कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 8 भारतीय राजनीति: नए बदलाव शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: 1980 के दशक के आखिर के पाँच बदलाव, गठबंधन का युग और केंद्र की 11 सरकारें, अन्य पिछड़ा वर्ग का उदय और मंडल आयोग, बामसेफ से बसपा तक दलित राजनीति, भाजपा और हिन्दुत्व, शाहबानो वाद, अयोध्या विषय और 9 नवम्बर 2019 का निर्णय, 2004 से 2019 तक के चुनाव और ‘बढ़ती सहमति’ की चार बातें। हर तारीख़, हर नाम, हर आँकड़ा और हर बक्से तथा कैप्शन की बात एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

दो बातें पढ़ने से पहले

1. अध्याय की अपनी समय-सीमा। ‘खुद करें-खुद सीखें’ में अध्याय ख़ुद कहता है कि इसमें 2004 के चुनाव (14वीं लोकसभा) तक की प्रमुख घटनाएँ शामिल हैं, और आगे के अद्यतन हिस्से 2009, 2014 और 2019 के चुनावों तथा 17वीं लोकसभा तक जाते हैं। सबसे बाद की तारीख़ पूरे अध्याय में 9 नवम्बर 2019 है। इसलिए उत्तर में 2019 के बाद की कोई घटना या आँकड़ा मत लिखिए।

2. प्रश्नावली और पाठ का मेल। यह अध्याय उन अध्यायों जैसा नहीं है जिनमें प्रश्नावली पुरानी रह गई हो। यहाँ आठों प्रश्न मौजूदा पाठ से ही हल हो जाते हैं। बस एक जगह ध्यान रखिए: प्रश्न 1 में ‘जनता दल का गठन’ और ‘इंदिरा गाँधी की हत्या’ की सन-तारीख़ इस अध्याय में छपी नहीं है। इंदिरा गाँधी की हत्या के कुछ दिनों बाद ही 1984 में लोकसभा चुनाव हुए, इतना पाठ में है; और जनता दल 1980 के दशक में मौजूद था तथा 1989 का चुनाव लड़ा, इतना भी पाठ में है। कालक्रम इन्हीं दो बातों से तय कीजिए, बाहर से तारीख़ मत जोड़िए।

1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द

याद कर लेंपरिभाषा 1

‘कांग्रेस प्रणाली’: वह परिघटना जिसमें कांग्रेस ख़ुद में ही एक गठबंधननुमा पार्टी थी और उसमें विभिन्न हित, सामाजिक समूह और वर्ग एक साथ रहते थे। अध्याय के अनुसार 1989 में ही इसकी समाप्ति हो गई।

याद कर लेंपरिभाषा 2

‘मंडल मुद्दा’: अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के समर्थकों और विरोधियों के बीच चला विवाद। इसने 1989 के बाद की राजनीति में अहम भूमिका निभाई।

याद कर लेंपरिभाषा 3

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी / ‘अदर बैकवर्ड क्लासेज़्’): विचार-विवेचन की एक प्रशासनिक कोटि, जो अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति से अलग है और जिसमें शैक्षणिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की गणना की जाती है। इन्हें ‘पिछड़ा वर्ग’ भी कहा जाता है।

याद कर लेंपरिभाषा 4

‘बहुजन’: बामसेफ की शब्दावली में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक। अध्याय कहता है कि ये देश की आबादी में सबसे ज़्यादा हैं और संख्या के लिहाज़ से एक मजबूत राजनीतिक ताकत का रूप ले सकते हैं।

याद कर लेंपरिभाषा 5

हिन्दुत्व: विनायक दामोदर सावरकर द्वारा भारतीय राष्ट्रीयता के आधार के रूप में लोकप्रिय किया गया विचार। इसका मूल आशय यह था कि एक भारतीय होने के लिए आवश्यक है कि वह भारतभूमि को अपनी ‘पितृभूमि’ और साथ ही ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे।

याद कर लेंपरिभाषा 6

ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम / नए आर्थिक सुधार: वे आर्थिक नीतियाँ जिनसे आज़ादी के बाद से चली आ रही आर्थिक दिशा मूलगामी अर्थों में बदल गई। शुरुआत राजीव गाँधी की सरकार के समय, बड़े पैमाने पर प्रकट 1991 तक।

याद कर लेंपरिभाषा 7

गठबंधन सरकार का दौर: 1989 के बाद की वह स्थिति जिसमें केंद्र की सरकारें या तो गठबंधन की थीं या दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की, और कोई सरकार क्षेत्रीय पार्टियों की साझेदारी या समर्थन के बिना नहीं बन सकती थी।

2 तारीख़ें जिनका घालमेल नहीं होना चाहिए

तारीख़ किस चीज़ की
1528 श्री राम के जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचे का निर्माण; यहीं से 500 वर्ष के इतिहास की गिनती
28 नवंबर 1858 निहंग सिखों का जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण, पूजन और हवन (‘क्या आप जानते हैं?’ बॉक्स)
1949 न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने के कारण ढाँचे का सील किया जाना
1978 केंद्र सरकार द्वारा आयोग बैठाया जाना; बामसेफ का गठन
1980 मंडल आयोग द्वारा सिफ़ारिशें पेश करना; भारतीय जनता पार्टी का गठन
1984 इंदिरा गाँधी की हत्या के कुछ दिनों बाद लोकसभा चुनाव, कांग्रेस को 415 सीटें; भाजपा को बहुत सफलता नहीं; बसपा की स्थापना
1985 शाहबानो वाद
1986 मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम; फैजाबाद जिला न्यायालय के निर्णय से ताला खुलना; इसी वर्ष के बाद भाजपा का राष्ट्रवाद पर बल
1989 कांग्रेस 197 सीटों पर; ‘कांग्रेस प्रणाली’ का अंत; राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार; उत्तर प्रदेश में बसपा को सफलता
अगस्त 1990 राष्ट्रीय मोर्चा सरकार द्वारा मंडल की एक सिफ़ारिश लागू करना
मई 1991 राजीव गाँधी की हत्या (तमिलनाडु, लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिल); उसी वर्ष मध्यावधि चुनाव, नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री
नवंबर 1992 इंदिरा साहनी केस में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार का निर्णय सही ठहराया
1992 ढाँचे का ध्वंस
1996 भाजपा सबसे बड़ी पार्टी पर बहुमत नहीं; संयुक्त मोर्चा की सरकार
मई 1998 से जून 1999 राजग की पहली सरकार, वाजपेयी प्रधानमंत्री
अक्तूबर 1999 राजग की दोबारा वापसी; इस सरकार ने निर्धारित कार्यकाल पूरा किया
2004 राजग की हार, संप्रग सरकार, वाम मोर्चा का समर्थन; कांग्रेस 145
जुलाई 2008 भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर वाम दलों का समर्थन वापस लेना
2009 15वीं लोकसभा; कांग्रेस 206; मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल
सितंबर 2013 भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी (तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री) को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना
2014 16वाँ लोकसभा चुनाव; भाजपा को अपने दम पर 282; 30 साल बाद एकल दल बहुमत; फिर भी राजग सरकार
2019 भाजपा 303 सीटों के साथ विजयी; 9 नवम्बर 2019 को अयोध्या पर 5-0 का निर्णय

3 1980 के दशक के आखिर के पाँच बड़े बदलाव

यही ढाँचा पूरे अध्याय का है

1. 1989 में कांग्रेस की हार। 1984 की 415 सीटों से घटकर 197। 1991 में मध्यावधि चुनाव के बाद वह फिर सत्ता में आयी, पर ‘कांग्रेस प्रणाली’ 1989 में ही ख़त्म हो गई। कांग्रेस महत्त्वपूर्ण पार्टी बनी रही और 1989 के बाद भी किसी अन्य पार्टी के बजाय उसका शासन ज़्यादा दिनों तक रहा।

2. ‘मंडल मुद्दे’ का उदय। 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नयी सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कीं, जिनके अंतर्गत केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण का प्रावधान था। देश के विभिन्न भागों में मंडल-विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए।

3. आर्थिक नीतियों का बदलना। ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम अथवा नए आर्थिक सुधार। शुरुआत राजीव गाँधी की सरकार के समय, 1991 तक बड़े पैमाने पर प्रकट। नयी नीतियों की विभिन्न आंदोलनों और संगठनों ने भरपूर आलोचना की, फिर भी इस अवधि की हर सरकार ने अमल जारी रखा।

4. अयोध्या का राम जन्मभूमि विवाद। शताब्दियों से चले आ रहे इस विधिक एवं राजनीतिक विवाद ने भारत की राजनीति को प्रभावित करना आरम्भ किया। राम जन्मभूमि आंदोलन के केन्द्रीय विषय बनने से धर्म निरपेक्षता और लोकतंत्र के विमर्श की दिशा बदल गई। इन परिवर्तनों की परिणति 9 नवम्बर 2019 को घोषित सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के निर्णय के उपरांत अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के रूप में हुई।

5. राजीव गाँधी की हत्या। मई 1991 में, तमिलनाडु के चुनावी दौरे पर, लिट्टे से जुड़े श्रीलंकाई तमिलों द्वारा। इसके परिणामस्वरूप कांग्रेस के नेतृत्व में परिवर्तन हुआ और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री चुने गए।

4 गठबंधन का युग: कौन सी सरकार, किसके सहारे

सरकार कब बनावट और सहारा
राष्ट्रीय मोर्चा 1989 जनता दल + कुछ अन्य क्षेत्रीय दल। नेतृत्व वी.पी. सिंह। भाजपा और वाम मोर्चा का बाहर से समर्थन, दोनों सरकार में शामिल नहीं
संयुक्त मोर्चा 1996 और 1997 जनता दल + कई क्षेत्रीय पार्टियाँ। कांग्रेस का समर्थन, भाजपा का नहीं। कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की सरकार से समर्थन वापस लिया
राजग 1998 और 1999 भाजपा के नेतृत्व में। मई 1998 से जून 1999, फिर अक्तूबर 1999। दोनों बार वाजपेयी प्रधानमंत्री; 1999 वाली सरकार ने कार्यकाल पूरा किया
संप्रग 2004 और 2009 कांग्रेस के नेतृत्व में। वाम मोर्चा का समर्थन; जुलाई 2008 में वाम दलों के हटने पर भी कार्यकाल पूरा
खोज-बीन बॉक्स की बात, जो परीक्षा में पूछी जाती है

कांग्रेस के दबदबे के खात्मे के साथ बहुदलीय शासन-प्रणाली का युग शुरू हुआ। 1989 के बाद नयी बात यह हुई कि कई पार्टियाँ इस तरह उभरीं कि किसी एक-दो पार्टी को ही अधिकांश वोट या सीट नहीं मिल पाते थे। इसका मतलब यह भी हुआ कि 1989 के बाद लोकसभा चुनावों में 2014 तक किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसके बाद 2014 तथा 2019 में भाजपा को अकेले बहुमत प्राप्त हुआ।

दो और आँकड़े: 1989 के बाद केंद्र में 11 सरकारें बनीं। और 1989 के बाद 1996, 2004 तथा 2009 को छोड़कर ज़्यादातर समय कांग्रेस और भाजपा को मिले वोटों का योग 50 फीसदी से ज़्यादा रहा है।

गठबंधन का युग अचानक नहीं आया

अध्याय इसे तीन पुरानी प्रवृत्तियों की परिणति बताता है: 1. शुरुआती सालों में कांग्रेस ख़ुद एक गठबंधननुमा पार्टी थी (‘कांग्रेस प्रणाली’)। 2. 1960 के दशक से विभिन्न समूह कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने लगे। 3. 1977 के बाद के सालों में कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। इन सबसे कांग्रेस कमज़ोर हुई, पर कोई दूसरी पार्टी उसका विकल्प नहीं बन पायी।

5 अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिक उदय और मंडल आयोग

क्रम याद रखिए

1. पृष्ठभूमि। दक्षिण के राज्यों में कम-से-कम 1960 के दशक से ओबीसी आरक्षण चला आ रहा था, पर उत्तर भारत में नहीं। 1977-79 की जनता पार्टी सरकार के समय उत्तर भारत में यह माँग राष्ट्रीय स्तर पर उठी। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इस दिशा में अग्रणी थे और उनकी सरकार ने बिहार में ओबीसी आरक्षण की नयी नीति लागू की।

2. गैर-कांग्रेसी दलों का आधार। पिछड़ी जातियों के कई तबके कांग्रेस से दूर जा रहे थे, जिससे गैर-कांग्रेसी दलों के लिए जगह बनी। इसकी अभिव्यक्ति 1977 की जनता पार्टी सरकार थी; उसके घटकों भारतीय क्रांतिदल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का ग्रामीण ओबीसी में ताकतवर जनाधार था।

3. आयोग का गठन। केंद्र सरकार ने 1978 में आयोग बैठाया। आज़ादी के बाद यह दूसरा ऐसा अवसर था, इसलिए आधिकारिक नाम ‘दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग’; अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर ‘मंडल कमीशन’।

4. काम। शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाना, पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताना और पिछड़ापन दूर करने के उपाय सुझाना।

5. सिफ़ारिशें (1980)। जब तक रिपोर्ट आयी, जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी। आयोग का मशविरा था कि पिछड़ा वर्ग को पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए, क्योंकि अनुसूचित जातियों से इतर ऐसी अनेक जातियाँ हैं जिन्हें वर्ण व्यवस्था में ‘नीच’ समझा जाता है। सर्वेक्षण में पाया गया कि इनकी शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी है, इसलिए 27 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की सिफ़ारिश की गई। और भी समाधान सुझाए गए, जिनमें भूमि-सुधार भी एक था।

6. लागू होना और अदालत। अगस्त 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने केंद्रीय सरकार और उसके उपक्रमों की नौकरियों वाली सिफ़ारिश लागू की। उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध हुआ। चुनौती सर्वोच्च न्यायालय में गई और प्रकरण ‘इंदिरा साहनी केस’ कहलाया। नवंबर 1992 में न्यायालय ने सरकार के निर्णय को सही ठहराया। क्रियान्वयन के तरीके पर दलों में कुछ मतभेद था, पर आरक्षण देने के मसले पर सभी बड़े दलों में सहमति थी।

जीवनी बॉक्स 1: बी.पी. मंडल (1918-1982)

1967-1970 तथा 1977-1979 में बिहार से सांसद। दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्षता की; इस आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफ़ारिश की। बिहार के समाजवादी नेता। 1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे। 1977 में जनता पार्टी में शामिल हुए।

6 दलित राजनीति: बामसेफ से बसपा तक

चार चरण

1. 1980 के दशक में दलित जातियों के राजनीतिक संगठनों का उभार। 1978 में बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ एम्पलाइज़ फेडरेशन) का गठन। यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण ट्रेड यूनियन नहीं था; इसने ‘बहुजन’ की राजनीतिक सत्ता की ज़बरदस्त तरफ़दारी की।

2. इसी का परवर्ती विकास ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’, जिससे बाद में बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ। अगुआई कांशीराम ने की।

3. बसपा शुरुआती दौर में छोटी पार्टी थी, समर्थन पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं का। 1989 और 1991 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में सफलता मिली। आज़ाद भारत में यह पहला मौका था जब कोई दल मुख्यतया दलित मतदाताओं के समर्थन के बूते ऐसी राजनीतिक सफलता तक पहुँचा।

4. बुनियाद व्यवहार केंद्रित नीतियों पर थी और आत्मविश्वास इस तथ्य से मिला कि बहुजन देश की आबादी में सबसे ज़्यादा हैं। बसपा राज्य में बड़ी ताकत बनी और एक से ज़्यादा दफ़े वहाँ सरकार बनायी; अब वह अन्य वर्गों में भी जनाधार बढ़ा रही है। अध्याय यह भी दर्ज करता है कि भारत के कई हिस्सों में दलित राजनीति और अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति ने स्वतंत्र रूप धारण किया है और इन दोनों के बीच अकसर प्रतिस्पर्धा भी चलती है।

जीवनी बॉक्स 2: कांशीराम (1934-2006)

बहुजन समाज के सशक्तीकरण के प्रतिपादक और बसपा के संस्थापक। सामाजिक और राजनीतिक काम के लिए केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफ़ा। क्रम: बामसेफ, डीएस-4 और अंततः 1984 में बसपा की स्थापना। कुशाग्र रणनीतिकार; राजनीतिक सत्ता को सामाजिक समानता का आधार मानते थे; उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति के संगठनकर्ता।

7 सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र

भाजपा का विकास-क्रम

आपातकाल के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय। जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद पूर्ववर्ती जनसंघ के समर्थकों ने 1980 में भाजपा बनाई। आरंभ में जनसंघ से बड़ा राजनीतिक पटल: गांधीवादी समाजवाद के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। 1984 में बहुत सफलता नहीं मिली। 1986 के बाद राष्ट्रवाद पर विचारधारा के केन्द्र के रूप में बल, और राजनीतिक लामबन्दी के लिए हिन्दुत्व की राजनीति। इसके बाद 1991 और 1996 में लगातार मज़बूती, 1996 में सबसे बड़ी पार्टी, फिर राजग।

शाहबानो वाद, 1985

एक 62 वर्षीय तलाकशुदा मुस्लिम महिला ने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता के लिए वाद किया। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया। पुरातन पंथी मुसलमानों ने इसे ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में हस्तक्षेप माना। कुछ मुस्लिम नेताओं की माँग पर सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक से जुड़े अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिसने न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया। इस कार्य का अनेक महिला संगठनों, अनेक मुस्लिम समूहों तथा अधिकांश बुद्धिजीवियों ने विरोध किया। भाजपा ने इसे अल्पसंख्यक समुदाय को दी गयी अनावश्यक छूट और तुष्टिकरण बताकर आलोचना की।

‘क्या आप जानते हैं?’ बॉक्स

28 नवंबर 1858 की एक बहुत ही रोचक घटना है, जब निहंग सिखों ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा बलपूर्वक निकाले जाने से पहले, जन्मभूमि स्थल पर नियंत्रण कर लिया तथा पूजन और हवन किया।

8 अयोध्या विषय और 9 नवम्बर 2019

कालक्रम और निर्णय

प्रकृति। यह विषय देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास में गहराई तक बैठा हुआ था, जिसमें विभिन्न हितधारकों के भिन्न दृष्टिकोण थे। यह श्री राम के जन्मस्थान, जो पवित्रतम धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है, के स्वामित्व से संबंधित विवाद था।

1528 और उसके बाद। 1528 से प्रारम्भ होकर 500 वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में अनेक संघर्ष लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के गजेटियर में अंकित हैं। 1528 में जन्मस्थान पर तीन-गुम्बद ढाँचा निर्मित किया गया, पर उसके आन्तरिक और बाह्य भागों में हिन्दू प्रतीकों तथा अवशेषों को प्रत्यक्ष देखा जा सकता था। इसलिए यह विषय प्राचीन सभ्यता में राष्ट्रीय गौरव से जुड़ गया।

1949 और 1986। कालान्तर में यह एक लम्बे विधिक विवाद में परिणत हुआ; न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने के कारण 1949 में ढाँचे को सील कर दिया गया। 1986 में फैजाबाद (अब अयोध्या) जिला न्यायालय के एक निर्णय से महत्वपूर्ण मोड़ आया: ताला खोल दिया गया और लोगों को वहाँ पूजा की अनुमति दे दी गई। मन्दिर का शिलान्यास हुआ, किन्तु आगे का निर्माण प्रतिबन्धित रहा। हिन्दू समुदाय ने इसे अपनी चिन्ताओं की उपेक्षा समझा, जबकि मुस्लिम समाज ढाँचे पर अधिकार के आश्वासन की माँग करता रहा।

1992। तनाव बढ़ा और अनगिनत विवाद तथा विधिक संघर्ष हुए। 1992 में ढाँचे के ध्वंस के बाद कुछ आलोचकों ने माना कि इस घटना ने भारतीय लोकतन्त्र के सिद्धान्तों को बड़ी चुनौती दी है।

समाधान (किताब का उपशीर्षक: ‘विधिक कार्यवाही से मैत्रीपूर्ण स्वीकृति’)। अध्याय कहता है कि किसी भी समाज में विवाद होते ही हैं, पर बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक लोकतांत्रिक समाज में विवादों का हल सामान्यतः विधि की उचित प्रक्रिया से होता है। न्यायालय में सुनवाइयाँ, मध्यस्थता के प्रयास तथा जन आन्दोलन जैसी अनेक प्रक्रियाओं के बाद अन्ततः 9 नवम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के 5-0 के निर्णय से अयोध्या विवाद का समाधान हुआ, जिसने विरोधाभासी हितों का सामंजस्यपूर्ण समाधान किया।

निर्णय ने क्या किया। विवादित स्थल श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को राम मन्दिर निर्माण के लिए आवंटित; और संबंधित सरकार को सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को एक मस्जिद निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटित करने का आदेश।

आधार और आकलन। यह विषय पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे साक्ष्यों के आधार पर सुलझाया गया। अध्याय के अनुसार समाज में व्यापक रूप से निर्णय को उत्सवपूर्वक लिया गया, और यह एक उदाहरण है जिसमें एक संवेदनशील विषय पर सर्वसम्मति का निर्माण किया गया।

दो उद्धृत अंश। अध्याय निर्णय (9 नवम्बर 2019) के दो अंश छापता है, पृष्ठ 920 और पृष्ठ 1045 के हवाले से। पहला अंश कहता है कि संविधान के हृदय में कानून के शासन द्वारा कायम समानता के प्रति प्रतिबद्धता है, कि सभी धर्मों के नागरिक कानून के समक्ष समान हैं, और कि संविधान एक धर्म और दूसरे धर्म की आस्था और विश्वास के बीच अंतर नहीं करता है। दूसरा अंश निर्णय का वह निष्कर्ष है जो मस्जिद के निर्माण से पहले और उसके बाद से हिंदुओं की आस्था तथा विश्वास के बारे में, दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर, दर्ज किया गया है।

9 2004 से 2019: चुनाव और सरकारें

एक सिलसिले में

2004। कांग्रेस पूरे ज़ोर के साथ गठबंधन में शामिल हुई। राजग की हार, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार, नेतृत्व कांग्रेस का, समर्थन वाम मोर्चा का। एक हद तक कांग्रेस का पुनरुत्थान: 1991 के बाद पहली बार सीटें बढ़ीं। राजग और संप्रग को मिले कुल वोटों का अंतर बहुत कम था।

2008 और 2009। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर जुलाई 2008 में वाम दलों ने समर्थन वापस लिया, फिर भी संप्रग सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव; कांग्रेस 145 से 206; डॉ. मनमोहन सिंह ने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ली।

2013 और 2014। सितंबर 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी (तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री) को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। 2014 के 16वें लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत, अपने दम पर 282 सीटें, 30 साल बाद एकल पार्टी बहुमत; फिर भी सहयोगियों के साथ राजग सरकार का विकल्प। अध्याय इसे भारतीय राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक क्षण कहता है, और जोड़ता है कि इस सरकार ने सामाजिक क्षेत्र, विदेश नीति और आर्थिक नीति में तेज़ी से निर्णय लिए।

2019। भाजपा फिर 303 सीटों के साथ विजयी। अध्याय का वाक्य: जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है तब भी गठबंधन की राजनीति की मान्यता अभी भी प्रासंगिक है। और: इस तरह दलीय प्रणाली सत्तर के दशक की तुलना में एकदम ही बदल गई है।

10 ‘एक नयी सहमति का उदय’ और ‘बढ़ती सहमति’ की चार बातें

किताब का उपशीर्षक ‘एक नयी सहमति का उदय’ है। वहाँ अध्याय कहता है कि 1989 के बाद की अवधि को कभी-कभार कांग्रेस के पतन और भाजपा के अभ्युदय की अवधि भी कहा जाता है, और इस दौर की राजनीति का जटिल चरित्र समझने के लिए कांग्रेस तथा भाजपा की चुनावी हार-जीत की तुलना करनी पड़ेगी। इसके बाद ‘बढ़ती सहमति’ में चार बातें गिनाई जाती हैं।

# सहमति किस पर अध्याय क्या कहता है
1 नयी आर्थिक नीति कई समूह इसके खिलाफ़ हैं, पर ज़्यादातर दल पक्ष में हैं और मानते हैं कि देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा
2 पिछड़ी जातियों के दावे सभी दल शिक्षा और रोज़गार में आरक्षण के पक्ष में; ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को सत्ता में समुचित हिस्सेदारी देने को तैयार
3 प्रांतीय दलों की भूमिका प्रांतीय और राष्ट्रीय दल का भेद लगातार कम; प्रांतीय दल केंद्रीय सरकार में साझीदार बने और पिछले बीस सालों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई
4 विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी पर ज़ोर; उदाहरण, अधिकतर दल भाजपा की ‘हिंदुत्व’ विचारधारा से सहमत न होते हुए भी गठबंधन में शामिल हुए और पाँच साल चलने वाली सरकार बनाई

11 संख्याओं वाले दो चित्र

17वीं लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति

भारतीय जनता पार्टी 303 · अन्य पार्टियाँ 108 · इंडियन नेशनल कांग्रेस 52 · द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डी.एम.के.) 24 · शिवसेना 18 · जनता दल यूनाईटेड (जद-यू) 16 · बीजू जनता दल (बीजेडी) 12 · बहुजन समाज पार्टी (बसपा) 10। स्रोत: लोकसभा की वेबसाइट।

ध्यान दें: यह चित्र सिर्फ़ सात दलों के नाम देता है, इसलिए यहाँ ‘अन्य’ का आँकड़ा 108 है। अध्याय की बड़ी तालिका अठारह दलों के नाम देती है, इसलिए वहाँ 2019 के स्तंभ में ‘अन्य’ का आँकड़ा 82 है। दोनों सही हैं, बस समूह अलग-अलग हैं।

सन् 2004 से संसद में दलीय स्थिति (चारों स्तंभ 543 पर पूरे होते हैं)
पार्टी 2004 2009 2014 2019
आम आदमी पार्टी — — 4 1
ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम 0 9 37 1
बहुजन समाज पार्टी 19 21 — 10
भारतीय जनता पार्टी 138 116 282 303
बीजू जनता दल 11 14 20 12
कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सवादी 43 16 9 3
कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया 10 4 1 2
द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम 16 18 — 24
इंडियन नेशनल कांग्रेस 145 206 44 52
जनता दल-यूनाइटेड 8 20 2 16
जनता दल-सेक्यूलर 3 3 2 1
लोक जनशक्ति पार्टी 4 — 6 6
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी 9 9 6 5
राष्ट्रीय जनता दल 24 4 4 —
राष्ट्रीय लोकदल 3 5 1 —
समाजवादी पार्टी 36 23 5 5
शिरोमणि अकाली दल 8 4 4 2
शिवसेना 12 11 18 18
अन्य 54 60 98 82
कुल 543 543 543 543

संसद सदस्यों की कुल संख्या 543 (राज्यों से 530 और केंद्रशासित प्रदेशों से 13)। स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग।

12 बॉक्स, कैप्शन और छोटी चीज़ें जो अकसर छूट जाती हैं

इन्हें भी एक बार पढ़ लीजिए

1. 1990 का चरखी वाला कार्टून। नब्बे के दशक में दलों की अफ़रा-तफ़री को ऊँची चरखी की सवारी जैसा दिखाया गया। कार्टून में सवार नौ नेता: राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह, एल.के. आडवाणी, चंद्रशेखर, ज्योति बसु, एन.टी. रामाराव, देवीलाल, पी.के. महंत और के. करुणानिधि।

2. सीताराम केसरी वाला कैप्शन। कांग्रेस नेता सीताराम केसरी ने देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।

3. ‘नयी आर्थिक नीति’ वाला कार्टून। तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को नयी आर्थिक नीति के शुरुआती दौर में दिखाता एक कार्टून। साभार: आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ़ इंडिया।

4. वी.पी. सिंह वाला कैप्शन। वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को वाम मोर्चा (प्रतीक रूप में ज्योति बसु) और भाजपा (प्रतीक रूप में एल.के. आडवाणी) ने समर्थन दिया था। साभार: सुधीर तैलंग।

5. बहुदलीय सफ़र वाला कार्टून। एक पार्टी के प्रभुत्व के दौर से लेकर बहुदलीय गठबंधन प्रणाली तक के सफ़र पर एक कार्टूनिस्ट की नज़र। साभार: अजीत मैनन, इंडिया टुडे।

6. अन्य चित्र। मंडलीकरण पर एक प्रतिक्रिया; मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने पर जगह-जगह हुए विरोध प्रदर्शन; समरसता का संदेश देता एक विज्ञापन।

7. गतिविधि (खोज-बीन)। अपने माता-पिता से 1990 के दशक के बाद की घटनाओं के बारे में पूछें, समूह में एक व्यापक सूची बनाएँ, देखें किस घटना का ज़िक्र ज़्यादा आया, और उसकी तुलना अध्याय में गिनाए गए बदलावों से करें।

8. समापन वाला चर्चा-बिंदु। भारत की आज़ादी के आसपास कई अन्य देश भी आज़ाद हुए और उन्होंने लोकतंत्र अपनाया। भारत सामाजिक समानता और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने में एक महान भूमिका निभाते हुए एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में उभरा, जबकि उनमें से कुछ देशों में ऐसा नहीं हुआ।

9. सुझाए गए स्रोत। लोकसभा की वेबसाइट (17वीं लोकसभा के सदस्यों का विस्तृत अध्ययन), भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट (2009 और 2019 के प्रदर्शन की तुलना), और प्रधानमंत्रियों की जानकारी वाली सरकारी वेबसाइट।

13 अध्याय का अपना समापन

एक नज़र में

अध्याय कहता है कि ये सभी महत्त्वपूर्ण बदलाव हैं और आगामी राजनीति इन्हीं के दायरे में आकार लेगी। कांग्रेस के एक प्रभावशाली पार्टी बनकर उभरने से चलकर अब हम एक ऐसे पड़ाव पर हैं, जहाँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहीं ज़्यादा तेज़ है, लेकिन इसी प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच मुख्य दलों में कुछेक मसलों पर सहमति है। दूसरी तरफ़ जन आंदोलन और संगठन विकास के नए रूप, स्वप्न और तरीकों की पहचान कर रहे हैं। गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मज़दूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले जन आंदोलनों के ज़रिए राजनीतिक एजेंडे पर आ रहे हैं और ये आंदोलन राज्य को उसकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं। इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के संदर्भ में न्याय तथा लोकतंत्र के मुद्दे उठा रहे हैं। अध्याय का अंतिम वाक्य यह भरोसा जताता है कि भारत में लोकतांत्रिक राजनीति जारी रहेगी।

अध्याय की चार शुरुआती जिज्ञासाएँ, जिनके जवाब वह ख़ुद नहीं देता पर पूछना सिखाता है: गठबंधन की राजनीति के उदय का लोकतंत्र पर क्या असर पड़ा; मंडलीकरण क्या है और उसने राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वभाव कैसे बदला; राम जन्मभूमि आंदोलन ने क्या विरासत छोड़ी; और नीतिगत मामलों पर बनी सर्व-सहमति का राजनीतिक विकल्पों के चयन पर क्या असर हुआ।