Class 12 Psychology Chapter 2 Self and Personality NCERT Solutions in Hindi

NCERT अध्याय के हिंदी संस्करण के सभी 11 समीक्षात्मक प्रश्न, पूर्ण आदर्श उत्तरों के साथ। इस किताब
में अलग से “प्रश्नावली” खंड नहीं है, इसके पीछे के प्रश्नों को समीक्षात्मक प्रश्न कहा गया है।

1 प्रश्न 1

प्रश्न 1

प्र. आत्म क्या है? आत्म की भारतीय अवधारणा पाश्चात्य अवधारणा से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: आत्म व्यक्ति के अपने बारे में सचेतन अनुभवों, विचारों, चिंतन और भावनाओं की समग्रता को कहते हैं, यह व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यक्ति के अस्तित्व को परिभाषित करता है, किताब कहती है कि आत्म व्यक्तित्व के मूल में है। भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा के बीच मुख्य अंतर यह है कि आत्म और अन्य के बीच सीमा रेखा किस प्रकार निर्धारित की गई है। पाश्चात्य दृष्टिकोण में यह सीमा अपेक्षाकृत स्थिर है, आत्म और समूह दो भिन्न इकाइयों के रूप में हैं और व्यक्ति समूह के भीतर भी अपनी वैयक्तिकता बनाए रखता है, इसीलिए अनेक पाश्चात्य संस्कृतियों का व्यक्तिवादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है। भारतीय दृष्टिकोण में यह सीमा परिवर्तनीय है, एक क्षण आत्म समूचे ब्रह्मांड या अन्य में विलीन हो जाता है, दूसरे ही क्षण व्यक्तिगत आवश्यकताओं और लक्ष्यों पर केंद्रित हो जाता है, आत्म और समूह सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व में रहते हैं; इसीलिए अनेक एशियाई संस्कृतियों (भारतीय सहित) का सामूहिकतावादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है।

2 प्रश्न 2

प्रश्न 2

प्र. परितोषण के विलंब से क्या तात्पर्य है? इसे क्यों वयस्कों के विकास के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है?

उत्तर: परितोषण का विलंब (आत्म-नियंत्रण) किसी आवश्यकता की संतुष्टि को विलंबित या आस्थगित करने की सीखी हुई योग्यता है, तात्कालिक संतुष्टि के बजाय। यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि दीर्घावधि लक्ष्यों की संप्राप्ति में आत्म-नियंत्रण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है (किताब का अपना कारण)। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा इसके लिए तैयार उपाय देती है, जैसे व्रत या रोज़ा में उपवास और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ति। इसे विकसित करने की तकनीकों में अपने व्यवहार का प्रेक्षण, आत्म-अनुदेश और आत्म-प्रबलन शामिल हैं।

3 प्रश्न 3

प्रश्न 3

प्र. व्यक्तित्व को आप किस प्रकार परिभाषित करते हैं? व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम कौन-से हैं?

उत्तर: व्यक्तित्व व्यक्ति के अपेक्षाकृत स्थिर और विशिष्ट गुणों को कहते हैं जो विभिन्न स्थितियों में, एक समयावधि में, उसके व्यवहार को विशिष्टता प्रदान करते हैं। इसके शारीरिक और मनोवैज्ञानिक, दोनों घटक होते हैं, यह प्रत्येक व्यक्ति में विशिष्ट रूप से व्यक्त होता है, समय के साथ आसानी से नहीं बदलता, और गतिशील/अनुकूलनशील है। व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम हैं, प्ररूप उपागम (हिप्पोक्रेट्स, शेल्डन, युंग जैसी व्यापक श्रेणियाँ), विशेषक उपागम (ऑलपोर्ट, कैटेल, आइज़ेंक, बृहत् पाँच कारक जैसे विशिष्ट स्थिर गुण), मनोगतिक उपागम (फ्रायड का इड-अहं-पराहम् के बीच अचेतन संघर्ष), व्यवहारवादी उपागम (पर्यावरण के प्रति सीखी हुई अनुक्रिया), सांस्कृतिक उपागम (पारिस्थितिकी और संस्कृति के प्रति अनुकूलन), और मानवतावादी उपागम (रोजर्स एवं मैस्लो का आत्मसिद्धि पर बल)।

4 प्रश्न 4

प्रश्न 4

प्र. व्यक्तित्व का विशेषक उपागम क्या है? यह कैसे प्ररूप उपागम से भिन्न है?

उत्तर: विशेषक उपागम उन विशिष्ट मनोवैज्ञानिक गुणों, विशेषकों, पर केंद्रित है जिन पर व्यक्ति संगत और स्थिर ढंग से भिन्न होते हैं, जैसे शर्मीलापन या मित्रतापूर्ण होना। विशेषक अपेक्षाकृत स्थिर, विभिन्न स्थितियों में संगत, और व्यक्ति-व्यक्ति में तीव्रता व संयोजन में भिन्न होते हैं। इसके विपरीत, प्ररूप उपागम व्यक्तियों के देखे गए व्यवहार के व्यापक प्रतिरूपों की जाँच कर उन्हें एक व्यापक श्रेणी (टाइप) में रखता है, जैसे हिप्पोक्रेट्स के चार हास्य रस या शेल्डन के शारीरिक प्ररूप। संक्षेप में, प्ररूप उपागम लोगों को कुछ व्यापक श्रेणियों में बाँटता है, जबकि विशेषक उपागम लोगों को कई विशिष्ट, सतत आयामों पर वर्णित करता है।

5 प्रश्न 5

प्रश्न 5

प्र. फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना की व्याख्या कैसे की है?

उत्तर: फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व के तीन संरचनात्मक तत्व हैं, इड, अहं और पराहम्। ये संप्रत्यय हैं, वास्तविक भौतिक संरचनाएँ नहीं, और अचेतन में ऊर्जा के रूप में रहते हैं जिनका अनुमान लोगों के व्यवहार के तरीकों से लगाया जा सकता है। इड व्यक्ति की मूलप्रवृत्तिक ऊर्जा का स्रोत है, यह सुखेप्सा-सिद्धांत पर कार्य करता है, आदिम आवश्यकताओं की तात्कालिक संतुष्टि की माँग करता है और नैतिकता, समाज या अन्य व्यक्तियों की परवाह नहीं करता। अहं इड से उत्पन्न होता है और वास्तविकता-सिद्धांत पर कार्य करता है, यह इड को वास्तविकता के अनुरूप, अधिक उपयुक्त तरीकों की ओर निर्देशित करता है। पराहम् मानसिक कार्यप्रणाली की नैतिक शाखा है, यह समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से पैतृक प्राधिकार को आंतरिक करता है और इड व अहं को बताता है कि किसी विशेष स्थिति में संतुष्टि नैतिक है या नहीं। इन तीनों की सापेक्ष शक्ति प्रत्येक व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थिरता निर्धारित करती है, और फ्रायड के अनुसार मनुष्य के अधिकांश व्यवहार दुश्चिंता के प्रति उपयुक्त समायोजन अथवा पलायन को प्रतिबिंबित करते हैं; अहं दुश्चिंता का किस ढंग से सामना करता है, यही व्यापक रूप से निर्धारित करता है कि लोग किस प्रकार व्यवहार करेंगे।

6 प्रश्न 6

प्रश्न 6

प्र. हार्नी की अवसाद की व्याख्या अल्फ्रेड एडलर की व्याख्या से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: कैरन हार्नी के अनुसार मनोवैज्ञानिक विकार बाल्यावस्था की अवधि में विक्षुब्ध अंतर्वैयक्तिक (माता-पिता-बालक) संबंधों के कारण उत्पन्न होते हैं: जब माता-पिता का व्यवहार उदासीन, हतोत्साहित करने वाला और अनियमित होता है, तो बच्चा असुरक्षित महसूस करता है, उसमें मूल दुश्चिंता उत्पन्न होती है, और माता-पिता के प्रति गहन अमर्ष और मूल आक्रामकता घटित होती है। अल्फ्रेड एडलर, इसके विपरीत, मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपर्याप्तता और अपराध की भावनाओं (हीनता मनोग्रंथि) से ग्रसित होता है, जो बाल्यावस्था में बनती है, और इष्टतम व्यक्तित्व विकास के लिए इस मनोग्रंथि पर विजय पाना आवश्यक है। किताब इन दोनों में से किसी के द्वारा अवसाद की अलग से व्याख्या का उल्लेख नहीं करती, इसलिए उत्तर का सार यही अंतर है। इस प्रकार हार्नी की व्याख्या माता-पिता-बालक संबंध की गुणवत्ता पर केंद्रित है, जबकि एडलर की व्याख्या व्यक्ति की अपनी अनसुलझी हीनता मनोग्रंथि पर।

7 प्रश्न 7

प्रश्न 7

प्र. व्यक्तित्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिज्ञप्ति क्या है? आत्मसिद्धि से मैस्लो का क्या तात्पर्य था?

उत्तर: मानवतावादी उपागम, मुख्यतः कार्ल रोजर्स और अब्राहम मैस्लो द्वारा फ्रायड के सिद्धांत की प्रतिक्रिया में विकसित, यह प्रस्तावित करता है कि व्यक्तियों में एक सहज प्रवृत्ति होती है जो उन्हें अपनी वंशागत प्रकृति की सिद्धि या प्राप्ति की ओर निर्दिष्ट करती है, और लोग सतत अपने वास्तविक आत्म की सिद्धि की प्रक्रिया में लगे रहते हैं; लोग (जो सहज रूप से अच्छे होते हैं) सदैव अनुकूली तथा आत्मसिद्धि वाले व्यवहार का चयन करेंगे। रोजर्स का मानना था कि वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म के बीच सामंजस्य, जिसे अशर्त सकारात्मक आदर से समर्थन मिलता है, स्वस्थ विकास की ओर ले जाता है। मैस्लो की आत्मसिद्धि वह स्थिति है जब व्यक्ति अपनी पूर्ण संभावित क्षमता प्राप्त कर लेता है, जैविक, सुरक्षा और आत्मीयता की उत्तरजीविता आवश्यकताओं से आगे बढ़कर, जो पशुओं में भी पाई जाती हैं, मानव जीवन की वास्तविक यात्रा आत्म-सम्मान और आत्मसिद्धि की आवश्यकताओं की खोज से शुरू होती है।

8 प्रश्न 8

प्रश्न 8

प्र. व्यक्तित्व-मूल्यांकन में प्रयुक्त की जाने वाली प्रमुख प्रेक्षण विधियों का विवेचन करें। इन विधियों के उपयोग में हमें किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

उत्तर: व्यवहारपरक विश्लेषण की प्रमुख प्रेक्षण विधियाँ हैं, साक्षात्कार (संरचित, निश्चित प्रश्नों व प्रक्रिया के साथ, या असंरचित, खुले प्रभाव-निर्माण के साथ), व्यवहारपरक निर्धारण (व्यक्ति को भली-भाँति जानने वाले लोगों द्वारा श्रेणीकरण, शिक्षा एवं औद्योगिक क्षेत्रों में सामान्य), प्रेक्षण (व्यवहार का सतर्क, प्रशिक्षित प्रेक्षण), नाम निर्देशन (सहकर्मी-मूल्यांकन विधि, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति बताता है किसके साथ वह काम/अध्ययन/खेलना चाहेगा) और स्थितिपरक परीक्षण (जैसे स्थितिपरक दबाव परीक्षण, असहयोगी परिस्थितियों में भूमिका-निर्वाह)। इन विधियों के उपयोग में आने वाली समस्याएँ हैं, उपयोगी आँकड़े जुटाने के लिए आवश्यक पेशेवर प्रशिक्षण अत्यंत मांगपूर्ण और समय-साध्य है, मान्य आँकड़े प्राप्त करने के लिए मनोवैज्ञानिक की परिपक्वता एक पूर्व-शर्त है, और प्रेक्षक की मात्र उपस्थिति, एक अजनबी के रूप में, प्रेक्षित व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर परिणामों को दूषित कर सकती है। व्यवहारपरक निर्धारण विशेष रूप से परिवेश प्रभाव, मध्य संवर्ग अभिनति और आत्यंतिक अनुक्रिया अभिनति से भी ग्रस्त होते हैं।

9 प्रश्न 9

प्रश्न 9

प्र. संरचित व्यक्तित्व परीक्षणों से क्या तात्पर्य है? व्यापक रूप से उपयोग किए गए दो संरचित व्यक्तित्व परीक्षण कौन-से हैं?

उत्तर: संरचित व्यक्तित्व परीक्षण आत्म-प्रतिवेदन माप हैं, पर्याप्त रूप से संरचित और प्रायः सिद्धांत पर आधारित, जिनमें व्यक्ति से किसी रेटिंग स्केल का उपयोग करते हुए स्वयं के बारे में मौखिक प्रतिक्रियाएँ देने को कहा जाता है, प्रतिक्रियाओं को उनके अंकित मूल्य पर स्वीकार किया जाता है और परीक्षण के लिए विकसित मानकों के आधार पर मात्रात्मक रूप से व्याख्यायित किया जाता है। किताब में व्यापक रूप से उपयोग में बताए गए दो संरचित परीक्षण हैं, मिनेसोटा बहुपक्षीय व्यक्तित्व सूची (MMPI), हाथवे एवं मैकिन्ले द्वारा विकसित (567 सही/ग़लत कथन, 10 उपमापनियाँ), और सोलह व्यक्तित्व कारक प्रश्नावली (16PF), कैटेल द्वारा विकसित।

10 प्रश्न 10

प्रश्न 10

प्र. व्याख्या कीजिए कि प्रक्षेपी तकनीक किस प्रकार व्यक्तित्व का मूल्यांकन करती है? कौन-से व्यक्तित्व के प्रक्षेपी परीक्षण मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग में लाए गए हैं?

उत्तर: प्रक्षेपी तकनीकें अप्रत्यक्ष मूल्यांकन विधियाँ हैं, इन्हें इसलिए विकसित किया गया क्योंकि प्रत्यक्ष (आत्म-प्रतिवेदन) विधियाँ व्यवहार के उस अचेतन भाग को उजागर नहीं कर पातीं जिसे मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत मानव व्यवहार का बहुत बड़ा भाग नियंत्रित करता बताता है। ये व्यक्ति के सामने एक अपेक्षाकृत या पूर्णतः असंरचित उद्दीपक प्रस्तुत करती हैं, बिना यह बताए कि मूल्यांकन का उद्देश्य क्या है, और यह बताते हुए कि कोई सही या ग़लत उत्तर नहीं है, यह मान्यता है कि व्यक्ति इस असंरचित स्थिति पर अपनी भावनाओं, इच्छाओं और आवश्यकताओं का प्रक्षेपण करेगा, और हर प्रतिक्रिया व्यक्तित्व के किसी महत्वपूर्ण पक्ष को प्रकट करती मानी जाती है। इनका अंकन और व्याख्या दीर्घ तथा विशेष प्रशिक्षण की माँग करती है। किताब में नामित दो सर्वाधिक व्यापक रूप से उपयोग किए गए प्रक्षेपी परीक्षण हैं, रोर्शा स्याही-धब्बा परीक्षण (10 धब्बे, हर्मन रोर्शा द्वारा विकसित) और कथानक संप्रत्यक्षण परीक्षण (TAT, 30 चित्र कार्ड + 1 खाली कार्ड, मॉर्गन एवं मरे द्वारा विकसित)।

11 प्रश्न 11

प्रश्न 11

प्र. अरिहन्त एक गायक बनना चाहता है, इसके बावजूद कि वह चिकित्सकों के एक परिवार से संबंध रखता है। यद्यपि उसके परिवार के सदस्य दावा करते हैं कि वे उसको प्रेम करते हैं किंतु वे उसकी जीवनवृत्ति को दृढ़ता से अस्वीकार कर देते हैं। कार्ल रोजर्स की शब्दावली का उपयोग करते हुए अरिहन्त के परिवार द्वारा प्रदर्शित अभिवृत्तियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: कार्ल रोजर्स की शब्दावली में, अरिहन्त का परिवार अशर्त सकारात्मक आदर के विपरीत, केवल शर्त पर आधारित स्वीकृति (सशर्त सकारात्मक आदर) दे रहा है, प्रेम का दावा करते हुए भी, उनकी स्वीकृति इस शर्त पर निर्भर है कि अरिहन्त अपने आदर्श आत्म की आकांक्षा (गायक बनना) त्याग कर वह करे जिसे वे स्वीकार्य मानते हैं, परिवार का पेशा, चिकित्सा को अपनाना। यह रोजर्स द्वारा स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक बताई गई अशर्त सकारात्मक आदर के ठीक विपरीत है। चूँकि अरिहन्त का परिवार उसके आदर्श आत्म की आकांक्षा (वह आत्म जो वह बनना चाहता है) को अस्वीकार करता है और उसे अपनी शर्तों पर जीने को कहता है, इससे उसके वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म के बीच विसंगति बनी रहती है; रोजर्स के अनुसार ऐसी विसंगति के कारण प्रायः अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।

परीक्षा संकेत

प्रश्न 11 (अरिहन्त का प्रकरण) अध्याय का समीक्षात्मक प्रश्न 11 है, जिसमें रोजर्स की शब्दावली को एक
परिदृश्य पर लागू करना होता है। किताब के शब्दों “अशर्त सकारात्मक आदर” और “वास्तविक आत्म बनाम
आदर्श आत्म” का सटीक अभ्यास करें।

12 पाठ के बीच के क्रियाकलाप और परियोजना विचार

अध्याय के बीच में तीन क्रियाकलाप और अंत में दो परियोजना विचार भी छपे हैं। यहाँ उन्हें उसी क्रम में हल किया गया है जिस क्रम में पुस्तक उन्हें देती है।

क्रियाकलाप 2.1: आत्म की समझ

प्र. कृपया ‘मैं …….. हूँ’ वाले अधोलिखित वाक्यों को पूरा करें। (शुरू करने का समय और पूरा करने का समय भी लिखें।)

उत्तर: आपके वाक्य आपके अपने होंगे, इसलिए कोई एक सही उत्तर नहीं है। अध्याय के शब्दों में यह क्रियाकलाप यह दिखाने के लिए है: (1) कुछ वाक्य आपकी व्यक्तिगत अनन्यता बताते हैं, यानी वे गुण जो आपको दूसरों से अलग करते हैं, जैसे नाम, गुण, क्षमताएँ या विश्वास (“मैं ईमानदार हूँ”, “मैं अच्छा गायक हूँ”)। (2) कुछ वाक्य आपकी सामाजिक अनन्यता बताते हैं, यानी वे गुण जो आपको किसी सामाजिक या सांस्कृतिक समूह से जोड़ते हैं (“मैं हिंदू हूँ”, “मैं उत्तर भारतीय हूँ”)। (3) कुछ वाक्य आत्म को आत्मगत रूप में बताते हैं, यानी ऐसी सत्ता जो कुछ करती है (“मैं नर्तक हूँ”), और कुछ वस्तुगत रूप में, यानी ऐसी सत्ता जिस पर कुछ होता है (“मैं वह हूँ जिसे आसानी से ठेस पहुँचती है”)। अपने वाक्यों को इन समूहों में बाँटिए। मित्रों से सूची बदलकर देखने पर आप यह भी पाएँगे कि आत्म की संरचना हमारे अपने अनुभवों और दूसरों के साथ हमारे अनुभवों से बनती और बदलती है।

क्रियाकलाप 2.2

प्र. यदि आपसे अपने व्यक्तित्व के एक पक्ष को परिवर्तित करने को कहा जाए तो आप क्या परिवर्तित करना पसंद करेंगे और क्यों? यदि नहीं, तो क्यों? आपके व्यक्तित्व का कौन-सा ऐसा पक्ष है जिसे आप कभी परिवर्तित नहीं करना चाहेंगे? इस पर एक पैराग्राफ लिखिए। अपने मित्र से परिचर्चा कीजिए।

उत्तर: यह व्यक्तिगत चिंतन है, इसलिए अपने बारे में ईमानदारी से लिखें। एक अच्छे पैराग्राफ में एक विशिष्ट विशेषक का नाम हो (जैसे संकोच, अधीरता या जल्दी गुस्सा आना), यह बताया जाए कि आप उसे क्यों बदलना चाहेंगे और वह अलग-अलग परिस्थितियों में आप पर कैसे असर डालता है, और फिर एक ऐसा गुण जो आपको प्रिय है और जिसे आप कभी नहीं बदलेंगे (जैसे ईमानदारी या मित्रता), कारण सहित। इसे अध्याय से जोड़ें: व्यक्तित्व अपेक्षाकृत स्थिर होता है, इसलिए उसकी मुख्य विशेषताएँ आसानी से नहीं बदलतीं, पर वह गत्यात्मक भी है, इसलिए आंतरिक या बाहरी माँगों के अनुसार कुछ विशेषताएँ बदल भी सकती हैं। किसी विशेषक पर काम करना अध्याय में बताई गई आत्म-नियमन की विधियों का उपयोग है: अपने व्यवहार का प्रेक्षण, आत्म-अनुदेश और आत्म-प्रबलन। मित्र से चर्चा करने पर यह भी पता चलता है कि दूसरे आपको कैसे देखते हैं, जो आपकी अपनी धारणा से अलग हो सकता है।

क्रियाकलाप 2.3

प्र. अपने और अपने मित्रों के व्यवहार की उन विशेषताओं का प्रेक्षण कीजिए और उनको नोट कीजिए जिसे लोकप्रिय युवकों को देखकर आत्मसात किया गया है।

उत्तर: तीन स्तंभों वाली एक छोटी तालिका बनाइए: व्यक्ति (आप और आपके दो-तीन मित्र), लोकप्रिय युवा आदर्श (कोई अभिनेता, खिलाड़ी या गायक), और अपनाया गया व्यवहार (बालों की शैली, पहनावा, बोलने का ढंग, कोई तकिया-कलाम, व्यायाम की आदत, कोई दृष्टिकोण)। फिर इसे अध्याय के व्यवहारवादी उपागम से समझाइए: व्यक्तित्व को पर्यावरण से सीखी गई अनुक्रियाओं के रूप में देखा जाता है, और बंदूरा का सामाजिक अधिगम (प्रेक्षण एवं दूसरों के अनुकरण पर आधारित) सिद्धांत बताता है कि लोग दूसरों को, विशेषकर प्रशंसित या पुरस्कृत आदर्शों को, देखकर और उनका अनुकरण करके सीखते हैं। यह भी लिखें कि कौन-से अपनाए गए व्यवहार उपयोगी हैं (अनुशासन, परिश्रम) और कौन-से केवल ऊपरी हैं (शैली, बोलचाल)।

परियोजना विचार 1

प्र. हम सभी अपने आदर्श आत्म के बारे में अवधारणा रखते हैं अर्थात हम क्या बनना चाहते हैं? समय लेकर आप कल्पना करें कि आपने अपने आदर्श आत्म को उपार्जित या प्राप्त कर लिया है। अपने आदर्श आत्म की इस अवधारणा के साथ इन संवर्गों के प्रति अपनी अभिवृत्तियों को अभिव्यक्त कीजिए – (अ) विद्यालय, (ब) मित्र, (स) परिवार, और (द) धन। इनमें से प्रत्येक पर अपनी आदर्श अभिवृत्तियों का वर्णन करते हुए एक पैराग्राफ लिखिए। उसके बाद आप इन चारों संवर्गों को चार अलग-अलग कागज़ के पन्नों पर लिखिए और अपने दो मित्रों और परिवार के दो सदस्यों से इन संवर्गों के प्रति आपकी वास्तविक अभिवृत्तियों का जो वे प्रत्यक्षण करते हैं, उसको लिखने के लिए कहिए। ये चार व्यक्ति आपके वास्तविक आत्म को जिस रूप में आपमें देखते हैं, उसका वर्णन करेंगे। अपने आदर्श वर्णनों की तुलना दूसरों के वास्तविक वर्णनों से विस्तार में कीजिए। क्या वे दोनों वर्णन बहुत समान अथवा असमान हैं? इस पर एक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

उत्तर: प्रश्न में दिए चरणों का पालन करें, फिर प्रतिवेदन रोजर्स के शब्दों में लिखें। आपके चार पैराग्राफ आपके आदर्श आत्म का वर्णन हैं, यानी वह आत्म जो आप बनना चाहते हैं; चार अन्य लोगों के वर्णन आपके वास्तविक आत्म को दिखाते हैं, जैसा दूसरे उसे देखते हैं। हर संवर्ग में लिखें कि दोनों कहाँ मेल खाते हैं और कहाँ अलग हैं। रोजर्स के अनुसार जब वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म में समानता होती है तो व्यक्ति सामान्यतः प्रसन्न रहता है, जबकि दोनों में विसंगति प्रायः अप्रसन्नता और असंतोष उत्पन्न करती है। प्रतिवेदन के अंत में एक-दो ऐसे अंतर लिखें जिन्हें आप कम करना चाहेंगे और कैसे (जैसे आत्म-नियमन द्वारा), और यह भी कि उच्च आत्म-संप्रत्यय और आत्म-सम्मान वाले लोग लचीले और नए अनुभवों के प्रति खुले होते हैं, इसलिए वे आगे बढ़ते रहते हैं।

परियोजना विचार 2

प्र. पाँच ऐसे लोगों, या तो वास्तविक जीवन से या इतिहास से, का चयन कीजिए जिनकी आप अत्यंत प्रशंसा करते हैं। अपने-अपने क्षेत्रों में उनके योगदानों के बारे में सूचनाएँ एकत्र कीजिए और पहचान कीजिए कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ हैं जिन्होंने आपको प्रभावित किया है। क्या आप कोई समानता पाते हैं? एक तुलनात्मक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।

उत्तर: पाँच व्यक्ति चुनें, हर एक के योगदान पर छोटी टिप्पणी लिखें, और उनकी उन व्यक्तित्व-विशेषताओं की सूची बनाएँ जो आपको प्रभावित करती हैं; इसके लिए अध्याय के विशेषक-शब्दों का प्रयोग करें (जैसे पंच-कारक मॉडल के अंतर्विवेकशीलता, अनुभवों के लिए खुलापन, सहमतिशीलता, या ऑलपोर्ट के अर्थ में कोई प्रमुख विशेषक, जैसे गांधी जी की अहिंसा, जिसे पुस्तक स्वयं उदाहरण के रूप में देती है)। पाँचों को एक तालिका में साथ-साथ रखें और पहचानिए कि इन व्यक्तियों में कौन-से विशेषक (बृहत् पाँच कारक या ऑलपोर्ट के विशेषक) बार-बार दिखाई देते हैं। मानवतावादी दृष्टि से ऐसे लोग मैस्लो की आत्मसिद्धि के निकट होते हैं, यानी अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचे हुए।