कक्षा 12 इतिहास अध्याय 8 किसान, ज़मींदार और राज्य NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग II के अध्याय 8 ‘किसान, ज़मींदार और राज्य’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, लगभग 250-300 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और स्रोतों व चित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।

1 आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की समस्याएँ

प्रश्न 1 (100-150 शब्द)

प्र. कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?

उत्तर: आइन-ए-अकबरी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह “ऊपर से देखा गया दृश्य” देती है। इसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने दरबार के दृष्टिकोण से लिखा, जिसका केंद्रीय उद्देश्य साम्राज्य को एक सशक्त शासक के अधीन सामाजिक सद्भाव से बँधे साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत करना था; इसलिए इसमें किसी भी विद्रोह को असफल होना पहले से तय माना गया है, जो वास्तविकता को विकृत कर सकता है।
इसके अतिरिक्त आइन में तकनीकी सीमाएँ भी हैं: कई योग-त्रुटियाँ हैं, अधिकतर सहायकों की छोटी अंकगणितीय या लिपि-चूक; और कवरेज असमान है, जैसे ज़मींदारों की जाति-जानकारी बंगाल और उड़ीसा के लिए अनुपस्थित है, और विस्तृत मूल्य व मज़दूरी के आँकड़े मुख्यतः आगरा के आसपास से हैं, जो अन्यत्र इसकी प्रासंगिकता सीमित करते हैं।
इतिहासकार इन समस्याओं से निपटने के लिए आइन को क्षेत्रीय अभिलेखों से पूरक बनाते हैं: गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के विस्तृत राजस्व-दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापक अभिलेख, जो किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के वास्तविक संघर्षों को दर्ज करते हैं और यह भी प्रकट करते हैं कि किसान स्वयं उचित व्यवहार से क्या अपेक्षा रखते थे।

2 क्या कृषि उत्पादन को निर्वाह-कृषि कहा जा सकता है?

प्रश्न 2 (100-150 शब्द)

प्र. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की कृषि उत्पादन को पूर्णतः निर्वाह-कृषि नहीं कहा जा सकता। यद्यपि अधिकतर किसान अपने परिवार के लिए अनाज उगाते थे, पर मुग़ल राज्य ने जिन्स-ए-कामिल (“उत्तम फ़सलें”) जैसी नक़दी फ़सलों को ऊँचे राजस्व के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया: सबसे ऊपर कपास (मध्य भारत, दक्कन) और गन्ना (बंगाल), साथ ही तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन। यह महत्वपूर्ण है कि निर्वाह और वाणिज्यिक खेती एक औसत किसान की अपनी ही ज़मीन पर घनिष्ठता से जुड़ी थीं, एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं।
इसके अलावा, दो-फ़सला खेती आम थी (आइन आगरा में 39, दिल्ली में 43, बंगाल में चावल की 50 किस्में दर्ज करती है), जो अतिरिक्त उत्पादन का प्रमाण है। एक नक़द अर्थव्यवस्था भी पहले ही विकसित हो चुकी थी: मुग़ल हृदयक्षेत्र में भी राजस्व नक़द में आँका-वसूला जाता था, निर्यातोन्मुख शिल्पी (बुनकर, कपास-रेशम-नील के उत्पादक) नक़द अग्रिम व मज़दूरी पाते थे, और ज़मींदार अक्सर बाज़ार (हाट) स्थापित करते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचते थे। अतः यह विशुद्ध निर्वाह-कृषि नहीं बल्कि निर्वाह व वाणिज्यिक खेती का घनिष्ठ मिश्रण थी।

3 कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका

प्रश्न 3 (100-150 शब्द)

प्र. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।

उत्तर: पुरुष और स्त्रियाँ मिलकर खेतों में काम करते थे: पुरुष जोतते और हल चलाते थे, जबकि स्त्रियाँ बोतीं, निराई करतीं, गाहतीं और ओसातीं। केंद्रित गाँवों और व्यक्तिगत किसान-खेती के साथ, पूरे घराने का श्रम और संसाधन ही उत्पादन का आधार थे, इसलिए घर/खेत, स्त्री/पुरुष का स्वच्छ विभाजन कभी वास्तव में संभव नहीं था। फिर भी जैविक वर्जनाएँ बनी रहीं: मासिक धर्म से गुज़र रही स्त्रियाँ पश्चिम भारत में हल या कुम्हार के चाक को नहीं छू सकती थीं, या बंगाल के पान के बाग़ों में प्रवेश नहीं कर सकती थीं।
धागा कातना, मिट्टी के बर्तनों के लिए मिट्टी छानना व गूँधना, और कढ़ाई, ये सब भारी मात्रा में स्त्री-श्रम पर निर्भर थे; कोई उत्पाद जितना अधिक वाणिज्यिक होता, स्त्रियों के काम की माँग उतनी ही अधिक होती, जो उन्हें खेतों के साथ-साथ नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों तक भी ले जाती। स्त्रियाँ दोहरे रूप से महत्वपूर्ण थीं, श्रम-शक्ति और संतान-उत्पादक दोनों के रूप में, यद्यपि उच्च स्त्री-मृत्यु-दर ने पत्नियों की वास्तविक कमी पैदा की, जिसने वधू-मूल्य और पुनर्विवाह जैसी विशिष्ट ग्रामीण रीतियों को आकार दिया।

4 मौद्रिक कारोबार का महत्व

प्रश्न 4 (100-150 शब्द)

प्र. विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।

उत्तर: ग्रामीण इलाक़ा एक सक्रिय नक़द अर्थव्यवस्था से पहले ही जुड़ चुका था। मुग़ल हृदयक्षेत्र में भी भूमि-राजस्व नक़द में आँका और वसूला जाता था; अकबर ने अमील-गुज़ार (राजस्व वसूलीकर्ता) को नक़द भुगतान को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया, यद्यपि वस्तु-भुगतान भी उपलब्ध रखा गया। निर्यातोन्मुख शिल्पी, जैसे बुनकर और कपास-रेशम-नील के उत्पादक, नक़द अग्रिम और मज़दूरी पाते थे। ज़मींदार अक्सर बाज़ार (हाट) स्थापित करते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचते थे, जिससे ग्रामीण इलाक़े का मुद्रीकरण तेज़ हुआ।
सत्रहवीं सदी के फ्रांसीसी यात्री ज़्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि ‘भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।’ सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे। इसके अलावा नई दुनिया से आए वैश्विक चाँदी-प्रवाह ने सोलहवीं-अठारहवीं सदी के बीच उल्लेखनीय मुद्रा-स्थिरता (विशेषतः चाँदी की रुपया) दी, सिक्का-ढलाई और नक़द-प्रचलन का विस्तार किया, और मुग़ल राज्य की नक़द में कर लगाने-वसूलने की क्षमता को सुदृढ़ किया।

5 भू-राजस्व मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होने के प्रमाण

प्रश्न 5 (100-150 शब्द)

प्र. उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।

उत्तर: भूमि-राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ थी, जिसे एक बड़े प्रशासनिक तंत्र की आवश्यकता थी, जिसका नेतृत्व दीवान का कार्यालय (दफ़्तर) करता था और जो साम्राज्य की पूरी वित्तीय व्यवस्था की देखरेख करता था। राजस्व-आँकलन दो सावधानीपूर्वक चरणों में होता था: जमा (आँकी गई राशि) और हासिल (वास्तव में वसूली गई राशि)। खेती की हुई और खेती-योग्य दोनों भूमि प्रांत-दर-प्रांत मापी गई; आइन ने अकबर के अधीन इन कुल योगों को संकलित किया, और यह मापन बाद के बादशाहों के अधीन भी जारी रहा, औरंगज़ेब ने 1665 में वार्षिक गाँव-स्तरीय कृषक-गणना का आदेश तक दिया।
भूमि को पोलज, परौती, चचर और बंजर में सूक्ष्मता से वर्गीकृत किया जाता था, और आगे अच्छी-मध्यम-ख़राब में बाँटकर मध्यम उपज का एक-तिहाई राजस्व के रूप में दावा किया जाता था; आँकलन कणकुत, बटाई, खेत-बटाई या लाँग बटाई जैसी कई सावधानीपूर्वक विधियों से होता था। इतनी विस्तृत, बार-बार जाँची गई व्यवस्था स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भूमि-राजस्व राज्य के लिए केंद्रीय महत्व रखता था।

6 निबंध · कृषि समाज में जाति का कारक

प्रश्न 6 (लघु निबंध, 250-300 शब्द)

प्र. आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?

उत्तर: जाति ने किसान वर्ग को गहराई से असमान बनाया, यद्यपि इसका प्रभाव समाज के अलग-अलग स्तरों पर भिन्न-भिन्न ढंग से पड़ा। सबसे नीचे, एक महत्वपूर्ण हिस्सा भूमिहीन साधारण मज़दूरों (मज़ूर) के रूप में काम करता था, जिन्हें साधारण काम दिए जाते और चाहे कितनी भी खेती-योग्य भूमि उपलब्ध हो, ग़रीब ही रखा जाता था, जो आधुनिक भारत के दलितों से तुलनीय है। ऐसी ही पदानुक्रम ग़ैर-हिंदू समुदायों तक भी फैली थी: मुस्लिम हलालख़ोरान (सफ़ाईकर्मी) गाँव की सीमाओं के बाहर रहते थे, और बिहार के मल्लाहज़ादा को काफ़ी हद तक दासों जैसा व्यवहार मिलता था।
मध्यवर्ती स्तरों पर, जाति और दर्जे का संबंध कहीं कम सुव्यवस्थित था। सत्रहवीं सदी की एक मारवाड़ी नियमावली राजपूतों को निम्न-दर्जे के जाटों के साथ स्थान साझा करने वाले किसानों के रूप में सूचीबद्ध करती है; वृंदावन के आसपास के गौरव ने राजपूत दर्जा माँगा, अहीर-गुज्जर-माली लाभदायक पशुपालन-बाग़वानी के माध्यम से ऊपर उठे, और पूर्व में सदगोप-कैवर्त जैसी चारागाही-मछुआरा जातियों ने किसान-दर्जा प्राप्त किया। यह दिखाता है कि जाति स्थिर नहीं बल्कि आर्थिक अवसर से गतिशील थी।
जाति ने संस्थागत रूप भी लिया: हर जाति की अपनी जाति पंचायत थी जो विवाद-मध्यस्थता, भूमि-दावों और विवाह-उपयुक्तता पर निर्णय देती थी, और ग्राम पंचायत भी जाति-सीमाओं की रखवाली करती थी, जैसे पूर्वी भारत में हर विवाह में मंडल की उपस्थिति “मुख्यतः जाति के विरुद्ध किसी अपराध को रोकने के लिए” आवश्यक थी। कुल मिलाकर, जाति निर्धनतम स्तर पर सबसे कठोर थी, बीच में परक्राम्य थी, और अभिजात स्तर (ब्राह्मण-राजपूत ज़मींदार गठजोड़) पर सत्ता को वैध बनाती थी, इसलिए यह एक महत्वपूर्ण पर एकसमान नहीं, बहुस्तरीय कारक थी।

7 निबंध · वनवासियों के जीवन में परिवर्तन

प्रश्न 7 (लघु निबंध, 250-300 शब्द)

प्र. सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किस तरह बदल गई?

उत्तर: गहन खेती वाले क्षेत्रों से परे, घना जंगल या झाड़ी-भूमि पूर्वी, मध्य और उत्तरी भारत, झारखंड, और पश्चिमी घाट-दक्कन तक फैली थी, जो अनुमानतः भारत की लगभग 40 प्रतिशत भूमि को ढकती थी। “जंगली” शब्द का उस समय अर्थ “असभ्य” नहीं था; यह उन लोगों का वर्णन करता था जो वन-उपज संग्रहण, शिकार और स्थानांतरी कृषि से जीते थे, भीलों की तरह मौसम-विशिष्ट चक्र में: वसंत में संग्रहण, ग्रीष्म में मछली पकड़ना, मानसून में खेती, शरद-शीत में शिकार।
राज्य के लिए वन राजनीतिक रूप से ख़तरनाक थे, उपद्रवियों के लिए एक शरण-स्थल (मवास); बाबर ने लिखा कि जंगल एक ऐसी आड़ देते थे ‘जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।’ पर सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में वाणिज्यिक शक्तियों ने वन-जीवन को बदल डाला: राज्य को युद्ध-हाथी चाहिए होते थे, इसलिए वनवासियों से पेशकश (मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट) अक्सर हाथियों के रूप में होती थी; शहद, मोम और लाख की भारी माँग थी (लाख सत्रहवीं सदी में एक प्रमुख निर्यात बना); हाथी पकड़े-बेचे जाते थे; और पंजाब के लोहानी जैसी जनजातियाँ अफ़ग़ानिस्तान के साथ थल-व्यापार चलाती थीं।
इस वाणिज्यीकरण के साथ गहरा सामाजिक परिवर्तन आया: जनजातीय मुखिया, गाँव के “बड़े आदमियों” की तरह, अपने वंश-समूहों से सेनाएँ बनाने लगे, और कई ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी। सिंध की जनजातियों ने 6,000 घुड़सवार और 7,000 पैदल सैनिक तैनात किए; असम के अहोम राजाओं के पास पाइक थे और उन्होंने जंगली हाथी पकड़ने को राजकीय एकाधिकार घोषित किया। यह जनजातीय-से-राजतांत्रिक बदलाव सोलहवीं सदी तक पूरी तरह परिपक्व हुआ, कोच राजाओं के युद्धों की लंबी शृंखला में स्पष्ट, और सूफ़ी पीरों ने इन नए कृषि-सीमांतों में इस्लाम के धीमे प्रसार में वास्तविक भूमिका निभाई मानी जाती है।

8 निबंध · मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका

प्रश्न 8 (लघु निबंध, 250-300 शब्द)

प्र. मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।

उत्तर: ज़मींदार सीधे खेती किए बिना कृषि से जीते थे: भूमिधारी स्वामी, ऊँचे सामाजिक व आर्थिक दर्जे के, आंशिक रूप से जाति से और आंशिक रूप से राज्य के लिए की गई सेवाओं (ख़िदमत) से प्राप्त। उनकी व्यक्तिगत भूमि, मिल्कियत, किराए या बंधुआ श्रम से जोती जाती थी और स्वतंत्र रूप से बेची, वसीयत या गिरवी रखी जा सकती थी। ज़मींदार राज्य के लिए राजस्व वसूलकर (एक शुल्क के बदले) और सैन्य संसाधन नियंत्रित करके भी कमाते थे: अधिकतर के पास दुर्ग और घुड़सवार-तोपख़ाना-पैदल सेना की सशस्त्र टुकड़ियाँ थीं। आइन पूरे मुग़ल भारत में उनकी संयुक्त सैन्य शक्ति 3,84,558 घुड़सवार, 42,77,057 पैदल सैनिक, 1,863 हाथी और 4,260 तोपें दर्ज करती है, 4,260 तोप और 4,500 नाव।
ग्रामीण समाज को एक पिरामिड के रूप में देखें तो ज़मींदार इसके बहुत संकरे शिखर बनाते थे। अबुल फ़ज़्ल का वृत्तांत एक प्रभावी उच्च-जाति ब्राह्मण-राजपूत गठजोड़ दिखाता है, साथ ही मध्यवर्ती जातियाँ और मुस्लिम ज़मींदारियों की वास्तविक उपस्थिति। कुछ ज़मींदारियाँ विजय से शुरू हुईं, पर अधिक सामान्य थीं धीमी प्रक्रियाएँ: नई भूमि का उपनिवेशीकरण, अधिकारों का हस्तांतरण, राजकीय आदेश, या सीधी ख़रीद, जिससे अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार-दर्जे में प्रवेश पा सके। ज़मींदारों ने कृषि-उपनिवेशीकरण को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया, कृषकों को नक़द ऋण व औज़ारों से बसाया, और अक्सर बाज़ार (हाट) स्थापित किए।
ज़मींदारों को केवल उत्पीड़क मानना ग़लत होगा: किसानों के साथ उनका संबंध वास्तविक पारस्परिकता, संरक्षकता और आश्रय रखता था। भक्ति संत, जो अन्यत्र जाति-उत्पीड़न के तीखे आलोचक थे, ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाते थे, उनके ग़ुस्से का निशाना आमतौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था; और सत्रहवीं सदी के कई कृषक-विद्रोहों में ज़मींदार वास्तव में राज्य के विरुद्ध किसानों के साथ लड़े, उनके विरुद्ध नहीं।

9 निबंध · पंचायत और मुखिया द्वारा ग्रामीण समाज का नियमन

प्रश्न 9 (लघु निबंध, 250-300 शब्द)

प्र. पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।

उत्तर: ग्राम पंचायत, वंशानुगत संपत्ति-अधिकार रखने वाले बुज़ुर्गों की सभा, मिश्रित-जाति वाले गाँवों में सामान्यतः जाति-मिश्रित होती थी, यद्यपि साधारण मज़दूरों के इसमें बैठने की संभावना कम थी; इसके निर्णय सदस्यों को बाँधते थे। मुखिया (मुक़द्दम या मंडल), बुज़ुर्गों की सहमति से चुना जाता और ज़मींदार द्वारा अनुमोदित, तब तक ही पद पर रहता जब तक बुज़ुर्गों का उस पर विश्वास बना रहता। उसका मुख्य काम ग्राम-लेखा की देखरेख करना था, जिसमें पटवारी सहायता करता था; यद्यपि मंडल अक्सर पटवारी के साथ मिलकर धोखाधड़ी भी करते थे, छोटे कृषकों पर बोझ डालने के लिए अपनी ही भूमि का राजस्व कम आँकते थे।
पंचायत निधि आगंतुक राजस्व अधिकारियों की मेहमानी, आपदाओं के बाद सामुदायिक राहत, और वह अवसंरचना (एक बाँध, एक नहर) जिसे अकेले कोई किसान वहन नहीं कर सकता था, के लिए ख़र्च होती थी। पंचायत का एक मुख्य कार्य जाति-सीमाओं का पहरा देना था: पूर्वी भारत में हर विवाह में मंडल की उपस्थिति आवश्यक थी “मुख्यतः उनकी जाति के विरुद्ध किसी अपराध को रोकने के लिए”। पंचायतें जुर्माना लगा सकती थीं या, एक कठोर, सामान्यतः अस्थायी उपाय के रूप में, किसी को समुदाय से निकाल सकती थीं, उसे एक बहिष्कृत बनाकर जो अपना पेशा करने का अधिकार भी खो देता था।
हर जाति की अपनी अलग जाति पंचायत भी थी, जो जातियों के आर-पार दीवानी विवादों में मध्यस्थता करती, भूमि-दावों में समझौता कराती, विवाह की उपयुक्तता और अनुष्ठानिक वरीयता पर निर्णय देती थी; राज्य सामान्यतः आपराधिक मामलों को छोड़कर जाति पंचायत के फ़ैसलों का सम्मान करता था। पश्चिम भारत से याचिकाएँ, अक्सर ग्रामीण समाज की सबसे निचली पायदान से, अत्यधिक कराधान या बेगार की शिकायत करती थीं, पंचायत को एक नैतिक अपील-न्यायालय मानते हुए। इस प्रकार पंचायत और मुखिया आर्थिक प्रशासन, विवाद-निपटान और सामाजिक नियंत्रण, तीनों के माध्यम से ग्रामीण समाज को नियमित करते थे, यद्यपि यह नियमन तटस्थ नहीं बल्कि शक्तिशाली वर्गों के हितों से आकारित था।

10 मानचित्र कार्य

प्रश्न 10 (मानचित्र कार्य)

प्र. विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।

उत्तर: यह उत्तर तालिका और चरणों के रूप में है, छपा हुआ मानचित्र नहीं: इसे विश्व के अपने बहिर्रेखा वाले नक्शे पर बनाइए।
मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क वाले इलाके (अध्याय के अनुसार): चीन (मिंग साम्राज्य), ईरान (सफ़ावी साम्राज्य), तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य), अफ़ग़ानिस्तान (लोहानी कबीले का ज़मीनी व्यापार), अरबिया और ओमान (कॉफ़ी), लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा, यूरोप (फ्रांस, इंग्लैंड, पुर्तगाल, डच), अमेरिका (चाँदी का स्रोत), जापान (खानों की चाँदी), तथा पेगू और तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव के टापू और मोज़ाम्बीक़।
दिखाने वाले मार्ग: चीन से मध्य एशिया होते हुए भूमध्य सागर तक ज़मीनी मार्ग; भारत से उत्तर-पश्चिम होते हुए अफ़ग़ानिस्तान और ईरान; अरब सागर पार कर लाल सागर (मोचा) और फ़ारस की खाड़ी (बसरा) तक समुद्री मार्ग; अमेरिका की चाँदी का यूरोप से होकर तुर्की और (स्मिरना होते हुए) फ़ारस, फिर जहाज़ों से हिंदुस्तान पहुँचने का मार्ग; यूरोप से अफ़्रीका का चक्कर लगाकर भारत; और भारत के पूर्वी तट से म्यांमार, थाइलैंड, श्रीलंका और जापान तक समुद्री मार्ग (स्रोत 8)।

अंकित करने वाला इलाका मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क दिखाने वाला मार्ग
चीन (मिंग साम्राज्य) चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार मध्य एशिया होकर
ईरान (सफ़ावी) और तुर्की (ऑटोमन) व्यापार; चाँदी इन्हीं से होकर भारत पहुँचती थी उत्तर-पश्चिम से ज़मीनी मार्ग; फ़ारस की खाड़ी के बसरा से समुद्री मार्ग
अफ़ग़ानिस्तान लोहानी कबीले का ज़मीनी व्यापार उत्तर-पश्चिम होकर
अरबिया और लाल सागर (मोचा), बसरा भारतीय वस्तुएँ ख़रीदने के लिए भेजा गया धन (स्रोत 8) अरब सागर पार समुद्री मार्ग
यूरोप (पुर्तगाल, डच, इंग्लैंड, फ्रांस) खोज-यात्राओं से खुला व्यापार अफ़्रीका का चक्कर लगाकर समुद्री मार्ग
अमेरिका चाँदी का स्रोत अटलांटिक पार यूरोप, फिर एशिया
जापान खानों की चाँदी (स्रोत 8) दक्षिण-पूर्व एशिया होकर समुद्री मार्ग
पेगू और तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम, सीलोन, मालदीव, मोज़ाम्बीक़ भारत के तटों से व्यापार बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर पार समुद्री मार्ग

मानचित्र कैसे बनाएँ: (1) भारत में मुग़ल साम्राज्य को छायांकित कीजिए; (2) तालिका के हर इलाके को छायांकित करके नाम लिखिए; (3) ज़मीनी मार्ग सीधी तीर वाली रेखा से और समुद्री मार्ग टूटी रेखा से दिखाइए, चाँदी के मार्ग अलग रंग में; (4) संकेत-सूची और शीर्षक लिखिए।

11 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11 (परियोजना कार्य)

प्र. पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर (परियोजना कैसे करें): प्रश्न के शीर्षकों के अनुसार एक सर्वेक्षण-पत्र बनाइए: आबादी, फ़सलें (खरीफ़ और रबी, खाने की फ़सलें और नकदी फ़सलें), जानवर, दस्तकार समूह, महिलाओं के नाम ज़मीन, और पंचायत का कामकाज। किसानों, दस्तकारों, महिलाओं और पंचायत सदस्यों से बात कीजिए। फिर अध्याय से तुलना कीजिए: ज़मीन की व्यक्तिगत मिल्कियत, दो फ़सली मौसम, कपास और गन्ने जैसी नकदी फ़सलें, फ़सल के हिस्से या नकद में दस्तकारों की अदायगी, बुआई-निराई-कटाई में महिलाओं का श्रम, और मुक़द्दम के नेतृत्व वाली बुज़ुर्गों की पंचायत। निरंतरता (जैसे फ़सली मौसम, कई दस्तकारी हुनर) और परिवर्तन (आरक्षित सीटों वाली चुनी हुई ग्राम पंचायत, मशीनें और नलकूप, पुश्तैनी व्यवस्थाओं में कमी) दोनों नोट कीजिए और उनके कारण समझाइए।

प्रश्न 12 (परियोजना कार्य)

प्र. आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?

उत्तर (परियोजना कैसे करें): कोई एक अंश चुनिए, जैसे ‘बारह प्रांतों का बयान’ में से किसी एक सूबे का विवरण, या ज़मीन का वर्गीकरण। अपने ब्योरे में (1) बताइए कि उसमें कौन-सी जानकारी है (फ़सलें, राजस्व की दरें, मापी गई ज़मीन, क़िले, ज़मींदार और उनकी फ़ौज, रीति-रिवाज); (2) दिखाइए कि इससे इतिहासकार कृषि समाज के बारे में क्या जान सकता है; (3) अध्याय की तरह इसकी सीमाएँ बताइए: समाज के शीर्ष से देखी हुई तसवीर, जोड़ की ग़लतियाँ, सभी सूबों से एक शक्ल में न जुटाए गए आँकड़े, कीमतें और मज़दूरी मुख्यतः आगरा के आसपास से; और (4) उसकी जाँच के लिए दूसरे स्रोत सुझाइए (क्षेत्रीय राजस्व दस्तावेज़, ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़)।

12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।

पाठगत प्रश्न 1 · स्रोत 1

प्र. कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी।

उत्तर: बाबर को यह बात चौंकाने वाली लगी कि बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते थे और बस भी जाते थे: बड़े शहर के बाशिंदे भी डेढ़ दिनों में अपना हर नामोनिशान मिटाकर चले जाते थे और नई जगह उतनी ही जल्दी बसा लेते थे। फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं, इसलिए पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी; लोग केवल एक सरोवर या कुआँ बनाते थे, घर या दीवार नहीं, और खस की घास व लकड़ी की बहुतायत से झोंपड़ियाँ तुरंत बन जाती थीं। उसने यह भी देखा कि आबादी बेशुमार थी और लोग नई जगह पर उमड़ते चले आते थे।

पाठगत प्रश्न 2 · स्रोत 2

प्र. सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। सिंचाई की इन दोनों अलग-अलग प्रणालियों में किस-किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इनमें से किन-किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?

उत्तर: बाबर ने कुओं पर लगे छोटे साधन देखे: घड़ों वाला रहट जिसे बैल घुमाता था (लाहौर, दीपालपुर) और बेलन पर रस्सी से खींची जाने वाली बालटी (आगरा, चाँदवर, बयाना)। विजयनगर में राज्य के बड़े काम थे: धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़, कमलपुरम् जलाशय और उसकी नहर, और तुंगभद्रा के बाँध से पानी लाने वाली हिरिया नहर। रहट और बालटी के लिए केवल कुआँ, लकड़ी, रस्सी, घड़े, बैल और एक-दो लोग चाहिए थे; जलाशयों, बाँधों और नहरों के लिए भारी संसाधन, हज़ारों मज़दूर और राज्य की संपत्ति व संगठन चाहिए था। कुएँ पर लगने वाले छोटे साधन, जिन्हें एक किसान परिवार ख़ुद बना, चला और सुधार सकता था, ऐसी प्रणालियाँ थीं जिनमें कृषि तकनीक के सुधार में किसानों की भागेदारी ज़रूरी और संभव थी।

पाठगत प्रश्न 3 · खंड 1.4 · चर्चा कीजिए

प्र. इस अनुभाग में खेती संबंधी जिन क्रियाकलापों और तकनीकों की चर्चा हुई है उनमें से कौन-कौन सी अध्याय 2 में वर्णित तकनीकों और क्रियाकलापों से मिलती-जुलती हैं और कौन कौन सी भिन्न हैं?

उत्तर: मिलती-जुलती: हल (अध्याय 2 में लोहे के फाल वाले हल और बैलों का प्रयोग), कुओं, तालाबों और नहरों से सिंचाई, और धान जैसी बारिश पर निर्भर मुख्य फ़सलें। भिन्न: इस अध्याय में लोहे की नुकीली धार वाला हलका लकड़ी का हल, बैलों के जोड़े से खींचे जाने वाले बरमे से बुआई या हाथ से छिड़ककर बुआई, लोहे की पतली धार से गुड़ाई-निराई, रहट से पानी उठाना, साल में दो या तीन फ़सलें (खरीफ़ और रबी), जिन्स-ए-कामिल जैसी नकदी फ़सलें (कपास, गन्ना) और नयी दुनिया से आई फ़सलें (मक्का, टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास, पपीता), जो अध्याय 2 में नहीं मिलतीं।

पाठगत प्रश्न 4 · चित्र 8.3

प्र. चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या-क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।

उत्तर: आगे की ओर महिलाएँ समूहों में बैठकर घर और दस्तकारी के काम कर रही हैं, जैसे अनाज पीसना या कूटना और सूत कातना; कुछ पानी के घड़े ढो रही हैं और बच्चों को सँभाल रही हैं। पुरुष ऊँटों, गाय-बैलों और भैंसों की देखभाल कर रहे हैं, बोझ ढो रहे हैं और हाथ में लाठी लिए बातें कर रहे हैं। गाँव घना बसा है: सपाट छतों वाले मिट्टी और ईंट के घर, छप्पर वाली झोंपड़ियाँ, भंडारण के मटकों वाले आँगन, और घरों के पीछे ऊँची बुर्ज़ जैसी मीनार व दीवार।

पाठगत प्रश्न 5 · चित्र 8.4

प्र. चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?

उत्तर: गाँव के बुज़ुर्ग ज़मीन पर पास-पास बैठे एक बड़े समूह में दिखाए गए हैं, कई बिना कुर्ते के या सादे सफ़ेद कपड़ों और सादी पगड़ियों में। कर अधिकारी दाईं ओर अलग बैठे हैं, अंगरखे और पगड़ी पहने, ज़्यादा औपचारिक और सरकारी दिखते हुए, और उनके सामने काग़ज़, हिसाब की बहियाँ और लिखने का सामान फैला है, जो उन्हें राज्य के हिसाब रखने वाले के रूप में अलग पहचान देता है।

पाठगत प्रश्न 6 · चित्र 8.5

प्र. चित्र में दर्शायी गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: खुले में कपड़ा बनाने के अलग-अलग चरणों में लगे कामगार दिखाए गए हैं: धारा में कपड़े के थान धोना, लंबे कपड़े को सुखाने या सफ़ेद करने के लिए ज़मीन पर फैलाना और तानना, और बरतनों व नादों के साथ काम करना, शायद रँगाई के लिए। ऊपर पेड़ के नीचे क़ीमती कपड़े पहने लोग बैठे देख रहे हैं, शायद काम के मालिक या संरक्षक।

पाठगत प्रश्न 7 · खंड 2.4 · चर्चा कीजिए

प्र. इस अनुभाग में जिन पंचायतों का ज़िक्र किया गया है, वे आपके मुताबिक किस तरह से आज की ग्राम पंचायतों से मिलती-जुलती थीं अथवा भिन्न थीं?

उत्तर: मिलती-जुलती: दोनों गाँव के मामलों को देखती हैं, स्थानीय झगड़े सुलझाती हैं, साझा कोष सँभालती हैं और सामुदायिक कल्याण के काम (जैसे मिट्टी का बाँध बनाना या नहर खोदना) करती हैं। भिन्न: मुग़ल काल की पंचायत संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, एक अल्पतंत्र, जिसमें खेतिहर मज़दूरों के लिए जगह होने की संभावना कम थी; वह जाति की हदें लागू करती थी और जुर्माना या निष्कासन कर सकती थी। आज की ग्राम पंचायतें सभी वयस्क ग्रामवासियों द्वारा चुनी जाती हैं, उनमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं, वे संविधान और क़ानून के अधीन काम करती हैं और जाति के नियम तोड़ने पर दंड नहीं दे सकतीं।

पाठगत प्रश्न 8 · खंड 3 · चर्चा कीजिए

प्र. क्या आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं और मर्दों की पहुँच में कोई फ़र्क है?

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: क़ानून के अनुसार अब बेटियों और बेटों को कृषि भूमि में बराबर उत्तराधिकार है, पर व्यवहार में ज़मीन ज़्यादातर पुरुषों के नाम दर्ज होती है और महिलाएँ अकसर अपना हिस्सा भाइयों के पक्ष में छोड़ देती हैं। महिलाएँ खेती का बहुत काम (बुआई, निराई, कटाई) करती हैं, पर ज़मीन का छोटा हिस्सा ही उनके नाम होता है। यह अध्याय की याद दिलाता है, जहाँ महिलाएँ मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करती थीं, और केवल भूमिहर भद्रजनों की महिलाएँ संपत्ति की वारिस बनकर उसे बेचती थीं।

पाठगत प्रश्न 9 · चित्र 8.9

प्र. आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?

उत्तर: शाहजहाँ, जिसके सिर के चारों ओर प्रभामंडल है, एक छोटे क़ालीन पर घुटने टेककर जंगल के दृश्य में नीलगायों और हिरनों के झुंड पर लंबी बंदूक से निशाना साध रहा है, और पीछे हथियारबंद दरबारी व सेवक खड़े हैं। चित्र के ऊपरी कोने में साधारण ग्रामीण जीवन का एक छोटा, शांत दृश्य है: पानी उठाने वाले पहिये वाले कुएँ पर खेतिहर, एक बैल और हरे खेत। बादशाह के प्रभामंडल के साथ यही छोटा दृश्य वह सांकेतिक तत्व है: यह एक सद्भावनापूर्ण शासन दिखाता है जिसमें न्यायप्रिय बादशाह के अधीन साधारण प्रजा शांति से रहती और काम करती है, ठीक वैसा ही छोटा दृश्य जो, अध्याय के अनुसार, दरबारी चित्रकार शिकार के चित्रों में डाल देते थे।

पाठगत प्रश्न 10 · स्रोत 3

प्र. यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें ‘बिदेसी’ बताया गया है?

उत्तर: पद्यांश में परदेसी बड़ी संख्या में आते हैं, उन्हें भारी भरकम चाकू, कुल्हाड़ी और भाले-बरछे बाँटे जाते हैं, वे जंगल साफ़ करते हैं, बाज़ार बसाते हैं और कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेर डरकर भाग जाते हैं: बस्ती, व्यापार और नए राज्य के लिए जंगल की सफ़ाई। चित्र 8.9 में बादशाह शिकार के लिए जंगल में जाता है और इसे न्यायपूर्ण, सद्भावनापूर्ण शासन के चिह्न के रूप में दिखाया गया है; पद्यांश में बादशाह नहीं, साधारण बसने वाले जंगल को हमेशा के लिए बदल देते हैं। जंगल में रहने वालों की दृष्टि से ये सभी बाहरी लोग ‘बिदेसी’ थे: उत्तर से आए दास, दक्खिन से आए फ़सल कटाई वाले, पश्चिम से आया ज़फ़र मियाँ और उसके बाईस हज़ार लोग, और जंगल साफ़ करवाने वाला कालकेतु।

पाठगत प्रश्न 11 · स्रोत 4

प्र. इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।

उत्तर: सामान इंसानों, मोटे-मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर ले जाया जाता था, क्योंकि पहाड़ों के सँकरे, खड़ी चढ़ाई वाले रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल सकती थीं, जबकि कुली, टट्टू और बकरे चल सकते थे। मैदानों से पहाड़ी लोग ये चीज़ें ले जाते थे: सफ़ेद और रंगीन कपड़े (पहनने के लिए), कहरुबा और गहने (सजावट के लिए), नमक (खाने में और चीज़ें सुरक्षित रखने के लिए), हींग (मसाला और दवा), और शीशे व मिट्टी के बरतन (घरेलू बरतन और रखने के पात्र)।

पाठगत प्रश्न 12 · खंड 4.2 · चर्चा कीजिए

प्र. पता कीजिए कि आपके प्रांत में किन क्षेत्रों को आजकल जंगल वाले इलाके के रूप में पहचाना जाता है? क्या इन इलाकों में आज ज़िंदगियाँ बदल रही हैं? इन बदलावों की वजहें वही हैं जिनका ज़िक्र हमने इस अनुभाग में किया है या उनसे अलग?

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: राज्य के वन विभाग से अपने प्रांत के वन वाले ज़िले या संरक्षित क्षेत्र पता कीजिए। वहाँ ज़िंदगी बदल रही है: सड़कें, खनन, बाँध, व्यापारिक बागान, पर्यटन और वन-उत्पादों के बाज़ार जंगल तक पहुँच गए हैं, और कई वनवासी अब मज़दूरी करते हैं या शहरों में चले जाते हैं। कुछ वजहें अध्याय जैसी ही हैं (राज्य की माँगें, वाणिज्यिक खेती का फैलाव, वन-उत्पादों का व्यापार, बसने के लिए जंगल की सफ़ाई); कुछ नई हैं (उद्योग, खनन, संरक्षण क़ानून और वन अधिकार क़ानून)।

पाठगत प्रश्न 13 · खंड 5 · चर्चा कीजिए

प्र. आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।

उत्तर: यह अनुभाग दिखाता है कि ज़मींदार कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा लिए बिना खेती से कमाते थे, उनके पास दिहाड़ी या पराधीन मज़दूरों से जुतने वाली बड़ी मिल्कियत ज़मीन थी, वे कर वसूलते थे, उनके पास किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं, वे ज़्यादातर ‘ऊँची’ जातियों से थे और ‘शोषण करने वाला तबका’ थे; वे ग्रामीण पिरामिड का संकरा शीर्ष थे। ज़मींदारी का उन्मूलन राज्य और खेतिहर के बीच के इस बिचौलिये को हटाने, किसानों का शोषण ख़त्म करने और ज़मीन उसे देने के लिए किया गया जो वास्तव में उसे जोतता है।

पाठगत प्रश्न 14 · स्रोत 5

प्र. अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?

उत्तर: ज़मीन को इस आधार पर बाँटा गया कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है: पोलज (हर साल खेती, कभी खाली नहीं), परौती (ताकत वापस पाने के लिए कुछ दिन खेती रोकी गई), चचर (तीन या चार वर्षों तक खाली) और बंजर (पाँच या ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं), और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया गया। पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में थीं, अच्छी, मध्यम और खराब; हर किस्म के उत्पाद को जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता था, और मध्यम उत्पाद का एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क होता था।

पाठगत प्रश्न 15 · मानचित्र 1

प्र. भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: बाबर से औरंगज़ेब के शासन तक साम्राज्य फैलने से ज़्यादा ज़मीन राजस्व निर्धारण के अधीन आई और राज्य की आमदनी बढ़ी, पर ज़मीन की नपाई, जमा तय करने और उसकी वसूली का काम बहुत कठिन हो गया। दीवान के अधीन राजस्व अधिकारियों और हिसाब रखने वालों का बड़ा तंत्र चाहिए था, कई इलाक़ों (ख़ासकर जंगलों और दूर के क्षेत्रों) की नपाई नहीं हो सकी, और स्थानीय हालात अकसर राज्य को अपनी पूरी माँग वसूलने से रोकते थे।

पाठगत प्रश्न 16 · स्रोत 6

प्र. राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?

उत्तर: कणकुत (फ़सल का अंदाज़ा) जल्दी हो जाता था, पर ग़लत अंदाज़े से खेतिहर पर बोझ बढ़ सकता था। बटाई या भाओली (सभी पक्षों की मौजूदगी में कटी फ़सल का बँटवारा) में असली पैदावार बँटती थी, इसलिए ख़राब साल में खेतिहर कम देता था, पर धोखे से बचने के लिए ईमानदार निरीक्षक चाहिए थे। खेत बटाई (बीज बोने के बाद खेत का बँटवारा) में हिस्से पहले तय हो जाते थे, इसलिए फ़सल बिगड़ने का जोखिम खेतिहर पर पड़ता था। लाँग बटाई (कटे अनाज के ढेर का बँटवारा) में हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता था, यानी खेतिहर अपनी असली उपज से देता था। नकद भुगतान, जिसे राज्य पसंद करता था, में खेतिहर को पहले अपनी फ़सल बेचनी पड़ती थी।

पाठगत प्रश्न 17 · स्रोत 7

प्र. आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?

उत्तर: हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के बारे में खेती के मौजूदा हालात का पता करने से जमा ठीक-ठीक तय हो सकता था: इतना कि सरकार के वित्तीय हित (किफ़ायत) सुरक्षित रहें, पर इतना नहीं कि किसान बर्बाद हों, जिनके कल्याण का ज़िक्र भी औरंगज़ेब के हुक्म में है। इससे स्थानीय अधिकारियों और मुखियाओं द्वारा कम आकलन और धोखाधड़ी भी रुकती थी।

पाठगत प्रश्न 18 · खंड 6 · चर्चा कीजिए

प्र. क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?

उत्तर: हाँ, काफ़ी हद तक। राजस्व नकद या फ़सल (जीन्स) दोनों में दिया जा सकता था; निर्धारण की कई विधियाँ थीं (कणकुत, बटाई, खेत बटाई, लाँग बटाई); ज़मीन को उसकी हालत के आधार पर बाँटकर अलग-अलग कर लगाया जाता था; अच्छी, मध्यम और खराब ज़मीन में फ़र्क किया जाता था; और 1665 के हुक्म ने अधिकारियों से किसानों के कल्याण का ध्यान रखने को कहा। पर राज्य हमेशा अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, इसलिए यह लचीलापन सीमित था।

पाठगत प्रश्न 19 · खंड 7 · चर्चा कीजिए

प्र. पता लगाइए कि वर्तमान में आपके राज्य में कृषि उत्पादन पर कर लगाए जाते हैं या नहीं। आज की राज्य सरकारों की राजकोषीय नीतियों और मुग़ल राजकोषीय नीतियों में समानताओं और भिन्नताओं को समझाइए।

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: कृषि आय केंद्र के आयकर से मुक्त है; राज्य भू-राजस्व ले सकते हैं, पर यह आमतौर पर बहुत कम होता है और कई राज्यों ने इसे घटा या ख़त्म कर दिया है, जबकि कुछ राज्य उपज की बिक्री पर मंडी शुल्क लेते हैं। समानता: राज्य आज भी ज़मीन की नपाई और उसका रिकॉर्ड रखता है (भू-अभिलेख, पटवारी)। भिन्नता: मुग़लों के लिए भू-राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था, अकसर मध्यम उत्पाद का एक-तिहाई; आज के राज्य मुख्यतः दूसरे करों पर निर्भर हैं और किसानों को सहायता (सब्सिडी) भी देते हैं।

पाठगत प्रश्न 20 · स्रोत 9

प्र. उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?

उत्तर: स्रोत: महामहिम की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; समझदार बुज़ुर्गों और सत्यकर्मी जवानों के बयान; सूबों से भेजे गए संस्मरण; इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे गए हुक्मों की मूल प्रतियाँ या नकलें; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; और जानकार लोगों के कच्चे मसौदे व ज्ञापनपत्र। कृषि संबंधों के लिए सबसे उपयोगी: सूबों को भेजे गए हुक्म, रिपोर्टें और राज्य के दस्तावेज़, जिनमें राजस्व और ज़मीन की जानकारी थी। अकबर से रिश्ते का असर: काफ़ी, क्योंकि अकबर ने यह काम सौंपा था, सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाती थी, और दरबारी इतिहासकार के रूप में अबुल फ़ज़्ल एक मज़बूत शासक के अधीन सद्भाव वाले साम्राज्य का खाका पेश करना चाहता था; इसलिए यह समाज के शीर्ष से देखी हुई तसवीर है।