कक्षा 12 इतिहास अध्याय 7 एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग II के अध्याय 7 ‘एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, लगभग 250-300 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और स्रोतों व चित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।

1 हम्पी के अध्ययन की पद्धतियाँ

प्रश्न 1 (100-150 शब्द)

प्र. पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन-सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?

उत्तर:
1. आरंभिक सर्वेक्षण। 1800 में कर्नल कॉलिन मैकेन्जी, एक ईस्ट इंडिया कंपनी इंजीनियर, ने स्थल का पहला सर्वेक्षण मानचित्र तैयार किया, अपनी आरंभिक अधिकतर जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों से लेते हुए।
2. फ़ोटोग्राफ़ी और अभिलेख-संग्रह। 1856 से फ़ोटोग्राफ़रों ने स्मारकों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना शुरू किया; 1836 से पुरालेखविदों ने हम्पी के मंदिरों के अनेक अभिलेख एकत्र किए।
3. साहित्य और यात्री-वृत्तांत। इतिहासकारों ने इन सबको विदेशी यात्रियों (पेस, नूनिज़, अब्दुर रज़्ज़ाक, निकितिन) के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल व संस्कृत साहित्य के साथ मिलाया।
4. आधुनिक मानचित्रण। 1980 के दशक से एक गहन ग्रिड-वर्ग मानचित्रण परियोजना ने स्थल को 25 वर्गों में बाँटकर हज़ारों संरचनाओं व सड़कों-बाज़ारों के निशान श्रमसाध्य रूप से दर्ज किए।
पूरक भूमिका। पुरोहितों की मौखिक स्मृतियाँ मुख्यतः धार्मिक केंद्र (विरुपाक्ष मंदिर, पम्पादेवी के पूजास्थल) तक सीमित थीं; अभिलेख, यात्री-वृत्तांत और मानचित्रण सर्वेक्षण ने इसे राजकीय केंद्र, शहरी केंद्र, जल-प्रणाली और दुर्गीकरण जैसे व्यापक क्षेत्रों तक विस्तृत किया, जिन्हें अकेले मौखिक परंपरा दर्ज नहीं कर सकती थी।

2 जल-आवश्यकताओं की पूर्ति

प्रश्न 2 (100-150 शब्द)

प्र. विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?

उत्तर:
1. भौगोलिक चुनौती। नगर तुंगभद्रा से बने एक प्राकृतिक बेसिन में, ग्रेनाइट पहाड़ियों से घिरा, प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में स्थित था, जिसने वर्षा-जल संग्रहण को अनिवार्य बना दिया।
2. बाँध और जलाशय। पहाड़ी झरनों के आर-पार बाँधों ने जलाशय बनाए; सबसे महत्वपूर्ण, पंद्रहवीं सदी के आरंभ का कमलपुरम् जलाशय, ने निकटवर्ती खेतों की सिंचाई की और नहर से ‘राजकीय केंद्र’ तक पानी पहुँचाया।
3. हिरिया नहर। तुंगभद्रा के एक बाँध से पानी लेते हुए, संभवतः संगम राजवंश के अधीन बनी, इसने वह घाटी सींची जो ‘धार्मिक केंद्र’ को ‘शहरी केंद्र’ से अलग करती थी।
4. दूर से जल-आपूर्ति। पेस के अनुसार कृष्णदेव राय द्वारा बनवाए गए एक तालाब में पानी 9 मील (लगभग 15 किलोमीटर) से अधिक दूर से नालियों द्वारा लाया जाता था, और इसके लिए एक पहाड़ी तोड़ी गई।

3 दुर्गीकृत क्षेत्र में कृषि-भूमि

प्रश्न 3 (100-150 शब्द)

प्र. शहर के क़िलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?

उत्तर:
फ़ायदे। अब्दुर रज़्ज़ाक ने दुर्ग की सात पंक्तियों का वर्णन किया, जो नगर के साथ-साथ इसकी कृषि-भूमि और वनों को भी घेरती थीं। घिरा हुआ विजयनगर लंबी घेराबंदी के दौरान अपनी ही दीवारों के भीतर की भूमि से स्वयं को पोषित कर सकता था, न कि केवल संचित अन्न-भंडारों पर निर्भर रहकर, जो लंबी घेराबंदी सहने की रणनीति के रूप में एक बड़ा सामरिक लाभ था।
नुकसान। यह एक महँगा विकल्प था: खेती की भूमि को घेरने के लिए दुर्ग-दीवारों की परिधि कहीं अधिक लंबी बनानी पड़ती थी, जिसमें अधिक श्रम, समय और संसाधन लगते थे, और इतनी लंबी दीवार की रक्षा करना भी अधिक चुनौतीपूर्ण था।
निष्कर्ष। अब्दुर रज़्ज़ाक ने स्वयं नोट किया कि ‘पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं’, जिसकी पुष्टि पेस और आज के पुरातत्व दोनों करते हैं, यह दिखाते हुए कि यह जान-बूझकर अपनाई गई एक दीर्घकालिक सुरक्षा-नीति थी।

4 महानवमी डिब्बा के अनुष्ठान

प्रश्न 4 (100-150 शब्द)

प्र. आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?

उत्तर:
1. उत्सव से जुड़ाव। यहाँ के अनुष्ठान संभवतः दस-दिवसीय शरद उत्सव महानवमी (‘महान नौवें दिन’) के साथ मेल खाते थे, जिसे अन्यत्र दशहरा, दुर्गा पूजा या नवरात्री कहा जाता है।
2. अनुष्ठान का स्वरूप। इसमें मूर्ति और राजकीय घोड़े की पूजा, पशु-बलि, नृत्य, कुश्ती, सजे घोड़ों-हाथियों-रथों के जुलूस, और नायकों व अधीनस्थ राजाओं द्वारा अनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ शामिल थीं।
3. सत्ता का प्रदर्शन। यह एक अंतिम सैन्य निरीक्षण में परिणत होता जहाँ नायक उपहार और श्रद्धांजलि देते, इस तरह यह राजा की सत्ता और सैन्य नियंत्रण के सार्वजनिक, प्रतीकात्मक प्रदर्शन का सबसे बड़ा वार्षिक अवसर था।
4. अनसुलझी पहेली। पर क्या बचा हुआ चबूतरा वास्तव में इन भीड़ों को समा सकता था, यह विवादित है; विद्वान नोट करते हैं कि आसपास की जगह वर्णित जुलूस के पैमाने के लिए बहुत छोटी लगती है, इसलिए यह संरचना अपने ही महत्त्व के बावजूद एक पहेली बनी हुई है।

5 विरुपाक्ष मन्दिर के स्तंभ का रेखाचित्र

प्रश्न 5 (चित्र-आधारित)

प्र. चित्र 7-33 विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प-विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
पुष्प-विषयक रूपांकन। हाँ। स्तंभ का शीर्ष खिलती पंखुड़ियों वाली कमल-कली के आकार का है, उसके बगल की टेक एक बड़े पत्ते या कली की तरह बाहर को मुड़ी है, और पटलों के बीच फूल जैसे गोल अलंकरणों तथा लहरदार बेलों की पट्टियाँ बनी हैं। बड़े जानवर का शरीर भी घुमावदार बेल-बूटों से ढका है।
जानवर। सबसे बड़ी आकृति एक पिछले पैरों पर खड़ा पौराणिक जानवर, याली, है: उसका चेहरा सिंह जैसा है, घने घुँघराले अयाल हैं, और वह स्तंभ के किनारे से सटकर उठा हुआ है; उसके पैरों के पास एक छोटी झुकी हुई आकृति है।
इन्हें क्यों चित्रित किया गया। ऐसे उग्र, उठे हुए जानवर शक्ति और रक्षा के प्रतीक हैं, जो मन्दिर के पवित्र स्थान की रखवाली करते प्रतीत होते हैं। यह उस काल की साम्राज्यिक शैली से भी मेल खाता है: मन्दिर शासकों की शक्ति के प्रदर्शन के लिए विशाल स्तर पर बनाए जाते थे, और युद्ध व राजकीय शोभायात्राओं के लिए ज़रूरी घोड़े और हाथी जैसे जानवर विजयनगर की मूर्तिकला में बार-बार दिखते हैं।
मानव आकृतियाँ। स्तंभ का मुख्य भाग एक के ऊपर एक छोटे पटलों में बँटा है। ऊपर के पटल में एक पैर उठाए नृत्य-मुद्रा में एक आकृति है; बीच के पटल में एक चबूतरे पर रखे शिवलिंग के पास एक आकृति पूजा के भाव से एक हाथ उठाए खड़ी है; नीचे के पटल में मुकुट और भारी आभूषण पहने, गोल पेट वाली एक बैठी हुई आकृति हाथ में गदा लिए है। नृत्य और पूजा के ये दृश्य अध्याय के उस वर्णन से मेल खाते हैं जिसमें देवताओं की मूर्तियों के सामने संगीत, नृत्य और नाटक के कार्यक्रम होते थे, और शिवलिंग उस मन्दिर के अनुरूप है जो शिव के एक रूप विरुपाक्ष का है।

6 ‘शाही केंद्र’ शब्द की उपयुक्तता

प्रश्न 6 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. ‘शाही केंद्र’ शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।

उत्तर:
1. पक्ष में तर्क। राजकीय केंद्र में 60 से अधिक मंदिर और लगभग 30 राजमहल-परिसर हैं, जो शासक-वर्ग की उपस्थिति और सत्ता-प्रदर्शन का स्पष्ट केंद्र थे। महानवमी डिब्बा जैसे अनुष्ठानिक चबूतरे और कमल महल, हज़ार राम मंदिर जैसी इमारतें स्पष्ट रूप से राजकीय समारोहों व राजपरिवार से जुड़ी थीं।
2. विपक्ष में तर्क। ‘राजा के महल’ के घेरे के पास राजकीय निवास होने का कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। सभा मंडप में इतने खंभों के गड्ढे हैं कि खाली फ़र्श कम बचता है, जिससे इसका सटीक प्रयोजन स्पष्ट नहीं है। इसी तरह महानवमी डिब्बा का सटीक अनुष्ठानिक उपयोग विद्वानों के बीच वास्तव में विवादित है, और कमल महल का नाम भी उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश यात्रियों ने बाद में दिया, इसके मूल प्रयोग से मेल खाने की कोई निश्चितता नहीं है।
3. निष्कर्ष। ‘शाही केंद्र’ नाम एक आधुनिक विद्वत्तापूर्ण वर्गीकरण है जो क्षेत्र के प्रमुख कार्य (शासन व अनुष्ठान से जुड़ी इमारतें) को सही ढंग से इंगित करता है, पर यह हर इमारत के सटीक प्रयोग की पूर्ण व्याख्या नहीं करता; मंदिरों के विपरीत, जो पूरी तरह चिनाई से बने थे, राजमहल जैसी इमारतों की ऊपरी संरचनाओं में नाशवान लकड़ी प्रयुक्त हुई, इसलिए बहुत कुछ अनुमान पर आधारित है। कुल मिलाकर यह शब्द उपयोगी है, पर पूर्णतः सटीक नहीं।

7 कमल महल और हाथियों के अस्तबल का स्थापत्य

प्रश्न 7 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?

उत्तर:
1. सांस्कृतिक खुलापन। कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसी इमारतें इंडो-इस्लामी स्थापत्य के मेहराब और गुंबद का प्रयोग करती हैं, जो तुर्की सुल्तानों द्वारा लाए गए और स्थानीय निर्माण-प्रथा के साथ अनुकूलित किए गए। यह दिखाता है कि विजयनगर के शासक दक्कन की सल्तनतों की स्थापत्य भाषा से भली-भाँति परिचित थे और धार्मिक-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद उसे अपनाने में संकोच नहीं करते थे।
2. व्यावहारिक व प्रतीकात्मक शक्ति। हाथियों के अस्तबल जैसी विशाल संरचनाएँ हाथियों जैसे बहुमूल्य सैन्य संसाधनों (जो युद्ध और भव्य जुलूसों दोनों में महत्वपूर्ण थे) के व्यवस्थित प्रबंधन और सार्वजनिक प्रदर्शन, दोनों पर दिए गए महत्त्व को दिखाती हैं।
3. अस्पष्ट प्रयोजन, स्पष्ट भव्यता। कमल महल का नाम उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश यात्रियों ने रखा (संभवतः यह एक परिषद-कक्ष था), और इसका ठीक-ठीक ऐतिहासिक प्रयोग निश्चित नहीं है, फिर भी इसकी सुघड़, बहु-स्तरीय संरचना और अलंकरण भव्यता व शासकीय अभिरुचि प्रदर्शित करने की स्पष्ट मंशा दिखाते हैं।
निष्कर्ष। ये भवन बताते हैं कि विजयनगर के शासक सैन्य शक्ति, राजनयिक व्यावहारिकता (प्रतिद्वंद्वी सल्तनतों से स्थापत्य उधार लेकर) और शाही भव्यता तीनों को एक साथ प्रदर्शित करना चाहते थे, भले ही आज इनके सटीक दैनिक प्रयोग के बारे में इतिहासकार पूरी तरह निश्चित न हों।

8 प्रेरणादायी स्थापत्य परंपराएँ

प्रश्न 8 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. स्थापत्य की कौन-कौन-सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?

उत्तर:
1. मंदिर-स्थापत्य की पुरानी परंपराएँ। विजयनगर ने पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल की मंदिर-निर्माण परंपराओं को आधार बनाया, विशेषकर तंजावुर के बृहदेश्वर और बेलूर के चन्नकेशव मंदिर की परंपराएँ, जिन क्षेत्रों की पहले से मज़बूत मंदिर-परंपराओं को साम्राज्य ने समाहित किया था।
2. राय गोपुरम का नवाचार। इन पर निर्माण करते हुए विजयनगर के वास्तुविदों ने राय गोपुरम नामक एक नया स्थापत्य पैमाना विकसित किया, जो अक्सर केंद्रीय तीर्थ के अपने ही शिखर को बौना बना देते थे, दूर से मंदिर की उपस्थिति की घोषणा करते हुए और शासक के संसाधनों-कौशल-तकनीक पर नियंत्रण प्रदर्शित करते हुए।
3. मंडप और गलियारे। मंदिरों में विस्तृत मंडप और लंबे स्तंभयुक्त गलियारे भी उभरे, जो विरुपाक्ष मंदिर में कृष्णदेव राय द्वारा अपने राज्यारोहण को चिह्नित करने हेतु बनवाए गए हॉल जैसे उदाहरणों में दिखते हैं।
4. इंडो-इस्लामी अनुकूलन। साथ ही प्रवेश-द्वारों में इंडो-इस्लामी स्थापत्य के मेहराब और गुंबद प्रयुक्त किए गए, जो तुर्की सुल्तानों द्वारा लाए गए थे, पर स्थानीय निर्माण-प्रथा के साथ परस्पर-क्रिया से अनुकूलित किए गए, जैसा कमल महल में दिखता है।
5. अपनी नई पहल। अब राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित की जाने लगीं, राजा की मन्दिर-यात्राओं को महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर माना जाने लगा, और नए देवता भी अपनाए गए, जैसे विट्ठल, जो सामान्यतः महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विष्णु के एक रूप हैं; विट्ठल मन्दिर में रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर है और गोपुरम् से सीधी जाने वाली रथ गलियाँ हैं, जिनके दोनों ओर के स्तंभ वाले मण्डपों में व्यापारी दुकानें लगाते थे।
निष्कर्ष। विजयनगर के वास्तुविदों ने पुरानी दक्षिण भारतीय मंदिर-परंपराओं को नए, बड़े पैमाने के प्रवेश-द्वारों और उत्तर से आई इंडो-इस्लामी शैलियों के साथ जोड़कर एक विशिष्ट, संकर स्थापत्य भाषा बनाई।

9 सामान्य लोगों के जीवन की छवि

प्रश्न 9 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं?

उत्तर:
1. आवास और मोहल्ले। बरबोसा सामान्य आवास के बारे में लिखता है: ‘लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।’। शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने में मिली उत्कृष्ट चीनी मिट्टी (पोर्सलेन) और एक मुस्लिम आवासीय मोहल्ला संकेत देते हैं कि धनी व्यापारी भी वहाँ रहते थे।
2. बाज़ार और व्यापार। पेस बाज़ारों को माणिक्य, हीरे, मोतियों जैसी बहुमूल्य वस्तुओं के साथ-साथ नींबू, संतरे, अंगूर जैसी सामान्य बाग़-उपज से भरा ‘विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर’ कहता है; नूनिज़ बाज़ारों को सस्ते और फलों से भरपूर बताता है, जो एक जीवंत, विविध रोज़मर्रा व्यापारिक जनजीवन का संकेत देता है।
3. धार्मिक जीवन। केंद्र भर में बिखरे अनेक छोटे तीर्थ कई समानांतर पंथों की ओर इशारा करते हैं, जबकि कुएँ और मंदिर/वर्षा-जल तालाब सामान्य निवासियों की जल-आवश्यकताएँ पूरी करते थे, यह दिखाते हुए कि साधारण धार्मिक जीवन राजकीय अनुष्ठानों से अलग, स्थानीय स्तर पर भी सक्रिय था।
4. सीमाएँ। पर सामान्य आवास का लगभग कुछ भी भौतिक रूप से नहीं बचा, इसलिए यह छवि मुख्यतः यात्री-वृत्तांतों पर निर्भर है; अध्याय स्वयं स्वीकार करता है कि इमारतें यह नहीं बता सकतीं कि सामान्य पुरुष-स्त्रियाँ राजकीय या धार्मिक केंद्रों तक पहुँच रखते थे या नहीं, या नगर बनाने वाले शिल्पी-मज़दूर कौन थे।
निष्कर्ष। कुल मिलाकर एक व्यस्त, समृद्ध, बहु-सांस्कृतिक नगरीय जीवन की छवि उभरती है, जो व्यापार और साधारण धार्मिकता पर पनपता था, भले ही इसके भौतिक अवशेष लगभग पूरी तरह खो चुके हों।

10 मानचित्र कार्य

प्रश्न 10 (मानचित्र कार्य)

प्र. विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इटली, पुर्तगाल, ईरान तथा रूस को सन्निकटता से अंकित कीजिए। उन मार्गों को पहचानिए जिनका प्रयोग पृ. 176 पर उल्लिखित यात्रियों ने विजयनगर पहुँचने के लिए किया था।

उत्तर: यह उत्तर तालिका और चरणों के रूप में है, छपा हुआ मानचित्र नहीं: इसे विश्व के अपने सीमारेखा मानचित्र पर बनाइए।
पृ. 176 पर उल्लिखित यात्री: इतालवी व्यापारी निकोलो दे कॉन्ती, फ़ारस (आज का ईरान) के राजा का दूत अब्दुर रज़्ज़ाक और रूस का व्यापारी अफ़ानासी निकितिन (सभी पंद्रहवीं शताब्दी में); तथा पुर्तगाल के दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस और फर्नाओ नूनिज़ (सोलहवीं शताब्दी में)।
पहचानने वाले मार्ग: इटली से भूमध्य सागर और पश्चिम एशिया होते हुए फ़ारस की खाड़ी या लाल सागर, फिर अरब सागर पार कर भारत का पश्चिमी तट; ईरान से फ़ारस की खाड़ी से समुद्री मार्ग द्वारा कालीकट (अब्दुर रज़्ज़ाक कालीकट, आज के कोज़ीकोड, भेजा गया था); रूस से दक्षिण की ओर कैस्पियन सागर और ईरान होते हुए फ़ारस की खाड़ी, फिर समुद्र से पश्चिमी तट; पुर्तगाल से समुद्री मार्ग द्वारा अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे का चक्कर लगाकर हिंद महासागर पार करते हुए पश्चिमी तट (पुर्तगाली 1498 से यहाँ आने लगे और 1510 में गोवा जीता)। पश्चिमी तट के बंदरगाहों से सभी यात्री स्थल मार्ग से विजयनगर पहुँचे।

यात्री यह देश अंकित करें शताब्दी विजयनगर तक का मार्ग
निकोलो दे कॉन्ती इटली पंद्रहवीं भूमध्य सागर → पश्चिम एशिया → फ़ारस की खाड़ी या लाल सागर → अरब सागर → भारत का पश्चिमी तट → स्थल मार्ग
अब्दुर रज़्ज़ाक फ़ारस (ईरान) पंद्रहवीं फ़ारस की खाड़ी → अरब सागर → कालीकट → स्थल मार्ग
अफ़ानासी निकितिन रूस पंद्रहवीं दक्षिण की ओर कैस्पियन सागर और ईरान → फ़ारस की खाड़ी → अरब सागर → पश्चिमी तट → स्थल मार्ग
दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस, फर्नाओ नूनिज़ पुर्तगाल सोलहवीं अटलांटिक महासागर → अफ़्रीका के दक्षिणी सिरे का चक्कर → हिंद महासागर → पश्चिमी तट (गोवा) → स्थल मार्ग

मानचित्र कैसे बनाएँ: (1) इटली, पुर्तगाल, ईरान और रूस को छायांकित करके नाम लिखिए; (2) दक्षिण भारत में तुंगभद्रा के तट पर विजयनगर और पश्चिमी तट के बंदरगाह कालीकट व गोवा अंकित कीजिए; (3) हर यात्री का मार्ग तीर वाली रेखा से दिखाइए, स्थल पर सीधी और समुद्र पर टूटी रेखा, हर यात्री के लिए अलग रंग; (4) संकेत-सूची और शीर्षक लिखिए।

11 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11 (परियोजना कार्य)

प्र. भारतीय उपमहाद्वीप के किसी एक ऐसे प्रमुख शहर के विषय में और जानकारी हासिल कीजिए जो लगभग चौदहवीं-सत्रहवीं शताब्दियों में फला-फूला। शहर के स्थापत्य का वर्णन कीजिए। क्या कोई ऐसे लक्षण हैं जो इनके राजनीतिक केंद्र होने की ओर संकेत करें? क्या ऐसे भवन हैं जो आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण हों? कौन-से ऐसे लक्षण हैं जो शहरी भाग को आस-पास के क्षेत्रों से विभाजित करते हैं?

उत्तर (परियोजना कैसे करें): इस काल का कोई शहर चुनिए, जैसे बीजापुर, गोलकुण्डा, अहमदनगर, मदुरई या फ़तेहपुर सीकरी। फिर अध्याय की पद्धति अपनाइए: (1) राजनीतिक केंद्र: महल, सभा मंडप, क़िलेबंद दीवारें और प्रवेशद्वार खोजिए, जैसे विजयनगर का राजकीय केंद्र; (2) आनुष्ठानिक भवन: मन्दिर, मस्जिद, मक़बरे या पूजास्थल और वहाँ मनाए जाने वाले उत्सव; (3) शहरी भाग की पहचान: दीवारें, जल-व्यवस्था, सड़कें, बाज़ार और अलग-अलग अंचल, जो शहर को आस-पास के गाँवों और खेतों से अलग करते हैं, जैसे विजयनगर की रथ गलियाँ और पेस द्वारा वर्णित बाज़ार। एक नक्शा या रेखाचित्र जोड़िए और अपने स्रोत (यात्रा वृत्तांत, अभिलेख, तसवीरें, सर्वेक्षण) लिखिए।

प्रश्न 12 (परियोजना कार्य)

प्र. अपने आस-पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।

उत्तर (परियोजना कैसे करें): भवन का एक सरल नक्शा (समस्तरी अवलोकन) और एक खड़ा रेखाचित्र (ऊर्ध्व अवलोकन) बनाइए, जैसा अध्याय विरुपाक्ष मन्दिर और कमल महल के लिए करता है। उसमें प्रवेशद्वार, सभागार, गलियारे, स्तंभ, मेहराब, छत और पानी का स्रोत दिखाइए। फिर हर अभिलक्षण की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर से कीजिए: उसके ऊँचे गोपुरम्, कृष्णदेव राय द्वारा बनवाया गया उत्कीर्णित स्तंभों वाला मण्डप, देवस्थलों के चारों ओर स्तंभों वाले गलियारे, संगीत-नृत्य, देवी-देवताओं के विवाह और झूले के लिए सभागार, और मन्दिर का जलाशय। लिखिए कि आज आपके भवन का हर भाग किस काम आता है, और अभिलेखों, दस्तावेज़ों या बुज़ुर्गों से पता कीजिए कि इसे किसने और कब बनवाया।

12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।

पाठगत प्रश्न 1 · चित्र 7.2

प्र. मैकेन्जी और उनके देशज़ सूचनादाताओं को चित्रकार ने किस प्रकार चित्रित किया है? उनके तथा उनके सूचनादाताओं के विषय में दर्शकों पर किस प्रकार के विचार डालने का प्रयास किया गया है?

उत्तर: मैकेन्जी चित्र के बीच में, चटक लाल वर्दी में, रोशनी में और आत्मविश्वास से भरे खड़े हैं; उनके सहायक, दूरबीन थामे चपरासी और ब्राह्मण सहायक, किनारों पर और पीछे, गहरे रंगों में और कुछ छाया में दिखाए गए हैं। चित्र दर्शक के मन में यह विचार डालता है कि मैकेन्जी ही नेता और ज्ञान के असली खोजकर्ता हैं, जबकि जानकारी का बड़ा हिस्सा देने वाले भारतीय सूचनादाता केवल सहायक की तरह दिखते हैं।

पाठगत प्रश्न 2 · स्रोत 2

प्र. आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा?

उत्तर: युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए आयातित घोड़े और हाथी बहुत ज़रूरी थे, और राजा चाहता था कि वे उसके पास आएँ, दुश्मनों के पास नहीं। व्यापार से मिलने वाला राजस्व राज्य की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देता था, और शहर की समृद्ध जनता रत्नों और आभूषणों की माँग करती थी। लाभ पाने वालों में राजा और राज्य, विदेशी व्यापारी और नाविक, कुदिरई चेट्टी जैसे स्थानीय व्यापारी, बंदरगाह वाले शहर और इन वस्तुओं के धनी ख़रीदार शामिल थे।

पाठगत प्रश्न 3 · मानचित्र 1

प्र. उन आधुनिक राज्यों को चिह्नित कीजिए जो विजयनगर साम्राज्य का भाग थे।

उत्तर: साम्राज्य उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था, इसलिए इसमें आज के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल, तथा तेलंगाना के कृष्णा से दक्षिण वाले भाग शामिल थे।

पाठगत प्रश्न 4 · खंड 2.3 · चर्चा कीजिए

प्र. मानचित्र 1 पर चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर तथा मैसूर को चिह्नित कीजिए, ये सभी नायक शक्ति के केंद्र थे। यह भी चर्चा कीजिए कि नदियों और पहाड़ों ने किन मायनों में विजयनगर के साथ संचार को सरल अथवा बाधित किया।

उत्तर: मानचित्र 1 पर इक्केरी पश्चिम में तट के पास, मैसूर दक्षिण में, चन्द्रगिरी दक्षिण-पूर्व में (तिरुपति के पास), और तंजावुर व मदुरई सुदूर दक्षिण में तमिलनाडु में हैं। तुंगभद्रा और कावेरी जैसी नदियों की घाटियाँ प्राकृतिक रास्ते और उपजाऊ भूमि देती थीं, जिससे आवाजाही आसान होती थी; पर चौड़ी नदियों को पार करना पड़ता था और पहाड़ियाँ व जंगली ऊँचे इलाके (जैसे इक्केरी के पास) यात्रा धीमी कर देते थे। कोई केंद्र जितना दूर और कटा हुआ होता, जैसे मदुरई और तंजावुर, राजा के लिए उस पर नियंत्रण रखना उतना ही कठिन होता, इसी से समझ आता है कि नायक विद्रोह कर पाते थे और बाद में स्वतंत्र राज्य बना लेते थे।

पाठगत प्रश्न 5 · चित्र 7.4

प्र. नक्शे पर बने तीन अंचलों को पहचानिए। मध्यभाग को ध्यान से देखिए। क्या आप नदियों से जुड़ती हुई नहरों को देख सकते हैं? आप कितनी किलेबन्द दीवारों को देख सकते हैं। क्या धार्मिक केंद्र किलेबन्द था?

उत्तर: तीन अंचल हैं: धार्मिक केंद्र (उत्तर में, तुंगभद्रा के किनारे, हम्पी के पास), राजकीय केंद्र (दक्षिण-पश्चिम में) और शहरी केंद्र (इन दोनों के बीच, दक्षिण और पूर्व का बड़ा भाग)। मध्यभाग में खेती वाली घाटी से होकर नदी से पानी लाती नहरें देखी जा सकती हैं। नक्शे पर शहरी केंद्र और राजकीय केंद्र के चारों ओर दीवारों की रेखाएँ दिखती हैं; धार्मिक केंद्र नदी के किनारे फैला है और राजकीय केंद्र की तरह अपनी अलग दीवार से घिरा नहीं दिखता, इसलिए वह अलग से किलेबन्द प्रतीत नहीं होता।

पाठगत प्रश्न 6 · स्रोत 3

प्र. क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? आपके विचार में पेस ने उद्यानों तथा जल-स्रोतों को विशेष-उल्लेख के लिए क्यों चुना?

उत्तर: कुछ अभिलक्षण, जैसे पार्क और कुछ झीलें, आज भी मिल जाते हैं, पर ज़्यादातर आधुनिक शहरों में उपवन, घरों के बगीचे या बीच से बहती पानी की नालियाँ कम ही दिखती हैं। पेस ने इनका विशेष उल्लेख इसलिए किया क्योंकि विजयनगर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में था, इसलिए इतनी हरियाली और पानी अनोखा था; यह शहर की समृद्धि और पानी के संचयन व वितरण के कुशल प्रबंध को भी दिखाता था।

पाठगत प्रश्न 7 · चित्र 7.6 और 7.7

प्र. इन दो प्रवेश-द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। आपके विचार में विजयनगर के शासकों ने इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया?

उत्तर: समानताएँ: दोनों प्रवेशद्वार किसी महत्त्वपूर्ण स्थान में प्रवेश को नियंत्रित करते हैं और उसे प्रभावशाली बनाते हैं। विभिन्नताएँ: क़िलेबंद दीवार का प्रवेशद्वार (चित्र 7.6) सादा है, उसमें नुकीली मेहराब और द्वार के ऊपर गुंबद है, जो तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित इण्डो-इस्लामी शैली के तत्त्व हैं; गोपुरम् (चित्र 7.7) कई मंज़िलों में ऊपर उठती, पतली होती ऊँची मीनार है, मूर्तियों से ढकी हुई, और उसमें गुंबद नहीं है। शासकों ने इण्डो-इस्लामी तत्त्व इसलिए अपनाए क्योंकि दक्कन की सल्तनतों से लगातार संपर्क से स्थापत्य के क्षेत्र में विचारों का आदान-प्रदान होता था; उन्होंने उपयोगी तकनीकें ग्रहण कीं और उन्हें आगे विकसित किया।

पाठगत प्रश्न 8 · चित्र 7.9

प्र. आपके विचार में ये टुकड़े मूलतः किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे?

उत्तर: नीले-सफ़ेद रंग से चित्रित, घुमावदार परिष्कृत चीनी मिट्टी के ये टुकड़े कटोरों, प्लेटों व तश्तरियों, प्यालों और छोटे मर्तबानों के हिस्से लगते हैं: महँगे बर्तन, जिनका प्रयोग उस क्षेत्र में रहने वाले अमीर व्यापारी करते थे।

पाठगत प्रश्न 9 · चित्र 7.10

प्र. क्या इस मस्जिद में इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्व विद्यमान हैं?

उत्तर: नहीं। यह पत्थर के चौकोर स्तंभों की पंक्तियों वाला, सपाट छत का एक कक्ष है, जिसमें न मेहराब है, न गुंबद, न मीनार। यह हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों जैसा दिखता है, और अध्याय भी यही कहता है कि इस मुहल्ले के मक़बरों और मस्ज़िदों का स्थापत्य मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।

पाठगत प्रश्न 10 · खंड 4 · चर्चा कीजिए

प्र. विजयनगर की रूपरेखा की तुलना अपने नगर या गाँव की रूपरेखा से कीजिए।

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: विजयनगर धार्मिक केंद्र, राजकीय केंद्र और शहरी केंद्र में बँटा था, जिन्हें कई दीवारें घेरती थीं और जिनके भीतर खेत भी थे; जलाशय और नहरें थीं, सड़कें घाटियों से होकर जाती थीं और मन्दिरों की गलियों में बाज़ार लगते थे। मेरे नगर में दीवारें नहीं हैं; पुराना बाज़ार एक मन्दिर के पास मुख्य सड़क पर बसा है, जैसे विजयनगर में, पर दफ़्तर, स्कूल और घर अलग-अलग अंचलों में नहीं बल्कि मिले-जुले हैं, और पानी जलाशयों व नहरों से नहीं, पाइपों से आता है।

पाठगत प्रश्न 11 · चित्र 7.12

प्र. क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं?

उत्तर: महानवमी डिब्बा के आधार के पटलों पर सवारों और सेवकों के साथ घोड़ों की पंक्तियाँ, तीरंदाज़ों और जानवरों वाले शिकार के दृश्य, और सैनिकों व लोगों की शोभायात्राएँ उकेरी गई हैं। ये त्यौहार के उत्सवों से मेल खाते हैं: घोड़ों, हाथियों और सैनिकों की शोभायात्रा और राजा की ताक़त का प्रदर्शन।

पाठगत प्रश्न 12 · चित्र 7.13, 7.14 और 7.15

प्र. चित्र 7.13 तथा 7.15 की तुलना कीजिए तथा उन अभिलक्षणों की सूची बनाइये जो दोनों में हैं, और साथ ही उनकी भी जो इनमें से केवल एक में ही देखे जा सकते हैं। चित्र 7.14 में बनी मेहराब की तुलना चित्र 7.6 में बनी मेहराब से कीजिए। कमल महल में नौ मीनारें थीं, बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ-साथ। छाया-चित्र तथा खड़े रेखाचित्र में आप कितनी-कितनी मीनारें देख पाते हैं। यदि आप कमल महल का फिर से नामकरण करते तो इसे क्या कहते?

उत्तर: दोनों में: दो मंज़िलें, नीचे की मंज़िल पर लहरदार किनारों वाली मेहराबों की पंक्ति, ऊपर छोटी मेहराबदार खिड़कियाँ, बाहर निकले छज्जे और शीर्ष पर पिरामिड जैसी मीनारें। केवल खड़े रेखाचित्र में: सामने का पूरा भाग सीधा और समान रूप से, आधार और हर मेहराब साफ़। केवल छाया-चित्र में: एक कोण से दिखता भवन, उसकी गहराई, प्लास्टर की टूट-फूट और आसपास का परिवेश। चित्र 7.14 की मेहराब लहरदार किनारों वाली और बारीक उत्कीर्णन से सजी है, जबकि चित्र 7.6 के प्रवेशद्वार की मेहराब सादी नुकीली मेहराब है। दोनों चित्रों में नौ में से लगभग पाँच मीनारें दिखती हैं, बीच की ऊँची मीनार और भुजाओं की कुछ मीनारें; बाकी पीछे छिप जाती हैं। नया नाम हो सकता है ‘परिषद भवन’, क्योंकि मैकेन्जी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।

पाठगत प्रश्न 13 · चित्र 7.16 और 7.17

प्र. चित्र 7.16(क) तथा 7.16(ख) की तुलना चित्र 7.17 से कीजिए। प्रत्येक में दिखाई देने वाले अभिलक्षणों की सूची बनाइए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?

उत्तर: खड़ा रेखाचित्र (7.16 क): ग्यारह खंडों वाला लंबा सामने का भाग, हर खंड में बड़ा मेहराबदार प्रवेश और ऊपर गुंबद, बीच में ऊँचा मंडप। नक्शा (7.16 ख): एक पंक्ति में ग्यारह बड़े वर्गाकार कक्ष, हर एक में एक ओर चौड़ा द्वार। छाया-चित्र (7.17): वही लंबा भवन अपने परिवेश में, कुछ गुंबद क्षतिग्रस्त। कक्ष बड़े, ऊँचे और चौड़े द्वारों वाले हैं, हाथियों के लिए पर्याप्त, इसलिए ये अस्तबल हो सकते थे; पर कोई सीधा प्रमाण नहीं दिया गया है, इसलिए ‘कमल महल’ की तरह यह नाम भी बाद में दिया गया हो सकता है।

पाठगत प्रश्न 14 · चित्र 7.18

प्र. क्या आप नृत्य के दृश्यांशों को पहचान सकते हैं। आपके विचार में हाथियों और घोड़ों को पटलों पर क्यों चित्रित किया गया था?

उत्तर: हाँ, सबसे ऊपर की पंक्ति में स्त्रियाँ नृत्य-मुद्राओं में हैं। नीचे की पंक्तियों में कूच करते सैनिक, घोड़े और हाथियों की पूरी पंक्ति है। घोड़े और हाथी सेना और महानवमी जैसी राजकीय शोभायात्राओं का मुख्य आधार थे; राजा और उसके परिवार के लिए बने इस मन्दिर में वे राजा की सैन्य शक्ति और समृद्धि दिखाते थे।

पाठगत प्रश्न 15 · खंड 4.2 · चर्चा कीजिए

प्र. नायकों ने विजयनगर के शासकों की भवन निर्माण परंपराओं को जारी क्यों रखा?

उत्तर: नायक साम्राज्य का हिस्सा रहे थे और उसी तरह शासन करना चाहते थे। साम्राज्यिक शैली में महलनुमा संरचनाएँ और मन्दिर बनाकर वे विजयनगर के राजाओं जैसी प्रतिष्ठा और वैधता का दावा कर सकते थे, अपनी शक्ति और संपत्ति दिखा सकते थे और समर्थन पा सकते थे; साम्राज्य के कुशल कारीगर भी उन्हें उपलब्ध थे। इसीलिए उन्होंने क़िलेबंदी और मन्दिर निर्माण की परंपराओं को जारी रखा और और अधिक व्यापक बनाया।

पाठगत प्रश्न 16 · चित्र 7.21

प्र. नक्शे में दिए गए स्केल का प्रयोग कर मुख्य गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी नापिए। जलाशय से देवालय तक जाने के लिए सबसे आसान मार्ग कौन सा रहा होगा?

उत्तर: 30 मी के स्केल से नापने पर मुख्य (पूर्वी) गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी लगभग 150-170 मीटर आती है (छपे नक्शे से मोटा अनुमान)। जलाशय उत्तर में है, इसलिए जलाशय से देवालय तक सबसे आसान मार्ग दूसरे, उत्तरी प्रवेशद्वार (काले रंग से भरा दूसरा द्वार) से रहा होगा, जो जलाशय की ओर से सीधे देवालय के चारों ओर के भीतरी आँगन में खुलता है।

पाठगत प्रश्न 17 · चित्र 7.23

प्र. स्तंभ पर आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए।

उत्तर: स्तंभ के किनारे पर मुकुटधारी एक योद्धा पिछले पैरों पर खड़े याली (घुँघराले अयाल वाला सिंह जैसा पौराणिक जानवर) पर सवार है, जिसका शरीर घुमावदार बेलों से ढका है। स्तंभ का मुख्य भाग एक के ऊपर एक छोटे उत्कीर्णित पटलों में बँटा है, जिनमें एक नर्तक और हाथ उठाए, डंडा पकड़े एक आकृति जैसी आकृतियाँ हैं, और बीच-बीच में फूलों जैसी सजावट की पट्टियाँ हैं।

पाठगत प्रश्न 18 · चित्र 7.24

प्र. क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे?

उत्तर: इस रूप में शायद नहीं। यह ‘रथ’ पत्थर का एक भारी, स्थिर मन्दिर है, जिसके पत्थर के पहिये घूम नहीं सकते। असली मन्दिर-रथ लकड़ी के बनाए जाते थे ताकि शोभायात्राओं में उन्हें रथ गलियों में खींचा जा सके; यह पत्थर का मन्दिर उन्हीं के आकार की नक़ल करता है।

पाठगत प्रश्न 19 · खंड 5.2 · चर्चा कीजिए

प्र. आनुष्ठानिक स्थापत्य की पूर्ववर्ती परंपराओं को विजयनगर के शासकों ने कैसे और क्यों अपनाया तथा रूपान्तरित किया?

उत्तर: कैसे: उन्होंने पल्लव, चालुक्य, होयसाल तथा चोल वंशों की मन्दिर-परंपराओं को आधार बनाया, पर उन्हें विशाल स्तर तक पहुँचाया: केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना बनाने वाले राय गोपुरम्, मण्डप और लंबे स्तंभों वाले गलियारे, मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ, राजा की मन्दिर-यात्राओं को राजकीय अवसर बनाना, और विट्ठल जैसे नए देवताओं की पूजा आरंभ करना। क्यों: अपने आप को ईश्वर से जोड़ने के लिए (वे विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे), अपनी सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के लिए, और अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात कर एक साम्राज्यिक संस्कृति बनाने के लिए।

पाठगत प्रश्न 20 · चित्र 7.27

प्र. अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? मानचित्र में दिए गए पैमाने का प्रयोग करते हुए किसी एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए।

उत्तर: अक्षर I का प्रयोग नहीं किया गया (वर्ग A-H और J-Z हैं, कुल 25)। 5 कि.मी. के पैमाने से नापने पर हर वर्ग पैमाने की पट्टी से थोड़ा छोटा, लगभग 4-4.5 कि.मी. भुजा वाला आता है (छपे मानचित्र से मोटा अनुमान)।

पाठगत प्रश्न 21 · चित्र 7.28

प्र. इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है?

उत्तर: रैखिक (पट्टी) पैमाना, जिस पर 0, 500 मी और 1 कि.मी. अंकित हैं: मानचित्र पर पट्टी की लंबाई ज़मीन पर 1 कि.मी. दर्शाती है।

पाठगत प्रश्न 22 · चित्र 7.29

प्र. किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, एक केंद्रीय देवालय, तथा मन्दिर तक जाने वाले रास्तों के अवशेषों को खोजिए। मानचित्र पर उन वर्गों को नाम दीजिए जिनमें मन्दिर का नक्शा स्थित है।

उत्तर: दीवारों से घिरा एक आयताकार मन्दिर, जिसके भीतर केंद्रीय देवालय है, वर्ग NM के ऊपरी-मध्य भाग में छोटे वर्ग h (NMh) में स्थित है; उसके पास छोटी संरचनाएँ हैं और दक्षिण की ओर से उस तक आते रास्ते के निशान हैं। (यहाँ भी अक्षर i का प्रयोग नहीं हुआ है।)

पाठगत प्रश्न 23 · चित्र 7.30

प्र. गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक पहुँचने के लिए आप किन भागों से होकर गुज़रेंगे।

उत्तर: गोपुरम् दीवारों में काले रंग से भरे प्रवेशद्वार हैं (मुख्य उत्तर की ओर, और छोटे पूर्व व पश्चिम में); स्तंभावलियाँ भीतरी दीवार के अंदर की ओर चलती बिंदुओं (स्तंभों) की पंक्तियाँ हैं; सभागार देवालय के सामने बिंदुओं से भरे आयत हैं; केंद्रीय देवालय बीच का छोटा वर्गाकार कक्ष है। बाहरी प्रवेशद्वार से आप बाहरी घेरे, फिर मुख्य गोपुरम् से होकर स्तंभावलियों से घिरे भीतरी आँगन, फिर स्तंभों वाले सभागार और अंतराल से गुज़रकर केंद्रीय देवालय तक पहुँचेंगे।