कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 7 महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात क्या है?

उत्तर: प्रवाह। वैश्वीकरण विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक आवाजाही से जुड़ी परिघटना है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के चार प्रवाह कौन-कौन से हैं?

उत्तर: विचार, पूँजी, वस्तु और लोग। इन्हीं चार तरह के प्रवाहों की आवाजाही से किताब वैश्वीकरण को परिभाषित करती है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की पहली बैठक कब और कहाँ हुई थी?

उत्तर: 2001 में, ब्राजील के पोर्टो अलगेरे में।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना कब और किस वजह से शुरू हुई?

उत्तर: 1991 में, वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण’ किसे कहते हैं?

उत्तर: वैश्वीकरण से हर संस्कृति का कहीं ज़्यादा अलग और विशिष्ट होते जाना। प्रश्नावली में इसी को ‘सांस्कृतिक विभिन्नता’ कहा गया है।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘पुनःउपनिवेशीकरण’ शब्द किसने और किसके लिए इस्तेमाल किया है?

उत्तर: कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहा है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. 1999 में सिएट्ल में क्या हुआ था?

उत्तर: वहाँ विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक हुई और आर्थिक रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर-तरीके अपनाने के विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ से क्या आशय है?

उत्तर: ऐसे सांस्थानिक उपाय जिनसे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव कम किए जा सकें।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. विश्वव्यापी ‘पारस्परिक जुड़ाव’ क्या है?

उत्तर: यह वह जुड़ाव है जो विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों के लगातार चलने वाले प्रवाहों से पैदा होता है और उन्हीं से कायम भी रहता है। किताब इसी को वैश्वीकरण की सबसे ज़रूरी बात मानती है, क्योंकि इसी की वजह से विश्व के एक हिस्से में घटी घटना का असर दूसरे हिस्से पर पड़ता है।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. वैश्वीकरण को ‘बहुआयामी अवधारणा’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए। किताब कहती है कि इसे केवल आर्थिक परिघटना मान लेना ग़लत है और इसे एकदम सांस्कृतिक परिघटना मान लेना भी भूल होगी।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. जनार्दन का उदाहरण वैश्वीकरण का कौन-सा पहलू दिखाता है?

उत्तर: सेवाओं का वैश्वीकरण। जनार्दन कॉल-सेंटर में काम करता है, दफ़्तर में घुसते ही जॉन बन जाता है, नया लहजा और नयी भाषा अपनाता है, और सारी रात काम करता है क्योंकि वह उसके विदेशी ग्राहकों के लिए दिन का समय होता है। उसकी छुट्टियाँ भी भारतीय नहीं, अमरीकी कैलेंडर से मेल खाती हैं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. रामधारी और सारिका के उदाहरण वैश्वीकरण के किन दो अलग पहलुओं को दिखाते हैं?

उत्तर: रामधारी का उदाहरण वस्तुओं की आवाजाही दिखाता है: उसने चीन में बनी और भारत में बिक रही साइकिल ख़रीदी, और पिछले साल अमरीका में बनी ‘बार्बी डॉल’ दिलाई थी। सारिका का उदाहरण जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा दिखाता है, जो उन नये अवसरों से पैदा हुई है जो उसके परिवार की महिलाओं को पहले उपलब्ध नहीं थे।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. छपाई की तकनीक और राष्ट्रवाद का क्या रिश्ता किताब बताती है, और वह इससे क्या निष्कर्ष निकालती है?

उत्तर: किताब कहती है कि शुरू-शुरू में जब छपाई (मुद्रण) की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तर्ज़ पर वह यह अपेक्षा करती है कि आज की प्रौद्योगिकी का असर इस पर पड़ेगा कि हम अपने बारे में और सामूहिक जीवन के बारे में किस ढंग से सोचते हैं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. बर्ड फ़्लू और ‘सुनामी’ का उदाहरण किताब किस बात के लिए देती है?

उत्तर: यह दिखाने के लिए कि विश्व के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं। किताब कहती है कि बर्ड फ़्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते, ये घटनाएँ राष्ट्रीय-सीमाओं का जोर नहीं मानतीं। यही बात बड़ी आर्थिक घटनाओं पर भी लागू होती है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. ‘सांस्कृतिक समरूपता’ का क्या अर्थ है, और किताब के अनुसार इसका क्या अर्थ नहीं है?

उत्तर: इसका अर्थ यह है कि वैश्वीकरण एक जैसी संस्कृति ले आता है। पर किताब चेताती है कि इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है; विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। यही बात हम अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय 3 में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत पढ़ चुके हैं।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. नीम के पेटेन्ट का मामला क्या था?

उत्तर: अमरीकी और यूरोपीय फ़र्मों ने कुछ वनस्पतियों, मसलन ‘नीम’ को पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। भारत में इसका कड़ा विरोध हुआ। किताब इसे भारत में वैश्वीकरण के प्रतिरोध के उदाहरणों में गिनाती है, उन्हीं आवाज़ों के साथ जो बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध कर रही थीं।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. भारत में वैश्वीकरण के दक्षिणपंथी विरोध के तीन उदाहरण दीजिए।

उत्तर: किताब के अनुसार यह खेमा विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध करता है: केबल नेटवर्क के जरिए उपलब्ध कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनल, वैलेन्टाईन-डे मनाना, और स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है?

उत्तर: 1. कोई एक कारक नहीं, पर प्रौद्योगिकी अपरिहार्य: किताब कहती है कि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं, फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।
2. संचार की क्रांति: टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।
3. सोचने के तरीके पर असर: जैसे छपाई की तकनीक ने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी थी, वैसे ही आज की प्रौद्योगिकी हमारे निजी और सामूहिक जीवन के बारे में सोचने के तरीके पर असर डालेगी।
4. प्रवाहों की आसानी, पर अलग-अलग गति: विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी की तरक्की से संभव हुई है, हालाँकि पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही से ज़्यादा तेज और व्यापक होगी।
5. सिर्फ़ साधन काफ़ी नहीं: किताब जोड़ती है कि संचार-साधनों की तरक्की और उपलब्धता मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में नहीं आया; ज़रूरी यह भी है कि लोग समझें कि वे आपस में जुड़े हुए हैं। बर्ड फ़्लू और ‘सुनामी’ इसी समझ के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव के तीन पहलुओं को समझाइए।

उत्तर: किताब कहती है कि राज्य की संप्रभुता पर असर का जवाब देते समय कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा।
1. राज्य की क्षमता में कमी: कल्याणकारी राज्य की जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है, जो कानून-व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा तक सीमित रहता है और लोक-कल्याणकारी कामों से हाथ खींच लेता है। कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है, और बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ी भूमिका से सरकारों की अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता घटती है।
2. राज्य की प्रधानता कायम: राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है। देशों के बीच पुरानी ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता की दखल आज भी है, राज्य कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनिवार्य कार्य पूरे कर रहे हैं, और वे सोच-समझकर उन्हीं दायरों से हटते हैं जहाँ उनकी मर्जी हो।
3. कुछ मायनों में ताकत में इज़ाफ़ा: अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी है जिसके बूते वे नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इस सूचना के दम पर वे ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं, इसलिए नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज़्यादा ताकतवर हैं।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. आर्थिक वैश्वीकरण के समर्थकों और आलोचकों के तर्क लिखिए।

उत्तर: आलोचकों के तर्क: सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण से आबादी के एक छोटे तबके को ही फ़ायदा होगा, जबकि नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई की सुविधा आदि) के लिए सरकार पर आश्रित लोग बदहाल हो जाएँगे। वे ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ की माँग करते हैं। दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा और बलपूर्वक किए जा रहे वैश्वीकरण को रोका जाना चाहिए, क्योंकि इससे ग़रीब देश बर्बादी की कगार पर पहुँच जाएँगे। कुछ अर्थशास्त्रियों ने इसे विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहा है।
समर्थकों के तर्क: उनका तर्क है कि इससे समृद्धि बढ़ती है और ‘खुलेपन’ के कारण ज़्यादा से ज़्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है। व्यापार बढ़ने से हर देश को अपना बेहतर कर दिखाने का मौका मिलता है और इससे पूरी दुनिया को फ़ायदा होगा। वे यह भी कहते हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है और इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं।
मध्यमार्गी समर्थक: इनका कहना है कि वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. बर्गर और नीली जीन्स के उदाहरणों से किताब क्या सिद्ध करना चाहती है?

उत्तर: 1. पहला पक्ष: कुछ लोगों का तर्क है कि बर्गर अथवा नीली जीन्स की लोकप्रियता का नज़दीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है, क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है। ऐसे लोग दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं।
2. दूसरा पक्ष: किताब जोड़ती है कि यह मान लेना भूल है कि सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती।
3. बर्गर: बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए उससे वस्तुतः कोई ख़तरा नहीं; हुआ मात्र इतना कि भोजन की पसंद में एक चीज़ और शामिल हो गई।
4. नीली जीन्स: नीली जीन्स हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है। यहाँ बाहरी प्रभाव से एक अनूठी बात बनती है, और इस पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।
5. निष्कर्ष: सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफ़ा नहीं होता, और सांस्कृतिक समरूपता के साथ-साथ वैश्वीकरण सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण भी पैदा करता है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. औपनिवेशिक दौर से 1991 तक भारत की आर्थिक नीति का सफ़र लिखिए।

उत्तर: 1. औपनिवेशिक दौर: ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था।
2. आज़ादी के बाद: ब्रिटेन के साथ अपने अनुभवों से सबक लेते हुए भारत ने फ़ैसला किया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय ख़ुद सामान बनाया जाए, और यह भी कि दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि अपने उत्पादक चीजें बनाना सीख सकें। इसे ‘संरक्षणवाद’ कहा गया।
3. संरक्षणवाद की दिक्कतें: कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई, पर स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा जैसे ज़रूरी क्षेत्रों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे। भारत में आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।
4. 1991 के सुधार: वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई, जिसके अंतर्गत व्यापार और विदेशी निवेश समेत विभिन्न क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं।
5. किताब की चेतावनी: यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह भारत के लिए कितना अच्छा साबित हुआ, क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि यह है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: 1. क्या है: यह नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का एक विश्व-व्यापी मंच है।
2. कौन जुड़ता है: इस मंच के तहत मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता एकजुट होकर नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।
3. बैठकें: पहली बैठक 2001 में ब्राजील के पोर्टो अलगेरे में हुई; चौथी बैठक 2004 में मुंबई में हुई; और किताब के अनुसार इसकी बैठक नेपाल में फरवरी 2024 में हुई थी।
4. संदर्भ: यह उसी लहर का हिस्सा है जिसमें 1999 में सिएट्ल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे। भारत में इससे मिलता-जुलता मंच इंडियन सोशल फोरम है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के वामपंथी और दक्षिणपंथी आलोचकों के तर्कों में क्या अंतर है?

उत्तर: वामपंथी आलोचना: वामपंथी राजनीतिक रुझान रखने वालों का तर्क है कि मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज़्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाती है। वे यह भी कहते हैं कि राज्य के कमजोर होने से ग़रीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है।
दक्षिणपंथी आलोचना: ये आलोचक वैश्वीकरण के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। राजनीतिक अर्थों में उन्हें राज्य के कमजोर होने की चिंता है; आर्थिक अर्थों में वे चाहते हैं कि कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ का दौर फिर कायम हो; और सांस्कृतिक अर्थों में उनकी चिंता है कि परंपरागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन-मूल्य तथा तौर-तरीकों से हाथ धो देंगे।
साझा बात: दोनों ही खेमों में राज्य के कमजोर होने की चिंता दिखती है, पर वामपंथी चिंता का केंद्र ग़रीब और असमानता है, जबकि दक्षिणपंथी चिंता का केंद्र आत्मनिर्भरता और परंपरागत संस्कृति है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. किताब का कॉल-सेन्टर वाला बॉक्स वैश्वीकरण के किन पहलुओं को उजागर करता है?

उत्तर: 1. सेवाओं का वैश्वीकरण: भारत में बैठा कर्मचारी अमरीकियों के फोन-कॉल निबटाता है, यानी सेवा वहाँ पहुँच रही है जहाँ ग्राहक है।
2. संस्कृतियों का आमना-सामना: रिपोर्ट कहती है कि इस काम से असली अमरीकी संस्कृति की एक झलक मिलती है और एक औसत अमरीकी अपेक्षा से कहीं ज़्यादा जीवंत और ईमानदार लगता है।
3. प्रतिरोध और नाराज़गी: हर बातचीत खुशगवार नहीं होती; अविवेकी और बदज़बान लोगों के फोन भी आते हैं, और यह जानकर कि ‘कॉल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, फोन करने वाले का लहजा नफ़रत से भर उठता है।
4. नौकरी छिनने का डर: अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो। यह वही डर है जो किताब के ‘कल/आज’ वाले कार्टून में भी दिखता है।
स्रोत: 10 जनवरी 2005 के द हिंदू में रंजीता उर्स की रिपोर्ट।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. वैश्वीकरण की आर्थिक परिणतियाँ क्या हुई हैं? इस संदर्भ में वैश्वीकरण ने भारत पर कैसे प्रभाव डाला है?

उत्तर: क. आर्थिक वैश्वीकरण क्या है
इसमें दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाते हैं। कुछ प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं। आर्थिक वैश्वीकरण का ज़िक्र आते ही ध्यान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन पर जाता है, पर किताब कहती है कि इसे इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए; असली सवाल यह है कि फ़ायदों का बँटवारा कैसे हुआ, यानी किसे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ, किसे सबसे कम और किसने नुकसान उठाया।
ख. ठोस परिणाम
1. वस्तुओं के व्यापार में इज़ाफ़ा हुआ है, क्योंकि आयात पर लगने वाले प्रतिबंध कम हो गए हैं।
2. पूँजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध हैं, इसलिए धनी देशों के निवेशकर्ता विकासशील देशों में निवेश कर सकते हैं जहाँ उन्हें ज़्यादा मुनाफा हो।
3. विचारों का प्रवाह अबाध हो उठा है; इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका उदाहरण है।
4. लोगों की आवाजाही उतनी नहीं बढ़ी, क्योंकि विकसित देश वीज़ा-नीति से अपनी सीमाएँ अभेद्य बनाए रखते हैं।
5. एक जैसी नीतियाँ अपनाने पर भी परिणाम हर जगह अलग-अलग हुए हैं, इसलिए संदर्भ-विशेष पर ध्यान देना ज़रूरी है।
6. जनमत गहराई से बँट गया है: आलोचक सामाजिक सुरक्षा कवच माँगते हैं और कुछ अर्थशास्त्री इसे विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहते हैं, जबकि समर्थक समृद्धि और खुलेपन का तर्क देते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ़्तार तेज हो चली है।
ग. भारत पर असर
औपनिवेशिक दौर में भारत कच्चे माल का निर्यातक और बने-बनाये सामानों का आयातक था। आज़ादी के बाद ‘संरक्षणवाद’ अपनाया गया, जिससे कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई पर स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित रहे और वृद्धि-दर धीमी रही। 1991 में वित्तीय संकट और ऊँची वृद्धि-दर की इच्छा से आर्थिक-सुधार शुरू हुए और व्यापार तथा विदेशी निवेश समेत कई क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं। किताब जोड़ती है कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह सब भारत के लिए कितना अच्छा साबित हुआ, क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि यह है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के सांस्कृतिक परिणामों का मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: क. असर कहाँ तक
वैश्वीकरण के परिणाम सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक दायरों में नज़र नहीं आते; हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं। हम जो कुछ खाते-पीते-पहनते या सोचते हैं, सब पर इसका असर है, और जिन बातों को हम अपनी पसंद कहते हैं वे भी वैश्वीकरण के असर में तय होती हैं।
ख. नकारात्मक पक्ष: सांस्कृतिक समरूपता
1. डर यह है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को ख़तरा पहुँचाएगी, क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है।
2. इसका अर्थ किसी विश्व-संस्कृति का उदय नहीं है; विश्व-संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। यही बात अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय 3 में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत पढ़ी जा चुकी है।
3. बर्गर और नीली जीन्स की लोकप्रियता को कुछ लोग अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से जोड़ते हैं और दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं।
4. इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे ख़त्म होती है, इसलिए यह केवल ग़रीब देशों के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए ख़तरनाक है।
ग. सकारात्मक पक्ष
1. यह मान लेना भूल है कि सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती और हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करती रहती है।
2. कुछ बाहरी प्रभाव नकारात्मक होते हैं क्योंकि इससे हमारी पसंदों में कमी आती है; कभी-कभी इनसे पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है, तो कभी परंपरागत मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।
3. बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए उससे वस्तुतः कोई ख़तरा नहीं। नीली जीन्स हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है, और इस अनूठे पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी।
घ. निष्कर्ष: वैभिन्नीकरण
सांस्कृतिक समरूपता वैश्वीकरण का एक पहलू है, तो इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है: हर संस्कृति कहीं ज़्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है, जिसे सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में ताकत का सवाल गौण है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफ़ा नहीं होता।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के संदर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर: क. क्षमता में कमी वाला पक्ष
1. पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा पुरानी पड़ गई है और उसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है, जो कानून-व्यवस्था बनाये रखने और नागरिकों की सुरक्षा जैसे कुछेक मुख्य कामों तक सीमित रहता है।
2. ऐसे राज्य ने आर्थिक और सामाजिक-कल्याण वाले कई कामों से अपने को खींच लिया है, और इनकी जगह अब बाज़ार आर्थिक तथा सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।
3. बहुराष्ट्रीय निगम पूरे विश्व में पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है, जिससे सरकारों की अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता घटती है।
4. विकासशील देशों में इसका असर सबसे गहरा है, क्योंकि यहाँ नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई की सुविधा आदि) के लिए सरकार पर आश्रित लोगों की संख्या बड़ी है। इसीलिए सामाजिक न्याय के पक्षधर ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ की माँग करते हैं, और अनेक आंदोलन इसे भी अपर्याप्त मानते हैं।
ख. दूसरा पक्ष: राज्य अब भी महत्त्वपूर्ण
1. राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है और विश्व राजनीति में देशों के बीच पुरानी ईर्ष्या तथा प्रतिद्वंद्विता की दखल अब भी है।
2. राज्य कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनिवार्य कार्य पूरे कर रहे हैं और बहुत सोच-समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मर्जी हो। यानी हटना हमेशा मजबूरी नहीं, कई बार चुनाव है।
ग. तीसरा पक्ष: कुछ मायनों में ताकत बढ़ी
अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी है जिसके बूते वे नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इस सूचना के दम पर राज्य ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं; उनकी क्षमता बढ़ी है, कम नहीं हुई।
घ. मूल्यांकन
इसलिए यह कहना कि वैश्वीकरण ने राज्य को केवल कमजोर किया है, अधूरा निष्कर्ष होगा। राज्य की कल्याणकारी भूमिका ज़रूर सिकुड़ी है और यही विकासशील देशों की असली चिंता है, पर उसकी संप्रभु और सुरक्षा-संबंधी भूमिका, और सूचना पर उसकी पकड़, पहले से मजबूत हुई है। किताब की सलाह यही है कि विशिष्ट संदर्भों पर ध्यान दिए बिना सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज किया जाए।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया है और भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?

उत्तर: क. वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया
1. लंबा इतिहास: पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है।
2. औपनिवेशिक दौर: ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के चलते भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक बना।
3. संरक्षणवाद: आज़ादी के बाद भारत ने ख़ुद सामान बनाने और आयात रोकने का फ़ैसला किया। इससे कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई, पर स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित रहे और वृद्धि-दर धीमी रही।
4. 1991 के सुधार: वित्तीय संकट और ऊँची वृद्धि-दर की इच्छा से सुधार शुरू हुए और व्यापार तथा विदेशी निवेश समेत कई क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं।
5. रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर: जनार्दन का कॉल-सेंटर, चीन में बनी साइकिल और अमरीका में बनी बार्बी डॉल, तथा सारिका के सामने खुले नये अवसर और उनसे पैदा दुविधा, तीनों इसी असर के उदाहरण हैं।
ख. भारत वैश्वीकरण को कैसे प्रभावित कर रहा है
1. सेवाओं के ज़रिए: भारतीय कॉल-सेंटर विदेशी ग्राहकों को सेवा दे रहे हैं, और किताब का बॉक्स दिखाता है कि यह अमरीका में नौकरी छिनने की बहस तक पहुँच गया है।
2. संस्कृति के ज़रिए: जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता पहनने का चलन अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी; जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है। यही सांस्कृतिक प्रभाव के एकतरफ़ा न होने का प्रमाण है।
3. प्रतिरोध के ज़रिए: भारत में वैश्वीकरण का विरोध कई हलकों से हुआ है, और 2004 में वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक मुंबई में हुई, यानी भारत वैश्वीकरण-विरोधी विश्वव्यापी नेटवर्क का एक केंद्र भी बना।
ग. निष्कर्ष
अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. वैश्वीकरण के प्रतिरोध का विवरण दीजिए और बताइए कि भारत में यह प्रतिरोध किन रूपों में सामने आया है।

उत्तर: क. आलोचना के दो खेमे
1. वामपंथी: मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज़्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाती है; राज्य के कमजोर होने से ग़रीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता घटती है।
2. दक्षिणपंथी: राजनीतिक अर्थ में राज्य के कमजोर होने की चिंता; आर्थिक अर्थ में कुछ क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ की वापसी की माँग; सांस्कृतिक अर्थ में परंपरागत संस्कृति और सदियों पुराने जीवन-मूल्यों के खोने की चिंता।
ख. आंदोलनों का चरित्र
वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटवर्क में भागीदारी करते हैं और दूसरे देशों के अपने जैसे लोगों से गठजोड़ करते हैं। बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं, बल्कि वैश्वीकरण के किसी ख़ास कार्यक्रम के विरोधी हैं, जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।
ग. दो बड़े पड़ाव
1. 1999, सिएट्ल: विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए। विरोधियों का तर्क था कि आर्थिक रूप से ताकतवर देश व्यापार के अनुचित तौर-तरीके अपना रहे हैं और उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है।
2. वर्ल्ड सोशल फोरम: नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का विश्व-व्यापी मंच, जिसमें मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता एकजुट होते हैं। पहली बैठक 2001 में पोर्टो अलगेरे में, चौथी 2004 में मुंबई में, और नेपाल में फरवरी 2024 में।
घ. भारत में प्रतिरोध
1. सामाजिक आंदोलनों से लोगों को अपने पास-पड़ोस की दुनिया समझने और अपनी समस्याओं के हल तलाशने में मदद मिलती है।
2. आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से और इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से उठी हैं।
3. औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।
4. ‘नीम’ जैसी वनस्पतियों को अमरीकी और यूरोपीय फ़र्मों द्वारा पेटेन्ट कराने के प्रयासों का कड़ा विरोध हुआ।
5. दक्षिणपंथी खेमे से विरोध सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर हुआ: केबल नेटवर्क के विदेशी टी.वी. चैनल, वैलेन्टाईन-डे मनाना, और छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
अध्याय की शुरुआत में किताब वैश्वीकरण के तीन उदाहरण देती है और फिर कहती है कि कुछ उदाहरण इनसे अलग हैं। ये अलग उदाहरण इस तरह हैं: ‘फसल के मारे जाने से कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महँगे बीज खरीदे थे। यूरोप स्थित एक बड़ी और अपनी प्रतियोगी कंपनी को एक भारतीय कंपनी ने खरीद लिया जबकि खरीदी गई कंपनी के मालिक इस खरीददारी का विरोध कर रहे थे। अनेक खुदरा दुकानदारों को भय है कि अगर कुछ बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने देश में खुदरा दुकानों की अपनी शृंखला खोल ली तो उनकी रोजी-रोटी जाती रहेगी। मुम्बई के एक फिल्म-निर्माता पर आरोप लगे कि उसने हॉलीवुड में बनी एक फिल्म की कहानी उठाकर अपनी फिल्म बना ली है। पश्चिमी परिधान पहनने वाली कॉलेज की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन ने अपने एक बयान में धमकी दी है।’

(क) 1 अंक इन उदाहरणों में से कौन-सा उदाहरण यह दिखाता है कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर नहीं होती?
उत्तर: एक भारतीय कंपनी द्वारा यूरोप स्थित एक बड़ी प्रतियोगी कंपनी को खरीद लेना।

(ख) 2 अंक किताब इन उदाहरणों से कौन-से दो निष्कर्ष निकालती है?
उत्तर: पहला, कि वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता और लोगों पर इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं; दरअसल ऐसे लोगों की संख्या ज़्यादा है जो मानते हैं कि इसके नकारात्मक प्रभाव ज़्यादा हैं। दूसरा, कि वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा और ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।

(ग) 3 अंक इन उदाहरणों में से कोई तीन चुनकर बताइए कि हर एक वैश्वीकरण के किस आयाम से जुड़ा है।
उत्तर: 1. बहुराष्ट्रीय कंपनी के महँगे बीज और किसानों की आत्महत्या: आर्थिक आयाम, जिसमें बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ी भूमिका और कमजोर तबकों पर उसका बोझ दिखता है, यानी वही चिंता जिससे ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ की माँग उठती है।
2. खुदरा दुकानदारों का भय: आर्थिक आयाम, जिसमें बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से स्थानीय रोज़ी-रोटी पर ख़तरे की बात है। यही चिंता भारत में बहुराष्ट्रीय निगमों के विरोध की जड़ में है।
3. पश्चिमी परिधान पहनने वाली छात्राओं को धमकी: सांस्कृतिक आयाम, जो भारत में दक्षिणपंथी खेमे के उसी विरोध से मेल खाता है जिसमें छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि पर आपत्ति है।

केस स्टडी
किताब राज्य और वैश्वीकरण पर लिखती है: ‘सबसे सीधा-सरल विचार यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत में कमी आती है। पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है।’ इसके तुरंत बाद वह जोड़ती है: ‘वस्तुतः कुछ मायनों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में इजाफा हुआ है। अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इस सूचना के दम पर राज्य ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। उनकी क्षमता बढ़ी है; कम नहीं हुई।’

(क) 1 अंक कल्याणकारी राज्य की जगह किसने ले ली है?
उत्तर: न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार राज्य की ताकत में इज़ाफ़ा किस वजह से हुआ है?
उत्तर: अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी की वजह से, जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं और उस सूचना के दम पर ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं।

(ग) 3 अंक इन दोनों बातों को साथ रखकर वैश्वीकरण और राज्य के रिश्ते पर अपना निष्कर्ष लिखिए।
उत्तर: दोनों बातें एक-दूसरे को काटती नहीं, एक ही तस्वीर के दो हिस्से हैं। वैश्वीकरण से राज्य की कल्याणकारी भूमिका सिकुड़ी है: वह आर्थिक और सामाजिक-कल्याण वाले कामों से हटा है और बाज़ार प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक बन गया है। पर उसकी संप्रभु और सुरक्षा-संबंधी भूमिका कायम है, राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में उसकी प्रधानता को चुनौती नहीं मिली है, और नई प्रौद्योगिकी से नागरिकों पर उसकी पकड़ पहले से मजबूत हुई है। इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि राज्य की भूमिका बदली है, केवल घटी नहीं, और किताब की सलाह के मुताबिक़ विशिष्ट संदर्भों पर ध्यान दिए बिना सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज करना चाहिए।