इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. सुरक्षा का बुनियादी अर्थ क्या है?
उत्तर: सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है ख़तरे से आज़ादी।
प्र. ‘अपरोध’ किसे कहते हैं?
उत्तर: सुरक्षा-नीति का वह पहलू, जिसका संबंध युद्ध की आशंका को रोकने से होता है, अपरोध कहलाता है।
प्र. ‘रक्षा’ किसे कहते हैं?
उत्तर: सुरक्षा-नीति का वह पहलू, जिसका संबंध युद्ध को सीमित रखने अथवा उसको समाप्त करने से होता है, रक्षा कहलाता है।
प्र. आतंकवाद की किताबी परिभाषा लिखिए।
उत्तर: आतंकवाद का आशय उस राजनीतिक ख़ून-ख़राबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है।
प्र. आप्रवासी और शरणार्थी में क्या अंतर है?
उत्तर: आप्रवासी वे हैं जो अपनी मर्ज़ी से स्वदेश छोड़ते हैं, जबकि शरणार्थी वे हैं जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण स्वदेश छोड़ने पर मजबूर होते हैं।
प्र. ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ किसे कहते हैं? किताब का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: जो लोग अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं, उन्हें आंतरिक रूप से विस्थापित जन कहा जाता है। उदाहरण: 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित।
प्र. भारत ने पहला परमाणु परीक्षण कब किया, और 1998 के परीक्षणों को सरकार ने किस तर्क से उचित ठहराया?
उत्तर: भारत ने पहला परमाणु परीक्षण सन् 1974 में किया। 1998 के परीक्षणों को भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से उचित ठहराया, क्योंकि दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं।
प्र. मानवता की सुरक्षा का संकीर्ण अर्थ कोफ़ी अन्नान ने किन शब्दों में रखा?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्रसंघ के भूतपूर्व महासचिव कोफ़ी अन्नान के शब्दों में इसका आशय है ‘व्यक्तियों और समुदायों को अंदरूनी ख़ून-ख़राबा से बचाना।’
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. सुरक्षा को ‘विवादग्रस्त धारणा’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि सुरक्षा की कोई एक, सबको मंज़ूर धारणा है ही नहीं। किताब दो सवाल उठाती है। पहला, क्या सदियों अथवा दशकों से विभिन्न समाजों में सुरक्षा की एकसमान धारणा चली आ रही है? ऐसा होना आश्चर्यजनक होगा, क्योंकि संसार में कितनी ही बातें रोज़ बदलती रहती हैं। दूसरा, क्या किसी एक ख़ास समय में विश्व के सभी समाजों में सुरक्षा की एक जैसी धारणा रहती है? यह बात भी हजम नहीं होती कि क़रीब 200 मुल्कों के 7 अरब लोग सुरक्षा की एक जैसी धारणा रखते हों। इसी वजह से किताब इसे भुलैयादार और विवादग्रस्त धारणा कहती है।
प्र. ‘केंद्रीय मूल्य’ क्या हैं, और उनसे जुड़ा कौन-सा सवाल किताब उठाती है?
उत्तर: केंद्रीय मूल्य जीवन की वे बुनियादी बातें हैं जिन पर चोट पड़ने को ही सुरक्षा का मसला माना जाता है। सुरक्षा विषयक अध्ययन करने वालों का कहना है कि केवल उन्हीं चीज़ों को सुरक्षा से जुड़ी चीज़ों का विषय बनाया जाय जिनसे जीवन के केंद्रीय मूल्यों को ख़तरा हो। इस पर किताब सवाल उठाती है कि केंद्रीय मूल्य आख़िर किसके, पूरे देश के या आम स्त्री-पुरुषों के, और क्या नागरिकों की नुमाइंदगी करने वाली सरकार हमेशा केंद्रीय मूल्यों का वही अर्थ ग्रहण करती है जो कोई साधारण नागरिक।
प्र. निरस्त्रीकरण क्या है? किताब के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर: निरस्त्रीकरण की माँग होती है कि सभी राज्य, चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ ख़ास किस्म के हथियारों से बाज़ आयें। उदाहरण: 1972 की जैविक हथियार संधि और 1997 की रासायनिक हथियार संधि, जिनमें ऐसे हथियार बनाना और रखना दोनों प्रतिबंधित कर दिए गए। 155 से ज़्यादा देशों ने जैविक हथियार संधि पर और 193 देशों ने रासायनिक हथियार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, और दोनों में सभी महाशक्तियाँ शामिल हैं।
प्र. अस्त्र-नियंत्रण क्या है? किताब की दो संधियों के नाम लिखिए।
उत्तर: अस्त्र-नियंत्रण के अंतर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ कायदे-कानूनों का पालन करना पड़ता है। किताब की संधियाँ: 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि, सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि-2, सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि, और 1968 की परमाणु अप्रसार संधि, जो एक अर्थ में अस्त्र-नियंत्रण संधि ही थी।
प्र. विश्वास बहाली के उपाय क्या हैं, और उनका मक़सद क्या है?
उत्तर: विश्वास बहाली की प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का फ़ैसला करते हैं। वे एक-दूसरे को अपने फ़ौजी मकसद तथा एक हद तक अपनी सैन्य योजनाओं के बारे में बताते हैं, यह भी बताते हैं कि उनके पास किस तरह के सैन्य-बल हैं और उन्हें कहाँ तैनात किया जा रहा है। इसका मक़सद प्रतिद्वन्द्वी को यह आश्वासन देना है कि औचक हमले की योजना नहीं बनायी जा रही, ताकि कोई देश ग़लतफ़हमी या ग़फ़लत में पड़कर जंग के लिए आमादा न हो जाए।
प्र. मानवाधिकारों की तीन कोटियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर: पहली कोटि राजनीतिक अधिकारों की है, जैसे अभिव्यक्ति और सभा करने की आज़ादी। दूसरी कोटि आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की है। तीसरी कोटि में उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार आते हैं। इस वर्गीकरण को लेकर व्यापक सहमति है, पर इस पर सहमति नहीं बन पायी कि इनमें से किसे सार्वभौम मानवाधिकार कहा जाए।
प्र. सहयोगमूलक सुरक्षा में बल-प्रयोग कब किया जा सकता है, और किस शर्त पर?
उत्तर: बल-प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी उन सरकारों से निबटने के लिए इसकी अनुमति दे सकती है जो अपनी ही जनता को मार रही हों, अथवा ग़रीबी, महामारी और प्रलयंकारी घटनाओं की मार झेल रही जनता के दुख-दर्द की उपेक्षा कर रही हों। शर्त यह है कि बल-प्रयोग सामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में किया जाए, न कि कोई एक देश अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी और स्वयंसेवी संगठनों समेत अन्यों की मर्ज़ी पर कान दिए बग़ैर अकेले यह रास्ता अख़्तियार करे।
प्र. वैश्विक तापवृद्धि सुरक्षा का मसला क्यों है? किताब के उदाहरणों से समझाइए।
उत्तर: क्योंकि वह पूरे देशों के अस्तित्व को ख़तरे में डाल सकती है और कोई भी देश इसका समाधान अकेले नहीं कर सकता। किताब का उदाहरण यह है कि अगर समुद्रतल दो मीटर ऊँचा उठता है तो बांग्लादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा, कमोबेश पूरा मालदीव सागर में समा जाएगा और थाइलैंड की 50 फ़ीसदी आबादी को ख़तरा पहुँचेगा। मालदीव इसीलिए वैश्विक तापवृद्धि को अपने अस्तित्व का ख़तरा मानता है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. सुरक्षा के परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार किसी राष्ट्र पर ख़तरा मंडराने पर उसके सामने कौन-से विकल्प होते हैं?
उत्तर: बुनियादी तौर पर तीन विकल्प होते हैं।
1. आत्मसमर्पण करना, यानी दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना।
2. युद्ध से होने वाले नाश को इस हद तक बढ़ाने के संकेत देना कि दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से बाज़ आये। यही अपरोध है।
3. युद्ध ठन जाय तो अपनी रक्षा करना, ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो सके और पीछे हट जाए, अथवा हमलावर को पराजित कर देना। यही रक्षा है।
किताब यह भी जोड़ती है कि कोई सरकार युद्ध में भले ही आत्मसमर्पण कर दे, पर वह इसे अपने देश की नीति के रूप में कभी प्रचारित नहीं करना चाहेगी। इसी कारण व्यवहार में सुरक्षा-नीति दो ही कामों से बनती है: अपरोध और रक्षा।
प्र. ‘शक्ति-संतुलन’ क्या है? कोई देश इसे कैसे कायम करता है?
उत्तर: शक्ति-संतुलन परंपरागत सुरक्षा-नीति का तीसरा तत्त्व है। कोई देश अपने अड़ोस-पड़ोस में देखने पर पाता है कि कुछ मुल्क छोटे हैं तो कुछ बड़े, और इसी से इशारा मिल जाता है कि भविष्य में किस देश से उसे ख़तरा हो सकता है। संभव है कोई पड़ोसी यह न कहे कि वह हमले की तैयारी में है, और हमले का कोई प्रकट कारण भी न जान पड़े; फिर भी यह देखकर कि वह देश बहुत ताकतवर है, यह भाँपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है। इसी वजह से हर सरकार दूसरे देश से अपने शक्ति-संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है।
कोई देश इसे इस तरह कायम करता है:
1. वह शक्ति-संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करता है।
2. ख़ास तौर पर उन देशों के साथ, जो नज़दीक हों, जिनके साथ अनबन हो, या जिनके साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो।
3. यह कवायद ज़्यादातर अपनी सैन्य-शक्ति बढ़ाने की होती है।
4. साथ ही आर्थिक और प्रौद्योगिकी की ताकत भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सैन्य-शक्ति का यही आधार है।
प्र. सैन्य गठबंधन के क्या उद्देश्य होते हैं? गठबंधन बदल क्यों जाते हैं, किताब के उदाहरण से समझाइए।
उत्तर: गठबंधन में कई देश शामिल होते हैं और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं। यही उसका मूल उद्देश्य है। इसके साथ किताब तीन बातें और जोड़ती है।
1. अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से एक औपचारिक रूप मिलता है, और ऐसे गठबंधनों में यह बात बिलकुल स्पष्ट रहती है कि ख़तरा किससे है।
2. देश गठबंधन इसलिए बनाते हैं ताकि किसी दूसरे देश अथवा गठबंधन की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ा सकें।
3. गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं, और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।
किताब का अपना उदाहरण यह है कि संयुक्त राज्य अमरीका ने सन् 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितंबर 2001 के दिन उस पर हमला किया, तो उसने इन्हीं इस्लामी उग्रवादियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।
प्र. एशिया और अफ़्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के सामने खड़ी सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोपीय देशों के मुक़ाबले किन दो मायनों में विशिष्ट थीं?
उत्तर: किताब के अनुसार ये चुनौतियाँ दो मायनों में विशिष्ट थीं।
1. इन देशों को अपने पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका थी। अनेक नव-स्वतंत्र देश संयुक्त राज्य अमरीका या सोवियत संघ अथवा औपनिवेशिक ताकतों से कहीं ज़्यादा अपने पड़ोसी देशों से आशंकित थे। इनके बीच सीमा रेखा और भूक्षेत्र अथवा आबादी पर नियंत्रण को लेकर, या एक-एक करके सभी सवालों पर झगड़े हुए।
2. इन्हें अंदरूनी सैन्य-संघर्ष की भी चिंता करनी थी। अलग राष्ट्र बनाने पर तुले भीतर के अलगाववादी आंदोलनों से भी इन देशों को ख़तरा था। कोई पड़ोसी मुल्क ऐसे अलगाववादी आंदोलन को हवा दे अथवा उसकी सहायता करे, तो दो पड़ोसी देशों के बीच तनाव की स्थिति बनती थी, यानी बाहरी और भीतरी ख़तरे आपस में घुल-मिल जाते थे।
इसी संदर्भ में किताब यह आँकड़ा देती है कि विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं, और सन् 1946 से 1991 के बीच गृह युद्धों की संख्या में बारहगुनी वृद्धि हुई, जो पिछले 200 वर्षों में सबसे लंबी छलांग है। इस तरह पड़ोसी देशों से युद्ध और आंतरिक संघर्ष, दोनों नव-स्वतंत्र देशों के सामने सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थे।
प्र. मानवता की सुरक्षा के संकीर्ण, व्यापक और व्यापकतम अर्थ में क्या अंतर है?
उत्तर: मानवता की सुरक्षा के सभी पैरोकार मानते हैं कि इसका प्राथमिक लक्ष्य व्यक्तियों की संरक्षा है। मतभेद इस बात पर है कि ठीक-ठीक ऐसे कौन-से ख़तरे हैं जिनसे व्यक्तियों को बचाया जाना चाहिए।
1. संकीर्ण अर्थ: ज़ोर व्यक्तियों को हिंसक ख़तरों यानी ख़ून-ख़राबे से बचाने पर होता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के भूतपूर्व महासचिव कोफ़ी अन्नान के शब्दों में इसका आशय है ‘व्यक्तियों और समुदायों को अंदरूनी ख़ून-ख़राबा से बचाना।’
2. व्यापक अर्थ: ख़तरों की सूची में अकाल, महामारी और आपदाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि युद्ध, जन-संहार और आतंकवाद साथ मिलकर जितने लोगों को मारते हैं, उससे कहीं ज़्यादा लोग अकाल, महामारी और प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं।
3. व्यापकतम अर्थ: इसमें आर्थिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा की सुरक्षा को भी शामिल किया जाता है। तनिक अलग अंदाज़ में कहें तो इस नज़रिए में ज़ोर ‘अभाव से मुक्ति’ और ‘भय से मुक्ति’ पर दिया जाता है।
प्र. किसी मसले को ‘सुरक्षा का मसला’ कहलाने के लिए किताब कौन-सा न्यूनतम मानक तय करती है? उसके तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर: किताब पहले चेतावनी देती है कि सुरक्षा की धारणा में विस्तार करने का यह मतलब नहीं कि हम हर तरह के कष्ट या बीमारी को सुरक्षा विषयक चर्चा के दायरे में शामिल कर लें। ऐसा करने पर धारणा में संगति नहीं रह जाती और हर चीज़ सुरक्षा का मसला हो सकती है। इसी कारण एक सर्व स्वीकृत न्यूनतम मानक ज़रूरी है: अगर किसी मसले से संदर्भी, यानी राज्य अथवा जनसमूह, के अस्तित्व को ख़तरा हो रहा हो, तो उसे सुरक्षा का मसला कहा जा सकता है, चाहे इस ख़तरे की प्रकृति कुछ भी हो।
किताब के तीन उदाहरण:
1. मालदीव को वैश्विक तापवृद्धि से ख़तरा है, क्योंकि समुद्र तल के ऊँचा उठने से उसका ज़्यादातर हिस्सा डूब जाएगा।
2. दक्षिणी अफ़्रीकी देशों में एचआईवी-एड्स से गंभीर ख़तरा है, क्योंकि वहाँ हर 6 वयस्क व्यक्तियों में एक इस रोग से पीड़ित है; बोत्सवाना की हालत सबसे बदतर है, जहाँ 3 में से एक व्यक्ति पीड़ित है।
3. सन् 1994 में रवांडा की तुत्सी जनजाति के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराया, क्योंकि प्रतिद्वन्द्वी हुतु जनजाति ने कुछ ही हफ़्तों में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को मार डाला।
इससे पता चलता है कि सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा भी पारंपरिक धारणा के समान स्थानीय संदर्भों के अनुकूल परिवर्तनशील है।
प्र. सहयोगमूलक सुरक्षा क्या है? इसमें कौन-कौन भागीदार हो सकते हैं?
उत्तर: सुरक्षा पर मंडराते अपारंपरिक ख़तरों से निपटने के लिए सैन्य-संघर्ष की नहीं, बल्कि आपसी सहयोग की ज़रूरत होती है, और इसी को सहयोगमूलक सुरक्षा कहते हैं। आतंकवाद से लड़ने अथवा मानवाधिकारों को बहाल करने में भले ही सैन्य-बल की कोई भूमिका हो, और वहाँ भी वह एक सीमा तक ही कारगर हो सकता है, लेकिन ग़रीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी, यह कहना मुश्किल है। किताब जोड़ती है कि ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।
सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर का हो सकता है, और यह ख़तरे की प्रकृति तथा देशों की इच्छा और सामर्थ्य पर निर्भर करेगा।
भागीदार, देशों के अतिरिक्त:
1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन, जैसे संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष।
2. स्वयंसेवी संगठन, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, रेड क्रॉस, निजी संगठन तथा दानदाता संस्थाएँ, धार्मिक संगठन, मज़दूर संगठन, और सामाजिक तथा विकास संगठन।
3. व्यवसायिक संगठन और निगम।
4. जानी-मानी हस्तियाँ, जैसे नेल्सन मंडेला और मदर टेरेसा।
प्र. भारत की सुरक्षा-नीति का दूसरा घटक क्या है? उसे विस्तार से लिखिए।
उत्तर: दूसरा घटक है अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कायदों और संस्थाओं को मज़बूत करना। इसके अंतर्गत किताब ये बातें गिनाती है।
1. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई एकता, विउपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण के प्रयासों की हिमायत की।
2. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्रसंघ को अंतिम पंच मानने पर ज़ोर दिया।
3. भारत ने हथियारों के अप्रसार के संबंध में एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति चलाने की पहलकदमी की, जिसमें हर देश को सामूहिक संहार के हथियारों, यानी परमाणु, जैविक और रासायनिक हथियारों से संबद्ध बराबर के अधिकार और दायित्व हों।
4. भारत ने नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग उठायी।
5. सबसे बड़ी बात यह कि दो महाशक्तियों की खेमेबाज़ी से अलग उसने गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व-शांति का तीसरा विकल्प सामने रखा।
6. भारत उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें वैश्विक तापवृद्धि पर काबू रखने के लिए ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन कम करने के दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
7. सहयोगमूलक सुरक्षा की पहलकदमियों के समर्थन में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांतिबहाली के मिशनों में भेजी है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. परंपरागत और अपारंपरिक सुरक्षा में क्या अंतर है? गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना इनमें से किस कोटि में आता है?
उत्तर: दोनों धारणाएँ चार बातों पर अलग हो जाती हैं: सुरक्षा किसकी, किन चीज़ों की, किन ख़तरों से, और किन तरीकों से।
1. संदर्भी (सुरक्षा किसकी): परंपरागत धारणा में संदर्भी भूक्षेत्र और संस्थाओं सहित राज्य है। अपारंपरिक धारणा में यह दायरा बड़ा हो जाता है, और उसका जवाब है कि सिर्फ़ राज्य ही नहीं, व्यक्तियों और समुदायों या कहें कि समूची मानवता को सुरक्षा की ज़रूरत है। इसी कारण इसे मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व-रक्षा कहा जाता है।
2. ख़तरे की प्रकृति: परंपरागत धारणा में सबसे बड़ा ख़तरा सैन्य ख़तरा है, जिसका स्रोत कोई दूसरा मुल्क होता है और जो संप्रभुता, स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय अखंडता को निशाना बनाता है। अपारंपरिक धारणा में मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक ख़तरे शामिल हैं, जैसे आतंकवाद, मानवाधिकारों का हनन, वैश्विक निर्धनता, शरणार्थियों का पलायन और महामारियाँ।
3. तरीके: परंपरागत धारणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा उसकी आशंका से जुड़ी है, और उसमें माना जाता है कि सैन्य बल से ही सुरक्षा को ख़तरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा कायम रखी जा सकती है। फिर भी वह देशों के बीच सहयोग की संभावना से इन्कार नहीं करती, और किताब के अनुसार इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं निरस्त्रीकरण, अस्त्र-नियंत्रण तथा विश्वास की बहाली। अपारंपरिक धारणा में ज़ोर सहयोगमूलक सुरक्षा पर है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय संगठन, स्वयंसेवी संगठन, निगम और जानी-मानी हस्तियाँ तक भागीदार होते हैं, और बल-प्रयोग सिर्फ़ अंतिम उपाय है।
4. एक साझी बात भी है: दोनों धारणाएँ स्थानीय संदर्भों के अनुकूल परिवर्तनशील हैं।
गठबंधनों का निर्माण और उनको बनाये रखना परंपरागत सुरक्षा की कोटि में आता है। किताब उसे परंपरागत सुरक्षा-नीति का चौथा तत्त्व बताती है, क्योंकि गठबंधन का पूरा मक़सद सैन्य हमले को रोकना अथवा उससे रक्षा करना है।
प्र. पारंपरिक सुरक्षा की धारणा में देशों के बीच सहयोग के कौन-से रूप स्वीकार किए गए हैं? हर एक को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: सुरक्षा की परंपरागत धारणा इस संभावना से इनकार नहीं करती कि देशों के बीच किसी न किसी रूप में सहयोग हो। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण तीन हैं।
1. निरस्त्रीकरण: इसकी माँग होती है कि सभी राज्य, चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ ख़ास किस्म के हथियारों से बाज़ आयें। उदाहरण के लिए, 1972 की जैविक हथियार संधि तथा 1997 की रासायनिक हथियार संधि में ऐसे हथियार बनाना और रखना प्रतिबंधित कर दिया गया है। 155 से ज़्यादा देशों ने जैविक हथियार संधि पर और 193 देशों ने रासायनिक हथियार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, और इन दोनों संधियों पर दस्तख़त करने वालों में सभी महाशक्तियाँ शामिल हैं। लेकिन महाशक्तियाँ, यानी अमरीका तथा सोवियत संघ, सामूहिक संहार के अस्त्र यानी परमाण्विक हथियार का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती थीं, इसलिए दोनों ने अस्त्र-नियंत्रण का सहारा लिया।
2. अस्त्र-नियंत्रण: इसके अंतर्गत हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ कायदे-कानूनों का पालन करना पड़ता है। सन् 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि ने अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा-कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका; संधि में दोनों देशों को सीमित संख्या में ऐसी रक्षा-प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी, लेकिन इस संधि ने उनके व्यापक उत्पादन से रोक दिया। इसके अलावा दोनों ने सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि-2 और सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि पर हस्ताक्षर किए। परमाणु अप्रसार संधि (1968) भी एक अर्थ में अस्त्र-नियंत्रण संधि ही थी, क्योंकि इसने परमाण्विक हथियारों के उपार्जन को कायदे-कानून के दायरे में ला खड़ा किया। जिन देशों ने सन् 1967 से पहले परमाणु हथियार बना लिये थे या उनका परीक्षण कर लिया था, उन्हें इन हथियारों को रखने की अनुमति दी गई, और जो देश 1967 तक ऐसा नहीं कर पाये थे, उन्हें ऐसे हथियार हासिल करने के अधिकार से वंचित किया गया। इस संधि ने परमाण्विक आयुधों को समाप्त तो नहीं किया, लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या ज़रूर कम की।
3. विश्वास की बहाली: इस प्रक्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का फ़ैसला करते हैं। दो देश एक-दूसरे को अपने फ़ौजी मकसद तथा एक हद तक अपनी सैन्य योजनाओं के बारे में बताते हैं, यह भी बताते हैं कि उनके पास किस तरह के सैन्य-बल हैं और उन्हें कहाँ तैनात किया जा रहा है। इस तरह वे अपने प्रतिद्वन्द्वी को आश्वासन देते हैं कि उनकी तरफ़ से औचक हमले की योजना नहीं बनायी जा रही। संक्षेप में, यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि प्रतिद्वन्द्वी देश किसी ग़लतफ़हमी या ग़फ़लत में पड़कर जंग के लिए आमादा न हो जाएँ।
इनके साथ किताब हिंसा की सीमा की बात भी करती है: ‘न्याय-युद्ध’ की यूरोपीय परंपरा के विस्तार के रूप में आज लगभग पूरा विश्व मानता है कि युद्ध केवल उचित कारणों, यानी आत्म-रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही होना चाहिए, और उसमें साधनों का इस्तेमाल भी सीमित होना चाहिए।
प्र. ‘ख़तरे के नये स्रोत’ खंड में किताब किन ख़तरों की चर्चा करती है? आतंकवाद, मानवाधिकार और वैश्विक निर्धनता को विस्तार से लिखिए।
उत्तर: सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा के दो पक्ष हैं, मानवता की सुरक्षा और विश्व सुरक्षा, और दोनों ख़तरों की बदलती प्रकृति पर ज़ोर देते हैं। इसी खंड में किताब आतंकवाद, मानवाधिकार, वैश्विक निर्धनता, प्रवास तथा शरणार्थी और महामारियों की चर्चा करती है।
1. आतंकवाद: इसका आशय उस राजनीतिक ख़ून-ख़राबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज़्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं। कोई राजनीतिक संदर्भ या स्थिति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल-प्रयोग अथवा बल-प्रयोग की धमकी देकर बदलना चाहते हैं। जनमानस को आतंकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया जाता है, और आतंकवाद नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के ख़िलाफ़ करता है। चिर-परिचित उदाहरण हैं विमान-अपहरण अथवा रेलगाड़ी, होटल, बाज़ार जैसी भीड़ भरी जगहों पर बम लगाना। सन् 2001 के 11 सितंबर को आतंकवादियों ने अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला बोला, और इसके बाद से दूसरे मुल्क तथा वहाँ की सरकारें आतंकवाद पर ज़्यादा ध्यान देने लगी हैं। बहरहाल, आतंकवाद कोई नयी परिघटना नहीं है; गुजरे वक़्त में उसकी अधिकांश घटनाएँ मध्यपूर्व, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्षिण एशिया में हुईं।
2. मानवाधिकार: इन्हें तीन कोटियों में रखा गया है। पहली कोटि राजनीतिक अधिकारों की है, जैसे अभिव्यक्ति और सभा करने की आज़ादी; दूसरी आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की; और तीसरी में उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार आते हैं। इस वर्गीकरण को लेकर व्यापक सहमति है, पर इस बात पर सहमति नहीं बन पायी कि इनमें से किस कोटि के अधिकारों को सार्वभौम मानवाधिकार कहा जाए, या उल्लंघन की स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को क्या करना चाहिए। 1990 के दशक से रवांडा में जनसंहार, कुवैत पर इराक़ का हमला और पूर्वी तिमूर में इंडोनेशियाई सेना के रक्तपात जैसी घटनाओं के कारण यह बहस चल पड़ी है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ को हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। कुछ का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का घोषणापत्र अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को अधिकार देता है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हथियार उठाये। दूसरी तरफ़ कुछ का तर्क है कि संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निर्धारित होता हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ किस मामले में कार्रवाई करेगा और किसमें नहीं।
3. वैश्विक निर्धनता: विश्व की जनसंख्या फ़िलहाल 760 करोड़ है और यह आँकड़ा 21वीं सदी के मध्य तक 1000 करोड़ हो जाएगा। कुल जनसंख्या-वृद्धि का 50 फ़ीसदी सिर्फ़ 6 देशों, यानी भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में घटित हो रहा है। अनुमान है कि अगले 50 सालों में सबसे ग़रीब देशों में जनसंख्या तीन गुनी बढ़ेगी, जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ति उच्च आय और जनसंख्या की कम वृद्धि धनी देशों को और धनी बनाती है, जबकि निम्न आय और तीव्र वृद्धि मिलकर ग़रीब देशों को और ग़रीब बनाते हैं। विश्वस्तर पर यह असमानता उत्तरी गोलार्द्ध के देशों को दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से अलग करती है, और दक्षिण गोलार्द्ध के भीतर भी असमानता अच्छी-ख़ासी बढ़ी है। उदाहरण के लिए, दुनिया में सबसे ज़्यादा सशस्त्र संघर्ष अफ़्रीका के सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं, जो दुनिया का सबसे ग़रीब इलाक़ा है, और 21वीं सदी के शुरुआती समय में इस इलाके के युद्धों में शेष दुनिया की तुलना में कहीं ज़्यादा लोग मारे गए।
प्र. प्रवास, शरणार्थी और महामारियाँ सुरक्षा के मसले कैसे बन जाते हैं? किताब के आँकड़ों सहित समझाइए।
उत्तर: 1. प्रवास और उसके तीन वर्ग: दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में मौजूद ग़रीबी के कारण अधिकाधिक लोग बेहतर जीवन, ख़ासकर आर्थिक अवसरों की तलाश में उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में प्रवास कर रहे हैं, और इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद उठ खड़ा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय कायदे-कानून आप्रवासी और शरणार्थी में भेद करते हैं। आप्रवासी वे हैं जो अपनी मर्ज़ी से स्वदेश छोड़ते हैं; शरणार्थी वे हैं जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण स्वदेश छोड़ने पर मजबूर होते हैं। सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि कोई राज्य शरणार्थियों को स्वीकार करेगा, लेकिन उन पर आप्रवासियों को स्वीकारने की बाध्यता नहीं होती। जो लोग अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं, उन्हें आंतरिक रूप से विस्थापित जन कहा जाता है, और किताब का उदाहरण 1990 के दशक के शुरुआती सालों में कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित हैं।
2. युद्ध और शरणार्थी का रिश्ता: विश्व का शरणार्थी-मानचित्र विश्व के संघर्ष-मानचित्र से लगभग हू-ब-हू मेल खाता है, क्योंकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सशस्त्र संघर्ष और युद्ध के कारण लाखों लोग शरणार्थी बने। 1990 से 1995 के बीच सत्तर देशों के मध्य कुल 93 युद्ध हुए और इसमें लगभग साढ़े 55 लाख लोग मारे गये। सन् 1990 के दशक में कुल 60 जगहों से शरणार्थी प्रवास करने को मजबूर हुए, और इसमें तीन को छोड़कर शेष सभी के मूल में सशस्त्र संघर्ष था। ‘विश्व में शरणार्थी (2017)’ के आँकड़ों के अनुसार विस्थापित लोगों को शरण देने में अफ़्रीका 30 प्रतिशत, मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ़्रीका 26 प्रतिशत, यूरोप 17 प्रतिशत, अमेरिका 16 प्रतिशत तथा एशिया और पैसिफ़िक 11 प्रतिशत का हिस्सा रखते हैं।
3. महामारियाँ: एचआईवी-एड्स, बर्ड फ़्लू और सार्स जैसी महामारियाँ आप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन और सैन्य-अभियानों के ज़रिए बड़ी तेज़ी से विभिन्न देशों में फैली हैं, और इनके फैलाव को रोकने में किसी एक देश की सफलता अथवा असफलता का प्रभाव दूसरे देशों के संक्रमण पर पड़ता है। अनुमान है कि 2003 तक पूरी दुनिया में 4 करोड़ लोग एचआईवी-एड्स से संक्रमित हो चुके थे, जिनमें दो-तिहाई अफ़्रीका में रहते थे और शेष के 50 फ़ीसदी दक्षिण एशिया में। उत्तरी अमरीका तथा दूसरे औद्योगिक देशों में 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में उपचार की नयी विधियों से मृत्यु-दर तेज़ी से घटी, लेकिन अफ़्रीका जैसे ग़रीब इलाके के लिए ये उपचार कीमत को देखते हुए आकाश-कुसुम कहे जाएँगे, जबकि एचआईवी-एड्स अफ़्रीका को ज़्यादा ग़रीब बनाने में महत्त्वपूर्ण घटक साबित हुआ है। एबोला वायरस, हैंटावायरस और हेपेटाइटिस-सी जैसी नयी महामारियाँ उभरी हैं, और कोरोना, टीबी, मलेरिया, डेंगी बुख़ार तथा हैजा जैसी पुरानी महामारियों ने औषधि-प्रतिरोधक रूप धारण कर लिया है। जानवरों की महामारियों के भारी आर्थिक दुष्प्रभाव होते हैं: ब्रिटेन ने ‘मैड-काऊ’ महामारी के कारण अरबों डॉलर का नुक़सान उठाया और बर्ड फ़्लू के कारण कई दक्षिण एशियाई देशों को मुर्ग़-निर्यात बंद करना पड़ा।
निष्कर्ष यह कि ये महामारियाँ बताती हैं कि देशों के बीच पारस्परिक निर्भरता बढ़ रही है, राष्ट्रीय सीमाएँ अब पहले की तुलना में कम सार्थक रह गई हैं, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है।
प्र. भारत की सुरक्षा रणनीति के चारों घटकों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर: भारत को पारंपरिक (सैन्य) और अपारंपरिक, दोनों तरह के ख़तरों का सामना करना पड़ा है, और ये ख़तरे सीमा के अंदर से भी उभरे और बाहर से भी। भारत की सुरक्षा-नीति के चार बड़े घटक हैं, और अलग-अलग वक़्त में इन्हीं घटकों के हेर-फेर से रणनीति बनायी गई है।
1. सैन्य-क्षमता को मज़बूत करना: क्योंकि भारत पर पड़ोसी देशों से हमले होते रहे हैं। पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में और चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया। दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं, इसलिए भारत के परमाणु परीक्षण करने के फ़ैसले (1998) को उचित ठहराते हुए भारतीय सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया था। भारत ने सन् 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया था।
2. अंतर्राष्ट्रीय कायदों और संस्थाओं को मज़बूत करना: जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई एकता, विउपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण के प्रयासों की हिमायत की, और अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्रसंघ को अंतिम पंच मानने पर ज़ोर दिया। भारत ने हथियारों के अप्रसार के संबंध में एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति चलाने की पहलकदमी की, जिसमें हर देश को सामूहिक संहार के हथियारों से संबद्ध बराबर के अधिकार और दायित्व हों। उसने नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग उठायी, और सबसे बड़ी बात यह कि दो महाशक्तियों की खेमेबाज़ी से अलग गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व-शांति का तीसरा विकल्प सामने रखा। भारत 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने वाले 160 देशों में शामिल है, और सहयोगमूलक सुरक्षा की पहलकदमियों के समर्थन में उसने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांतिबहाली के मिशनों में भेजी है।
3. अंदरूनी सुरक्षा-समस्याओं से निबटने की तैयारी: नगालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कई उग्रवादी समूहों ने समय-समय पर इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोशिश की। भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया है, जो विभिन्न समुदायों और जन-समूहों को अपनी शिकायतें खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी करने का मौक़ा देती है।
4. आर्थिक विकास के ज़रिए ग़रीबी और असमानता घटाना: भारत में अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास किए गए हैं कि बहुसंख्यक नागरिकों को ग़रीबी और अभाव से निजात मिले तथा नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता ज़्यादा न हो। ये प्रयास आंशिक रूप से सफल हुए हैं। फिर भी लोकतांत्रिक राजनीति से ऐसे अवसर उपलब्ध हैं कि ग़रीब और वंचित नागरिक अपनी आवाज़ उठा सकें, और लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित सरकार के ऊपर दबाव होता है कि वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए।
अध्याय इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि लोकतंत्र सिर्फ़ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज़्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।
प्र. सुरक्षा की परंपरागत धारणा का आंतरिक सुरक्षा से क्या रिश्ता है? दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस पहलू पर ज़ोर क्यों कम हुआ, और नव-स्वतंत्र देशों के लिए स्थिति कैसे अलग रही?
उत्तर: 1. रिश्ता: सुरक्षा की परंपरागत धारणा का ज़रूरी रिश्ता अंदरूनी सुरक्षा से भी है। सवाल सीधा है: अगर किसी देश के भीतर रक्तपात हो रहा हो अथवा होने की आशंका हो, तो वह देश सुरक्षित कैसे हो सकता है, और बाहर के हमलों से निपटने की तैयारी कैसे करेगा जबकि वह ख़ुद अपनी सीमा के भीतर सुरक्षित नहीं है?
2. ज़ोर क्यों कम हुआ: आंतरिक सुरक्षा ऐतिहासिक रूप से सरकारों का सरोकार बनी चली आ रही थी, लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ऐसे हालात और संदर्भ सामने आये कि वह पहले की तुलना में कहीं कम महत्त्व की चीज़ बन गई। सन् 1945 के बाद ऐसा जान पड़ा कि संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अंदर एकीकृत और शांतिसंपन्न हैं। अधिकांश यूरोपीय देशों, ख़ासकर ताकतवर पश्चिमी मुल्कों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों अथवा वर्गों से कोई गंभीर ख़तरा नहीं था, इसलिए इन देशों ने अपना ध्यान सीमापार के ख़तरों पर केंद्रित किया।
3. उनके बाहरी ख़तरे: दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्ध का दौर चला, जिसमें अमरीका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट और सोवियत संघ की अगुआई वाला साम्यवादी गुट आमने-सामने थे, और दोनों को एक-दूसरे से सैन्य हमले का भय था। इसके अतिरिक्त कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में उपनिवेशीकृत जनता से ख़ून-ख़राबे की चिंता सता रही थी, क्योंकि अब ये लोग आज़ादी चाहते थे। 1950 के दशक में फ़्रांस को वियतनाम में, और 1950 तथा 1960 के दशक में ब्रिटेन को केन्या में जूझना पड़ा।
4. नव-स्वतंत्र देशों की अलग स्थिति: उपनिवेशों ने 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध से आज़ाद होना शुरू किया। कुछ नव-स्वतंत्र देश यूरोपीय ताकतों के समान शीतयुद्धकालीन गुटों के सदस्य बन गए और उन्हें शीतयुद्ध की चिंता करनी पड़ी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जितने युद्ध हुए उनमें एक तिहाई के लिए शीतयुद्ध ज़िम्मेदार रहा, और इनमें से अधिकांश तीसरी दुनिया में हुए। कुछ उपनिवेशित मुल्कों को यह डर भी था कि उनके यूरोपीय औपनिवेशिक शासक कहीं उन पर फिर हमला न बोल दें, इसलिए उन्हें एक साम्राज्यवादी युद्ध से अपनी रक्षा की तैयारी करनी पड़ी। एशिया और अफ़्रीका के नव-स्वतंत्र देशों की चुनौतियाँ यूरोप से दो मायनों में विशिष्ट थीं: एक, पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका, और दूसरे, अंदरूनी सैन्य-संघर्ष की चिंता। भीतर के अलगाववादी आंदोलनों से भी ख़तरा था, और कोई पड़ोसी उन्हें हवा दे तो दोनों देशों के बीच तनाव बन जाता था। इस तरह पड़ोसी देशों से युद्ध और आंतरिक संघर्ष, दोनों नव-स्वतंत्र देशों के सामने सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थे।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक विश्व के सशस्त्र संघर्षों में कितने प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध हैं?
उत्तर: 95 प्रतिशत।
(ख) 1 अंक गृह युद्धों की बारहगुनी वृद्धि किन वर्षों के बीच हुई?
उत्तर: सन् 1946 से 1991 के बीच।
(ग) 2 अंक यह गद्यांश किस तरह दिखाता है कि बाहरी और भीतरी ख़तरे आपस में घुल-मिल जाते हैं?
उत्तर: अलगाववादी आंदोलन देश के भीतर का ख़तरा है, पर वह भीतर तक सीमित नहीं रहता। जब कोई पड़ोसी मुल्क ऐसे आंदोलन को हवा देता है या उसकी सहायता करता है, तो वही अंदरूनी मसला दो देशों के बीच तनाव में बदल जाता है। इसी वजह से किताब कहती है कि नव-स्वतंत्र देशों के सामने पड़ोसी देशों से युद्ध और आंतरिक संघर्ष, दोनों साथ-साथ सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थे।
(क) 1 अंक 11 सितंबर 2001 को आतंकवादियों ने अमरीका में किस इमारत पर हमला बोला?
उत्तर: वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर।
(ख) 1 अंक आतंकवाद के दो चिर-परिचित उदाहरण किताब में क्या दिए गए हैं?
उत्तर: विमान-अपहरण, और रेलगाड़ी, होटल, बाज़ार जैसी भीड़ भरी जगहों पर बम लगाना।
(ग) 2 अंक आतंकवाद नागरिकों को ही निशाना क्यों बनाता है, और क्या इसे सुरक्षा के लिए एक नयी चुनौती कहा जा सकता है?
उत्तर: नागरिकों को निशाना जनमानस को आतंकित करने के लिए बनाया जाता है, ताकि आम लोगों का असंतोष राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्ष में शामिल अन्य पक्ष के ख़िलाफ़ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सके। इसे बिलकुल नयी चुनौती नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किताब साफ़ कहती है कि आतंकवाद कोई नयी परिघटना नहीं है और गुजरे वक़्त में उसकी अधिकांश घटनाएँ मध्यपूर्व, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्षिण एशिया में हुईं। 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद जो बदला, वह घटना नहीं बल्कि उस पर दुनिया भर की सरकारों का ध्यान है।