कक्षा 12 इतिहास अध्याय 2 राजा, किसान और नगर शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

आख़िरी वक़्त की रिवीज़न के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, ज़रूरी तथ्य, तारीख़ें और तालिकाएँ। पूरी व्याख्या वाले विस्तृत नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 पूरा अध्याय एक फ़्रेम में

राजा, किसान और नगर (लगभग 600 ई.पू.-600 ई.)
राज्यसोलह महाजनपद → मौर्य साम्राज्य → मौर्योत्तर सरदारी, दैविक राजा, सामंत
किसानहल-कृषि, रोपाई, सिंचाई, भूमिदान से ग्रामीण भेद
नगरनगरीकरण, श्रेणियाँ, सिक्के, रोम तक व्यापार
स्रोत क्या बताता है
अभिलेख असोक के शिलालेख, भूमिदान, दानात्मक अभिलेख, प्रशस्तियाँ
ग्रंथ बौद्ध-जैन ग्रंथ, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, जातक, संगम काव्य
सिक्के आहत (पंच-मार्क्ड), हिंद-यूनानी, कुषाण, यौधेय, गुप्त
दृश्य सामग्री मूर्तिकला, सिक्कों की आकृतियाँ, उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र

2 याद रखने लायक़ आँकड़े

16महाजनपद (छठी शताब्दी ई.पू.)
5मौर्य साम्राज्य के प्रमुख राजनीतिक केंद्र
1838जेम्स प्रिंसेप द्वारा असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकालना
आँकड़ा किस बात का
150 वर्ष मौर्य साम्राज्य की कुल आयु (लगभग 321-185 ई.पू.)
1,50,000 निर्वासित / 1,00,000 मृत कलिंग-युद्ध के बाद असोक के अभिलेख का दावा
6,00,000 पैदल / 30,000 घुड़सवार / 9,000 हाथी यूनानी स्रोतों के अनुसार मौर्य सेना (कुछ इतिहासकारों को अतिरंजित)
8,000+ कोलिन मैकेंज़ी द्वारा एकत्र संस्कृत और तमिल भाषा के अभिलेख (1810 का दशक)
250 ई.पू. का ‘अ’ पुरालिपिशास्त्र (palaeography) से लिपि की तिथि जानने का उदाहरण

3 तारीख़ें एक नज़र में

तारीख़ क्या हुआ
लगभग 600-500 ई.पू. धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के
लगभग 327-325 ई.पू. सिकंदर का आक्रमण
लगभग 321 ई.पू. चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण
लगभग 272/268-231 ई.पू. असोक का शासनकाल; कलिंग-विजय शासन के आठवें वर्ष में
लगभग 185 ई.पू. मौर्य साम्राज्य का अंत
लगभग 200 ई.पू.-200 ई. हिंद-यूनानी, चोल-चेर-पांड्य, सातवाहन, शक शासन; रोमन व्यापार; स्वर्ण मुद्रा
लगभग 78 ई.? कनिष्क का राज्यारोहण (तिथि अनिश्चित)
लगभग 320 ई. गुप्त शासन का आरंभ
लगभग 335-375 ई. समुद्रगुप्त; प्रयाग प्रशस्ति
लगभग 606-647 ई. कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; श्वैन त्सांग की यात्रा
लगभग 712 ई. अरबों की सिंध पर विजय
1784 एशियाटिक सोसाइटी (बंगाल) की स्थापना
1838 जेम्स प्रिंसेप द्वारा असोक-ब्राह्मी का वाचन
1965-66 डी.सी. सरकार की इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लॉसरी

4 सभी परिभाषाएँ एक जगह

शब्द अर्थ
अभिलेखशास्त्र (epigraphy) अभिलेखों का अध्ययन
पुरालिपिशास्त्र (palaeography) लेखन-शैलियों के अध्ययन से बिना-तिथि अभिलेखों की तिथि जानना
जनपद / महाजनपद वह भूमि जहाँ कोई जन बसता है / एक बड़ा जनपद
कुलीनतंत्र (गण/संघ) शासन का वह रूप जिसमें सत्ता कुछ पुरुषों के समूह द्वारा चलाई जाती है
धम्म (असोक का) बड़ों के प्रति सम्मान, उदारता, दयालुता और अन्य धर्मों के प्रति सम्मान का सिद्धांत
सरदार (chief) वंशानुगत हो भी सकता है और नहीं भी; भेंट प्राप्त कर पुनर्वितरित करता है, कर नहीं वसूलता
प्रशस्तियाँ कवियों द्वारा संस्कृत में राजाओं की प्रशंसा में रची गई काव्य-रचनाएँ
गहपति परिवार का स्वामी या मुखिया, संसाधनों का नियंत्रक
अग्रहार ब्राह्मण को दिया गया भूमिदान, प्रायः राजस्व-मुक्त
श्रेणियाँ (guilds) शिल्प-उत्पादकों और व्यापारियों के संगठन
दानात्मक अभिलेख (votive inscriptions) धार्मिक संस्थाओं को दिए गए उपहार दर्ज करने वाले अभिलेख
मुद्राशास्त्र (numismatics) सिक्कों का अध्ययन: लिपि, आकृति, धातु-विश्लेषण, प्राप्ति-स्थल
देवपुत्र ‘ईश्वर का पुत्र’, कुषाण शासकों की उपाधि

5 तमिल संगम ग्रामीण वर्ग

वर्ग अर्थ
वेल्लालर बड़े भूस्वामी
उल्वर हलवाहक
अणिमई दास

6 सिक्कों का क्रम

काल सिक्के
लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से आहत सिक्के (चाँदी-ताँबा, प्रतीक ठोंके/मुद्रित)
लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. हिंद-यूनानी: राजा के नाम-चित्र वाले पहले सिक्के
लगभग पहली शताब्दी ई. कुषाण: पहले स्वर्ण सिक्के, सबसे बड़े भंडार
लगभग पहली शताब्दी ई. यौधेय: जनजातीय गणराज्य के ताँबे के सिक्के
लगभग 320 ई. से गुप्त: शुद्धता के लिए उल्लेखनीय स्वर्ण सिक्के

7 फटाफट पुनरावृत्ति · परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें

1830 के दशक में प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी और खरोष्ठी के वाचन (असोककालीन ब्राह्मी 1838 में) ने आरंभिक भारतीय राजनीतिक इतिहास को पठनीय बनाया, और पियदस्सी को असोक के रूप में पहचाना। छठी शताब्दी ई.पू. तक सोलह महाजनपद बने, अधिकतर राजतंत्र, कुछ गण/संघ। मगध उपजाऊ कृषि, लोहे, हाथियों और गंगा के कारण, या महत्वाकांक्षी राजाओं के कारण जीता, यह इस पर निर्भर है कि आप कौन-सा स्रोत मानते हैं। मौर्य साम्राज्य के पाँच राजनीतिक केंद्र थे और कोई एक समान प्रशासन नहीं था; असोक ने इसे धम्म और धम्म महामात्तों से जोड़े रखा। यह केवल लगभग 150 वर्ष चला और कभी पूरे उपमहाद्वीप को नहीं ढका। सरदार भेंट प्राप्त करते और पुनर्वितरित करते थे; राजा कर वसूलते थे। कुषाणों ने विशाल मूर्तियों और देवपुत्र उपाधि से दिव्यता का दावा किया; गुप्तों की प्रशस्तियों में प्रशंसा हुई। लोहे के हल-फल, रोपाई और सिंचाई से ग्रामीण जीवन बदला, पर असमान रूप से, जिससे गहपति, वेल्लालर, उल्वर और अणिमई जैसे वर्ग बने। भूमिदान या तो कृषि-विस्तार के प्रमाण के रूप में पढ़े जाते हैं या राजाओं के सामंतों पर नियंत्रण खोने के प्रमाण के रूप में। नगरों में श्रेणियाँ और नामित व्यवसायों की लंबी सूची थी; व्यापार रोम तक पहुँचता था, और दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों के भंडार सिद्ध करते हैं कि व्यापार राजनीतिक सीमाएँ पार करता था। अभिलेख शक्तिशाली पर आंशिक हैं: वे बनवाने वाले के दृष्टिकोण से भव्य घटनाएँ दर्ज करते हैं, सामान्य जीवन को पूरी तरह छोड़ देते हैं।