परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: आपातकाल की पृष्ठभूमि, गुजरात और बिहार के आंदोलन, 1974 की रेल हड़ताल, न्यायपालिका से संघर्ष और केशवानंद भारती, 12 जून से 26 जून 1975 तक की घटनाएँ, आपातकाल के परिणाम और सबक, 1977 तथा 1980 के चुनाव, जनता सरकार और विरासत। हर तारीख़, हर नाम, हर आँकड़ा और हर बक्से की बात एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
यह अध्याय 2022 में तर्कसंगत किया गया संस्करण है, पर प्रश्नावली नहीं बदली गई। इसलिए तीन जगहों पर प्रश्न ऐसी बातों पर हैं जो अब अध्याय के पाठ में नहीं मिलेंगी:
1. प्रश्न 1(ङ) सी.पी.आई. के रुख़ पर है, पर सी.पी.आई. का नाम पूरे अध्याय में एक बार भी नहीं आता। उत्तर ‘सही’ है: सी.पी.आई. ने आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया था। 2. प्रश्न 2(ङ) और प्रश्न 5 शाह आयोग पर हैं, पर पाठ में शाह कमीशन सिर्फ़ एक वाक्य में आता है (पुलिस और प्रशासन के राजनीतिक दबाव में आ जाने वाला)। आयोग की नियुक्ति और उसके निष्कर्षों का ब्योरा हटाए गए हिस्से में था। 3. आपातकाल की ‘ज़्यादतियों’ का ब्योरा भी हटा है; पाठ में सिर्फ़ इतना बचा है कि ज़बरन उजाड़ने, विस्थापित करने और ज़बरन नसबंदी का काम ज़्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था।
मतलब: इन तीन बातों को अलग से याद कर लीजिए। बाकी पूरा अध्याय पाठ से ही तैयार होता है।
1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द
आपातकाल: वह असाधारण स्थिति जिसमें सामान्य लोकतांत्रिक राजनीति के कामकाज नहीं किए जा सकते, इसलिए सरकार को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इसकी घोषणा के साथ ही शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और सारी शक्तियाँ केंद्र सरकार के हाथ में आ जाती हैं।
अनुच्छेद 352: संविधान का वह अनुच्छेद जिसके अंतर्गत प्रावधान है कि बाहरी अथवा अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है। 1975 में इसी को लागू किया गया।
प्रेस सेंसरशिप: आपातकाल में सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर रोक लगाकर समाचारपत्रों से कहा कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है। इसी को प्रेस सेंसरशिप कहा जाता है।
निवारक नज़रबंदी: वह प्रावधान जिसके अंतर्गत लोगों को इसलिए गिरफ़्तार नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है, बल्कि इस आशंका से गिरफ़्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका: वह याचिका जिसके सहारे गिरफ़्तार व्यक्ति अपनी गिरफ़्तारी को अदालत में चुनौती देता है। आपातकाल में गिरफ़्तार राजनीतिक कार्यकर्ता इसका सहारा भी नहीं ले सकते थे।
सम्पूर्ण क्रांति: जयप्रकाश नारायण का वह आह्वान जो उन्होंने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में किया, ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतंत्र’ की स्थापना की जा सके।
बुनियादी ढाँचा: केशवानंद भारती के मुकदमे (1973) में सर्वोच्च न्यायालय का यह फ़ैसला कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती।
‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका और नौकरशाही: प्रधानमंत्री के नज़दीकी लोगों की वह माँग कि न्यायपालिका तथा नौकरशाही ऐसी हो जो विधायिका और कार्यपालिका की सोच के अनुकूल आचरण करे।
आंशिक स्थगनादेश: 24 जून 1975 को सर्वोच्च न्यायालय का वह आदेश, जिसके अनुसार अपील की सुनवाई तक इंदिरा गाँधी सांसद बनी रहेंगी, लेकिन लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकतीं।
गैर-कांग्रेसवाद: कांग्रेस की प्रकृति में आए बदलावों के बाद विपक्षी दलों की वह राजनीति, जिसका मूल सूत्र यह था कि चुनावों में गैर-कांग्रेसी वोट बिखरने नहीं चाहिए।
2 तारीख़ें जिनका घालमेल नहीं होना चाहिए
| तारीख़ | किस चीज़ की |
|---|---|
| 1971 | चुनाव में कांग्रेस का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा; इंदिरा गाँधी के इसी निर्वाचन को बाद में चुनौती मिली |
| 1973 | कीमतों में 23 फीसदी का इज़ाफ़ा; केशवानंद भारती का फ़ैसला; ए.एन. रे की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति |
| 1974 | कीमतों में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा; डी.के. बरुआ का नारा |
| जनवरी 1974 | गुजरात में छात्र-आंदोलन की शुरुआत |
| मार्च 1974 | बिहार में छात्र-आंदोलन की शुरुआत |
| 16 अप्रैल 1974 | आर.के. लक्ष्मण का कार्टून, टाइम्स ऑफ इंडिया |
| मई 1974 | रेल हड़ताल; 20 दिन बाद बिना समझौते के वापस |
| 1975 | जेपी का जनता का ‘संसद-मार्च’, राजधानी की तब तक की सबसे बड़ी रैली |
| जून 1975 | गुजरात विधानसभा का चुनाव, जिसमें कांग्रेस हारी |
| 12 जून 1975 | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा) का फ़ैसला |
| 24 जून 1975 | सर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश |
| 25 जून 1975 | रामलीला मैदान का प्रदर्शन; अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा; रात में राष्ट्रपति की उद्घोषणा |
| 26 जून 1975, सुबह 6 बजे | मंत्रिमंडल को विशेष बैठक में सूचना |
| 26 जून 1975 | आर.के. लक्ष्मण का वह कार्टून जो घोषणा के चंद रोज़ पहले छपा था |
| 27 जून 1975 | ‘नई दुनिया’ का खाली संपादकीय |
| 15 अगस्त 1975 | द टाइम्स (लंदन) में ‘फ्री जेपी कैम्पेन’ का विज्ञापन |
| अप्रैल 1976 | सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ का बंदी प्रत्यक्षीकरण पर फ़ैसला |
| जनवरी 1977 | 18 महीने के आपातकाल के बाद चुनाव कराने का फ़ैसला और नेताओं की रिहाई |
| मार्च 1977 | लोकसभा चुनाव; कांग्रेस 154, जनता पार्टी और साथी 330, अकेले जनता पार्टी 295 |
| 29 मार्च 1977 | आम आदमी वाला आर.के. लक्ष्मण का कार्टून, टाइम्स ऑफ़ इंडिया |
| 13 नवंबर 1979 | जनता पार्टी की गुटबाजी पर आर.के. लक्ष्मण का कार्टून |
| जुलाई 1979 से जनवरी 1980 | चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री-काल |
| जनवरी 1980 | लोकसभा के लिए नए सिरे से चुनाव; कांग्रेस को 353 सीटें |
| 2005 | फ़िल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, निर्देशक सुधीर मिश्र |
3 आपातकाल की पृष्ठभूमि: राजनीतिक और आर्थिक
राजनीतिक: 1967 के बाद इंदिरा गाँधी एक कद्दावर नेता के रूप में उभरीं और उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। दलगत प्रतिस्पर्धा तीखी और ध्रुवीकृत हो चली थी। न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों में तनाव आया: सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरुद्ध माना। कांग्रेस का कहना था कि अदालत का यह रवैया लोकतंत्र के सिद्धांतों और संसद की सर्वोच्चता के विरुद्ध है, और अदालत एक यथास्थितिवादी संस्था है जो गरीबों को लाभ पहुँचाने वाले कल्याण-कार्यक्रमों की राह में रोड़े अटका रही है। विपक्षी दलों को लगता था कि सरकारी प्राधिकार को निजी प्राधिकार मानकर इस्तेमाल किया जा रहा है और राजनीति हद से ज़्यादा व्यक्तिगत होती जा रही है। कांग्रेस की टूट से मतभेद और गहरे हो गए थे।
| आर्थिक कारण | ब्योरा |
|---|---|
| बांग्लादेश का संकट | लगभग 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार करके भारत आए; अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ |
| पाकिस्तान से युद्ध | युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया |
| तेल की कीमतें | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कई गुना बढ़ोतरी, जिससे बाकी चीज़ों की कीमतें भी तेज़ी से बढ़ीं |
| मूल्यवृद्धि | 1973 में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी का इज़ाफ़ा |
| उद्योग और रोज़गार | औद्योगिक विकास की दर बहुत कम; बेरोज़गारी, खासकर ग्रामीण इलाकों में, बेतहाशा बढ़ी |
| वेतन | खर्चा घटाने के लिए सरकार ने कर्मचारियों का वेतन रोका, जिससे भारी असंतोष |
| मानसून | 1972-73 में मानसून असफल; खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम |
इस माहौल में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने कारगर तरीके से जन-विरोध की अगुवाई की। 1960 के दशक से ही उठ रहे छात्रों के विरोध के स्वर और प्रबल हुए। संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी बढ़ी; इन्होंने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाए और राज्यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ये मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी कहलाए और पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा सक्रिय थे, जहाँ राज्य सरकार ने इन्हें दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।
4 गुजरात और बिहार के आंदोलन
| गुजरात | बिहार | |
|---|---|---|
| कब | जनवरी 1974 | मार्च 1974 |
| किसके खिलाफ़ | खाद्यान्न, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमत, तथा उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार | बढ़ती कीमतें, खाद्यान्न का अभाव, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार |
| कौन जुड़ा | बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हुईं | जयप्रकाश नारायण को बुलावा; जीवन के हर क्षेत्र के लोग जुड़े |
| नतीजा | राष्ट्रपति शासन; मोरारजी देसाई की भूख-हड़ताल की चेतावनी; जून 1975 में चुनाव, कांग्रेस हारी | सरकार ने इस्तीफ़ा देने से इनकार किया; आंदोलन राष्ट्रीय बना |
जेपी की दो शर्तें: आंदोलन अहिंसक रहेगा और अपने को सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं रखेगा। इसी से छात्र-आंदोलन ने राजनीतिक चरित्र लिया और उसमें राष्ट्रव्यापी अपील आई। जेपी ने बिहार की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की माँग की और घेराव, बंद तथा हड़ताल का सिलसिला चला।
राष्ट्रीय स्तर पर: 1975 में जेपी ने जनता के ‘संसद-मार्च’ का नेतृत्व किया, जो राजधानी में तब तक की सबसे बड़ी रैली थी। उन्हें भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी का समर्थन मिला और इन दलों ने जेपी को इंदिरा गाँधी के विकल्प के रूप में पेश किया। जेपी के विचारों और उनकी जन-प्रतिरोध की रणनीति की आलोचनाएँ भी मुखर हुईं। दोनों आंदोलनों को कांग्रेस विरोधी माना गया, और इंदिरा गाँधी का मानना था कि ये आंदोलन उनके प्रति व्यक्तिगत विरोध से प्रेरित हैं।
किसने बुलाई: रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से संबंधित राष्ट्रीय समन्वय समिति, जॉर्ज फर्नान्डिस के नेतृत्व में। माँगें: बोनस और सेवा से जुड़ी शर्तें। कब: 1974 के मई महीने में; रेलवे भारत का सबसे बड़ा सार्वजनिक उद्यम है। सरकार की प्रतिक्रिया: हड़ताल को अवैधानिक करार दिया, माँगें मानने से इनकार किया, कई नेताओं को गिरफ़्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना तैनात कर दी। अंत: 20 दिन बाद बगैर किसी समझौते के वापस। जो बड़ा सवाल उठा: क्या आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपनी माँगों को लेकर हड़ताल कर सकते हैं?
5 न्यायपालिका से संघर्ष
| संवैधानिक मसला | सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ |
|---|---|
| क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? | संसद ऐसा नहीं कर सकती |
| क्या संसद संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? | सरकार संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए |
| संसद का यह संशोधन कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी की जा सकती है | अदालत ने इस प्रावधान को निरस्त कर दिया |
केशवानंद भारती (1973): संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती।
ए.एन. रे की नियुक्ति: केशवानंद भारती के फ़ैसले के तुरंत बाद मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हुआ। परिपाटी सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को नियुक्त करने की थी, पर 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया। यह इसलिए विवादास्पद बना क्योंकि उन तीनों ने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फ़ैसला दिया था। इसके बाद संविधान की व्याख्या और राजनीतिक विचारधाराओं का तेज़ी से घालमेल हुआ, और ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका तथा नौकरशाही की बात होने लगी। संघर्ष का चरमबिंदु तब आया जब एक उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।
6 12 जून से 26 जून 1975: घटनाओं का क्रम
| तारीख़ | क्या हुआ |
|---|---|
| 12 जून 1975 | न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गाँधी के लोकसभा निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया। याचिका समाजवादी नेता राजनारायण की थी, जो 1971 में उनके खिलाफ़ उम्मीदवार थे। आधार: चुनाव-प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का इस्तेमाल। अर्थ: कानूनन अब वे सांसद नहीं रहीं, और अगले छह महीने में दोबारा निर्वाचित न हों तो प्रधानमंत्री पद पर नहीं रह सकतीं। |
| 24 जून 1975 | सर्वोच्च न्यायालय का आंशिक स्थगनादेश: अपील की सुनवाई तक वे सांसद बनी रहेंगी, पर लोकसभा की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकतीं। |
| 25 जून 1975 | जेपी की अगुवाई में विपक्षी दलों का रामलीला मैदान, दिल्ली में विशाल प्रदर्शन। जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की और सेना, पुलिस तथा सरकारी कर्मचारियों से कहा कि वे सरकार के अनैतिक और अवैधानिक आदेशों का पालन न करें। सरकार ने इसी दिन कहा कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और अनुच्छेद 352 लागू कर दिया। |
| 25 जून 1975 की रात | प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से सिफारिश की; राष्ट्रपति ने तुरंत उद्घोषणा कर दी। आधी रात के बाद सभी बड़े अखबारों के दफ़्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी हुई। |
| 26 जून 1975, सुबह 6 बजे | एक विशेष बैठक में मंत्रिमंडल को सूचना दी गई, लेकिन तब तक बहुत कुछ हो चुका था। |
7 परिणाम
| क्षेत्र | क्या हुआ |
|---|---|
| विरोध | आंदोलन एकबारगी रुक गया; हड़तालों पर रोक; अनेक विपक्षी नेता जेल में; धरना, प्रदर्शन और हड़ताल की अनुमति नहीं |
| प्रेस | प्रेस सेंसरशिप: छापने से पहले अनुमति ज़रूरी |
| संगठन | सामाजिक और सांप्रदायिक गड़बड़ी की आशंका के मद्देनजर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध |
| मौलिक अधिकार | विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी; अदालत जाने का अधिकार भी नहीं |
| गिरफ़्तारी | निवारक नज़रबंदी अधिनियमों से बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ; बंदी प्रत्यक्षीकरण से चुनौती नहीं; सरकार का कहना कि गिरफ़्तारी का कारण बताना ज़रूरी नहीं |
| अदालत | अनेक उच्च न्यायालयों ने याचिकाएँ स्वीकार करने का फ़ैसला दिया, पर अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उन्हें उलटकर सरकार की दलील मान ली। आशय: सरकार आपातकाल में नागरिक से जीवन और आज़ादी का अधिकार वापस ले सकती है। इसे अदालत के सर्वाधिक विवादास्पद फ़ैसलों में एक माना गया। |
प्रतिरोध कैसा रहा: पहली लहर में गिरफ़्तारी से बचे कार्यकर्ता ‘भूमिगत’ हो गए और सरकार के खिलाफ़ मुहिम चलाई। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ ने रोके गए समाचारों की जगह खाली छोड़कर विरोध किया। ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ ने सेंसरशिप के आगे घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा। गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स निकले। पद्मभूषण से सम्मानित कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत और पद्मश्री से सम्मानित हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने लोकतंत्र के दमन के विरोध में अपनी-अपनी पदवी लौटा दी। पर किताब खुद जोड़ती है: मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।
संविधान में बदलाव: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले की पृष्ठभूमि में यह प्रावधान किया गया कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। आपातकाल के दौरान ही 42वाँ संशोधन पारित हुआ, जिसके एक बदलाव से विधायिका का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया, और यह स्थायी रूप से लागू होना था। साथ ही आपातकाल के दौरान चुनाव एक साल के लिए स्थगित किए जा सकते थे, यानी 1971 के बाद चुनाव 1976 के बदले 1978 में करवाए जा सकते थे।
8 आपातकाल के सबक
1. भारत से लोकतंत्र को विदा कर पाना बहुत कठिन है। बहुत-से पर्यवेक्षक मानते हैं कि आपातकाल में भारत लोकतांत्रिक नहीं रह गया था, फिर भी थोड़े ही दिनों में कामकाज लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट आया।
2. आपातकाल के प्रावधानों के अर्थगत उलझाव प्रकट हुए, जिन्हें बाद में सुधार लिया गया। अब ‘अंदरूनी’ आपातकाल सिर्फ़ ‘सशस्त्र विद्रोह’ की स्थिति में लगाया जा सकता है, और घोषणा की सलाह मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को लिखित में देता है।
3. हर कोई नागरिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा सचेत हुआ। आपातकाल के बाद अदालतों ने नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई और नागरिक अधिकारों के कई संगठन वजूद में आए।
जो सवाल खुले रह गए: लोकतांत्रिक सरकार के रोज़मर्रा के कामकाज और दलों तथा समूहों के निरंतर राजनीतिक विरोध के बीच तनाव बनता है। दोनों के बीच सधा हुआ संतुलन क्या हो? क्या नागरिकों को विरोध में शामिल होने की पूरी आज़ादी हो, या कोई अधिकार ही न हो? ऐसे विरोध की सीमा क्या मानी जाए?
पुलिस और प्रशासन: आपातकाल का वास्तविक क्रियान्वयन इन्हीं के ज़रिए हुआ। ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाईं और इन्हें शासक दल ने अपना राजनीतिक औज़ार बनाकर इस्तेमाल किया। शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव की चपेट में आ गए थे। यह समस्या आपातकाल के बाद भी खत्म नहीं हुई।
आपातकाल खत्म होते ही सबसे कीमती सबक राजव्यवस्था ने सीख लिया। 1977 के चुनाव एक तरह से आपातकाल के अनुभवों पर जनमत-संग्रह थे, उत्तर भारत में तो खासतौर पर। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा और जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध रहा। कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी यही स्थिति रही: जिन सरकारों को जनता ने लोकतंत्र-विरोधी माना, उन्हें मतदाता ने भारी दंड दिया। इस अर्थ में 1975-77 के अनुभवों की एक परिणति भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद को पुख्ता बनाने में हुई।
जनता पार्टी का गठन: आपातकाल लागू होने के पहले ही बड़ी विपक्षी पार्टियाँ नज़दीक आ रही थीं। चुनाव के ऐन पहले इन्होंने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। कांग्रेस के कुछ नेता, जो आपातकाल के खिलाफ़ थे, इसमें शामिल हुए। कुछ अन्य ने जगजीवन राम के नेतृत्व में ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई, जो बाद में जनता पार्टी में मिल गई। प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल की ज़्यादतियों पर ज़ोर रहा।
| 1977 का नतीजा | आँकड़ा |
|---|---|
| कांग्रेस की सीटें | 154; वोट 35 प्रतिशत से भी कम। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हारी |
| जनता पार्टी और साथी दल | कुल 542 सीटों में से 330 |
| अकेले जनता पार्टी | 295, यानी स्पष्ट बहुमत |
| जहाँ कांग्रेस को एक भी सीट नहीं | बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब |
| जहाँ एक-एक सीट | राजस्थान, मध्य प्रदेश |
| हारे हुए बड़े नाम | इंदिरा गाँधी रायबरेली से और संजय गाँधी अमेठी से |
| जहाँ कांग्रेस बची रही | महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा में कई सीटें; दक्षिण भारत में विजय का चक्का बेरोक-टोक चला |
दक्षिण और उत्तर का फ़र्क़ क्यों: पहला, आपातकाल का प्रभाव हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा; ज़बरन उजाड़ने, विस्थापित करने अथवा ज़बरन नसबंदी का काम ज़्यादातर उत्तर भारत के राज्यों में हुआ था। दूसरा और किताब के अनुसार इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण: उत्तर भारत में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की प्रकृति में दूरगामी बदलाव आ चुके थे। उत्तर भारत का मध्यवर्ग कांग्रेस से दूर जाने लगा था और उसके कई तबके जनता पार्टी को एक मंच के रूप में पाकर उससे जुड़ गए।
प्रधानमंत्री पद की होड़: मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम। देसाई 1966-67 से ही इंदिरा गाँधी के प्रतिद्वंद्वी थे; चरण सिंह भारतीय लोकदल के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के किसान नेता थे; जगजीवन राम को कांग्रेसी सरकारों में मंत्री पद का विशाल अनुभव था। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, पर खींचतान खत्म नहीं हुई।
आलोचना: दिशा, नेतृत्व अथवा एक साझे कार्यक्रम का अभाव; कांग्रेस की नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं।
अंत: जनता पार्टी बिखरी, देसाई सरकार ने 28 माह में बहुमत खोया; कांग्रेस के समर्थन पर चरण सिंह की सरकार बनी, कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया और वह 4 महीने चली। जनवरी 1980 के चुनाव में जनता पार्टी बुरी तरह परास्त हुई और उत्तर भारत में उसे करारी शिकस्त मिली, जबकि 1977 में यहीं उसे ज़बरदस्त सफलता मिली थी। कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं।
सबक: सरकार अगर अस्थिर हो और उसके भीतर कलह हो, तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।
10 विरासत
दलगत प्रणाली में बदलाव: 1977 और 1980 के चुनावों के बीच नाटकीय बदलाव आए। 1969 के बाद कांग्रेस का सबको समाहित करके चलने वाला स्वभाव बदलना शुरू हुआ। पहले वह विविध विचारधारात्मक गति-मति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक में समेटकर चलती थी; अब उसने खुद को एक विशेष विचारधारा से जोड़ा और अपने को देश की एकमात्र समाजवादी और गरीबों की हिमायती पार्टी बताना शुरू किया। 1970 के दशक से उसकी सफलता इस पर निर्भर हो गई कि वह गहरे सामाजिक और विचारधारात्मक विभाजन के आधार पर कितने लोग खींच पाती है, और साथ ही एक नेता, यानी इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता पर। जवाब में विपक्षी दल ‘गैर-कांग्रेसवाद’ की राजनीति की तरफ़ मुड़े।
पिछड़े वर्गों की राजनीति: अप्रत्यक्ष रूप से 1977 के बाद पिछड़े वर्गों की भलाई का मुद्दा भारतीय राजनीति पर हावी होना शुरू हुआ। 1977 के चुनाव-परिणामों पर पिछड़ी जातियों के मतदान का असर पड़ा था, खासकर उत्तर भारत में। लोकसभा के बाद 1977 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उत्तर भारत में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जिनमें पिछड़ी जाति के नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिहार में ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ के आरक्षण के सवाल पर बहुत शोर मचा और इसके बाद केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग नियुक्त किया।
आपातकाल और इसके आसपास की अवधि संवैधानिक संकट की अवधि भी थी: संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष आपातकाल के मूल में था। यह राजनीतिक संकट का भी दौर था: सत्ताधारी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था, फिर भी इसके नेतृत्व ने लोकतंत्र को ठप्प करने का फ़ैसला किया। संविधान के निर्माताओं को विश्वास था कि सभी दल लोकतांत्रिक मानकों का पालन करेंगे और आपातकाल में भी सरकार अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल विधि के शासन के दायरे में रहते हुए करेगी; इसी उम्मीद में उसे व्यापक और चहुँमुखी शक्तियाँ दी गई थीं, जिनका दुरुपयोग हुआ। किताब का अपना निष्कर्ष: यह राजनीतिक संकट तत्कालीन संवैधानिक संकट से कहीं ज़्यादा संगीन था।
इस दौर का एक और मसला था संसदीय लोकतंत्र में जन आंदोलन की भूमिका और उसकी सीमा। साफ़ दिखा कि संस्था आधारित लोकतंत्र और स्वतःस्फूर्त जन-भागीदारी पर आधारित लोकतंत्र में तनाव है। इसका एक कारण यह भी कहा जा सकता है कि हमारी दलीय प्रणाली जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम साबित नहीं हुई।
11 बक्से, कार्टून, नारे और तसवीरें
ये अक्सर छूट जाते हैं और परीक्षा में पूछ लिए जाते हैं। एक बार पढ़ लीजिए।
| क्या | ब्योरा |
|---|---|
| अध्याय का पहला बक्सा | 27 जून, 1975 के ‘नई दुनिया’ का संपादकीय बाकी दिनों की तरह मौजूद था, बस ‘संपादकीय’ की जगह खाली छोड़ दी गई थी, क्योंकि उसे आपातकालीन अधिकारों के अंतर्गत ‘सेंसर’ कर दिया गया था। कई अखबार विरोध जताने के लिए रिक्त स्थान छोड़ते थे; बाद में खाली जगह छोड़ने पर भी पाबंदी लगा दी गई। |
| कार्टून (साभार अबु) | ‘प्रधानमंत्री ने कहा: आगे के दिन मुश्किल’ के साथ पंक्ति: ‘अच्छा तो यही होता कि 1973 का यह साल जितनी जल्दी हो सके, बीत जाता।’ |
| नारा | ‘इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’, कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ ने 1974 में दिया |
| नारा | ‘सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है!’, 1974 के बिहार आंदोलन का एक नारा |
| कार्टून, 16 अप्रैल 1974 | आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया: ‘देखो! वह लोकतंत्र को पलीता लगाना चाहता है, अराजकता फैलाना चाहता है और सत्ता हासिल…’ |
| कार्टून, 26 जून 1975 | आर.के. लक्ष्मण, द टाइम्स ऑफ इंडिया। यह घोषणा के चंद रोज़ पहले छपा था; कुर्सी को पीछे से सहारा देता हाथ कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. बरुआ का है। |
| विज्ञापन, 15 अगस्त 1975 | द टाइम्स (लंदन) में ‘फ्री जेपी कैम्पेन’ का: ‘आज भारत की आज़ादी का दिन है… भारत के लोकतंत्र का दीपक बुझने न पाए।’ |
| कार्टून, 29 मार्च 1977 | आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ़ इंडिया: ‘रे बाबा! इस आम आदमी से बच के रहना…’। आम आदमी के साथ खड़े दिखाए गए हैं जगजीवन राम, मोरारजी देसाई, चरण सिंह और अटलबिहारी वाजपेयी। |
| तसवीर | 1977 में बनी गैर-कांग्रेसी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह: जयप्रकाश नारायण, जे. बी. कृपलानी, मोरारजी देसाई और अटलबिहारी वाजपेयी बैठे नज़र आते हैं। |
| कार्टून, 1980 के बाद | ‘मैदान साफ!’ (आर.के. लक्ष्मण)। जनता पार्टी की गुटबाजी पर बने कार्टूनों में अतनु राय / इंडिया टुडे का भी है। |
| हाशिये के सवाल | ‘क्या ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ और ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ का मतलब यह है कि न्यायाधीश और सरकारी अधिकारी शासक दल के प्रति निष्ठावान हों?’ · ‘यह तो सेना से सरकार के खिलाफ़ बगावत करने को कहने जैसा जान पड़ता है! क्या यह बात लोकतांत्रिक है?’ · ‘क्या राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश के बगैर आपातकाल की घोषणा करनी चाहिए थी?’ · ‘अरे! सर्वोच्च न्यायालय ने भी साथ छोड़ दिया!’ · ‘मैं समझ गया! आपातकाल एक तरह से तानाशाही निरोधक टीका था।’ |
लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी), 1902-1979: युवावस्था में मार्क्सवादी; कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव; 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन के नायक; नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में देखे गए; नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार; 1955 के बाद सक्रिय राजनीति छोड़ी; गाँधीवादी बनने के बाद भूदान आंदोलन में सक्रिय; नगा विद्रोहियों से सुलह की बातचीत की; कश्मीर में शांति प्रयास किए; चंबल के डकैतों से आत्मसमर्पण कराया; बिहार आंदोलन के नेता; आपातकाल के विरोध के प्रतीक बने; जनता पार्टी के गठन के प्रेरणास्रोत।
मोरारजी देसाई, 1896-1995: स्वतंत्रता सेनानी, गाँधीवादी नेता; खादी, प्राकृतिक चिकित्सा और निग्रह के प्रतिपादक; बॉम्बे प्रांत के मुख्यमंत्री; 1967-1969 के बीच उप-प्रधानमंत्री; पार्टी में टूट के बाद कांग्रेस (ओ) में शामिल; 1977-1979 तक एक गैर-कांग्रेसी दल की तरफ़ से प्रधानमंत्री रहे।
चौधरी चरण सिंह, 1902-1987: जुलाई 1979 से जनवरी 1980 के बीच भारत के प्रधानमंत्री; स्वतंत्रता सेनानी; उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय; ग्रामीण एवं कृषि विकास के समर्थक; कांग्रेस छोड़ी और 1967 में भारतीय क्रांति दल का गठन; उत्तर प्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री; 1977 में जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक; उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री (1977-79); लोकदल के संस्थापक।
जगजीवन राम, 1908-1986: स्वतंत्रता सेनानी एवं बिहार के कांग्रेसी नेता; 1977-79 के बीच भारत के उप-प्रधानमंत्री; संविधान सभा के सदस्य; 1952 से मृत्युपर्यंत सांसद; स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री; 1952 से 1977 के बीच अनेक मंत्रालयों की जिम्मेदारी; विद्वान और कुशल प्रशासक।
वर्ष: 2005 · निर्देशक: सुधीर मिश्र · पटकथा: रुचि नारायण, शिव कुमार, सुब्रह्मण्यम · अभिनय: के.के. मेनन, शाइनी आहूजा, चित्रांगदा सिंह। सिद्धार्थ, विक्रम और गीता मेधावी और सामाजिक सरोकार वाले छात्र हैं, जो दिल्ली में पढ़ाई पूरी करने के बाद अलग-अलग राह पर निकल पड़ते हैं। सिद्धार्थ सामाजिक बदलाव के लिए क्रांतिकारी विचारधारा का हिमायती है; विक्रम की दलील ज़िंदगी में कामयाबी हासिल करने की है, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े। फ़िल्म की पृष्ठभूमि सत्तर के दशक की है और इसके युवा चरित्र उस दौर की अपेक्षाओं तथा आदर्शवाद की उपज हैं। सिद्धार्थ क्रांति के अपने मकसद में सफल नहीं होता, पर गरीबों की हालत में थोड़ी बेहतरी ला पाना भी उसे अच्छा लगने लगता है; विक्रम एक आमफहम राजनीतिक तिकड़मबाज बन जाता है, पर अपने इस काम को लेकर उसका मन कचोटता रहता है।
12 CBSE 2026-27 संदर्भ सामग्री (मूल्यांकन नहीं)
CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 ने इस अध्याय में चार उप-विषय अतिरिक्त संदर्भ सामग्री के रूप में जोड़े हैं। पाठ्यक्रम के परिशिष्ट के अनुसार यह सामग्री कक्षा में पढ़ाने-समझाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा। यह NCERT पुस्तक में नहीं है।
| उप-विषय | मुख्य बातें |
|---|---|
| जयप्रकाश नारायण | तीन योगदान: भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष (युवाओं की भागीदारी, विशेषकर गुजरात और बिहार में; लोकपाल पद), सामुदायिक समाजवाद (समुदाय, क्षेत्र और राष्ट्र, तीन परतें, मिलकर सच्चा संघ) और संपूर्ण क्रांति (नैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और पारिस्थितिक परिवर्तन)। राजनीतिक परिवर्तन में प्रत्याह्वान का अधिकार (राइट टू रिकॉल), ग्राम/मोहल्ला समितियाँ और स्वच्छ राजनीति के लिए ‘ऊपर के लोगों’ का आह्वान। परिवर्तन का वाहक ‘मनुष्य’। |
| राम मनोहर लोहिया और समाजवाद | लोकतांत्रिक समाजवाद: पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों भारत के लिए अप्रासंगिक; आर्थिक उद्देश्य (भोजन, आवास) और गैर-आर्थिक उद्देश्य (लोकतंत्र, स्वतंत्रता)। चौबुर्जा राजनीति: चार जुड़े स्तंभ, केंद्र, क्षेत्र, ज़िला, गाँव। सकारात्मक कार्रवाई महिलाओं और गैर-धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भी। ‘समाजवाद की पार्टी’ के प्रतीक: फावड़ा (परिश्रम), वोट (मतदान की शक्ति), जेल (त्याग)। |
| दीनदयाल उपाध्याय और एकात्म मानववाद | स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल, जिसके केंद्र में मनुष्य। तीन सिद्धांत: अंश नहीं, संपूर्ण की प्रधानता; धर्म की सर्वोच्चता; समाज की स्वायत्तता। पूँजीवादी व्यक्तिवाद और मार्क्सवादी समाजवाद, दोनों को भौतिकवादी मानकर नकारा; चिति पर आधारित वर्गहीन, जातिहीन, संघर्ष-मुक्त समाज। लोकतंत्र का भारतीयकरण; आर्थिक लोकतंत्र की नींव विकेंद्रीकरण और स्वदेशी; अर्थायाम: अर्थ का अभाव और अति, दोनों धर्म का ह्रास करते हैं। |
| लोकतांत्रिक उभार | लोकतांत्रिक राजनीति में जनता की बढ़ती भागीदारी। पहला (1950-1970 के दशक): केंद्र और राज्यों में वयस्क मतदाताओं की भागीदारी, इस पश्चिमी धारणा का खंडन कि लोकतंत्र के लिए पहले आधुनिकीकरण ज़रूरी है। दूसरा (1980 का दशक): अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की भागीदारी। तीसरा (1990 के दशक की शुरुआत से, उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण): प्रतिस्पर्धी चुनावी बाज़ार; तीन बदलाव, राज्य से बाज़ार, सरकार से शासन, नियंत्रक राज्य से सुविधा-प्रदाता राज्य; युवा निर्णायक। |
1. आपातकाल: 25 जून 1975, अनुच्छेद 352, आधार अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका, उद्घोषणा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की। 2. इलाहाबाद उच्च न्यायालय: 12 जून 1975, न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा, याचिकाकर्ता राजनारायण। 3. केशवानंद भारती 1973: बुनियादी ढाँचा। 4. रेल हड़ताल: मई 1974, जॉर्ज फर्नान्डिस, 20 दिन। 5. दो आंदोलन: गुजरात जनवरी 1974, बिहार मार्च 1974, जेपी की दो शर्तें, ‘सम्पूर्ण क्रांति’। 6. परिणाम: प्रेस सेंसरशिप, आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध, निवारक नज़रबंदी, अप्रैल 1976 का फ़ैसला, 42वाँ संशोधन (5 से 6 साल)। 7. तीन सबक, जिनमें ‘सशस्त्र विद्रोह’ और लिखित सलाह सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं। 8. 1977: 154 / 330 / 542 / 295, ‘लोकतंत्र बचाओ’, पाँच राज्यों में शून्य, रायबरेली और अमेठी। 9. जनता सरकार: 28 माह, 4 महीने, जनवरी 1980, कांग्रेस 353, और विरासत में मंडल आयोग तथा ‘गैर-कांग्रेसवाद’।