कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 7 NCERT Solutions (प्रश्नावली के हल) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक समकालीन विश्व राजनीति के अध्याय 7 वैश्वीकरण की प्रश्नावली के सभी ग्यारह प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और कक्षा-गतिविधि के उत्तर प्रश्नावली के बाद दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

शुरू करने से पहले

इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी है: दोनों में ग्यारह प्रश्न हैं, उसी क्रम में, प्रश्न 1 से 5 तक हर प्रश्न के चार-चार विकल्प दोनों में एक जैसे हैं और सही विकल्प भी हर बार वही है। यानी यहाँ उत्तर का अक्षर ग़लत संस्करण पढ़ लेने से नहीं बदल सकता, जो इसी किताब के कुछ दूसरे अध्यायों में असली ख़तरा है।

प्रश्न 1 से 5 ध्यान से पढ़िए। इनमें से चार पूछते हैं कि कौन-सा कथन सही है और एक पूछता है कि कौन-सा कथन ग़लत है। जो विद्यार्थी प्रश्न 5 को भी ‘सही कथन चुनिए’ मानकर हल कर देता है, वह जानते-बूझते हुए भी अंक गँवा देता है।

1 प्रश्न 1

प्रश्न 1

प्र. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक परिघटना है।
(ख) वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुई।
(ग) वैश्वीकरण और पश्चिमीकरण समान हैं।
(घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।

उत्तर: (घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।

क्यों: किताब यह बात सीधे-सीधे कहती है, ‘वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए।’ अध्याय की पूरी बनावट भी यही दिखाती है, क्योंकि इसमें राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक प्रभाव और सांस्कृतिक प्रभाव तीनों के अलग-अलग खंड हैं।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: (क) को किताब ख़ुद ख़ारिज करती है, ‘यह मान लेना ग़लत है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक परिघटना है। ठीक इसी तरह यह मान लेना भी भूल होगी कि वैश्वीकरण एकदम सांस्कृतिक परिघटना है।’ (ख) दो अलग बातें गड्डमड्ड कर देता है: 1991 वह साल है जब भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई, जबकि चार प्रवाहों के अर्थ में वैश्वीकरण ‘मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है’ और उसका ‘एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है’। (ग) ग़लत है क्योंकि सांस्कृतिक समरूपता, यानी पश्चिमी संस्कृति का लादा जाना, वैश्वीकरण के सांस्कृतिक असर का सिर्फ़ एक पहलू है; उसी प्रक्रिया से उलटा असर, सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण, भी पैदा होता है।

2 प्रश्न 2

प्रश्न 2

प्र. वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) विभिन्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है।
(ख) सभी देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव समान रहा है।
(ग) वैश्वीकरण का असर सिर्फ राजनीतिक दायरे तक सीमित है।
(घ) वैश्वीकरण से अनिवार्यतया सांस्कृतिक समरूपता आती है।

उत्तर: (क) विभिन्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है।

क्यों: किताब का वाक्य यही है, ‘वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा है, यह कुछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा ज़्यादा प्रभावित कर रहा है।’ इसीलिए वह आगे चेतावनी देती है कि विशिष्ट संदर्भों पर पर्याप्त ध्यान दिए बिना सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने से परहेज़ किया जाए।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: (ख) ऊपर वाले वाक्य का ठीक उलटा कहता है। (ग) अध्याय की बनावट से ही कट जाता है, जिसमें राजनीतिक के अलावा आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभावों के पूरे-पूरे खंड हैं। (घ) की गड़बड़ ‘अनिवार्यतया’ शब्द में है: सांस्कृतिक समरूपता वैश्वीकरण का एक पहलू ज़रूर है, पर किताब कहती है कि उसी प्रक्रिया से ‘इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है’ और हर संस्कृति ‘कहीं ज़्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है’।

3 प्रश्न 3

प्रश्न 3

प्र. वैश्वीकरण के कारणों के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है।
(ख) जनता का एक खास समुदाय वैश्वीकरण का कारण है।
(ग) वैश्वीकरण का जन्म संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ।
(घ) वैश्वीकरण का एकमात्र कारण आर्थिक धरातल पर पारस्परिक निर्भरता है।

उत्तर: (क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है।

क्यों: किताब का सूत्र-वाक्य याद रखने लायक है, ‘हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।’ टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के आविष्कारों ने संचार की क्रांति कर दिखायी, और विचार, पूँजी, वस्तु तथा लोगों की आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की से ही संभव हुई है। विकल्प के शब्द पर ग़ौर कीजिए, यह ‘एक महत्त्वपूर्ण’ कारण कहता है, इकलौता कारण नहीं।

बाकी विकल्प क्यों नहीं: (ख) का अध्याय में कोई आधार नहीं है, किताब वैश्वीकरण को कहीं भी किसी ख़ास समुदाय के मत्थे नहीं मढ़ती। (ग) इसलिए ग़लत है कि किताब वैश्वीकरण को एक मजबूत ऐतिहासिक आधार वाली परिघटना बताती है जो मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रही है; वह यह भी कहती है कि ‘ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।’ (घ) की गड़बड़ ‘एकमात्र’ शब्द में है, और वजह वही है जिससे (क) सही होता है: कोई एक कारक अकेले ज़िम्मेदार नहीं।

4 प्रश्न 4

प्रश्न 4

प्र. वैश्वीकरण के बारे कौन-सा कथन सही है?
(क) वैश्वीकरण का संबंध सिर्फ वस्तुओं की आवाजाही से है।
(ख) वैश्वीकरण में मूल्यों का संघर्ष नहीं होता।
(ग) वैश्वीकरण के अंग के रूप में सेवाओं का महत्त्व गौण है।
(घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।

उत्तर: (घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।

क्यों: चार प्रवाह गिनाने के बाद किताब कहती है, ‘यहाँ सबसे ज़रूरी बात है “विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव” जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है।’

बाकी विकल्प क्यों नहीं: तीनों को अध्याय की शुरुआत के तीन उदाहरण ही काट देते हैं। (क) ग़लत है क्योंकि वस्तुएँ चार प्रवाहों में से सिर्फ़ एक हैं, बाकी तीन हैं विचार, पूँजी और लोग। (ख) ग़लत है क्योंकि सारिका के सामने किताब के अपने शब्दों में ‘जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा की स्थिति है’। (ग) ग़लत है क्योंकि कॉल-सेंटर में काम करने वाला जनार्दन ‘सेवाओं के वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है’।

छपाई की एक बात

हिंदी संस्करण में यह प्रश्न ‘वैश्वीकरण के बारे कौन-सा कथन सही है?’ छपा है, यानी ‘बारे’ के बाद ‘में’ छूट गया है। ऊपर प्रश्न वैसा ही रखा गया है जैसा किताब में छपा है। अंग्रेज़ी संस्करण में यही प्रश्न पूरा है। इससे उत्तर पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

5 प्रश्न 5

प्रश्न 5

प्र. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन ग़लत है?
(क) वैश्वीकरण के समर्थकों का तर्क है कि इससे आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।
(ख) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे आर्थिक असमानता और ज़्यादा बढ़ेगी।
(ग) वैश्वीकरण के पैरोकारों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।
(घ) वैश्वीकरण के आलोचकों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।

उत्तर: (ग) वैश्वीकरण के पैरोकारों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।

यह कथन ग़लत क्यों है: सांस्कृतिक समरूपता वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ जताया गया डर है, उसका वादा नहीं। किताब इसे इसी रूप में पेश करती है, ‘वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी। वैश्वीकरण से यह होता है क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है।’ यही वे लोग कहते हैं जो दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ़ इशारा करते हैं। यह तर्क वैश्वीकरण के विरोध में है, इसलिए इसे पैरोकारों के मुँह में रख देना कहने वाले को ही उलट देता है।

बाकी तीन कथन सही क्यों हैं: (क) किताब से मेल खाता है, ‘आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का तर्क है कि इससे समृद्धि बढ़ती है और “खुलेपन” के कारण ज़्यादा से ज़्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है।’ (ख) वामपंथी और सामाजिक न्याय, दोनों तरफ़ की आलोचना से मेल खाता है: मौजूदा वैश्वीकरण ‘धनिकों को और ज़्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और गरीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाती है’, और आबादी के एक छोटे तबके को ही फ़ायदा होगा जबकि सरकार पर आश्रित लोग बदहाल हो जाएँगे। (घ) वही डर है जो ऊपर बताया गया, इस बार सही लोगों यानी आलोचकों के नाम के साथ।

परीक्षा संकेत

प्रश्नावली में यही एक प्रश्न है जो ग़लत कथन माँगता है। विकल्प देखने से पहले प्रश्न-पत्र पर ‘ग़लत’ शब्द के नीचे लकीर खींच दीजिए।

6 प्रश्न 6

प्रश्न 6

प्र. विश्वव्यापी ‘पारस्परिक जुड़ाव’ क्या है? इसके कौन-कौन से घटक हैं?

उत्तर:

1. यह है क्या। एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है प्रवाह। इन्हीं प्रवाहों की निरंतरता से जो चीज़ पैदा होती है और कायम रहती है, वही ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ है। दूसरे शब्दों में, यह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की वह हालत है जिसमें लगातार होने वाली आवाजाही उन्हें आपस में इस तरह बाँध देती है कि एक हिस्से में घटी घटना दूसरे हिस्से पर असर डालती है।

2. इसके घटक: चार प्रवाह।

  • विचार का विश्व के एक हिस्से से दूसरे हिस्सों में पहुँचना। किताब का उदाहरण है इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार, जिसके चलते विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही।
  • पूँजी का एक से ज़्यादा जगहों पर जाना। पूँजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध हैं, इसलिए धनी देश का निवेशकर्ता अपना धन कहीं और लगा सकता है, ख़ासकर विकासशील देशों में जहाँ उसे ज़्यादा मुनाफ़ा होगा।
  • वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना और उनका व्यापार। किताब का अपना उदाहरण रामधारी की वह साइकिल है जो बनी चीन में थी और बिक भारत में रही थी।
  • लोगों की बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आवाजाही। यही वह प्रवाह है जो सबसे कम बढ़ा, क्योंकि विकसित देश अपनी वीजा-नीति के ज़रिए अपनी सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं।

3. इससे निकलता क्या है। इसी जुड़ाव के कारण आज हम इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक हिस्से में घटने वाली घटना का प्रभाव दूसरे हिस्से में भी पड़ेगा। किताब के अपने उदाहरण में बर्ड फ़्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते, ये घटनाएँ राष्ट्रीय-सीमाओं का जोर नहीं मानतीं। इसी तरह बड़ी आर्थिक घटनाओं का प्रभाव उनके क्षेत्रीय परिवेश तक सीमित न रहकर विश्व भर में महसूस किया जाता है।

7 प्रश्न 7

प्रश्न 7

प्र. वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है?

उत्तर:

1. अपरिहार्य कारण, पर इकलौता नहीं। उत्तर की शुरुआत किताब के इसी वाक्य से कीजिए, ‘हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।’ यही वाक्य प्रश्न 3 के विकल्प (क) को सही और (घ) को ग़लत बनाता है।

2. संचार की क्रांति। इसमें कोई शक नहीं कि टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।

3. सोचने का तरीका भी बदलती है। शुरू-शुरू में जब छपाई (मुद्रण) की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तरह आज यह अपेक्षा की जा सकती है कि प्रौद्योगिकी का असर हमारे अपने बारे में और सामूहिक जीवन के बारे में सोचने के तरीके पर पड़ेगा।

4. चारों प्रवाहों को संभव बनाया। विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभिन्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुई तरक्की के कारण संभव हुई है।

5. हर प्रवाह की रफ़्तार एक जैसी नहीं। इन प्रवाहों की गति में अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में ज़्यादा तेज और व्यापक होगी।

6. अकेली प्रौद्योगिकी काफ़ी नहीं। किताब यह भी साफ़ करती है कि ‘संचार-साधनों की तरक्की और उनकी उपलब्धता मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में आया हो, ऐसी बात नहीं।’ ज़रूरी बात यह है कि विश्व के विभिन्न भागों के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं।

8 प्रश्न 8

प्रश्न 8

प्र. वैश्वीकरण के संदर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें?

उत्तर: किताब कहती है कि राज्य की संप्रभुता की परंपरागत धारणा पर वैश्वीकरण के असर का जवाब देते समय ‘कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा’। आलोचनात्मक मूल्यांकन का मतलब है तीनों पहलू सामने रखना और फिर राय देना।

1. राज्य की क्षमता घटती है। सबसे सीधा-सरल विचार यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता, यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत, में कमी आती है। पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है, जो कानून-व्यवस्था बनाये रखने और नागरिकों की सुरक्षा जैसे कुछेक मुख्य कामों तक अपने को सीमित रखता है और पहले के कई लोक-कल्याणकारी कामों से अपने को खींच चुका है।

2. राज्य की जगह बाज़ार और बहुराष्ट्रीय निगम ले लेते हैं। लोक-कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है। पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है, जिससे सरकारों के अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता में कमी आती है।

3. इसकी सबसे बड़ी मार विकासशील देशों पर क्यों पड़ती है। सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण से आबादी के एक छोटे तबके को ही फ़ायदा होगा, जबकि नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ़-सफ़ाई की सुविधा आदि) के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जाएँगे। इसीलिए वे ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ जैसे सांस्थानिक उपायों पर जोर देते हैं। दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा, और उन्होंने बलपूर्वक किए जा रहे वैश्वीकरण को रोकने की आवाज़ लगाई है, क्योंकि इससे ग़रीब देश आर्थिक रूप से बर्बादी की कगार पर पहुँच जाएँगे और ख़ासकर इन देशों के गरीब लोग एकदम बदहाल हो जाएँगे। कुछ अर्थशास्त्रियों ने तो आर्थिक वैश्वीकरण को ‘विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण’ कहा है।

4. लेकिन ताकत हमेशा घटती ही हो, ऐसा नहीं। किताब साफ़ कहती है कि राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं मिली है। विश्व की राजनीति में अब भी देशों के बीच पुरानी ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता की दखल है। राज्य कानून और व्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अपने अनिवार्य कार्य पूरे कर रहे हैं और बहुत सोच-समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मर्जी हो। राज्य अभी भी महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।

5. कुछ मायनों में तो राज्य पहले से ताकतवर हुआ है। वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की ताकत में इजाफा भी हुआ है। अब राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते वे अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं, और इस सूचना के दम पर ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। इस प्रकार नई प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से ज़्यादा ताकतवर हैं।

6. मूल्यांकन। इसलिए राज्य की बदलती भूमिका दोनों तरफ़ काटती है, और ईमानदार निष्कर्ष वही है जिस पर किताब ख़ुद जोर देती है: हर जगह एक समान नीति अपना लेने का मतलब यह नहीं होता कि हर जगह परिणाम भी समान होंगे। वैश्वीकरण के कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारों ने एकसार आर्थिक नीतियाँ अपनायी हैं, पर विश्व के विभिन्न भागों में उनके परिणाम बहुत अलग-अलग हुए हैं। इसलिए सर्व-सामान्य निष्कर्ष निकालने के बजाय संदर्भ-विशेष पर ध्यान देना होगा।

9 प्रश्न 9

प्रश्न 9

प्र. वैश्वीकरण की आर्थिक परिणतियाँ क्या हुई हैं? इस संदर्भ में वैश्वीकरण ने भारत पर कैसे प्रभाव डाला है।?

उत्तर, पहला हिस्सा: आर्थिक परिणतियाँ।

1. आर्थिक वैश्वीकरण की सही परिभाषा। जैसे ही आर्थिक वैश्वीकरण का उल्लेख होता है, हमारा ध्यान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं तथा विश्व भर में आर्थिक नीतियों के निर्धारण में इनकी भूमिका पर जाता है। पर किताब चेताती है कि वैश्वीकरण को इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें इन संस्थाओं के अलावा भी कई खिलाड़ी शामिल हैं। इसे व्यापक नज़र से समझने के लिए हमें आर्थिक फ़ायदों के बँटवारे के अर्थ में सोचना चाहिए: किसे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ, किसे सबसे कम, और किसने नुकसान उठाया।

2. आर्थिक प्रवाह तेज हुए, कुछ स्वेच्छा से और कुछ जबरन। आर्थिक वैश्वीकरण में दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक प्रवाह तेज हो जाता है। कुछ प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं। ये प्रवाह वस्तुओं, पूँजी, जनता अथवा विचारों के हो सकते हैं।

3. क्या-क्या बढ़ा। वस्तुओं के व्यापार में इजाफा हुआ है, क्योंकि आयात पर लगने वाले प्रतिबंध अब कम हो गए हैं। पूँजी की आवाजाही पर भी कहीं कम प्रतिबंध हैं, इसलिए धनी देशों के निवेशकर्ता विकासशील देशों में निवेश कर सकते हैं जहाँ उन्हें ज़्यादा मुनाफ़ा होगा। विचारों का प्रवाह अबाध हो उठा है, और इंटरनेट तथा कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका उदाहरण है।

4. क्या नहीं बढ़ा। जिस सीमा तक वस्तुओं और पूँजी का प्रवाह बढ़ा है, उस सीमा तक लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ सकी है। विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए रखते हैं, ताकि दूसरे देशों के नागरिक आकर उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।

5. नतीजा एक जैसा नहीं रहा। वैश्वीकरण के कारण सरकारों ने एकसार आर्थिक नीतियाँ तो अपनायीं, पर विश्व के विभिन्न भागों में इसके परिणाम बहुत अलग-अलग हुए हैं।

6. जनमत गहराई से बँट गया। आर्थिक वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराई से बँट गया है। आलोचक कहते हैं कि सरकारें ज़िम्मेदारियों से हाथ खींच रही हैं, फ़ायदा आबादी के एक छोटे तबके को ही होगा और सरकार पर आश्रित लोग बदहाल हो जाएँगे; इसलिए वे ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ माँगते हैं, और कुछ अर्थशास्त्रियों ने इसे ‘विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण’ कहा है। समर्थक कहते हैं कि इससे समृद्धि बढ़ती है और खुलेपन से ज़्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है, व्यापार बढ़ने से हर देश को अपना बेहतर कर दिखाने का मौका मिलता है, और आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है क्योंकि इतिहास की धारा को अवरुद्ध करना कोई बुद्धिमानी नहीं। मध्यमार्गी समर्थकों का कहना है कि ‘वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।’ इतना तय है कि ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ़्तार अब तेज हो चली है और सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।

उत्तर, दूसरा हिस्सा: भारत पर प्रभाव।

7. औपनिवेशिक विरासत। पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है। औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था।

8. संरक्षणवाद और उसकी कीमत। आज़ादी के बाद ब्रिटेन के साथ अपने अनुभवों से सबक लेते हुए हमने तय किया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय ख़ुद सामान बनाया जाए, और दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजें बनाना सीख सकें। इस ‘संरक्षणवाद’ से कुछ नयी दिक्कतें पैदा हुईं: कुछ क्षेत्रों में तरक्की हुई, पर स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा जैसे ज़रूरी क्षेत्रों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे, और भारत में आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।

9. 1991 के आर्थिक सुधार। 1991 में, वित्तीय संकट से उबरने और आर्थिक वृद्धि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू हुई, जिसके अंतर्गत व्यापार और विदेशी निवेश समेत विभिन्न क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं।

10. इसे परखा कैसे जाए। किताब ख़ुद कहती है कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है, ‘क्योंकि अंतिम कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।’

छपाई की एक बात

हिंदी संस्करण में इस प्रश्न का अंत ‘…प्रभाव डाला है।?’ छपा है, यानी प्रश्नवाचक चिह्न से पहले पूर्ण विराम भी है। ऊपर प्रश्न किताब की अपनी छपाई के अनुसार ही दिया गया है।

10 प्रश्न 10

प्रश्न 10

प्र. क्या आप इस तर्क से सहमत हैं कि वैश्वीकरण से सांस्कृतिक विभिन्नता बढ़ रही है?

उत्तर: हाँ, काफ़ी हद तक सहमत हूँ, बशर्ते हम यह मान लें कि समरूपता और विभिन्नता एक ही प्रक्रिया के दो असर हैं, आपस में टकराने वाले दो अलग-अलग वर्णन नहीं। किताब ख़ुद यही रुख़ अपनाती है।

1. दूसरी तरफ़ की बात पहले रखनी होगी। वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी, क्योंकि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है। पर समरूपता का यह अर्थ नहीं कि किसी विश्व-संस्कृति का उदय हो रहा है; विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। किताब बताती है कि यह बात हम अमरीकी वर्चस्व वाले अध्याय तीन में वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत पढ़ चुके हैं। बर्गर या नीली जीन्स की लोकप्रियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से जोड़ा जाता है, और ऐसे तर्क देने वाले अक्सर दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ़ इशारा करते हैं। चूँकि इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे खत्म होती है, यह केवल गरीब देशों के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के लिए खतरनाक है।

2. पर यह पूरी तस्वीर नहीं है। किताब कहती है, ‘यह मान लेना एक भूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती। हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करते रहती है।’

3. बाहरी प्रभाव तीन अलग-अलग तरह से काम करता है। कुछ बाहरी प्रभाव नकारात्मक होते हैं क्योंकि इससे हमारी पसंदों में कमी आती है। कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है, तो कभी इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।

4. किताब के अपने दो उदाहरण। बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए बर्गर से वस्तुतः कोई खतरा नहीं है; इससे हुआ मात्र इतना है कि हमारे भोजन की पसंद में एक चीज़ और शामिल हो गई। दूसरी तरफ़, नीली जीन्स हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है, और मज़ेदार बात यह है कि इस अनूठे पहरावे को अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी है। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।

5. निष्कर्ष, किताब के अपने शब्दों में। ‘सांस्कृतिक समरुपता वैश्वीकरण का एक पहलू है तो वैश्वीकरण से इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है। वैश्वीकरण से हर संस्कृति कहीं ज़्यादा अलग और विशिष्ट होते जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।’ इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में उनकी ताकत का सवाल गौण है, पर इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफा नहीं होता।

शब्द पर ध्यान दीजिए

प्रश्नावली में इसे ‘सांस्कृतिक विभिन्नता’ कहा गया है, जबकि अध्याय के भीतर इसी विचार का नाम ‘सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण’ (cultural heterogenisation) है। दोनों एक ही बात हैं। उत्तर में वैभिन्नीकरण शब्द ज़रूर लिखिए, क्योंकि किताब का अपना पारिभाषिक शब्द वही है।

परीक्षा संकेत

जो उत्तर सिर्फ़ इतना कहता है कि ‘हाँ, संस्कृतियाँ ज़्यादा विशिष्ट होती जा रही हैं’, उसे कम अंक मिलते हैं। अंक इसमें हैं कि पहले समरूपता रखी जाए, फिर वैभिन्नीकरण, और फिर यह कहा जाए कि दोनों एक ही प्रक्रिया से निकलते हैं।

11 प्रश्न 11

प्रश्न 11

प्र. वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया है और भारत कैसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?

उत्तर, पहला हिस्सा: वैश्वीकरण ने भारत को कैसे प्रभावित किया।

1. आर्थिक तौर पर। भारत की कहानी औपनिवेशिक दौर से शुरू होती है, जब ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के चलते भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक बना; फिर आज़ादी के बाद अपनाया गया ‘संरक्षणवाद’, जिसमें स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित रहे और वृद्धि-दर धीमी रही; और फिर 1991 में वित्तीय संकट से उबरने तथा ऊँची वृद्धि-दर की इच्छा से शुरू हुए आर्थिक-सुधार, जिनके अंतर्गत व्यापार और विदेशी निवेश समेत कई क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं।

2. काम और सेवाओं पर। जनार्दन की कॉल-सेंटर की नौकरी किताब की अपनी तस्वीर है: दफ़्तर में घुसने के साथ ही वह जॉन बन जाता है, नया लहजा अख़्तियार कर लेता है, हजारों किलोमीटर दूर बसे ग्राहकों से बात करने के लिए एक नयी भाषा बोलने लगता है जो वह घर में नहीं बोलता, सारी रात काम करता है क्योंकि वह उसके विदेशी ग्राहकों के लिए दिन का समय होता है, और उसकी छुट्टियाँ भी भारतीय नहीं बल्कि अमरीकी कैलेंडर से मेल खाती हैं।

3. भारतीय क्या ख़रीदते हैं, इस पर। रामधारी ने अपनी बेटी के लिए जो साइकिल ख़रीदी वह बनी चीन में थी और बिक भारत में रही थी, और उससे पिछले साल उसने ‘बार्बी डॉल’ ख़रीदकर दी थी जो दरअसल संयुक्त राज्य अमरीका में बनी थी और भारत में बिक रही थी। दोनों इसलिए ख़रीदी गईं कि कीमत और ‘क्वालिटी’ दोनों उसे जँच गईं।

4. जीवन-मूल्यों और अवसरों पर। सारिका अपने परिवार में पहली पीढ़ी की शिक्षित है और उसे नौकरी करके एक स्वतंत्र करिअर शुरू करने का अवसर मिला है, जिसके बारे में उसके परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं। कुछ रिश्तेदार विरोध कर रहे हैं, फिर भी उसने नौकरी करने का फ़ैसला किया। किताब इसे जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा की स्थिति बताती है।

5. इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है। किताब के अपने उदाहरणों में, फसल के मारे जाने से कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली, जिन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महँगे बीज ख़रीदे थे। अनेक खुदरा दुकानदारों को भय है कि अगर कुछ बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने देश में खुदरा दुकानों की अपनी श्रृंखला खोल ली तो उनकी रोजी-रोटी जाती रहेगी।

उत्तर, दूसरा हिस्सा: भारत वैश्वीकरण को कैसे प्रभावित कर रहा है।

6. भारतीय कंपनियाँ विदेश में ख़रीद कर रही हैं। किताब का अपना उदाहरण यह है कि यूरोप स्थित एक बड़ी और अपनी प्रतियोगी कंपनी को एक भारतीय कंपनी ने ख़रीद लिया, जबकि ख़रीदी गई कंपनी के मालिक इस खरीददारी का विरोध कर रहे थे। यही किताब का सबूत है कि ‘ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।’

7. सेवाओं का वैश्वीकरण भारत से होकर गुजरता है। जनार्दन जैसा कॉल-सेंटर कर्मचारी ऐसे आदमी को अपनी सेवा दे रहा है जिससे बहुत संभव है वह कभी आमने-सामने की मुलाकात न कर सके। यानी भारत में बैठा कर्मचारी हजारों किलोमीटर दूर बसे ग्राहक को सेवा दे रहा है, और सेवाओं का वैश्वीकरण भारत से होकर गुजरता है।

8. भारतीय संस्कृति बाहर जा रही है। जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता एक अनूठा पहरावा है, और इसे अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी थी; जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है। किताब के शब्दों में, सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफा नहीं होता।

9. भारत प्रतिरोध को भी दिशा दे रहा है। सामाजिक आंदोलनों से लोगों को अपने पास-पड़ोस की दुनिया समझने और अपनी समस्याओं के हल तलाशने में मदद मिलती है। भारत में आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ़ से भी उठी हैं और इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से भी। औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है, और ‘नीम’ जैसी वनस्पतियों को अमरीकी तथा यूरोपीय फर्मों द्वारा पेटेन्ट कराने के प्रयासों का भी कड़ा विरोध हुआ। दक्षिणपंथी खेमे से विरोध केबल नेटवर्क के विदेशी टी.वी. चैनलों, वैलेन्टाईन-डे मनाने और छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि तक फैला है। इसके अलावा ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की चौथी बैठक 2004 में मुंबई में हुई थी, यानी वैश्वीकरण-विरोध के विश्वव्यापी मंच की मेज़बानी भारत ने की।

12 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)

किताब अध्याय के हाशिये पर और कार्टूनों के नीचे भी कुछ प्रश्न पूछती है और एक कक्षा-गतिविधि देती है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।

पाठगत प्रश्न 1

प्र. बहुत-से नेपाली मजदूर काम करने के लिए भारत आते हैं। क्या यह वैश्वीकरण है?

उत्तर: हाँ, उसी अर्थ में जिसमें अध्याय यह शब्द इस्तेमाल करता है। वैश्वीकरण के चार प्रवाहों में से एक है बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही, और काम की तलाश में भारत आने वाले नेपाली मजदूर ठीक ऐसा ही प्रवाह हैं। यह उदाहरण यह भी दिखाता है कि वैश्वीकरण सिर्फ़ धनी देशों और बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की कहानी नहीं है। साथ ही ध्यान रहे कि किताब के अनुसार लोगों की आवाजाही वह प्रवाह है जो सबसे कम बढ़ा है, क्योंकि विकसित देश अपनी वीजा-नीति के जरिए अपनी सीमाओं को अभेद्य बनाए रखते हैं।

पाठगत प्रश्न 2

प्र. एक हफ़्ते के अख़बार पर नज़र दौड़ाइए और वैश्वीकरण के विषय में जो कुछ छपा हो उसकी कतरन एकत्रित कीजिए।

कैसे करें: यह परियोजना-कार्य है। कतरनों को अध्याय के शीर्षकों के हिसाब से छाँटिए: चार प्रवाह (विचार, पूँजी, वस्तु, लोग), और राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव। फिर हर कतरन के आगे लिखिए कि उससे जुड़े लोगों के लिए वह ख़बर अच्छी है या बुरी। अध्याय के अपने उदाहरण बताते हैं कि वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता और वह सिर्फ़ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा।

पाठगत प्रश्न 3

प्र. भारत में बिकने वाली चीन की बनी बहुत-सी चीजें तस्करी की होती हैं। क्या वैश्वीकरण के चलते तस्करी होती है?

उत्तर: अपने आप में नहीं। वैश्वीकरण में अलग-अलग देश अपने यहाँ होने वाले आयात पर लगे प्रतिबंध कम कर देते हैं, इसलिए रामधारी की साइकिल जैसी चीन में बनी चीज़ें क़ानूनी रास्ते से ही भारत में बिक सकती हैं। तस्करी तब होती है जब कर, शुल्क या पाबंदी से बचने के लिए सामान ग़ैरक़ानूनी ढंग से सीमा पार कराया जाता है। वस्तुओं का प्रवाह बढ़ने और विदेशी सामान सस्ता होने से, जहाँ शुल्क अब भी ऊँचे हैं वहाँ तस्करी का लालच बढ़ सकता है, पर इसका इलाज राज्य का नियमन और क़ानून का पालन कराना है। किताब कहती है कि राज्य कानून-व्यवस्था जैसे अपने अनिवार्य कार्य अब भी पूरे कर रहे हैं।

पाठगत प्रश्न 4

प्र. क्या साम्राज्यवाद का ही नया नाम वैश्वीकरण नहीं है? हमें नये नाम की ज़रूरत क्यों है?

उत्तर: कुछ आलोचक ऐसा ही मानते हैं: किताब बताती है कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहा है, और वैश्वीकरण-विरोधी बहुत-से आंदोलन वैश्वीकरण के किसी ख़ास कार्यक्रम के विरोधी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं। पर अध्याय यह भी दिखाता है कि नया नाम क्यों काम का है। साम्राज्यवाद का मतलब था किसी विदेशी ताकत का उपनिवेशों पर सीधा राजनीतिक नियंत्रण, जैसे औपनिवेशिक दौर में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के चलते भारत कच्चे माल का निर्यातक और बने-बनाये सामानों का आयातक बना। वैश्वीकरण विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों के प्रवाहों तथा उनसे पैदा ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ की बात है; इसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों अवतार हैं, इसका प्रभाव विषम है, और इसमें प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर नहीं होती, जैसे जब एक भारतीय कंपनी यूरोप की एक बड़ी प्रतियोगी कंपनी को ख़रीद लेती है।

पाठगत प्रश्न 5

प्र. (कार्टून का शीर्षक) वैश्वीकरण के खतरे?

उत्तर: कार्टून के दो हिस्से हैं। ‘कल’ वाले हिस्से में एक माँ अपने बच्चे से कहती है कि अपना खाना जल्दी ख़त्म करो, चीन और भारत के भूखे लोग तुम्हारा खाना खा जाएँगे। ‘आज’ वाले हिस्से में वही बात होमवर्क के बारे में है: अपना होमवर्क जल्दी पूरा करो, चीन और भारत के लोग तुम्हारी नौकरी खा जाएँगे। कार्टून दिखाता है कि वैश्वीकरण के साथ धनी देशों में डर का विषय बदल गया है: पहले चीन और भारत ग़रीबी और भूख के प्रतीक थे, अब नौकरी छीनने वाले प्रतियोगी हैं। यही डर किताब के कॉल-सेन्टर वाले बॉक्स में भी है, जहाँ अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो। शीर्षक का प्रश्न-चिह्न पूछता है कि क्या यह सचमुच ख़तरा है: सेवाओं का वैश्वीकरण एक देश के लिए अवसर और दूसरे देश के कुछ लोगों के लिए चिंता, दोनों एक साथ हो सकता है।

पाठगत प्रश्न 6

प्र. आप या आपका परिवार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जिन उत्पादों को इस्तेमाल करता है उसकी एक सूची तैयार करें।

कैसे करें: यह निजी अभ्यास है। घर की चीज़ों पर नज़र डालिए: साबुन, टूथपेस्ट, शैम्पू, डिब्बाबंद खाने-पीने की चीज़ें और ठंडे पेय, मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर, टी.वी. और फ़्रिज, जूते और कपड़े, और आपके फ़ोन के ऐप। हर चीज़ के आगे कंपनी का नाम और यह लिखिए कि वह विदेशी है या भारतीय। सूची दिखाएगी कि वैश्वीकरण हमारे घर के भीतर तक कितना पहुँच चुका है; किताब के शब्दों में, हम जो कुछ खाते-पीते-पहनते या सोचते हैं, सब पर इसका असर है।

पाठगत प्रश्न 7

प्र. जब हम सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात करते हैं तो इसका सीधा-सादा मतलब होता है कि कुछ लोग तो वैश्वीकरण के चलते बदहाल होंगे ही! तभी तो सामाजिक सुरक्षा-कवच की बात की जाती है। है न?

उत्तर: हाँ। किताब कहती है कि सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण से आबादी के एक छोटे तबके को ही फ़ायदा होगा, जबकि नौकरी और जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई की सुविधा आदि) के लिए सरकार पर आश्रित लोग बदहाल हो जाएँगे; इसलिए वे ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ जैसे सांस्थानिक उपायों पर जोर देते हैं ताकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव कम किए जा सकें। सुरक्षा-कवच का विचार ही यह मान लेता है कि कुछ लोग नुकसान उठाएँगे। इसीलिए दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि ‘सामाजिक सुरक्षा-कवच’ की बात अव्यावहारिक है, इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा, और बलपूर्वक किए जा रहे वैश्वीकरण को रोका जाना चाहिए।

पाठगत प्रश्न 8

प्र. हम पश्चिमी संस्कृति से क्यों डरते हैं? क्या हमें अपनी संस्कृति पर विश्वास नहीं है?

उत्तर: डर सांस्कृतिक समरूपता के विचार से आता है: राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है, और दुनिया का ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को धीरे-धीरे ख़त्म करता है। पर किताब यह भी दिखाती है कि आत्मविश्वास क्यों रखा जा सकता है। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती और हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करती रहती है। कुछ प्रभाव सिर्फ़ हमारी पसंद का दायरा बढ़ाते हैं, जैसे बर्गर मसाला-डोसा की जगह नहीं लेता, बस भोजन की पसंद में एक चीज़ और जुड़ जाती है; और कुछ हमारी संस्कृति से मिलकर कुछ नया बनाते हैं, जैसे नीली जीन्स के ऊपर खादी का कुर्ता, जिसे अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी। जिस संस्कृति को अपने पर भरोसा हो, वह बाहरी प्रभाव अपनाकर भी अपनी पहचान नहीं खोती।

पाठगत प्रश्न 9

प्र. अपनी भाषा की सभी जानी-पहचानी बोलियों की सूची बनाएँ। अपने दादा की पीढ़ी के लोगों से इस बारे में सलाह लीजिए। कितने लोग आज इन बोलियों को बोलते हैं?

कैसे करें: यह परियोजना-कार्य है। परिवार और पड़ोस के बुज़ुर्गों से पूछिए कि वे अपनी भाषा की कौन-कौन-सी स्थानीय बोलियाँ बोलते हुए बड़े हुए, और पता कीजिए कि आज हर बोली को कितने लोग बोलते हैं। बहुत संभव है कि कुछ बोलियाँ पहले से कम लोग बोलते हों, क्योंकि लोग शहरों में जा बसते हैं, एक जैसे टी.वी. कार्यक्रम देखते हैं और भाषा का एक मानक रूप अपनाते हैं। यह उसी सांस्कृतिक समरूपता का उदाहरण है जिसकी बात अध्याय करता है, और यह भी दिखाता है कि कुछ लोगों को विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के सिकुड़ने का डर क्यों है।

पाठगत प्रश्न 10

प्र. यह बात तो सही है कि कभी-कभी मुझे नए गीत अच्छे लगते हैं। क्या हम सबको थोड़ा नृत्य करना अच्छा नहीं लगता भले ही बजायी जा रही धुन पर पश्चिमी संगीत का असर हो?

उत्तर: इसमें कोई हर्ज़ ज़रूरी नहीं। किताब कहती है कि यह मान लेना एक भूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं; संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती, और कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद-नापसंद का दायरा बढ़ता है तो कभी परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है। पश्चिमी संगीत के असर वाला गीत जीन्स के ऊपर खादी के कुर्ते जैसा एक नया और अनूठा मेल हो सकता है। चिंता की बात तभी है जब बाहरी प्रभाव हमारी पसंदों में कमी लाए, यानी हमारा अपना संगीत ही पूरी तरह हाशिये पर चला जाए।

कक्षा-गतिविधि (चरण)

प्र. विद्यार्थी अपनी जानी-पहचानी चीज़ों (खाद्य-उत्पाद, बिजली से चलने वाले घरेलू इस्तेमाल के उपकरण और सुख-सुविधा के सामान) और अपने पसंदीदा टी.वी. कार्यक्रमों की सूची बनाते हैं, फिर इन वस्तुओं के निर्माताओं और कार्यक्रमों के प्रायोजकों के नाम पता करते हैं, और निर्माताओं को तीन वर्गों में बाँटते हैं: पूर्णतया विदेशी कंपनी, पूर्णतया भारतीय कंपनी, और साझेदारी में काम करने वाली कंपनियाँ।

कैसे करें: यह कक्षा का सर्वेक्षण है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं है। तीनों सूचियाँ तैयार होने पर चर्चा कीजिए कि वे क्या दिखाती हैं: वैश्वीकरण ने कैसे हमारे जीवन में प्रवेश किया है, और इसका दूसरा पहलू भी, जिसकी ओर किताब ध्यान खींचती है कि विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल जैसे-जैसे बढ़ा है वैसे-वैसे हमारे छोटे स्वदेशी उद्योगों के ग्राहक कम हुए हैं और ये उद्योग बंद हो रहे हैं। अंत में यह चर्चा कीजिए कि विकासशील और अविकसित देशों पर वैश्वीकरण के प्रभावों को लेकर क्या बातें कही जा रही हैं, और विश्व व्यापार संगठन से जुड़े समझौते के विरोध में दुनिया भर में हुए धरने और प्रदर्शन, जैसे 1999 में सिएट्ल में।