कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 8 भारतीय राजनीति: नए बदलाव महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. राजनीति विज्ञानी जिसे ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहते हैं, उसकी समाप्ति अध्याय के अनुसार किस चुनाव से हुई?

उत्तर: 1989 के चुनाव से। कांग्रेस इसके बाद भी एक महत्त्वपूर्ण पार्टी बनी रही, पर दलीय प्रणाली के भीतर उसे पहले जैसी प्रमुखता अब नहीं मिली।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. मंडल आयोग का आधिकारिक नाम क्या था और उसे ‘मंडल कमीशन’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: आधिकारिक रूप से इसे ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’ कहा गया, क्योंकि आज़ादी के बाद यह दूसरा अवसर था जब सरकार ने ऐसा आयोग नियुक्त किया। आमतौर पर इसे इसके अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर ‘मंडल कमीशन’ कहा जाता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘बामसेफ’ का पूरा नाम क्या है और इसका गठन कब हुआ?

उत्तर: बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन। इसका गठन 1978 में हुआ।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार हिन्दुत्व का मूल आशय क्या था?

उत्तर: यह कि एक भारतीय होने के लिए आवश्यक है कि वह भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे। इसे विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया था।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. अयोध्या विवाद का समाधान किस तारीख को, किस पीठ के किस अनुपात वाले निर्णय से हुआ?

उत्तर: 9 नवम्बर 2019 को, उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. 2014 में भाजपा ने अपने दम पर कितनी सीटें जीतीं और यह क्यों उल्लेखनीय था?

उत्तर: 282 सीटें। यह इसलिए उल्लेखनीय था क्योंकि भाजपा 30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत हासिल करने वाली पहली पार्टी बन गई। इसके बावजूद उसने अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ राजग सरकार बनाने का विकल्प चुना।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. राजीव गाँधी की हत्या कब, कहाँ और किनके द्वारा हुई?

उत्तर: मई 1991 में। वे चुनाव अभियान के सिलसिले में तमिलनाडु के दौरे पर थे, तभी लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों ने उनकी हत्या कर दी।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. 17वीं लोकसभा के आँकड़ों में भारतीय जनता पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस के पास कितनी-कितनी सीटें थीं?

उत्तर: भारतीय जनता पार्टी के पास 303 और इंडियन नेशनल कांग्रेस के पास 52 सीटें।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. अध्याय 1980 के दशक के आखिर के जिन पाँच बड़े बदलावों को गिनाता है, उन्हें लिखिए।

उत्तर: 1. 1989 के चुनावों में कांग्रेस की हार। 2. राष्ट्रीय राजनीति में ‘मंडल मुद्दे’ का उदय। 3. आर्थिक नीतियों का बुनियादी तौर पर बदल जाना, यानी ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम या नए आर्थिक सुधार। 4. अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के विधिक एवं राजनीतिक विवाद का भारत की राजनीति को प्रभावित करना। 5. मई 1991 में राजीव गाँधी की हत्या और उसके परिणामस्वरूप कांग्रेस के नेतृत्व में परिवर्तन।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. 1989 में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद विपक्ष में क्यों बैठी, और सरकार कैसे बनी?

उत्तर: कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी, पर उसे बहुमत नहीं मिला था, इसलिए उसने विपक्ष में बैठने का फ़ैसला किया। सरकार राष्ट्रीय मोर्चा ने बनायी, जो जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बना था। इसे परस्पर विरुद्ध दो राजनीतिक समूहों, भाजपा और वाम मोर्चे, ने बाहर से समर्थन दिया, पर इनमें से किसी ने सरकार में शिरकत नहीं की।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. ‘मंडल मुद्दा’ किसे कहा जाता है?

उत्तर: 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नयी सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू किया, जिनके अंतर्गत केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। इस फ़ैसले से देश के विभिन्न भागों में मंडल-विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए। अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के समर्थकों और विरोधियों के बीच चले इसी विवाद को ‘मंडल मुद्दा’ कहा जाता है, और इसने 1989 के बाद की राजनीति में अहम भूमिका निभाई।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ से क्या आशय है? यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से कैसे अलग है?

उत्तर: ‘ओबीसी’ यानी ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ अथवा ‘अदर बैकवर्ड क्लासेज़्’ विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि है। यह अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति से अलग एक कोटि है, जिसमें शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना की जाती है। इन समुदायों को ‘पिछड़ा वर्ग’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. मंडल आयोग की दो प्रमुख सिफ़ारिशें लिखिए।

उत्तर: 1. आयोग का मशविरा था कि पिछड़ा वर्ग को पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए, क्योंकि अनुसूचित जातियों से इतर ऐसी अनेक जातियाँ हैं जिन्हें वर्ण व्यवस्था में ‘नीच’ समझा जाता है। 2. इन समूहों के लिए शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित की जाएँ। आयोग ने और भी समाधान सुझाए, जिनमें भूमि-सुधार भी एक था।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. बामसेफ किस तरह का संगठन था और उसने ‘बहुजन’ से क्या आशय लिया?

उत्तर: बामसेफ सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण ट्रेड यूनियन नहीं था। इस संगठन ने ‘बहुजन’ यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त तरफ़दारी की। इसी का परवर्ती विकास ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ है, जिससे बाद के समय में बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. शाहबानो वाद क्या था और उसके बाद सरकार ने क्या किया?

उत्तर: 1985 के इस प्रकरण में एक 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता के लिए वाद किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया। पुरातन पंथी मुसलमानों ने इस निर्णय को ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना। कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. 1989 और 1996 के राजनीतिक समीकरणों में क्या उलटफेर हुआ? अध्याय के आधार पर बताइए।

उत्तर: 1989 में भाजपा और वाम मोर्चा, दोनों ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार को समर्थन दिया था, क्योंकि दोनों कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना चाहते थे। 1996 में वाम मोर्चा ने गैर-कांग्रेसी सरकार को समर्थन जारी रखा, पर इस बार संयुक्त मोर्चा की सरकार को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया और भाजपा ने नहीं, क्योंकि अब कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहते थे। अध्याय के शब्दों में इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. अध्याय के ‘क्या आप जानते हैं?’ बॉक्स में 28 नवंबर 1858 की कौन-सी घटना दी गई है?

उत्तर: बॉक्स के अनुसार 28 नवंबर 1858 की एक बहुत ही रोचक घटना है, जब निहंग सिखों ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा बलपूर्वक निकाले जाने से पहले, जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण कर लिया तथा पूजन और हवन किया।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. 1989 के बाद शुरू हुए गठबंधन की राजनीति के दौर की मुख्य विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: 1. कोई एक पार्टी बहुमत तक नहीं पहुँचती। अध्याय के अनुसार 1989 के बाद कई पार्टियाँ इस तरह उभरीं कि किसी एक-दो पार्टी को ही अधिकांश वोट या सीट नहीं मिल पाते थे, और 2014 तक किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला।
2. केंद्र में 11 सरकारें। ये सभी या तो गठबंधन की सरकारें थीं अथवा दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें थीं, जिनमें वे दल शामिल नहीं हुए।
3. क्षेत्रीय पार्टियों की निर्णायक भूमिका। इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी। यह बात 1989 की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, 1996 और 1997 की संयुक्त मोर्चा सरकार, 1998 और 1999 की राजग तथा 2004 और 2009 की संप्रग सरकार पर समान रूप से लागू होती है।
4. बदलती हुई प्रवृत्ति। अध्याय जोड़ता है कि 2014 में यह प्रवृत्ति बदल गई, जब भाजपा को अकेले बहुमत मिला, पर पूर्ण बहुमत के बावजूद गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. मंडल आयोग की पृष्ठभूमि, गठन और काम का वर्णन कीजिए।

उत्तर: 1. पृष्ठभूमि। दक्षिण के राज्यों में कम-से-कम 1960 के दशक से अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान चला आ रहा था, पर यह नीति उत्तर भारत के राज्यों में लागू नहीं थी। 1977-79 की जनता पार्टी की सरकार के समय उत्तर भारत में पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूती से आवाज़ उठाई गई। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इस दिशा में अग्रणी थे और उनकी सरकार ने बिहार में ‘ओबीसी’ को आरक्षण देने की नयी नीति लागू की।
2. गठन। इसके बाद केंद्र सरकार ने 1978 में एक आयोग बैठाया, जिसके जिम्मे पिछड़ा वर्ग की स्थिति सुधारने के उपाय बताने का काम सौंपा गया। आज़ादी के बाद यह दूसरा ऐसा आयोग था, इसलिए आधिकारिक रूप से इसे ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’ कहा गया। अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर यह ‘मंडल कमीशन’ कहलाया।
3. काम। आयोग का काम था भारतीय समाज के विभिन्न तबकों के बीच शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना, इन पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताना और उनका पिछड़ापन दूर करने के उपाय सुझाना।
4. सिफ़ारिशें। आयोग ने 1980 में अपनी सिफ़ारिशें पेश कीं, जब तक जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी। उसने कहा कि पिछड़ा वर्ग को पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए, शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत सीट आरक्षित की जाएँ, और भूमि-सुधार जैसे और भी समाधान अपनाए जाएँ।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. 1990 में मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू होने के बाद क्या हुआ? इंदिरा साहनी केस सहित बताइए।

उत्तर: 1. फ़ैसला। 1990 के अगस्त में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों में से एक को लागू करने का फ़ैसला किया। यह सिफ़ारिश केंद्रीय सरकार और उसके उपक्रमों की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के संबंध में थी।
2. विरोध। सरकार के इस फ़ैसले से उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध का स्वर उमड़ा।
3. अदालत में चुनौती। इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गई और यह प्रकरण ‘इंदिरा साहनी केस’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सरकार के फ़ैसले के खिलाफ़ अर्जी दायर करने वालों में एक नाम इंदिरा साहनी का भी था।
4. निर्णय और उसके बाद। 1992 के नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय को सही ठहराते हुए अपना फ़ैसला सुनाया। राजनीतिक दलों में इस फ़ैसले के क्रियान्वयन के तरीके को लेकर कुछ मतभेद ज़रूर था, पर अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मसले पर देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों में सहमति थी।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. बामसेफ से बहुजन समाज पार्टी तक, दलित राजनीति के उभार का वर्णन कीजिए।

उत्तर: 1. शुरुआत। 1980 के दशक में दलित जातियों के राजनीतिक संगठनों का भी उभार हुआ। 1978 में ‘बामसेफ’ यानी बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन का गठन हुआ। यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण ट्रेड यूनियन नहीं था; इसने ‘बहुजन’ की, यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त तरफ़दारी की।
2. आगे का विकास। इसी का परवर्ती विकास ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ है, जिससे बाद के समय में बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ। इस पार्टी की अगुआई कांशीराम ने की।
3. चुनावी सफलता। बसपा शुरुआती दौर में एक छोटी पार्टी थी और इसे पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं का समर्थन हासिल था। 1989 और 1991 के चुनावों में इसे उत्तर प्रदेश में सफलता मिली। आज़ाद भारत में यह पहला मौका था जब कोई राजनीतिक दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता हासिल कर पाया।
4. आधार और आगे का रास्ता। कांशीराम के नेतृत्व में बसपा ने अपने संगठन की बुनियाद व्यवहार केंद्रित नीतियों पर रखी थी, और उसके आत्मविश्वास को इस तथ्य से बल मिला कि बहुजन देश की आबादी में सबसे ज़्यादा हैं। इसके बाद बसपा राज्य में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनी और एक से ज़्यादा दफ़े वहाँ सरकार बनायी। अब इसने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपना जनाधार बढ़ाना भी शुरू किया है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास-क्रम का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: 1. जनसंघ से भाजपा तक। आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी के साथ विलय हो गया था। जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद पूर्ववर्ती जनसंघ के समर्थकों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनाई।
2. शुरुआती पटल। आरंभ में भाजपा ने जनसंघ की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक पटल अपनाया और गांधीवादी समाजवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी विचारधारा के रूप में अपनाया। किंतु 1984 के चुनावों में उसे बहुत सफलता नहीं मिली।
3. विचारधारा में मोड़। 1986 के बाद इस दल ने राष्ट्रवाद पर अपनी विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल देना प्रारम्भ किया और राजनीतिक लामबन्दी के लिए हिन्दुत्व की राजनीति को भी अपनाया। 1986 की दो घटनाएँ, शाहबानो वाद से जुड़ा प्रकरण और अयोध्या विषय, इसकी राजनीति का केन्द्र बिंदु बन गईं।
4. चुनावी चढ़ाई। भाजपा ने 1991 तथा 1996 के चुनावों में अपनी स्थिति लगातार मज़बूत की और 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, हालाँकि तब बहुमत नहीं जुटा सकी। आखिरकार वह राजग के अगुआ के रूप में 1998 के मई से 1999 के जून तक और फिर 1999 के अक्तूबर से सत्ता में आयी, और 1999 की राजग सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया। आगे चलकर 2014 में उसे अपने दम पर 282 और 2019 में 303 सीटें मिलीं।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. अध्याय में दिए गए अयोध्या विषय के कालक्रम को लिखिए।

उत्तर: 1. 1528 और उसके बाद। अध्याय के अनुसार अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थान की महत्ता इस तथ्य से परखी जा सकती है कि 1528 से प्रारम्भ होकर 500 वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में अनेक संघर्ष लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित हैं। 1528 में श्री राम के जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित किया गया, परन्तु ढाँचे के आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू प्रतीकों तथा अवशेषों को प्रत्यक्ष देखा जा सकता था।
2. 28 नवंबर 1858। ‘क्या आप जानते हैं?’ बॉक्स के अनुसार इस दिन निहंग सिखों ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा बलपूर्वक निकाले जाने से पहले जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण कर लिया तथा पूजन और हवन किया।
3. 1949 और 1986। कालान्तर में यह विषय एक लम्बे विधिक विवाद में परिणत हो गया, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने के कारण 1949 में ढाँचे को सील कर दिया गया। 1986 में फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के एक निर्णय से एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जिसमें ढाँचे का ताला खोल दिया गया और लोगों को वहाँ पूजा की अनुमति दे दी गई। मन्दिर का शिलान्यास हुआ, किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा।
4. 1992 और 2019। तनाव बढ़ता गया और अनगिनत विवाद तथा विधिक संघर्ष हुए। 1992 में ढाँचे के ध्वंस के बाद कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है। अन्ततः 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से विवाद का समाधान हुआ।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. 2004 से 2019 तक के लोकसभा चुनावों और सरकारों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

उत्तर: 1. 2004। कांग्रेस भी पूरे ज़ोर के साथ गठबंधन में शामिल हुई। राजग की हार हुई और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, जिसका नेतृत्व कांग्रेस ने किया और जिसे वाम मोर्चा ने समर्थन दिया। 1991 के बाद पहली बार इस दफ़ा पार्टी की सीटों की संख्या बढ़ी, हालाँकि राजग और संप्रग को मिले कुल वोटों का अंतर बहुत कम था।
2. 2008 और 2009। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर जुलाई 2008 में वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया, फिर भी संप्रग सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। 2009 में 15वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए, कांग्रेस की सीटें 2004 की 145 से बढ़कर 2009 में 206 हो गईं और डॉ. मनमोहन सिंह ने दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
3. 2013 और 2014। भाजपा ने सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी को, जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला और उसने अपने दम पर 282 सीटें जीतीं, यानी 30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत। इसके बावजूद उसने सहयोगियों के साथ राजग सरकार बनाने का विकल्प चुना।
4. 2019। भाजपा फिर से 303 सीटों के साथ विजयी हुई। अध्याय जोड़ता है कि जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है, तब भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. अध्याय में दी गई जीवनियों के आधार पर बी.पी. मंडल और कांशीराम का परिचय दीजिए।

उत्तर: बी.पी. मंडल (1918-1982): वे 1967-1970 तथा 1977-1979 में बिहार से सांसद चुने गए। उन्होंने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्षता की, और इस आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफ़ारिश की। वे बिहार के समाजवादी नेता थे। 1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे और 1977 में जनता पार्टी में शामिल हुए।

कांशीराम (1934-2006): वे बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक थे। सामाजिक और राजनीतिक काम के लिए उन्होंने केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफ़ा दिया। उनका क्रम रहा बामसेफ, फिर डीएस-4 और अंततः 1984 में बसपा की स्थापना। वे कुशाग्र रणनीतिकार थे, राजनीतिक सत्ता को सामाजिक समानता का आधार मानते थे और उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति के संगठनकर्ता रहे।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार अधिकतर दलों के बीच जो व्यापक सहमति उभरती दिखती है, उसकी चार बातें विस्तार से समझाइए।

उत्तर: अध्याय कहता है कि कड़े मुकाबले और बहुत-से संघर्षों के बावजूद अधिकतर दलों के बीच एक सहमति उभरती सी जान पड़ रही है, और इस सहमति में चार बातें हैं।

1. नयी आर्थिक नीति पर सहमति। कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ़ हैं, लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं। अधिकतर दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।

2. पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति। राजनीतिक दलों ने पहचान लिया है कि पिछड़ी जातियों के सामाजिक और राजनीतिक दावे को स्वीकार करने की ज़रूरत है। इसी कारण आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं। दल यह भी सुनिश्चित करने के लिए तैयार हैं कि ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी मिले।

3. देश के शासन में प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति। प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद अब लगातार कम होता जा रहा है। प्रांतीय दल केंद्रीय सरकार में साझीदार बन रहे हैं और इन दलों ने पिछले बीस सालों में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

4. विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर ज़ोर। गठबंधन की राजनीति के इस दौर में राजनीतिक दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर ज़ोर दे रहे हैं। मिसाल के लिए अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं हैं, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई, जो पाँच साल तक चली।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. 1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे क्या रहे हैं? इन मुद्दों से राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं?

उत्तर: मुख्य मुद्दे

1. कांग्रेस के दबदबे का खात्मा। 1989 में कांग्रेस की हार के साथ ‘कांग्रेस प्रणाली’ का अंत हुआ और बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग शुरू हुआ।
2. मंडल मुद्दा। 1990 में मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के समर्थकों और विरोधियों के बीच जो विवाद चला, वही ‘मंडल मुद्दा’ है। इसने अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप दिया।
3. नयी आर्थिक नीति। ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम या नए आर्थिक सुधारों ने आज़ादी के बाद की आर्थिक दिशा को मूलगामी अर्थों में बदल दिया, और इनकी भरपूर आलोचना भी हुई।
4. धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीति और अयोध्या विषय। इस दौर में धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीति का प्रत्यक्ष उदय हुआ, जिसने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के बारे में बहस को दिशा दी।

दलों के आपसी जुड़ाव के रूप

1. बाहर से समर्थन वाली मोर्चा सरकारें। 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी, जिसे भाजपा और वाम मोर्चा, यानी परस्पर विरुद्ध दो समूहों, ने बाहर से समर्थन दिया, पर दोनों सरकार में शामिल नहीं हुए।
2. समीकरणों का पलटना। 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार को कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों ने समर्थन दिया और भाजपा ने नहीं, क्योंकि अब निशाना बदल चुका था। अध्याय के शब्दों में इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।
3. स्थायी गठबंधनों का बनना। भाजपा राजग के अगुआ के रूप में और कांग्रेस संप्रग के नेतृत्व में सामने आयी, यानी मुकाबला भाजपा-नीत गठबंधन और कांग्रेस-नीत गठबंधन के बीच चला।
4. क्षेत्रीय दलों की केंद्रीयता। इस पूरे दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी।
5. विचारधारा से ऊपर गठजोड़। दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर ज़ोर देने लगे, जिसका उदाहरण अध्याय खुद देता है कि हिंदुत्व से असहमत दल भी भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और पाँच साल चलने वाली सरकार बनाई।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. अन्य पिछड़ा वर्ग के राजनीतिक उदय की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: 1. यह कोटि क्या है। ‘ओबीसी’ अथवा ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि है, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से अलग है और जिसमें शैक्षणिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना की जाती है।

2. कांग्रेस से दूरी और नयी जगह। पिछड़ी जातियों के अनेक तबके कांग्रेस से दूर जा रहे थे और उनमें कांग्रेस के लिए समर्थन घट रहा था। ऐसे में गैर-कांग्रेसी दलों के लिए एक जगह पैदा हुई और इन दलों ने इस तबके का समर्थन हासिल किया।

3. 1977 की जनता पार्टी। गैर-कांग्रेसी दलों के राजनीतिक अभ्युदय की अभिव्यक्ति 1977 की जनता पार्टी की सरकार के रूप में हुई। इसके कई घटकों, मसलन भारतीय क्रांतिदल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का, ग्रामीण इलाकों के अन्य पिछड़े वर्ग में ताकतवर जनाधार था।

4. जनता दल और मंडल। 1980 के दशक में अन्य पिछड़ा वर्गों के बीच लोकप्रिय ऐसे ही राजनीतिक समूहों को जनता दल ने एकजुट किया। फिर राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का फ़ैसला किया, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप देने में मदद मिली।

5. पहचान की सजगता। नौकरी में आरक्षण के सवाल पर तीखे वाद-विवाद हुए और इन विवादों से ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ अपनी पहचान को लेकर ज़्यादा सजग हुआ। जो इस तबके को लामबंद करना चाहते थे, उन्हें इसका फायदा हुआ।

6. नयी पार्टियाँ और उनकी माँग। इस दौर में ऐसी अनेक पार्टियाँ आगे आयीं, जिन्होंने रोज़गार और शिक्षा के क्षेत्र में अन्य पिछड़ा वर्ग को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की माँग की और सत्ता में उसकी हिस्सेदारी का सवाल भी उठाया। इनका कहना था कि भारतीय समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा है, इसलिए शासन में उसका समुचित प्रतिनिधित्व और सत्ता में समुचित मौजूदगी तय करना लोकतांत्रिक कदम होगा।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. अयोध्या विषय और अध्याय में दिए गए उसके विधिक समाधान का वर्णन कीजिए।

उत्तर: 1. विषय की प्रकृति। अध्याय के अनुसार अयोध्या विषय देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था, जिसमें विभिन्न हितधारकों के भिन्न दृष्टिकोण थे। यह विषय श्री राम के जन्मस्थान, जो पवित्रतम धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है, के स्वामित्व से संबंधित विवाद था।

2. लंबा इतिहास। 1528 से प्रारम्भ होकर 500 वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में अनेक संघर्ष लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित हैं। 1528 में जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित किया गया, परन्तु उसके आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू प्रतीकों तथा अवशेषों को प्रत्यक्ष देखा जा सकता था, इसलिए यह विषय प्राचीन सभ्यता में राष्ट्रीय गौरव से जुड़ गया।

3. विधिक विवाद बनना। कालान्तर में यह एक लम्बे विधिक विवाद में परिणत हो गया, जिसमें न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने के कारण 1949 में ढाँचे को सील कर दिया गया। 1986 में फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के एक निर्णय से ढाँचे का ताला खोल दिया गया और पूजा की अनुमति दी गई। मन्दिर का शिलान्यास हुआ, किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा। हिन्दू समुदाय ने इसे अपनी चिन्ताओं की उपेक्षा समझा, जबकि मुस्लिम समाज ढाँचे पर अधिकार के आश्वासन की माँग करता रहा। 1992 में ढाँचे के ध्वंस के बाद कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है।

4. समाधान का रास्ता। अध्याय कहता है कि एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है। न्यायालय में सुनवाइयाँ, मध्यस्थता के प्रयास तथा जन आन्दोलन जैसी अनेक लोकतान्त्रिक और विधिक प्रक्रियाओं के जरिये अन्ततः 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से अयोध्या विवाद का समाधान हो गया।

5. निर्णय ने क्या किया। इस निर्णय ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को विवादित स्थल राम मन्दिर निर्माण के लिए आवंटित कर दिया और संबंधित सरकार को सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को एक मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटित करने का आदेश दिया।

6. अध्याय का आकलन। यह विषय पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे साक्ष्यों के आधार पर विधि की उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सुलझाया गया। अध्याय के अनुसार समाज में व्यापक रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उत्सवपूर्वक लिया गया, और यह एक उदाहरण है जिसमें एक संवेदनशील विषय पर सर्वसम्मति का निर्माण किया गया।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. 1989 से 2019 तक केंद्र की सरकारों का लेखा-जोखा दीजिए और बताइए कि गठबंधन का युग किन प्रवृत्तियों की परिणति था।

उत्तर: 1. 1989: राष्ट्रीय मोर्चा। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होकर भी बहुमत में न होने के कारण विपक्ष में बैठी। राष्ट्रीय मोर्चा, जो जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बना था, ने वी.पी. सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायी। भाजपा और वाम मोर्चा ने बाहर से समर्थन दिया।

2. 1996 और 1997: संयुक्त मोर्चा। इसमें भी जनता दल और कई क्षेत्रीय पार्टियाँ शामिल थीं। इस बार भाजपा ने समर्थन नहीं दिया और कांग्रेस ने दिया। अध्याय यह भी दर्ज करता है कि कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।

3. 1998 और 1999: राजग। भाजपा 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनी पर बहुमत नहीं जुटा सकी। आखिरकार वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अगुआ के रूप में सत्ता में आयी और 1998 के मई से 1999 के जून तक रही, फिर 1999 के अक्तूबर में दोबारा सत्ता हासिल की। दोनों बार अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और 1999 की सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया।

4. 2004 और 2009: संप्रग। 2004 में राजग की हार हुई और कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, जिसे वाम मोर्चा ने समर्थन दिया। जुलाई 2008 में परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बावजूद सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। 2009 में कांग्रेस की सीटें 145 से बढ़कर 206 हुईं और मनमोहन सिंह ने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ली।

5. 2014 और 2019। 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर 282 सीटें मिलीं, यानी 30 साल बाद पहला एकल दल बहुमत, फिर भी उसने सहयोगियों के साथ राजग सरकार बनाने का विकल्प चुना। 2019 में वह 303 सीटों के साथ फिर विजयी हुई।

6. यह युग किन प्रवृत्तियों की परिणति था। अध्याय कहता है कि गठबंधन सरकारों का युग लंबे समय से जारी कुछ प्रवृत्तियों की परिणति है। शुरुआती सालों में कांग्रेस खुद में ही एक गठबंधननुमा पार्टी थी, जिसमें विभिन्न हित, सामाजिक समूह और वर्ग एक साथ रहते थे; इसी को ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहा गया। 1960 के दशक से विभिन्न समूह कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने लगे, और 1977 के बाद के सालों में कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। इन सारे कारणों से कांग्रेस कमज़ोर हुई, लेकिन कोई दूसरी पार्टी इस तरह नहीं उभर पायी कि उसका विकल्प बन सके। इसी से केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
इस दौर में कांग्रेस के दबदबे के खात्मे के साथ बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग शुरू हुआ। यह तो निश्चित ही है कि अपने देश में अनेक पार्टियाँ चुनाव लड़ती आयी हैं। हमारी संसद में हमेशा कई दलों के सांसद रहे हैं। 1989 के बाद एक नयी बात देखने में आयी। अब कई पार्टियाँ इस तरह उभरीं कि किसी एक-दो पार्टी को ही अधिकांश वोट या सीट नहीं मिल पाते थे। इसका मतलब यह भी हुआ कि 1989 के बाद से लोकसभा के चुनावों में कभी भी किसी एक पार्टी को 2014 तक पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बदलाव के साथ केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। यद्यपि, पुनः 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनावों में भा.ज.पा. दल को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ है।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग किसके खात्मे के साथ शुरू हुआ?
उत्तर: कांग्रेस के दबदबे के खात्मे के साथ।

(ख) 1 अंक 1989 के बाद कौन-सी नयी बात देखने में आयी?
उत्तर: अब कई पार्टियाँ इस तरह उभरीं कि किसी एक-दो पार्टी को ही अधिकांश वोट या सीट नहीं मिल पाते थे।

(ग) 2 अंक गद्यांश किस वर्ष तक की बात करता है कि किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, और उसके बाद क्या हुआ?
उत्तर: गद्यांश कहता है कि 1989 के बाद से लोकसभा के चुनावों में 2014 तक कभी किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसके बाद 2014 तथा 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ।

(घ) 2 अंक इस बदलाव के साथ केंद्र में क्या शुरू हुआ और उसमें किनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही? अध्याय के आधार पर एक उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर: इस बदलाव के साथ केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। अध्याय के अनुसार इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी। उदाहरण के लिए 1989 का राष्ट्रीय मोर्चा जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बना था, और 1996 के संयुक्त मोर्चा में भी जनता दल के साथ कई क्षेत्रीय पार्टियाँ शामिल थीं।

केस स्टडी
ये सभी महत्त्वपूर्ण बदलाव हैं और आगामी राजनीति इन्हीं बदलावों के दायरे में आकार लेगी। भारत की राजनीति के इस अध्ययन की शुरुआत में हमने चर्चा की थी कि कांग्रेस किस तरह एक प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरी। इस स्थिति से चलकर अब हम एक ऐसे पड़ाव पर पहुँचे हैं, जहाँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहीं ज़्यादा तेज़ है लेकिन इस प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच मुख्य राजनीतिक दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है। अगर राजनीतिक दल इस सहमति के दायरे में सक्रिय हैं, तो जन आंदोलन और संगठन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीकों की पहचान कर रहे हैं। गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले जन आंदोलनों के ज़रिए राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने आ रहे हैं। ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं। इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार आज की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में कैसी है?
उत्तर: कहीं ज़्यादा तेज़, फिर भी इस प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच मुख्य राजनीतिक दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है।

(ख) 1 अंक जन आंदोलनों के ज़रिए कौन-कौन से मसले राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने आ रहे हैं?
उत्तर: गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले।

(ग) 2 अंक गद्यांश के अनुसार जन आंदोलन और संगठन क्या कर रहे हैं, और उसका राज्य पर क्या असर पड़ रहा है?
उत्तर: जन आंदोलन और संगठन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीकों की पहचान कर रहे हैं। ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं। इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं।

(घ) 2 अंक गद्यांश जिस ‘सहमति’ की बात करता है, अध्याय के अनुसार उसमें कौन-कौन सी बातें शामिल हैं? कोई दो लिखिए।
उत्तर: कोई दो, जैसे: 1. नयी आर्थिक नीति पर सहमति, यानी ज़्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं और मानते हैं कि इनसे देश समृद्ध होगा। 2. पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति, यानी सभी दल शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण के पक्ष में हैं और ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की सत्ता में समुचित हिस्सेदारी सुनिश्चित करने को तैयार हैं। (बाकी दो बातें प्रांतीय दलों की भूमिका की स्वीकृति और विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर ज़ोर हैं।)