कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 8 भारतीय राजनीति: नए बदलाव NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 8 भारतीय राजनीति: नए बदलाव (कई जगह इसे भारतीय राजनीति के हाल के घटनाक्रम भी लिखा जाता है) की प्रश्नावली के सभी 8 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में ‘खुद करें-खुद सीखें’ गतिविधि और पाठ के बीच पूछे गए प्रश्न (‘खोज-बीन’ बॉक्स, हाशिये की टिप्पणियाँ, वोट की हिस्सेदारी वाला चित्र और अंत का चर्चा वाला बॉक्स) भी हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

पहले यह जान लीजिए: अध्याय कहाँ तक की बात करता है

अध्याय अपनी समय-सीमा ख़ुद बताता है। ‘खुद करें-खुद सीखें’ में लिखा है कि इस अध्याय में 2004 के चुनाव (14वीं लोकसभा) तक भारतीय राजनीति की प्रमुख घटनाओं को शामिल किया गया है, और उसके बाद के हिस्से 2009, 2014 और 2019 के चुनावों तथा 17वीं लोकसभा तक ले जाते हैं। अयोध्या वाला हिस्सा 9 नवम्बर 2019 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय तक जाता है, और संसद की तालिका में चार ही स्तंभ हैं: 2004, 2009, 2014 और 2019।

इसका मतलब: नीचे के सारे उत्तर अध्याय के अपने पाठ तक सीमित हैं। 2019 के बाद की कोई घटना, कोई आँकड़ा या कोई राय यहाँ नहीं जोड़ी गई है, क्योंकि परीक्षा भी किताब के भीतर से ही पूछती है।

हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करण की तुलना

इस अध्याय की प्रश्नावली में दोनों संस्करणों में 8-8 प्रश्न हैं और उनका क्रम भी एक ही है। प्रश्न 1 की छह मदें हिंदी में (क) से (च) और अंग्रेज़ी में (a) से (f) तक, उसी क्रम और उसी विषय के साथ छपी हैं। प्रश्न 2 का बायाँ स्तंभ (क) से (घ) तक और दायाँ स्तंभ दोनों किताबों में (i) से (iv) तक है, वह भी एक ही क्रम में। इसलिए इस अध्याय में उत्तर का अक्षर संस्करण बदलने से नहीं बदलता, यह मद-दर-मद जाँचा गया है। नीचे के सभी उत्तर फिर भी हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।

पाठ में भी दोनों संस्करणों के बीच कोई ऐसा अंतर नहीं मिला जिससे उत्तर बदले: कार्टून के कैप्शन, ‘क्या आप जानते हैं?’ बॉक्स, अयोध्या वाला अद्यतन हिस्सा, निर्णय के दोनों उद्धृत अंश (पृष्ठ 920 और 1045), 17वीं लोकसभा का चित्र और 2004 से 2019 तक की तालिका, सब दोनों में हैं।

1 अखबार की कतरनों को कालक्रम में लगाइए

प्रश्न 1

प्र. उन्नी-मुन्नी ने अखबार की कुछ कतरनों को बिखेर दिया है। आप इन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें:
(क) मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करना
(ख) जनता दल का गठन
(ग) राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
(घ) इंदिरा गाँधी की हत्या
(ङ) राजग सरकार का गठन
(च) संप्रग सरकार का गठन

उत्तर: सही कालक्रम है (घ) → (ख) → (क) → (ङ) → (च) → (ग)।

क्रम कतरन कब
1 (घ) इंदिरा गाँधी की हत्या 1984
2 (ख) जनता दल का गठन 1980 के दशक में, 1989 के चुनाव से पहले
3 (क) मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करना 1990 का अगस्त
4 (ङ) राजग सरकार का गठन 1998 का मई
5 (च) संप्रग सरकार का गठन 2004
6 (ग) राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय 9 नवम्बर 2019

क्यों: अध्याय की पहली ही पंक्तियाँ कहती हैं कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने और हत्या के कुछ दिनों बाद ही 1984 में लोकसभा के चुनाव हुए। मंडल आयोग की एक सिफ़ारिश को 1990 के अगस्त में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने लागू किया। भाजपा राजग के अगुआ के रूप में 1998 के मई में सत्ता में आयी। 2004 के चुनावों के बाद संप्रग की सरकार बनी। और अयोध्या विवाद का समाधान 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से हुआ।

जनता दल वाली मद पर एक ज़रूरी बात। इस अध्याय में जनता दल के गठन का साल छपा नहीं है। फिर भी उसकी जगह अध्याय से ही तय हो जाती है: अध्याय कहता है कि राष्ट्रीय मोर्चा जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बना था और उसने 1989 का चुनाव लड़कर सरकार बनायी, तथा यह भी कि 1980 के दशक में अन्य पिछड़ा वर्गों के बीच लोकप्रिय राजनीतिक समूहों को जनता दल ने एकजुट किया। यानी जनता दल 1984 की हत्या के बाद और 1990 के मंडल वाले फ़ैसले से पहले बन चुका था। उत्तर लिखते समय इसी तर्क को लिख दीजिए, बाहर से कोई तारीख़ मत जोड़िए।

2 निम्नलिखित में मेल करें

प्रश्न 2

प्र. निम्नलिखित में मेल करें:
बायाँ स्तंभ: (क) सर्वानुमति की राजनीति, (ख) जाति आधारित दल, (ग) पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय, (घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत
दायाँ स्तंभ: (i) शाहबानो मामला, (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार, (iii) गठबंधन सरकार, (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति

उत्तर: (क) से (iv), (ख) से (ii), (ग) से (i), (घ) से (iii)।

क्यों:

(क) सर्वानुमति की राजनीति का जोड़ा (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति है। अध्याय ‘बढ़ती सहमति’ वाले हिस्से में सबसे पहली बात यही रखता है: कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ़ हैं, लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक दल इन नीतियों के पक्ष में हैं और मानते हैं कि इनसे देश समृद्ध होगा।

(ख) जाति आधारित दल का जोड़ा (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार है। अध्याय बताता है कि मंडल के बाद ऐसी अनेक पार्टियाँ आगे आयीं जिन्होंने रोज़गार और शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग को बेहतर अवसर देने और सत्ता में उसकी हिस्सेदारी की माँग उठाई, और दलित राजनीति ने भी बसपा के रूप में स्वतंत्र रूप लिया।

(ग) पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय का जोड़ा (i) शाहबानो मामला है। इस प्रकरण में एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ते का सवाल था। सर्वोच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया, कुछ लोगों ने इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना और सरकार ने 1986 का अधिनियम पारित कर निर्णय को निरस्त कर दिया।

(घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत का जोड़ा (iii) गठबंधन सरकार है। अध्याय का अपना वाक्य है कि इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन से ही बनायी जा सकती थी, और क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

3 1989 के बाद के मुख्य मुद्दे और दलों का जुड़ाव

प्रश्न 3

प्र. 1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे क्या रहे हैं? इन मुद्दों से राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं?

उत्तर: अध्याय चार बड़े मुद्दे गिनाता है, और उन्हीं से दलों के जुड़ने-टूटने के पाँच रूप निकलते हैं।

मुख्य मुद्दे

1. कांग्रेस के दबदबे का खात्मा। 1989 में कांग्रेस 415 से घटकर 197 सीटों पर आ गई और उसी चुनाव के साथ ‘कांग्रेस प्रणाली’ की समाप्ति हो गई। इसके साथ बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग शुरू हुआ।

2. मंडल मुद्दा। 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने वाली सिफ़ारिश लागू की। इसके समर्थकों और विरोधियों के बीच चला विवाद ही ‘मंडल मुद्दा’ है, और इससे अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप मिला।

3. नयी आर्थिक नीति। ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम अथवा नए आर्थिक सुधारों ने आज़ादी के बाद की आर्थिक दिशा को मूलगामी अर्थों में बदल दिया। विभिन्न आंदोलनों और संगठनों ने इनकी भरपूर आलोचना की, फिर भी हर सरकार ने इन पर अमल जारी रखा।

4. धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीति और अयोध्या विषय। इस अवधि में धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीति का प्रत्यक्ष उदय हुआ, जिसने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के बारे में बहस को दिशा दी। राम जन्मभूमि का विवाद इसका केन्द्रीय विषय बना और उसकी परिणति 9 नवम्बर 2019 के निर्णय के बाद राम मन्दिर निर्माण के रूप में हुई।

दलों के आपसी जुड़ाव के रूप

1. बाहर से समर्थन वाली मोर्चा सरकार। 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा को भाजपा और वाम मोर्चा, यानी परस्पर विरुद्ध दो समूहों ने समर्थन दिया, पर दोनों सरकार में शामिल नहीं हुए। वजह साफ़ थी: दोनों कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना चाहते थे।

2. समीकरणों का पलट जाना। 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार को कांग्रेस और वाम मोर्चा दोनों ने समर्थन दिया और भाजपा ने नहीं, क्योंकि अब दोनों भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहते थे। अध्याय के शब्दों में इससे पता चलता है कि राजनीतिक समीकरण किस कदर छुईमुई थे।

3. दो स्थायी गठबंधनों का बनना। नब्बे के दशक में राजनीतिक मुकाबला भाजपा-नीत गठबंधन (राजग) और कांग्रेस-नीत गठबंधन (संप्रग) के बीच चला।

4. क्षेत्रीय दलों का केंद्र में आना। इस दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी अथवा उनके समर्थन के बिना नहीं बन सकती थी। प्रांतीय और राष्ट्रीय दल का भेद लगातार कम होता गया।

5. विचारधारा से ऊपर उठकर गठजोड़। दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर ज़ोर देने लगे। अध्याय ख़ुद उदाहरण देता है कि अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं थे, फिर भी उसके साथ गठबंधन में शामिल हुए और पाँच साल चलने वाली सरकार बनाई।

4 क्या गठजोड़ विचारधारा के आधार पर नहीं होते

प्रश्न 4

प्र. ‘‘गठबंधन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते हैं।’’ इस कथन के पक्ष या विपक्ष में आप कौन-से तर्क देंगे।

उत्तर: यह प्रश्न आपसे एक पक्ष चुनने को कहता है। दोनों तरफ़ के तर्क अध्याय से ही निकलते हैं, इसलिए दोनों दीजिए और फिर अपना निष्कर्ष लिखिए।

कथन के पक्ष में तर्क

1. अध्याय ख़ुद यही कहता है। ‘बढ़ती सहमति’ की चौथी बात है, विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर ज़ोर और विचारधारागत सहमति के बगैर राजनीतिक गठजोड़। अध्याय के अनुसार दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर ज़ोर दे रहे हैं।

2. अध्याय का अपना उदाहरण। अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं थे, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई, जो पाँच साल तक चली।

3. एक ही मोर्चे को उलटे छोर से समर्थन। 1989 में भाजपा और वाम मोर्चा, जिनकी विचारधाराएँ परस्पर विरुद्ध हैं, दोनों ने एक ही सरकार को समर्थन दिया।

4. समर्थन का बदलते रहना। कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया, यानी समर्थन देने और वापस लेने का आधार भी वैचारिक नहीं था।

कथन के विपक्ष में तर्क

1. गठजोड़ पूरी तरह विचारधारा-मुक्त नहीं थे। 1989 में भाजपा और वाम मोर्चा दोनों का साझा आधार ‘कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना’ था, और 1996 में कांग्रेस तथा वाम मोर्चा का साझा आधार ‘भाजपा को सत्ता से बाहर रखना’ था। यह भी एक राजनीतिक दिशा ही है, केवल कुर्सी की गिनती नहीं।

2. मुद्दों पर सहमति बनी, विचार मिटा नहीं। अध्याय के अनुसार दलों में नयी आर्थिक नीति, पिछड़ी जातियों के दावे और प्रांतीय दलों की भूमिका पर एक व्यापक सहमति है। सहमति का होना यह नहीं बताता कि विचारधारा ख़त्म हो गई, बल्कि यह कि विचारधारा का दायरा बदल गया।

3. गठबंधन टिके भी। राजग की 1999 वाली सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया और संप्रग की सरकार ने वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद भी कार्यकाल पूरा किया। पूरी तरह अवसरवादी गठजोड़ इतने लंबे नहीं चलते।

निष्कर्ष: अध्याय के आधार पर कहा जा सकता है कि इस दौर में विचारधारा गठजोड़ की एकमात्र कसौटी नहीं रही, सत्ता में हिस्सेदारी और कार्यसिद्धि उसके बराबर या उससे बड़ी कसौटी बन गई। पर यह कहना कि विचारधारा की कोई भूमिका ही नहीं रही, अध्याय के तथ्यों से आगे की बात होगी।

5 आपातकाल के बाद भाजपा का विकास-क्रम

प्रश्न 5

प्र. आपातकाल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास-क्रम का उल्लेख करें।

उत्तर:

1. जनसंघ से भाजपा तक (1977 से 1980)। आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी के साथ विलय हो गया था। जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद पूर्ववर्ती जनसंघ के समर्थकों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनाई।

2. शुरुआती और बड़ा राजनीतिक पटल। आरंभ में भाजपा ने जनसंघ की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा राजनीतिक पटल अपनाया और गांधीवादी समाजवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी विचारधारा के रूप में अपनाया।

3. 1984 का झटका। इसके बावजूद 1984 के चुनावों में भाजपा को बहुत सफलता नहीं मिली।

4. 1986 के बाद विचारधारा में मोड़। 1986 के बाद इस दल ने राष्ट्रवाद पर अपनी विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल देना प्रारम्भ किया और राजनीतिक लामबन्दी के लिए हिन्दुत्व की राजनीति को भी अपनाया। हिन्दुत्व को विनायक दामोदर सावरकर ने भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया था, जिसका मूल आशय यह था कि एक भारतीय होने के लिए भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करना आवश्यक है।

5. दो घटनाओं का केन्द्र बिंदु बनना। 1986 की दो घटनाएँ भाजपा की राजनीति का केन्द्र बिंदु बन गईं। एक 1985 का शाहबानो वाद और उसके बाद पारित मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986, जिसे भाजपा ने अल्पसंख्यक समुदाय को दी गयी अनावश्यक छूट और तुष्टिकरण बताकर आलोचना की। दूसरी अयोध्या विषय, जो देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था।

6. चुनावी चढ़ाई। भाजपा ने 1991 तथा 1996 के चुनावों में अपनी स्थिति लगातार मज़बूत की और 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसे सरकार बनाने का न्यौता मिला, पर अधिकांश दल उसकी नीतियों के खिलाफ़ थे, इसलिए वह लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी।

7. सत्ता तक। आखिरकार भाजपा राजग के अगुआ के रूप में सत्ता में आयी और 1998 के मई से 1999 के जून तक रही, फिर 1999 के अक्तूबर में इस गठबंधन ने दोबारा सत्ता हासिल की। दोनों बार अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और 1999 की सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया। आगे चलकर 2014 में 282 और 2019 में 303 सीटें उसे मिलीं।

6 प्रभुत्व ख़त्म, फिर भी कांग्रेस का असर

प्रश्न 6

प्र. कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया है। इसके बावजूद देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर लगातार कायम है। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।

उत्तर: हाँ, अध्याय के आधार पर इस बात से सहमत हुआ जा सकता है। नीचे पहले यह कि प्रभुत्व सचमुच ख़त्म हुआ, फिर यह कि असर फिर भी बना रहा।

प्रभुत्व का ख़त्म होना

1. 1989 के चुनाव में कांग्रेस 1984 की 415 सीटों से घटकर 197 पर आ गई और उसी के साथ ‘कांग्रेस प्रणाली’ की समाप्ति हो गई। अध्याय कहता है कि दलीय प्रणाली के भीतर जैसी प्रमुखता इसे पहले हासिल थी, वैसी अब न रही।
2. कांग्रेस की हार के साथ भारत की दलीय व्यवस्था से उसका दबदबा ख़त्म हो गया और बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग शुरू हुआ।

असर फिर भी कायम

1. वह महत्त्वपूर्ण पार्टी बनी रही। अध्याय का सीधा वाक्य है कि कांग्रेस एक महत्त्वपूर्ण पार्टी के रूप में कायम रही और 1989 के बाद भी देश पर किसी अन्य पार्टी के बजाय उसका शासन ज़्यादा दिनों तक रहा।

2. उसकी जगह कोई और नहीं ले सका। अध्याय दो जगह यह दोहराता है: नब्बे के दशक में कांग्रेस की अग्रणी हैसियत को चुनौती ज़रूर मिली, पर इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस की जगह कोई दूसरी पार्टी प्रमुख हो गई।

3. सरकार बनाने-गिराने की कुंजी उसके पास रही। 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी थी, और कांग्रेस नेता सीताराम केसरी के समर्थन वापस लेने से देवगौड़ा की सरकार गिरी।

4. वह गठबंधन की धुरी बन गई। नब्बे के दशक में मुकाबला भाजपा-नीत गठबंधन और कांग्रेस-नीत गठबंधन के बीच चला। 2004 में कांग्रेस पूरे ज़ोर के साथ गठबंधन में शामिल हुई, संप्रग की सरकार बनी और उसका नेतृत्व कांग्रेस ने किया।

5. चुनावी वापसी भी हुई। 2004 के चुनावों में एक हद तक कांग्रेस का पुनरुत्थान हुआ और 1991 के बाद इस दफ़ा पार्टी की सीटों की संख्या फिर बढ़ी। 2009 में यह संख्या 145 से बढ़कर 206 हुई और डॉ. मनमोहन सिंह ने दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

6. वोट का हिस्सा। अध्याय की तालिका के पाठ-संकेत में कहा गया है कि 1989 के बाद 1996, 2004 और 2009 को छोड़कर ज़्यादातर समय कांग्रेस और भाजपा को मिले वोटों का योग 50 फीसदी से ज़्यादा रहा है, यानी कांग्रेस मुक़ाबले से बाहर नहीं हुई।

7 दो-दलीय व्यवस्था बनाम भारत की बहुदलीय व्यवस्था

प्रश्न 7

प्र. अनेक लोग सोचते हैं कि सफल लोकतंत्र के लिए दो-दलीय व्यवस्था ज़रूरी है। पिछले तीस सालों के भारतीय अनुभवों को आधार बनाकर एक लेख लिखिए और इसमें बताइए कि भारत की मौजूदा बहुदलीय व्यवस्था के क्या फ़ायदे हैं।

उत्तर (लेख के रूप में):

भूमिका। 1989 के चुनावों से भारत में गठबंधन की राजनीति का एक लंबा दौर शुरू हुआ। कांग्रेस के दबदबे के खात्मे के साथ बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग आया, जिसमें 1989 के बाद 2014 तक किसी एक पार्टी को लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला और केंद्र में 11 सरकारें बनीं।

फ़ायदा 1: ज़्यादा समूहों को प्रतिनिधित्व। नब्बे का दशक कुछ ताकतवर पार्टियों और आंदोलनों के उभार का साक्षी रहा, जिन्होंने दलित तथा पिछड़े वर्ग की नुमाइंदगी की। बसपा के रूप में आज़ाद भारत में पहली बार कोई दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी सफलता तक पहुँचा। दो-दलीय ढाँचे में ऐसी आवाज़ों को अपनी अलग पार्टी बनाने की जगह मुश्किल से मिलती।

फ़ायदा 2: क्षेत्रों को केंद्र में जगह। इन दलों में से अनेक ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं की भी दमदार दावेदारी की। अध्याय के अनुसार इस नए दौर में कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी या समर्थन से ही बन सकती थी, प्रांतीय दल केंद्रीय सरकार में साझीदार बने और प्रांतीय तथा राष्ट्रीय दल का भेद लगातार कम होता गया।

फ़ायदा 3: सत्ता का बँटवारा और आपसी नियंत्रण। गठबंधन सरकारों में सत्ता एक दल के हाथ में नहीं रहती। समर्थन देने और वापस लेने की ताक़त भी बनी रहती है, जिसका उदाहरण अध्याय ख़ुद देता है, जब कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की सरकार से समर्थन वापस लिया।

फ़ायदा 4: सहमति की राजनीति। कड़े मुक़ाबले के बावजूद अधिकतर दलों के बीच नयी आर्थिक नीति, पिछड़ी जातियों के दावे और प्रांतीय दलों की भूमिका जैसे मसलों पर एक व्यापक सहमति उभरी। यानी बहुदलीय होने से नीतिगत अराजकता नहीं आई।

फ़ायदा 5: स्थिरता भी संभव है। यह मान लेना ठीक नहीं कि गठबंधन का मतलब अस्थिरता ही है। 1999 की राजग सरकार ने अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया, और संप्रग सरकार ने जुलाई 2008 में वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बावजूद अपना कार्यकाल पूरा किया।

निष्कर्ष। अध्याय यह भी दर्ज करता है कि 2014 और 2019 में भाजपा को अकेले बहुमत मिला, फिर भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता प्रासंगिक बनी हुई है। इसलिए भारत का अनुभव यह बताता है कि सफल लोकतंत्र के लिए दो-दलीय होना ज़रूरी नहीं है। भारत जैसे विविध समाज में बहुदलीय व्यवस्था ज़्यादा लोगों को अपनी बात कहने का रास्ता देती है, और सहमति के दायरे के भीतर वह टिकाऊ सरकार भी दे सकती है।

8 अवतरण आधारित प्रश्न: दलगत व्यवस्था की चुनौतियाँ

प्रश्न 8

प्र. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:

भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस-प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की नयी प्रवृत्ति का भी ज़ोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की समाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे। राजव्यवस्था के सामने एक महत्त्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगत व्यवस्था खड़ी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है, जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें… ‘जोया हसन’

(क) इस अध्याय को पढ़ने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सूची बना सकते हैं?

हाँ। अध्याय के आधार पर सूची इस तरह बनेगी:

1. किसी एक दल का बहुमत तक न पहुँच पाना। 1989 के बाद कई पार्टियाँ इस तरह उभरीं कि किसी एक-दो पार्टी को ही अधिकांश वोट या सीट नहीं मिल पाते थे, और 2014 तक किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला।
2. सरकारों का बाहरी समर्थन पर टिका रहना। केंद्र की 11 सरकारें या तो गठबंधन की थीं या दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की, जिससे समर्थन वापस लेते ही सरकार ख़तरे में आ जाती थी।
3. समीकरणों का बहुत जल्दी बदलना। 1989 और 1996 के उलटे समीकरण दिखाते हैं कि गठजोड़ किस कदर छुईमुई थे।
4. विचारधारा और गठजोड़ के बीच खिंचाव। दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर ज़ोर देने लगे, जिससे मतदाता के सामने विकल्प का अर्थ धुँधला पड़ता है।
5. पहचान की राजनीति के साथ तालमेल। अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित राजनीति के स्वतंत्र उभार, और इन दोनों के बीच की प्रतिस्पर्धा, ने दलों के सामने नयी माँगें रखीं।
6. धार्मिक पहचान पर आधारित राजनीति। इसके उदय ने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के विमर्श की दिशा बदली और दलों के सामने संवेदनशील सवाल खड़े किए।

(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमें एकजुटता का होना क्यों ज़रूरी है।

क्योंकि भारत जैसा समाज बहुत सारे अलग-अलग हितों से बना है, और लोकतंत्र में हर हित को अपनी बात कहने का रास्ता चाहिए। अध्याय की मिसाल से यह समझ आता है: शुरुआती सालों में कांग्रेस ख़ुद में ही एक गठबंधननुमा पार्टी थी, जिसमें विभिन्न हित, सामाजिक समूह और वर्ग एक साथ रहते थे, और इसी को ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहा गया। जब यह समाई ख़त्म हुई तो अलग-अलग समूहों ने अपनी अलग पार्टियाँ बनायीं और आत्म-प्रतिनिधित्व की प्रवृत्ति बढ़ी। अगर दल इन बिखरे हुए हितों को मुखर भी करें और एकजुट भी, तो हर समूह को प्रतिनिधित्व भी मिलता है और सरकार चलाने लायक बहुमत भी बनता है। अध्याय यह भी दिखाता है कि ऐसा हो सकता है: नयी आर्थिक नीति, पिछड़ी जातियों के दावे और प्रांतीय दलों की भूमिका पर अलग-अलग दल एक जगह आ पाए।

(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा। इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?

1. यह विवाद पहचान से जुड़ा था, हित से नहीं। अध्याय के अनुसार यह विषय श्री राम के जन्मस्थान के स्वामित्व से संबंधित विवाद था और देश के सामाजिक-सांस्कृतिक तथा राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था, जिसमें विभिन्न हितधारकों के भिन्न दृष्टिकोण थे। ऐसे मसले पर बीच का रास्ता निकालना आर्थिक मसलों जितना आसान नहीं होता।

2. दोनों समुदायों की माँगें आमने-सामने थीं। हिन्दू समुदाय ने निर्माण पर रोक को अपनी चिन्ताओं की उपेक्षा समझा, जबकि मुस्लिम समाज ढाँचे पर अधिकार के आश्वासन की माँग करता रहा। स्वामित्व को लेकर तनाव बढ़ा और उसका परिणाम अनगिनत विवादों तथा विधिक संघर्षों के रूप में दिखा।

3. विमर्श की दिशा ही बदल गई। राम जन्मभूमि आंदोलन के केन्द्रीय विषय बनने से धर्म निरपेक्षता और लोकतंत्र के विमर्श की दिशा बदल गई, यानी दलों को अपनी पूरी भाषा नए सिरे से तय करनी पड़ी।

4. 1992 की घटना पर आलोचना। अध्याय दर्ज करता है कि 1992 में ढाँचे के ध्वंस के बाद कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है।

5. समाधान अंततः विधि की प्रक्रिया से निकला। अध्याय यह भी कहता है कि एक बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है, और न्यायालय की सुनवाइयों, मध्यस्थता के प्रयासों तथा जन आन्दोलन जैसी प्रक्रियाओं के बाद 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से विवाद का समाधान हुआ, जिसने विरोधाभासी हितों का सामंजस्यपूर्ण समाधान किया।

एक नज़र में

प्रश्न 1: (घ), (ख), (क), (ङ), (च), (ग)। प्रश्न 2: (क)-(iv), (ख)-(ii), (ग)-(i), (घ)-(iii)। प्रश्न 3: चार मुद्दे (कांग्रेस का पतन, मंडल, नयी आर्थिक नीति, अयोध्या) और पाँच रूप (बाहरी समर्थन, पलटते समीकरण, दो गठबंधन, क्षेत्रीय दल, विचारधारा से ऊपर गठजोड़)। प्रश्न 4: पक्ष में ‘बढ़ती सहमति’ की चौथी बात और हिंदुत्व वाला उदाहरण, विपक्ष में साझा राजनीतिक दिशा और टिकाऊ सरकारें। प्रश्न 5: जनसंघ का विलय, 1980 में भाजपा, गांधीवादी समाजवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, 1984 की नाकामी, 1986 के बाद राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व, 1996 में सबसे बड़ी पार्टी, फिर राजग। प्रश्न 6: हाँ, क्योंकि कांग्रेस महत्त्वपूर्ण बनी रही, उसकी जगह कोई नहीं ले सका, सरकारें उसके समर्थन पर टिकीं और 2004 में संप्रग का नेतृत्व उसी ने किया। प्रश्न 7: बहुदलीय व्यवस्था के पाँच फ़ायदे, प्रतिनिधित्व से लेकर स्थिरता तक। प्रश्न 8: छह चुनौतियाँ, समाहार की ज़रूरत, और अयोध्या विवाद की पाँच-नुक़ाती चुनौती।

9 खुद करें-खुद सीखें

गतिविधि

प्र. इस अध्याय में 2004 के चुनाव (14वीं लोकसभा) तक भारतीय राजनीति की प्रमुख घटनाओं को शामिल किया गया है। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2009 में आयोजित किए गए, जिसके दौरान कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की जीत हुई। 2014 तथा 2019 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग विजेता बन कर उभरी। 17वीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति पृष्ठ 154 पर दर्शाई गई है।
• 17वीं लोकसभा के सदस्यों का एक विस्तृत अध्ययन लोकसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
• भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से परिणामों के बारे में आँकड़े एकत्र करके 2009 के चुनाव (15वीं लोकसभा) और 2019 के चुनाव (17वीं लोकसभा) में विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावी प्रदर्शन की तुलना करें।
• 2004 के बाद से भारत में प्रमुख राजनीतिक घटनाओं का एक घटनाक्रम तैयार करें और अपनी कक्षा में उस पर चर्चा करें।

2009 और 2019 की तुलना (अध्याय की ‘सन् 2004 से संसद में दलीय स्थिति’ तालिका से, सीटें): भारतीय जनता पार्टी 116 से 303; इंडियन नेशनल कांग्रेस 206 से 52; बहुजन समाज पार्टी 21 से 10; कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सवादी 16 से 3; समाजवादी पार्टी 23 से 5; द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम 18 से 24; जनता दल-यूनाइटेड 20 से 16; शिवसेना 11 से 18। यानी 2009 में कांग्रेस आगे थी और उसके नेतृत्व में संप्रग जीता, जबकि 2019 तक तस्वीर पलट गई और भाजपा ने अपने दम पर 303 सीटें जीतीं। वाम दलों की सीटें लगातार घटीं, और कई प्रांतीय दलों की सीटें एक चुनाव से दूसरे चुनाव में बहुत बदलीं।

2004 के बाद का घटनाक्रम (अध्याय के आधार पर): 2004: राजग की हार और कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार, जिसे वाम मोर्चा ने समर्थन दिया। जुलाई 2008: भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों ने समर्थन वापस लिया; संप्रग ने फिर भी कार्यकाल पूरा किया। 2009: संप्रग की दोबारा जीत और डॉ. मनमोहन सिंह का दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बनना। सितंबर 2013: भाजपा ने नरेंद्र मोदी (तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री) को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। 2014: भाजपा ने अपने दम पर 282 सीटें जीतीं, 30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत, और सहयोगी दलों के साथ राजग सरकार बनाई। 2019: भाजपा फिर से 303 सीटों के साथ विजयी। 9 नवम्बर 2019: अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ का 5-0 का निर्णय। इसके बाद की घटनाएँ अखबारों और निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से जोड़िए।

10 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय के बीच में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं: ‘खोज-बीन’ बॉक्स में, हाशिये की टिप्पणियों में, वोट की हिस्सेदारी वाले चित्र के नीचे और अध्याय के अंत के चर्चा वाले बॉक्स में। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, किताब के अपने शब्दों में, हल किया गया है।

खोज-बीन

प्र. अपने माता-पिता से 1990 के दशक के बाद से हुई घटनाओं के बारे में पूछें और इस समय की उनकी यादों को कुरेदें। उनसे पूछिए कि उस दौर की महत्त्वपूर्ण घटनाओं के बारे में वे क्या सोचते हैं। समूह बनाकर एक साथ बैठिए और अपने माता-पिता द्वारा बतायी गई घटनाओं की एक व्यापक सूची बनाइए। देखिए कि किस घटना का ज़िक्र ज़्यादा आया है। फिर, इस अध्याय में जिन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बदलावों का ज़िक्र आया है उनसे तुलना कीजिए। आप इस बात पर चर्चा कर सकते हैं कि कुछ घटनाएँ क्यों कुछ लोगों के लिए ज़्यादा महत्त्वपूर्ण थीं, जबकि दूसरों के लिए नहीं।

कैसे करें: तुलना के लिए अध्याय की अपनी सूची आधार है। अध्याय 1980 के दशक के आख़िर के पाँच बड़े बदलाव गिनाता है: 1989 के चुनावों में कांग्रेस की हार, राष्ट्रीय राजनीति में ‘मंडल मुद्दे’ का उदय, राजीव गाँधी की सरकार के समय शुरू हुए और 1991 तक बड़े पैमाने पर प्रकट हुए नए आर्थिक सुधार, अयोध्या का विवाद, और मई 1991 में राजीव गाँधी की हत्या। आगे वह 1989 से शुरू हुए गठबंधन की राजनीति के दौर, अन्य पिछड़ा वर्ग और बसपा जैसे दलों के उभार, और दलों के बीच बनी सर्व-सहमति की बात भी करता है। कक्षा की सूची में सबसे ज़्यादा बताई गई घटनाओं को इस सूची के सामने रखिए।

घटनाएँ अलग-अलग लोगों के लिए अलग क्यों: लोग वही याद रखते हैं जिसने उनकी अपनी ज़िंदगी को छुआ। आरक्षण की बहस से प्रभावित परिवार, आर्थिक सुधारों के बाद जिनका काम-धंधा बदला ऐसा परिवार, या किसी ऐसे राज्य का परिवार जहाँ कोई प्रांतीय दल सत्ता में आया, हर कोई घटनाओं को अलग क्रम में रखेगा। अध्याय भी यही कहता है कि इस दौर के बदलाव बड़े विवादास्पद हैं।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. चलो मान लिया कि भारत जैसे देश में लोकतांत्रिक राजनीति का तकाज़ा ही गठबंधन बनाना है। लेकिन क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि हमारे देश में हमेशा से गठबंधन बनते चले आ रहे हैं। अथवा, राष्ट्रीय स्तर के दल एक बार फिर अपना बुलंद मुकाम हासिल करके दिखाएँगे?

उत्तर: गठबंधन हमेशा से नहीं रहे और हमेशा रहें, यह भी ज़रूरी नहीं। 1952 से लंबे समय तक एक दल, कांग्रेस, की सरकारें बनीं; गठबंधन तब पार्टी के भीतर था। 1989 के चुनावों से गठबंधन की राजनीति का लंबा दौर शुरू हुआ और केंद्र में 11 सरकारें बनीं, जो सभी या तो गठबंधन की सरकारें थीं या दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें। पर 2014 में यह प्रवृत्ति बदल गई: भाजपा ने अपने दम पर 282 सीटें जीतीं और 2019 में 303, यानी एक राष्ट्रीय दल ने फिर अपना बुलंद मुकाम हासिल किया। फिर भी भाजपा ने सहयोगी दलों के साथ राजग सरकार बनाई, यानी बहुमत होने पर भी गठबंधन की परंपरा चलती रही।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. मुझे इसकी चिंता नहीं है कि सरकार किसी एक पार्टी की है या गठबंधन की। मसला तो यह है कि कोई सरकार काम कौन-से कर रही है। क्या गठबंधन सरकार में ज़्यादा समझौते करने पड़ते हैं? क्या गठबंधन सरकार साहसी और कल्पनाशील नीतियाँ नहीं अपना सकती?

उत्तर: गठबंधन सरकार में समझौते ज़्यादा करने पड़ते हैं, क्योंकि गठबंधन की राजनीति के इस दौर में दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर ज़ोर देते हैं, और असहमत साझीदारों को एक साझा कार्यक्रम पर राज़ी होना पड़ता है। पर गठबंधन सरकारें बड़े फ़ैसले भी ले चुकी हैं: 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने वाली मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू की; जुलाई 2008 में वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बावजूद संप्रग ने अपना कार्यकाल पूरा किया; और 1999 की राजग सरकार ने, जबकि उसके अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा से सहमत नहीं थे, अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किया। यानी गठबंधन में भी साहसी नीतियाँ संभव हैं, बस उनके लिए साझीदारों में सहमति बनानी पड़ती है। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. क्या इससे पिछड़े और दलित समुदायों के सभी नेताओं को लाभ होगा या इन समूहों के भीतर मौजूद कुछ ताकतवर जातियाँ और परिवार ही सारे फ़ायदे अपनी मुट्ठी में कर लेंगे?

उत्तर: अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित राजनीति के उभार से सत्ता के दरवाज़े उन समुदायों के लिए खुले जो पहले बाहर थे: केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिला (जिसे 1992 के नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सही ठहराया), बसपा जैसे दल उभरे, और सभी दलों ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे को स्वीकार किया। पर इसका लाभ बराबर नहीं बँटा। अध्याय बताता है कि भारत के कई हिस्सों में दलित राजनीति और अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने स्वतंत्र रूप धारण किया है और इन दोनों के बीच अकसर प्रतिस्पर्धा भी चलती है, और नेतृत्व अकसर इन समूहों के भीतर की ताकतवर जातियों और परिवारों से आया है। लाभ सब तक पहुँचे, यह इस पर निर्भर है कि नेतृत्व और अवसर कितने व्यापक रूप से बँटते हैं। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. असल मुद्दा नेताओं का नहीं, जनता का है! क्या इस बदलाव से सचमुच के वंचितों के लिए बेहतर नीतियाँ बनेंगी और उन पर कारगर तरीके से अमल होगा या फिर यह सारा कुछ एक राजनीतिक खेल मात्र बनकर रह जाएगा?

उत्तर: बेहतर नीतियाँ बन सकती हैं, क्योंकि अब दलों को इन समुदायों के वोट के लिए होड़ करनी पड़ती है; अध्याय कहता है कि आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोज़गार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं और यह सुनिश्चित करने को तैयार हैं कि ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी मिले। मंडल आयोग ने ख़ुद आरक्षण के अलावा कई और समाधान सुझाए थे, जिनमें भूमि-सुधार भी एक था। असली कसौटी अमल है: अगर बदलाव कुछ लोगों के चुनाव जीतने और पद पाने तक सिमट जाए तो यह राजनीतिक खेल भर रह जाएगा; अगर सबसे गरीब लोगों तक शिक्षा, रोज़गार और भूमि-सुधार पहुँचे तो यह सचमुच का सामाजिक बदलाव होगा। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

वोट में हिस्सा वाला चित्र

प्र. गौर कीजिए कि अधिकतर इस अवधि में भाजपा और कांग्रेस कठिन प्रतिस्पर्धा में लगे हुए थे। 1984 के चुनावों से तुलना करने पर आप इन पार्टियों की चुनावी सफलता में क्या अंतर पाते हैं?

उत्तर: 1984 में कोई मुकाबला था ही नहीं: कांग्रेस ने 48.1 प्रतिशत वोटों के साथ 415 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 7.4 प्रतिशत वोट और सिर्फ़ 2 सीटें मिलीं। 1989 के बाद दोनों कड़े प्रतिद्वंद्वी बन गए। कांग्रेस का वोट-प्रतिशत घटा (1989 में 39.5, 1996 में 28.8, 2004 में 26.5, 2009 में 28.6), जबकि भाजपा का बढ़ा (1989 में 11.4, 1991 में 20.1, 1998 में 25.6)। 1996, 1998 और 1999 में भाजपा की सीटें कांग्रेस से ज़्यादा रहीं, और 2004 तथा 2009 में कांग्रेस फिर आगे रही। 2014 और 2019 तक 1984 की तस्वीर पूरी तरह पलट गई: भाजपा ने 31.3 और 37.4 प्रतिशत वोटों के साथ 282 और 303 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 19.5 प्रतिशत वोटों के साथ सिर्फ़ 44 और 52 सीटें जीत सकी।

वोट में हिस्सा वाला चित्र

प्र. यहाँ कांग्रेस और जनता पार्टी-तंत्र के आरेख पर ग़ौर कीजिए। मौजूदा दलों में ऐसे कौन-कौन-से दल हैं, जो न तो दलों के कांग्रेस परिवार में थे और न ही जनता पार्टी परिवार में?

उत्तर: ये दोनों ‘परिवार’ वाले आरेख अध्याय के मौजूदा संस्करण में नहीं छपे हैं, इसलिए अध्याय की ‘सन् 2004 से संसद में दलीय स्थिति’ वाली तालिका से उत्तर दीजिए। उसमें ऐसे दल, जो न कांग्रेस से निकले और न जनता पार्टी से, ये हैं: कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सवादी, बहुजन समाज पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम, शिवसेना और आम आदमी पार्टी।

वोट में हिस्सा वाला चित्र

प्र. नब्बे के दशक में राजनीतिक मुकाबला भाजपा-नीत गठबंधन और कांग्रेस-नीत गठबंधन के बीच चला। क्या आप ऐसी पार्टियों की सूची बना सकते हैं, जो दोनों में से किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं?

उत्तर: नब्बे के दशक में दोनों गठबंधनों से बाहर मुख्य रूप से वाम दल (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) थे, जो गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा सरकारों को समर्थन देते रहे, और जनता दल तथा वे क्षेत्रीय दल थे जिन्होंने 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा और 1996 में संयुक्त मोर्चा बनाया। अध्याय बसपा को भी, जिसे मुख्य रूप से दलित मतदाताओं का समर्थन है, दोनों से अलग उभरता हुआ दिखाता है। (दलों के गठबंधन हर चुनाव में बदलते हैं, इसलिए उत्तर लिखते समय मौजूदा स्थिति भी देख लीजिए।)

चर्चा का बॉक्स

प्र. जैसा कि आप जानते हैं भारत की आजादी के आसपास कई अन्य देश भी आजाद हुए और लोकतंत्र को अपनाया। हालाँकि, भारत सामाजिक समानता और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने में एक महान भूमिका निभाते हुए एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा, लेकिन उनमें से कुछ देशों में ऐसा नहीं हुआ है। उन कारकों के बारे में आपस में चर्चा करें जिन्होंने भारत में लोकतंत्र को पनपने में सक्षम बनाया है।

उत्तर: यह अध्याय ऐसे कई कारकों की ओर इशारा करता है। पहला, सरकार चुनाव से तय होती रही। सत्ता बार-बार मतपत्र के ज़रिये बदली: 1989 में कांग्रेस हारी और 1991 में लौटी, राष्ट्रीय मोर्चा, संयुक्त मोर्चा, भाजपा-नीत गठबंधन, राजग और संप्रग, सब चुनाव के रास्ते सत्ता में आए, और 2014 तथा 2019 में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला। दूसरा, दलीय व्यवस्था में नए समूहों को जगह मिली। दलित और पिछड़ी जातियों की नुमाइंदगी करने वाले दल और अनेक क्षेत्रीय दल इस दौर में उभरे, और प्रांतीय दल राष्ट्रीय स्तर पर भी सत्ता में साझीदार बने। तीसरा, कड़ी होड़ के बीच भी दलों में सहमति बनी: नयी आर्थिक नीति पर, पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावों पर, शासन में प्रांतीय दलों की भूमिका पर और सत्ता में साझेदारी की व्यावहारिक राजनीति पर। चौथा, विवाद विधि की उचित प्रक्रिया से सुलझे: मंडल संबंधी फ़ैसले को 1992 के नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सही ठहराया, और अयोध्या विवाद 9 नवम्बर 2019 को संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से सुलझा। पाँचवाँ, जन-आंदोलन नए मुद्दे सामने लाते रहे: गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे और वर्ग, जाति, लिंग तथा क्षेत्र के संदर्भ में न्याय और लोकतंत्र के सवाल। अध्याय के शब्दों में, भारत में लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी। (यह चर्चा का प्रश्न है; तर्क देकर आप दूसरे कारक भी जोड़ सकते हैं।)