NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 7 बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी) की प्रश्न-अभ्यास (6 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (2 प्रश्न) के सभी आठ प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 प्रश्न-अभ्यास
प्र. अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर: अगहन महीने में रातें बड़ी होने लगती हैं और दिन घटने लगते हैं, यह दुख विरहिणी नागमती के लिए सहना कठिन हो जाता है। दिन भी उसे रात जैसा लगने लगता है और वह दीपक की बाती की तरह विरह में जलती रहती है। हृदय काँपता है तो शीत प्रतीत होता है, और यह शीत तभी जाए जब प्रियतम साथ हो (‘तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ’)। घर-घर में सबने जाड़े के वस्त्र (चीर) तैयार कर लिए हैं, पर नागमती का रूप-रंग तो उसका पति (नाहू) अपने साथ ले गया और लौटा नहीं। ठंड की आग (सियरि अगिनि, एक विरोधाभास) ने उसके हृदय को जला दिया है, वह सुलग-सुलगकर राख हो चली है, पर प्रियतम को यह दहन मालूम ही नहीं। अंत में विरहिणी भँवरे और कौवे से अपना संदेश प्रियतम तक पहुँचाने को कहती है, कि वह विरह में जलकर मर चुकी है (‘सो धनि बिरहें जरि मुई’), और अब उसका धुआँ ही हमें लगा है।
प्र. ‘जीयत खाइ मुएँ नहि छाँड़ा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति पूस अंश की है, जहाँ जायसी विरह को एक बाज पक्षी (सचान) के रूप में चित्रित करते हैं। यह बाज इतना प्रचंड (चाँड़ा) है कि जीते-जी शरीर को खाता रहता है, और मरने पर भी उसे नहीं छोड़ता। इस रूपक के माध्यम से नागमती की विरह-दशा की भयावहता स्पष्ट होती है, विरह उसका पीछा जीवन में भी नहीं छोड़ता और मृत्यु के बाद भी उसका साथ बना रहता प्रतीत होता है। यह विरह की अंतहीन, निरंतर पीड़ा को दर्शाने वाला पूस अंश का एक प्रमुख बिंब है, जिसके ठीक बाद के दोहे में नागमती स्वयं को सारस पक्षी की तरह रट-रटकर मरता हुआ बताती है।
प्र. माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?
उत्तर: माघ महीने में अब पाला (कड़ाके की ठंड) पड़ने लगता है, और विरह काल बनकर जड़काला (मृत्यु) हो जाता है। शरीर को पहले-पहल रुई से ढकने पर भी नागमती का हृदय बुरी तरह काँपता है। वह अपने पति से आकर सूर्य बनकर तपने को कहती है, क्योंकि उसके बिना माघ में यह जाड़ा नहीं छूटता। पाठ के अनुसार इसी मास में रस का मूल (रसमूलू, शृंगार रस) उपजता है (‘एहि मास उपजै रस मूलू’), नागमती कहती है कि प्रियतम ही उसका भँवरा है और उसका यौवन फूल है, पर उसका अपना शृंगार छूट गया है: वह किसके लिए शृंगार करे, किसके लिए रेशमी वस्त्र (पटोरा) पहने; गले में हार नहीं रहा, बस डोरा रह गया है। उसके आँसू माघ की वर्षा (माँहुट) के जल जैसे बहते हैं, बूँदें ओलों की तरह टूटकर गिरती हैं, और विरह पवन बनकर झकझोरता है।
प्र. वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?
उत्तर: वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें फागुन महीने में गिरते हैं, जब तेज़ हवाओं के झोंकों से ठंड चौगुनी बढ़ जाती है और शाखाएँ अनपत्त (पत्ते रहित) हो जाती हैं (‘तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा’)। इसका विरहिणी नागमती से गहरा संबंध है, उसका शरीर भी इन्हीं पीले, झड़ते पत्तों की तरह पीला पड़ गया है, यानी प्रकृति की यह दशा नागमती की अपनी दुर्बल, क्षीण होती दशा का ही प्रतिबिंब बन जाती है। चारों ओर वनस्पति में उल्लास होते हुए भी, प्रकृति का यह पतझड़-रूप उसके भीतर के विषाद को और गहरा कर देता है।
प्र. निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए,
(क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।
(ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।
(ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उड़ावा झोल।।
(घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहँ पाउ।
उत्तर (क): यह अगहन अंश का दोहा है। विरहिणी नागमती भँवरे और कौवे से कहती है, मेरा यह संदेश मेरे प्रियतम तक पहुँचा देना कि वह स्त्री विरह में जलकर मर चुकी है, अब उसका धुआँ ही हमें लग रहा है। यहाँ भँवरे-काग को संदेशवाहक बनाया गया है, और ‘धुआँ लगना’ विरह की चरम पीड़ा को दर्शाता है।
उत्तर (ख): यह पूस अंश का दोहा है। नागमती कहती है कि विरह से उसका रक्त बहकर ढल गया है (ढरा), मांस गल गया है और हड्डियाँ शंख जैसी शेष रह गई हैं। वह सारस पक्षी की तरह रट-रटकर मर चुकी है, अब कोई आकर उसके पंख समेट ले। यह नागमती की चरम विरह-वेदना और मृत्यु-तुल्य दशा को व्यक्त करता है।
उत्तर (ग): यह माघ अंश का दोहा है। नागमती अपने प्रियतम से कहती है, तुम्हारे बिना यह शरीर तिनके जैसा हल्का हो गया है, और विरह की आग इसे जलाकर हवा में उड़ा देना चाहती है। यह उसकी दुर्बलता और असहनीय विरह-वेदना को एक साथ व्यक्त करता है।
उत्तर (घ): यह फागुन अंश का दोहा है। नागमती कहती है, इस शरीर को जलाकर राख कर दो और उसे हवा में उड़ा दो, ताकि वह राख उसी मार्ग में गिरे जहाँ मेरे प्रियतम के चरण पड़ें। यह नायिका के आत्म-समर्पण और प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
प्र. प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर: प्रथम दो छंदों (अगहन और पूस अंश) में ये प्रमुख अलंकार मिलते हैं। (1) उपमा: “जरै बिरह ज्यों दीपक बाती” में “ज्यों” वाचक शब्द के साथ विरह में जलती नायिका की तुलना दीपक की बाती से की गई है। (2) विरोधाभास: “सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा” में ठंड को आग कहा गया है, जो ऊपर से विपरीत लगता है पर अत्यधिक ठंड भी आग जैसी जलन देती है। (3) पुनरुक्तिप्रकाश: “अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई”, “सुलगि सुलगि दगधै” और “कँपि कँपि मरौं” में एक ही शब्द की आवृत्ति भाव पर बल देती है। (4) उत्प्रेक्षा: “जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी” में “जानहुँ” (मानो) से संभावना व्यक्त की गई है कि सेज मानो बर्फ़ में डूबी हो। (5) रूपक: “बिरह सचान भँवै तन चाँड़ा” में विरह को ही बाज पक्षी (सचान) कह दिया गया है। (6) अनुप्रास: “दूभर दुख”, “बिरह बाढ़ि” में वर्णों की आवृत्ति है। इसके अलावा पूस अंश में चकई से तुलना है: चकई रात में बिछुड़ती और दिन में मिलती है, पर नायिका रात-दिन विरह में “कोकिला” की तरह है। इन अलंकारों से काव्य-सौंदर्य में गहराई आती है, वे नायिका की पीड़ा को केवल बताते नहीं, बल्कि पाठक को उसकी तीव्रता का प्रत्यक्ष अनुभव कराते हैं।
2 योग्यता-विस्तार
प्र. किसी अन्य कवि द्वारा रचित विरह वर्णन की दो कविताएँ चुनकर लिखिए और अपने अध्यापक को दिखाइए।
उत्तर: (यह एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी स्वयं पुस्तकालय या इंटरनेट से खोजकर लिखें और अध्यापक को दिखाएँ। मार्गदर्शन के लिए) विरह-वर्णन की परंपरा में सूरदास के भ्रमरगीत के पद (गोपियों का उद्धव से कृष्ण-वियोग व्यक्त करना) और जायसी के ही समकालीन कवियों की रचनाएँ अच्छे उदाहरण हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त मीराबाई के कृष्ण-विरह के पद भी इस विषय पर उपयुक्त उदाहरण हैं। विद्यार्थी इन्हें पूरा पढ़कर, बारहमासा शैली से उनकी समानता (प्रकृति का उद्दीपन-रूप में प्रयोग) और अंतर (महीनों के क्रम का न होना) पर भी ध्यान दें।
प्र. ‘नागमती वियोग खंड’ पूरा पढ़िए और जायसी के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर: (यह भी एक क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी पूरा नागमती वियोग खंड पढ़कर स्वयं जानकारी एकत्र करें।) पाठ्यपुस्तक में दिया गया अंश नागमती वियोग खंड के केवल चार महीनों (अगहन, पूस, माघ, फागुन) तक सीमित है, जबकि मूल खंड में बारहों महीनों का वर्णन है। पूरा खंड पढ़ने पर विद्यार्थियों को पता चलेगा कि नागमती की विरह-वेदना शेष आठ महीनों (चैत, बैसाख, जेठ, आषाढ़, सावन, भादों, क्वार, कार्तिक) में किस प्रकार चित्रित की गई है, और जायसी की भाषा, अवधी शब्दावली तथा लोक-संस्कृति से जुड़े बिंबों की विविधता को और गहराई से समझा जा सकता है।