NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग III के अध्याय 10 ‘विद्रोही और राज’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्न, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, हर एक के आदर्श उत्तर के साथ: पाँच प्रश्न ‘उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)’, चार ‘लघु निबंध (लगभग 250 से 300 शब्दों में)’, एक मानचित्र कार्य और दो परियोजना कार्य (कोई एक)। इनके बाद अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए बारह प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 पुराने शासकों से नेतृत्व की माँग
प्र. बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया?
उत्तर: विद्रोही अक्सर नेतृत्व के लिए ब्रिटिश-पूर्व शासकों की ओर मुड़े, यद्यपि स्वीकृति शायद ही कभी उत्सुकता से मिली। दिल्ली में सिपाहियों ने बूढ़े मुग़ल बादशाह बहादुर शाह को, जो शुरू में भयभीत थे, विद्रोह का आशीर्वाद देने और नाममात्र नेतृत्व स्वीकार करने पर मजबूर किया। कानपुर में सिपाहियों और नगरवासियों ने पेशवा बाजी राव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को नेतृत्व के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा। झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई को आम जनता के दबाव में विद्रोह की बागडोर सँभालने पर मजबूर किया गया। अवध में, नवाब वाजिद अली शाह के हटाए जाने से आहत लोग उनके युवा पुत्र बिरजिस क़द्र के इर्द-गिर्द जुटे।
नेतृत्व केवल इन्हीं तक सीमित नहीं था: बिहार के आरा में ज़मींदार कुँवर सिंह ने कमान संभाली। इस प्रकार सिपाहियों ने बार-बार पुराने राजघरानों से अपनी वैधता उधार माँगी, क्योंकि इनका नाम विद्रोह को एक अकेली छावनी की अवज्ञा से कहीं आगे, एक व्यापक राजनीतिक वैधता देता था।
2 योजना और समन्वय के साक्ष्य
प्र. उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे।
उत्तर: छावनियों भर में विद्रोह के पैटर्न की समानता, संकेत (शाम की तोप या बिगुल), फिर शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा, ख़ज़ाना लूटना, सरकारी इमारतों पर हमला, यह एक ही निश्चित क्रम बार-बार दोहराया जाना, वास्तविक समन्वय की ओर इशारा करता है, स्वतःस्फूर्त अराजकता की ओर नहीं। सातवीं अवध इर्रेगुलर कैवलरी ने नए कारतूस अस्वीकार करने के बाद 48वीं नेटिव इन्फ़ैंट्री को लिखा कि उन्होंने “धर्म के लिए काम किया है” और 48वीं के आदेशों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो छावनियों के बीच सीधे पत्राचार का प्रमाण है।
हर रेजीमेंट से आए देशी अधिकारियों की पंचायतें कानपुर जैसे स्थानों पर रात-रात मिलकर सामूहिक कार्रवाई तय करतीं। सिस्टन और एक मुस्लिम तहसीलदार के बीच का संवाद (जिसमें तहसीलदार ने बाद में बिजनौर में विद्रोह का नेतृत्व किया) दिखाता है कि योजनाएँ अजनबियों के बीच सामान्य बातचीत से भी यात्रा करती थीं जो एक-दूसरे को सहानुभूति रखने वाला पहचान लेते थे, यह सब प्रमाणित करता है कि सिपाही अपने ही विद्रोह के सचेत निर्माता थे।
3 धार्मिक विश्वासों की भूमिका
प्र. 1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी?
उत्तर: धार्मिक भय और विश्वासों ने विद्रोह भड़काने में केंद्रीय भूमिका निभाई। एनफ़ील्ड राइफल के नए कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफ़वाह हिंदू और मुस्लिम दोनों धार्मिक प्रथाओं के लिए सीधा अपमान थी। एक और व्यापक अफ़वाह मानती थी कि बाज़ार के आटे में गाय-सुअर की हड्डी का चूरा मिलाया जा रहा है, हिंदू-मुस्लिम धर्म नष्ट कर ईसाई धर्मांतरण के लिए मजबूर करने की एक कथित ब्रिटिश साज़िश के भाग के रूप में। ये अफ़वाहें इसलिए फलीं-फूलीं क्योंकि वे दशकों के ब्रिटिश “सुधार” (सती-प्रतिबंध, विधवा-पुनर्विवाह, अंग्रेज़ी-माध्यम शिक्षा) और मिशनरी गतिविधि से बने वास्तविक डरों से मेल खाती थीं।
विद्रोही घोषणापत्र भी जान-बूझकर धार्मिक भाषा में लिखे गए: आज़मगढ़ घोषणा और सिपाही अर्ज़ी दोनों “अपने धर्म की रक्षा” की बात करती हैं और हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों को समान रूप से ख़तरे में बताती हैं। इस प्रकार धार्मिक विश्वास विद्रोह भड़काने, उसे व्यापक फैलाने और सांप्रदायिक एकता बनाए रखने, तीनों में निर्णायक कारक था।
4 विद्रोहियों के बीच एकता के तरीके
प्र. विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?
उत्तर: विद्रोही घोषणापत्र, यहाँ तक कि मुस्लिम राजकुमारों के नाम पर जारी किए गए भी, जान-बूझकर हिंदू भावना को भी संबोधित करते थे, एक साझा ब्रिटिश-पूर्व हिंदू-मुस्लिम मुग़ल-कालीन अतीत की अपील करते हुए। बहादुर शाह के नाम से जारी एक घोषणापत्र ने लोगों से “मुहम्मद और महावीर दोनों के झंडों तले” लड़ने का आह्वान किया। आज़मगढ़ घोषणा ने पंडितों और फ़क़ीरों दोनों को हिंदू और मुस्लिम धर्मों के “अभिभावक” मानकर एक साथ धर्मयुद्ध में शामिल होने का आह्वान किया।
सांप्रदायिक विभाजन उल्लेखनीय रूप से अनुपस्थित रहा यहाँ तक कि जहाँ अंग्रेज़ों ने सक्रिय रूप से इसे उत्पन्न करने का प्रयास किया: दिसंबर 1857 में बरेली में अंग्रेज़ों ने हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने के लिए 50,000 रुपये ख़र्च किए, और असफल रहे। इसके अतिरिक्त, अधिकतर विद्रोही प्रशासन जान-बूझकर अठारहवीं सदी के मुग़ल दरबार पर आधारित बनाए गए, एक साझा प्रतीक जो सभी समुदायों को बाँधता था।
5 ब्रिटिश दमन के क़दम
प्र. अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?
उत्तर: अंग्रेज़ों ने मई-जून 1857 में आपातकालीन क़ानून पारित किए जिन्होंने पूरे उत्तर भारत को सैन्य क़ानून के अधीन कर दिया, सामान्य अंग्रेज़ों तक को संदिग्ध विद्रोहियों पर मुक़दमा चलाने और दंड देने दिया; विद्रोह की केवल एक ही सज़ा थी: मृत्यु। दिल्ली के प्रतीकात्मक महत्व को पहचानते हुए, अंग्रेज़ों ने कलकत्ता और पंजाब से दो-दिशीय हमला किया, पर नगर को सितंबर 1857 के अंत तक ही पुनः प्राप्त कर सके।
गंगा के मैदान की पुनर्विजय धीमी थी और इसे गाँव-दर-गाँव करना पड़ा; अवध मार्च 1858 तक फिर नियंत्रित नहीं हुआ। सैन्य बल के साथ-साथ अंग्रेज़ों ने राजनीतिक विभाजन का भी प्रयोग किया: आज के उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्सों में, जहाँ बड़े ज़मींदारों और किसानों ने मिलकर प्रतिरोध किया था, अंग्रेज़ों ने इस एकता को तोड़ने के लिए बड़े ज़मींदारों को उनकी जागीरें लौटाने का वादा किया; विद्रोही ज़मींदारों को बेदख़ल किया गया और वफ़ादारों को पुरस्कृत। फाँसियाँ जान-बूझकर खुले में, सार्वजनिक रूप से दी जातीं ताकि आगे विद्रोह को रोका जा सके।
6 निबंध · अवध में विद्रोह की व्यापकता
प्र. अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुक़दार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
उत्तर: गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी ने 1851 में अवध के लिए “ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” वाक्यांश प्रयोग किया; राज्य को 1856 में औपचारिक रूप से मिला लिया गया, आधिकारिक रूप से कुशासन के लिए, यद्यपि नवाब वाजिद अली शाह वास्तव में व्यापक रूप से प्रिय थे। दरबार के विघटन ने संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, शिल्पियों और प्रशासनिक कर्मचारियों को रातों-रात बेरोज़गार कर दिया।
विलय ने केवल नवाब को ही नहीं बल्कि ताल्लुक़दारों को भी बेदख़ल किया। 1856 के एकमुश्त बंदोबस्त ने मान लिया कि ताल्लुक़दार भूमि में बिना किसी वैध दावे के महज़ बिचौलिए थे, और उनका हिस्सा 67 प्रतिशत से घटकर 38 प्रतिशत रह गया, दक्षिणी अवध में सबसे कठोर। अंग्रेज़ों ने उन्हें निरस्त्र किया और उनके दुर्ग ध्वस्त किए। ब्रिटिश अधिकारियों को उम्मीद थी कि “वास्तविक” कृषकों के साथ सीधे बंदोबस्त से किसान का बोझ घटेगा, पर कुछ स्थानों पर राजस्व-माँग 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ गई, इसलिए किसान को भी कोई राहत नहीं मिली।
ताल्लुक़दार को खोने ने एक पूरा सामाजिक संबंध भी तोड़ा: ताल्लुक़दार देय-राशियाँ वसूलते थे पर, स्थानीय संरक्षकों के रूप में, अक्सर कठिनाई में माँगें ढील देते या त्योहार के समय सहायता देते थे; अवैयक्तिक ब्रिटिश व्यवस्था ऐसा कोई लचीलापन नहीं देती थी। इसलिए जहाँ अवध में प्रतिरोध सबसे तीव्र और लंबा था, ताल्लुक़दार अपने ही किसानों के साथ लड़े, न कि उनके विरुद्ध। इसके अतिरिक्त, अधिकतर बंगाल सेना सिपाही ठीक इसी क्षेत्र से आते थे (“बंगाल सेना की नर्सरी”), इसलिए कारतूस-अफ़वाह और भूमि-शिकायतें गाँव और बैरक के बीच दोनों दिशाओं में एक साथ बहीं। इस प्रकार नवाब, ताल्लुक़दार, किसान और सिपाही, चारों की शिकायतें एक ही कड़ी में जुड़ गईं, जिससे अवध का विद्रोह असाधारण रूप से गहरा और लंबा बना।
7 निबंध · विद्रोही क्या चाहते थे
प्र. विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क़ था?
उत्तर: क्योंकि अंग्रेज़ जीते, उनके वृत्तांत अभिलेख पर हावी हैं; विद्रोहियों ने बिखरे घोषणापत्रों और इश्तहारों के अलावा अपने बहुत कम प्रमाण छोड़े, इसलिए विद्रोही दृष्टिकोण का पुनर्निर्माण आधिकारिक दृष्टिकोण के पुनर्निर्माण से कठिन है। फिर भी आज़मगढ़ घोषणा (25 अगस्त 1857) जैसे स्रोत दिखाते हैं कि माँगें समूह-विशिष्ट थीं। ज़मींदारों से घोषणा वादा करती है कि बादशाही सरकार में जमा हल्का रहेगा और उनके हितों की रक्षा होगी, बेहिसाब वसूली और नीलामी नहीं होगी। व्यापारियों से यह विदेशी एकाधिकार ख़त्म कर व्यापार भारत के देसी व्यापारियों के लिए खोलने का वादा करती है। सरकारी कर्मचारियों से यह सम्मान, बेहतर वेतन और ऊँचे ओहदे का वादा करती है। शिल्पियों (बुनकर, बढ़ई, लोहार, मोची) से यह अंग्रेज़ी आयातों से हुई बेरोज़गारी दूर करने का वादा करती है। पंडितों और फ़क़ीरों से यह हिंदू-मुस्लिम, दोनों धर्मों के “रक्षक” के रूप में धर्मयुद्ध में शामिल होने का आह्वान करती है।
फिर भी एक साझा अंतर्धारा सबको जोड़ती थी: फ़िरंगी राज से जुड़ी हर चीज़ की अस्वीकृति और अठारहवीं सदी की मुग़ल-शैली शासन-व्यवस्था की वापसी की कल्पना। यही कारण है कि जहाँ भी ब्रिटिश शासन ढहा, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर में, विद्रोहियों ने पदों पर नियुक्तियाँ, राजस्व-वसूली और सैन्य-आदेश की शृंखलाएँ, सब मुग़ल दरबार के प्रतीकों पर आधारित, वैकल्पिक प्रशासन बनाने का प्रयास किया।
कुछ स्थानों पर एक अधिक क्रांतिकारी, समतावादी अंतर्धारा भी दिखी, लेखा-बहियाँ जलाना और महाजनों के घर लूटना, पारंपरिक पदानुक्रम पलटने की एक वास्तविक यद्यपि कभी स्पष्ट रूप से न कही गई प्रेरणा; पर घोषणापत्र स्वयं इसे उभारने के बजाय सबको फ़िरंगी के विरुद्ध जोड़ने पर केंद्रित रहे। इस तरह विद्रोहियों की दृष्टि एक साथ बहुरंगी (हर समूह की अपनी शिकायत) और एकीकृत (साझा फ़िरंगी-विरोध) दोनों थी।
8 निबंध · चित्रों से मिलने वाली जानकारी
प्र. 1857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?
उत्तर: इतना कम बचा विद्रोही साक्ष्य होने से, इतिहासकारों ने अधिकतर ब्रिटिश-निर्मित सामग्री से काम किया है, जिसमें चित्रों, नक़्क़ाशियों, पोस्टरों और व्यंग्य-चित्रों का एक बड़ा संग्रह शामिल है, जो घटनाओं के बारे में जितना बताते हैं उतना ही ब्रिटिश भावना और आत्म-छवि के बारे में भी बताते हैं। थॉमस जोन्स बार्कर की “रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ” (1859) कॉलिन कैंपबेल, आउट्रम और हेवलॉक को केंद्र में, विजयी घोड़ों के साथ दिखाकर उद्धारकों का उत्सव मनाती है और ब्रिटिश दर्शकों को आश्वस्त करती है कि संकट टल चुका है।
जोसेफ़ नोएल पेटन की “इन मेमोरियम” (1859) अंग्रेज़ स्त्रियों-बच्चों को सिमटा दिखाकर, हिंसा की प्रतीक्षा करते हुए (जो कभी नहीं दिखाई जाती, केवल संकेतित), बदले की जन-माँग पोषित करती है; एक विपरीत शैली मिस व्हीलर को कानपुर में अकेले सशस्त्र विद्रोहियों से लड़ते हुए, फ़र्श पर बाइबल के साथ, वीर-रक्षक के रूप में दिखाती है। जैसे-जैसे ब्रिटिश जन-क्रोध बढ़ा, पंच के “न्याय” (12 सितंबर 1857) और “द ब्रिटिश लायन्स वेंजेंस ऑन द बंगाल टाइगर” जैसे व्यंग्य-चित्रों ने क्रूर प्रतिशोध को आवश्यक न्याय के रूप में स्वीकृति दी। इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ ने 3 अक्टूबर 1857 को पेशावर में बारह विद्रोहियों की सार्वजनिक फाँसी दिखाई, आतंक का एक जान-बूझकर मंचित प्रदर्शन। यहाँ तक कि संयम की माँग को भी उपहास मिला: “द क्लेमेंसी ऑफ़ कैनिंग” (24 अक्टूबर 1857) ने गवर्नर-जनरल कैनिंग की उदारता का व्यंग्यात्मक मज़ाक उड़ाया।
इतिहासकार इन्हें तटस्थ अभिलेख नहीं, बल्कि एक विशेष भावना के साथ एक विशेष दर्शक-वर्ग को समझाने के लिए बनाए गए स्रोत मानकर पढ़ते हैं, यह पूछते हुए कि किसने, किसके लिए, और किस भावना को भड़काने के लिए इन्हें रचा। बीसवीं सदी के भारतीय राष्ट्रवाद ने बाद में 1857 को “स्वतंत्रता के पहले युद्ध” के रूप में पुनः दावा किया, रानी लक्ष्मीबाई को युग की परिभाषित वीर छवि बनाकर, यह साबित करते हुए कि हर पीढ़ी अपनी ज़रूरत के अनुसार अतीत की तस्वीर गढ़ती है।
9 निबंध · दो स्रोतों की तुलनात्मक जाँच
प्र. एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और चर्चा कीजिए कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है।
उत्तर: दृश्य स्रोत के रूप में थॉमस जोन्स बार्कर की “रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ” (1859) को लें। यह हेनरी लॉरेंस की मृत्यु और कर्नल इंगलिस की लंबी रक्षा के बाद, कॉलिन कैंपबेल के अतिरिक्त सैनिकों के आगमन का स्मरण कराती है। रचना कैंपबेल, आउट्रम और हेवलॉक को केंद्र में, अच्छी तरह प्रकाशित, हाथों के इशारों से घिरा दिखाती है जो दर्शक की नज़र उन तक ले जाते हैं; अग्रभूमि में मृत-घायल पिछले दुख का संकेत देते हैं, जबकि मध्यभूमि में विजयी घोड़े पुनर्स्थापित ब्रिटिश नियंत्रण दिखाते हैं। यह विशुद्ध रूप से विजेता का दृष्टिकोण है: संकट को टला हुआ और ब्रिटिश सत्ता को विजयी दिखाकर ब्रिटिश दर्शकों को आश्वस्त करना।
पाठ्य स्रोत के रूप में आज़मगढ़ घोषणा (25 अगस्त 1857) को लें, जो उस समय जारी हुई जब विद्रोही अभी लड़ रहे थे और अभी हारे नहीं थे। यह अंग्रेज़ों को हर सामाजिक समूह, ज़मींदार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी, शिल्पी, पंडित-फ़क़ीर, के उत्पीड़क के रूप में चित्रित करती है और एक वैकल्पिक, न्यायपूर्ण बादशाही शासन की कल्पना प्रस्तुत करती है जिसमें हर समूह की विशिष्ट शिकायत का समाधान किया जाएगा। यह पराजित होने वाले पक्ष का, पर हार से पहले लिखा गया, आत्मविश्वासी दृष्टिकोण है।
दोनों स्रोतों की तुलना अभिलेख के असंतुलन को भी दिखाती है: जैसा अध्याय बताता है, बहुत कम विद्रोहियों को अपना पक्ष दर्ज करने का अवसर मिला, और कुछ घोषणाओं व इश्तहारों के अलावा 1857 का पुनर्निर्माण मुख्यतः अंग्रेज़ों के लिखे और बनाए स्रोतों पर निर्भर है। इसीलिए विजेता का दृष्टिकोण स्रोतों पर हावी है और विद्रोहियों के दृष्टिकोण का पुनर्निर्माण कठिन है।
10 मानचित्र कार्य
प्र. भारत के मानचित्र पर कलकत्ता (कोलकाता), बम्बई (मुंबई), मद्रास (चेन्नई) को चिह्नित कीजिए जो 1857 में ब्रिटिश सत्ता के तीन मुख्य केंद्र थे। मानचित्र 1 और 2 को देखिए तथा उन इलाकों को चिह्नित कीजिए जहाँ विद्रोह सबसे व्यापक रहा। औपनिवेशिक शहरों से ये इलाके कितनी दूर या कितनी पास थे?
उत्तर (यह रेखा-मानचित्र पर करने का अभ्यास है; यहाँ उत्तर सूची के रूप में दिया गया है):
तीन औपनिवेशिक शहर: पूर्वी तट पर कलकत्ता, पश्चिमी तट पर बम्बई और दक्षिण-पूर्वी तट पर मद्रास।
विद्रोह के सबसे व्यापक इलाके (अध्याय के अनुसार): उत्तर भारत की गंगा घाटी: मेरठ और दिल्ली; अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी और एटा; लखनऊ सहित अवध; कानपुर और बरेली; झाँसी; बिहार में आरा; परगना बड़ौत; और छोटा नागपुर में सिंहभूम। इसके विपरीत पंजाब मोटे तौर पर शांत रहा।
दूरी: ये केंद्र उत्तर भारत के भीतरी भाग में थे: बम्बई और मद्रास से बहुत दूर, और कलकत्ता से भी गंगा घाटी में काफ़ी ऊपर। इसीलिए अंग्रेज़ों को दिल्ली पर फिर से क़ब्ज़े के लिए एक सेना कलकत्ता से और दूसरी पंजाब से भेजनी पड़ी, और गंगा के मैदान की पुनर्विजय गाँव-दर-गाँव, धीरे-धीरे हुई।
11 परियोजना कार्य (कोई एक): विद्रोही नेता की जीवनी
प्र. 1857 के विद्रोही नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़ें। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोर्टों, अख़बारी ख़बरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज़ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फ़र्क दिखाई देते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर (परियोजना के लिए तरीका):
अध्याय में आए किसी नेता को चुनिए, जैसे रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहिब, कुँवर सिंह, बहादुर शाह, शाह मल या मौलवी अहमदुल्लाह शाह।
जीवनीकार के स्रोतों की सूची बनाइए, प्रश्न में दिए शीर्षकों के अनुसार: सरकारी रिपोर्टें, अख़बारी ख़बरें, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियाँ, चित्र, और अन्य (पत्र, गीत, घोषणाएँ)।
उनकी तुलना कीजिए। अध्याय स्वयं बताता है कि वे अलग क्यों हो सकते हैं: अंग्रेज़ी वृत्तांत विद्रोहियों को तिरस्कार से देखते थे, जबकि राष्ट्रवादी कला और साहित्य ने रानी झाँसी जैसे नेताओं को वीर रूप में प्रस्तुत किया। जहाँ स्रोत सहमत हैं और जहाँ अलग हैं, उसे लिखिए और कारण सुझाइए।
निष्कर्ष में बताइए कि नेता का अपना दृष्टिकोण जानने के लिए कौन-से स्रोत सबसे भरोसेमंद लगे, यह याद रखते हुए कि बहुत कम विद्रोही अपना पक्ष दर्ज कर पाए।
12 परियोजना कार्य (कोई एक): 1857 पर फ़िल्म
प्र. 1857 पर बनी कोई फ़िल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्रोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज़ों, विद्रोहियों और अंग्रेज़ों के भारतीय वफ़ादारों को किस तरह दिखाया गया है? फ़िल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, ज़मींदारों और ताल्लुक़दारों के बारे में क्या कहती है? फ़िल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?
उत्तर (परियोजना के लिए तरीका):
प्रश्न के शीर्षकों के अनुसार नोट्स बनाइए: अंग्रेज़, विद्रोही, वफ़ादार; फिर किसान, नगरवासी, आदिवासी, ज़मींदार और ताल्लुक़दार।
अध्याय से तुलना कीजिए। जैसे, क्या फ़िल्म विद्रोह को केवल सैनिक विद्रोह दिखाती है, या एक जन-विद्रोह के रूप में जिसमें अवध की तरह ताल्लुक़दार और किसान साथ लड़े? क्या वह ऐसे नेता दिखाती है जिन्हें जनता के दबाव ने नेतृत्व सँभालने पर मजबूर किया, जैसा अध्याय बहादुर शाह, नाना साहिब और रानी झाँसी के बारे में बताता है?
फ़िल्म को अध्याय के चित्रों की तरह पढ़िए: वह किसका दृष्टिकोण अपनाती है और कौन-सी भावना (गर्व, क्रोध, सहानुभूति) जगाना चाहती है, ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिश चित्र बदले की भावना और राष्ट्रवादी छवियाँ प्रेरणा जगाना चाहती थीं।
13 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए प्रश्न, उसी क्रम में जिसमें पुस्तक उन्हें छापती है।
प्र. इन दोनों रिपोर्टों तथा उस दौरान दिल्ली के हालात के बारे में इस अध्याय में दिए गए विवरणों को पढ़ें। याद रखें कि अख़बारों में छपी ख़बरें अकसर पत्रकार के पूर्वाग्रह या सोच से प्रभावित होती हैं। इस आधार पर बताएँ कि दिल्ली उर्दू अख़बार लोगों की गतिविधियों को किस नज़र से देखता था?
उत्तर: दिल्ली उर्दू अख़बार (14 जून 1857) इस उथल-पुथल को चिंता और नाराज़गी की नज़र से देखता था। (1) वह शिकायत करता है कि बाज़ारों में सब्ज़ियाँ और साग तक नहीं मिलते, आलू और अरबी बासी-सड़ी मिलती है जिसे कुंजड़ों ने जमाकर रखा था, और शहर के बाग़-बगीचों का माल ख़ास लोगों के लिए है जबकि ग़रीब और मध्यवर्ग वाले ‘बस होठों पर जीभ फिरा कर रह जाते हैं’। (2) वह शिकायत करता है कि पानी भरने वालों ने पानी भरना बंद कर दिया है, जिससे ‘ग़रीब शुरफ़ा (शरीफ लोग)’ ख़ुद पानी ढोते हैं; और ‘हलालख़ोर हरामख़ोर हो गए हैं’, जिससे गंदगी, बीमारी और महामारी फैलने का डर है। अख़बार की सहानुभूति शरीफ़ लोगों और मध्यवर्ग के साथ है और वह काम बंद कर देने वाले कुंजड़ों, भिश्तियों और सफ़ाईकर्मियों को दोषी मानता है। यह एक ऊँचे तबके के शहरी पत्रकार का पूर्वाग्रह दिखाता है। अध्याय दूसरा पहलू बताता है: दिल्ली के आम लोग सिपाहियों के साथ जुड़ गए थे, अमीरों पर हमले हुए और उन्हें लूटा गया, और सत्ता व सोपानों की सरेआम अवहेलना हो रही थी, जिसे अख़बार केवल व्यवस्था के बिखरने के रूप में देखता था।
प्र. विद्रोही अपनी योजनाओं को किस तरह एक-दूसरे तक पहुँचाते थे, इस बारे में इस बातचीत से क्या पता चलता है? तहसीलदार ने सिस्टन को संभावित विद्रोही क्यों मान लिया था?
उत्तर: योजनाएँ कैसे पहुँचाई जाती थीं: (1) गुप्त रूप से, घुमा-फिराकर बोली गई भाषा में: ‘काम कैसा चल रहा है?’ और ‘अगर हमें अवध में काम मिलता है तो जनाब-ए-आली को भी पता चल जाएगा’ जैसे वाक्य विद्रोह का नाम लिए बिना उसकी बात करते हैं; (2) भारतीयों के निजी संपर्कों से, यहाँ तक कि सरकारी नौकरी में लगे लोगों के बीच भी, जैसे बिजनौर का तहसीलदार; (3) एक इलाके से दूसरे इलाके तक, क्योंकि बिजनौर का आदमी अवध की ख़बर पूछ रहा है; (4) किसी केंद्रीय दिशा के भरोसे के साथ: ‘भरोसा रखो, इस बार हम कामयाब होंगे। मामला काबिल हाथों में है।’ अध्याय यह भी बताता है कि सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जाते थे और कानपुर की सिपाही लाइनों में रात को देशी अफ़सरों की पंचायतें जुटती थीं। सिस्टन को संभावित विद्रोही क्यों माना: सीतापुर का देसी ईसाई पुलिस इंसपेक्टर सिस्टन हिंदुस्तानी कपड़े पहने आलथी-पालथी मारकर बैठा था, और वह अवध में तैनात था, जो असंतोष का केंद्र था। इसलिए तहसीलदार ने उसे ऐसा हिंदुस्तानी समझा जो विद्रोहियों की शिकायतों में साझेदार है और अवध के ‘काम’ से जुड़ा है।
प्र. इस भाग को एक बार और पढ़िए तथा विद्रोह के दौरान नेता कैसे उभरते थे, इस बारे में समानताओं और भिन्नताओं की व्याख्या कीजिए। किन्हीं दो नेताओं के बारे में बताइए कि आम लोग उनकी तरफ़ क्यों आकर्षित हो जाते थे।
उत्तर: समानताएँ: (1) विद्रोहियों ने कई बार ऐसे लोगों की शरण ली जो अंग्रेज़ों से पहले नेता थे: मुग़ल बादशाह बहादुर शाह, पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब, झाँसी की रानी, आरा के ज़मींदार कुँवर सिंह, और नवाब वाजिद अली शाह के युवा बेटे बिरजिस क़द्र; (2) इनमें से कई को सिपाहियों या जनता के दबाव में नेतृत्व सँभालना पड़ा: बहादुर शाह पहले भयभीत और बेचैन थे और तभी माने जब सिपाही जबरन लाल क़िले के दरबार में घुस गए; नाना साहिब के सामने ‘कोई विकल्प ही नहीं’ छोड़ा गया; रानी और कुँवर सिंह को भी जनता के दबाव में नेतृत्व लेना पड़ा।
भिन्नताएँ: सभी नेता दरबारों से जुड़े नहीं थे। कुछ धार्मिक लोग थे, जैसे मेरठ में हाथी पर सवार फ़क़ीर और लखनऊ के धार्मिक नेता व स्वयंभू पैगम्बर-प्रचारक; मौलवी अहमदुल्ला शाह को 22वीं नेटिव इन्फ़ैंट्री के विद्रोहियों ने अपना नेता चुना; कुछ स्थानीय नेता जनता के बीच से उभरे, जैसे बड़ौत परगना के जाट किसान शाह मल और सिंहभूम के आदिवासी काश्तकार गोनू, जिन्होंने कोल आदिवासियों का नेतृत्व किया; लखनऊ में लोगों ने स्वयं बिरजिस क़द्र को अपना नेता घोषित किया।
दो नेता और लोगों का आकर्षण:
शाह मल: उन्होंने गाँव वालों की शिकायतों को आवाज़ दी: ऊँचा लगान, सख़्त वसूली, और व्यापारियों व महाजनों के हाथों ज़मीन छिनना। वे रात के साए में गाँव-गाँव गए, एक अंग्रेज़ अफ़सर के बंगले को ‘न्याय भवन’ बनाकर झगड़ों का फ़ैसला करने लगे, गुप्तचरी का हैरतअंगेज़ नेटवर्क बनाया, और स्थानीय स्तर पर राजा कहलाए; लोगों को लगा कि फ़िरंगी राज ख़त्म हो चुका है और ‘उनका राज आ गया है’।
मौलवी अहमदुल्ला शाह: वे गाँव-गाँव जाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जिहाद का प्रचार करते थे, पालकी में ढोल-नगाड़ों के साथ चलते थे (इसलिए डंका शाह कहलाए); बहुत सारे मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानने लगे; चिनहाट के संघर्ष में उनकी बहादुरी से हेनरी लॉरेंस की टुकड़ियाँ हारीं; और लोग मानते थे कि उनके पास जादुई शक्तियाँ हैं और उन्हें कोई नहीं हरा सकता।
प्र. इस पूरे भाग को पढ़ें और चर्चा करें कि लोग वाजिद अली शाह की विदाई पर इतने दुखी क्यों थे।
उत्तर: (1) वे लोकप्रिय थे: अंग्रेज़ों ने ग़लत निष्कर्ष निकाला कि वाजिद अली शाह लोकप्रिय नहीं थे, जबकि लोग उन्हें दिल से चाहते थे; 1856 में कुशासन के बहाने उन्हें गद्दी से हटाकर कलकत्ता निष्कासित किया गया तो बहुत सारे लोग विलाप करते हुए कानपुर तक उनके पीछे गए। (2) दुख और अपमान का अहसास: एक प्रेक्षक ने लिखा, ‘देह से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी’, और कोई सड़क, बाज़ार या घर ऐसा न था जहाँ जान-ए-आलम से बिछड़ने पर विलाप न गूँज रहा हो; एक लोक गीत ने कहा ‘अंगरेज बहादुर आइन, मुल्क लई लीन्हों’; दूसरे गीत के अनुसार अभिजात और किसान सब रो रहे थे। (3) भौतिक क्षति: नवाब के हटने से दरबार और उसकी संस्कृति ख़त्म हो गई; संगीतकारों, नर्तकों, कवियों, कारीगरों, बावर्चियों, नौकरों और सरकारी कर्मचारियों की रोज़ी-रोटी चली गई। (4) अधिग्रहण से नाराज़गी: लॉर्ड डलहौज़ी के अधिग्रहण को विदेशी क़ब्ज़ा माना गया; अवध के लोग फ़िरंगी राज के आगमन को अपनी दुनिया के ख़ात्मे के रूप में देखने लगे।
प्र. इस अंश से आपको ताल्लुक़दारों के रवैये के बारे में क्या पता चल रहा है? ‘यहाँ के लोगों’ से हनवन्त सिंह का क्या आशय था? उन्होंने लोगों के ग़ुस्से की क्या वजह बताई?
उत्तर: ताल्लुक़दारों का रवैया: वे अंग्रेज़ों से गहराई से आहत थे, जिन्होंने उनके राजाओं को खदेड़ दिया और पुरखों की ज़मीन छीन ली। कुछ समय वे चुप रहे, और कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह ने व्यक्तिगत रूप से सम्मानजनक व्यवहार करते हुए एक अंग्रेज़ अफ़सर की जान भी बचाई। पर अब वे विद्रोह को अवसर मानकर अपने सिपाहियों के साथ लखनऊ जाकर अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ने को तैयार थे। उनकी निष्ठा नवाब और अपनी ज़मीन के प्रति थी, अंग्रेज़ों के प्रति नहीं। ‘यहाँ के लोग’: अवध के आम लोग, यानी किसान, गाँव वाले और सिपाही (बंगाल आर्मी के अधिकांश सिपाही अवध के गाँवों से थे), जो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए थे। ग़ुस्से की वजह: अंग्रेज़ों ने उनके राजा को खदेड़ दिया और अफ़सर भेजकर जागीरों के मालिकाने की जाँच करवाकर ‘एक ही झटके में’ ज़मीनें छीन लीं।
प्र. पता लगाएँ कि क्या आपके राज्य के लोगों ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था? अगर हाँ, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? अगर नहीं, तो उसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर: यह खोजबीन का कार्य है; अध्याय को मार्गदर्शक बनाइए। यदि आपके राज्य ने हिस्सा लिया (जैसे उत्तर प्रदेश: मेरठ, लखनऊ, कानपुर, बरेली, अवध और बड़ौत परगना; बिहार: कुँवर सिंह के नेतृत्व में आरा; झारखंड: गोनू और कोल आदिवासियों के साथ सिंहभूम; रानी के नेतृत्व में झाँसी; दिल्ली), तो अध्याय में दिए कारण खोजिए: अवध और झाँसी जैसी रियासतों का अधिग्रहण; ताल्लुक़दारों को बेदख़ल करने वाले और किसानों पर भारी लगान डालने वाले भूराजस्व बंदोबस्त; चर्बी वाले कारतूस और जाति-धर्म नष्ट होने का डर; कम वेतन, छुट्टी न मिलने और नस्ली दुर्व्यवहार से सिपाहियों का असंतोष; और सिपाहियों का अपने गाँवों से गहरा जुड़ाव। यदि आपके राज्य ने हिस्सा नहीं लिया, तो कारण खोजिए: अध्याय के अनुसार, उदाहरण के लिए, पंजाब काफ़ी हद तक शांत था; संभावित कारण हो सकते हैं कि वहाँ के सैनिक विद्रोह करने वाली बंगाल आर्मी का हिस्सा नहीं थे, वहाँ के शासक अंग्रेज़ों के वफ़ादार रहे, वहाँ हाल में इस तरह का अधिग्रहण या राजस्व बंदोबस्त नहीं हुआ था, या ख़बरें और संगठन वहाँ तक नहीं पहुँचे। अपने उत्तर के समर्थन में ज़िला गज़ेटियर या संग्रहालय के अभिलेख जैसे स्थानीय स्रोत देखिए।
प्र. इस घोषणा में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ कौन से मुद्दे उठाए गए हैं। प्रत्येक तबके के बारे में दिए गए भाग को ध्यान से पढ़िए। घोषणा की भाषा पर ध्यान दीजिए और देखिए कि उसमें कौन-सी भावनाओं पर ज़ोर दिया जा रहा है।
उत्तर: तबकेवार मुद्दे:
(1) ज़मींदार: बहुत ऊँची जमा (राजस्व माँग); बकाया लगान के लिए जागीरों की सार्वजनिक नीलामी; एक मामूली रैयत, नौकरानी या दास की शिकायत पर इज़्ज़तदार ज़मींदारों को अदालत में बुलाना, गिरफ़्तार करना और जेल भेजना; स्टांप और अदालतों का भारी ख़र्च; स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों के लिए हर साल चंदा।
(2) व्यापारी: अंग्रेज़ सरकार ने नील, कपड़े और जहाज़ से होने वाले व्यापार जैसी बहुमूल्य चीज़ों पर एकाधिकार कर लिया और लोगों के लिए छोटी-मोटी चीज़ों का व्यापार छोड़ा; डाक ख़र्च, नाका वसूली और चंदों से मुनाफ़े में सेंध; ‘दो कौड़ी के आदमी’ की शिकायत पर गिरफ़्तारी और बेइज़्ज़ती।
(3) सरकारी कर्मचारी: इज़्ज़त नहीं, कम तनख़्वाह, कोई ताक़त नहीं; प्रतिष्ठा और पैसे वाले सारे पद केवल अंग्रेज़ों को।
(4) कारीगर: इंग्लैंड में बनी चीज़ों ने बुनकरों, सूती वस्त्र बनाने वालों, बढ़इयों, लोहारों और मोचियों को बेरोज़गार कर भिखमंगों की हालत में पहुँचा दिया।
(5) पंडित और फ़क़ीर: यूरोपीय हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के शत्रु हैं।
भाषा और भावनाएँ: अंग्रेज़ों को ‘अधर्मी और षड्यंत्रकारी’ कहा गया है और संघर्ष को ‘भारतीय धर्म युद्ध’ और ‘पवित्र युद्ध’, यानी धर्म की भावना; हिंदू और मुसलमान दोनों को एक साथ संबोधित किया गया है, यानी एकता की भावना; हर तबके को ‘बादशाही सरकार’ में बेहतर जीवन का वादा (हल्की जमा, खुला व्यापार, 200-300 रुपये की तनख़्वाह, कारीगरों को काम), यानी स्वार्थ और हित की भावना; इज़्ज़त और प्रतिष्ठा की भावना; ज्योतिषियों और पंडितों की गणना का हवाला कि अंग्रेज़ अब टिक नहीं पाएँगे; और चेतावनी कि यह सुनहरा मौक़ा गँवाने वाले पछताएँगे।
प्र. इस अर्ज़ी में सैनिक विद्रोह के जो कारण बताए गए हैं उनकी तुलना ताल्लुक़दार द्वारा बताए गए कारणों (स्रोत 3) के साथ कीजिए।
उत्तर: (ताल्लुक़दार का वक्तव्य कालाकंकर के राजा हनवन्त सिंह का है, जो पृष्ठ 269 पर छपा है।)
अर्ज़ी में सिपाहियों के कारण: सबसे बढ़कर धर्म और आस्था: नए कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी, और आटे में हड्डियों का चूरा; कारतूस दाँतों से खींचने से मना करने वाले थर्ड लाइट केवेलरी के 84 नए सिपाहियों को बेड़ियाँ डालकर जेल में बंद करना, ताकि बाक़ी डर जाएँ; और विश्वासघात का अहसास, क्योंकि उनके पुरखों ने और उन्होंने वफ़ादारी से अंग्रेज़ों की सेवा की थी और उन्हें हर इलाका जिताया था। ‘अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या?’
ताल्लुक़दार के कारण: राजनीतिक और आर्थिक: अंग्रेज़ों ने राजा को खदेड़ दिया (अवध का अधिग्रहण) और जागीरों के मालिकाने की जाँच करवाकर उनके पुरखों की ज़मीन छीन ली।
तुलना: दोनों मानते हैं कि अंग्रेज़ों ने उनकी वफ़ादारी या चुप्पी का बदला अन्याय से दिया, और दोनों अपने विद्रोह को उचित ठहराते हैं। पर सिपाही अपनी आस्था पर ख़तरे पर ज़ोर देते हैं, जबकि ताल्लुक़दार अपने शासक और अपनी ज़मीन छिनने पर।
प्र. आपकी राय में विद्रोहियों के नज़रिए को पुनःनिर्मित करने में इतिहासकारों के सामने कौन-सी मुख्य समस्याएँ आती हैं?
उत्तर: (1) विद्रोहियों के अपने दस्तावेज़ बहुत कम: विद्रोहियों के दमन के साथ उनकी आवाज़ भी दबा दी गई, और बहुत कम विद्रोहियों को अपना पक्ष दर्ज करने का मौक़ा मिला। (2) निरक्षरता: अधिकतर विद्रोही सिपाही और आम लोग थे जो पढ़े-लिखे नहीं थे। (3) सीमित स्रोत: कुछ घोषणाओं, इश्तहारों, पत्रों और अर्ज़ियों के सिवाय बहुत कम बचा है। (4) अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों पर निर्भरता: इतिहासकारों को मजबूरन अंग्रेज़ों के दस्तावेज़ों (सरकारी रिपोर्टें, पत्र, डायरियाँ, नोट और इतिहास) पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनसे अफ़सरों की सोच का तो पता चलता है पर यह कम पता चलता है कि विद्रोही क्या चाहते थे; और अंग्रेज़ों ने विद्रोहियों को एहसानफ़रामोश और बर्बर कहकर ख़ारिज कर दिया। (5) पक्षपाती चित्र और ख़बरें: ब्रिटिश अख़बारों और चित्रों ने बदले की भावना भड़काने के लिए विद्रोहियों की हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। (6) घोषणाएँ मतभेद छिपाती हैं: वे सभी तबकों को एकजुट करना चाहती थीं, इसलिए विद्रोहियों के कामों (बही-खाते जलाना, महाजनों पर हमले) में दिखी अधिक समतावादी समाज की कल्पना कभी लिखी नहीं गई।
प्र. इस विवरण के अनुसार गाँव वालों से निपटने में अंग्रेज़ों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?
उत्तर: (1) अवध के गाँव वाले उत्तर से जोड़ने वाली अंग्रेज़ों की संचार लाइन पर ज़ोर बना रहे थे, जिससे उनकी आवाजाही और रसद पर ख़तरा था। (2) ये गाँव वाले ‘यूरोपियों की पकड़ से बिलकुल बाहर’ थे; पल में बिखर जाते और पल में फिर जुट जाते, इसलिए अंग्रेज़ उन्हें घेरकर खुली लड़ाई में हरा नहीं पाते थे। (3) उनकी संख्या बहुत बड़ी थी और उनके पास बंदूकें थीं। (4) क्योंकि वे आम गाँव वाले थे, पूरा देहात अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ था: अध्याय बताता है कि अंग्रेज़ों को गाँव-गाँव करके इलाका फिर जीतना पड़ा, और फॉरसिथ के अनुमान के अनुसार अवध की कम से कम तीन-चौथाई वयस्क पुरुष आबादी विद्रोह में शामिल थी।
प्र. तसवीर से क्या सोच निकलती है? शेर और चीते की तसवीरों के माध्यम से क्या कहने का प्रयास किया गया है? औरत और बच्चे की तसवीर क्या दर्शाती है?
उत्तर: पन्च (1857) का यह चित्र, ‘बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध’, यह सोच सामने रखता है कि विद्रोहियों से अंग्रेज़ों का बदला न्यायपूर्ण और ज़रूरी था। शेर, जो ब्रिटेन का राष्ट्रीय प्रतीक है, पूरी ताक़त से बाघ पर झपट रहा है; यह ब्रिटिश शक्ति, न्याय के दावे और दंड देने के संकल्प को दिखाता है। बाघ (चीता) ‘बंगाल’ के विद्रोहियों, यानी बंगाल आर्मी के सिपाहियों, का प्रतीक है, जिन्हें निर्दोषों पर हमला करने वाले हिंसक जानवर की तरह दिखाया गया है। बाघ के नीचे पड़ी औरत और बच्चा विद्रोहियों के शिकार हुए अंग्रेज़ स्त्रियों और बच्चों को दर्शाते हैं, जैसे कानपुर के जनसंहार में; इन्हें दिखाने का उद्देश्य ग़ुस्सा भड़काना और प्रतिशोध को उचित ठहराना है। उस समय के दूसरे चित्रों की तरह इसने ऐसा माहौल बनाया जिसमें निर्मम दमन को ज़रूरी और वाजिब माना जाने लगा।
प्र. इस भाग में दिए गए प्रत्येक चित्र के विभिन्न तत्वों की जाँच कीजिए और चर्चा कीजिए कि उनके ज़रिए आपको कलाकार की सोच को पहचानने में कैसे मदद मिलती है।
उत्तर: कलाकार की सोच इस बात से पहचानी जाती है कि चित्र के केंद्र में कौन है, किसे नायक और किसे खलनायक दिखाया गया है, और रोशनी, हाव-भाव, प्रतीकों और नीचे लिखी पट्टी का प्रयोग कैसे हुआ है।
(1) ‘द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (बार्कर, 1859): केंद्र में रोशनी में खड़े कैम्पबेल, आउट्रम और हेवलॉक, आस-पास के लोगों के हाथों के इशारे उन्हीं की ओर, अग्रभूमि में मृत और घायल, और विजयी घोड़े: एक अंग्रेज़ कलाकार रक्षकों का गुणगान कर रहा है और ब्रिटिश जनता को आश्वस्त कर रहा है कि ब्रिटिश सत्ता लौट आई है।
(2) ‘इन मेमोरियम’ (पेटन, 1859): एक घेरे में सिमटी असहाय अंग्रेज़ औरतें और बच्चे; विद्रोही दिखाई नहीं देते पर उन्हें हिंसक और बर्बर बताया गया है; पृष्ठभूमि में रक्षक सेना आ रही है: ब्रिटेन में ग़ुस्सा और रोष भड़काने का प्रयास।
(3) मिस व्हीलर (चित्र 10.12): अकेली औरत चार हट्टे-कट्टे सिपाहियों को मार रही है, ज़मीन पर बाइबिल पड़ी है: विद्रोहियों को राक्षस जैसा दिखाया गया है और संघर्ष को ईसाइयत की इज़्ज़त बचाने की लड़ाई बताया गया है।
(4) ‘जस्टिस’ (न्याय) (पन्च, चित्र 10.13): तलवार और ढाल लिए न्याय की रूपकात्मक स्त्री छवि, चेहरे पर ग़ुस्सा, सिपाहियों को पैरों तले कुचलती, जबकि भारतीय औरतें और बच्चे भय से काँप रहे हैं: प्रतिशोध की माँग।
(5) ‘बंगाल टाइगर से ब्रिटिश शेर का प्रतिशोध’ (चित्र 10.14): बदले को न्यायपूर्ण बताना।
(6) पेशावर में मृत्युदंड (इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़, चित्र 10.15, 10.16): खुले में सैनिकों की क़तारों के सामने तोप से उड़ाए और फाँसी पर लटकाए विद्रोही: दंड को दहशत के प्रदर्शन के रूप में मंचित करना, ताकि दूसरे डरें।
(7) ‘द क्लिमेंसी ऑफ़ केनिंग’ (पन्च, चित्र 10.17): एक भव्य बुज़ुर्ग की तरह केनिंग, जो ख़ून टपकते हथियार लिए सिपाही के सिर पर हाथ रखे है: केनिंग की नरमी की अपील का मज़ाक।
(8) रानी लक्ष्मीबाई (चित्र 10.3, 10.18): फ़ौजी पोशाक में, हाथ में तलवार, घोड़े पर सवार: राष्ट्रवादी सोच, जो विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और रानी को अन्याय व विदेशी शासन के प्रतिरोध का प्रतीक मानती है।