इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. “महान परंपरा” और “लघु परंपरा” शब्द किसने गढ़े?
उत्तर: समाजशास्त्री रॉबर्ट रेडफ़ील्ड ने ये शब्द गढ़े।
प्र. सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति में क्या अंतर है?
उत्तर: सगुण भक्ति किसी विशेष देवता की मानवाकार रूप में पूजा है; निर्गुण भक्ति एक अमूर्त, निराकार ईश्वर की पूजा है।
प्र. ख़ानक़ाह किसे कहते हैं?
उत्तर: ख़ानक़ाह सूफ़ियों की धर्मशाला है, जिसका नेतृत्व एक शेख़ या पीर/मुर्शीद करते थे।
प्र. सिलसिला शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: सिलसिला का शाब्दिक अर्थ “श्रृंखला” है, जो पैग़ंबर तक जाने वाली अटूट आध्यात्मिक वंशावली को दर्शाता है।
प्र. ख़ालसा पंथ के पाँच प्रतीकों (पाँच ककार) के नाम लिखिए।
उत्तर: बिना कटे बाल (केश), कटार (कृपाण), कच्छा, कंघा, और लोहे का कड़ा।
प्र. जज़िया क्या था?
उत्तर: जज़िया वह कर था जो ज़िम्मी (संरक्षित ग़ैर-मुस्लिम) मुस्लिम शासन के अंतर्गत संरक्षण के बदले चुकाते थे।
प्र. वली और औलिया शब्दों का क्या अर्थ है?
उत्तर: वली (बहुवचन औलिया) का अर्थ है “ईश्वर का मित्र” है, ऐसे शेख़ को इस रूप में पूजा जाता था।
प्र. लंगर और फ़ुतूह क्या हैं?
उत्तर: लंगर चिश्ती ख़ानक़ाहों की खुली रसोई थी, जो फ़ुतूह (बिना माँगे दान) पर चलती थी।
प्र. उर्स किसे कहते हैं?
उत्तर: उर्स किसी शेख़ की मृत्यु-वर्षगाँठ है, जो इस विश्वास पर मनाई जाती थी कि संत मृत्यु में ईश्वर से मिलन पाते हैं।
प्र. जीनन किसे कहते हैं?
उत्तर: जीनन खोजा (एक इस्माइली शिया शाखा) द्वारा रचित भक्ति-गीत हैं, जिनके माध्यम से विचार फैलाए जाते थे।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. बे-शरिया और बा-शरिया सूफ़ियों में क्या अंतर है?
उत्तर: बे-शरिया सूफ़ी (जैसे क़लंदर, मदारी, मलंग, हैदरी) शरिया की खुली अवहेलना करते थे और भिक्षाटन-ब्रह्मचर्य के लिए ख़ानक़ाह को अस्वीकार करते थे। बा-शरिया सूफ़ी शरिया का पालन करते हुए ख़ानक़ाह-केंद्रित जीवन जीते थे।
प्र. मल्फ़ूज़ात और मक़तूबात में क्या अंतर है?
उत्तर: मल्फ़ूज़ात (“कथित”) सूफ़ी संतों की बातचीत के संकलन हैं, शेख़ की अनुमति से शिष्यों द्वारा तैयार। मक़तूबात (“लिखित”) सूफ़ी गुरुओं से शिष्यों को लिखे पत्र हैं।
प्र. तवरम क्या था, और यह कैसे संकलित हुआ?
उत्तर: तवरम अप्पार, संबंदर और सुंदरार के शिव-भक्ति पदों का संकलन है, जो संगीत के अनुसार वर्गीकृत कर दसवीं सदी में तैयार किया गया।
प्र. इस्लाम के पाँच स्तंभ कौन-कौन से हैं?
उत्तर: शहादा (एक ईश्वर व मुहम्मद उनके संदेशवाहक की गवाही), नमाज़/सलात (दिन में पाँच बार प्रार्थना), ज़कात (दान), सौम (रमज़ान में रोज़ा), और हज (मक्का की तीर्थयात्रा)।
प्र. आठवीं-चौदहवीं सदी में मुसलमानों को किन नामों से पुकारा जाता था?
उत्तर: तुरुष्क (तुर्क), ताजिक (ताजिकिस्तान), पारसीक (फ़ारस), पुराने प्रयुक्त लेबल शक या यवन, और अधिक सामान्य शब्द म्लेच्छ (जो बताता था कि वे वर्ण-नियमों का पालन नहीं करते और संस्कृत से न उपजी भाषाएँ बोलते हैं)।
प्र. ज़िक्र और समा में क्या अंतर है?
उत्तर: ज़िक्र दैवी नामों का पाठ है, जबकि समा (“श्रवण”) रहस्यवादी संगीत के माध्यम से दैवी परमानंद जगाने की प्रथा है; दोनों क़व्वाली के केंद्र में थे।
प्र. उलटबाँसी किसे कहते हैं?
उत्तर: उलटबाँसी (“उलटी बातें”) कबीर के पदों में मिलने वाली उक्तियाँ हैं जो रोज़मर्रा के अर्थ को उलट देती हैं (जैसे “बिना फूल खिलता कमल”) ताकि उस यथार्थ की ओर इशारा किया जा सके जिसे साधारण शब्द नहीं पकड़ सकते।
प्र. ख़ालसा पंथ की स्थापना किसने और क्यों की?
उत्तर: दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने ख़ालसा पंथ की स्थापना की, अपने पाँच प्रतीकों सहित, ताकि सिख समुदाय को एक सामाजिक-धार्मिक और सैन्य शक्ति के रूप में सुदृढ़ किया जा सके।
प्र. उपमहाद्वीप की मस्जिदों की सार्वभौमिक और स्थानीय रूप से भिन्न विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: सार्वभौमिक: मक्का की ओर दिशा-निर्धारण, मेहराब (प्रार्थना-आला) और मिंबर (मंच)। स्थानीय रूप से भिन्न: छत की शैली और निर्माण-सामग्री, जैसे ईंट की अतिया मस्जिद (बांग्लादेश) या कश्मीरी लकड़ी की शाह हमदान मस्जिद।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. उदाहरण सहित समझाइए कि इतिहासकारों का पूजा प्रणालियों के समन्वय से क्या अभिप्राय है।
उत्तर: इतिहासकार दो साथ-साथ चलती प्रक्रियाओं की बात करते हैं। पहली, ब्राह्मणीय विचार सोच-समझकर फैलाए गए, सरल संस्कृत श्लोकों में रचित पौराणिक ग्रंथों के माध्यम से जो स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी सुलभ थे। दूसरी, ब्राह्मणों ने अन्य सामाजिक समूहों के स्थानीय विश्वासों को आत्मसात कर उन्हें नया रूप दिया, जैसे पुरी में स्थानीय आदिवासी देवता जगन्नाथ को विष्णु का रूप मान लिया गया, और आम देवी-पत्थर पूजा को लक्ष्मी या पार्वती की पूजा के बराबर मान लिया गया। इसी द्विदिशीय प्रक्रिया, फैलाव और आत्मसातीकरण, को इतिहासकार “समन्वय” कहते हैं।
प्र. अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किन तरीकों से जाति-व्यवस्था की आलोचना की?
उत्तर: अलवार-नयनार में भक्त ब्राह्मणों, शिल्पियों, कृषकों और “अस्पृश्य” जातियों तक से आए, और उनकी रचनाओं को वेदों के समान माना गया (नलयिरादिव्यप्रबंधम् को “तमिल वेद” कहा गया)। इस तरह जाति-सीमा को पार करने वाली भक्ति को शास्त्रीय दर्जा मिला। स्रोत 1-2 में तोंदराडिप्पोडि और अप्पार सीधे कहते हैं कि विधि-ग्रंथों/गोत्र-कुल का कोई महत्व नहीं, केवल भक्ति मायने रखती है। वीरशैव/लिंगायतों ने और आगे जाकर जाति और अनुष्ठानिक “अपवित्रता” के विचार को सीधे चुनौती दी, यौवनोत्तर विवाह व विधवा-पुनर्विवाह जैसी वर्जित प्रथाओं को प्रोत्साहित किया, और धर्मशास्त्र-निर्धारित अंत्येष्टि रीति (दाह-संस्कार) को अस्वीकार कर दफ़नाने की प्रथा अपनाई।
प्र. आपके विचार से राजाओं ने नयनारों और सूफ़ियों से संबंध क्यों स्थापित करने का प्रयास किया?
उत्तर: नयनार और सूफ़ी दोनों के पास वह लोकप्रिय जन-समर्थन था जिस तक शासक स्वयं की शक्ति से नहीं पहुँच सकते थे। नयनार वेल्लाल किसानों द्वारा पूजनीय थे, इसलिए चोल शासकों ने मंदिर बनवाकर, मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित कर और तवरम को मंदिर-अनुष्ठान में शामिल कर अपनी वैधता को जन-आस्था से जोड़ा। इसी तरह दिल्ली सुल्तान, एक ग़ैर-मुस्लिम बहुसंख्या पर शासन करते हुए, शरिया को कठोरता से लागू नहीं कर सकते थे; सूफ़ियों की नैतिक-आध्यात्मिक सत्ता (जो सीधे ईश्वर से मानी जाती थी, न कि विधिवेत्ताओं से) ने शासकों को वह लोकप्रिय वैधता दी जो अकेले सैन्य शक्ति नहीं दे सकती थी। राजा अपनी क़ब्रें भी दरगाहों के निकट चाहते थे, यह मानकर कि औलिया उनकी ओर से ईश्वर के समक्ष मध्यस्थता कर सकते हैं।
प्र. इतिहासकारों के लिए यह पुष्टि करना कठिन क्यों है कि कबीर हिंदू जन्मे या मुस्लिम?
उत्तर: वैष्णव संत-चरित्र (सत्रहवीं सदी से, कबीर की मृत्यु के लगभग 200 वर्ष बाद रचित) कहते हैं कि वे एक हिंदू, कबीरदास थे, एक ग़रीब मुस्लिम बुनकर (जुलाहा) परिवार में पले और रामानंद द्वारा भक्ति में दीक्षित हुए। परंतु कबीर के अपने पद केवल “गुरु” और “सतगुरु” शब्दों का प्रयोग करते हैं, किसी विशिष्ट गुरु का नाम नहीं लेते। इतिहासकार यह भी नोट करते हैं कि रामानंद और कबीर को समकालीन सिद्ध करना, एक या दोनों के लिए अविश्वसनीय रूप से लंबी आयु माने बिना, आसान नहीं है। इसके अतिरिक्त कबीर की वाणी तीन विशिष्ट किंतु परस्पर व्याप्त पांडुलिपि परंपराओं (कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब) से पुनर्निर्मित है, सभी उनकी मृत्यु के काफ़ी बाद संकलित। इसलिए रामानंद-संबंध को कबीर के महत्व के बाद के सांस्कृतिक प्रमाण के रूप में लिया जाना चाहिए, स्थिर ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं।
प्र. ग़ियासपुर में शेख़ निज़ामुद्दीन की ख़ानक़ाह की बनावट और दैनिक जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर: यह चौदहवीं सदी की धर्मशाला दिल्ली के बाहर यमुना पर ग़ियासपुर में थी। इसमें छोटे कमरे, प्रार्थना और निवास के लिए एक बड़ा हॉल (जमाअत खाना), एक बरामदा, सीमा-दीवार, और शेख़ का अपना छत वाला कमरा था जहाँ वे सुबह-शाम आगंतुकों से मिलते थे। एक खुली रसोई (लंगर) बिना माँगे दान (फ़ुतूह) पर चलती थी, जिसमें सैनिकों, दासों, गायकों, व्यापारियों, कवियों, यात्रियों, हिंदू जोगियों और क़लंदरों को समान रूप से भोजन कराया जाता था। आगंतुकों में कवि अमीर हसन सिज्ज़ी, अमीर ख़ुसरो और इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी शामिल थे। एक अवसर पर मंगोल हमले की आशंका से भाग रहे आसपास के निवासियों ने भी यहाँ पनाह ली थी।
प्र. खम्बात के गिरजाघर पर अकबर का फ़रमान, और उनका एक जोगी को पत्र, मुग़ल धार्मिक नीति के बारे में क्या बताते हैं?
उत्तर: दोनों दस्तावेज़ मुग़ल शासकों की धार्मिक लचीलेपन की नीति दिखाते हैं। अकबर का 1598 का फ़रमान खम्बायत के गणमान्य लोगों को निर्देश देता है कि पादरियों को गिरजाघर बनाने से न रोका जाए बल्कि अनुमति दी जाए। यह दिखाता है कि मुग़ल शासन ग़ैर-मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं (यहूदी, ईसाई, हिंदू, पारसी) के निर्माण और भूमि/कर-छूट का समर्थन करता था। औरंगज़ेब का 1661-62 में एक जोगी गुरु आनंद नाथ जी को लिखा पत्र, जिसमें वे उन्हें “शिव मूरत” कहकर संबोधित करते और भेंट भेजते हैं, दिखाता है कि सामान्यतः कट्टर माने जाने वाले औरंगज़ेब के अधीन भी स्थानीय हिंदू-योगी परंपराओं के प्रति सम्मान की नीति जारी रही। दोनों साथ मिलकर यह दिखाते हैं कि मुग़ल राज्य-नीति व्यवहार में धार्मिक कठोरता के बजाय व्यावहारिक सहिष्णुता पर आधारित थी।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. सूफ़ीवाद की विशेषता बताने वाले प्रमुख विश्वासों और प्रथाओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर: सूफ़ी आरंभिक इस्लाम में ख़लीफ़ा की बढ़ती भौतिकवादिता और क़ुरान की कठोर, शास्त्रीय व्याख्या के विरुद्ध तपस्वी, रहस्यवादी असंतुष्टों के रूप में उभरे, गहन भक्ति और ईश्वर-प्रेम के माध्यम से मुक्ति खोजते हुए। संगठन की दृष्टि से, ग्यारहवीं सदी तक सूफ़ी ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द संगठित हो गए, जिसका नेतृत्व शेख़/पीर करते और शिष्य (मुरीद) बनाते तथा उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) नामित करते। बारहवीं सदी से सिलसिलों ने पैग़ंबर तक जाने वाली अटूट आध्यात्मिक वंशावली को औपचारिक रूप दिया। मृत्यु के बाद शेख़ की क़ब्र (दरगाह) भक्ति-केंद्र बन जाती, तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती (ज़ियारत), विशेषतः उर्स पर। शेख़ को वली/औलिया माना जाता, जिनके पास बरकत (कृपा) होती जो करामत (चमत्कार) संभव बनाती। कुछ रहस्यवादी (क़लंदर, मदारी, मलंग, हैदरी) ख़ानक़ाह को अस्वीकार कर भिक्षाटन-ब्रह्मचर्य अपनाते, शरिया की खुली अवहेलना कर बे-शरिया कहलाते, बा-शरिया सूफ़ियों के विपरीत। संगीत और समा (रहस्यवादी श्रवण) के माध्यम से दैवी परमानंद जगाना भी एक केंद्रीय प्रथा थी, विशेषतः चिश्तियों में।
प्र. उपमहाद्वीप की मस्जिदों का स्थापत्य किस हद तक सार्वभौमिक आदर्शों और स्थानीय परंपराओं के मिश्रण को दर्शाता है?
उत्तर: उपमहाद्वीप की मस्जिदें कुछ सार्वभौमिक विशेषताएँ साझा करती हैं जो इस्लामी पूजा-पद्धति से सीधे जुड़ी हैं: मक्का की ओर दिशा-निर्धारण, प्रार्थना-आला (मेहराब) और उपदेश-मंच (मिंबर)। ये तत्व हर मस्जिद में मिलते हैं चाहे वह कहीं भी बनी हो, क्योंकि नमाज़ की पद्धति ही इन्हें अनिवार्य बनाती है। इसके साथ ही, छत की शैली और निर्माण-सामग्री जैसी विशेषताएँ स्थानीय परंपरा के अनुसार भिन्न हैं: केरल की तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद की छत शिखर जैसी है; बांग्लादेश के मैमनसिंह ज़िले की अतिया मस्जिद (1609) ईंट से बनी है; और श्रीनगर में झेलम किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद (1395) कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसके शिखर और नक्काशीदार छज्जे हैं और जो पेपरमैशी से सजाई गई है। इस प्रकार उपमहाद्वीप की मस्जिदें एक ही सार्वभौमिक धार्मिक ढाँचे के भीतर स्थानीय परंपराओं को समाहित करने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
प्र. उदाहरणों सहित विश्लेषण कीजिए कि भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचार व्यक्त करने के लिए विविध भाषाएँ क्यों अपनाईं।
उत्तर: भक्ति और सूफ़ी दोनों परंपराओं का उद्देश्य आम जनसाधारण तक सीधे पहुँचना था, न कि केवल शास्त्र-प्रशिक्षित अभिजात वर्ग तक, इसलिए संस्कृत/अरबी-फ़ारसी के बजाय स्थानीय, बोलचाल की भाषाओं का प्रयोग स्वाभाविक था। दक्षिण में अलवार-नयनार तमिल स्तोत्र गाते थे; कर्नाटक में बासवन्ना और लिंगायत कन्नड़ में वचन रचते थे। दिल्ली के चिश्ती हिंदवी (जनसाधारण की भाषा) में बातचीत करते थे; बाबा फ़रीद के स्थानीय भाषा के पद बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हुए। कुछ सूफ़ियों ने मानव-प्रेम को दैवी-प्रेम के रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए मसनवी रचीं, जैसे मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत। बीजापुर के आसपास चिश्ती सूफ़ियों ने दखनी (उर्दू रूपांतर) में चरखानामा, लोरीनामा और शादीनामा जैसी छोटी कविताएँ रचीं, जो घरेलू काम करते समय स्त्रियाँ गाती थीं। यह मार्ग था जिससे इस्लाम दक्कन के गाँवों तक पहुँचा। कबीर की रचनाएँ अनेक भाषाओं और बोलियों में मिलती हैं, जिनमें से कुछ निर्गुण कवियों की खास बोली संत भाषा में हैं; गुरु नानक ने अपने विचार इस क्षेत्र की भाषा पंजाबी में ‘शबद’ के माध्यम से व्यक्त किए। संक्षेप में, भाषा-चयन स्वयं एक धार्मिक-राजनीतिक कार्यनीति था: शास्त्रीय भाषाओं के अभिजात्य नियंत्रण को चुनौती देकर भक्ति-प्रेम को हर व्यक्ति के लिए सुलभ बनाना।
प्र. सूफ़ी परंपराओं के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए इतिहासकार किन स्रोतों का प्रयोग करते हैं, और प्रत्येक की शक्तियों और सीमाओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर: इतिहासकार चार प्रमुख प्रकार के स्रोत प्रयोग करते हैं। ग्रंथ (नियमावलियाँ) सूफ़ी चिंतन और प्रथा पर नियमावली हैं, जैसे अली बिन उस्मान हुजविरी की कश्फ़-उल-महजुब। इनकी शक्ति यह है कि ये सूफ़ीवाद पर बाहरी (गैर-भारतीय) प्रभाव भी दिखाते हैं, पर सीमा यह कि ये आदर्शीकृत सैद्धांतिक विवरण हैं, वास्तविक व्यवहार नहीं। मल्फ़ूज़ात सूफ़ी संतों की बातचीत के संकलन हैं, जैसे अमीर हसन सिज्ज़ी द्वारा संकलित फ़वाइद-उल-फ़ुआद (निज़ामुद्दीन औलिया की बातचीत)। इनकी शक्ति प्रत्यक्ष, संवादात्मक स्वर है, पर सीमा यह कि ये शेख़ की अनुमति से संकलित होते थे और सदियों-क्षेत्रों में फैलकर संपादित होते रहे, इसलिए मूल शब्दों की शुद्धता संदिग्ध रहती है। मक़तूबात सूफ़ी गुरुओं से शिष्यों को लिखे पत्र हैं, जैसे शेख़ अहमद सरहिंदी की मक़तूबात-ए-इमाम रब्बानी। इनकी शक्ति व्यक्तिगत विश्वासों और चिंताओं का सीधा प्रकटीकरण है, पर सीमा यह कि ये केवल एक पक्ष (गुरु) का दृष्टिकोण देते हैं। तज़किरा संतों के जीवनी-वृत्तांत हैं, जैसे मीर ख़्वुर्द किरमानी की सियर-उल-औलिया। इनकी शक्ति ऐतिहासिक विवरण देना है, पर सीमा यह कि ये अक्सर अपने ही सिलसिले की वंशावली की महिमा करने के उद्देश्य से लिखे जाते थे, कभी-कभी काल्पनिक अंश भी लिए हुए। हर विधा को अपने ही पठन-कौशल की आवश्यकता है, लेखक, पाठक-वर्ग और उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक क़ौल का प्रचलन किसने शुरू किया?
उत्तर: अमीर ख़ुसरो ने क़ौल का प्रचलन शुरू किया।
(ख) 2 अंक ज़िक्र और समा के माध्यम से क़व्वाली किस उद्देश्य की पूर्ति करती थी?
उत्तर: ज़िक्र (दैवी नामों का पाठ) और समा (रहस्यवादी संगीत/श्रवण) के माध्यम से क़व्वाली दैवी परमानंद जगाती थी और स्थानीय भक्ति-परंपरा के साथ एक स्पष्ट संपर्क-बिंदु का काम करती थी।
(ग) 3 अंक अजमेर की दरगाह और अकबर के संबंध से चिश्ती-राज्य संबंध की प्रकृति पर क्या प्रकाश पड़ता है?
उत्तर: अकबर का 1580 तक चौदह बार अजमेर जाना, विजयों-मन्नतों-पुत्रों के लिए आशीर्वाद माँगना, और भव्य उपहार (जैसे 1568 की विशाल देग) देना दिखाता है कि मुग़ल शासक चिश्ती दरगाहों की लोकप्रिय आध्यात्मिक सत्ता से अपनी वैधता जोड़ना चाहते थे। यह चिश्ती तपस्विता के लौकिक सत्ता से दूरी बनाए रखते हुए भी पूर्ण अलगाव न रखने के सिद्धांत को दर्शाता है। दान स्वीकार किया गया, पर सत्ता में सीधी भागीदारी नहीं।
(क) 1 अंक गुरु नानक की परम सत्ता को क्या कहा जाता था?
उत्तर: गुरु नानक की परम सत्ता को “रब” कहा जाता था, जिसका कोई लिंग या रूप नहीं था।
(ख) 2 अंक गुरु नानक ने अपने अनुयायियों को किस संस्था में संगठित किया, और अगला गुरु किसे नियुक्त किया?
उत्तर: उन्होंने अनुयायियों को सामूहिक पूजा के नियमों वाले एक समुदाय, संगत, में संगठित किया, और अपने शिष्य अंगद को अगला गुरु नियुक्त किया।
(ग) 3 अंक गद्यांश के अंतिम वाक्य से हमें सिख पहचान के क्रमिक विकास के बारे में क्या समझ मिलती है?
उत्तर: गद्यांश बताता है कि गुरु नानक का उद्देश्य संभवतः एक नया, अलग धर्म स्थापित करना नहीं था, उनकी शिक्षाएँ हिंदू व मुस्लिम दोनों परंपराओं के तत्वों को अस्वीकार व आत्मसात करते हुए एक साझा निर्गुण भक्ति-मार्ग प्रस्तुत करती थीं। परंतु समय के साथ, गुरु-परंपरा के संस्थागत रूप लेने (संगत, बाद में आदि ग्रंथ साहिब और ख़ालसा पंथ) के साथ-साथ उनके अनुयायियों ने स्वयं को एक पृथक सामाजिक-धार्मिक समुदाय के रूप में पहचानना शुरू कर दिया। यह दिखाता है कि धार्मिक पहचानें अक्सर संस्थापक के मूल इरादे से भिन्न, ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से क्रमिक रूप से बनती हैं।