परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, दोनों धारणाओं की तुलना, संधियों के नाम और साल, वे आँकड़े जो सीधे पूछे जाते हैं, और भारत की सुरक्षा-नीति के चार घटक। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 एक नज़र में
सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है ख़तरे से आज़ादी। पर हर ख़तरा सुरक्षा का मसला नहीं होता; सुरक्षा का रिश्ता सिर्फ़ उन गंभीर ख़तरों से है जिनको रोकने के उपाय न किए गए तो हमारे केंद्रीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचेगी।
अपरोध सुरक्षा-नीति का वह हिस्सा है जिसका संबंध युद्ध की आशंका को रोकने से होता है। रक्षा का संबंध युद्ध छिड़ जाने पर उसे सीमित रखने अथवा समाप्त करने से होता है। एक युद्ध से पहले का उपाय है, दूसरा युद्ध के बाद का।
आतंकवाद का आशय राजनीतिक ख़ून-ख़राबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज़्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं।
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| अध्याय का सवाल | सुरक्षा क्या है, और भारत के सुरक्षा सरोकार क्या-क्या हैं |
| दो नज़रिये | सुरक्षा की पारंपरिक और अपारंपरिक धारणा |
| पारंपरिक धारणा के दो पक्ष | बाहरी सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा |
| अपारंपरिक धारणा के दो पक्ष | मानवता की सुरक्षा और विश्व सुरक्षा |
| पारंपरिक के केंद्रीय मूल्य | संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता |
| विश्व-सुरक्षा की धारणा कब उभरी | 1990 के दशक में, वैश्विक तापवृद्धि, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और एड्स तथा बर्ड फ़्लू जैसी महामारियों के मद्देनज़र |
| सुरक्षा का न्यूनतम मानक | संदर्भी (राज्य अथवा जनसमूह) के अस्तित्व को ख़तरा हो, चाहे ख़तरे की प्रकृति कुछ भी हो |
2 दोनों धारणाओं की तुलना
| कसौटी | पारंपरिक धारणा | अपारंपरिक धारणा |
|---|---|---|
| संदर्भी (सुरक्षा किसकी) | भूक्षेत्र और संस्थाओं सहित राज्य | सिर्फ़ राज्य ही नहीं, व्यक्ति, समुदाय और समूची मानवता |
| ख़तरा किससे | सैन्य ख़तरा; स्रोत कोई दूसरा मुल्क | मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक ख़तरे |
| किन मूल्यों की रक्षा | संप्रभुता, स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता | ‘अभाव से मुक्ति‘ और ‘भय से मुक्ति‘ |
| तरीक़ा | सैन्य बल का प्रयोग या उसकी आशंका | सहयोग; बल-प्रयोग सिर्फ़ अंतिम उपाय और सामूहिक स्वीकृति से |
| दूसरा नाम | राष्ट्रीय सुरक्षा | ‘मानवता की सुरक्षा’ अथवा ‘विश्व-रक्षा’ |
| समेकित निष्कर्ष | सैन्य बल से सुरक्षा को ख़तरा, सैन्य बल से ही सुरक्षा कायम | सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता |
3 पारंपरिक सुरक्षा: चार तत्त्व और तीन विकल्प
| तत्त्व | क्या है |
|---|---|
| 1. अपरोध | नाश बढ़ाने के संकेत देकर दूसरे पक्ष को हमले से बाज़ रखना; युद्ध की आशंका रोकना |
| 2. रक्षा | युद्ध ठन जाय तो अपनी रक्षा करना; युद्ध को सीमित रखना या समाप्त करना |
| 3. शक्ति-संतुलन | पड़ोस के छोटे-बड़े मुल्कों को देखकर पलड़ा अपने पक्ष में बैठाना; ज़्यादातर सैन्य-शक्ति बढ़ाकर, पर आर्थिक और प्रौद्योगिकी की ताकत भी, क्योंकि सैन्य-शक्ति का यही आधार है |
| 4. गठबंधन | कई देश मिलकर सैन्य हमले को रोकने या उससे रक्षा के लिए समवेत कदम; अधिकांश को लिखित संधि से औपचारिक रूप; राष्ट्रीय हित बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं |
- युद्ध की स्थिति में सरकार के तीन विकल्प: आत्मसमर्पण करना · नाश बढ़ाने के संकेत देकर हमले से रोकना (अपरोध) · युद्ध ठन जाय तो अपनी रक्षा करना, ताकि हमलावर कामयाब न हो और पीछे हट जाए, या उसे पराजित कर देना।
- गठबंधन बदलने का किताबी उदाहरण: अमरीका ने 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख़िलाफ़ इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, पर ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व वाले अल-कायदा के 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद उन्हीं के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।
- ख़तरा बाहर से क्यों: अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कोई केंद्रीय ताकत नहीं जो देशों के बरताव पर अंकुश रखे। संयुक्त राष्ट्रसंघ अपनी बनावट के अनुरूप अपने सदस्य देशों का दास है, इसलिए हर देश को अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी ख़ुद उठानी होती है।
- न्याय-युद्ध की परंपरा: युद्ध उचित कारणों यानी आत्म-रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही; युद्ध-साधनों का सीमित इस्तेमाल; संघर्षविमुख शत्रु, निहत्थे व्यक्ति और आत्मसमर्पण करने वाले को न मारा जाए; बल-प्रयोग तभी जब बाक़ी उपाय असफल हो गए हों।
4 पारंपरिक धारणा: आंतरिक सुरक्षा
- 1945 के बाद महत्त्व क्यों घटा: अमरीका और सोवियत संघ अपनी सीमा के अंदर एकीकृत और शांति-संपन्न जान पड़े; अधिकांश यूरोपीय देशों के सामने भीतर के समुदायों से कोई गंभीर ख़तरा नहीं था, इसलिए इन देशों ने ध्यान सीमापार के ख़तरों पर केंद्रित किया।
- उपनिवेशों की चिंता: 1950 के दशक में फ़्रांस को वियतनाम में और 1950 तथा 1960 के दशक में ब्रिटेन को केन्या में जूझना पड़ा।
- शीतयुद्ध का हिसाब: दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जितने युद्ध हुए उनमें एक तिहाई के लिए शीतयुद्ध ज़िम्मेदार रहा, और इनमें अधिकांश युद्ध तीसरी दुनिया में हुए।
- नव-स्वतंत्र देशों की दो विशिष्ट चुनौतियाँ: (1) पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका, (2) अंदरूनी सैन्य-संघर्ष की चिंता। ये देश अमरीका, सोवियत संघ या औपनिवेशिक ताकतों से कहीं ज़्यादा अपने पड़ोसी देशों से आशंकित थे; झगड़े सीमा रेखा, भूक्षेत्र और आबादी पर नियंत्रण को लेकर हुए।
- आंतरिक युद्ध के दो आँकड़े: विश्व के सशस्त्र संघर्षों में 95 प्रतिशत अब आंतरिक युद्ध के अंतर्गत हैं; सन् 1946 से 1991 के बीच गृह युद्धों की संख्या में बारहगुनी वृद्धि हुई, जो पिछले 200 वर्षों में सबसे लंबी छलांग है।
5 संधियाँ: नाम, साल और किस कोटि की
| संधि | साल | कोटि और ख़ास बात |
|---|---|---|
| जैविक हथियार संधि (बॉयोलॉजिकल वीपन्स कंवेंशन, BWC) | 1972 | निरस्त्रीकरण; ऐसे हथियार बनाना और रखना प्रतिबंधित; 155 से ज़्यादा देशों ने हस्ताक्षर किए |
| रासायनिक हथियार संधि (केमिकल वीपन्स कंवेंशन, CWC) | 1997 | निरस्त्रीकरण; 193 देशों ने हस्ताक्षर किए |
| एंटी बैलेस्टिक मिसाइल संधि (ABM) | 1972 | अस्त्र-नियंत्रण; अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्टिक मिसाइलों को रक्षा-कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका; सीमित संख्या में तैनाती की अनुमति, पर व्यापक उत्पादन पर रोक |
| सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि-2 (SALT II) | साल किताब में नहीं | अस्त्र-नियंत्रण; अध्याय एक में देखी गई अमरीका-सोवियत संधियों में से एक |
| सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि (START) | साल किताब में नहीं | अस्त्र-नियंत्रण; वही जोड़ी |
| परमाणु अप्रसार संधि (NPT) | 1968 | एक अर्थ में अस्त्र-नियंत्रण संधि; 1967 से पहले हथियार बना या परखा लेने वाले देशों को रखने की अनुमति, बाक़ी वंचित; परमाण्विक आयुध समाप्त नहीं किए, हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या घटायी |
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 | ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन घटाने के दिशा-निर्देश; भारत उन 160 देशों में शामिल जिन्होंने हस्ताक्षर किए |
निरस्त्रीकरण में हथियार की किस्म ही छोड़ दी जाती है (BWC, CWC)। अस्त्र-नियंत्रण में हथियार छोड़े नहीं जाते, उन्हें बनाने या हासिल करने पर कायदे-कानून लगते हैं (ABM, SALT II, START, NPT)। विश्वास बहाली में हथियार का सवाल ही नहीं, सिर्फ़ सूचनाओं और विचारों का नियमित आदान-प्रदान है। महाशक्तियाँ सामूहिक संहार का अस्त्र यानी परमाण्विक हथियार का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती थीं, इसीलिए दोनों ने निरस्त्रीकरण के बजाय अस्त्र-नियंत्रण का सहारा लिया।
- विश्वास बहाली के उपाय (CBMs) में क्या साझा होता है: सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्द्विता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान-प्रदान का फ़ैसला करते हैं; एक-दूसरे को अपने फ़ौजी मकसद और एक हद तक अपनी सैन्य योजनाओं के बारे में बताते हैं; यह भी बताते हैं कि उनके पास किस तरह के सैन्य-बल हैं और उन्हें कहाँ तैनात किया जा रहा है। मक़सद यह आश्वासन देना है कि औचक हमले की योजना नहीं बनायी जा रही, ताकि प्रतिद्वन्द्वी देश किसी ग़लतफ़हमी या ग़फ़लत में पड़कर जंग के लिए आमादा न हो जाएँ।
- चार सवाल: अपारंपरिक धारणा की शुरुआत संदर्भी (सुरक्षा किसकी) पर सवाल उठाकर होती है, और फिर तीन और तत्त्वों पर प्रश्नचिह्न लगता है: किन चीज़ों की सुरक्षा, किन ख़तरों से सुरक्षा, और सुरक्षा के तरीक़े।
- मानवता की रक्षा का विचार: यह जनता-जनार्दन की सुरक्षा को राज्यों की सुरक्षा से बढ़कर मानता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए और अक्सर होते भी हैं, लेकिन सुरक्षित राज्य का मतलब हमेशा सुरक्षित जनता नहीं होता।
- सबसे चौंकाने वाला वाक्य: पिछले 100 वर्षों में जितने लोग विदेशी सेना के हाथों मारे गए, उससे कहीं ज़्यादा लोग ख़ुद अपनी ही सरकारों के हाथों खेत रहे।
| मानव-सुरक्षा का अर्थ | किससे बचाना |
|---|---|
| संकीर्ण | व्यक्तियों को हिंसक ख़तरों यानी ख़ून-ख़राबे से; कोफ़ी अन्नान के शब्दों में ‘व्यक्तियों और समुदायों को अंदरूनी ख़ून-ख़राबा से बचाना’ |
| व्यापक | ऊपर के साथ अकाल, महामारी और आपदाओं को भी, क्योंकि युद्ध, जन-संहार और आतंकवाद मिलकर जितने लोगों को मारते हैं उससे कहीं ज़्यादा लोग इनकी भेंट चढ़ते हैं |
| व्यापकतम | ऊपर के साथ आर्थिक सुरक्षा और मानवीय गरिमा की सुरक्षा भी; ज़ोर ‘अभाव से मुक्ति‘ और ‘भय से मुक्ति‘ पर |
7 ख़तरे के नये स्रोत
| स्रोत | किताब की अपनी बात |
|---|---|
| आतंकवाद | राजनीतिक ख़ून-ख़राबा जो जान-बूझकर नागरिकों को निशाना बनाता है; उदाहरण विमान-अपहरण और रेलगाड़ी, होटल, बाज़ार जैसी भीड़ भरी जगहों पर बम; 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला; पुराने इलाक़े मध्यपूर्व, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्षिण एशिया |
| मानवाधिकार | तीन कोटियाँ: (1) राजनीतिक अधिकार, जैसे अभिव्यक्ति और सभा करने की आज़ादी; (2) आर्थिक और सामाजिक अधिकार; (3) उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार |
| वैश्विक निर्धनता | विश्व की जनसंख्या 760 करोड़, 21वीं सदी के मध्य तक 1000 करोड़; कुल जनसंख्या-वृद्धि का 50 फ़ीसदी सिर्फ़ छह देशों में: भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया |
| प्रवास | आप्रवासी अपनी मर्ज़ी से स्वदेश छोड़ते हैं; शरणार्थी युद्ध, प्राकृतिक आपदा या राजनीतिक उत्पीड़न के कारण छोड़ने पर मजबूर होते हैं; आंतरिक रूप से विस्थापित जन घर-बार छोड़ चुके हैं पर राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं |
| महामारी | एचआईवी-एड्स, बर्ड फ़्लू और सार्स आप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन और सैन्य-अभियानों के ज़रिए तेज़ी से फैलीं; ये बताती हैं कि राष्ट्रीय सीमाएँ अब पहले से कम सार्थक रह गई हैं |
सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि कोई राज्य शरणार्थियों को स्वीकार करेगा, लेकिन उन्हें आप्रवासियों को स्वीकारने की बाध्यता नहीं होती। शरणार्थी अपनी जन्मभूमि छोड़ते हैं; आंतरिक रूप से विस्थापित जन राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही रहते हैं। किताब का उदाहरण: 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित आंतरिक रूप से विस्थापित जन के उदाहरण हैं।
8 वे आँकड़े जो सीधे पूछे जाते हैं
| आँकड़ा | मान |
|---|---|
| आंतरिक युद्ध | विश्व के सशस्त्र संघर्षों का 95%; 1946-1991 में गृह युद्धों में बारहगुनी वृद्धि, 200 वर्षों की सबसे लंबी छलांग |
| वैश्विक तापवृद्धि (समुद्रतल 2 मीटर ऊँचा उठने पर) | बांग्लादेश का 20% डूबेगा · कमोबेश पूरा मालदीव सागर में समा जाएगा · थाइलैंड की 50% आबादी को ख़तरा |
| विश्व जनसंख्या | फ़िलहाल 760 करोड़; 21वीं सदी के मध्य तक 1000 करोड़; अगले 50 सालों में सबसे गरीब देशों की आबादी तीन गुनी, कई धनी देशों की घटेगी |
| युद्ध और शरणार्थी | 1990 से 1995 के बीच सत्तर देशों के मध्य कुल 93 युद्ध, लगभग साढ़े 55 लाख मारे गये; 1990 के दशक में कुल 60 जगहों से शरणार्थी-प्रवास, तीन को छोड़कर सबके मूल में सशस्त्र संघर्ष |
| विश्व में शरणार्थी (2017) | अफ़्रीका 30% · मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ़्रीका 26% · यूरोप 17% · अमेरिका 16% · एशिया और पैसिफ़िक 11% |
| एचआईवी-एड्स | 2003 तक पूरी दुनिया में 4 करोड़ संक्रमित; दो-तिहाई अफ़्रीका में, शेष के 50 फ़ीसदी दक्षिण एशिया में; दक्षिणी अफ़्रीकी देशों में हर 6 वयस्क में 1; बोत्सवाना सबसे बदतर, 3 में से 1 |
| रवांडा 1994 | प्रतिद्वन्द्वी हुतु जनजाति ने कुछ ही हफ़्तों में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को मार डाला; तुत्सी जनजाति के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराया |
| मैड-काऊ | 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध से ब्रिटेन ने अरबों डॉलर का नुकसान उठाया; बर्ड फ़्लू के कारण कई दक्षिण एशियाई देशों को मुर्ग़-निर्यात बंद करना पड़ा |
9 सहयोगमूलक सुरक्षा
- ज़रूरत क्यों: अपारंपरिक ख़तरों से निपटने के लिए सैन्य-संघर्ष की नहीं, आपसी सहयोग की ज़रूरत है। गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य-बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्किल है; ऐसे अधिकांश मसलों में बल-प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।
- चार स्तर: सहयोग द्विपक्षीय (दो देशों के बीच), क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर का हो सकता है, यह ख़तरे की प्रकृति और देशों की इच्छा तथा क्षमता पर निर्भर करेगा।
- कौन-कौन शामिल: देशों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय संगठन (संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) · स्वयंसेवी संगठन (एमनेस्टी इंटरनेशनल, रेड क्रॉस, निजी और दानदाता संस्थाएँ, धार्मिक तथा मज़दूर संगठन, सामाजिक और विकास संगठन) · व्यवसायिक संगठन और निगम · जानी-मानी हस्तियाँ (नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसा)।
- बल-प्रयोग की शर्त: सहयोगमूलक सुरक्षा में भी अंतिम उपाय के रूप में बल-प्रयोग हो सकता है, उन सरकारों से निबटने के लिए जो अपनी ही जनता को मार रही हों या दुख-दर्द की उपेक्षा कर रही हों। पर ज़ोर यह है कि बल-प्रयोग सामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में हो, न कि कोई एक देश दूसरों की मर्ज़ी पर कान दिए बग़ैर यह रास्ता अख़्तियार करे।
10 भारत: सुरक्षा की रणनीतियाँ
| घटक | क्या है और किताब के उदाहरण |
|---|---|
| 1. सैन्य-क्षमता मज़बूत करना | पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971, 1999 में और चीन ने 1962 में भारत पर हमला किया; दक्षिण एशिया में भारत के चारों तरफ़ परमाणु हथियारों से लैस देश; पहला परमाणु परीक्षण 1974, और 1998 के परीक्षण के फ़ैसले को सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देकर उचित ठहराया |
| 2. अंतर्राष्ट्रीय कायदों और संस्थाओं को मज़बूत करना | नेहरू ने एशियाई एकता, विउपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण की हिमायत की, और अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्रसंघ को अंतिम पंच माना; भारत ने अप्रसार पर सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति की पहलकदमी की; नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग; गुटनिरपेक्षता को विश्व-शांति का तीसरा विकल्प रखा; 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करने वाले 160 देशों में शामिल; संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांतिबहाली मिशनों में सेना भेजी |
| 3. अंदरूनी सुरक्षा-समस्याओं से निबटने की तैयारी | नगालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से उग्रवादी समूहों ने इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोशिश की; भारत ने राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया, जो समुदायों को शिकायतें खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी का मौका देती है |
| 4. आर्थिक विकास और असमानता घटाना | अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से निजात मिले और आर्थिक असमानता ज़्यादा न हो; प्रयास आंशिक रूप से सफल हुए हैं |
लोकतंत्र सिर्फ़ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज़्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साधन भी है।
समकालीन विश्व राजनीति, अध्याय 5 का निष्कर्ष
11 दोहराने से पहले की परिभाषाएँ
सुरक्षा: ख़तरे से आज़ादी; पर सिर्फ़ उन गंभीर ख़तरों से, जिन्हें न रोका जाए तो केंद्रीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचे।
अपरोध: सुरक्षा-नीति का वह हिस्सा जिसका संबंध युद्ध की आशंका को रोकने से है।
रक्षा: युद्ध छिड़ जाने पर उसे सीमित रखने अथवा उसको समाप्त करने से जुड़ा उपाय।
शक्ति-संतुलन: पारंपरिक सुरक्षा-नीति का वह तत्त्व जिसमें कोई देश अपने पड़ोस की ताकतों को देखते हुए शक्ति का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने की कोशिश करता है।
गठबंधन: कई देशों का ऐसा मेल जो सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाता है और जिसे अधिकांशतः लिखित संधि से औपचारिक रूप मिलता है।
निरस्त्रीकरण: यह माँग कि सभी राज्य, चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव कुछ भी हो, कुछ ख़ास किस्म के हथियारों से बाज़ आयें।
अस्त्र-नियंत्रण: हथियारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध में कुछ कायदे-कानूनों का पालन।
विश्वास बहाली के उपाय: प्रतिद्वन्द्वी देशों के बीच सुरक्षा-मामलों पर सूचनाओं और विचारों के नियमित आदान-प्रदान की प्रक्रिया, ताकि औचक हमले की आशंका न रहे।
आतंकवाद: राजनीतिक ख़ून-ख़राबा जो जान-बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है।
मानवता की सुरक्षा: वह धारणा जो जनता-जनार्दन की सुरक्षा को राज्यों की सुरक्षा से बढ़कर मानती है; इसे ‘विश्व-रक्षा’ भी कहा जाता है।
आप्रवासी: वे लोग जो अपनी मर्ज़ी से स्वदेश छोड़ते हैं।
शरणार्थी: वे लोग जो युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण स्वदेश छोड़ने पर मज़बूर होते हैं।
आंतरिक रूप से विस्थापित जन: वे लोग जो अपना घर-बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं।
सहयोगमूलक सुरक्षा: अपारंपरिक ख़तरों से निपटने की वह रणनीति जो द्विपक्षीय, क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक सहयोग पर टिकी है और जिसमें बल-प्रयोग सिर्फ़ अंतिम उपाय है।
इस अध्याय में सबसे ज़्यादा अंक तीन जगह से आते हैं: दोनों धारणाओं की तुलना (संदर्भी, ख़तरा, मूल्य, तरीक़ा), पारंपरिक सुरक्षा के चार तत्त्व के साथ तीन विकल्प, और भारत की सुरक्षा-नीति के चार घटक अपने-अपने उदाहरणों के साथ। संधियों में निरस्त्रीकरण और अस्त्र-नियंत्रण का फ़र्क़ हर साल पूछा जाता है, और आँकड़ों में 95 प्रतिशत, बांग्लादेश 20 प्रतिशत, 760 करोड़, 4 करोड़ और रवांडा के 5 लाख सबसे ज़्यादा आते हैं।