इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. आपातकाल की घोषणा किस तारीख को और संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत की गई?
उत्तर: 25 जून 1975 के दिन, संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत। सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इसी तर्क के साथ यह अनुच्छेद लागू किया।
प्र. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के किस न्यायाधीश ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया और कब?
उत्तर: न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने, 12 जून 1975 के दिन। उन्होंने लोकसभा के लिए इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया।
प्र. ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किसने किया और किस उद्देश्य से?
उत्तर: जयप्रकाश नारायण ने। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके।
प्र. 1974 की रेल हड़ताल का आह्वान किस संगठन ने और किसके नेतृत्व में किया?
उत्तर: रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने, जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में।
प्र. प्रेस सेंसरशिप से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: आपातकाल में सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी और समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है। इसे ही प्रेस सेंसरशिप कहा जाता है।
प्र. निवारक नज़रबंदी क्या है?
उत्तर: यह वह प्रावधान है जिसके अंतर्गत लोगों को इसलिए गिरफ़्तार नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है, बल्कि इस आशंका से गिरफ़्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।
प्र. 1977 के चुनाव में विपक्ष ने किस नारे पर चुनाव लड़ा?
उत्तर: विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा और जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध रहा।
प्र. मंडल आयोग की नियुक्ति किस सरकार ने और किस पृष्ठभूमि में की?
उत्तर: केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने। बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचने के बाद यह आयोग नियुक्त किया गया।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने इसके क्या कारण बताए थे?
उत्तर: सरकार ने 25 जून 1975 को कहा कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इसी तर्क के साथ उसने अनुच्छेद 352 लागू किया, जिसके अंतर्गत बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर आपातकाल लगाया जा सकता है। सरकार का निर्णय था कि गंभीर संकट की घड़ी आन पड़ी है, इसलिए आपातकाल की घोषणा ज़रूरी हो गई। सरकार ने जिन घटनाओं का हवाला दिया उनमें जयप्रकाश नारायण का राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह और सेना, पुलिस तथा सरकारी कर्मचारियों से सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करने का आह्वान शामिल था, जिससे सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ था।
प्र. केशवानंद भारती के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या फ़ैसला सुनाया और इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर: 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है। इसका महत्त्व यह था कि संसद की संशोधन-शक्ति की एक सीमा तय हो गई। अध्याय के अनुसार यह फ़ैसला संसद और न्यायपालिका के बीच चले लंबे संघर्ष की परिणति था।
प्र. 1973 में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राजनीतिक रूप से विवादास्पद क्यों बन गई?
उत्तर: सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाने की परिपाटी चली आ रही थी, लेकिन 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। यह इसलिए विवादास्पद बना क्योंकि जिन तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी हुई थी, उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फ़ैसला दिया था।
प्र. 24 जून 1975 के सर्वोच्च न्यायालय के आंशिक स्थगनादेश का क्या अर्थ था?
उत्तर: सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर आंशिक स्थगनादेश सुनाते हुए कहा कि जब तक इस फ़ैसले को लेकर की गई अपील की सुनवाई नहीं होती तब तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी, लेकिन वे लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती हैं।
प्र. आपातकाल के दौरान पारित 42वें संशोधन से कौन-से बदलाव हुए?
उत्तर: 42वें संशोधन के जरिए संविधान के अनेक हिस्सों में बदलाव किए गए। इनमें एक बदलाव यह था कि देश की विधायिका का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया, और यह व्यवस्था मात्र आपातकाल की अवधि भर के लिए नहीं, स्थायी रूप से लागू की जानी थी। इसके अतिरिक्त अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था, यानी 1971 के बाद चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।
प्र. गुजरात के छात्र-आंदोलन के क्या कारण थे और उसका क्या नतीजा निकला?
उत्तर: 1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमत और उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ा। बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी इसमें शरीक हो गईं और आंदोलन ने विकराल रूप ले लिया। नतीजा यह हुआ कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, और विपक्षी दलों के दबाव में 1975 के जून में विधानसभा के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस हार गई।
प्र. जयप्रकाश नारायण ने बिहार के छात्रों का निमंत्रण किन शर्तों पर स्वीकार किया और इसका क्या असर हुआ?
उत्तर: जेपी ने छात्रों का निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा। इससे छात्र-आंदोलन ने एक राजनीतिक चरित्र ग्रहण कर लिया, उसके भीतर राष्ट्रव्यापी अपील आई और जीवन के हर क्षेत्र के लोग आंदोलन से जुड़ गए।
प्र. आपातकाल के दौरान समाचारपत्रों और पत्रिकाओं ने सेंसरशिप का विरोध किस तरह किया?
उत्तर: ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने जिन समाचारों को छापने से रोका जाता था उनकी जगह खाली छोड़कर विरोध जताया। ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाओं ने सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा। सेंसरशिप को धत्ता बताते हुए गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स भी निकले।
प्र. ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ क्या थी और उसका क्या हुआ?
उत्तर: 1977 के चुनाव के समय कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में एक नयी पार्टी बनाई, जिसका नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था। बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. आपातकाल की पृष्ठभूमि में जो आर्थिक कारण काम कर रहे थे, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर: 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था, लेकिन 1971-72 के बाद के सालों में देश की सामाजिक-आर्थिक दशा में खास सुधार नहीं हुआ। बांग्लादेश के संकट से भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा, क्योंकि लगभग 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार करके भारत आ गए थे। इसके बाद पाकिस्तान से युद्ध भी करना पड़ा और युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। इसी अवधि में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई, जिससे 1973 में चीज़ों की कीमतों में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी और बेरोज़गारी, खासकर ग्रामीण इलाकों में, बेतहाशा बढ़ी। खर्चे कम करने के लिए सरकार ने अपने कर्मचारियों का वेतन रोक लिया, जिससे उनमें असंतोष पनपा। 1972-73 में मानसून असफल रहा और खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। इस पूरी बदहाली को लेकर देश में असंतोष का माहौल था, जिसका फ़ायदा उठाकर गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने जन-विरोध की अगुवाई की।
प्र. 1974 की रेल हड़ताल पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर: रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तों के संबंध में अपनी माँगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए यह आह्वान किया गया था। सरकार इन माँगों के खिलाफ़ थी, इसलिए भारत के इस सबसे बड़े सार्वजनिक उद्यम के कर्मचारी 1974 के मई महीने में हड़ताल पर चले गए। इस हड़ताल से मज़दूरों के असंतोष को बढ़ावा मिला। मज़दूरों के अधिकार जैसे मसले तो उठे ही, यह सवाल भी उठा कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर सकते हैं या नहीं। सरकार ने हड़ताल को अवैधानिक करार दिया, माँगों को मानने से इनकार किया, इसके कई नेताओं को गिरफ़्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना को तैनात कर दिया। 20 दिन के बाद यह हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई।
प्र. सरकार और न्यायपालिका के बीच किन संवैधानिक मसलों पर टकराव हुआ?
उत्तर: इस दौर में तीन संवैधानिक मसले उठे। पहला, क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? सर्वोच्च न्यायालय का जवाब था कि संसद ऐसा नहीं कर सकती। दूसरा, क्या संसद संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? इस पर भी अदालत का कहना था कि सरकार संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए। तीसरा, संसद ने यह कहते हुए संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया। इस संकट की परिणति केशवानंद भारती के मुकदमे के रूप में आई, जिसमें अदालत ने कहा कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती। इसके बाद 1973 में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके ए.एन. रे की मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति और ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की बहस ने तनाव और बढ़ाया। इस संघर्ष का चरमबिंदु तब आया जब एक उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।
प्र. आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद क्या परिणाम सामने आए?
उत्तर: सरकार के इस फ़ैसले से विरोध-आंदोलन एकबारगी रुक गया और हड़तालों पर रोक लगा दी गई। अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया और राजनीतिक माहौल में तनाव भरा एक गहरा सन्नाटा छा गया। सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी और समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है, जिसे प्रेस सेंसरशिप कहा जाता है। सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया। धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी। सबसे बड़ी बात यह हुई कि नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए और उनके पास यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ।
प्र. नागरिक अधिकारों की दशा पर और नागरिकों पर आपातकाल का क्या असर हुआ?
उत्तर: आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए, यहाँ तक कि उनके पास मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत जाने का अधिकार भी नहीं रहा। सरकार ने निवारक नज़रबंदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया, जिसके अंतर्गत लोगों को इस आशंका से गिरफ़्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं। गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ता बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे, और सरकार का कहना था कि उन्हें गिरफ़्तारी का कारण बताना कतई ज़रूरी नहीं है। अनेक उच्च न्यायालयों ने ऐसी याचिकाएँ स्वीकार करने का फ़ैसला दिया, लेकिन 1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उन्हें उलट दिया और सरकार की दलील मान ली। इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है। अध्याय के अनुसार इस फ़ैसले से नागरिकों के लिए अदालत के दरवाज़े बंद हो गए और इसे सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया।
प्र. 1977 के चुनावों के बाद पहली दफा केंद्र में विपक्षी दल की सरकार बनी। ऐसा किन कारणों से संभव हुआ?
उत्तर: पहला कारण यह था कि 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों पर जनमत-संग्रह बन गए, खासकर उत्तर भारत में जहाँ आपातकाल का असर सबसे ज़्यादा महसूस किया गया था। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा और जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध गया। दूसरा कारण जनता पार्टी का गठन था। चुनाव के ऐन पहले बड़ी विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। कांग्रेस के कुछ नेता भी इस पार्टी में शामिल हुए और जगजीवन राम की ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ भी बाद में इसमें मिल गई। तीसरा कारण चुनाव-प्रचार था, जिसमें जनता पार्टी ने शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज़्यादतियों पर ज़ोर दिया। हज़ारों लोगों की गिरफ़्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।
प्र. 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार क्यों नहीं चल पाई?
उत्तर: 1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के पद के लिए मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच होड़ मची। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन इससे पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म नहीं हुई। आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका। आलोचकों ने कहा कि पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था, और सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी। जनता पार्टी बिखर गई और देसाई की सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर चरण सिंह के नेतृत्व में दूसरी सरकार बनी, लेकिन कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और यह सरकार मात्र 4 महीने तक चली।
प्र. आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र ने क्या सबक सीखे?
उत्तर: पहला सबक यह है कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है। बहुत-से पर्यवेक्षक मानते हैं कि आपातकाल के दौरान भारत लोकतांत्रिक नहीं रह गया था, लेकिन थोड़े ही दिनों के अंदर कामकाज फिर से लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट आया। दूसरा सबक यह कि संविधान में वर्णित आपातकाल के प्रावधानों के कुछ अर्थगत उलझाव प्रकट हुए, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है, और इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में दे। तीसरा सबक यह कि आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा सचेत हुआ। आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई और नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए। इसके साथ अध्याय यह भी दर्ज करता है कि आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ, ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं और शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार वे राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गई थीं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. आपातकाल की घोषणा तक पहुँचने वाली घटनाओं का क्रमवार वर्णन कीजिए।
उत्तर: 1967 के बाद दलगत प्रतिस्पर्धा तीखी और ध्रुवीकृत हो चली थी, कांग्रेस की टूट से इंदिरा गाँधी और उनके विरोधियों के बीच मतभेद गहरे हो गए थे और न्यायपालिका तथा सरकार के रिश्तों में तनाव आ गया था। इसी दौर में आर्थिक संकट गहराया: बांग्लादेश का संकट, पाकिस्तान से युद्ध, अमरीकी सहायता का बंद होना, तेल की कीमतों की बढ़ोतरी, 1973 में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी की मूल्यवृद्धि, बढ़ती बेरोज़गारी और 1972-73 का असफल मानसून, जिससे खाद्यान्न उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। 1974 के जनवरी में गुजरात और मार्च में बिहार के छात्र-आंदोलन शुरू हुए। जेपी ने बिहार आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। मई 1974 में जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में रेल हड़ताल हुई, जो 20 दिन बाद बिना समझौते के वापस ले ली गई। इससे पहले, 1973 में ही, केशवानंद भारती के फ़ैसले और ए.एन. रे की नियुक्ति ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव बढ़ा दिया था। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया और 24 जून को सर्वोच्च न्यायालय ने आंशिक स्थगनादेश दिया। 25 जून 1975 को रामलीला मैदान में विशाल प्रदर्शन हुआ और जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की। इन्हीं घटनाओं के मद्देनजर सरकार ने 25 जून 1975 को अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा कर दी। उसी रात प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उद्घोषणा कर दी, आधी रात के बाद अखबारों के दफ़्तरों की बिजली काट दी गई, तड़के विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं और 26 जून की सुबह 6 बजे मंत्रिमंडल को इसकी सूचना दी गई।
प्र. भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ? उदाहरणों से पुष्टि कीजिए।
उत्तर: पहला असर यह हुआ कि विपक्ष एकजुट हो गया। चुनाव के ऐन पहले बड़ी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई, जो बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गई। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। दूसरा असर 1977 के नतीजों में दिखा: आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई, उसे मात्र 154 सीटें और 35 प्रतिशत से भी कम वोट मिले, जबकि जनता पार्टी और उसके साथी दलों को 542 में से 330 सीटें मिलीं और अकेले जनता पार्टी को 295 सीटें तथा स्पष्ट बहुमत। तीसरा असर यह कि केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, पर वह टिक नहीं पाई; जनता पार्टी बिखर गई, देसाई सरकार ने 28 माह में बहुमत खोया और चरण सिंह की सरकार 4 महीने चली, जिससे 1980 में कांग्रेस 353 सीटों के साथ लौट आई। चौथा और गहरा असर यह था कि 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ। 1977 के विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं जिनमें पिछड़ी जाति के नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण का सवाल उठा और केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया। साथ ही कांग्रेस का सबको समाहित करके चलने वाला स्वभाव बदला और वह एक विचारधारा तथा एक नेता की लोकप्रियता पर निर्भर होती चली गई, जिसके जवाब में विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े।
प्र. आपातकाल की अवधि को संवैधानिक संकट और राजनीतिक संकट, दोनों के रूप में क्यों देखा जाता है? समझाइए।
उत्तर: अध्याय आपातकाल और इसके आसपास की अवधि को संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में देखता है क्योंकि संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष आपातकाल के मूल में था। मौलिक अधिकारों में कटौती, संपत्ति के अधिकार और नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लेकर उठे तीन मसलों पर सर्वोच्च न्यायालय और संसद आमने-सामने थे। केशवानंद भारती के फ़ैसले में अदालत ने बुनियादी ढाँचे का सिद्धांत दिया, फिर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके ए.एन. रे की नियुक्ति हुई और ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की बात होने लगी। आपातकाल के दौरान संसद ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को अदालत में चुनौती देने पर रोक लगाने वाला संशोधन किया और 42वाँ संशोधन पारित किया। दूसरी तरफ़ यह राजनीतिक संकट का भी दौर था। सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था, फिर भी इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया। भारतीय संविधान के निर्माताओं को विश्वास था कि सभी राजनीतिक दल लोकतांत्रिक मानकों का पालन करेंगे और आपातकाल की स्थिति में भी सरकार अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल विधि के शासन के दायरे में रहते हुए करेगी। इसी उम्मीद में सरकार को व्यापक और चहुँमुखी शक्तियाँ दी गई थीं, जिनका आपातकाल के दौरान दुरुपयोग हुआ। अध्याय का अपना निष्कर्ष यह है कि यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज़्यादा संगीन था।
प्र. गुजरात और बिहार के आंदोलनों का वर्णन कीजिए और बताइए कि राष्ट्रीय राजनीति पर उनका क्या प्रभाव पड़ा।
उत्तर: गुजरात और बिहार, दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। 1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमत और उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ा। बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी इसमें शरीक हो गईं, आंदोलन ने विकराल रूप ले लिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। मोरारजी देसाई ने कहा कि नए सिरे से चुनाव न होने पर वे अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठ जाएँगे। दबाव में 1975 के जून में विधानसभा के चुनाव हुए और कांग्रेस हार गई। 1974 के मार्च माह में बढ़ती कीमतों, खाद्यान्न के अभाव, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बिहार में छात्रों ने आंदोलन छेड़ा और जयप्रकाश नारायण को बुलावा भेजा। जेपी ने यह निमंत्रण इस शर्त पर स्वीकार किया कि आंदोलन अहिंसक रहेगा और सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की माँग की और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। घेराव, बंद और हड़ताल का सिलसिला चला, पर सरकार ने इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया। राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव यह हुआ कि छात्र-आंदोलन ने एक राजनीतिक चरित्र ले लिया और उसमें राष्ट्रव्यापी अपील आई। रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल के साथ मिलकर देश के रोज़मर्रा के कामकाज के ठप्प हो जाने का खतरा पैदा हुआ। 1975 में जेपी ने जनता के ‘संसद-मार्च’ का नेतृत्व किया, जो राजधानी की तब तक की सबसे बड़ी रैली थी। उन्हें भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेसी दलों का समर्थन मिला और इन दलों ने जेपी को इंदिरा गाँधी के विकल्प के रूप में पेश किया। दोनों आंदोलनों को कांग्रेस विरोधी माना गया और कहा गया कि ये राज्य सरकारों के नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व के खिलाफ़ चलाए गए हैं, जबकि इंदिरा गाँधी का मानना था कि ये आंदोलन उनके प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं।
प्र. 1977 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर: चुनाव के अंतिम नतीजों ने सबको चौंका दिया। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई। उसे मात्र 154 सीटें और 35 प्रतिशत से भी कम वोट मिले, जबकि जनता पार्टी और उसके साथी दलों को कुल 542 सीटों में से 330 सीटें मिलीं और खुद जनता पार्टी अकेले 295 सीटों पर जीतकर स्पष्ट बहुमत में आ गई। उत्तर भारत में चुनावी माहौल कांग्रेस के एकदम खिलाफ़ था: वह बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी और राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली। इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए। लेकिन कांग्रेस देश में हर जगह नहीं हारी थी। महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में उसने कई सीटों पर कब्ज़ा बरकरार रखा और दक्षिण भारत के राज्यों में उसकी चुनावी विजय का चक्का बेरोक-टोक चला। अध्याय इसके दो कारण बताता है। पहला, आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था; लोगों को ज़बरन उजाड़ने और विस्थापित करने अथवा ज़बरन नसबंदी करने का काम ज़्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था। दूसरा और अध्याय के अनुसार इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि उत्तर भारत में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति में दूरगामी बदलाव आए थे। उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और उसके कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर उससे जुड़ गए। इस अर्थ में 1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते, बल्कि इसके आगे की भी कुछ बातों का संकेत करते हैं।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक यह विवरण किस अखबार और किस तारीख का है?
उत्तर: यह ‘नई दुनिया’ अखबार का है और 27 जून, 1975 की तारीख का है।
(ख) 1 अंक संपादकीय की जगह खाली क्यों छोड़ी गई थी?
उत्तर: क्योंकि संपादकीय को आपातकालीन अधिकारों के अंतर्गत ‘सेंसर’ कर दिया गया था।
(ग) 2 अंक अखबार खाली जगह छोड़कर क्या जताना चाहते थे, और सरकार ने आगे चलकर क्या किया?
उत्तर: कई अखबारों में जगह-जगह रिक्त स्थान इसलिए छोड़े जाते थे ताकि आपातकाल के प्रति विरोध जताया जा सके। बाद में सरकार ने खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी।
(घ) 2 अंक इस घटना का संबंध आपातकाल के किस कदम से है? उस कदम को समझाइए।
उत्तर: इसका संबंध प्रेस सेंसरशिप से है। सरकार ने आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों पर अमल करते हुए प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी और समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है। इसी को प्रेस सेंसरशिप कहा जाता है। अध्याय बताता है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने भी खाली जगह छोड़कर इसका विरोध किया, जबकि ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाओं ने बंद होना मुनासिब समझा।
(क) 1 अंक अंश के अनुसार आपातकाल का पहला सबक क्या है?
उत्तर: पहला सबक यह है कि भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है।
(ख) 1 अंक बहुत-से पर्यवेक्षक आपातकाल के दौर के बारे में क्या मानते हैं?
उत्तर: वे मानते हैं कि आपातकाल के दौरान भारत लोकतांत्रिक नहीं रह गया था।
(ग) 2 अंक आपातकाल के बाद आपातकाल से जुड़े प्रावधानों में क्या सुधार किए गए?
उत्तर: अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी ज़रूरी है कि आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में दे।
(घ) 2 अंक अंश में जिन ‘कमजोरियों’ की बात है, उनमें से एक बताइए जिसे अध्याय पुलिस और प्रशासन के संदर्भ में दर्ज करता है।
उत्तर: अध्याय दर्ज करता है कि आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ और ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं। इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे, और यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।