाते हैं, निराशा की पराकाष्ठा और हठ भरी आशा।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक घनानंद किस बादशाह के दरबार में मीर मुंशी थे?
उत्तर: घनानंद मुहम्मद शाह के दरबार में मीर मुंशी थे।
(ख) 1 अंक घनानंद वृंदावन जाकर किस संप्रदाय में दीक्षित हुए?
उत्तर: घनानंद निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित हुए।
(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि घनानंद को दरबार से क्यों निकाला गया?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार सुजान के प्रेम के कारण घनानंद बादशाह के दरबार में बे-अदबी कर बैठे, जिससे नाराज़ होकर बादशाह ने उन्हें दरबार से निकाल दिया।
(घ) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि वृंदावन जाकर भी घनानंद सुजान को भूल नहीं पाए, इसका गद्यांश में क्या प्रमाण मिलता है?
उत्तर: यद्यपि घनानंद वृंदावन जाकर निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित होकर भक्त के रूप में जीवन-निर्वाह करने लगे, फिर भी वे सुजान को भूल नहीं पाए। इसका प्रमाण गद्यांश का यह वाक्य है: वे “अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हुए काव्य-रचना करते रहे”।