कक्षा 12 इतिहास अध्याय 6 भक्ति-सूफ़ी परंपराएं NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II, अध्याय 6 ‘भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्न, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और हर एक का पूरा आदर्श उत्तर; अंत में अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न भी। किताब इन्हें चार हिस्सों में बाँटती है: पाँच ‘उत्तर दीजिए’ (100-150 शब्द), चार ‘लघु निबंध लिखिए’ (लगभग 250-300 शब्द), एक मानचित्र-कार्य और दो परियोजना-कार्य जिनमें से कोई एक करना है। पहले अपना उत्तर लिखिए, फिर इससे मिलाइए।

शुरू करने से पहले

यह अध्याय भक्ति (दक्षिण के अलवार-नयनार, कर्नाटक के वीरशैव, उत्तर के कबीर-नानक-मीराबाई) और सूफ़ी (ख़ानक़ाह, सिलसिला, चिश्ती) दोनों परंपराओं को साथ पढ़ता है, इसलिए हर उत्तर में जहाँ बन सके दोनों धाराओं से एक-एक उदाहरण दीजिए। लिखने का तरीक़ा: प्रश्न 1 से 5 तीन-चार अंक के होते हैं, इसलिए चार से छह ठोस बिंदु काफ़ी हैं। प्रश्न 6 से 9 लघु निबंध हैं, इसलिए उपशीर्षक और एक निष्कर्ष ज़रूर दीजिए। हर बिंदु में जहाँ बन सके स्रोत का नाम (स्रोत 1, बासवन्ना का वचन, अकबर का फ़रमान आदि) या पारिभाषिक शब्द (ख़ानक़ाह, सिलसिला, ज़िम्मी आदि) ज़रूर लिखिए।

1 उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1

प्र. उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?

उत्तर:
दो साथ-साथ चलती प्रक्रियाएँ। ब्राह्मणीय विचार सरल संस्कृत पौराणिक ग्रंथों के माध्यम से सोच-समझकर फैलाए गए, जो स्त्रियों-शूद्रों के लिए भी सुलभ थे; साथ ही ब्राह्मणों ने अन्य समूहों के स्थानीय विश्वासों को आत्मसात कर नया रूप दिया।
जगन्नाथ का उदाहरण। पुरी में स्थानीय आदिवासी शिल्पियों द्वारा तराशा गया लकड़ी का देवता जगन्नाथ बारहवीं सदी तक विष्णु के एक रूप में पहचान लिया गया।
देवी-पूजा का उदाहरण। गेरू लगे एक साधारण पत्थर की पूजा को व्यापक रूप से आत्मसात कर लक्ष्मी या पार्वती की पूजा के बराबर मान लिया गया।
वास्तविक संघर्ष भी था। वैदिक परंपरावादियों, तांत्रिक साधकों, भक्तों और बौद्ध-जैन धर्म के बीच तनाव बना रहा, यह मिलन कभी पूर्णतः सहज नहीं था।
निष्कर्ष। इसी द्विदिशीय प्रक्रिया, फैलाव और आत्मसातीकरण, को इतिहासकार “समन्वय” कहते हैं।

प्रश्न 2

प्र. किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?

उत्तर:
सार्वभौमिक तत्व। मक्का की ओर दिशा-निर्धारण, मेहराब (प्रार्थना-आला) और मिंबर (मंच): नमाज़ की पद्धति इन्हें हर मस्जिद में अनिवार्य बनाती है।
स्थानीय भिन्नता। छत की शैली और निर्माण-सामग्री स्थानीय जलवायु और शिल्प-परंपरा के अनुसार बदलती है।
बांग्लादेश का उदाहरण। मैमनसिंह ज़िले की अतिया मस्जिद (1609) ईंट से बनी है।
कश्मीर का उदाहरण। श्रीनगर की शाह हमदान मस्जिद (1395) कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है, शिखर और नक्काशीदार छज्जों वाली।
केरल का उदाहरण। तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद की छत शिखर जैसी है।
निष्कर्ष। एक ही सार्वभौमिक धार्मिक ढाँचे के भीतर स्थानीय भौगोलिक-सांस्कृतिक विविधता का प्रत्यक्ष प्रमाण।

प्रश्न 3

प्र. बे शरिया और बा शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
एकरूपता। दोनों ईश्वर-प्रेम, तपस्या और भौतिकवाद-विरोधी रुख़ में एक-रूप हैं, दोनों ख़लीफ़ा की भौतिकवादिता के विरुद्ध रहस्यवादी असंतोष से निकलीं।
बा-शरिया। शरिया का पालन करते हुए ख़ानक़ाह-केंद्रित, सिलसिला-संगठित जीवन, जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, नक़्शबंदी इसी श्रेणी में।
बे-शरिया। क़लंदर, मदारी, मलंग, हैदरी। शरिया की खुली अवहेलना, भिक्षाटन-ब्रह्मचर्य, चरम तपस्या, अनुष्ठान की उपेक्षा।
निष्कर्ष। दोनों धाराएँ साथ-साथ अस्तित्व में रहीं, इस्लामी रहस्यवाद के भीतर विविधता को दर्शाते हुए।

प्रश्न 4

प्र. चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?

उत्तर:
जाति के पार भक्त। अलवार-नयनार में भक्त ब्राह्मणों, शिल्पियों, कृषकों और “अस्पृश्य” जातियों तक से आए।
वेद के समान दर्जा। नलयिरादिव्यप्रबंधम् को “तमिल वेद” कहा गया, यह जाति-भेद के बावजूद भक्ति की सर्वोच्चता का संकेत है।
स्रोत 1-2 का प्रमाण। तोंदराडिप्पोडि व अप्पार सीधे कहते हैं कि विधि-ग्रंथों/गोत्र-कुल का कोई महत्व नहीं, केवल भक्ति मायने रखती है।
वीरशैवों ने और आगे बढ़कर चुनौती दी। जाति और अनुष्ठानिक “अपवित्रता” को सीधे नकारा, यौवनोत्तर विवाह-विधवा-पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया, और दाह-संस्कार के बजाय दफ़नाने की प्रथा अपनाई।

प्रश्न 5

प्र. कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ।

उत्तर (गुरु नानक पर आधारित):
निराकार रब। परम सत्ता “रब” का कोई लिंग या रूप नहीं था; मूर्ति-पूजा, अनुष्ठानिक स्नान, तप और हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मग्रंथ अस्वीकृत।
दैवी नाम का स्मरण। शब्द (भजन) के रूप में, विभिन्न रागों में, साथी मरदाना की रबाब के साथ गाए जाते।
संस्थागत रूप। अनुयायियों को संगत में संगठित किया; शिष्य अंगद को अगला गुरु नियुक्त किया, यह क्रम आगे चलता रहा।
संप्रेषण। मुख्यतः मौखिक परंपरा से; बाद में गुरु अर्जन ने आदि ग्रंथ साहिब में संकलित किया, और गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब बनाकर ख़ालसा पंथ स्थापित किया।

2 निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6

प्र. सूफ़ी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:
उदय। ख़लीफ़ा की बढ़ती भौतिकवादिता और क़ुरान की कठोर व्याख्या के विरुद्ध तपस्वी, रहस्यवादी असंतुष्टों के रूप में उभरे।
ख़ानक़ाह और सिलसिला। ग्यारहवीं सदी तक शेख़/पीर के नेतृत्व में ख़ानक़ाह-केंद्रित संगठन; बारहवीं सदी से सिलसिलों ने पैग़ंबर तक की अटूट वंशावली औपचारिक की।
दरगाह और उर्स। मृत्यु के बाद शेख़ की क़ब्र भक्ति-केंद्र बनती, ज़ियारत आकर्षित करती, विशेषतः उर्स पर; शेख़ वली/औलिया माने जाते, उनकी बरकत करामत संभव बनाती।
बे-शरिया धारा। क़लंदर-मदारी-मलंग-हैदरी शरिया की खुली अवहेलना करते, चरम तपस्या अपनाते।
संगीत और समा। क़व्वाली के माध्यम से ज़िक्र/समा से दैवी परमानंद जगाना, विशेषतः चिश्तियों में केंद्रीय प्रथा।
निष्कर्ष। ये सभी तत्व मिलकर सूफ़ीवाद को एक भक्ति-केंद्रित, संस्थागत पर साथ ही रहस्यवादी परंपरा बनाते हैं।

प्रश्न 7

प्र. क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?

उत्तर:
कारण: लोकप्रिय जन-समर्थन। नयनार और सूफ़ी दोनों के पास वह लोकप्रिय जन-समर्थन था जिस तक शासक अकेले सैन्य शक्ति से नहीं पहुँच सकते थे।
चोलों का तरीक़ा। नयनार वेल्लाल किसानों द्वारा पूजनीय थे; चोल शासकों ने मंदिर बनवाकर, संतों की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा कर (परांतक प्रथम का लगभग 945 का अभिलेख) और तवरम को मंदिर-अनुष्ठान में शामिल कर वैधता जोड़ी।
दिल्ली सुल्तानों का तरीक़ा। ग़ैर-मुस्लिम बहुसंख्या पर शासन करते हुए शरिया कठोरता से लागू नहीं कर सकते थे; सूफ़ियों की ईश्वर-प्रदत्त नैतिक सत्ता को अपनाया, विधिवेत्ताओं (उलेमा) की माँग का प्रतिरोध करते हुए।
राजाओं की क़ब्रें। राजा अपनी क़ब्रें भी दरगाहों के निकट चाहते थे, यह मानकर कि औलिया ईश्वर के समक्ष मध्यस्थता कर सकते हैं; अकबर स्वयं 1580 तक अजमेर चौदह बार गए।
निष्कर्ष। धार्मिक संरक्षण राजनीतिक वैधता जुटाने की एक सचेत रणनीति थी।

प्रश्न 8

प्र. उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?

उत्तर:
उद्देश्य: जनसाधारण तक पहुँच। संस्कृत/अरबी-फ़ारसी की तुलना में स्थानीय भाषाएँ आम लोगों के लिए सुलभ थीं।
दक्षिण भारत। अलवार-नयनार तमिल में, बासवन्ना-लिंगायत कन्नड़ वचनों में।
चिश्ती और हिंदवी। दिल्ली के चिश्ती हिंदवी में बातचीत करते; बाबा फ़रीद के पद बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हुए।
मसनवी और दखनी। मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत (प्रेमाख्यान मसनवी); बीजापुर के आसपास दखनी में चरखानामा, लोरीनामा, शादीनामा, जो स्त्रियाँ घरेलू काम करते समय गातीं।
कबीर और गुरु नानक। कबीर की रचनाएँ अनेक भाषाओं और बोलियों में मिलती हैं, कुछ निर्गुण कवियों की खास बोली संत भाषा में; गुरु नानक ने इस क्षेत्र की भाषा पंजाबी में शबद रचे।
निष्कर्ष। भाषा-चयन स्वयं एक रणनीति था: शास्त्रीय भाषाओं के अभिजात्य नियंत्रण को चुनौती देकर भक्ति को सुलभ बनाना।

प्रश्न 9

प्र. इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।

उत्तर:
स्रोत 1-2 (तोंदराडिप्पोडि व अप्पार)। जाति-निंदा और भक्ति की सर्वोच्चता का सामाजिक-धार्मिक विचार।
स्रोत 4 (बासवन्ना का वचन)। पत्थर के साँप बनाम असली साँप: खोखले अनुष्ठान बनाम वास्तविक करुणा।
स्रोत 5-6 (अकबर का खम्बायत फ़रमान, औरंगज़ेब का जोगी को पत्र)। मुग़ल धार्मिक-सहिष्णुता नीति।
स्रोत 9 (शेख़ फ़रीदुद्दीन/निज़ामुद्दीन औलिया, भूमि-उपहार अस्वीकार)। चिश्ती तपस्विता और लौकिक सत्ता से दूरी।
स्रोत 10-11 (कबीर व मीराबाई के पद)। निर्गुण एकेश्वरवाद और व्यक्तिगत, तीव्र भक्ति-भावना।
निष्कर्ष। हर स्रोत को अपनी विधा (पद, वचन, राजाज्ञा, वृत्तांत) और लेखक के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पढ़ना ज़रूरी है।

3 मानचित्र कार्य

प्रश्न 10

प्र. भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।

उत्तर: इन्हें अपने रेखांकित भारत के मानचित्र पर दर्शाइए। छहों स्थल आज के भारत में हैं और अध्याय के अपने स्थल हैं।

दर्शाने वाला स्थल आज का राज्य क्या है (अध्याय के अनुसार)
अजमेर राजस्थान सूफ़ी स्थल: ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह
दिल्ली (ग़ियासपुर) दिल्ली सूफ़ी स्थल: शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह
फ़तेहपुर सीकरी उत्तर प्रदेश सूफ़ी स्थल: शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह
पुरी ओडिशा (पुस्तक में उड़ीसा) जगन्नाथ का मंदिर, विष्णु का एक रूप
तंजावुर (या चिदंबरम, गंगैकोंडचोलपुरम) तमिलनाडु चोल शासकों के बनाए शिव मंदिर
कोई देवी-मंदिर आपकी पसंद अध्याय किसी विशेष देवी-मंदिर का नाम नहीं देता। अपना पढ़ा हुआ कोई प्रसिद्ध देवी-मंदिर दर्शाइए, जैसे गुवाहाटी (असम) के पास कामाख्या (यह अध्याय में नहीं है)।

कैसे दर्शाएँ: (1) हर स्थल को उसके राज्य में एक बिंदु से दिखाइए और पास में नाम लिखिए। (2) सूफ़ी स्थलों के लिए एक चिह्न (जैसे अर्धचंद्र) और मंदिरों के लिए दूसरा चिह्न (जैसे त्रिभुज) लीजिए। (3) संकेत-सूची बनाइए। अजोधन (शेख़ फ़रीदुद्दीन गंज-ए-शकर की दरगाह) भी एक प्रमुख चिश्ती स्थल है, पर वह आज के पाकिस्तान में है, इसलिए आज के भारत के रेखांकित मानचित्र पर उसे नहीं दर्शाया जा सकता।

4 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11

प्र. इस अध्याय में वर्णित किन्हीं 2 धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं।

उत्तर (सुझाव, कबीर और गुरु नानक):
कबीर। लगभग चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी; वाणी कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ साहिब, तीन पांडुलिपि-परंपराओं से पुनर्निर्मित; संभवतः ग़रीब मुस्लिम बुनकर परिवार में पले, वाणी हिंदू-मुस्लिम दोनों की शब्दावली प्रयोग करती है।
गुरु नानक। 1469-1539; हिंदू व्यापारी परिवार में जन्मे, फ़ारसी सीखी, सूफ़ियों-भक्तों के बीच व्यापक यात्रा की; संगत की स्थापना की, अंगद को उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
जानकारी का स्रोत। दोनों की जानकारी मुख्यतः मौखिक रूप से प्रसारित पदों और मृत्यु के बाद संकलित जीवनी-परंपराओं से मिलती है, इसलिए ऐतिहासिक तथ्य और बाद की भक्ति-किंवदंती में भेद करना कठिन है।
महत्व। दोनों ने जाति और धार्मिक विभाजनों को चुनौती देने वाला साझा, निर्गुण भक्ति-मार्ग प्रस्तुत किया जो आज भी करोड़ों अनुयायियों को प्रेरित करता है।

प्रश्न 12

प्र. इस अध्याय में वर्णित सूफ़ी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन सी हैं?

उत्तर (सुझाव, अजमेर की दरगाह):
आज भी जारी। ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर दरगाह पर ज़ियारत आज भी बड़े पैमाने पर होती है, विशेषतः उर्स के अवसर पर।
कौन जाता है। मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों के लोग, जैसा दरगाह क़ुली ख़ान ने नसीरुद्दीन चिराग़-ए-दहली की दरगाह के बारे में लिखा, ‘हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।’
क्यों जाते हैं। मन्नतें माँगने, आशीर्वाद पाने, बीमारी से मुक्ति या संतान-प्राप्ति की कामना से, जैसा अकबर स्वयं विजयों-मन्नतों-पुत्रों के लिए आशीर्वाद माँगने जाते थे।
गतिविधियाँ। क़व्वाली, मज़ार की परिक्रमा, इत्र व चादर चढ़ाना, लंगर में भोजन, जैसा जहाँआरा के 1643 के वृत्तांत में वर्णित है, जिसमें वे मज़ार के सात चक्कर लगाती हैं।

5 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।

पाठगत प्रश्न 1 · खंड 1.2 · चर्चा कीजिए

प्र. अपने शहर या गाँव में पूजित देवी-देवताओं के नाम और उनके चित्रण पर विचार कीजिए। उनकी उपासना से जुड़े अनुष्ठानों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: हमारे शहर का मुख्य मंदिर शिव का है, जिनकी पूजा लिंग के रूप में होती है, और नीम के पेड़ के नीचे स्थानीय देवी का एक स्थान है जहाँ देवी केवल सिंदूर और गेरू लगे एक पत्थर के रूप में हैं। लोग सोमवार और शिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल, दूध और फूल चढ़ाते हैं, जबकि देवी को नारियल, लाल चुनरी और दीप चढ़ाए जाते हैं और वार्षिक उत्सव पर उनकी सवारी निकलती है। एक बड़े पौराणिक देवता के साथ पत्थर के रूप में पूजी जाने वाली स्थानीय देवी, यही वह संप्रदायों का समन्वय है जिसका वर्णन अध्याय करता है।

पाठगत प्रश्न 2 · स्रोत 1 · प्रश्न

प्र. क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति व्यवस्था के विरोधी थे?

उत्तर: वे धार्मिक महत्त्व के पैमाने के रूप में जाति के आलोचक अवश्य थे। स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी वे कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से भी ज़्यादा, जो उनकी सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उन ‘दासों’ को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण-व्यवस्था के परे हों। उनके लिए ईश्वर के सामने जन्म या वैदिक ज्ञान नहीं, भक्ति मायने रखती है। पर यह पद जाति व्यवस्था को ही समाप्त करने की माँग नहीं करता; यह भक्ति में जाति-आधारित विशेषाधिकार को नकारता है।

पाठगत प्रश्न 3 · स्रोत 2 · प्रश्न

प्र. क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?

उत्तर: समानता। दोनों जन्म और शास्त्र-ज्ञान को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग नहीं मानते; दोनों के लिए केवल भक्ति महत्त्वपूर्ण है।
अंतर। तोंदराडिप्पोडि, जो स्वयं ब्राह्मण अलवार थे, एक नरम तुलना करते हैं: विष्णु निष्ठाहीन चतुर्वेदियों से ज़्यादा प्रेमी ‘दासों’ को पसंद करते हैं। नयनार संत अप्पार कहीं अधिक तीखे हैं: वे शास्त्र उद्धृत करने वालों को ‘धूर्तजन’ कहते हैं और पूछते हैं कि उनका गोत्र और कुल किस काम का, और उन्हें मारपेरू के स्वामी (शिव) के सामने नतमस्तक होने को कहते हैं।

पाठगत प्रश्न 4 · स्रोत 3 · प्रश्न

प्र. उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं?

उत्तर: वे स्वयं को राक्षसी बताती हैं: फूली हुई नाड़ियों वाली, बाहर निकली आँखें, सफ़ेद दाँत और भीतर धँसा उदर, लाल केश और आगे निकले दाँत, टखनों तक फैली लंबी पिंडली, जो वन में विचरते समय चीखती और रोती है। स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा कोमल अंगों, सुंदर मुख, मर्यादित-शांत व्यवहार और घर के भीतर के जीवन की प्रशंसा करती है; वे जान-बूझकर स्वयं को हर तरह से इसके उलट प्रस्तुत करती हैं, यह दिखाने के लिए कि उन्होंने शिव-भक्ति के लिए सौंदर्य और सामाजिक अपेक्षाओं का त्याग कर दिया है।

पाठगत प्रश्न 5 · खंड 2.4 · चर्चा कीजिए

प्र. आपको क्यों लगता है कि शासक भक्तों से अपने संबंध को दर्शाने के लिए उत्सुक थे?

उत्तर: नयनार और अलवार संत वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे, इसलिए इन संतों से जुड़कर शासक जनता का समर्थन पा सकते थे। चोल राजा इस संबंध से दैवी समर्थन का दावा करते और अपनी शक्ति व प्रतिष्ठा दर्शाते थे: उन्होंने संतों के दर्शन को साकार करने वाली पत्थर और धातु की मूर्तियों से सजे भव्य मंदिर बनवाए, मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू कराया और उन्हें तवरम में संकलित कराया, और परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ शिव मंदिर में स्थापित करवाईं जिन्हें उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।

पाठगत प्रश्न 6 · स्रोत 4 · प्रश्न

प्र. अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं?

उत्तर: बासवन्ना खोखले अनुष्ठानों के कड़े आलोचक हैं। वे दिखाते हैं कि लोग पत्थर के सर्प पर दूध चढ़ाते हैं पर असली साँप आने पर ‘मारो-मारो’ कहते हैं, और जो ईश्वर की प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं जबकि देवता के उस सेवक को, जो भोजन परसने पर खा सकता है, ‘चले जाओ! चले जाओ!’ कहकर भगा देते हैं। वे रोज़मर्रा के सरल उदाहरणों को आमने-सामने रखकर श्रोता को समझाते हैं, जिससे बिना किसी शास्त्रीय तर्क के ऐसे अनुष्ठानों का विरोधाभास और व्यंग्य अपने-आप स्पष्ट हो जाता है।

पाठगत प्रश्न 7 · स्रोत 5 · प्रश्न

प्र. वे कौन लोग थे जिनकी तरफ़ से अकबर को अपने फ़रमान की बेअदबी का अंदेशा था?

उत्तर: फ़रमान कहता है कि ‘खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ’। इसलिए अकबर को खम्बात के स्थानीय महानुभावों, यानी नगर के अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों, से विरोध का अंदेशा था, जो पादरियों को गिरजाघर बनाने से रोक सकते थे; इसीलिए उन्होंने जोड़ा कि बादशाह के इस फ़रमान की हर तरह से तामील हो।

पाठगत प्रश्न 8 · स्रोत 6 · प्रश्न

प्र. जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।

उत्तर: जोगी शिव के उपासक थे: औरंगज़ेब उन्हें ‘शिवमूरत’ कहते हैं और कामना करते हैं कि वे ‘श्री शिव जियो की पनाह में’ रहें। बादशाह का रवैया आदर और श्रद्धा का है: वे जोगी को ‘बुलंद मकाम’ और ‘जनाब-ए-मुहतरम’ जैसे सम्मानसूचक शब्दों से संबोधित करते हैं, पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट के तौर पर भेजते हैं, और कहते हैं कि जब भी उनकी मदद की ज़रूरत हो, जोगी उन्हें लिख सकते हैं।

पाठगत प्रश्न 9 · खंड 5.3 · चर्चा कीजिए

प्र. अपने गाँव अथवा शहर की मस्जिद की स्थापत्य कला के बारे में जानकारी हासिल कीजिए। इसे बनाने में किस तरह की सामग्री का इस्तेमाल हुआ है? क्या यह सामग्री स्थानीय स्तर पर मिलती है? क्या इसके कुछ विशिष्ट स्थापत्य लक्षण हैं?

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: हमारे शहर की मुख्य मस्जिद स्थानीय भट्ठों की ईंटों और चूने के प्लास्टर से बनी है, और उसका फ़र्श पास में मिलने वाले पत्थर का है; दोनों सामग्रियाँ आसपास आसानी से मिलती हैं। हर मस्जिद की तरह इसकी दिशा मक्का की ओर है, पश्चिमी दीवार में मेहराब और उसके पास मिंबर है। इसके स्थानीय लक्षण हैं: छोटे गुंबदों वाली सपाट छत, प्रार्थना-कक्ष को ठंडा रखने वाले मेहराबदार बरामदे, और वज़ू के लिए हौज़ वाला आँगन। जैसा अध्याय केरल, अतिया और शाह हमदान मस्जिदों के उदाहरण से दिखाता है, सार्वभौमिक लक्षण स्थानीय सामग्री और शैली के साथ मिल जाते हैं।

पाठगत प्रश्न 10 · खंड 6.2 · चर्चा कीजिए

प्र. क्या आपके गाँव अथवा शहर में ख़ानक़ाह या दरगाह है? मालूम कीजिए इनकी स्थापना कब हुई थी तथा इनके संग कौन से क्रियाकलाप जुड़े हुए हैं? क्या ऐसे अन्य स्थान हैं जहाँ धार्मिक स्त्री और पुरुष मिलते और रहते हैं?

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: हमारे शहर में एक स्थानीय सूफ़ी संत की दरगाह है, जो लगभग दो सौ वर्ष पहले उनकी क़ब्र पर बनी। सभी समुदायों के लोग, विशेषकर गुरुवार को और उर्स के दिनों में, यहाँ फूल और चादर चढ़ाने, मन्नत के धागे बाँधने और क़व्वाली सुनने आते हैं; ग़रीबों में भोजन बाँटा जाता है। ऐसे अन्य स्थान जहाँ धार्मिक स्त्री-पुरुष मिलते या रहते हैं: आश्रम वाले मंदिर, लंगर वाला गुरुद्वारा, और मठ जहाँ साधु रहते हैं।

पाठगत प्रश्न 11 · चित्र 6.12 · प्रश्न

प्र. यह बताइए कि कलाकार शेख साहब और उनके शिष्य में कैसे फर्क डालता है?

उत्तर: शेख निज़ामुद्दीन औलिया बड़े आकार में, ऊँचे आसन पर आराम से बैठे दिखाए गए हैं, सादे हरे वस्त्र, सफ़ेद दाढ़ी और सिर के चारों ओर सुनहरे प्रभामंडल के साथ, जो उनकी आयु, गरिमा और आध्यात्मिक शक्ति के चिह्न हैं। अमीर खुसरो छोटे आकार में, उनके सामने विनम्र और ध्यानमग्न मुद्रा में बैठे हैं, बेल-बूटेदार वस्त्र पहने और हाथ में एक वाद्य लिए, जो उन्हें शिष्य और कवि-संगीतकार के रूप में पहचान देता है।

पाठगत प्रश्न 12 · चित्र 6.13 · प्रश्न

प्र. चित्र में कलाकार के हस्ताक्षर ढूँढ़िए।

उत्तर: चित्र के ऊपर दाईं ओर चट्टानी पृष्ठभूमि पर फ़ारसी लिपि की एक छोटी पंक्ति देखिए: मुगल चित्रकार चित्र के भीतर ऐसी छोटी पंक्तियों में अपना नाम या छोटे लेख लिखते थे। पाठ्यपुस्तक में छपा चित्र कटा हुआ और छोटा है, इसलिए लिखावट साफ़ नहीं पढ़ी जा सकती; मनोहर के इस चित्र की बड़ी प्रति में इसे देखिए।

पाठगत प्रश्न 13 · स्रोत 7 · प्रश्न

प्र. जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाते हैं? दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?

उत्तर: चेष्टाएँ। हर रोज़ और हर मुकाम पर दो बार की अख़्तियारी नमाज़; बहुत दिनों तक रात को बाघ के चमड़े पर न सोना, अपने पैर मुकद्दस दरगाह की तरफ़ न फैलाना, न ही पीठ उनकी तरफ़ करना; दिन पेड़ के नीचे गुज़ारना; अपने ज़र्द चेहरे को दरगाह की चौखट की धूल से रगड़ना; दरवाज़े से मुकद्दस दरगाह तक नंगे पाँव ज़मीन चूमते हुए जाना; मज़ार के चारों ओर सात फेरे लेना; अपने हाथों से सबसे उम्दा इतर छिड़कना और अपना गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखना।
दरगाह की खासियत। वे अजमेर को ‘पाक और बेजोड़’ कहती हैं, और दरगाह को ‘मुकद्दस’, ‘चिराग और इतर में डूबी’ और ‘गुम्बद के भीतर रोशनी से भरी’ बताती हैं, यानी पवित्रता, प्रकाश और सुगंध के शब्दों से।

पाठगत प्रश्न 14 · स्रोत 8 · प्रश्न

प्र. इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?

उत्तर: समानता। दोनों सूफ़ी पीर के प्रति भक्ति व्यक्त करते हैं और भक्ति को अनुशासित शारीरिक क्रियाओं में बदलते हैं: गीत में साँस गिनना और ज़िक्र, जहाँआरा के वृत्तांत में नमाज़, नंगे पाँव चलना और मज़ार के फेरे। दोनों का अंत पीर को भेंट से होता है (ज़िक्र पीर को तोहफ़े में; इतर और दुपट्टा मज़ार पर)।
अंतर। चरखानामा एक सरल काम-काजी गीत है, जिसे संभवतः साधारण स्त्रियाँ चरखा कातते हुए दक्खनी में गाती थीं; इसमें रुई, धागा और चरखा जैसे रोज़मर्रा के बिंब हैं और भक्ति घर के रोज़ के काम में समाई है। जहाँआरा का वृत्तांत एक मुगल शहज़ादी का गद्य है, जो एक प्रसिद्ध दरगाह की विशेष तीर्थयात्रा और वहाँ की चेष्टाओं का आदरपूर्ण, दरबारी भाषा में वर्णन करता है।

पाठगत प्रश्न 15 · खंड 7.4 · चर्चा कीजिए

प्र. धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के संभावित स्रोत क्या-क्या हैं?

उत्तर: (1) दोनों लोगों पर अधिकार का दावा करते हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे से अपनी सत्ता की स्वीकृति चाहते हैं: अध्याय बताता है कि सुल्तान और सूफ़ी दोनों कुछ रस्मों, जैसे झुककर सलाम (सिजदा) और क़दम चूमने, की अपेक्षा रखते थे। (2) ‘सुल्तान-उल-मशाइख़’ (शेखों में सुल्तान) जैसी उपाधियाँ शासक की बराबरी करती लग सकती थीं। (3) अनुदान और भेंट: शासक संतों से जुड़ना चाहते थे, पर चिश्ती जैसे सूफ़ी दुनियावी सत्ता से दूरी रखते और कई बार भेंट अस्वीकार कर देते थे। (4) उलमा शासकों पर शरिया को राजकीय क़ानून बनाने का दबाव डालते थे, जिसका ग़ैर-मुसलमान बहुल प्रजा वाले शासक विरोध करते थे। (5) किसी संत की जनता में लोकप्रियता उसे निष्ठा का प्रतिद्वंद्वी केंद्र बना सकती थी।

पाठगत प्रश्न 16 · स्रोत 9 · प्रश्न

प्र. सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है? यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?

उत्तर: सूफ़ी और राज्य। शासक ज़मीन, बगीचे और धन भेंट करके सूफ़ियों की सद्भावना चाहते थे; चिश्ती शेख दुनियावी सत्ता से दूरी रखते थे, ज़मीन और संपत्ति ठुकराते थे, पर वह धन स्वीकार कर लेते थे जो तुरंत दरवेशों पर ख़र्च हो सके, जैसा शेख फ़रीदुद्दीन ने उलुग़ ख़ान (बाद के सुल्तान ग़ियासुद्दीन) के साथ किया।
संपर्क के तरीके। अनुयायी गहरा आदर दिखाते थे (लेखक शेख के क़दम चूमता है); शेख बातचीत और पुराने आध्यात्मिक गुरुओं की कहानियाँ सुनाकर शिक्षा देते थे; और शिष्य इन बातचीतों को लिखकर सुरक्षित रखते थे, जैसा यहाँ अमीर हसन सिजज़ी ने किया (मल्फ़ूज़ात)।

पाठगत प्रश्न 17 · स्रोत 10 · प्रश्न

प्र. विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?

उत्तर: कबीर पूछते हैं कि संसार के एक नहीं दो स्वामी कैसे हो सकते हैं, और किसने लोगों को भ्रमित किया है। ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है, जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत, पर ‘विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं’। इसलिए भेद करने वाले दोनों ही भुलावे में हैं, कोई भी राम को प्राप्त नहीं कर सकता; एक बकरे को मारता है और दूसरा गाय को, और वे पूरा जीवन विवादों में ही गँवा देते हैं।

पाठगत प्रश्न 18 · स्रोत 11 · प्रश्न

प्र. यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?

उत्तर: मीराबाई निडर और राणा के प्रति विद्रोही हैं: ‘राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी’ (मेवाड़ का राणा मेरा क्या कर लेगा), ‘म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ’ (मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी)। राणा रूठ जाए तो अपना गाँव रख ले, पर हरि रूठ जाएँ तो वह मुरझा जाएगी। उन्हें केवल ईश्वर की नाराज़गी की चिंता है, राजा की नहीं; कृष्ण-भक्ति उन्हें उस राणा की शक्ति से परे रखती है जिसके परिवार में उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध हुआ था।

पाठगत प्रश्न 19 · खंड 8.3 · चर्चा कीजिए

प्र. आपको क्यों लगता है कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्त्वपूर्ण हैं?

उत्तर: (1) उनका संदेश कि ईश्वर एक है और जाति व धर्म के भेद मनुष्य के बनाए हैं, आज के सांप्रदायिक और जातिगत बँटवारे का सशक्त उत्तर है। (2) उन्होंने आम लोगों की भाषा में, खोखले अनुष्ठानों के बिना, भक्ति की शिक्षा दी। (3) उनकी रचनाएँ आज भी गाई जाती हैं: कबीर के पद पूरे देश में, बाबा गुरु नानक के शबद गुरु ग्रंथ साहिब में, और मीराबाई के पद स्त्रियों और पुरुषों द्वारा, खासतौर से गुजरात व राजस्थान के गरीब लोगों द्वारा जिन्हें ‘नीच जाति’ का समझा जाता है। (4) पत्नी की पारंपरिक भूमिका और राजसत्ता के प्रति मीराबाई का प्रतिरोध स्त्री-स्वतंत्रता की प्रेरणा देता है। (5) अध्याय के अनुसार कबीर आज भी उन सबके लिए प्रेरणा हैं जो जड़ जमाई धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर प्रश्न उठाते हैं।