कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 NCERT Solutions (प्रश्नावली के हल) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक समकालीन विश्व राजनीति के अध्याय 5 समकालीन विश्व में सुरक्षा की प्रश्नावली के सभी 12 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और कक्षा-गतिविधि के उत्तर प्रश्नावली के बाद दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

ध्यान दीजिए

इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी नहीं है। प्रश्न 2 में हिंदी संस्करण में छह पद हैं (क से च तक), अंग्रेज़ी में केवल पाँच। तीसरा पद (ग) ‘पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद’ हिंदी संस्करण में ही मिलता है, और उसके बाद के हर पद का अक्षर खिसक जाता है। प्रश्न 11 भी दोनों संस्करणों में अलग बात पूछता है: हिंदी पूछता है कि किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए, अंग्रेज़ी पूछता है कि भारत में किसको वरीयता दी गई है। नीचे के सभी उत्तर हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।

1 सुमेलन

प्रश्न 1

प्र. निम्नलिखित पदों को उनके अर्थ से मिलाएँ
(1) विश्वास बहाली के उपाय (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स – CBMs)
(2) अस्त्र-नियंत्रण
(3) गठबंधन
(4) निरस्त्रीकरण
(क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज
(ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया
(ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अपरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।
(घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश

उत्तर:
(1) विश्वास बहाली के उपाय: (ख) राष्ट्रों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं के आदान-प्रदान की नियमित प्रक्रिया।
(2) अस्त्र-नियंत्रण: (घ) हथियारों के निर्माण अथवा उनको हासिल करने पर अंकुश।
(3) गठबंधन: (ग) सैन्य हमले की स्थिति से निबटने अथवा उसके अपरोध के लिए कुछ राष्ट्रों का आपस में मेल करना।
(4) निरस्त्रीकरण: (क) कुछ खास हथियारों के इस्तेमाल से परहेज।

मिलान याद रखने का तरीक़ा: निरस्त्रीकरण में हथियार की किस्म ही छोड़ दी जाती है, जैसे 1972 की जैविक हथियार संधि और 1997 की रासायनिक हथियार संधि में हुआ। अस्त्र-नियंत्रण में हथियार छोड़े नहीं जाते, बस उन्हें बनाने या हासिल करने पर कायदे-कानून लगते हैं, जैसे 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि और परमाणु अप्रसार संधि में। विश्वास बहाली में हथियार का सवाल ही नहीं है, सिर्फ़ सूचनाओं का नियमित आदान-प्रदान है। और गठबंधन में कई देश मिलकर सैन्य हमले को रोकने या उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं।

2 वर्गीकरण

प्रश्न 2

प्र. निम्नलिखित में से किसको आप सुरक्षा का परंपरागत सरोकार/सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार/’खतरे की स्थिति नहीं’ का दर्ज़ा देंगे:
(क) चिकेनगुनिया/डेंगू बुखार का प्रसार
(ख) पड़ोसी देश से कामगारों की आमद
(ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद
(घ) अपने इलाके को राष्ट्र बनाने की माँग करने वाले समूह का उदय
(ङ) अपने इलाके को अधिक स्वायत्तता दिए जाने की माँग करने वाले समूह का उदय।
(च) देश की सशस्त्र सेना को आलोचनात्मक नज़र से देखने वाला अखबार।

उत्तर:
(क) सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार। किताब महामारी को ख़तरे के नये स्रोतों में गिनती है और डेंगी बुखार का नाम उन पुरानी बीमारियों में लेती है जिन्होंने औषधि-प्रतिरोधक रूप धारण कर लिया है। यह सैन्य ख़तरा नहीं है, पर मानवीय अस्तित्व पर चोट करता है।
(ख) सुरक्षा का अपारंपरिक सरोकार। दूसरे देश से कामगारों का आना सैन्य हमला नहीं है, इसलिए परंपरागत सरोकार नहीं। पर किताब आप्रवास को ख़तरे के नये स्रोतों वाले खंड में रखती है और बताती है कि इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद उठ खड़ा हुआ है।
(ग) ‘खतरे की स्थिति नहीं’। यहाँ ध्यान से पढ़िए: यह पड़ोसी राज्य है, पड़ोसी देश नहीं। अपने ही देश के एक राज्य से दूसरे राज्य में कामगारों का आना-जाना नागरिकों का सामान्य अधिकार है, इसमें कोई अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार नहीं होती, इसलिए यह सुरक्षा का मसला ही नहीं बनता।
(घ) सुरक्षा का परंपरागत सरोकार। अपने इलाके को अलग राष्ट्र बनाने की माँग देश की क्षेत्रीय अखंडता पर चोट है, और क्षेत्रीय अखंडता परंपरागत धारणा का केंद्रीय मूल्य है। किताब कहती भी है कि अलग राष्ट्र बनाने पर तुले अंदर के अलगाववादी आंदोलनों से नव-स्वतंत्र देशों को ख़तरा था, और यह पारंपरिक धारणा की आंतरिक सुरक्षा वाली कोटि में आता है।
(ङ) ‘खतरे की स्थिति नहीं’। अधिक स्वायत्तता माँगना अलग होने की माँग नहीं है। लोकतंत्र में यह माँग रखना और उस पर बहस करना व्यवस्था का हिस्सा है। किताब खुद कहती है कि भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था इसीलिए अपनाई कि विभिन्न समुदाय अपनी शिकायतों को खुलकर रख सकें और सत्ता में भागीदारी कर सकें।
(च) ‘खतरे की स्थिति नहीं’। अभिव्यक्ति की आज़ादी मानवाधिकारों की पहली कोटि, यानी राजनीतिक अधिकारों में आती है। सेना की आलोचना करने वाला अखबार उसी आज़ादी का इस्तेमाल कर रहा है, इसलिए वह सुरक्षा पर ख़तरा नहीं।

सावधानी: (ख) और (ग) जान-बूझकर लगभग एक जैसे लिखे गए हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ ‘देश’ और ‘राज्य’ का है, और पूरा उत्तर उसी एक शब्द पर टिका है।

3 वर्णनात्मक प्रश्न

प्रश्न 3

प्र. परंपरागत और अपारंपरिक सुरक्षा में क्या अंतर है? गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना इनमें से किस कोटि में आता है?

उत्तर: दोनों धारणाओं का बुनियादी अंतर चार बातों में है।

1. संदर्भी कौन है, यानी सुरक्षा किसकी। परंपरागत धारणा में भूक्षेत्र और संस्थाओं सहित राज्य को संदर्भी माना जाता है। अपारंपरिक धारणा में संदर्भी का दायरा बड़ा होता है; उसके प्रतिपादकों का जवाब है कि सिर्फ़ राज्य ही नहीं, व्यक्तियों और समुदायों या कहें कि समूची मानवता को सुरक्षा की ज़रूरत है।

2. ख़तरा किस चीज़ से है। परंपरागत धारणा में सैन्य ख़तरे को सबसे ज़्यादा ख़तरनाक माना जाता है और उसका स्रोत कोई दूसरा मुल्क होता है। अपारंपरिक धारणा सिर्फ़ सैन्य ख़तरों से संबद्ध नहीं; इसमें मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक ख़तरे शामिल हैं, जैसे आतंकवाद, मानवाधिकारों का हनन, वैश्विक निर्धनता, महामारी और वैश्विक तापवृद्धि।

3. किन मूल्यों की रक्षा। परंपरागत धारणा में संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की; अपारंपरिक में ‘अभाव से मुक्ति’ और ‘भय से मुक्ति’, यानी मानवीय गरिमा और आर्थिक सुरक्षा तक की।

4. सुरक्षा का तरीक़ा। परंपरागत धारणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग या उसकी आशंका से संबद्ध है; उसमें माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को ख़तरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है। अपारंपरिक ख़तरों से निपटने के लिए सैन्य-संघर्ष की नहीं बल्कि आपसी सहयोग की ज़रूरत होती है, क्योंकि गरीबी मिटाने या महामारी रोकने में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्किल है; ऐसे अधिकांश मसलों में बल-प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।

दूसरा भाग: गठबंधनों का निर्माण करना और उनको बनाये रखना परंपरागत सुरक्षा की कोटि में आता है। गठबंधन पारंपरिक सुरक्षा-नीति का चौथा तत्त्व है। इसमें कई देश शामिल होते हैं और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं। अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से औपचारिक रूप मिलता है और उनमें यह बिलकुल स्पष्ट रहता है कि ख़तरा किससे है।

प्रश्न 4

प्र. तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में क्या अंतर है?

उत्तर: दोनों के ख़तरे प्रकृति में ही अलग हैं।

तीसरी दुनिया के देशों की जनता के सामने ख़तरे:

  • पड़ोसी देशों से युद्ध। ये देश संयुक्त राज्य अमरीका या सोवियत संघ अथवा औपनिवेशिक ताकतों से कहीं ज़्यादा अपने पड़ोसी देशों से आशंकित थे। इनके बीच सीमा रेखा, भूक्षेत्र और आबादी पर नियंत्रण को लेकर झगड़े हुए।
  • अंदरूनी सैन्य-संघर्ष। अलग राष्ट्र बनाने पर तुले अलगाववादी आंदोलनों से इन देशों को ख़तरा था, और कोई पड़ोसी मुल्क ऐसे आंदोलन को हवा दे तो वही अंदरूनी मसला दो देशों के तनाव में बदल जाता था। किताब का आँकड़ा है कि विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं।
  • वैश्विक निर्धनता। प्रति व्यक्ति निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और ग़रीब बनाते हैं। दुनिया में सबसे ज़्यादा सशस्त्र संघर्ष सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं, और यही दुनिया का सबसे गरीब इलाका है।
  • महामारी। एचआईवी-एड्स से 2003 तक संक्रमित 4 करोड़ लोगों में दो-तिहाई अफ़्रीका में रहते थे और शेष के 50 फ़ीसदी दक्षिण एशिया में। अफ़्रीका जैसे ग़रीब इलाके के लिए नये उपचार कीमत को देखते हुए आकाश-कुसुम कहे जाएँगे।
  • शरणार्थी बनना और विस्थापन। दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में सशस्त्र संघर्ष और युद्ध के कारण लाखों लोग शरणार्थी बने; विश्व का शरणार्थी-मानचित्र विश्व के संघर्ष-मानचित्र से लगभग हू-ब-हू मेल खाता है।

विकसित देशों की जनता के सामने ख़तरे:

  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ताकतवर पश्चिमी मुल्कों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों या वर्गों से कोई गंभीर ख़तरा नहीं था, इसलिए इन देशों ने अपना ध्यान सीमापार के ख़तरों पर केंद्रित किया।
  • शीतयुद्ध के दौर में इनका बड़ा भय दूसरे गुट से सैन्य हमले का था। कुछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों में ख़ून-ख़राबे की चिंता भी थी, जैसे 1950 के दशक में फ़्रांस को वियतनाम में और 1950 तथा 1960 के दशक में ब्रिटेन को केन्या में जूझना पड़ा।
  • आज इनके सामने बड़े ख़तरे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और वैश्विक तापवृद्धि जैसे विश्वव्यापी ख़तरे हैं। 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद से दूसरे मुल्क और वहाँ की सरकारें आतंकवाद पर ज़्यादा ध्यान देने लगी हैं।
  • प्रति व्यक्ति उच्च आय और जनसंख्या की कम वृद्धि इन देशों को और धनी बनने में मदद करती है, इसलिए भुखमरी और अभाव इनकी सुरक्षा का मसला नहीं बनते; उलटे इनके सामने दक्षिणी गोलार्द्ध से होने वाले प्रवास का राजनीतिक मतभेद खड़ा हुआ है।

निचोड़: विकसित देशों की जनता के ख़तरे मुख्यतः बाहर से और सैन्य या विश्वव्यापी प्रकृति के हैं, जबकि तीसरी दुनिया की जनता के ख़तरे बाहर और भीतर दोनों तरफ़ से हैं और उनमें रोज़मर्रा के जीवन-यापन के ख़तरे यानी गरीबी, बीमारी और विस्थापन बड़ी जगह घेरते हैं।

प्रश्न 5

प्र. आतंकवाद सुरक्षा के लिए परंपरागत खतरे की श्रेणी में आता है या अपरंपरागत?

उत्तर: आतंकवाद सुरक्षा के लिए अपारंपरिक ख़तरे की श्रेणी में आता है। किताब आतंकवाद की चर्चा ‘ख़तरे के नये स्रोत’ खंड में करती है, यानी अपारंपरिक धारणा के अंतर्गत।

ऐसा क्यों है:

  • निशाना नागरिक हैं, सेना नहीं। किताब की परिभाषा है कि आतंकवाद का आशय राजनीतिक ख़ून-ख़राबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। परंपरागत ख़तरे में एक देश की सेना दूसरे देश पर हमला करती है।
  • ख़तरे का स्रोत कोई राज्य नहीं है। परंपरागत धारणा में ख़तरे का स्रोत कोई दूसरा मुल्क होता है, जबकि आतंकवादी समूह किसी देश की सेना नहीं होते।
  • यह सीमाओं में नहीं बँधा। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज़्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं।
  • तरीक़ा भी अलग है। इसके चिर-परिचित उदाहरण हैं विमान-अपहरण अथवा भीड़ भरी जगहों जैसे रेलगाड़ी, होटल, बाज़ार पर बम लगाना, न कि घोषित युद्ध।

एक ज़रूरी जोड़: अपारंपरिक होने का यह मतलब नहीं कि इसमें सैन्य-बल की कोई भूमिका ही नहीं। किताब कहती है कि आतंकवाद से लड़ने में भले ही सैन्य-बल की कोई भूमिका हो, पर वहाँ भी सैन्य-बल एक सीमा तक ही कारगर हो सकता है। साथ ही आतंकवाद कोई नयी परिघटना नहीं है; गुजरे वक्त में इसकी अधिकांश घटनाएँ मध्यपूर्व, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्षिण एशिया में हुईं।

प्रश्न 6

प्र. सुरक्षा के परंपरागत दृष्टिकोण के हिसाब से बताएँ कि अगर किसी राष्ट्र पर खतरा मंडरा रहा हो तो उसके सामने क्या विकल्प होते हैं?

उत्तर: किताब के अनुसार बुनियादी तौर पर किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते हैं।

  • 1. आत्मसमर्पण करना: दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना। किताब यह भी जोड़ती है कि युद्ध में कोई सरकार भले ही आत्मसमर्पण कर दे, लेकिन वह इसे अपने देश की नीति के रूप में कभी प्रचारित नहीं करना चाहेगी।
  • 2. अपरोध: युद्ध से होने वाले नाश को इस हद तक बढ़ाने के संकेत देना कि दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से बाज आये। सुरक्षा-नीति का यह हिस्सा युद्ध की आशंका को रोकने से जुड़ा है, और इसी को ‘अपरोध’ कहा जाता है।
  • 3. रक्षा: युद्ध ठन जाय तो अपनी रक्षा करना, ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो सके और पीछे हट जाए, अथवा हमलावर को पराजित कर देना। युद्ध को सीमित रखने अथवा उसको समाप्त करने को ही ‘रक्षा’ कहा जाता है।

अंतर साफ़ रखिए: अपरोध युद्ध छिड़ने से पहले का उपाय है, रक्षा युद्ध छिड़ने के बाद का। दोनों मिलकर परंपरागत सुरक्षा-नीति का केंद्र बनाते हैं। इनके अलावा परंपरागत सुरक्षा-नीति के दो और तत्त्व हैं, शक्ति-संतुलन और गठबंधन बनाना।

प्रश्न 7

प्र. ‘शक्ति-संतुलन’ क्या है? कोई देश इसे कैसे कायम करता है?

उत्तर: शक्ति-संतुलन क्या है: यह परंपरागत सुरक्षा-नीति का एक तत्त्व है। कोई देश अपने अड़ोस-पड़ोस में देखने पर पाता है कि कुछ मुल्क छोटे हैं तो कुछ बड़े। इससे इशारा मिल जाता है कि भविष्य में किस देश से उसे ख़तरा हो सकता है। कोई पड़ोसी देश संभव है यह न कहे कि वह हमले की तैयारी में जुटा है, और हमले का कोई प्रकट कारण भी न जान पड़ता हो; फिर भी यह देखकर कि कोई देश बहुत ताकतवर है, यह भाँपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है। इसी वजह से हर सरकार दूसरे देश से अपने शक्ति-संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है और पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करती है।

कोई देश इसे कैसे कायम करता है:

  • सैन्य-शक्ति बढ़ाकर। शक्ति-संतुलन बनाये रखने की यह कवायद ज़्यादातर अपनी सैन्य-शक्ति बढ़ाने की होती है।
  • आर्थिक और प्रौद्योगिकी की ताकत बढ़ाकर। किताब इन्हें भी महत्त्वपूर्ण बताती है, क्योंकि सैन्य-शक्ति का यही आधार है।
  • किन देशों के साथ, यह चुनकर। जो देश नज़दीक हों, जिनके साथ अनबन हो या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो, उनके साथ शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में करने पर ख़ास तौर पर ज़ोर दिया जाता है।
  • गठबंधन बनाकर। किसी देश अथवा गठबंधन की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंधन बनाते हैं।
प्रश्न 8

प्र. सैन्य गठबंधन के क्या उद्देश्य होते हैं? किसी ऐसे सैन्य गठबंधन का नाम बताएँ जो अभी मौजूद है। इस गठबंधन के उद्देश्य भी बताएँ?

उत्तर: सैन्य गठबंधन के उद्देश्य:

  • गठबंधन में कई देश शामिल होते हैं और वे सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं।
  • किसी देश अथवा गठबंधन की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंधन बनाते हैं, यानी यह शक्ति-संतुलन अपने पक्ष में करने का तरीक़ा भी है।
  • अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से एक औपचारिक रूप मिलता है और ऐसे गठबंधनों में यह बात बिलकुल स्पष्ट रहती है कि ख़तरा किससे है।

एक मौजूद सैन्य गठबंधन: नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन), जो आज भी मौजूद है। इसका उद्देश्य अपने सदस्य देशों पर होने वाले सैन्य हमले को रोकना और हमला होने पर सामूहिक रूप से उसकी रक्षा करना है; सदस्य देश आपसी सुरक्षा के लिए एक-दूसरे से संधि से बँधे हैं और किसी एक पर हमले को सब पर हमला माना जाता है।

गठबंधन स्थायी नहीं होते: किताब ज़ोर देकर कहती है कि गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं। इसका किताबी उदाहरण यह है कि संयुक्त राज्य अमरीका ने सन् 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितंबर 2001 के दिन उस पर हमला किया, तो उसने इस्लामी उग्रवादियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।

प्रश्न 9

प्र. पर्यावरण के तेजी से हो रहे नुकसान से देशों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण देते हुए अपने तर्कों की पुष्टि करें।

उत्तर: हाँ, इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है। पर्यावरण का नुकसान अब सिर्फ़ पर्यावरण का मसला नहीं रह गया, वह देशों की सुरक्षा का मसला बन चुका है। किताब खुद कहती है कि किसी मसले को सुरक्षा का मसला कहलाने के लिए एक सर्व स्वीकृत न्यूनतम मानक पर खरा उतरना ज़रूरी है: अगर किसी मसले से संदर्भी यानी राज्य अथवा जनसमूह के अस्तित्व को ख़तरा हो रहा हो, तो उसे सुरक्षा का मसला कहा जा सकता है, चाहे इस ख़तरे की प्रकृति कुछ भी हो। पर्यावरण का नुकसान ठीक यही करता है।

तर्क और किताब के अपने उदाहरण:

  • पूरे देश का भूगोल ही डूब सकता है। वैश्विक तापवृद्धि से अगर समुद्रतल दो मीटर ऊँचा उठता है तो बांग्लादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा, कमोबेश पूरा मालदीव सागर में समा जाएगा और थाइलैंड की 50 फ़ीसदी आबादी को ख़तरा पहुँचेगा। किसी देश का भूक्षेत्र ही न बचे, इससे बड़ा सुरक्षा-ख़तरा क्या होगा।
  • मालदीव के लिए यह अस्तित्व का सवाल है। किताब मालदीव को उसी न्यूनतम मानक के उदाहरण के रूप में देती है: उसे वैश्विक तापवृद्धि से ख़तरा हो सकता है क्योंकि समुद्र तल के ऊँचा उठने से उसका ज़्यादातर हिस्सा डूब जाएगा।
  • संसाधनों पर झगड़े। पर्यावरण के नुकसान से पानी और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की किल्लत बढ़ती है, और संसाधनों पर दावेदारी झगड़े और तनाव पैदा करती है।
  • यह सीमाओं को नहीं मानता। ये समस्याएँ वैश्विक प्रकृति की हैं, कोई भी देश इनका समाधान अकेले नहीं कर सकता, और ऐसा भी हो सकता है कि किन्हीं स्थितियों में किसी एक देश को इनकी मार बाकियों की अपेक्षा ज़्यादा झेलनी पड़े।
  • यह विस्थापन पैदा करता है। प्राकृतिक आपदा के कारण स्वदेश छोड़ने पर मज़बूर लोग शरणार्थी कहलाते हैं, और शरणार्थियों की आवाजाही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद खड़ा करती है।

निष्कर्ष: इसीलिए किताब वैश्विक तापवृद्धि को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और एड्स तथा बर्ड फ़्लू जैसी महामारियों के साथ रखकर बताती है कि इन्हीं के मद्देनज़र 1990 के दशक में विश्व-सुरक्षा की धारणा उभरी, और चूँकि इन समस्याओं की प्रकृति वैश्विक है इसलिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है, भले ही इसे हासिल करना मुश्किल हो। भारत भी इसी कारण उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं।

प्रश्न 10

प्र. देशों के सामने फिलहाल जो खतरे मौजूद हैं उनमें परमाण्विक हथियार का सुरक्षा अथवा अपरोध के लिए बड़ा सीमित उपयोग रह गया है। इस कथन का विस्तार करें।

उत्तर: यह कथन सही है, और इसकी वजह यह है कि आज के ज़्यादातर ख़तरे उस किस्म के हैं ही नहीं जिनके लिए परमाणु हथियार बने थे।

1. आज के ख़तरे अपारंपरिक हैं। देशों के सामने अब आतंकवाद, मानवाधिकारों का हनन, वैश्विक निर्धनता, महामारी, वैश्विक तापवृद्धि और शरणार्थियों का प्रवास जैसे ख़तरे हैं। परमाणु हथियार इनमें से किसी के भी विरुद्ध काम नहीं आता।

2. ख़तरे का स्रोत कोई राज्य नहीं है। अपरोध का पूरा तर्क यह है कि दूसरे देश को नाश के डर से हमला करने से रोका जाए। आतंकवादी समूह न कोई राज्य हैं, न उनका कोई भूक्षेत्र है जिस पर जवाबी हमले का डर दिखाया जा सके। इसलिए अपरोध का तर्क इन पर लागू ही नहीं होता।

3. सैन्य-बल खुद ही सीमित कारगर है। किताब कहती है कि गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्किल है; वस्तुतः ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा। जब साधारण सैन्य-बल ही बेअसर है, तो परमाणु हथियार तो और भी अनुपयोगी है।

4. इनका इस्तेमाल आत्मघाती होगा। परंपरागत सुरक्षा की अपनी ‘न्याय-युद्ध’ परंपरा भी कहती है कि युद्ध-साधनों का सीमित इस्तेमाल होना चाहिए, संघर्षविमुख शत्रु और निहत्थे व्यक्ति को न मारा जाए, और उतने ही बल का प्रयोग हो जितना आत्मरक्षा के लिए ज़रूरी हो। परमाणु हथियार सामूहिक संहार का अस्त्र है और वह इस सीमा को किसी भी हाल में पूरा नहीं कर सकता।

5. दुनिया ने खुद इनके उपयोग को बाँध दिया है। महाशक्तियों ने अस्त्र-नियंत्रण का सहारा लिया; 1972 की एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि ने अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा-कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका, और परमाणु अप्रसार संधि (1968) ने परमाण्विक हथियारों के उपार्जन को कायदे-कानून के दायरे में ला खड़ा किया। किताब साफ़ कहती है कि इस संधि ने परमाण्विक आयुधों को समाप्त तो नहीं किया, लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या ज़रूर कम की।

बचा हुआ उपयोग: इसका मतलब यह नहीं कि उपयोग शून्य है। परंपरागत सैन्य ख़तरे के विरुद्ध अपरोध की भूमिका अब भी है; भारत ने अपने 1998 के परमाणु परीक्षण के फ़ैसले को उचित ठहराते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा का ही तर्क दिया था, क्योंकि दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं। इसलिए उपयोग ख़त्म नहीं हुआ है, बड़ा सीमित रह गया है।

प्रश्न 11

प्र. भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए: पारंपरिक या अपारंपरिक? अपने तर्क की पुष्टि में आप कौन-से उदाहरण देंगे?

उत्तर: भारतीय परिदृश्य में दोनों को साथ लेकर चलना ज़रूरी है, पर वरीयता अपारंपरिक सुरक्षा को दी जानी चाहिए, क्योंकि रोज़ाना जितने भारतीयों का जीवन अभाव, बीमारी और असमानता से प्रभावित होता है, उतना किसी सीमापार हमले से नहीं। नीचे दोनों पक्षों के तर्क हैं, और फिर संतुलित निष्कर्ष।

पारंपरिक सुरक्षा को वरीयता देने के तर्क:

  • भारत पर पड़ोसी देशों से हमले होते रहे हैं। पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में और चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया।
  • दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं। इसी कारण भारत की सुरक्षा-नीति का पहला घटक ही सैन्य-क्षमता को मज़बूत करना रहा है, और सरकार ने 1998 के परमाणु परीक्षण के फ़ैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से उचित ठहराया था। भारत ने पहला परमाणु परीक्षण सन् 1974 में किया था।
  • नगालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कई उग्रवादी समूहों ने समय-समय पर इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोशिश की, यानी क्षेत्रीय अखंडता पर ख़तरा वास्तविक रहा है।

अपारंपरिक सुरक्षा को वरीयता देने के तर्क:

  • भारत की सुरक्षा-नीति का चौथा घटक ही यह है कि अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित किया जाए कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से निजात मिले तथा नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता ज़्यादा न हो। किताब मानती है कि प्रयास आंशिक रूप से ही सफल हुए हैं, यानी काम अभी बाक़ी है।
  • वैश्विक निर्धनता की चर्चा में किताब भारत को उन छह देशों में गिनती है जिनमें विश्व की कुल जनसंख्या-वृद्धि का 50 फ़ीसदी घटित हो रहा है, और यह भी कहती है कि प्रति व्यक्ति निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृद्धि मिलकर गरीब देशों को और ग़रीब बनाते हैं।
  • एचआईवी-एड्स से संक्रमित लोगों में शेष के 50 फ़ीसदी दक्षिण एशिया में हैं, और कोरोना, टीबी, मलेरिया, डेंगी बुखार तथा हैजा जैसी पुरानी महामारियाँ औषधि-प्रतिरोधक रूप धारण कर चुकी हैं।
  • वैश्विक तापवृद्धि का ख़तरा भारत के पड़ोस को सीधे छूता है; बांग्लादेश का 20 प्रतिशत डूबने का मतलब भारत की सीमा पर भारी विस्थापन भी है। भारत उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं।
  • 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित ‘आंतरिक रूप से विस्थापित जन’ के उदाहरण हैं, यानी विस्थापन भारत के भीतर का जीवंत मसला है।
  • सबसे बड़ी बात, किताब का अपना निष्कर्ष यही है कि लोकतंत्र सिर्फ़ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज़्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है। लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित सरकार पर दबाव होता है कि वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए।

निष्कर्ष: भारत की अपनी सुरक्षा-नीति के चारों घटक बताते हैं कि यहाँ किसी एक को चुनने का सवाल ही नहीं है; अलग-अलग वक्त में इन्हीं घटकों के हेर-फेर से रणनीति बनायी गई है। सैन्य-क्षमता को छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि पड़ोस का इतिहास सामने है। लेकिन वरीयता अपारंपरिक सुरक्षा को मिलनी चाहिए, क्योंकि सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता, और भारत के करोड़ों नागरिकों के लिए असली असुरक्षा गरीबी, बीमारी और अभाव है। लोकतंत्र, आर्थिक विकास और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग इन तीनों को मज़बूत करना ही भारत के लिए सुरक्षा की सबसे टिकाऊ रणनीति है।

प्रश्न 12

प्र. नीचे दिए गए कार्टून को समझें। कार्टून में युद्ध और आतंकवाद का जो संबंध दिखाया गया है उसके पक्ष या विपक्ष में एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: यह कार्टून एरेस का है। इसमें ‘युद्ध’ लिखी एक विशाल सूअरनी लेटी है और ‘आतंकवाद’ लिखे कई छौने उसका दूध पी रहे हैं। संदेश यह है कि युद्ध आतंकवाद को जन्म देता है और उसे पालता-पोसता है, यानी युद्ध आतंकवाद को ख़त्म नहीं करता बल्कि उसे और पैदा करता है। नीचे दोनों पक्ष दिए हैं; परीक्षा में आपको किसी एक पक्ष में तर्क देकर टिप्पणी लिखनी है।

कार्टून के पक्ष में (यानी युद्ध और आतंकवाद जुड़े हुए हैं):

  • दोनों का तरीक़ा एक जैसा है। किताब कहती है कि शायद ही कभी ऐसा होता हो कि किसी युद्ध में सिर्फ़ सैनिक घायल हों अथवा मारे जायें; अक्सर निहत्थे और आम औरत-मर्द को जंग का निशाना बनाया जाता है, उनका और उनकी सरकार का हौसला तोड़ने की कोशिश होती है। आतंकवाद भी ठीक यही करता है, वह जनमानस को आतंकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाता है।
  • युद्ध वह असंतोष पैदा करता है जिस पर आतंकवाद पलता है। आतंकवाद नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के ख़िलाफ़ करता है।
  • इतिहास इसकी गवाही देता है। अमरीका ने 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, और उन्हीं में से निकले अल-कायदा ने 11 सितंबर 2001 को उस पर हमला किया। एक युद्ध के लिए खड़े किए गए समूह अगले दौर का आतंकवाद बन गए।
  • युद्ध का जवाब युद्ध देने से मसला हल नहीं होता। किताब कहती है कि आतंकवाद से लड़ने में सैन्य-बल एक सीमा तक ही कारगर हो सकता है।

कार्टून के विपक्ष में (यानी दोनों को एक बताना ठीक नहीं):

  • वैधता का फ़र्क़ है। किताब कहती है कि आज लगभग पूरा विश्व मानता है कि किसी देश को युद्ध उचित कारणों यानी आत्म-रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही करना चाहिए। आतंकवाद के पास ऐसा कोई उचित कारण नहीं होता।
  • नियम का फ़र्क़ है। युद्धरत सेना को चाहिए कि वह संघर्षविमुख शत्रु, निहत्थे व्यक्ति अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु को न मारे। आतंकवाद की परिभाषा ही यह है कि वह जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है।
  • कर्ता का फ़र्क़ है। युद्ध राज्यों के बीच होता है और उन पर अंतर्राष्ट्रीय कायदे-कानून लागू होते हैं; आतंकवादी समूह किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते।

सुझाया गया रुख़: कार्टून का संदेश काफ़ी हद तक सही है, क्योंकि युद्ध और आतंकवाद दोनों में क़ीमत आम नागरिक चुकाते हैं और एक दूसरे को जन्म देता है। पर दोनों को पूरी तरह एक कह देना भी ठीक नहीं, क्योंकि युद्ध के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियम और उचित कारण की शर्त मौजूद है, आतंकवाद के लिए नहीं। असली सबक यह है कि अपारंपरिक ख़तरों का जवाब अकेले बल-प्रयोग से नहीं, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से निकलेगा।

4 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)

किताब अध्याय के हाशिये पर और कार्टूनों के नीचे भी कुछ प्रश्न पूछती है और एक कक्षा-गतिविधि देती है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।

पाठगत प्रश्न 1

प्र. मेरी सुरक्षा के बारे में किसने फैसला किया? कुछ नेताओं और विशेषज्ञों ने? क्या मैं अपनी सुरक्षा का फैसला नहीं कर सकती?

उत्तर: अध्याय की शुरुआत यही बात उठाती है: ‘सुरक्षा’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ जैसे शब्द अक्सर बहस और चर्चा रोकने के लिए इस्तेमाल होते हैं, मानो सुरक्षा आम नागरिक का मामला ही न हो; पर लोकतंत्र में ऐसा नहीं हो सकता। परंपरागत धारणा में राज्य, नेताओं और विशेषज्ञों की सलाह से, तय करता है कि उसके केंद्रीय मूल्यों को किससे ख़तरा है। अपारंपरिक धारणा संदर्भी का दायरा बढ़ाकर व्यक्तियों, समुदायों और समूची मानवता तक ले जाती है, इसलिए आम इंसान की अपनी चिंताएँ, जैसे भूख, बीमारी या हिंसा, भी सुरक्षा का हिस्सा बनती हैं। किताब यह भी पूछती है कि क्या सरकार हमेशा केंद्रीय मूल्यों का वही अर्थ लेती है जो कोई साधारण नागरिक। लोकतंत्र में नागरिकों को यह तय करने में हिस्सा लेना चाहिए कि उनकी सुरक्षा क्या है।

पाठगत प्रश्न 2

प्र. (कार्टून) आपने ‘शांति-सेना’ के बारे में सुना होगा। क्या आपको लगता है कि ‘शांति-सेना’ का होना स्वयं में एक विरोधाभासी बात है?

उत्तर: कार्टून में एक हथियारबंद सैनिक शांति के प्रतीक कबूतर पर सवार है और उसकी लगाम थामे हुए है। विरोधाभास वह बात है जो ख़ुद अपनी ही काट करती लगे: शांति का अर्थ है बल-प्रयोग का न होना, जबकि सेना हथियारबंद बल है, इसलिए ‘शांति-सेना’ विरोधाभासी लगती है। पर असल में ऐसा नहीं है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की शांतिबहाली सेनाएँ, जिनमें किताब के अनुसार भारत ने भी सहयोगमूलक सुरक्षा के समर्थन में अपनी सेना भेजी है, युद्ध करने के लिए नहीं बल्कि लड़ते पक्षों को अलग रखने और नागरिकों की रक्षा के लिए होती हैं। कार्टून की चेतावनी यह है कि जब शांति को सैनिकों की लगाम से चलाना पड़े तो वह कसी हुई शांति होती है।

पाठगत प्रश्न 3

प्र. युद्ध का मतलब है असुरक्षा, विध्वंस और मृत्यु! युद्ध किसी को क्या सुरक्षा दे पाएगा?

उत्तर: परंपरागत धारणा में हमले की स्थिति में सरकार अपनी रक्षा करती है ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो और पीछे हट जाए, यानी युद्ध राज्य की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता बचा सकता है। पर किताब इसकी कीमत भी बताती है: शायद ही कभी ऐसा होता है कि युद्ध में सिर्फ़ सैनिक घायल हों या मारे जाएँ; अक्सर आम औरत-मर्द को जंग का निशाना बनाया जाता है। इसलिए युद्ध राज्य को तो बचा सकता है पर जनता को असुरक्षित कर देता है, और इसी कारण किताब कहती है कि सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता, और युद्ध केवल उचित कारणों से तथा बाक़ी उपाय असफल होने पर ही होना चाहिए।

पाठगत प्रश्न 4

प्र. (कार्टून ‘परमाणु शक्ति-संपन्न बिरादरी’) जब कोई नया देश परमाणु शक्ति-संपन्न होने की दावेदारी करता है तो बड़ी ताकतें क्या रवैया अख्तियार करती हैं? हमारे पास यह कहने के क्या आधार हैं कि परमाण्विक हथियारों से लैस कुछ देशों पर तो विश्वास किया जा सकता है परंतु कुछ पर नहीं?

उत्तर: कार्टून में पुरानी परमाणु शक्तियों के नेता ‘न्यूक्लियर पावर्स क्लब’ में आराम-कुर्सियों पर बैठे मिसाइल जैसे सिगार पी रहे हैं, और उत्तर कोरिया तथा ईरान भीतर घुसने की कोशिश कर रहे हैं। बड़ी ताकतें नये दावेदारों को बाहर रखने की कोशिश करती हैं, और परमाणु अप्रसार संधि यही करती है: जिन देशों ने 1967 से पहले परमाणु हथियार बना लिये थे या उनका परीक्षण कर लिया था, उन्हें ये हथियार रखने की अनुमति मिली, और बाक़ी को इन्हें हासिल करने के अधिकार से वंचित किया गया। कुछ देशों को भरोसेमंद और कुछ को अविश्वसनीय मानने का कोई निष्पक्ष आधार नहीं है; इस संधि ने परमाण्विक आयुधों को समाप्त नहीं किया, बस इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या कम की। इसीलिए भारत ने ऐसी सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति की पहलकदमी की जिसमें हर देश के बराबर अधिकार और दायित्व हों।

पाठगत प्रश्न 5

प्र. एक हफ़्ते के अखबार पर नज़र दौड़ाएँ और पूरे विश्व में चल रहे अंदरूनी तथा बाहरी संघर्षों की सूची बनाएँ।

उत्तर: यह परियोजना-कार्य है। दो खाने बनाइए। बाहरी संघर्षों में दो देशों के बीच के युद्ध या विवाद लिखिए, और अंदरूनी संघर्षों में किसी एक देश के भीतर के गृहयुद्ध, विद्रोह, अलगाववादी आंदोलन और जातीय टकराव। आप पाएँगे कि किताब की बात सही है कि विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं।

पाठगत प्रश्न 6

प्र. (कार्टून) अमरीका में सुरक्षा पर तो भारी-भरकम खर्च होता है जबकि शांति से जुड़े मामलों पर बहुत कम ही खर्च किया जाता है। यह कार्टून इस स्थिति पर एक टिप्पणी करता है। क्या हमारे देश में हालत इससे कुछ अलग है?

उत्तर: कार्टून में एक व्यक्ति ‘शांति विभाग’ के लिए कुछ लाख डॉलर माँगता है और उसे जवाब मिलता है कि इतना पैसा नहीं है, जबकि इराक़ युद्ध, अफ़गान युद्ध, गृह-सुरक्षा और रक्षा विभाग पर अरबों डॉलर ख़र्च हो रहे हैं। भारत की स्थिति भी इसी तरह की है: पाकिस्तान और चीन से युद्धों और चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देशों के कारण भारत रक्षा पर भारी ख़र्च करता है, जबकि स्वास्थ्य, ग़रीबी-उन्मूलन और आपदा-राहत जैसी अपारंपरिक सुरक्षा पर अपेक्षाकृत कम। फ़र्क़ यह है कि विकासशील देश होने के नाते भारत को बहुसंख्यक नागरिकों को ग़रीबी और अभाव से निकालने पर भी ख़र्च करना पड़ता है, जिसे किताब भारत की सुरक्षा-नीति का चौथा घटक बताती है।

पाठगत प्रश्न 7

प्र. मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात हो तो हम हमेशा बाहर क्यों देखते हैं? क्या हमारे अपने देश में इसके उदाहरण नहीं मिलते?

उत्तर: क्योंकि दूसरों की आलोचना करना अपनी आलोचना से आसान है, और किताब में जिस बहस की चर्चा है वह दूसरे देशों में हस्तक्षेप की है (कुवैत पर इराक़ का हमला, रवांडा का जनसंहार, पूर्वी तिमूर में इंडोनेशियाई सेना का रक्तपात)। पर भारत समेत हर देश में ऐसे उदाहरण मिलते हैं। किताब ख़ुद 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडितों को आंतरिक रूप से विस्थापित जन का उदाहरण बताती है, और नगालैंड, मिजोरम, पंजाब तथा कश्मीर के उग्रवादी आंदोलनों का ज़िक्र करती है। किताब का बड़ा सबक यहाँ भी लागू होता है कि पिछले 100 वर्षों में विदेशी सेनाओं से ज़्यादा लोग अपनी ही सरकारों के हाथों मारे गए, इसलिए मानवाधिकारों पर नज़र घर में भी रखनी चाहिए।

पाठगत प्रश्न 8

प्र. (कार्टून ‘खुशहाली और बदहाली का करीबी रिश्ता’) क्या गैर-बराबरी के बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर कुछ असर पड़ता है?

उत्तर: हाँ। किताब बताती है कि प्रति व्यक्ति उच्च आय और जनसंख्या की कम वृद्धि धनी देशों को और धनी बनाती है, जबकि निम्न आय और तीव्र वृद्धि ग़रीब देशों को और ग़रीब बनाते हैं, और यह असमानता उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों को अलग करती है। इसका सुरक्षा पर सीधा असर है: दुनिया में सबसे ज़्यादा सशस्त्र संघर्ष सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं, जो दुनिया का सबसे ग़रीब इलाका है; और दक्षिणी गोलार्द्ध की ग़रीबी के कारण उत्तरी गोलार्द्ध की ओर प्रवास बढ़ा है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद खड़ा हुआ है।

पाठगत प्रश्न 9

प्र. अफ़्रीका का एक मानचित्र लीजिए और जनता की सुरक्षा पर मंडराते विभिन्न ख़तरों को इस मानचित्र पर चिह्नित कीजिए।

उत्तर: यह मानचित्र-कार्य है; अफ़्रीका का रेखा-मानचित्र लीजिए। किताब अफ़्रीका के लिए ये ख़तरे गिनाती है: सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में सबसे ज़्यादा सशस्त्र संघर्ष, जो दुनिया का सबसे ग़रीब इलाका भी है; एचआईवी-एड्स, जिसके दो-तिहाई संक्रमित अफ़्रीका में हैं, दक्षिणी अफ़्रीकी देशों में हर 6 वयस्कों में एक और बोत्सवाना में 3 में से एक; 1994 में रवांडा का जनसंहार, जिसमें लगभग 5 लाख तुत्सी मारे गए; ग़रीबी और तेज़ जनसंख्या-वृद्धि, जिसमें नाइजीरिया उन छह देशों में है जहाँ विश्व की आधी जनसंख्या-वृद्धि होती है; और शरणार्थी, जिनमें 2017 में विश्व के विस्थापितों का 30 प्रतिशत अफ़्रीका ने शरण दी।

पाठगत प्रश्न 10

प्र. (कार्टून) यहाँ जो मुद्दे दिखाए गए हैं उनसे दुनिया कैसे उबरे?

उत्तर: कार्टून में दुनिया रस्सी पर चल रही है, नीचे आतंकवाद इंतज़ार कर रहा है और पीछे से प्राकृतिक आपदाएँ दौड़ती आ रही हैं। ये अपारंपरिक ख़तरे हैं और किताब का उत्तर सहयोगमूलक सुरक्षा है: कोई भी देश ऐसी समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता, इसलिए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर पर सहयोग की रणनीतियाँ बनानी होंगी, जिनमें संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन, स्वयंसेवी संगठन, व्यवसायिक संगठन और जानी-मानी हस्तियाँ भी भागीदार हों। आतंकवाद के विरुद्ध सैन्य-बल की सीमित भूमिका हो सकती है, वह भी सामूहिक स्वीकृति से; प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध केवल सहयोग ही काम आता है।

पाठगत प्रश्न 11

प्र. मुझे यह सुनकर अच्छा लगता है कि मेरे देश के पास परमाण्विक हथियार हैं लेकिन कोई मुझे यह समझाए कि क्या इससे मैं ज़्यादा सुरक्षित हो गया हूँ, क्या मेरा परिवार ज़्यादा सुरक्षित हो गया है?

उत्तर: परमाणु हथियार पारंपरिक सुरक्षा के काम आते हैं: वे युद्ध से होने वाले नाश को इतना बढ़ा देते हैं कि दूसरा पक्ष हमला करने से बाज़ आए, और भारत ने 1998 के परीक्षणों को राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से ही उचित ठहराया क्योंकि उसके चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं। पर वे उन ख़तरों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं करते जो किसी आम परिवार को सबसे ज़्यादा छूते हैं: ग़रीबी, बीमारी, महामारी, प्राकृतिक आपदा या आतंकवाद। यही राज्य की सुरक्षा और मानवता की सुरक्षा के बीच का वह अंतर है जिसकी बात किताब करती है: सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता।

पाठगत प्रश्न 12

प्र. परंपरागत सुरक्षा और अपरंपरागत सुरक्षा के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा किए जाने वाले ख़र्च की तुलना करें।

उत्तर: यह परियोजना-कार्य है: हाल के केंद्रीय बजट में रक्षा के लिए आवंटन की तुलना स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण के आवंटन से कीजिए। आम तौर पर रक्षा सबसे बड़े एकल मदों में होती है, जबकि अपारंपरिक सुरक्षा का ख़र्च कई मंत्रालयों में बँटा रहता है। अपने निष्कर्ष को किताब में बताए भारत की सुरक्षा-नीति के चार घटकों से जोड़िए, जिनमें सैन्य-क्षमता मज़बूत करना और नागरिकों को ग़रीबी से निकालने के लिए अर्थव्यवस्था का विकास, दोनों शामिल हैं।

कक्षा-गतिविधि (चरण)

प्र. नदी के किनारे बसे चार गाँव, कोटाबाग, गेवली, कंडली और गोप्पा, संसाधनों में ज़्यादा हिस्सा माँगते हैं: कोटाबाग इसलिए कि वह सबसे पहले बसा, कंडली और गेवली इसलिए कि उनकी आबादी ज़्यादा है, और गोप्पा इसलिए कि वह रईसी की ज़िंदगी जीता है। कक्षा चार समूहों में बँटकर इस पर बातचीत करे कि पुराने स्वर्णयुग में कैसे लौटा जाए।

कैसे करें: यह भूमिका-अभिनय है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं है। हर गाँव को एक राष्ट्र मानिए: पहले बसने वाले ऐतिहासिक अधिकार का दावा करते हैं, बड़ी आबादी वाले ज़रूरत का, और छोटा पर धनी समुदाय अपनी जीवन-शैली का। बातचीत में इस अध्याय के औज़ार अपनाइए: सूचनाएँ साझा करके विश्वास बहाली, बल-प्रयोग के बजाय सहयोग, और ऐसा समझौता जिसमें सबकी माँगों का ध्यान रखा गया हो। अंत में देखिए कि समझौता हुआ या बातचीत बेनतीजा रही, और इसकी तुलना भूक्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रों की बातचीत से कीजिए।

परीक्षा संकेत

इस प्रश्नावली में सबसे ज़्यादा अंक तीन जगह से आते हैं: प्रश्न 3 और 4 का तुलनात्मक ढाँचा, प्रश्न 6 और 7 की परंपरागत सुरक्षा-नीति के चारों तत्त्व, और प्रश्न 9 तथा 11 के मूल्यपरक उत्तर, जिनमें किताब के अपने उदाहरण देना ज़रूरी है। प्रश्न 2 में (ख) और (ग) का फ़र्क़ सिर्फ़ ‘देश’ और ‘राज्य’ का है, और प्रश्न 11 का हिंदी संस्करण यह पूछता है कि वरीयता दी जानी चाहिए, इसलिए उत्तर में अपना पक्ष लेकर तर्क देना ज़रूरी है, सिर्फ़ भारत का रिकॉर्ड बताना काफ़ी नहीं।