कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर NCERT समाधान (प्रश्नावली के हल) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर की प्रश्नावली के सभी 5 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे पाठ्यपुस्तक में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में ‘खुद करें-खुद समझें’ गतिविधि और पाठ के बीच पूछे गए प्रश्न (हाशिये की टिप्पणियाँ, ‘खोज-बीन’ बॉक्स और चुनावी नक्शा) भी हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

ध्यान दीजिए

प्रश्न 5 में दो उपप्रश्न हैं, (क) और (ख), और प्रश्न 2 में दलों की सूची (i), (ii), (iii), (iv) से गिनाई गई है। नीचे के सभी उत्तर पाठ्यपुस्तक की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं। किताब प्रश्नावली की उत्तर-कुंजी नहीं छापती, इसलिए प्रश्न 1-3 के उत्तर अपेक्षित उत्तर हैं।

1 सही विकल्प चुनकर रिक्त स्थान भरिए

प्रश्न 1

प्र. सही विकल्प को चुनकर खाली जगह को भरें:

(क) 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ ______ के लिए भी चुनाव कराए गए थे।
(भारत के राष्ट्रपति पद / राज्य विधानसभा / राज्यसभा / प्रधानमंत्री)

उत्तर: राज्य विधानसभा।

क्यों: किताब कहती है कि लोकसभा के चुनाव के साथ-साथ विधानसभा के भी चुनाव कराए गए थे, और कांग्रेस पार्टी को विधानसभा के चुनावों में भी बड़ी जीत हासिल हुई। बाकी तीनों विकल्प इसलिए ग़लत हैं क्योंकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जनता के सीधे वोट से नहीं चुने जाते, और राज्यसभा के सदस्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य चुनते हैं, आम मतदाता नहीं।

(ख) ______ लोकसभा के पहले आम चुनाव में 16 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
(प्रजा सोशलिस्ट पार्टी / भारतीय जनसंघ / भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी / भारतीय जनता पार्टी)

उत्तर: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी।

क्यों: किताब के अपने शब्दों में, जहाँ तक सीटों पर जीत हासिल करने का सवाल है, पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही और उसे कुल 16 सीट हासिल हुईं। इसी वजह से वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: भारतीय जनसंघ को 1952 में सिर्फ़ तीन सीटें मिलीं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सोशलिस्ट पार्टी के टूटने और मेल की प्रक्रिया से बनी और उसे भी छिटपुट सफलता ही मिली। भारतीय जनता पार्टी उस समय थी ही नहीं, वह बहुत बाद में बनी और उसकी जड़ें भारतीय जनसंघ में हैं।

(ग) ______ स्वतंत्र पार्टी का एक निर्देशक सिद्धांत था।
(कामगार तबके का हित / रियासतों का बचाव / राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था / संघ के भीतर राज्यों की स्वायत्तता)

उत्तर: राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था।

ज़रूरी बात: इस अध्याय में स्वतंत्र पार्टी का अपना परिचय-बक्सा नहीं छपा है। पूरे अध्याय में इस पार्टी का नाम सिर्फ़ दो जगह आता है: चुनावी नक्शे की दलों की सूची में और इसी प्रश्न में। इसलिए यह अपेक्षित उत्तर विकल्पों की तुलना करके निकलता है, किसी बक्से से नहीं। स्वतंत्र पार्टी 1959 में सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में बनी थी और केंद्रीकृत नियोजन तथा अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण का विरोध करती थी (यह जानकारी पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय में नहीं है)।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: ‘कामगार तबके का हित’ समाजवादियों और साम्यवादियों का सरोकार था, जो कांग्रेस पर मज़दूरों-किसानों की उपेक्षा का आरोप लगाते थे। ‘रियासतों का बचाव’ और ‘संघ के भीतर राज्यों की स्वायत्तता’ इस अध्याय में किसी भी दल के निर्देशक सिद्धांत के रूप में नहीं दिए गए, जबकि इस दौर की आर्थिक बहस का केंद्रीय सवाल यही था कि अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण कितना हो।

2 सुमेलन: नेता और दल

प्रश्न 2

प्र. यहाँ दो सूचियाँ दी गई हैं। पहले में नेताओं के नाम दर्ज़ हैं और दूसरे में दलों के। दोनों सूचियों में मेल बैठाएँ:

(क) एस.ए. डांगे    (ख) श्यामा प्रसाद मुखर्जी    (ग) मीनू मसानी    (घ) अशोक मेहता
(i) भारतीय जनसंघ    (ii) स्वतंत्र पार्टी    (iii) प्रजा सोशलिस्ट पार्टी    (iv) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

उत्तर:

नेता दल किताब में कहाँ
(क) एस.ए. डांगे (iv) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई के बक्से में प्रमुख नेताओं की सूची में
(ख) श्यामा प्रसाद मुखर्जी (i) भारतीय जनसंघ जनसंघ के संस्थापक-अध्यक्ष
(ग) मीनू मसानी (ii) स्वतंत्र पार्टी अपेक्षित मेल, बचे हुए विकल्प से: स्वतंत्र पार्टी का बक्सा इस अध्याय में नहीं है, और किताब उत्तर-कुंजी नहीं छापती
(घ) अशोक मेहता (iii) प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सोशलिस्ट पार्टी के बक्से में; उन्होंने कांग्रेस से हल्के-फुल्के सहयोग की तरफदारी की थी

याद रखने का तरीका: तीन मेल किताब के बक्सों से सीधे मिल जाते हैं, इसलिए चौथा अपने-आप तय हो जाता है।

3 सही या ग़लत: एकल पार्टी का प्रभुत्व

प्रश्न 3

प्र. एकल पार्टी के प्रभुत्व के बारे में यहाँ चार बयान लिखे गए हैं। प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगाएँ:

(क) विकल्प के रूप में किसी मजबूत राजनीतिक दल का अभाव एकल पार्टी-प्रभुत्व का कारण था।

उत्तर: सही। किताब बताती है कि शासक दल का कोई विकल्प नहीं था: विपक्षी दलों को 1950 के दशक में लोकसभा अथवा विधानसभा में कहने भर को प्रतिनिधित्व मिल पाया और ये दल सत्ता के वास्तविक इस्तेमाल से कोसों दूर थे। इसके अलावा कांग्रेस के गठबंधनी स्वभाव के कारण विपक्ष जो भी बात कहना चाहता, उसे कांग्रेस के कार्यक्रम में तुरंत जगह मिल जाती थी।

(ख) जनमत की कमजोरी के कारण एक पार्टी का प्रभुत्व कायम हुआ।

उत्तर: ग़लत। जनमत कमज़ोर नहीं था। पहले आम चुनाव में कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने अपना वोट डाला, औसतन हर सीट के लिए चार उम्मीदवार मैदान में थे, और हारने वाले उम्मीदवारों ने भी परिणामों को निष्पक्ष बताया। कांग्रेस का प्रभुत्व मुक्त और निष्पक्ष चुनावों में मिले जनादेश से बना, जनमत की कमज़ोरी से नहीं।

(ग) एकल पार्टी-प्रभुत्व का संबंध राष्ट्र के औपनिवेशिक अतीत से है।

उत्तर: सही। किताब कांग्रेस की असाधारण सफलता की जड़ें सीधे स्वाधीनता-संग्राम की विरासत में बताती है। कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन के वारिस के रूप में देखा गया, आज़ादी के आंदोलन के अग्रणी नेता अब उसके उम्मीदवार थे, और आज़ादी के वक्त तक वही एकमात्र देशव्यापी संगठन वाली पार्टी थी। इसी अतीत ने उसे ‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा दिया।

(घ) एकल पार्टी-प्रभुत्व से देश में लोकतांत्रिक आदर्शों के अभाव की झलक मिलती है।

उत्तर: ग़लत। यही इस अध्याय का सबसे बड़ा तर्क है। बाकी मुल्कों में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ, लेकिन भारत में यह लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ। यहाँ अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में एक-दूसरे से होड़ की और तब भी कांग्रेस एक के बाद एक चुनाव जीतती गई। इसके उलट चीन, क्यूबा और सीरिया के संविधान में सिर्फ़ एक ही पार्टी को शासन की अनुमति है, और म्यांमार, बेलारूस तथा इरीट्रिया में यह प्रभुत्व कानूनी और सैन्य उपायों से कायम हुआ है।

4 राज्यों की पहचान (1952-67)

प्रश्न 4

प्र. भारत का एक राजनीतिक नक्शा लीजिए (जिसमें राज्यों की सीमाएँ दिखाई गई हों) और उसमें निम्नलिखित को चिह्नित कीजिए:
(क) ऐसे दो राज्य जहाँ 1952-67 के दौरान कांग्रेस सत्ता में नहीं थी।
(ख) दो ऐसे राज्य जहाँ इस पूरी अवधि में कांग्रेस सत्ता में रही।

उत्तर (क): केरल और जम्मू-कश्मीर।

किताब के चुनावी नक्शे के साथ जो सूची छपी है, वह 1952-1967 के दौरान कांग्रेस शासित राज्यों के दो अपवाद अलग से गिनाती है:

  • केरल: डेमोक्रेटिक लेफ़्ट फ्रंट, 1957-1959। मार्च 1957 के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को 126 में से 60 सीटें मिलीं और पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का समर्थन भी, और ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद ने सरकार बनाई।
  • जम्मू और कश्मीर: नेशनल कॉन्फ्रेंस।

उत्तर (ख): उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश।

किताब कहती है कि इन एकाध अपवादों को छोड़ दें तो केंद्र सरकार और प्रांतीय सरकारों पर कांग्रेस पार्टी का पूरा नियंत्रण था। इसलिए ऊपर के दो अपवादों को छोड़कर कोई भी दो राज्य लिखे जा सकते हैं, जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार या राजस्थान।

ध्यान दें: त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा इस उत्तर में नहीं आते। पहले आम चुनाव में इन तीन राज्यों में कांग्रेस को अधिकतर सीटें नहीं मिलीं, लेकिन किताब के अपने शब्दों में ‘आखिरकार इन तीन राज्यों में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी।’

नक्शे पर: ऊपर के राज्यों के नाम याद रखिए और भारत के राजनीतिक नक्शे पर उन्हें सही जगह चिह्नित कीजिए।

भाग राज्य नक्शे पर कहाँ क्यों (किताब का तथ्य)
(क) केरल दक्षिण-पश्चिमी तट ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार, 1957-1959
(क) जम्मू और कश्मीर सुदूर उत्तर (आज के नक्शे पर केंद्रशासित प्रदेश) किताब के नक्शे में यहाँ नेशनल कॉन्फ्रेंस
(ख) उत्तर प्रदेश उत्तर भारत, गंगा का मैदान किताब के 1952-1967 वाले नक्शे में कांग्रेस शासित
(ख) मध्य प्रदेश मध्य भारत किताब के 1952-1967 वाले नक्शे में कांग्रेस शासित
नक्शे पर कैसे चिह्नित करें
  1. राज्यों की सीमाओं वाला भारत का रेखा-मानचित्र लीजिए (स्कूल एटलस या बोर्ड का रेखा-मानचित्र)।
  2. केरल और जम्मू-कश्मीर को एक तरह की छायांकन-रेखाओं से, और उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश को दूसरी तरह से भरिए।
  3. हर राज्य के भीतर उसका नाम लिखिए और संकेत-सूची बनाइए: पहला छायांकन = ‘1952-67 में कभी कांग्रेस सत्ता में नहीं’; दूसरा = ‘पूरे दौर में कांग्रेस सत्ता में’।

5 अवतरण आधारित प्रश्न: रजनी कोठारी

प्रश्न 5

प्र. निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

कांग्रेस के संगठनकर्ता पटेल कांग्रेस को दूसरे राजनीतिक समूह से निसंग रखकर उसे एक सर्वांगसम तथा अनुशासित राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव छोड़े और अनुशासित कॉडर से युक्त एक सगुंफित पार्टी के रूप में उभरे। ‘यथार्थवादी’ होने के कारण पटेल व्यापकता की जगह अनुशासन को ज़्यादा तरजीह देते थे। अगर ‘‘आंदोलन को चलाते चले जाने’’ के बारे में गाँधी के ख्याल हद से ज़्यादा रोमानी थे तो कांग्रेस को किसी एक विचारधारा पर चलने वाली अनुशासित तथा धुरंधर राजनीतिक पार्टी के रूप में बदलने की पटेल की धारणा भी उसी तरह कांग्रेस की उस समन्वयवादी भूमिका को पकड़ पाने में चूक गई जिसे कांग्रेस को आने वाले दशकों में निभाना था।

रजनी कोठारी

(क) लेखक क्यों सोच रहा है कि कांग्रेस को एक सर्वांगसम तथा अनुशासित पार्टी नहीं होना चाहिए?

उत्तर:

1. आने वाले दशकों में कांग्रेस को समन्वयवादी भूमिका निभानी थी। लेखक का मुख्य तर्क यही है: एक विचारधारा पर चलने वाली, कसकर अनुशासित पार्टी उस भूमिका को पकड़ ही नहीं पाती। इसीलिए वे कहते हैं कि पटेल की धारणा भी उतनी ही चूक गई जितने गाँधी के ख्याल।

2. कांग्रेस की असली ताकत उसका गठबंधनी स्वभाव थी। कांग्रेस ने परस्पर विरोधी हितों के कई समूहों को एक साथ जोड़ा था: किसान और उद्योगपति, शहर के बाशिंदे और गाँव के निवासी, मज़दूर और मालिक, तथा मध्य, निम्न और उच्च वर्ग एवं जाति। आज़ादी तक वह एक सतरंगे सामाजिक गठबंधन की शक्ल ले चुकी थी। ‘सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव’ छोड़ते ही यह सारा आधार बिखर जाता।

3. वह विचारधारात्मक गठबंधन भी थी। कांग्रेस ने क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी, तथा दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गियों को अपने अंदर समाहित किया। ‘किसी एक विचारधारा’ पर चलने का मतलब होता इनमें से अधिकांश को बाहर कर देना।

4. गुटों की गुंजाइश ही उसे टूटने से बचाती थी। अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी बनने की बजाय उसकी ताकत साबित हुई। पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों की आपसी होड़ के लिए जगह थी, इसलिए अलग-अलग हितों और विचारधाराओं की नुमाइंदगी करने वाले नेता कांग्रेस के भीतर ही बने रहे और उन्होंने बाहर निकलकर नई पार्टी बनाना बेहतर नहीं समझा। कड़े अनुशासन वाली पार्टी में यह गुंजाइश ख़त्म हो जाती और वे बाहर चले जाते।

5. भारत की विविधता के लिए यही उपयुक्त था। इस गठबंधन से वर्ग, जाति, धर्म, भाषा तथा अन्य हितों के आधार पर भारत की विविधता की नुमाइंदगी हो रही थी। एक देश जितना विविध हो, उसकी शासक पार्टी को उतना ही समावेशी होना पड़ता है।

(ख) शुरुआती सालों में कांग्रेस द्वारा निभाई गई समन्वयवादी भूमिका के कुछ उदाहरण दीजिए।

उत्तर:

1. दूसरे संगठनों को अपने भीतर जगह देना। आज़ादी से पहले के वक्त में अनेक संगठनों और पार्टियों को कांग्रेस में रहने की इजाज़त थी, हालाँकि इनके अपने-अपने संविधान थे और सांगठनिक ढाँचा भी अलग था। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी इसका सबसे साफ़ उदाहरण है, जो 1934 में कांग्रेस के ही भीतर बनी और बाद में अलग होकर विपक्षी दल बनी।

2. मतभेदों को सुलझाना नहीं तो समेटे रखना। किसी खास पद्धति, कार्यक्रम या नीति को लेकर मौजूद मतभेदों को कांग्रेस भले न सुलझा पाए, लेकिन उन्हें अपने आप में मिलाए रखती थी और एक आम सहमति कायम कर ले जाती थी।

3. हर मसले पर संतुलन। गठबंधन जो भी आए उसे अपने में शामिल कर लेता है, इसलिए उसे अतिवादी रुख़ अपनाने से बचना होता है और हर मसले पर संतुलन साधकर चलना पड़ता है। इसी वजह से विपक्ष जो भी बात कहना चाहता, उसे कांग्रेस की विचारधारा और कार्यक्रम में तुरंत जगह मिल जाती थी।

4. गुटों को सहना और उन्हें बढ़ावा देना। कांग्रेस की अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ अलग-अलग विचारधारात्मक रुख़ वाले गुटों को मिलाकर बनी थीं, और इन्हीं को साथ रखने से कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरती थी।

5. विपक्षी नेताओं को सरकार में जगह। स्वतंत्रता की उद्घोषणा के बाद जिस अंतरिम सरकार ने देश का शासन सँभाला, उसके मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे। जवाहरलाल नेहरू अकसर सोशलिस्ट पार्टी के प्रति अपने प्यार का इजहार करते थे और उन्होंने जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सरकार में शामिल होने का न्यौता दिया।

6. समाजवादी लक्ष्य को अपना लेना। 1955 में कांग्रेस ने घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य समाजवादी बनावट वाले समाज की रचना है। यह विरोधियों के एजेंडे को अपने भीतर समेट लेने का सबसे साफ़ उदाहरण है, और इसी से समाजवादियों के लिए खुद को कांग्रेस का कारगर विकल्प बनाकर पेश करना मुश्किल हो गया।

यहाँ कोई (ग) नहीं है

पाठ्यपुस्तक में इस प्रश्न के दो ही उपप्रश्न छपे हैं, (क) और (ख)। अपनी किताब की संख्या के अनुसार ही उत्तर लिखिए।

6 खुद करें-खुद समझें

यह प्रोजेक्ट कार्य है

किताब कहती है: ‘1952 के बाद से अब तक आपके राज्य में जितने चुनाव हुए और सरकारें बनी हैं, उनका एक चार्ट तैयार करें।’ इसमें ये स्तंभ रखे जा सकते हैं: चुनाव का वर्ष, जीतने वाले दल का नाम, शासक दल या दलों के नाम, और मुख्यमंत्री का नाम।

यह उत्तर हर विद्यार्थी के अपने राज्य के हिसाब से अलग होगा, इसलिए इसका कोई एक तय उत्तर नहीं है। चार्ट बनाते समय यह देखिए कि आपके राज्य में कब तक एक ही दल का प्रभुत्व रहा और कब से गठबंधन सरकारें बनने लगीं। यही इस अध्याय का मुख्य सवाल है, बस अपने राज्य के पैमाने पर।

7 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय के बीच में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं: हाशिये की टिप्पणियों में, ‘खोज-बीन’ बॉक्स में और चुनावी नक्शे के नीचे। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, किताब के अपने शब्दों में, हल किया गया है।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. हमारे लोकतंत्र में ही ऐसी कौन-सी खूबी है? आखिर देर-सबेर हर देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना ही लिया है। है न?

उत्तर: ख़ूबी उस फ़ैसले में है जो भारत ने शुरुआत में ही लिया, और उन हालात में है जिनमें लिया। राष्ट्र-निर्माण की चुनौती के बीच कई दूसरे देशों के नेताओं ने तय किया कि उनके देश लोकतंत्र का बोझ नहीं उठा सकते; उन्होंने राष्ट्रीय एकता को पहली प्राथमिकता माना, और उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए कई देशों में अलोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था कायम हुई। ऐसी व्यवस्थाओं ने वायदा तो किया कि जल्दी ही लोकतंत्र कायम कर दिया जाएगा, पर एक बार जम जाने के बाद उन्हें हटाना बहुत मुश्किल रहा। भारत के नेताओं ने कहीं ज़्यादा कठिन रास्ता चुना। 1952 का पहला आम चुनाव एक गरीब और अनपढ़ देश में लोकतंत्र की पहली बड़ी परीक्षा था, जबकि उस समय तक लोकतंत्र सिर्फ़ धनी देशों में ही कायम था, और यूरोप के बहुतेरे देशों में महिलाओं को मताधिकार तक नहीं मिला था। इसलिए यह कहना सही नहीं कि देर-सबेर हर देश अपने-आप लोकतांत्रिक हो गया; भारत ने सबसे कठिन हालात में, शुरुआत से ही, लोकतंत्र चुना।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. यह एक सही फ़ैसला था। लेकिन ऐसे लोगों का क्या किया जाए जो अभी भी औरतों को किसी की पत्नी के रूप में देखने के आदी हैं। इस तरह के व्यवहार से लगता है, मानो एक स्त्री का कोई नाम ही न हो।

उत्तर: जिस फ़ैसले की तारीफ़ की गई है, वह चुनाव आयोग का यह फ़ैसला है कि करीब 40 लाख महिलाओं की ‘अलां की बेटी’ या ‘फलां की बीवी’ वाली प्रविष्टियों को नहीं माना जाएगा, संभव हो तो उनका पुनरावलोकन होगा और ज़रूरी लगे तो उन्हें हटाया जाएगा। कानून और चुनाव आयोग यह तो तय कर सकते हैं कि हर महिला मतदाता अपने नाम से दर्ज़ हो, पर औरत को सिर्फ़ किसी की पत्नी या बेटी के रूप में देखना एक सामाजिक आदत है, जो शिक्षा से, सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी से और हर व्यक्ति के अपने व्यवहार से ही धीरे-धीरे बदलती है। आयोग का फ़ैसला बताता है कि लोकतंत्र की शुरुआत हर नागरिक को एक अलग व्यक्ति के रूप में पहचानने से होती है। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

खोज-बीन

प्र. अपने परिवार और पड़ोस के बुजुर्गों से चुनाव में भागीदारी के उनके अनुभवों के बारे में पूछिए।
• क्या इनमें से किसी ने पहले या दूसरे आम चुनाव में भाग लिया था? इन लोगों ने किसको वोट दिया और वोट देने का कारण क्या था?
• क्या इनमें कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने तीनों तरीके से मतदान किया हो? कौन-सा तरीका उसे सबसे ज़्यादा पसंद आया?
• उस दौर के चुनावों की तुलना में आज के समय के चुनावों में इन्हें क्या-क्या फ़र्क़ नज़र आते हैं?

कैसे करें: यह साक्षात्कार का काम है, इसलिए उत्तर उन्हीं लोगों से आएँगे जिनसे आप पूछेंगे। पूछने से पहले अध्याय के बॉक्स में बताए गए मतदान के तीनों तरीके जान लीजिए। पहले आम चुनाव में हर मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी रखी गई जिस पर उसका चुनाव-चिह्न अंकित था, और मतदाता खाली मतपत्र अपनी पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालता था; इसके लिए तकरीबन 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ। पहले दो चुनावों के बाद मतपत्र पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चुनाव-चिह्न छपने लगे और मतदाता अपने उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाने लगा; यह तरीका लगभग चालीस साल चला। 1990 के दशक के अंत में चुनाव आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल शुरू किया और 2004 तक पूरे देश में ईवीएम चालू हो गई।

क्या दर्ज़ करें: हर व्यक्ति के लिए लिखिए कि उन्हें किस साल और किस जगह का चुनाव याद है, उन्होंने किसे वोट दिया और क्यों, तीनों में से कौन-से तरीके इस्तेमाल किए और कौन-सा पसंद आया, और तब और अब के चुनावों में उन्हें क्या फ़र्क़ दिखता है (जैसे उम्मीदवारों और दलों की संख्या, मतदान का तरीका, प्रचार का ढंग)।

चुनावी नक्शा: कांग्रेस का प्रभुत्व 1952-1967

प्र. क्या आप उन जगहों को पहचान सकते हैं जहाँ कांग्रेस बहुत मज़बूत थी? किन प्रांतों में दूसरी पार्टियों को ज़्यादातर सीटें मिलीं?

उत्तर: नक्शे में 1952-1967 के दौरान लगभग हर राज्य कांग्रेस-शासित दिखाया गया है, यानी कांग्रेस लगभग पूरे देश में मज़बूत थी: पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मैसूर, आंध्र प्रदेश, मद्रास और असम तक। नक्शे के नीचे के स्तंभ-चित्रों में लोकसभा में उसकी सीटें 1952 में 489 में से 364, 1957 में 494 में से 371 और 1962 में 494 में से 361 हैं।

दूसरी पार्टियों को कुछ ही जगह अच्छी सफलता मिली। केरल को ‘डेमोक्रेटिक लेफ्ट फ्रंट 1957-1959’ के लिए अलग रंग में दिखाया गया है; यह दुनिया में पहला अवसर था जब किसी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के ज़रिये बनी। जम्मू और कश्मीर को ‘नेशनल कांफ्रेंस’ के लिए अलग दिखाया गया है। अध्याय यह भी बताता है कि पहले विधानसभा चुनावों में त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा में कांग्रेस को अधिकतर सीटें नहीं मिलीं, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को सबसे ज़्यादा समर्थन आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में मिला।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. पहले हमने एक ही पार्टी के भीतर गठबंधन देखा और अब पार्टियों के बीच गठबंधन होता देख रहे हैं। क्या इसका मतलब यह हुआ कि गठबंधन सरकार 1952 से ही चल रही है?

उत्तर: नहीं। 1952 से कांग्रेस ने एक ही दल की सरकारें बनाईं; वह एक ही पार्टी थी, भले ही उसका स्वभाव भीतर से गठबंधन जैसा था। कांग्रेस एक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन थी, जिसमें किसान और उद्योगपति से लेकर वामपंथी, दक्षिणपंथी और हर मध्यमार्गी धारा तक सबके लिए जगह थी, और उसके गुट शासक-दल के भीतर संतुलन साधने के औज़ार की तरह काम करते थे। गठबंधन सरकार इससे अलग चीज़ है: वह तब बनती है जब कई अलग-अलग पार्टियाँ मिलकर सत्ता चलाती हैं, क्योंकि किसी एक के पास बहुमत नहीं होता। यानी कांग्रेस-प्रणाली में गठबंधन पार्टी के भीतर था, जबकि गठबंधन सरकार में गठबंधन पार्टियों के बीच होता है। दोनों के पीछे का विचार, यानी अनेक हितों को साथ लेकर चलना, मिलता-जुलता है, पर सरकार का रूप एक नहीं है।