NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। आख़िर में पाठ के बीच पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर भी दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
यह अध्याय 2022 में तर्कसंगत किया गया संस्करण है। प्रश्नावली को तब बदला नहीं गया, इसलिए कुछ प्रश्न ऐसी बातों पर हैं जो अब अध्याय के मूल पाठ में नहीं हैं। ये तीन जगहें हैं:
1. प्रश्न 1(ङ) सी.पी.आई. के रुख़ पर है, पर अध्याय के पूरे पाठ में सी.पी.आई. का नाम एक बार भी नहीं आता। 2. प्रश्न 2(ङ) और प्रश्न 5 शाह आयोग पर हैं, पर अध्याय में शाह कमीशन का ज़िक्र सिर्फ़ एक वाक्य में है: ‘शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे।’ आयोग की नियुक्ति और उसके निष्कर्षों का ब्योरा हटाए गए हिस्से में था।
इनके उत्तर नीचे पूरे दिए गए हैं, क्योंकि प्रश्नावली किताब की अपनी है और परीक्षा में पूछी जा सकती है। पर ध्यान रहे: इनका ब्योरा अध्याय के पन्नों में ढूँढ़ने पर नहीं मिलेगा, इसलिए इन्हें अलग से याद कर लेना ही सही तरीका है।
इस अध्याय की प्रश्नावली में दोनों संस्करणों की संख्या और विकल्प-क्रम एक जैसे हैं। प्रश्न 1 और प्रश्न 2 में पाँच-पाँच मदें हैं और वे हिंदी में (क) से (ङ) तथा अंग्रेज़ी में (a) से (e) तक उसी क्रम में छपी हैं, इसलिए इस बार उत्तर का अक्षर संस्करण बदलने से नहीं बदलता। प्रश्न 3 में बायाँ स्तंभ (क) से (घ) और दायाँ स्तंभ (i) से (iv) तक है, दोनों किताबों में एक ही क्रम में। नीचे के सभी उत्तर फिर भी हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।
एक और अंतर ध्यान रखने लायक है: अंग्रेज़ी संस्करण में आपातकाल के दौर का एक गुमनाम विज्ञापन (D. E. M. O’Cracy वाला) छपा है, जो हिंदी किताब में है ही नहीं। हिंदी किताब में सिर्फ़ ‘फ्री जेपी कैम्पेन’ वाला वह विज्ञापन है जो द टाइम्स (लंदन) में 15 अगस्त 1975 को छपा था।
1 आपातकाल के बारे में कथन सही हैं या ग़लत
प्र. बताएँ कि आपातकाल के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या ग़लत।
(क) आपातकाल की घोषणा 1975 में इंदिरा गाँधी ने की।
(ख) आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए।
(ग) बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र आपातकाल की घोषणा की गई थी।
(घ) आपातकाल के दौरान विपक्ष के अनेक नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया।
(ङ) सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया।
उत्तर:
(क) सही। आपातकाल 1975 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने लगाया। किताब का वाक्य है कि 25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की और राष्ट्रपति ने तुरंत यह उद्घोषणा कर दी। उत्तर में दोनों भूमिकाएँ साफ़ लिखिए: सिफारिश प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की थी और औपचारिक उद्घोषणा राष्ट्रपति की।
(ख) ग़लत। किताब कहती है कि आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए। संविधान का प्रावधान भी यह है कि सरकार चाहे तो किसी एक अथवा सभी मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा उनमें कटौती कर सकती है। इसलिए ‘सभी मौलिक अधिकार निष्क्रिय हो गए’ कहना ठीक नहीं है।
(ग) ग़लत। सरकार ने जो कारण बताया वह आर्थिक नहीं था। 25 जून 1975 को सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इसी तर्क के साथ उसने अनुच्छेद 352 लागू किया। आर्थिक बदहाली इस दौर की पृष्ठभूमि ज़रूर थी, पर घोषणा का घोषित कारण नहीं।
(घ) सही। किताब का वाक्य है कि तड़के सबेरे बड़े पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी हुई, और आगे यह भी कि अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
(ङ) सही। सी.पी.आई. ने उस समय आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया था। ध्यान दें: यह बात अध्याय के मौजूदा पाठ में कहीं नहीं है, यह हटाए गए हिस्से से आती है। परीक्षा के लिए इसे अलग से याद रखना होगा।
2 आपातकाल की घोषणा के संदर्भ से कौन मेल नहीं खाता
प्र. निम्नलिखित में से कौन-सा आपातकाल की घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाता है:
(क) ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान
(ख) 1974 की रेल-हड़ताल
(ग) नक्सलवादी आंदोलन
(घ) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला
(ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष
उत्तर: (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष।
क्यों: बाकी चारों बातें आपातकाल की घोषणा से पहले की हैं और उसकी पृष्ठभूमि बनाती हैं। ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान जयप्रकाश नारायण ने बिहार आंदोलन के दौरान किया, रेल हड़ताल मई 1974 में हुई, नक्सलवादी समूहों की सक्रियता इसी दौर की अशांति का हिस्सा थी और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला 12 जून 1975 को आया, जिसने सीधे संकट को जन्म दिया। इसके उलट शाह आयोग की रिपोर्ट आपातकाल के बाद की चीज़ है, इसलिए वह घोषणा के संदर्भ से मेल नहीं खाती।
ध्यान दें: शाह आयोग का ब्योरा अध्याय के मौजूदा पाठ में नहीं है। पाठ में सिर्फ़ इतना है कि शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। इससे भी यही निकलता है कि रिपोर्ट बाद में आई, यानी उत्तर वही रहता है।
3 मेल बैठाइए
प्र. निम्नलिखित में मेल बैठाएँ
बायाँ स्तंभ: (क) संपूर्ण क्रांति, (ख) गरीबी हटाओ, (ग) छात्र आंदोलन, (घ) रेल हड़ताल
दायाँ स्तंभ: (i) इंदिरा गाँधी, (ii) जयप्रकाश नारायण, (iii) बिहार आंदोलन, (iv) जॉर्ज फर्नांडिस
उत्तर: (क) से (ii), (ख) से (i), (ग) से (iii), (घ) से (iv)।
क्यों: ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान जयप्रकाश नारायण ने किया, इसलिए (क) का जोड़ा (ii) है। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने दिया था, यानी इंदिरा गाँधी के दौर का नारा, इसलिए (ख) का जोड़ा (i) है। छात्र-आंदोलन जिस राज्य में सबसे बड़ा राष्ट्रीय रूप ले गया वह बिहार था, जहाँ मार्च 1974 में छात्रों ने आंदोलन छेड़ा और जेपी को बुलावा भेजा, इसलिए (ग) का जोड़ा (iii) है। रेल हड़ताल का आह्वान राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में किया, इसलिए (घ) का जोड़ा (iv) है।
प्र. किन कारणों से 1980 में मध्यावधि चुनाव करवाने पड़े?
उत्तर: इसकी जड़ जनता पार्टी की सरकार की अस्थिरता में थी।
1. सरकार में तालमेल ही नहीं था। 1977 के चुनावों के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कोई खास तालमेल नहीं था। चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के पद के लिए मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच होड़ मची। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, लेकिन इससे पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान खत्म नहीं हुई।
2. पार्टी को जोड़ने वाली चीज़ सिर्फ़ आपातकाल का विरोध थी। किताब के शब्दों में आपातकाल का विरोध जनता पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका। आलोचकों ने कहा कि पार्टी के पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था।
3. नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। जनता पार्टी की सरकार कांग्रेस द्वारा अपनाई गई नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं ला सकी, इसलिए उसके पास दिखाने को अपना कुछ नहीं था।
4. बहुमत टूटा और दूसरी सरकार भी नहीं चली। जनता पार्टी बिखर गई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 28 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर चरण सिंह के नेतृत्व में दूसरी सरकार बनी, लेकिन बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया और चरण सिंह की सरकार मात्र 4 महीने तक सत्ता में रही।
इन्हीं वजहों से लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव हुए।
5 शाह आयोग: नियुक्ति और निष्कर्ष
प्र. जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था। इस आयोग की नियुक्ति क्यों की गई थी और इसके क्या निष्कर्ष थे?
पहले एक ज़रूरी बात: इस प्रश्न का ब्योरा अध्याय के मौजूदा पाठ में नहीं है। मौजूदा पाठ में शाह कमीशन सिर्फ़ एक वाक्य में आता है, जो नीचे ‘निष्कर्ष’ में दिया गया है। जो बातें मौजूदा पुस्तक में नहीं हैं, उन्हें नीचे केवल पृष्ठभूमि के रूप में चिह्नित किया गया है; उत्तर का आधार अध्याय का पाठ ही रखें।
नियुक्ति क्यों की गई: 1977 में चुनाव जीतकर आई जनता पार्टी की सरकार ने यह जाँच आयोग (पृष्ठभूमि: इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति जे.सी. शाह ने की) इसलिए बनाया ताकि 25 जून 1975 को घोषित आपातकाल के दौरान हुई ज़्यादतियों और अनियमितताओं की जाँच की जा सके। जनता पार्टी ने पूरा चुनाव ही शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज़्यादतियों के मुद्दे पर लड़ा था, इसलिए सत्ता में आते ही उन आरोपों की औपचारिक जाँच कराना उसका घोषित वादा था।
निष्कर्ष: पृष्ठभूमि: आयोग ने आपातकाल की उन ज़्यादतियों की जाँच की जिनका वर्णन अध्याय खुद करता है, जैसे निवारक नज़रबंदी में गिरफ़्तारियाँ और प्रेस सेंसरशिप; उसकी पूरी रिपोर्ट आपकी पुस्तक में नहीं है। जो निष्कर्ष अध्याय अपने पाठ में खुद दर्ज करता है वह यह है: आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ, ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं, इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया, और किताब के अपने शब्दों में ‘शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे।’ अध्याय यह भी जोड़ता है कि यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।
6 सरकार ने आपातकाल के क्या कारण बताए थे
प्र. 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करते हुए सरकार ने इसके क्या कारण बताए थे?
उत्तर:
1. देश में गड़बड़ी की आशंका। 25 जून 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया। इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रावधान यह है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है। यहाँ आधार अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका था।
2. गंभीर संकट की घड़ी। सरकार का निर्णय था कि गंभीर संकट की घड़ी आन पड़ी है और इस वजह से आपातकाल की घोषणा ज़रूरी हो गई है।
3. सरकारी कामकाज ठप्प होने का अंदेशा। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में विपक्षी दलों ने इंदिरा गाँधी के इस्तीफ़े के लिए दबाव डाला और 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विशाल प्रदर्शन किया। जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा करते हुए सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आह्वान किया कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें। किताब कहती है कि इससे सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ।
4. यह सरकार की शक्तियों के दायरे में था। किताब यह भी जोड़ती है कि तकनीकी रूप से देखें तो ऐसा करना सरकार की शक्तियों के दायरे में था, क्योंकि संविधान में सरकार को आपातकाल की स्थिति में विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
7 1977 में विपक्ष केंद्र में सत्ता में कैसे आया
प्र. 1977 के चुनावों के बाद पहली दफा केंद्र में विपक्षी दल की सरकार बनी। ऐसा किन कारणों से संभव हुआ?
उत्तर:
1. चुनाव आपातकाल पर जनमत-संग्रह बन गया। किताब कहती है कि 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों के बारे में जनमत-संग्रह थे, उत्तर भारत में तो खासतौर पर, क्योंकि यहाँ आपातकाल का असर सबसे ज़्यादा महसूस किया गया था। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा और जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध रहा।
2. विपक्ष एकजुट हो गया। आपातकाल लागू होने के पहले ही बड़ी विपक्षी पार्टियाँ एक-दूसरे के नज़दीक आ रही थीं। चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया और नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। कांग्रेस के कुछ नेता, जो आपातकाल के खिलाफ़ थे, इस पार्टी में शामिल हुए। कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई, जो बाद में जनता पार्टी में मिल गई।
3. गैर-कांग्रेसी वोट बिखरा नहीं। जनता पार्टी के गठन के कारण यह सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। किताब कहती है कि इस चीज़ ने 1977 के चुनावों में एक बड़ी भूमिका निभाई।
4. चुनाव-प्रचार का मुद्दा। जनता पार्टी ने प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज़्यादतियों पर ज़ोर दिया। हज़ारों लोगों की गिरफ़्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।
5. उत्तर भारत की राजनीति बदल चुकी थी। किताब इसे इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बताती है: उत्तर भारत में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति में दूरगामी बदलाव आ चुके थे। उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और उसके कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर उससे जुड़ गए।
नतीजा: आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई। उसे मात्र 154 सीटें और 35 प्रतिशत से भी कम वोट मिले, जबकि जनता पार्टी और उसके साथी दलों को 542 में से 330 सीटें और अकेले जनता पार्टी को 295 सीटें तथा स्पष्ट बहुमत मिला।
8 हमारी राजव्यवस्था के चार पक्षों पर आपातकाल का असर
प्र. हमारी राजव्यवस्था के निम्नलिखित पक्ष पर आपातकाल का क्या असर हुआ?
• नागरिक अधिकारों की दशा और नागरिकों पर इसका असर
• कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंध
• जनसंचार माध्यमों के कामकाज
• पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयाँ
उत्तर:
(अ) नागरिक अधिकारों की दशा। आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए, और उनके पास यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँ। सरकार ने निवारक नज़रबंदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया, जिसमें लोगों को इस आशंका से गिरफ़्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं। गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ता बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे, और सरकार का कहना था कि उन्हें गिरफ़्तारी का कारण बताना कतई ज़रूरी नहीं है। धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की भी अनुमति नहीं थी। इसका एक अच्छा नतीजा बाद में यह निकला कि आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा सचेत हुआ और आपातकाल के बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।
(ब) कार्यपालिका और न्यायपालिका के संबंध। इस दौर में दोनों के रिश्तों में गहरा तनाव आया। तीन संवैधानिक मसलों पर सर्वोच्च न्यायालय सरकार के खिलाफ़ गया, फिर केशवानंद भारती के मुकदमे में अदालत ने कहा कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती। 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया, और प्रधानमंत्री के नज़दीकी लोग ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की ज़रूरत की बात करने लगे। आपातकाल के दौरान संसद ने यह प्रावधान भी किया कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालयों के फ़ैसले को उलटकर सरकार की दलील मान ली, जिसे किताब सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक बताती है। आपातकाल की समाप्ति के बाद अदालतों ने नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई।
(स) जनसंचार माध्यमों का कामकाज। सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी और समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है, यानी प्रेस सेंसरशिप। 25 जून की आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ़्तर की बिजली काट दी गई थी। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने खाली जगह छोड़कर इसका विरोध किया, ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाओं ने बंद होना मुनासिब समझा, और सेंसरशिप को धत्ता बताते हुए गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर तथा लीफ़लेट्स निकले। बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई।
(द) पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयाँ। किताब का सीधा वाक्य है कि आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन पुलिस और प्रशासन के ज़रिए हुआ, ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं और इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। किताब यह भी कहती है कि यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।
9 दलीय प्रणाली पर आपातकाल का असर
प्र. भारत की दलीय प्रणाली पर आपातकाल का किस तरह असर हुआ? अपने उत्तर की पुष्टि उदाहरणों से करें।
उत्तर:
1. विपक्ष एक दल में बदल गया। चुनाव के ऐन पहले बड़ी विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। जगजीवन राम की ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ भी बाद में इसी में मिल गई। यह भारतीय दलीय प्रणाली में एक बड़ा बदलाव था।
2. केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई। उसे 154 सीटें, जनता पार्टी और साथी दलों को 542 में से 330 और अकेले जनता पार्टी को 295 सीटें मिलीं।
3. पर यह टिकाऊ नहीं निकला। जनता पार्टी बिखर गई, देसाई सरकार ने 28 माह में बहुमत खोया, चरण सिंह की सरकार 4 महीने चली और 1980 में कांग्रेस 353 सीटों के साथ लौट आई। इससे यह सबक मिला कि सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।
4. कांग्रेस का अपना स्वभाव बदल गया। 1969 से पहले कांग्रेस विविध विचारधाराओं के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी। अब उसने खुद को एक विशेष विचारधारा से जोड़ा और अपने को देश की एकमात्र समाजवादी तथा गरीबों की हिमायती पार्टी बताना शुरू किया। साथ ही वह एक नेता, यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर निर्भर हो गई।
5. ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति। कांग्रेस की प्रकृति में आए बदलावों के मद्देनजर अन्य विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े। विपक्ष के नेताओं को साफ़ दिखने लगा कि चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए।
6. पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभार। अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ। 1977 में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं और इनके बनने में पिछड़ी जाति के नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा और इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।
10 अवतरण आधारित प्रश्न: दो-दलीय प्रणाली
प्र. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें।
1977 के चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र, दो-दलीय व्यवस्था के जितना नज़दीक आ गया था उतना पहले कभी नहीं आया। बहरहाल अगले कुछ सालों में मामला पूरी तरह बदल गया। हारने के तुरंत बाद कांग्रेस दो टुकड़ों में बँट गई… जनता पार्टी में भी बड़ी अफरा-तफरी मची… ‘डेविड बटलर, अशोक लाहिड़ी और प्रणव रॉय, पार्था चटर्जी’
(क) किन वज़हों से 1977 में भारत की राजनीति दो-दलीय प्रणाली के समान जान पड़ रही थी?
क्योंकि मुक़ाबला व्यावहारिक रूप से दो ही पक्षों के बीच सिमट गया था: एक तरफ़ कांग्रेस और दूसरी तरफ़ जनता पार्टी। चुनाव के ऐन पहले बड़ी विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई और जगजीवन राम की ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ भी उसमें शामिल हो गई, जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। ऊपर से पूरा चुनाव एक ही मुद्दे, यानी आपातकाल पर जनमत-संग्रह बन गया, जिसमें मतदाता के सामने बस दो ही विकल्प थे। नतीजों ने भी यही रूप लिया: कांग्रेस को 154 और जनता पार्टी तथा साथी दलों को 330 सीटें मिलीं।
(ख) 1977 में दो से ज़्यादा पार्टियाँ अस्तित्व में थीं। इसके बावज़ूद लेखकगण इस दौर को दो-दलीय प्रणाली के नज़दीक क्यों बता रहे हैं?
क्योंकि दो-दलीय प्रणाली का अर्थ दलों की गिनती नहीं, चुनावी मुक़ाबले की शक्ल है। भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियाँ, जो पहले अलग-अलग थीं, चुनाव के ऐन पहले एकजुट हुईं और उन्होंने जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाकर जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। इसलिए ज़्यादातर चुनाव-क्षेत्रों में मतदाता के सामने असल में दो ही विकल्प थे: कांग्रेस, या जनता पार्टी और उसके साथी दल। गिनती में पार्टियाँ कई थीं, पर मुक़ाबला दो-दलीय था, और लेखकों का ध्यान इसी शक्ल पर है।
(ग) कांग्रेस और जनता पार्टी में किन कारणों से टूट पैदा हुई?
जनता पार्टी में टूट की वजह यह थी कि उसमें कोई खास तालमेल नहीं था। प्रधानमंत्री के पद के लिए मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच होड़ मची, और देसाई के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी सत्ता की खींचतान खत्म नहीं हुई। आपातकाल का विरोध पार्टी को कुछ ही दिनों के लिए एकजुट रख सका, और आलोचकों के अनुसार उसके पास किसी दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव था। नतीजा यह हुआ कि सरकार 28 माह में बहुमत खो बैठी।
कांग्रेस में टूट की पृष्ठभूमि यह थी कि 1969 के बाद से इस पार्टी का सबको समाहित करके चलने वाला स्वभाव बदलना शुरू हुआ था। पहले वह विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं को एक में समेटकर चलती थी, पर अब उसने अपने को एक विशेष विचारधारा से और एक ही नेता की लोकप्रियता से जोड़ लिया। ऐसी पार्टी में असहमति के लिए जगह घटती चली गई, और 1977 की हार के तुरंत बाद वह दो टुकड़ों में बँट गई।
11 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय प्रश्नावली के अलावा पाठ के बीच में भी सवाल पूछता है: हाशिये की टिप्पणियों में, 1974 की रेल हड़ताल वाले बक्से में और 1977 के चुनाव-नतीजों वाले नक्शे के पास। नीचे इनके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें ये किताब में आते हैं, किताब के अपने शब्दों में।
प्र. गरीब जनता पर सचमुच भारी मुसीबत आई होगी। आखिर गरीबी हटाओ के वादे का हुआ क्या?
उत्तर: इन सालों में यह वादा पूरा नहीं हो सका। किताब बताती है कि 1971-72 के बाद के सालों में भी देश की सामाजिक-आर्थिक दशा में खास सुधार नहीं हुआ: बांग्लादेश के संकट से अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा, लगभग 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार करके भारत आ गए, फिर पाकिस्तान से युद्ध हुआ और युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें कई गुना बढ़ीं; 1973 में चीज़ों की कीमतों में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ। औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी, ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ी, सरकार ने कर्मचारियों का वेतन रोक लिया, और 1972-73 में मानसून असफल रहने से खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। इस तीव्र मूल्यवृद्धि की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी, और इसी असंतोष के माहौल में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने जन-विरोध की अगुवाई की।
प्र. यदि रेलगाड़ियों का चलना बंद हो जाए तो क्या होगा? एक या दो दिन नहीं, बल्कि हफ़्ते भर से ज़्यादा समय तक रेलगाड़ियाँ न चलें तो?
उत्तर: बक्सा खुद बताता है: बहुत-से लोगों का आना-जाना दूभर हो जाएगा, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि देश की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी, क्योंकि रेलगाड़ियों के माध्यम से ही देश में एक जगह से दूसरी जगह सामानों की ज़्यादातर ढुलाई होती है। 1974 में ठीक ऐसा ही हुआ: रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में बोनस और सेवा-शर्तों की माँगों को लेकर राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया और मई 1974 में कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। सरकार ने हड़ताल को अवैधानिक करार दिया, कई नेताओं को गिरफ़्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना तैनात कर दी; 20 दिन के बाद हड़ताल बगैर किसी समझौते के वापस ले ली गई। इससे यह सवाल भी उठा कि आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी हड़ताल कर सकते हैं या नहीं।
प्र. क्या ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ और ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ का मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?
उत्तर: व्यवहार में इस विचार का यही अर्थ निकलने लगा था, और इसीलिए यह ख़तरनाक था। प्रधानमंत्री के नज़दीकी लोग ऐसी न्यायपालिका और नौकरशाही की बात करने लगे जो कार्यपालिका और विधायिका की सोच के प्रति ‘प्रतिबद्ध’ हो; उसी दौर में 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया, और जिन तीन न्यायाधीशों की अनदेखी हुई थी उन्होंने सरकार के रुख़ के खिलाफ़ फ़ैसले दिए थे। लोकतंत्र में न्यायाधीश की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए और उसे स्वतंत्र होकर फ़ैसला करना चाहिए; सरकारी अधिकारी को हर सरकार के लिए निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए। आपातकाल ने इस ‘प्रतिबद्धता’ की क़ीमत दिखा दी: पुलिस और प्रशासन शासक दल के राजनीतिक औज़ार बन गए और शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए।
प्र. यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?
उत्तर: यह चर्चा वाला प्रश्न है और किताब दोनों पहलू देती है। जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करने को कहा, और किताब बताती है कि इससे सरकारी कामकाज के ठप्प हो जाने का अंदेशा पैदा हुआ; सरकार ने आपातकाल का आधार भी अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका को बनाया। चुनी हुई सरकार के खिलाफ़ सेना से अवज्ञा की अपील आम तौर पर लोकतांत्रिक विरोध की सीमा से बाहर मानी जाती है, क्योंकि लोकतंत्र में सेना को नागरिक सरकार के अधीन रहना चाहिए। दूसरी ओर, जेपी का आह्वान केवल उन आदेशों तक था जिन्हें वे अनैतिक और अवैधानिक मानते थे, और यह अहिंसक सत्याग्रह का हिस्सा था। किताब का निष्कर्ष है कि इस दौर में संस्था आधारित लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्त जन-भागीदारी पर आधारित लोकतंत्र में तनाव नज़र आया, और वह पूछती है कि दोनों के बीच सधा हुआ संतुलन क्या हो और विरोध की सीमा क्या मानी जाए। (अपनी राय कारणों के साथ लिखिए।)
प्र. क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी? कितनी अजीब बात है!
उत्तर: नहीं। 25 जून 1975 की रात में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफ़ारिश की और राष्ट्रपति ने तुरंत उद्घोषणा कर दी; मंत्रिमंडल को इसकी सूचना 26 जून को सुबह छह बजे एक विशेष बैठक में दी गई, जब यह सब हो चुका था। इतना बड़ा फ़ैसला पूरे मंत्रिमंडल की सलाह से होना चाहिए, किसी एक व्यक्ति की सिफ़ारिश से नहीं। किताब बताती है कि यह कमी बाद में दूर कर दी गई: अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है, और राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल लिखित में देगा।
प्र. अरे! सर्वोच्च न्यायालय ने भी साथ छोड़ दिया! उन दिनों सबको क्या हो गया था?
उत्तर: अनेक उच्च न्यायालयों ने फ़ैसला दिया था कि आपातकाल के बावजूद अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर सकती है, लेकिन अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उनके फ़ैसले को उलटकर सरकार की दलील मान ली। इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है; किताब इसे सर्वोच्च न्यायालय के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक मानती है। उन दिनों माहौल डर और दबाव का था: मौलिक अधिकार निष्प्रभावी थे, निवारक नज़रबंदी के तहत बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ हो रही थीं, प्रेस पर सेंसरशिप थी और पुलिस-प्रशासन राजनीतिक दबाव में थे, इसलिए ज़्यादातर संस्थाओं और लोगों ने विरोध नहीं किया। इसी अनुभव के जवाब में आपातकाल के बाद अदालतों ने नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई।
प्र. जिन चंद लोगों ने प्रतिरोध किया, उनकी बात छोड़ दें, बाकियों के बारे में सोचें कि उन्होंने क्या किया! क्या कर रहे थे बड़े-बड़े अधिकारी, बुद्धिजीवी, सामाजिक-धार्मिक नेता और नागरिक?
उत्तर: किताब इसका उत्तर एक वाक्य में देती है: मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए। कुछ ने विरोध ज़रूर किया: राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिगत हुए, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ ने खाली जगह छोड़ी, ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ ने बंद होना मुनासिब समझा, और शिवराम कारंत तथा फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने अपनी पदवी लौटा दी। लेकिन ज़्यादातर अधिकारियों ने आदेशों का पालन किया और बाकी लोग निवारक नज़रबंदी के डर से, या इसलिए कि अदालतें भी उनकी रक्षा नहीं कर पा रही थीं, चुप रहे। किताब इससे यह सबक निकालती है कि आपातकाल से हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा सचेत हुआ और इसके बाद नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।
प्र. अगर उत्तर और दक्षिण के राज्यों में मतदाताओं ने इतने अलग ढर्रे पर मतदान किया, तो हम कैसे कहें कि 1977 के चुनावों का जनादेश क्या था?
उत्तर: जनादेश उत्तर में साफ़ था और दक्षिण में कहीं कमज़ोर, और किताब इसका कारण बताती है। 1977 के चुनाव आपातकाल के अनुभवों पर जनमत-संग्रह थे, खासतौर पर उत्तर भारत में, जहाँ आपातकाल का असर सबसे ज़्यादा महसूस किया गया; लोगों को ज़बरन उजाड़ने, विस्थापित करने और ज़बरन नसबंदी का काम ज़्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था, और वहाँ का मध्यवर्ग पहले ही कांग्रेस से दूर जाने लगा था। दक्षिण में, जहाँ असर कम था, कांग्रेस की विजय का चक्का बेरोक-टोक चला। इसलिए यह कहना ठीक होगा कि आपातकाल के विरुद्ध जनादेश वहाँ सबसे मज़बूत था जहाँ लोगों ने उसकी सबसे ज़्यादा मार झेली थी, और किताब के शब्दों में 1977 के चुनाव सिर्फ़ आपातकाल की कथा नहीं कहते।
प्र. इस मानचित्र में उन जगहों को चिह्नित करें, जहाँ कांग्रेस हारी; कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई; ऐसे राज्य जहाँ कांग्रेस और उसके साथी दलों को भारी विजय मिली।
उत्तर (किताब के पाठ के आधार पर):
- बुरी तरह पराजित: बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब, जहाँ कांग्रेस एक भी सीट न पा सकी; और राजस्थान तथा मध्य प्रदेश, जहाँ उसे महज एक-एक सीट मिली।
- हारी, पर कई सीटें बचाईं: महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा।
- साथी दलों के साथ भारी विजय: दक्षिण भारत के राज्य, यानी आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
प्रश्न 1: (क) सही, (ख) ग़लत, (ग) ग़लत, (घ) सही, (ङ) सही। प्रश्न 2: (ङ) शाह आयोग की रिपोर्ट के निष्कर्ष। प्रश्न 3: (क)-(ii), (ख)-(i), (ग)-(iii), (घ)-(iv)। प्रश्न 4: जनता पार्टी की खींचतान, 28 माह में बहुमत का जाना, चरण सिंह की 4 महीने की सरकार। प्रश्न 5: आपातकाल की ज़्यादतियों की जाँच; पुलिस और प्रशासन का राजनीतिक दबाव में आ जाना। प्रश्न 6: देश में गड़बड़ी की आशंका, अनुच्छेद 352। प्रश्न 7: आपातकाल पर जनमत-संग्रह, जनता पार्टी का गठन, गैर-कांग्रेसी वोट का न बिखरना। प्रश्न 8: चार पक्षों पर अलग-अलग असर। प्रश्न 9: विपक्ष का एकजुट होना, पहली गैर-कांग्रेसी सरकार, कांग्रेस का बदला स्वभाव, पिछड़े वर्गों की राजनीति। प्रश्न 10: मुक़ाबले की दो-दलीय शक्ल, और दोनों दलों की टूट के अलग-अलग कारण।