आख़िरी वक़्त की रिवीज़न के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, ज़रूरी तथ्य, तारीख़ें और तालिकाएँ। पूरी व्याख्या वाले विस्तृत नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 पूरा अध्याय एक फ़्रेम में
कृषक समाज और मुग़ल साम्राज्य (लगभग सोलहवीं-सत्रहवीं सदी)
किसान और ग्राम समुदायरैयत/खुद-काश्त/पाहि-काश्त, जिन्स-ए-कामिल, पंचायत-मुखिया, शिल्पी-जजमानी
वन, ज़मींदार, राजस्वजंगली व जनजातीय-राजतांत्रिक बदलाव, मिल्कियत व सैन्य शक्ति, जमा-हासिल व भूमि-वर्गीकरण
चाँदी और आइनवैश्विक चाँदी-प्रवाह, अबुल फ़ज़्ल की आइन-ए-अकबरी: संरचना, पद्धति, सीमाएँ
| पहलू |
मुख्य बात |
| मुख्य स्रोत |
आइन-ए-अकबरी (अबुल फ़ज़्ल), “ऊपर से देखा गया दृश्य” |
| पूरक स्रोत |
गुजरात-महाराष्ट्र-राजस्थान के क्षेत्रीय राजस्व-दस्तावेज़, ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेख |
| ग्राम समुदाय के तीन भाग |
कृषक, पंचायत, मुखिया (मुक़द्दम/मंडल) |
2 याद रखने लायक़ आँकड़े
85%जनसंख्या गाँवों में रहती थी
5आइन-ए-अकबरी के संशोधन, 1598 में पूर्ण होने से पहले
~40%भूमि वन-आवरण के अंतर्गत
| आँकड़ा |
किस बात का |
| 6 एकड़ |
गुजरात में समृद्ध किसान की भूमि |
| 39 / 43 / 50 |
आइन में दर्ज फ़सल-किस्में: आगरा / दिल्ली / बंगाल में चावल |
| ~5 करोड़ |
1600-1800 के बीच भारत की जनसंख्या-वृद्धि (~33%) |
| 25% |
शिल्पी परिवार, ग्राम-परिवारों में (मराठी दस्तावेज़ों के अनुसार) |
| 3,84,558 / 42,77,057 |
ज़मींदारों की संयुक्त सैन्य शक्ति: घुड़सवार / पैदल सैनिक (आइन) |
| 5 संशोधन |
आइन-ए-अकबरी के लेखन में हुए संशोधन |
3 तारीख़ें एक नज़र में
| तारीख़ |
क्या हुआ |
| 1526 |
बाबर पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराकर पहला मुग़ल बादशाह बनता है |
| 1556-1605 |
अकबर का शासनकाल |
| 1598 |
आइन-ए-अकबरी पूर्ण, अकबर के 42वें राज्य-वर्ष में |
| 1604 |
अकबर और उसके अभिजातों ने पहली बार तम्बाकू देखा |
| 1628-58 |
शाहजहाँ का शासनकाल, पंजाब में पुरानी शाह नहर की मरम्मत |
| 1658-1707 |
औरंगज़ेब का शासनकाल |
| 1665 |
औरंगज़ेब का वार्षिक गाँव-स्तरीय कृषक-गणना का आदेश |
| 1690 |
जोवान्नी कारेरी का चाँदी-प्रवाह पर वृत्तांत (लगभग) |
| 1765 |
बंगाल की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को हस्तांतरित |
4 सभी परिभाषाएँ एक जगह
| शब्द |
अर्थ |
| रैयत / मुज़रियान / आसामी |
किसान के लिए प्रयुक्त इंडो-फ़ारसी शब्द |
| खुद-काश्त / पाहि-काश्त |
अपने ही गाँव में भूमि रखने वाला / अनुबंध पर कहीं और भूमि जोतने वाला किसान |
| जिन्स-ए-कामिल |
“उत्तम फ़सलें”, राज्य द्वारा प्रोत्साहित नक़दी फ़सलें (कपास, गन्ना) |
| मुक़द्दम / मंडल |
ग्राम मुखिया |
| पटवारी |
ग्राम-लेखाकार, मुखिया का सहायक |
| मीरास / वतन |
महाराष्ट्र में शिल्पियों की वंशानुगत भूमि-जोत |
| जजमानी व्यवस्था |
शिल्पी-किसान वस्तु-बदले-सेवा विनिमय (नाम बाद में पड़ा) |
| जंगली |
वन-उपज संग्रहण, शिकार व स्थानांतरी कृषि से जीवन-यापन करने वाले, “असभ्य” नहीं |
| मवास |
वन में उपद्रवियों का शरण-स्थल |
| पेशकश |
मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट; जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अकसर हाथी भी शामिल होते थे |
| मिल्कियत |
ज़मींदार की व्यक्तिगत भूमि, स्वतंत्र रूप से बेची/गिरवी रखी जा सकने वाली |
| ख़िदमत |
ज़मींदार द्वारा राज्य के लिए की गई सेवाएँ |
| जमा / हासिल |
आँकी गई राजस्व-राशि / वास्तव में वसूली गई राशि |
| पोलज / परौती / चचर / बंजर |
भूमि-वर्गीकरण: हर वर्ष जोती जाने वाली / कुछ समय खाली / तीन-चार वर्ष खाली / पाँच वर्ष या अधिक से खेती नहीं |
| कणकुत / बटाई / खेत-बटाई / लाँग बटाई |
राजस्व-आँकलन विधियाँ: अनुमान / काटकर बाँटना / बोए खेत को बाँटना / कटे अनाज को बाँटना |
| दीवान (दफ़्तर) |
साम्राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देखरेख करने वाला कार्यालय |
| अमील-गुज़ार |
राजस्व वसूलीकर्ता |
| मंज़िल-आबादी / सिपह-आबादी / मुल्क-आबादी |
आइन की पुस्तक 1 (शाही घराना) / 2 (सैन्य-नागरिक प्रशासन) / 3 (वित्तीय प्रशासन) |
5 फटाफट पुनरावृत्ति · परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
आइन-ए-अकबरी अध्याय का केंद्रीय स्रोत है: अबुल फ़ज़्ल द्वारा 1598 में (अकबर के 42वें राज्य-वर्ष में, पाँच संशोधनों के बाद) पूर्ण, यह अकबरनामा की तीसरी पुस्तक थी और समृद्ध-मात्रात्मक होते हुए भी “ऊपर से देखा गया दृश्य” देती है, इसलिए इसे गुजरात-महाराष्ट्र-राजस्थान के क्षेत्रीय अभिलेखों और ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों से संतुलित किया जाता है। किसान (रैयत/किसान/आसामी) छोटे, व्यक्तिगत रूप से स्वामित्व वाले भूखंड रखते थे; खुद-काश्त अपने ही गाँव में खेती करते, पाहि-काश्त अनुबंध पर कहीं और। जिन्स-ए-कामिल नक़दी फ़सलें (कपास, गन्ना) निर्वाह अनाजों के साथ घनिष्ठता से बुनी हुई थीं, उनके विरुद्ध नहीं, और एक सक्रिय नक़द अर्थव्यवस्था पहले ही विकसित हो चुकी थी।
ग्राम समाज जाति-पदानुक्रम, पंचायत व मुखिया-शासन, और शिल्पी-विनिमय-जाल (मीरास/वतन भूमि, बाद में जजमानी कहलाई) पर चलता था, समतावादी “छोटे गणराज्यों” पर नहीं; पंचायत जाति-सीमाओं की रखवाली भी करती थी और मंडल-पटवारी मिलीभगत से धोखाधड़ी भी होती थी। स्त्रियाँ खेत-श्रम पूरी तरह साझा करती थीं पर अनुष्ठानिक प्रतिबंध व कड़े पुरुष-नियंत्रण का सामना करती थीं, फिर भी अभिजात स्त्रियों के पास ज़मींदारियों पर वास्तविक, प्रयुक्त विरासत-अधिकार थे। वन भूमि का लगभग 40 प्रतिशत ढकते थे; “जंगली” का अर्थ था एक जीविका, सभ्यता की अनुपस्थिति नहीं, और जनजातीय मुखिया अक्सर ज़मींदार या राजा बन गए (अहोम, कोच)। ज़मींदार ग्रामीण समाज का संकरा शिखर बनाते थे, शक्तिशाली और अक्सर शोषक, फिर भी व्यवहार में राज्य के विरुद्ध अक्सर किसानों के साथ, उनके विरुद्ध नहीं, गठबंधित थे। राजस्व-आँकलन (जमा) और वसूली (हासिल) भूमि-वर्गीकरण (पोलज, परौती, चचर, बंजर) और कई मापन-विधियों (कणकुत, बटाई, खेत-बटाई, लाँग बटाई) का प्रयोग करते थे, और नई दुनिया के बुलियन से चलित वैश्विक चाँदी-प्रवाह ने मुग़ल मुद्रा को स्थिर किया।