NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग I के अध्याय 2 ‘राजा, किसान और नगर’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, लगभग 500 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और स्रोतों, चित्रों व मानचित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्प-उत्पादन के प्रमाण
प्र. आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
उत्तर: लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से उभरे आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्प-उत्पादन के दो मुख्य प्रकार के प्रमाण मिलते हैं।
1. पुरावशेष। उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र, संभवतः धनी लोगों द्वारा प्रयुक्त चमकदार कटोरे-थालियाँ, और सोने, चाँदी, ताँबे, काँसे, हाथीदाँत, काँच, शंख व टेराकोटा के आभूषण, औज़ार, हथियार, पात्र और मूर्तियाँ।
2. दानात्मक अभिलेख। दूसरी शताब्दी ई.पू. से मिलने वाले छोटे दानात्मक अभिलेख दाता का नाम और कभी-कभी व्यवसाय भी बताते हैं: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, सुनार, लोहार जैसे शिल्पकार। मथुरा की एक मूर्ति पर अभिलेख है कि सुनार धर्मक की पत्नी नागपिया ने इसे मंदिर में स्थापित किया।
हड़प्पाई प्रमाण से अंतर। हड़प्पाई नगरों के विपरीत, अधिकतर आरंभिक ऐतिहासिक स्थलों पर आज भी लोग रहते हैं, इसलिए पूर्ण खुदाई कठिन है और प्रमाण अधूरे हैं। हड़प्पाई शिल्प के प्रमाण मुख्यतः मुहरों, बाटों और मनका-कारख़ानों की सीधी पुरातात्विक खुदाई से मिलते हैं, जबकि आरंभिक ऐतिहासिक नगरों के लिए दानात्मक अभिलेख जैसा लिखित स्रोत अतिरिक्त रूप से उपलब्ध है, जो शिल्पकार का नाम व पहचान तक बता सकता है, ऐसी जानकारी हड़प्पाई पुरातत्व अकेले नहीं देता।
2 महाजनपदों की विशिष्ट विशेषताएँ
प्र. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. जनपद और महाजनपद। जनपद का अर्थ है वह भूमि जहाँ कोई जन बसता है; महाजनपद एक बड़ा जनपद है। आरंभिक बौद्ध-जैन ग्रंथ सोलह महाजनपद गिनाते हैं, जिनमें वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवंति सबसे अधिक बार आते हैं।
2. दो प्रकार के राज्य। राजतंत्र में एक ही राजा शासन करता था, आदर्श रूप से क्षत्रिय। गण या संघ (कुलीनतंत्र) में सत्ता कई पुरुषों में बँटी होती थी, जिन्हें सामूहिक रूप से राजा कहा जाता था; महावीर और बुद्ध दोनों ऐसे ही गणों से थे।
3. दुर्गीकृत राजधानी। हर महाजनपद की एक राजधानी होती थी, प्रायः दुर्गीकृत, क्योंकि दुर्ग, सेनाएँ और आरंभिक नौकरशाही, सबमें धन लगता था।
4. धर्मशास्त्रों के नियम। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्र रचे, जिनमें राजाओं को कृषकों, व्यापारियों और शिल्पियों से कर व भेंट वसूलने का निर्देश दिया गया, जबकि पशुचारकों-वनवासियों पर कर लगता था या नहीं, यह अज्ञात है।
5. छापे की वैधता। पड़ोसी राज्यों पर छापा मारना धन प्राप्त करने का एक मान्य, वैध तरीका माना जाता था।
3 सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण
प्र. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?
उत्तर: अभिलेख इसका उत्तर नहीं देते, क्योंकि आम लोगों ने अपने विचारों के वृत्तांत शायद ही कभी छोड़े; अभिलेख उन्हीं के विचार दर्ज करते हैं जिन्होंने उन्हें बनवाया।
1. जातक और पंचतंत्र जैसे संग्रह। इतिहासकार इनकी कहानियों से हल निकालते हैं, जो संभवतः लोकप्रिय मौखिक कथाएँ थीं, बाद में लिखी गईं। जातक प्रथम सहस्राब्दि ई. के मध्य के आसपास पालि में लिखे गए।
2. गंदतिन्दु जातक का उदाहरण। यह एक दुष्ट राजा की प्रजा, वृद्ध स्त्री-पुरुष, कृषक, पशुपालक, गाँव के लड़कों तक का वर्णन करता है। जब राजा अपनी पहचान बदल कर यह पता लगाने गया कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, तो सबने उसे भला-बुरा कहा: रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी। ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़ कर जंगल में बस गए।
3. निष्कर्ष। ऐसी कहानियाँ बताती हैं कि राजा और प्रजा के बीच संबंध तनावपूर्ण हो सकते थे, ऊँचे कर अत्याचारपूर्ण लगते थे, और प्रजा की प्रतिक्रिया या तो भाग जाना थी या उत्पादन बढ़ाना, जिसने ग्रामीण जीवन को बदल दिया।
4 पांड्य सरदार बनाम दंगुन गाँव
प्र. पांड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर:
समानताएँ। दोनों सूचियों में फूल का उल्लेख है, और दोनों कृषि व वन-आधारित समाज की उपज की झलक देती हैं।
असमानताएँ। सिलप्पादिकारम् के अनुसार पाण्ड्य सरदार सेनगुत्तुवन को हाथीदाँत, सुगंधित लकड़ी, चंदन, हल्दी, इलायची, काली मिर्च, नारियल, आम, गन्ना और वन्य पशु-पक्षी जैसी वन-पहाड़ की विलासिता की वस्तुएँ भेंट के रूप में दी जाती थीं, जिन्हें सरदार अपने समर्थकों में पुनर्वितरित करता था। इसके विपरीत, दंगुन गाँव प्रभावती गुप्त ने आचार्य चनालस्वामी को अग्रहार के रूप में दान किया था। उसके अभिलेख में गाँव की वस्तुएँ छूटों के रूप में आती हैं: घास, आसन के लिए जानवरों की खाल, कोयला, मदिरा, नमक, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध, साथ ही बड़े-छोटे सभी कर। ये रोज़मर्रा की ग्रामीण उपज और राजस्व-अधिकार हैं, न कि विलासिता की भेंट-वस्तुएँ।
निष्कर्ष। यह अंतर सरदार की भेंट-आधारित, पुनर्वितरणकारी अर्थव्यवस्था और राजा की भूमिदान व राजस्व-आधारित अर्थव्यवस्था के बीच के मूल भेद को उजागर करता है, जो अध्याय की धुरी है।
5 अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ
प्र. अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।
उत्तर:
1. तकनीकी सीमाएँ। अक्षर कभी-कभी बहुत हल्के उकेरे गए होते हैं, इसलिए पुनर्निर्माण अनिश्चित रहते हैं; अभिलेख क्षतिग्रस्त हो सकते हैं या उनमें अक्षर लुप्त हो सकते हैं; शब्दों का सटीक अर्थ हमेशा स्पष्ट नहीं होता, इसलिए विद्वान वैकल्पिक वाचन पर बहस करते रहते हैं।
2. अधूरा संग्रह। अब तक खोजे गए कई हज़ार अभिलेखों में से सभी को समझा, प्रकाशित या अनूदित नहीं किया गया है, और इससे कहीं अधिक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे।
3. गहरी सीमा। जो राजनीतिक-आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था, वह सब अभिलेखों में दर्ज ही नहीं हुआ; दैनिक कृषि-प्रथाओं और रोज़मर्रा जीवन के सुख-दुख का उल्लेख नहीं मिलता, क्योंकि अभिलेख भव्य, असाधारण घटनाओं पर केंद्रित होते हैं और हमेशा बनवाने वाले के ही दृष्टिकोण से लिखे जाते हैं।
6 मौर्य प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ
प्र. मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। असोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं?
उत्तर:
1. पाँच राजनीतिक केंद्र। अभिलेखों में मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्रों का नाम मिलता है: राजधानी पाटलिपुत्र, और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। स्थान चयन सोच-समझकर हुआ था: तक्षशिला और उज्जयिनी महत्वपूर्ण दूर-व्यापार मार्गों पर थे, और सुवर्णगिरि (‘सोने का पहाड़’) संभवतः कर्नाटक की सोने की खदानों के दोहन के लिए बसाया गया।
2. कोई एक समान प्रशासन नहीं। लगभग एक जैसा संदेश आज के पाकिस्तान से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक उकेरा गया, पर इतिहासकार अब मानते हैं कि एक समान व्यवस्था असंभव-सी थी, क्योंकि क्षेत्र (जैसे अफ़ग़ानिस्तान का पहाड़ी इलाक़ा बनाम उड़ीसा का तट) बहुत विविध थे। नियंत्रण संभवतः राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के आसपास सबसे मज़बूत था।
3. संचार और सेना। थल-नदी मार्गों से संचार अनिवार्य था, केंद्र से किसी प्रांत तक यात्रा में हफ़्तों-महीनों लग सकते थे। मेगस्थनीज़ एक समिति का वर्णन करता है जिसकी छह उपसमितियाँ सैन्य गतिविधियों का समन्वय करती थीं: नौसेना, परिवहन-रसद (जिसका दायित्व विभिन्न प्रकार का था), पैदल सैनिक, घुड़सवार, रथ और हाथी। यूनानी स्रोत मौर्य शासक को 6,00,000 पैदल सैनिक, 30,000 घुड़सवार और 9,000 हाथी होने का श्रेय देते हैं, यद्यपि कुछ इतिहासकार इसे अतिरंजित मानते हैं।
4. धम्म से जुड़ाव। असोक ने साम्राज्य को धम्म के प्रसार से भी जोड़े रखा, जिसके सिद्धांत सरल और सार्वभौमिक थे: बड़ों के प्रति सम्मान, ब्राह्मणों-सांसारिक त्यागियों के प्रति उदारता, दास-सेवकों के प्रति दयालुता, और अन्य धर्मों के प्रति सम्मान। संदेश फैलाने के लिए धम्म महामात्त नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए गए।
असोक के अभिलेखों में स्पष्ट तत्व। पाँचों राजनीतिक केंद्रों के आसपास और प्रमुख मार्गों पर मिलने वाले अभिलेख साम्राज्य के भौगोलिक विस्तार और नियंत्रण-प्रयास को स्पष्ट करते हैं। धम्म-प्रचार की व्यवस्था स्वयं अभिलेखों में दर्ज है, जैसे स्रोत 10 में वर्णित पतिवेदक व्यवस्था, जिसमें असोक कहता है कि उसे हर समय, कहीं भी प्रजा के मामलों की सूचना दी जाए। भाषा और लिपि की विविधता (अधिकतर प्राकृत-ब्राह्मी, उत्तर-पश्चिम में आरामाइक-यूनानी और खरोष्ठी) भी अभिलेखों से ही पता चलती है, जो क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप प्रशासन के लचीलेपन का प्रमाण है। हालाँकि अभिलेख यह नहीं बताते कि छह उपसमिति वाली सेना-व्यवस्था हर जगह वास्तव में कैसे काम करती थी, यह जानकारी मुख्यतः मेगस्थनीज़ से ही मिलती है।
7 डी.सी. सरकार का वक्तव्य
प्र. यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी.सी. सरकार का वक्तव्य है: ‘भारतीयों के जीवन, संस्कृति, और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है।’ चर्चा कीजिए।
उत्तर: यह प्रश्न संतुलित उत्तर माँगता है: अभिलेख बहुत कुछ दर्ज करते हैं, पर ‘हर पहलू’ नहीं।
1. सहमति में। अभिलेख राजाओं की विजयों और नीतियों को दर्ज करते हैं, जैसे असोक के कलिंग-अभिलेख में उसका पश्चाताप। ये भूमिदान (प्रभावती गुप्त का दंगुन-गाँव अनुदान), धार्मिक दान (दूसरी शताब्दी ई.पू. से मिलने वाले दानात्मक अभिलेख, जो धोबी, बुनकर, सुनार जैसे शिल्पकारों के नाम व व्यवसाय बताते हैं), प्रशासनिक कार्य (सुदर्शन झील अभिलेख, जिसमें रुद्रदमन प्रजा पर कर लगाए बिना मरम्मत का दावा करता है), व्यापार और श्रेणियाँ, तथा सामाजिक भेद (गहपति, वेल्लालर, उल्वर, अणिमई) तक व्यापक विषयों को समेटते हैं। प्रशस्तियाँ (प्रयाग प्रशस्ति) राजसत्ता की नई अवधारणाओं को दर्शाती हैं।
2. असहमति में। अभिलेख दैनिक कृषि-प्रथाओं और रोज़मर्रा जीवन के सुख-दुख का उल्लेख नहीं करते, क्योंकि ये भव्य, असाधारण घटनाओं पर केंद्रित होते हैं। ये हमेशा बनवाने वाले के ही दृष्टिकोण से लिखे जाते हैं, इसलिए इनमें व्यक्त विचारों की समीक्षा अन्य स्रोतों (जातक, पंचतंत्र) के परिप्रेक्ष्य में करनी होती है। असोक स्वयं दावा करता है कि पहले के शासकों ने रिपोर्ट प्राप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं की थी, एक ऐसा दावा जिसकी सत्यता इतिहासकारों को हर बार जाँचनी पड़ती है, जिससे स्पष्ट है कि अभिलेख का हर कथन शाब्दिक सत्य नहीं माना जा सकता।
3. तकनीकी और व्यावहारिक सीमाएँ। अक्षर हल्के उकेरे या क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, और अब तक खोजे गए कई हज़ार अभिलेखों में से सभी को समझा, प्रकाशित या अनूदित नहीं किया गया है, इससे अधिक अभिलेख रहे होंगे जो सुरक्षित ही नहीं बचे।
4. निष्कर्ष। इसलिए राजनीतिक-आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान अकेले अभिलेखशास्त्र से नहीं मिलता; इतिहासकारों की रुचियाँ भी समय के साथ बदली हैं, राजाओं से आर्थिक परिवर्तन और अब हाशिए पर पड़े समूहों की ओर, जिससे पुराने स्रोतों की नई जाँच होती रहती है। डी.सी. सरकार का कथन अभिलेखों की व्यापकता को सही रेखांकित करता है, पर इसे अभिलेखों की अंतर्निहित सीमाओं की समझ के साथ ही पढ़ना चाहिए।
8 मौर्योत्तर काल में राजत्व के विचार
प्र. उत्तर-मौर्य काल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: दूसरी शताब्दी ई.पू. तक उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में नए-नए शासक और रजवाड़े स्थापित होने लगे थे, और राजसत्ता की कई नई अवधारणाएँ विकसित हुईं।
1. दक्षिण के राजा और सरदार। तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य जैसी सरदारियाँ स्थिर और समृद्ध सिद्ध हुईं। सरदार अपने अधीनस्थों से भेंट प्राप्त करता था, राजाओं के विपरीत जो कर वसूलते थे, और अक्सर इसे अपने समर्थकों में पुनर्वितरित करता था। सिलप्पादिकारम् सरदार सेनगुत्तुवन को दी गई ऐसी वन-पहाड़ी भेंटों का वर्णन करता है। सातवाहन और शक जैसे शासक दूर-व्यापार से राजस्व पाते थे, इनकी सामाजिक उत्पत्ति अक्सर अस्पष्ट थी, और शक्तिशाली बनने पर इन्होंने विभिन्न तरीकों से सामाजिक प्रतिष्ठा का दावा किया।
2. दैविक राजा। उच्च प्रतिष्ठा का एक तरीका देवताओं से स्वयं को जोड़ना था। कुषाण (लगभग पहली शताब्दी ई.पू.-पहली शताब्दी ई.) इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं: उनकी विशाल मूर्तियाँ मथुरा के निकट माट और अफ़ग़ानिस्तान के मंदिरों में स्थापित थीं, और कई ने देवपुत्र, ‘ईश्वर का पुत्र’, की उपाधि अपनाई, संभवतः स्वयं को स्वर्ग-पुत्र कहने वाले चीनी शासकों से प्रेरित होकर। सिक्कों पर एक तरफ़ राजा और दूसरी तरफ़ किसी देवता को रखना स्वयं दैविक दर्जे का दावा था।
3. सामंत व्यवस्था। चौथी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य सहित फिर से बड़े राज्य बने, जो सामंतों पर निर्भर थे: ऐसे पुरुष जो स्थानीय संसाधनों से निर्वाह करते और श्रद्धांजलि व सैन्य सहायता देते थे। यह व्यवस्था दोनों ओर काम करती थी, एक शक्तिशाली सामंत राजा बन सकता था, और एक कमज़ोर शासक अधीनता में गिर सकता था।
4. प्रशस्तियों में अतिमानव प्रस्तुति। प्रशस्तियाँ, दरबारी कवियों की संस्कृत रचनाएँ, राजाओं की प्रशंसा में लिखी जाती थीं। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को पृथ्वी पर बिना प्रतिद्वंद्वी, कुबेर-वरुण-इंद्र-यम के समान बताया गया है। यह दावा शासक को हर प्रतिद्वंद्वी से परे रखता था, ऐसे समय में जब शक्तिशाली सामंत स्वयं राजा बन सकते थे, इसलिए कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजा स्वयं को उत्कृष्ट स्तर के मानव के रूप में प्रदर्शित करना चाहते थे क्योंकि उनका नियंत्रण ढीला होता जा रहा था और वे अपनी शक्ति का आडंबर प्रस्तुत करना चाहते थे।
9 कृषि-प्रथाओं में परिवर्तन
प्र. वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?
उत्तर: राजा ऊँचे कर माँगकर अपना ख़ज़ाना भरते थे, और किसानों की इस माँग से बचने की एक प्रतिक्रिया उत्पादन बढ़ाना थी, जिसने ग्रामीण जीवन को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया, यद्यपि यह बदलाव हर जगह एक समान नहीं था।
1. हल-कृषि। लोहे की नोक वाला हल-फल जलोढ़ मिट्टी को पलटता था, लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से। यह अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों, जैसे गंगा और कावेरी जैसी उपजाऊ नदी घाटियों, में सफल रहा, पर पंजाब और राजस्थान के अर्ध-शुष्क भागों के कृषकों ने इसे बीसवीं सदी तक नहीं अपनाया, और उत्तर-पूर्व व मध्य उपमहाद्वीप के पहाड़ी इलाक़ों में कुदाल-कृषि ही अधिक उपयुक्त रही।
2. रोपाई। पहले बीज बिखेरे जाते, फिर बड़ी पौध को जलभराव वाले खेतों में रोपा जाता, जिससे पौध ज़्यादा मात्रा में बच जाती थी और धान की उपज बढ़ जाती थी। इसने गंगा घाटी के कुछ भागों में धान का उत्पादन नाटकीय रूप से बढ़ाया, हालाँकि यह उत्पादक के लिए अत्यंत श्रमसाध्य काम था।
3. सिंचाई। कुएँ और तालाब, और कम सामान्यतः नहरें, समुदायों और व्यक्तियों दोनों द्वारा बनवाई गईं। सुदर्शन झील जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि शक्तिशाली पुरुष व राजा भी ऐसे कार्य करवाते और अभिलेखों में दर्ज कराते थे, प्रायः अपनी उदारता जताने के लिए।
4. असमान लाभ और ग्रामीण भेद। नई तकनीकों ने उत्पादन बढ़ाया, पर लाभ बहुत असमान रूप से बँटा। बड़े भूस्वामी और वंशानुगत गाँव-मुखिया अन्य कृषकों पर नियंत्रण रखते थे, जबकि छोटे किसान और भूमिहीन कृषि मज़दूर सबसे नीचे थे। गहपति परिवार का स्वामी था, और तमिल संगम साहित्य अपनी ही श्रेणियाँ बताता है: वेल्लालर (बड़े भूस्वामी), उल्वर (हलवाहक), अणिमई (दास)। इसीलिए विधि-ग्रंथों में भूमि की सीमाओं पर भी बहस होती थी, जैसा मनुस्मृति के छिपे सीमा-चिह्नों की सलाह से पता चलता है।
5. भूमिदान और नए ग्रामीण अभिजात। ईसा की आरंभिक शताब्दियों से भूमिदान शुरू हुए, अधिकतर ताम्रपत्रों पर, और धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों (अग्रहार) को दिए गए। प्रभावती गुप्त का दंगुन-गाँव अनुदान दिखाता है कि यह प्रक्रिया कृषि को नए क्षेत्रों में फैलाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती थी, या राजाओं के सामंतों पर नियंत्रण खोने का संकेत। साथ ही, पशुचारक, मछुआरे, आखेटक-संग्राहक और स्थानांतरी कृषक जैसे समूह प्रायः इन बदलावों और अधिकारियों की पहुँच, दोनों से बाहर ही रहे।
निष्कर्ष। इसलिए परिवर्तन गहरा था जहाँ भौगोलिक स्थितियाँ अनुकूल थीं (गंगा-कावेरी घाटियाँ), पर उपमहाद्वीप के बड़े हिस्सों में परंपरागत तरीक़े (कुदाल-कृषि, पशुचारण) बने रहे, जिससे 600 ई.पू. से 600 ई. तक का कृषि-परिदृश्य एक जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत असमान रहा।
10 मानचित्र कार्य
प्र. मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में असोक के कोई अभिलेख मिले हैं?
उत्तर: (पाठ्यपुस्तक के मानचित्र 1 और 2 सामने रखकर मिलाइए।) मानचित्र 2 में असोक के अभिलेख पश्चिमोत्तर में कंदहार से लेकर दक्षिण में ब्रह्मगिरि तक और पूर्व में कलिंग तक फैले हैं, और मानचित्र 1 के लगभग सभी महाजनपद इसी फैलाव के भीतर आते हैं। इसलिए सोलह महाजनपदों का लगभग पूरा क्षेत्र मौर्य साम्राज्य में शामिल रहा होगा। महाजनपदवार मिलान:
गांधार: शहबाज़गढ़ी और मानसेहरा के अभिलेख; प्रांतीय केंद्र तक्षशिला यहीं है।
कंबोज: पश्चिमोत्तर में कंदहार का अभिलेख इसी दिशा में आगे मिलता है।
कुरु: टोपरा, मेरठ और पास में कलसी।
मत्स्य: बैराट और भाब्रू।
वत्स: कौशाम्बी। काशी: सारनाथ।
वज्जि और मल्ल: रामपुरवा, लौरिया नंदनगढ़, लौरिया अरराज; पास में रुम्मिनदेई और निगालीसागर।
मगध: राजधानी पाटलिपुत्र, सहसराम और अहरौरा।
अवन्ति: प्रांतीय केंद्र उज्जयिनी, और पास में साँची।
चेदि: गुजर्रा इसी क्षेत्र के पास है।
पांचाल, शूरसेन, कोशल, अंग, अश्मक, वंग: ये भी साम्राज्य के फैलाव के भीतर आते हैं, पर मानचित्र 2 में इनकी राजधानियों (अहिच्छत्र, मथुरा, श्रावस्ती, चंपा) पर कोई अभिलेख अंकित नहीं है।
निष्कर्ष: हाँ, अधिकतर महाजनपदों के क्षेत्र में असोक के अभिलेख मिले हैं, विशेषकर गंगा घाटी के स्तंभ अभिलेख। साम्राज्य से बाहर सुदूर दक्षिण में चोल, केरलपुत्र और पांड्य मानचित्र 2 में अलग दिखाए गए हैं, और वहाँ कोई अभिलेख नहीं है।
11 परियोजना कार्य (कोई एक)
प्र. एक महीने के अखबार एकत्रित कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय में चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?
उत्तर (परियोजना कैसे करें): हर कतरन के लिए एक तालिका बनाइए: परियोजना (सड़क, पुल, बाँध, नहर आदि), वक्तव्य देने वाला अधिकारी, बताए गए संसाधन (धन, सामग्री, श्रमिक), संसाधन कैसे जुटाए गए (बजट, कर, ऋण), परियोजना का उद्देश्य, और प्रसार का माध्यम (अखबार, टीवी, वेबसाइट)। फिर अध्याय के अभिलेखों से तुलना कीजिए, विशेषकर सुदर्शन झील का अभिलेख (स्रोत 5), जिसमें रुद्रदमन दावा करता है कि उसने झील की मरम्मत अपने खर्चे से, प्रजा से कर लिए बिना करवाई। समानताएँ: दोनों में शासक या सरकार सार्वजनिक कार्य का श्रेय लेते हैं और अपनी उपलब्धि का प्रचार करते हैं; दोनों बनवाने वाले के ही दृष्टिकोण से लिखे जाते हैं। असमानताएँ: अभिलेख पत्थर पर स्थायी रूप से खुदे थे और कम लोग पढ़ पाते थे, जबकि आज के वक्तव्य अखबारों से बहुत से लोगों तक पहुँचते हैं; आज ख़र्च और संसाधनों का हिसाब देना पड़ता है, जबकि अभिलेख केवल शासक का दावा दर्ज करते थे। अंत में लिखिए कि दोनों प्रकार के स्रोतों को अन्य स्रोतों से जाँचना क्यों ज़रूरी है।
प्र. आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।
उत्तर (परियोजना कैसे करें): हर नोट और सिक्के के लिए अग्र भाग और पृष्ठ भाग पर दिखने वाली चीज़ें (चित्र, प्रतीक, लिपि, भाषाएँ, मूल्य), माप, आकार और धातु या काग़ज़ दर्ज कीजिए, और एक तालिका में समानताएँ और असमानताएँ लिखिए। फिर अध्याय के सिक्कों से तुलना कीजिए: आहत सिक्के (चाँदी और ताँबे के, प्रतीकों को ठोंककर बनाए गए), हिंद-यूनानी सिक्के (शासकों के नाम और प्रतिमा वाले पहले सिक्के, नाम यूनानी और खरोष्ठी में), कुषाण सिक्के (सोने के, अग्र भाग पर कनिष्क और पृष्ठ भाग पर देवता, आकार और वज़न रोमन व पार्थियन सिक्कों के समान), यौधेय सिक्के (ताँबे के, कबायली गणराज्य द्वारा जारी) और गुप्त सिक्के (अति उत्तम सोने के)। चर्चा कीजिए कि तब और अब सिक्के किस काम आते थे: विनिमय और व्यापार को सरल बनाना, शासक की सत्ता और पहचान का प्रचार, और (आज) राष्ट्रीय प्रतीकों का प्रदर्शन।
12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों, चित्रों व मानचित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।
प्र. ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ राज्य और नगर सर्वाधिक सघन रूप से बसे थे?
उत्तर: मानचित्र 1 में राज्य और उनकी राजधानियाँ सबसे सघन रूप से गंगा घाटी (उत्तर का मैदान) में बसे हैं: कुरु (इन्द्रप्रस्थ), पांचाल (अहिच्छत्र), शूरसेन (मथुरा), कोशल (श्रावस्ती), वत्स (कौशाम्बी), काशी (वाराणसी), मल्ल (कुशीनगर), वज्जि (वैशाली), मगध (राजगीर) और अंग (चंपा)। इसका कारण उपजाऊ कछारी भूमि और गंगा व उसकी उपनदियों से सस्ता आवागमन था। पश्चिमोत्तर (गांधार, कंबोज) और मध्य भारत (अवन्ति, चेदि) में राज्य कम हैं, और दक्षिण में केवल अश्मक दिखाया गया है।
प्र. मगध की सत्ता के विकास के लिए आरंभिक और आधुनिक लेखकों ने क्या-क्या व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं? ये एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं।
उत्तर: आधुनिक इतिहासकार भौगोलिक और आर्थिक कारण बताते हैं: मगध क्षेत्र में खेती की उपज ख़ास तौर पर अच्छी होती थी; लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) आसानी से उपलब्ध थीं जिससे उपकरण और हथियार बनाना सरल था; जंगली क्षेत्रों में हाथी मिलते थे जो सेना के महत्वपूर्ण अंग थे; और गंगा व उसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ था। आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक मगध की महत्ता का कारण विभिन्न शासकों की नीतियों को बताते हैं: बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे अत्यंत महत्त्वाकांक्षी राजा, और उनकी नीतियाँ लागू करने वाले मंत्री। अंतर: आधुनिक व्याख्या संसाधनों और भूगोल पर आधारित है, जबकि आरंभिक लेखक व्यक्तियों (राजाओं और मंत्रियों) को श्रेय देते हैं।
प्र. इन दीवारों का निर्माण क्यों किया गया?
उत्तर: राजगाह (राजगीर) मगध की प्रारंभिक राजधानी थी और पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर था। महाजनपदों की राजधानियाँ प्रायः किले से घेरी जाती थीं, क्योंकि पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना एक वैध उपाय माना जाता था। दीवारें राजधानी, राजा, उसके कोष और सेना की रक्षा करती थीं, और शासक की शक्ति का प्रदर्शन भी करती थीं।
प्र. सिंह शीर्ष को आज महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
उत्तर: सारनाथ के असोक-स्तंभ का सिंह शीर्ष आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक (राजचिह्न) है, जो सरकारी मुहरों, नोटों और सिक्कों पर दिखता है। यह मौर्यकालीन प्रस्तर मूर्तिकला की उस अद्भुत कला का प्रमाण है जिसे साम्राज्य की पहचान माना जाता है, और असोक से जुड़ा है, जिन्हें बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने प्रेरणा का स्रोत माना।
प्र. क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्र शासकों के अधीन नहीं थे वहाँ भी उन्होंने अभिलेख उत्कीर्ण करवाए होंगे?
उत्तर: हाँ, यह संभव है। असोक के अभिलेख मुख्यतः धम्म के प्रचार के संदेश थे, और ऐसे संदेश व्यापार-मार्गों, सीमांत क्षेत्रों या पड़ोसी इलाकों में भी लोगों तक पहुँचाने के लिए उत्कीर्ण करवाए जा सकते थे। अध्याय स्वयं बताता है कि साम्राज्य की सीमा के भीतर भी नियंत्रण एकसमान नहीं था और सबसे प्रबल नियंत्रण राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के आसपास रहा होगा। इसलिए केवल किसी स्थान पर अभिलेख मिलने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह क्षेत्र पूरी तरह शासक के प्रशासन में था।
प्र. विभिन्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अधिकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था?
उत्तर: ये अधिकारी कर वसूली करते थे, इसलिए भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों पर निगरानी राज्य की आय सुनिश्चित करती थी। लकड़हारे, बढ़ई, लोहार और खननकर्ता लकड़ी, लोहा और खनिज जैसे संसाधन देते थे, जो उपकरण, हथियार और सेना के लिए ज़रूरी थे। नदियों, भूमि-मापन और नहरों के मुखद्वार की देख-रेख से हर स्थान पर पानी की समान पूर्ति होती थी, और शिकारियों को इनाम या दंड देकर वन-संपदा पर नियंत्रण रखा जाता था।
प्र. मेगस्थनीज़ और अर्थशास्त्र से उद्धृत अंशों को पुनः पढ़िए। मौर्य शासन के इतिहास लेखन में ये ग्रंथ कितने उपयोगी हैं?
उत्तर: उपयोगिता: मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत थे, इसलिए उनका विवरण समकालीन है; इससे अधिकारियों के कार्यों (नदियों की देख-रेख, भूमि मापन, कर वसूली) और सेना की एक समिति व छः उपसमितियों का पता चलता है। अर्थशास्त्र सैनिक और प्रशासनिक संगठन के विस्तृत विवरण देता है, जैसे हाथी पकड़ने का तरीका। सीमाएँ: मेगस्थनीज़ के विवरण के आज कुछ अंश ही उपलब्ध हैं और वे एक विदेशी की दृष्टि से लिखे गए हैं (जैसे वे मिस्र से तुलना करते हैं); अर्थशास्त्र के केवल कुछ भागों की रचना संभवतः कौटिल्य ने की थी, और यह नियम बताता है, यह नहीं कि वास्तव में हर जगह क्या होता था; यूनानी स्रोतों के सेना के आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं। इसलिए इन ग्रंथों को असोक के अभिलेखों और पुरातात्विक प्रमाणों से मिलाकर ही उपयोग करना चाहिए।
प्र. यदि यूनानी विवरण सही है, तो बताइए कि इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी?
उत्तर: छः लाख पैदल सैनिकों, तीस हज़ार घुड़सवारों और नौ हज़ार हाथियों के लिए भारी संसाधन चाहिए थे: सैनिकों के वेतन के लिए बड़ा राजकोष, यानी किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से नियमित कर; सैनिकों के लिए भारी मात्रा में अनाज और जानवरों के लिए चारा; जंगलों से पकड़े गए हाथी और घोड़े; लोहे की खदानों से हथियार और उपकरण; उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ; और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक व शिल्पकार, जिनकी व्यवस्था मेगस्थनीज़ की दूसरी उपसमिति करती थी।
प्र. लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे?
उत्तर: स्रोत के अनुसार लोग ‘ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं’ उपहार लाए, यानी सरदार सेनगुत्तुवन के प्रति सम्मान और अधीनता प्रकट करने के लिए। सरदार कर नहीं वसूलता था, वह अपने अधीन लोगों से भेंट लेता था। वह इन उपहारों को अपने समर्थकों में वितरित करता होगा, जिससे उनकी निष्ठा बनी रहती, और कुछ का उपयोग अनुष्ठानों और अपने उपभोग में करता होगा। हाथी दाँत, चंदन, इलायची और मिर्च जैसी वस्तुएँ व्यापार में भी मूल्यवान थीं।
प्र. राजा को किस प्रकार दर्शाया गया है?
उत्तर: सिक्के के अग्र भाग पर राजा कनिष्क खड़ी मुद्रा में दिखाए गए हैं: लंबा कोट और ऊँचे जूते पहने, एक हाथ में लंबा दंड या भाला लिए और दूसरा हाथ एक छोटी वेदी की ओर बढ़ाए हुए, चारों ओर लिखावट के साथ। पृष्ठ भाग पर एक देवता हैं। एक ओर राजा और दूसरी ओर देवता को दिखाकर राजा को देवताओं से जोड़ा गया है, जो कुषाणों के ‘देवपुत्र’ जैसे दैविक दावे से मेल खाता है।
प्र. इस मूर्ति में ऐसी क्या विशेषताएँ हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि यह एक राजा की मूर्ति है?
उत्तर: बलुआ पत्थर की यह मूर्ति विशालकाय है; व्यक्ति सामने की ओर सीधा, गरिमापूर्ण मुद्रा में खड़ा है; उसने मध्य एशियाई शासकों जैसा भारी लंबा कोट और बड़े जूते पहने हैं; उसके हाथों में बड़ी तलवार और एक दंड है, जो शक्ति के प्रतीक हैं; और उसके वस्त्र पर एक अभिलेख उत्कीर्ण है। मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की ऐसी ही विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं।
प्र. राजाओं ने दिव्य स्थिति का दावा क्यों किया?
उत्तर: उच्च स्थिति प्राप्त करने का एक साधन देवी-देवताओं के साथ जुड़ना था। कुषाणों जैसे शासकों की सामाजिक उत्पत्ति प्रायः अस्पष्ट थी, इसलिए दैविक दावा उन्हें प्रजा की दृष्टि में वैधता और सम्मान देता था; कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ की उपाधि लगाई और देवस्थानों पर अपनी विशालकाय मूर्तियाँ लगवाईं। गुप्त काल में राज्य सामंतों पर निर्भर थे, और शक्तिशाली सामंत राजा भी बन जाते थे; प्रयाग प्रशस्ति जैसा दावा, जिसमें समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताया गया, राजा को हर प्रतिद्वंद्वी से ऊपर दिखाता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार जब राजाओं का नियंत्रण ढीला हो रहा था, तब वे अपनी शक्ति का आडंबर प्रस्तुत करना चाहते थे।
प्र. शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए?
उत्तर: सिंचाई से खेती की उपज बढ़ती थी, और अधिक उपज का अर्थ था राजा के लिए अधिक कर। सुदर्शन झील जैसे जलाशय सूखे क्षेत्रों में भी खेती संभव बनाते थे। साथ ही ऐसे कार्य शासक की उदारता और शक्ति का प्रचार करते थे: रुद्रदमन ने अपने अभिलेख में यह दर्ज करवाया कि उसने झील की मरम्मत अपने खर्चे से और प्रजा से कर लिए बिना करवाई। अध्याय बताता है कि सिंचाई साधन बनवाने वाले व्यक्ति प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में करवाया।
प्र. क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे?
उत्तर: पूरी तरह नहीं। ज़मीन में गाड़े गए पत्थर, हड्डियाँ, राख, खपटे, कोयला जैसे चिह्न समय के साथ नष्ट न होने वाले थे और खुदाई करके सीमा का प्रमाण दे सकते थे, इसलिए वे कुछ हद तक उपयोगी थे। पर वे छिपे हुए थे, इसलिए सामान्य लोग उन्हें देख नहीं सकते थे; उन्हें हटाया या दूसरी जगह गाड़ा जा सकता था; और कोई लिखित अभिलेख या नक्शा न होने से विवाद की स्थिति में यह याद रखने वालों की गवाही पर निर्भर था। इसलिए विवादों के हल के लिए गवाहों, ग्राम प्रधानों और राजा के निर्णय की भी ज़रूरत पड़ती रही होगी।
प्र. इस अंश में वर्णित लोगों को व्यवसाय के आधार पर आप कैसे वर्गीकृत करेंगे?
उत्तर: कृषक: छोटे किसान जिन्होंने धान की उपज वाली, खलिहान और उपजाऊ भूमि आपस में बाँट ली थी और जो कुदाल से खेती करते थे। वन-उत्पाद संग्राहक: पेड़ की छाल, फूल, अलसी और सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास इकट्ठा करके ढोने वाले लोग। विक्रेता (व्यापार): ग्रामीण महिलाएँ जो जंगल से एकत्र फलों की टोकरियाँ सिर पर रखकर रास्ते के गाँवों में बेचने जाती थीं।
प्र. इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं?
उत्तर: अभिलेख में जिन वस्तुओं को देने से छूट दी गई है, उनसे पता चलता है कि दंगुन गाँव में ये वस्तुएँ पैदा होती थीं: घास, जानवरों की खाल (आसन के लिए), कोयला, मदिरा, नमक (खुदाई से), खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध। अनुदान ‘बड़े-छोटे सभी करों सहित’ किया गया था, जिससे पता चलता है कि गाँव में खेती भी होती थी।
प्र. यह पता कीजिए कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई, तथा धान की रोपाई की जाती है? और अगर नहीं तो क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ हैं।
उत्तर (कैसे करें): यह अपने राज्य के बारे में स्वयं पता लगाने का कार्य है। किसानों से बात करके या कृषि विभाग की जानकारी से तीन बातें पता कीजिए: खेत की जुताई किससे होती है (बैलों से हल, ट्रैक्टर या कुदाल); सिंचाई के साधन क्या हैं (कुएँ, नलकूप, तालाब, नहरें या केवल वर्षा); और क्या धान की रोपाई होती है या बीज सीधे बोए जाते हैं। फिर अध्याय से तुलना कीजिए: लोहे के फाल वाला हल भारी वर्षा वाली उपजाऊ घाटियों में फैला, पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क क्षेत्रों में इसका प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ, और पूर्वोत्तर व मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल अधिक उपयोगी थी। जहाँ हल, सिंचाई या रोपाई नहीं होती, वहाँ की वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे वर्षा पर निर्भर खेती, कुदाल से खेती या झूम खेती) का कारण भी लिखिए।
प्र. तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली क्या वहाँ कोई नगर थे?
उत्तर: मानचित्र 3 के अधिकांश नगर गंगा घाटी और उसके पूर्व व दक्षिण में हैं (श्रावस्ती, कन्नौज, मथुरा, कौशाम्बी, वाराणसी, वैशाली, पाटलिपुत्र, राजगीर, महास्थान, चंद्रकेतुगढ़, विदिशा, उज्जयिनी, पैठन, धान्यकटक, शिशुपालगढ़, कोडूमनाल, पुहार)। जिस क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता फैली थी (सिंधु घाटी, पंजाब, गुजरात), वहाँ इस मानचित्र में केवल कुछ नगर हैं, जैसे पश्चिमोत्तर में तक्षशिला और गुजरात तट पर भरूकच्छ। इससे पता चलता है कि इस काल में नगरों का केंद्र सिंधु क्षेत्र से हटकर गंगा घाटी की ओर आ गया था।
प्र. लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी?
उत्तर: लेखक एक यूनानी समुद्र यात्री था। पेरिप्लस (समुद्री यात्रा) व्यापारियों के लिए एक मार्गदर्शक जैसा विवरण था, जो बताता था कि मालाबार तट के बाज़ार वाले नगरों में कौन-सी वस्तुएँ (सिक्के, पुखराज, मूँगे, कच्चा शीशा, ताँबा, टिन, सीसा) बेची जा सकती हैं और वहाँ से कौन-सी वस्तुएँ (काली मिर्च, दाल चीनी, मोती, हाथी दाँत, रेशमी वस्त्र, पारदर्शी पत्थर, हीरे) खरीदी जा सकती हैं। यह सूची लाल सागर से भारत आने वाले व्यापारियों को लाभदायक व्यापार की योजना बनाने में मदद करती थी।
प्र. व्यापार में विनिमय के लिए क्या-क्या प्रयोग होता था? उल्लिखित स्रोतों से किस प्रकार के विनिमय का पता चलता है। क्या कुछ विनिमय ऐसे भी हैं जिनका ज्ञान स्रोतों से नहीं हो पाता है?
उत्तर: विनिमय के साधन: सिक्के (चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के, हिंद-यूनानी, कुषाण और गुप्त सोने के सिक्के, यौधेयों के ताँबे के सिक्के, दक्षिण भारत में मिले रोमन सिक्के) और वस्तुओं के बदले वस्तुएँ। स्रोतों से पता चलने वाले विनिमय: पेरिप्लस से विदेशी व्यापारियों द्वारा सिक्के और धातुएँ देकर काली मिर्च, मोती, पत्थर लेना (लंबी दूरी का समुद्री व्यापार); सिलप्पादिकारम् से सरदार को भेंट; हर्षचरित से गाँव की महिलाओं द्वारा फल बेचना (स्थानीय व्यापार); और रोमन सिक्कों के भंडार से दक्षिण भारत और रोम का व्यापार। जिनका ज्ञान नहीं हो पाता: वस्तुओं के वास्तविक मूल्य और भाव, ऋण और उधार का लेन-देन, फेरीवालों और छोटे बाज़ारों का रोज़मर्रा का विनिमय, और श्रेणियों के भीतर का लेन-देन; अध्याय यह भी बताता है कि छठी शताब्दी ई. के बाद सिक्के कम मिलने से यह स्पष्ट नहीं होता कि व्यापार घटा या सिक्के प्रचलन में ही रहे।
प्र. क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं?
उत्तर: चित्र 2.11 में क, च, ढ, द, म और र के ब्राह्मी रूप दिए गए हैं। कुछ अक्षर मिलते-जुलते हैं: ब्राह्मी ‘क’ (खड़ी और आड़ी रेखा का क्रॉस) देवनागरी ‘क’ की बीच की खड़ी रेखा व आड़ी रेखा में दिखता है; ब्राह्मी ‘ढ’ और ‘द’ के घुमावदार रूप देवनागरी के इन अक्षरों से कुछ मिलते हैं; और ब्राह्मी ‘र’ एक खड़ी रेखा है। कुछ भिन्न हैं: ब्राह्मी ‘म’ और ‘च’ देवनागरी रूपों से बहुत अलग दिखते हैं, और ब्राह्मी में देवनागरी जैसी ऊपर की शिरोरेखा नहीं है। यह समानता इसलिए है क्योंकि आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है।
प्र. अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक शब्द का अर्थ संवाददाता बताया है। आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे?
उत्तर: पतिवेदक राजा के अधिकारी थे, जो लोगों के समाचार और मामले केवल राजा तक पहुँचाते थे, और वह भी हर समय, चाहे राजा खाना खा रहा हो, अन्तःपुर में हो या पालकी में; उद्देश्य था कि राजा हर स्थल पर लोगों के विषयों का निराकरण कर सके। आधुनिक संवाददाता किसी अखबार या चैनल के लिए काम करता है और समाचार आम जनता तक पहुँचाता है; वह सरकार के कार्यों पर प्रश्न भी उठा सकता है। इस प्रकार पतिवेदक शासन के लिए सूचना देने वाले सरकारी कर्मचारी थे, जबकि संवाददाता जनता के लिए स्वतंत्र रूप से समाचार देता है।
प्र. मानचित्र 2 देखिए और असोक के अभिलेख के प्राप्ति स्थान की चर्चा कीजिए। क्या उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है?
उत्तर: हाँ, कुछ स्पष्ट प्रारूप दिखते हैं। (1) महाशिलालेख प्रायः साम्राज्य के सीमांत और तटीय क्षेत्रों में हैं: पश्चिमोत्तर में कंदहार, शहबाज़गढ़ी और मानसेहरा; पश्चिम में गिरनार और सोपारा; पूर्वी तट पर कलिंग में शिशुपालगढ़ और जौगड़; दक्षिण में सन्नति; और उत्तर में कलसी। (2) स्तंभ अभिलेख अधिकतर गंगा घाटी में, राजधानी पाटलिपुत्र के आसपास के केंद्रीय क्षेत्र में हैं (टोपरा, मेरठ, निगालीसागर, रुम्मिनदेई, रामपुरवा, लौरिया नंदनगढ़, लौरिया अरराज, सारनाथ, कौशाम्बी), और साँची में भी। (3) लघुशिलालेख कर्नाटक क्षेत्र में घने समूह में हैं (मास्की, गावीमठ, पाल्कीगुंडु, जतिंग रामेश्वर, सिद्दपुर, उदेगोलाम, राजुलमंडगिरि, नित्तूर, ब्रह्मगिरि), जो सोने की खदानों वाले प्रांतीय केंद्र सुवर्णगिरि के पास हैं, और राजस्थान में बैराट-भाब्रू जैसे स्थलों पर। (4) अनेक अभिलेख महत्वपूर्ण नगरों और व्यापार-मार्गों के पास हैं, जहाँ अधिक लोग उन्हें देख सकते थे।