तेज़ दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: पहले आम चुनाव की तैयारी और उसके सारे आँकड़े, तीनों आम चुनावों के नतीजे, केरल 1957, तीनों विपक्षी दल, और ‘कांग्रेस-प्रणाली’ का पूरा तर्क। हर तारीख़, हर नाम और हर संख्या एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द
सीमांकन: चुनाव-क्षेत्रों की सीमाएँ तय करने का काम। पहला आम चुनाव कराने से पहले जो दो काम पूरे करने ज़रूरी थे, यह उनमें पहला था।
मतदाता-सूची: वोट देने के अधिकारी सभी नागरिकों की सूची। यह दूसरा तैयारी वाला काम था, और इसी के पहले प्रारूप में 40 लाख महिलाओं के नाम छूट जाने की बात पकड़ में आई।
सार्वभौम मताधिकार: हर वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार। भारत ने यह अधिकार अपने पहले ही चुनाव में दे दिया, जबकि इस वक्त तक लोकतंत्र सिर्फ़ धनी देशों में ही कायम था।
‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’: भारत की चुनाव-प्रणाली, जिसमें दूसरों से ज़्यादा वोट पाने वाली पार्टी को अपने वोट-हिस्से से कहीं ज़्यादा सीटें मिल जाती हैं। कांग्रेस की जीत का दायरा इसी वजह से बढ़ा-चढ़ा दिखता है। यह शब्द पिछले साल की किताब ‘भारतीय संविधान: सिद्धान्त और व्यवहार’ में पढ़ा जा चुका है।
एक दल का प्रभुत्व: वह स्थिति जिसमें एक ही पार्टी चुनाव-दर-चुनाव जीतती चली जाए। बाकी मुल्कों में यह प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ; भारत में यह लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ।
गुट: पार्टी के भीतर बने समूह। कांग्रेस की अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ ऐसे ही अनेक गुटों से बनी थीं। कुछ गुट विचारधारा पर आधारित थे, पर अकसर उनकी जड़ में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा होती थी।
‘कांग्रेस-प्रणाली’: इस पूरे दौर की भारतीय राजनीति को दिया गया नाम, क्योंकि चुनावी होड़ के पहले दशक में कांग्रेस शासक दल और विपक्ष, दोनों की भूमिका निभा रही थी।
सामाजिक गठबंधन: कांग्रेस का सतरंगा सामाजिक गठबंधन होना, जिसमें वर्ग और जाति, धर्म और भाषा तथा अलग-अलग हितों के लिहाज़ से भारत की विभिन्नता समाई हुई थी।
विचारधारात्मक गठबंधन: कांग्रेस का वह स्वभाव जिसके चलते उसमें क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी तथा दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गी, सब समा गए।
लोकतांत्रिक समाजवाद: समाजवादियों की विचारधारा, जो उन्हें कांग्रेस से भी अलग करती थी और कम्युनिस्टों से भी।
2 वे आँकड़े जिनका घालमेल नहीं होना चाहिए
| आँकड़ा | किस चीज़ का |
|---|---|
| 40 लाख | वे महिलाएँ जिनके नाम मतदाता-सूची के पहले प्रारूप में छूट गए थे, और जो सिर्फ़ ‘फलाँ की बेटी’ या ‘फलाँ की बीवी’ के रूप में दर्ज़ थीं |
| 17 करोड़ | पहले आम चुनाव के कुल मतदाता |
| 3200 | चुने जाने वाले विधायक |
| 489 | चुने जाने वाले लोकसभा सांसद |
| 15 फीसदी | मतदाताओं में साक्षर लोगों का हिस्सा |
| 3 लाख से ज़्यादा | प्रशिक्षित किए गए अधिकारी और चुनावकर्मी |
| 20 लाख | इस्तेमाल हुई स्टील की मतपेटियाँ |
| चार | औसतन हर सीट के लिए मैदान में उतरे उम्मीदवार |
| आधे से अधिक | मतदाताओं का वह हिस्सा जिसने वोट डाला |
| छह महीने | चुनाव अभियान, मतदान और मतगणना में कुल लगा समय |
| 489 में से 364 | पहली लोकसभा में कांग्रेस की सीटें |
| 16 | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें, जिनसे वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी |
| 3 (1952), 4 (1957) | भारतीय जनसंघ की लोकसभा सीटें |
| 45% वोट, 74% सीटें | 1952 में कांग्रेस |
| कुल 10% वोट, 3% सीटें भी नहीं | 1952 में सोशलिस्ट पार्टी, जो वोट के लिहाज़ से दूसरे नंबर पर रही |
| तीन-चौथाई | 1957 और 1962 में कांग्रेस को मिली लोकसभा सीटों का हिस्सा |
| दशांश | कांग्रेस की सीटों का वह हिस्सा जिस तक कोई विपक्षी दल नहीं पहुँच सका |
| 126 में से 60 + 5 | केरल 1957: कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें और पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का समर्थन |
3 लाख चुनावकर्मी हैं। 20 लाख मतपेटियाँ हैं। 40 लाख महिलाओं के नाम हैं। 17 करोड़ मतदाता हैं।
और यह भी: सोशलिस्ट पार्टी को पाठ्यपुस्तक के अनुसार कुल 10 प्रतिशत वोट मिले थे, और वह 3 प्रतिशत सीटें भी नहीं जीत पाई।
3 समय-रेखा
संविधान अंगीकृत हुआ।
संविधान पर हस्ताक्षर हुए।
संविधान लागू हुआ।
भारत के चुनाव आयोग का गठन; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।
भारतीय जनसंघ का गठन; इसी साल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ा।
पहला आम चुनाव, जिसे दो बार स्थगित करना पड़ा था, आख़िरकार हुआ। इसे अमूमन 1952 का चुनाव ही कहा जाता है क्योंकि देश के अधिकांश हिस्सों में मतदान 1952 में ही हुआ।
कांग्रेस ने ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ को अपना लक्ष्य घोषित किया, जिससे समाजवादियों के सामने दुविधा खड़ी हो गई।
केरल विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें; इसी साल दूसरा आम चुनाव।
केरल की कम्युनिस्ट सरकार अनुच्छेद 356 के अंतर्गत बर्खास्त।
तीसरा आम चुनाव; कांग्रेस को फिर तीन-चौथाई सीटें।
चीन और सोवियत संघ के विचारधारात्मक अंतर के बाद सीपीआई में बड़ी टूट; इसी साल चीन के आण्विक-परीक्षण, जिनके बाद जनसंघ ने भारत के आण्विक हथियारों की लगातार पैरोकारी की।
1885 कांग्रेस का जन्म, एक हित-समूह के रूप में। 1920 के दशक के शुरुआती साल: साम्यवादी समूहों का उभार। 1934 कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। 1935 से कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के दायरे में काम किया। दिसंबर 1941 में वे अलग हुए। 1948 में कांग्रेस ने दोहरी सदस्यता पर रोक लगाई और सोशलिस्ट पार्टी अलग बनी।
दूसरी चुनौती। आज़ादी के बाद भारत के सामने एक चुनौती राष्ट्र-निर्माण की थी, यानी बँटवारे, रजवाड़ों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन जैसे सवालों को हल करके देश को एक रखना। उसके साथ-साथ दूसरी चुनौती लोकतांत्रिक राजनीति की स्थापना की थी। इसीलिए आज़ादी के तुरंत बाद राजनीतिक दलों के बीच चुनावी होड़ शुरू हुई।
बाकी देशों ने जो रास्ता चुना। उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए बहुत-से देशों के नेताओं ने तय किया कि उनका देश लोकतंत्र का ख़र्च नहीं उठा सकता। उनकी दलील थी कि पहली प्राथमिकता राष्ट्रीय एकता है और लोकतंत्र मतभेद तथा संघर्ष पैदा करेगा। ऐसे शासन के तीन रूप सामने आए: नाममात्र का लोकतंत्र पर असल नियंत्रण एक नेता के हाथ, एक-दलीय शासन, या सीधा सैन्य शासन। ऐसी हर व्यवस्था जल्द ही लोकतंत्र लौटाने का वादा करके शुरू हुई, पर एक बार जमने के बाद उसे हटाना बेहद मुश्किल हो गया।
भारत के नेताओं ने दूसरा रास्ता क्यों चुना। आज़ादी की लड़ाई लोकतंत्र के विचार के प्रति गहरे तक प्रतिबद्ध थी। इन नेताओं ने राजनीति को समस्या नहीं, समस्याओं के समाधान का उपाय माना। होड़ और सत्ता राजनीति की सबसे दिखने वाली चीज़ें हैं, पर राजनीतिक गतिविधि का मकसद जनहित को तय करना और उसे साधना है और यही होना चाहिए।
अब मशीन खड़ी करनी थी। संविधान नियम तय कर चुका था, पर शासन अभी अंतरिम सरकार चला रही थी। अब देश की पहली लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार बिठानी ज़रूरी थी।
दो तैयारी वाले काम। सीमांकन यानी चुनाव-क्षेत्रों की सीमाएँ तय करना, और मतदाता-सूची तैयार करना। दोनों में काफ़ी वक्त लगा, और चुनाव दो बार स्थगित करने पड़े।
40 लाख नामों की गड़बड़ी। मतदाता-सूची के पहले प्रारूप में लाखों महिलाओं के अपने नाम दर्ज़ ही नहीं थे, वे सिर्फ़ ‘फलाँ की बेटी’ या ‘फलाँ की बीवी’ लिखी गई थीं। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियाँ मानने से इनकार कर दिया और आदेश दिया कि जहाँ संभव हो सुधार किया जाए और जहाँ ज़रूरी हो नाम हटा दिया जाए।
निरक्षरता का हल। सिर्फ़ 15 फीसदी मतदाता साक्षर थे, इसलिए हर मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक अलग मतपेटी रखी गई जिस पर उस उम्मीदवार का चुनाव-चिह्न अंकित था। मतदाता को बस अपनी पसंद के उम्मीदवार की पेटी में कोरा मतपत्र डालना था।
नतीजा। औसतन हर सीट पर चार उम्मीदवार, आधे से अधिक मतदाताओं की भागीदारी, और नतीजे आने पर हारने वाले उम्मीदवारों ने भी इन्हें निष्पक्ष बताया।
- एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया।
- ‘आर्गनाइजर’ नाम की पत्रिका ने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू ‘अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।’
- इंडियन सिविल सर्विस के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे का दावा था कि ‘आने वाला वक्त और अब से कहीं ज्यादा जानकार दौर बड़े विस्मय से लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी देखेगा।’
- टाइम्स ऑफ इंडिया ने माना कि इन चुनावों ने ‘उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया है जो सार्वभौम मताधिकार की इस शुरुआत को इस देश के लिए’ जोखिम भरा प्रयोग मानते थे।
- हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा कि इस बात पर सर्वसम्मति है कि दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनावी प्रयोग में भारत के लोगों ने बहुत अच्छा आचरण किया।
किताब का निष्कर्ष: 1952 का भारतीय आम चुनाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर बन गया, क्योंकि अब यह दलील देना मुमकिन नहीं रह गया था कि गरीबी या अशिक्षा की हालत में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं कराए जा सकते।
5 मतदान का तरीका कैसे बदला
| कब | तरीका |
|---|---|
| शुरुआती दो आम चुनाव | हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी, जिस पर उसका चुनाव-चिह्न अंकित; मतदाता अपनी पसंद की पेटी में कोरा मतपत्र डालता था। लगभग 20 लाख स्टील के बक्से लगे। |
| इसके बाद, अगले चालीस साल | एक ही मतपत्र पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चुनाव-चिह्न; मतदाता को अपने उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती थी। |
| 1990 के दशक के अंत | चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का इस्तेमाल शुरू किया। |
| 2004 तक | पूरे देश में ईवीएम से मतदान होने लगा। |
किताब मतपेटियाँ तैयार करने का एक असली ब्यौरा देती है: हर पेटी पर भीतर और बाहर उसके उम्मीदवार का चुनाव-चिह्न लगा, और उम्मीदवार का नाम उर्दू, हिंदी और पंजाबी में लिखा गया, साथ में चुनाव-क्षेत्र, मतदान केंद्र और बूथ की संख्या। इस काम में छह लोगों को पाँच घंटे लगे, जिनमें उनकी दो बेटियाँ भी थीं, और यह सारा काम उनके घर पर ही हुआ।
6 कांग्रेस का प्रभुत्व क्यों कायम हुआ
छह कारण
स्वाधीनता-संग्राम की विरासत
कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन का वारिस माना जाता था। आज़ादी की लड़ाई के नेता ही अब उसके उम्मीदवार थे।
देशव्यापी संगठन
वह अकेली पार्टी थी जिसका संगठन देश के कोने-कोने में, स्थानीय स्तर तक फैला हुआ था।
‘अव्वल और एकलौता’
कांग्रेस का अभियान तब शुरू हो चुका था जब बाकी दल रणनीति भी नहीं सोच पाए थे। ज़्यादातर दूसरे दल आज़ादी के आस-पास या उसके बाद ही बने।
नेहरू का करिश्मा
जवाहरलाल नेहरू उस वक्त भारतीय राजनीति के सबसे लोकप्रिय और करिश्माई नेता थे। उन्होंने पूरे देश का दौरा करके अभियान की अगुवाई की।
सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव
कुछ ही समय पहले तक वह एक राष्ट्रीय आंदोलन थी, इसलिए वह ऐसे समूहों को भी साथ रख पाती थी जिनके हित अकसर एक-दूसरे से टकराते थे।
चुनाव-प्रणाली
‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ ने 45 प्रतिशत वोट को 74 फीसदी सीटों में बदल दिया, और गैर-कांग्रेसी वोट आपस में बँटा रहा।
7 ‘कांग्रेस-प्रणाली’ और गुटों का तर्क
1. कांग्रेस का स्वभाव गठबंधनी था, और गठबंधन में शामिल होने वाले सबको जगह देनी पड़ती है।
2. इसलिए उसे अतिवादी रुख़ से बचना पड़ा और लगभग हर मसले पर संतुलन साधना पड़ा। सुलह-समझौता और सर्व-समावेशिता गठबंधन की पहचान हैं।
3. इससे विपक्ष मुश्किल में पड़ा: विपक्ष जो भी कहना चाहता, उसे कांग्रेस के कार्यक्रम और विचारधारा में जगह मिल ही जाती थी।
4. गठबंधन जैसी पार्टी अंदरूनी मतभेदों के प्रति ज़्यादा सहनशील भी होती है और समूहों तथा नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं को समेट लेती है।
5. इसलिए नाराज़ समूह पार्टी छोड़कर ‘विपक्ष’ बनने के बजाय भीतर रहकर दूसरे समूहों से लड़ता रहा। ये समूह ही गुट हैं।
6. नतीजा यह कि गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी नहीं, ताकत बन गई: अलग-अलग हितों और विचारधाराओं के नेता नई पार्टी बनाने के बजाय भीतर ही बने रहे।
7. गुटों ने अलग-अलग विचारधारात्मक रुख़ अपनाए, जिससे कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी दिखने लगी, और गुटों की प्रणाली शासक दल के भीतर संतुलन साधने का औजार बन गई।
8. इसलिए राजनीतिक होड़ कांग्रेस के भीतर ही होती थी, और कांग्रेस शासक दल तथा विपक्ष दोनों की भूमिका निभाती थी। इसी वजह से इस दौर को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।
कांग्रेस का जन्म 1885 में नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों के हित-समूह के रूप में हुआ। 20वीं सदी में वह जनआंदोलन बनी। शुरू में इसमें अँग्रेज़ीदाँ, अगड़ी जाति, ऊँचले मध्यवर्ग और शहरी अभिजन थे, पर हर सविनय अवज्ञा आंदोलन के साथ उसका सामाजिक आधार बढ़ता गया: किसान और उद्योगपति, शहर और गाँव, मज़दूर और मालिक, तथा मध्य, निम्न और उच्च वर्ग एवं जाति, सब उसमें समाते चले गए। आज़ादी तक वह एक सतरंगा सामाजिक गठबंधन बन चुकी थी और साथ ही एक विचारधारात्मक गठबंधन भी, जिसमें हर धारा के लोग थे। कांग्रेस एक मंच की तरह काम करती थी।
8 भारत का प्रभुत्व बाकी दुनिया से अलग क्यों
| देश | एक पार्टी का प्रभुत्व कैसे कायम हुआ |
|---|---|
| चीन, क्यूबा, सीरिया | इनके संविधान में ही सिर्फ़ एक पार्टी को देश के शासन की अनुमति दी गई है |
| म्यांमार, बेलारूस, इरीट्रिया | यहाँ एक पार्टी का प्रभुत्व कानूनी और सैन्य उपायों के चलते कायम हुआ है |
| मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, ताईवान | अब से कुछ साल पहले तक ये भी एक पार्टी के प्रभुत्व वाले देश थे |
| भारत | यहाँ प्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ: अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में होड़ की और फिर भी कांग्रेस चुनाव-दर-चुनाव जीतती रही |
| दक्षिण अफ्रीका | असली मिलती-जुलती मिसाल: रंगभेद की समाप्ति के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का प्रभुत्व |
कानूनी और सैन्य उपायों वाले समूह में पाठ्यपुस्तक तीन ही देश गिनाती है: म्यांमार, बेलारूस और इरीट्रिया।
9 विपक्षी दल
| दल | गठन | क्या याद रखना है | नेता |
|---|---|---|---|
| सोशलिस्ट पार्टी | कांग्रेस के भीतर 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी; अलग दल 1948 में | 1948 में कांग्रेस ने अपने संविधान में संशोधन करके दोहरी सदस्यता पर रोक लगाई, इसलिए समाजवादियों को अलग पार्टी बनानी पड़ी। ये लोकतांत्रिक समाजवाद में यकीन रखते थे और कांग्रेस पर पूँजीपतियों तथा ज़मींदारों का पक्ष लेने और मज़दूरों-किसानों की अनदेखी का आरोप लगाते थे। 1955 में जब कांग्रेस ने ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ को लक्ष्य घोषित किया तो समाजवादी दुविधा में पड़ गए: राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ समाजवादियों ने कांग्रेस से अपनी दूरी बढ़ाई और उसकी आलोचना की, जबकि अशोक मेहता जैसे कुछ अन्य समाजवादियों ने कांग्रेस से हल्के-फुल्के सहयोग की तरफदारी की। टूट से किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी निकलीं। आज के समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और जनता दल (सेक्युलर) पर सोशलिस्ट पार्टी की छाप देखी जा सकती है। | जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया, एस.एम. जोशी |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) | 1920 के दशक के शुरुआती सालों के साम्यवादी समूहों से | रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित। 1935 से कांग्रेस के दायरे में काम किया और दिसंबर 1941 में अलग हो गए, क्योंकि उन्होंने नाजी जर्मनी के खिलाफ़ लड़ रहे ब्रिटेन का समर्थन किया। आज़ादी के समय इनके पास सुचारू पार्टी मशीनरी और समर्पित कॉडर था। इनका मुख्य सवाल था कि आज़ादी सच्ची है या झूठी। तेलंगाना में हिंसक विद्रोह को बढ़ावा दिया, जन-समर्थन नहीं मिला और सशस्त्र सेनाओं ने उसे दबा दिया। 1951 में हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ा। पहले आम चुनाव में 16 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी। समर्थन आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में केंद्रित था। 1964 में चीन-सोवियत मतभेद के बाद बड़ी टूट: सोवियत-समर्थक सीपीआई में रहे और विरोधियों ने सीपीआई (एम) बनाई। दोनों दल आज तक कायम हैं। | ए.के. गोपालन, एस.ए. डांगे, ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, पी.सी. जोशी, अजय घोष, पी. सुंदरैया |
| भारतीय जनसंघ (बीजेएस) | 1951 | संस्थापक-अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी; जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदू महासभा में। विचारधारा: ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’; भारत और पाकिस्तान का एकीकरण यानी ‘अखंड भारत’; अंग्रेजी हटाकर हिंदी को राजभाषा बनाने के आंदोलन में सबसे आगे; धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियायत देने का विरोध; चीन के 1964 के आण्विक-परीक्षण के बाद भारत के आण्विक हथियारों की लगातार पैरोकारी। 1952 में 3 और 1957 में 4 लोकसभा सीटें। शुरुआती समर्थन राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों में। आज की भारतीय जनता पार्टी की जड़ें इसी जनसंघ में हैं। | श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक |
| स्वतंत्र पार्टी | 1959, नेतृत्व सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) (यह जानकारी पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय में नहीं है) | इस अध्याय में इस पार्टी का कोई परिचय-बक्सा नहीं है। पार्टी का नाम सिर्फ़ प्रश्नावली में और चुनावी नक्शे की दल-सूची (संक्षेप ‘स्वतंत्र’) में आता है। प्रश्नावली 1(ग) का अपेक्षित उत्तर: इसका एक निर्देशक सिद्धांत राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था था। प्रश्नावली 2 का अपेक्षित मेल: मीनू मसानी इसी दल से (किताब उत्तर-कुंजी नहीं छापती)। | सी. राजगोपालाचारी (यह जानकारी पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय में नहीं है); मीनू मसानी (प्रश्नावली 2 का अपेक्षित मेल) |
1950 के दशक में इन दलों को कहने भर को प्रतिनिधित्व मिला, फिर भी इनकी मौजूदगी ने बहुत कुछ किया। इन्होंने शासन-व्यवस्था का लोकतांत्रिक चरित्र बनाए रखा; सुचिन्तित और सिद्धांतों वाली आलोचना पेश की जिससे शासक दल पर अंकुश रहा और कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन तक बदला; लोकतांत्रिक विकल्प की संभावना जीवित रखकर व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका; और आगे के नेता तैयार किए। असल सत्ता से दूर होने के कारण ये हाशिए से, कांग्रेस के गुटों के ज़रिए, अप्रत्यक्ष असर डालते थे।
पारस्परिक सम्मान। शुरुआती सालों में अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कांग्रेस-विरोधी नेता शामिल थे, और नेहरू ने जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सरकार में आने का न्यौता दिया। जैसे-जैसे दलों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज़ हुई, यह भाव लगातार कम होता गया।
10 केरल 1957: महत्त्वपूर्ण अपवाद
मार्च 1957। केरल विधानसभा के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं: 126 में से 60, और साथ में पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का समर्थन भी।
सरकार बनी। राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया। दुनिया में यह पहला अवसर था जब कोई कम्युनिस्ट सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के रास्ते सत्ता में आई।
‘मुक्ति संघर्ष’। सत्ता से बेदखल होने पर कांग्रेस ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ़ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया। कम्युनिस्टों का कहना था कि यह आंदोलन निहित स्वार्थों और धार्मिक संगठनों की अगुवाई में चल रहा है।
1959। केंद्र की कांग्रेस सरकार ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केरल सरकार को बर्खास्त कर दिया। यह फ़ैसला बेहद विवादास्पद साबित हुआ और संविधान की आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में इसका बार-बार हवाला दिया गया।
11 अध्याय के प्रमुख व्यक्ति
| नाम | अध्याय क्या कहता है |
|---|---|
| जवाहरलाल नेहरू | उस वक्त भारतीय राजनीति के सबसे लोकप्रिय और करिश्माई नेता; कांग्रेस के अभियान की अगुवाई; पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री। कांग्रेस अध्यक्ष पद पर टंडन की जीत के बाद राजाजी को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा कि अगर कांग्रेस के सदस्य टंडन के निर्वाचन को सरकार या कांग्रेस में उनकी मौजूदगी से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण समझते हैं, तो वे कांग्रेस और सरकार के भीतर पूरी तरह अप्रासांगिक हो चुके हैं। |
| सुकुमार सेन | भारत के पहले चुनाव आयुक्त। |
| ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद | केरल में कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता; 1957 में सरकार बनाई। |
| रजनी कोठारी | प्रश्नावली 5 के अवतरण के लेखक, जो पटेल, गाँधी और कांग्रेस की समन्वयवादी भूमिका पर है। |
| बाबा साहब भीमराव रामजी अंबेडकर (1891-1956) | जाति विरोधी आंदोलन के नेता; इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी और बाद में शिडयूल्ड कास्टस् फेडरेशन के संस्थापक; रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के गठन के योजनाकार; संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष; नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; हिंदू कोड बिल पर 1951 में इस्तीफा; 1956 में हज़ारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 के भाषण में उन्होंने चेताया कि राजनीति में नायक-पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और यह रास्ता तानाशाही की तरफ़ जाता है। |
| श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) | हिंदू महासभा के नेता; भारतीय जनसंघ के संस्थापक; नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; पाकिस्तान से संबंधों पर मतभेद के चलते 1950 में इस्तीफा; संविधान सभा और लोकसभा के सदस्य; कश्मीर को स्वायत्तता देने के खिलाफ़; जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान गिरफ़्तार; हिरासत में मौत। |
| मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888-1958) | मूल नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद; इस्लाम के विद्वान; हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतिपादक; विभाजन के विरोधी; संविधान सभा के सदस्य; आज़ाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री। |
| राजकुमारी अमृत कौर (1889-1964) | गाँधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी; कपूरथला के राजपरिवार में जन्म; माता से ईसाई धर्म; संविधान सभा की सदस्य; पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री, 1957 तक। |
| आचार्य नरेन्द्र देव (1889-1956) | कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक; किसान आंदोलन में सक्रिय; बौद्ध धर्म के विद्वान; बाद में सोशलिस्ट और फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व। |
| रफी अहमद किदवई (1894-1954) | उत्तर प्रदेश से कांग्रेस नेता; प्रांतीय सरकार में 1937 में और फिर 1946 में मंत्री; आज़ाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में संचार मंत्री; खाद्य एवं कृषि मंत्री (1952-54)। |
| ए.के. गोपालन (1904-1977) | केरल के कम्युनिस्ट नेता; शुरुआत कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में; 1939 में कम्युनिस्ट पार्टी में; 1964 की टूट के बाद सीपीआई (एम) में; 1952 से सांसद। |
| दीन दयाल उपाध्याय (1916-1968) | 1942 से आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता; भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य; पहले महासचिव और फिर अध्यक्ष; समग्र मानवतावाद के प्रणेता। |
कार्टूनिस्ट शंकर का ‘रस्साकसी’ (29 अगस्त, 1954) कार्टून: पेड़ पर नेहरू और उनके कैबिनेट सहयोगी बैठे हैं और पेड़ गिराने की कोशिश कर रहे हैं ए.के. गोपालन, आचार्य कृपलानी, एन.सी. चटर्जी, श्रीकांतन नायर और सरदार हुकुम सिंह। 1951 की चुनाव समिति वाले कार्टून में नेहरू के साथ मोरारजी देसाई, रफ़ी अहमद किदवई, डॉ. बी.सी. रॉय, कामराज नाडार, राजगोपालाचारी, जगजीवन राम, मौलाना आज़ाद, डी.पी. मिश्रा, पी.डी. टंडन और गोविन्द बल्लभ पंत हैं। सिने-संसार वाला बक्सा मराठी फ़िल्म ‘सिंहासन’ (1981) की सिफ़ारिश करता है: निर्देशक जब्बार पटेल, पटकथा विजय तेंदुलकर, अरुण साधु के दो उपन्यासों ‘सिंहासन’ और ‘मुंबई दिनांक’ पर आधारित, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए गुटों की रस्साकशी दिखाती है।
किताब के चुनावी नक्शे और उसके नीचे के तीन स्तंभ-चित्रों (1952, 1957, 1962) के साथ दलों के ये संक्षेप छपे हैं: भाराकाँ (इंडियन नेशनल कांग्रेस), नि (निर्दलीय), सीपीआई, सोपा (सोशलिस्ट पार्टी), किमपा (किसान मज़दूर प्रजा पार्टी), स्वतंत्र (स्वतंत्र पार्टी), प्रसोपा (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी), हिंदू महा. (अखिल भारतीय हिन्दू महासभा), जनसंघ (आल इंडिया भारतीय जनसंघ), झापा (झारखंड पार्टी), एससीएफ (शिडयूल्ड कास्टस् फेडरेशन), डीएमके (द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम), गप (गणतंत्र परिषद), पीडीएफ (पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट)।
1952-1967 के दौरान कांग्रेस शासित राज्यों के दो अपवाद: केरल, जहाँ 1957-1959 में डेमोक्रेटिक लेफ़्ट फ्रंट की सरकार रही, और जम्मू और कश्मीर, जहाँ नेशनल कॉन्फ्रेंस थी। प्रश्नावली 4 का उत्तर यही दो राज्य हैं।
ध्यान दें: त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा इस उत्तर में नहीं आते। पहले आम चुनाव में इन तीनों में कांग्रेस को अधिकतर सीटें नहीं मिली थीं, लेकिन आख़िरकार इन तीनों में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी।
13 आख़िरी जाँच
1. चुनाव आयोग का गठन जनवरी 1950; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त।
2. 40 लाख महिलाओं के नाम छूटे; आयोग ने ऐसी प्रविष्टियाँ मानने से इनकार करके सुधार या नाम हटाने का आदेश दिया।
3. 17 करोड़ मतदाता, 489 सांसद, 15 फीसदी साक्षर, 20 लाख मतपेटियाँ, 3 लाख चुनावकर्मी।
4. चुनाव अक्तूबर 1951 से फरवरी 1952 तक; कहा ‘1952 का चुनाव’ जाता है; कुल छह महीने लगे।
5. कांग्रेस 489 में से 364; सीपीआई 16 सीटों के साथ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी।
6. ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’: कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट पर 74 फीसदी सीटें; सोशलिस्ट पार्टी को कुल 10 प्रतिशत वोट पर 3 प्रतिशत सीटें भी नहीं।
7. केरल, मार्च 1957: कम्युनिस्ट पार्टी 126 में से 60, नम्बूदरीपाद की सरकार, 1959 में अनुच्छेद 356 के अंतर्गत बर्खास्त।
8. भारत का प्रभुत्व इसलिए अलग है कि वह लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ; मिलती-जुलती मिसाल दक्षिण अफ्रीका की अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस।
9. गुट कमज़ोरी नहीं ताकत थे, और होड़ पार्टी के भीतर होती थी: यही ‘कांग्रेस-प्रणाली’ है।
10. तीन विपक्षी दल याद रखिए: सोशलिस्ट पार्टी (1934/1948), सीपीआई (1920 का दशक, 1964 की टूट) और भारतीय जनसंघ (1951)। स्वतंत्र पार्टी इस अध्याय में सिर्फ़ प्रश्नावली और चुनावी नक्शे की दल-सूची में आती है।
आज़ादी के बाद भारत ने लोकतंत्र को टालने के बजाय पहले ही आम चुनाव में सार्वभौम मताधिकार लागू किया, और उसके बाद जो एक-दलीय प्रभुत्व कायम हुआ वह लोकतंत्र की कीमत पर नहीं बल्कि मुक्त और निष्पक्ष चुनावों के भीतर कायम हुआ, क्योंकि कांग्रेस खुद एक ऐसा गठबंधन थी जिसमें विपक्ष भी समा जाता था।
1. पाठ्यपुस्तक के प्रश्नावली 5 में दो उप-प्रश्न हैं, (क) और (ख)।
2. प्रश्नावली 2 में पाठ्यपुस्तक दलों को (i)(ii)(iii)(iv) से गिनाती है, नेताओं को (क)(ख)(ग)(घ) से। उत्तर इन्हीं चिह्नों में लिखिए।