Class 12 Psychology Chapter 5 चिकित्सा उपागम Important Questions with Answers

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. मनश्चिकित्सा को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: सेवार्थी और चिकित्सक के बीच एक ऐच्छिक संबंध, जिसका उद्देश्य सेवार्थी की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करने में मदद करना है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. चिकित्सात्मक मैत्री क्या है?

उत्तर: सेवार्थी और चिकित्सक के बीच का विशेष, गोपनीय संबंध, न क्षणिक परिचय, न स्थायी संबंध।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. अशर्त सकारात्मक आदर को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: चिकित्सक की सेवार्थी के प्रति निरंतर सकारात्मक भावना, चाहे सेवार्थी कुछ भी प्रकट करे या कर चुका हो।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. नैदानिक निरूपण क्या है?

उत्तर: उपचार में प्रयुक्त चिकित्सात्मक मॉडल के अनुरूप सेवार्थी की समस्या का निरूपण (कथन) करना; यह एक सतत प्रक्रिया है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. क्रमिक विसंवेदनीकरण का प्रवर्तक कौन है?

उत्तर: वोल्प।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. RET का पूरा नाम क्या है, और इसे किसने प्रतिपादित किया?

उत्तर: संवेग तर्क चिकित्सा (RET), अल्बर्ट एलिस द्वारा प्रतिपादित।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. आत्मसिद्धि को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: एक सहज शक्ति जो व्यक्ति को अधिक जटिल, संतुलित और समाकलित बनने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. कैथार्सिस क्या है?

उत्तर: चिकित्सा के प्रारंभिक सत्रों में संवेगों को बाहर निकालने (भावनात्मक बोझ हलका करने) की प्रक्रिया, जिसे भाव-विरेचन या कैथार्सिस कहते हैं, जिसके स्वास्थ्य-लाभकारी गुण हैं।

प्रश्न 9 (1 अंक)

प्र. फ्रेडरिक और लॉरा पर्ल्स द्वारा दी गई चिकित्सा का नाम बताइए, और इस नाम का क्या अर्थ है?

उत्तर: गेस्टाल्ट चिकित्सा; ‘गेस्टाल्ट’ जर्मन में ‘समग्र’ के लिए है।

प्रश्न 10 (1 अंक)

प्र. मूल स्कीमा क्या है?

उत्तर: परिवार और समाज से बाल्यावस्था में बना विश्वास-और-क्रिया-प्रतिरूप तंत्र।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. चिकित्सात्मक मैत्री के दो घटक बताइए।

उत्तर: (i) संविदात्मक प्रकृति: सेवार्थी और चिकित्सक, दो इच्छुक व्यक्ति, सेवार्थी को समस्याओं पर विजय पाने में मदद करने के उद्देश्य से साझेदारी में प्रवेश करते हैं। (ii) सीमित अवधि: मैत्री तब तक चलती है जब तक सेवार्थी अपनी समस्याओं का सामना करने और अपने जीवन का नियंत्रण लेने में समर्थ न हो जाए।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. तदनुभूति को सहानुभूति से अलग कीजिए।

उत्तर: सहानुभूति दूसरे के कष्ट के प्रति दया-करुणा है, पर व्यक्ति वैसा अनुभव नहीं कर सकता। तदनुभूति इससे आगे जाती है: चिकित्सक सेवार्थी की स्थिति को समझता भी है और उसी की तरह अनुभव भी करता है, ‘दूसरे के स्थान पर’ खुद को रखकर।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. व्यवहार चिकित्सा में पूर्ववर्ती और अनुवर्ती संक्रिया क्या हैं?

उत्तर: पूर्ववर्ती संक्रिया व्यवहार से पहले घटित होने वाली किसी चीज़ को बदलती है, जिससे उसका प्रबलन मूल्य बदल जाए (‘स्थापक संक्रिया’)। अनुवर्ती संक्रिया व्यवहार के बाद घटित होने वाली किसी चीज़ को बदलती है, जैसे वांछित अनुक्रिया के लिए प्रशंसा करना।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. उदाहरण सहित विमुखी अनुबंधन समझाइए।

उत्तर: विमुखी अनुबंधन अवांछित अनुक्रिया को बार-बार किसी विमुखी परिणाम से जोड़ता है। उदाहरण: एक मद्यव्यसनी को शराब सूँघते समय हल्का बिजली का झटका दिया जाता है; बार-बार जोड़े जाने से शराब की गंध ही अप्रिय हो जाती है, और व्यक्ति शराब छोड़ देता है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. अन्योन्य प्रावरोध का सिद्धांत क्या है?

उत्तर: जब दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक ही समय उपस्थित हों, तो कमज़ोर शक्ति अवरुद्ध हो जाती है। क्रमिक विसंवेदनीकरण में, निर्मित विश्रांति प्रतिक्रिया (प्रबल) दुश्चिंता (कमज़ोर) को अवरुद्ध करती है जैसे-जैसे सेवार्थी अधिक भयावह दृश्यों की कल्पना करता है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. RET में पू.वि.प. विश्लेषण क्या है?

उत्तर: संवेग तर्क चिकित्सा का पहला चरण: कष्ट उत्पन्न करने वाली पूर्ववर्ती घटना को नोट करना, सेवार्थी की वास्तविकता को विकृत कर रहे अविवेकी विश्वास की पहचान करना, और परिणाम, अर्थात उससे उत्पन्न नकारात्मक संवेगों और व्यवहारों को पहचानना।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. मनश्चिकित्सक के लिए बताए गए छह नैतिक मानकों में से कोई दो बताइए।

उत्तर: इनमें से कोई दो: सुविज्ञ सहमति ली जानी चाहिए; सेवार्थी की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए; व्यक्तिगत कष्ट कम करना हर प्रयास का लक्ष्य होना चाहिए; चिकित्सक-सेवार्थी संबंध की अखंडता महत्वपूर्ण है; मानव अधिकार और गरिमा का आदर; व्यावसायिक सक्षमता और कौशल आवश्यक हैं।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. मनोविदलता जैसे गंभीर विकार में लक्षण-कमी से जीवन-गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं हो सकता?

उत्तर: गंभीर विकारों के कई रोगियों में नकारात्मक लक्षण होते हैं, जैसे काम करने या दूसरों के साथ अन्योन्यक्रिया में अनभिरुचि और प्रेरणा की कमी, जो सक्रिय लक्षण कम होने के बाद भी बने रहते हैं, इसलिए रोगी को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अलग से पुनःस्थापन की आवश्यकता होती है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. अध्याय के धूम्रपान उदाहरण की मदद से व्यवहार विश्लेषण की प्रक्रिया समझाइए।

उत्तर: व्यवहार विश्लेषण में सेवार्थी (और अक्सर परिवार) का साक्षात्कार कर पता लगाया जाता है: (i) अपक्रियात्मक व्यवहार जो कष्ट का कारण है, (ii) पूर्ववर्ती कारक जिसने व्यक्ति को उस व्यवहार के लिए प्रवृत्त किया, और (iii) संपोषण कारक जो इसे बनाए रखते हैं। पुस्तक के उदाहरण में, एक नवयुवक का अपक्रियात्मक व्यवहार धूम्रपान है; पूर्ववर्ती कारक वार्षिक परीक्षा की तैयारी करते समय की दुश्चिंता-उत्पादक स्थिति है; संपोषण कारक धूम्रपान से मिलने वाली दुश्चिंता से राहत है, जो इस क्रियाप्रसूत अनुक्रिया को बनाए रखती है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. आरन बेक की संज्ञानात्मक चिकित्सा मनोवैज्ञानिक कष्ट के विकास को कैसे समझाती है, उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: परिवार और समाज से बाल्यावस्था के अनुभव एक मूल स्कीमा (विश्वास + क्रिया-प्रतिरूप) विकसित करते हैं। उदाहरण: माता-पिता द्वारा उपेक्षित बच्चा मूल स्कीमा ‘मैं वांछित नहीं हूँ’ विकसित करता है। बाद में एक निर्णायक घटना (अध्यापक द्वारा सबके सामने हँसी उड़ाई जाना) इस स्कीमा को सक्रिय कर देती है, जिससे नकारात्मक स्वचालित विचार उत्पन्न होते हैं (‘कोई मुझे प्यार नहीं करता’, ‘मैं मूर्ख हूँ’), जो संज्ञानात्मक विकृतियों से अभिलक्षित होते हैं। इन विचारों का बार-बार होना दुश्चिंता और अवसाद उत्पन्न करता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. दुर्भीति के उपचार की तकनीक के रूप में क्रमिक विसंवेदनीकरण समझाइए।

उत्तर: वोल्प द्वारा प्रतिपादित। चिकित्सक सेवार्थी का साक्षात्कार कर भय-उत्पादक स्थितियाँ जानता है, और साथ मिलकर कम से अधिक भय तक का एक पदानुक्रम बनाते हैं। चिकित्सक सेवार्थी को विश्रांत करता है, जो पहले सबसे कम दुश्चिंता वाली स्थिति की कल्पना करता है, ज़रा-सा भी तनाव होने पर रुक जाता है। सत्रों के साथ सेवार्थी विश्रांत रहते हुए अधिक गंभीर स्थितियों की कल्पना करने लगता है और क्रमशः विसंवेदनशील हो जाता है। यह अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत से काम करता है: विश्रांति, प्रबल प्रतिक्रिया, कमज़ोर दुश्चिंता प्रतिक्रिया को अवरुद्ध करती है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. कार्ल रोज़र्स की सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा का वर्णन कीजिए।

उत्तर: रोज़र्स ने वैज्ञानिक निग्रह को व्यष्टीकृत पद्धति से जोड़ा, स्व के संप्रत्यय को लाते हुए, जिसमें स्वतंत्रता और वरण अस्तित्व का केंद्र हैं। यह चिकित्सा एक गर्मजोशी भरा संबंध देती है जिसमें सेवार्थी अपनी विघटित भावनाओं से जुड़ पाता है। चिकित्सक तदनुभूति (सेवार्थी के अनुभव को अपना समझकर समझना), अशर्त सकारात्मक आदर (जो कुछ भी प्रकट हो, उसकी परवाह किए बिना पूर्ण स्वीकार), और परावर्तन (सेवार्थी के कथनों को दोहराकर स्पष्टीकरण माँगना) दिखाता है। तदनुभूति चिकित्सक और सेवार्थी के बीच सांवेगिक अनुनाद की स्थिति बनाती है; अशर्त सकारात्मक आदर से सेवार्थी अपनी भावनाएँ अन्वेषित करने के लिए सुरक्षित महसूस करता है, समाकलित होता है, और अपना वास्तविक स्व बनता है, चिकित्सक केवल सुगमकर्ता के रूप में।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT) क्या है, और इसे व्यापक क्यों बताया जाता है?

उत्तर: CBT वर्तमान में सबसे लोकप्रिय मनश्चिकित्सा है, जिसे शोध ने दुश्चिंता, अवसाद, आतंक-दौरा, सीमावर्ती व्यक्तित्व आदि के लिए एक संक्षिप्त, प्रभावोत्पादक उपचार सिद्ध किया है। यह जैव-मनोसामाजिक उपागम अपनाती है: जैविक पक्ष विश्रांति की विधियों से, मनोवैज्ञानिक पक्ष व्यवहार और संज्ञानात्मक चिकित्सा तकनीकों से, और सामाजिक पक्ष पर्यावरण में परिवर्तन से संबोधित किए जाते हैं। यही इसे व्यापक, प्रयोग में आसान, कई विकारों पर लागू और प्रमाणित प्रभावोत्पादकता वाली चिकित्सा बनाता है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. विक्टर फ्रेंकल की उद्बोधक चिकित्सा समझाइए।

उत्तर: फ्रेंकल, एक मनोरोगविज्ञानी और तंत्रिकाविज्ञानी, ने उद्बोधक चिकित्सा प्रतिपादित की (‘लॉगोस’ ग्रीक में आत्मा है, इसलिए उद्बोधक चिकित्सा का अर्थ है आत्मा का उपचार)। इसका आधार ‘अर्थ निर्माण’ है: अपने अस्तित्व के आध्यात्मिक सत्य की खोज, जीवन-संकट की स्थितियों में भी। जैसे एक अचेतन (मूल प्रवृत्तियों का भंडार) होता है, वैसे ही एक आध्यात्मिक अचेतन (प्रेम, सौंदर्यात्मक अभिज्ञता, जीवन-मूल्यों का भंडार) होता है। अस्तित्व दुश्चिंता आध्यात्मिक मूल की तंत्रिकातापी दुश्चिंता है। लक्ष्य है सेवार्थी को अपनी परिस्थितियों से परे जीवन में अर्थ और उत्तरदायित्व खोजने में मदद करना; चिकित्सक निष्कपट है, ‘आज और अभी’ पर ज़ोर देता है, और अन्यारोपण को सक्रिय रूप से हतोत्साहित करता है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ में योगदान देने वाले चार कारकों को सूचीबद्ध कर संक्षेप में समझाइए।

उत्तर: (i) चिकित्सक द्वारा अपनाई गई तकनीकें और उनका परिपालन, जैसे CBT में विश्रांति और संज्ञानात्मक पुनःसंरचना। (ii) चिकित्सात्मक मैत्री स्वयं, जिसमें चिकित्सक की नियमित उपलब्धता, गर्मजोशी और तदनुभूति से स्वास्थ्य-लाभकारी गुण होते हैं। (iii) कैथार्सिस (भाव-विरेचन), प्रारंभिक साक्षात्कार सत्रों में भावनात्मक बोझ हलका करना। (iv) अविशिष्ट कारक, जो सभी पद्धतियों/सेवार्थियों/चिकित्सकों में घटित होते हैं: रोगी चर (परिवर्तन की अभिप्रेरणा, सुधार की प्रत्याशा) और चिकित्सक चर (सकारात्मक स्वभाव, अनसुलझे द्वंद्वों की अनुपस्थिति, अच्छा मानसिक स्वास्थ्य)।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. मानसिक रूप से बीमार रोगी के पुनःस्थापन के घटकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: पुनःस्थापन का उद्देश्य रोगी को समाज का उत्पादक सदस्य बनाने के लिए सशक्त बनाना है। इसके घटक हैं: व्यावसायिक चिकित्सा (मोमबत्ती बनाना, कागज़ की थैली बनाना, बुनाई जैसे कौशल, जो कार्य-अनुशासन बनाते हैं); सामाजिक कौशल प्रशिक्षण (भूमिका-निर्वाह, अनुकरण, अनुदेश के माध्यम से अंतर्वैयक्तिक कौशल विकसित करना, ताकि रोगी सामाजिक समूह में कार्य कर सके); संज्ञानात्मक पुनःप्रशिक्षण (अवधान, स्मृति और अधिशासी प्रकार्यों में सुधार); और पर्याप्त सुधार के बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण, जो उत्पादक रोज़गार के लिए आवश्यक कौशल देता है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. व्यवहार चिकित्सा में प्रयुक्त विभिन्न तकनीकों की चर्चा कीजिए।

उत्तर: व्यवहार चिकित्सा मानती है कि कष्ट दोषपूर्ण व्यवहार/चिंतन प्रतिरूपों से उत्पन्न होता है, और वर्तमान पर केंद्रित है। इसका आधार अधिगम-सिद्धांत का नैदानिक अनुप्रयोग है। व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीकें निषेधात्मक प्रबलन और विमुखी अनुबंधन हैं। तकनीकें: (i) निषेधात्मक प्रबलन: पीड़ादायक उद्दीपक से बचना (जैसे ठंड से बचने ऊनी कपड़े पहनना)। (ii) विमुखी अनुबंधन: अवांछित अनुक्रिया को बार-बार विमुखी परिणाम से जोड़ना (जैसे झटका + शराब की गंध)। (iii) सकारात्मक प्रबलन: दुर्लभ अनुकूली व्यवहार बढ़ाने के लिए पुरस्कार (जैसे समय पर गृहकार्य के लिए मनपसंद पकवान)। (iv) टोकन अर्थव्यवस्था: वांछित व्यवहार के लिए टोकन, जो संगृहीत कर किसी पुरस्कार से बदले जाते हैं। (v) विभेदक प्रबलन: अवांछित व्यवहार घटाना और वांछित बढ़ाना, एक साथ; वांछित के लिए सकारात्मक और अवांछित के लिए निषेधात्मक प्रबलन, या वांछित के लिए सकारात्मक प्रबलन और अवांछित की उपेक्षा, जो कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रभावी है (सिनेमा/लड़की उदाहरण)। (vi) विश्रांति की विधियाँ, जैसे प्रगामी पेशीय विश्रांति और ध्यान, दुश्चिंता कम करने के लिए। (vii) क्रमिक विसंवेदनीकरण (वोल्प), दुर्भीति के लिए, भय-पदानुक्रम और अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत का उपयोग करते हुए। (viii) मॉडलिंग: भूमिका-प्रतिरूप या चिकित्सक को देखकर प्रतिस्थानिक अधिगम से सीखना।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए कि संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है।

उत्तर: संज्ञानात्मक चिकित्साएँ कष्ट का कारण अविवेकी विचारों और विश्वासों में खोजती हैं। आरन बेक का सिद्धांत: परिवार और समाज से बाल्यावस्था के अनुभव एक मूल स्कीमा (विश्वास और क्रिया-प्रतिरूप तंत्र) विकसित करते हैं। उदाहरण: माता-पिता द्वारा उपेक्षित बच्चा मूल स्कीमा ‘मैं वांछित नहीं हूँ’ विकसित करता है। जीवन में बाद में एक निर्णायक घटना (स्कूल में अध्यापक द्वारा सबके सामने हँसी उड़ाई जाना) इस स्कीमा को सक्रिय कर देती है, जिससे ‘कोई मुझे प्यार नहीं करता’, ‘मैं कुरूप हूँ’, ‘मैं मूर्ख हूँ’, ‘मैं सफल नहीं हो सकता’ जैसे नकारात्मक स्वचालित विचार उत्पन्न होते हैं। ये नकारात्मक स्वचालित विचार संज्ञानात्मक विकृतियों से अभिलक्षित होते हैं: सामान्य प्रकृति के चिंतन-प्रतिरूप जो वास्तविकता को नकारात्मक रूप से विकृत करते हैं, जिन्हें अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना कहते हैं, जो सामाजिक यथार्थ के बारे में संज्ञान की त्रुटियाँ उत्पन्न करते हैं। इन विचारों का बार-बार होना दुश्चिंता और अवसाद की भावनाएँ विकसित करता है। चिकित्सक सौम्य, बिना धमकी वाले प्रश्नों से सेवार्थी के विश्वासों और विचारों का खंडन करता है, जिससे संज्ञानात्मक पुनःसंरचना प्राप्त होती है, जो दुश्चिंता और अवसाद को घटाती है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. कौन-सी चिकित्सा सेवार्थी को व्यक्तिगत संवृद्धि चाहने एवं अपनी संभाव्यताओं की सिद्धि के लिए प्रेरित करती है? उन चिकित्साओं की चर्चा कीजिए जो इस सिद्धांत पर आधारित हैं।

उत्तर: मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा इस सिद्धांत पर आधारित है कि मनुष्य व्यक्तिगत संवृद्धि और आत्मसिद्धि (अधिक जटिल, संतुलित, समाकलित बनने की सहज शक्ति) की इच्छा से अभिप्रेरित होते हैं। जब समाज और परिवार इन आवश्यकताओं को बाधित करते हैं तो मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न होता है; रोगोपचार मुक्त संवेगात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से, एक अनुज्ञात्मक, स्वीकृतिपूर्ण वातावरण में होता है, जिसमें सेवार्थी को अपने व्यवहार पर नियंत्रण की स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व दोनों हैं। इस सिद्धांत पर आधारित तीन नामित चिकित्साएँ हैं: (i) अस्तित्वपरक चिकित्सा: विक्टर फ्रेंकल की उद्बोधक चिकित्सा, जो ‘अर्थ निर्माण’ के माध्यम से सेवार्थी को अर्थ खोजने में मदद करती है, आध्यात्मिक मूल की अस्तित्व दुश्चिंता को संबोधित करते हुए। (ii) सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा: कार्ल रोज़र्स की चिकित्सा, जो तदनुभूति, अशर्त सकारात्मक आदर और परावर्तन के माध्यम से सेवार्थी को अपनी भावनाओं से पुनः जुड़ने और अपना वास्तविक स्व बनने में मदद करती है। (iii) गेस्टाल्ट चिकित्सा: फ्रेडरिक और लॉरा पर्ल्स की चिकित्सा, जो सेवार्थी को अपनी भावनाओं और द्वंद्वों के बारे में कल्पनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित कर उसकी आत्म-जागरूकता और आत्म-स्वीकृति बढ़ाती है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ के लिए किन कारकों का योगदान होता है? कुछ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की गणना कीजिए।

उत्तर: स्वास्थ्य-लाभ में चार कारक योगदान देते हैं: चिकित्सक द्वारा अपनाई गई तकनीकें और उनका परिपालन; चिकित्सात्मक मैत्री स्वयं (नियमित उपलब्धता, गर्मजोशी, तदनुभूति); कैथार्सिस (भाव-विरेचन: प्रारंभिक सत्रों में भावनात्मक बोझ हलका करना); और अविशिष्ट कारक (रोगी चर जैसे परिवर्तन की अभिप्रेरणा, और चिकित्सक चर जैसे अनसुलझे संवेगात्मक द्वंद्वों की अनुपस्थिति)। वैकल्पिक चिकित्सा, पारंपरिक औषध-उपचार या मनश्चिकित्सा के विकल्प के रूप में, योग, ध्यान, ऐक्यूपंक्चर और वनौषधि शामिल करती है। योग, पातंजलि के योग सूत्र के अष्टांग योग में विस्तृत, आज सामान्यतः आसन और/या प्राणायाम है। ध्यान श्वास, वस्तु, विचार या मंत्र पर केंद्रित होता है; विपश्यना (सतर्कता-आधारित) ध्यान में कोई नियत वस्तु नहीं होती, व्यक्ति संवेदनाओं और विचारों का निष्क्रिय प्रेक्षण करता है। सुदर्शन क्रिया योग (SKY), एक तीव्र-श्वसन तकनीक, दबाव, दुश्चिंता, PTSD, अवसाद, दबाव-संबंधी चिकित्सा रोग और मादक द्रव्यों के दुरुपयोग के लिए उपयोग की जाती है, और NIMHANS, भारत के शोध ने दिखाया है कि यह अवसाद को कम करता है। कुंडलिनी योग, प्राणायाम और मंत्रोच्चार को जोड़कर, अरैखिक विज्ञान संस्थान, UCSD, अमेरिका द्वारा मनोग्रहित-बाध्यता विकार के लिए प्रभावी पाया गया है।

5 केस स्टडी

केस अध्ययन (काल्पनिक, पुस्तक से नहीं)
प्रिया को दुश्चिंता की समस्या है और उसे व्यवहार चिकित्सा की सलाह दी गई है। उसका चिकित्सक उसका और उसके परिवार का साक्षात्कार कर व्यवहार विश्लेषण करता है। फिर भीड़भाड़ वाली जगहों के उसके विशेष भय के उपचार के लिए चिकित्सक उसे पहले प्रगामी पेशीय विश्रांति से विश्रांत करना सिखाता है।

(क) 1 अंक अध्याय के अनुसार, मनश्चिकित्सा की प्रक्रिया का प्रारंभ किस चरण से होता है?
उत्तर: सेवार्थी की समस्या के निरूपण से, अर्थात नैदानिक निरूपण (बॉक्स 5.1)।

(ख) 2 अंक अध्याय के अनुसार, व्यवहार विश्लेषण किन तीन चीज़ों की पहचान करने का प्रयास करता है?
उत्तर: कष्ट का कारण बनने वाला अपक्रियात्मक व्यवहार, वे पूर्ववर्ती कारक जिन्होंने उसे इसके लिए प्रवृत्त किया, और वे संपोषण कारक जो इसे बनाए रखते हैं।

(ग) 3 अंक प्रिया के भीड़भाड़ वाली जगहों के भय का उपचार संभवतः किस विशिष्ट तकनीक से किया जाएगा, और यह कैसे काम करती है?
उत्तर: क्रमिक विसंवेदनीकरण। चिकित्सक और प्रिया मिलकर भीड़ से संबंधित स्थितियों का कम से अधिक भय तक का एक पदानुक्रम बनाएँगे; विश्रांत किए जाने के बाद वह सबसे कम दुश्चिंता वाली स्थिति की कल्पना करेगी, और सत्रों के साथ अधिक गंभीर स्थितियों की ओर बढ़ेगी, विश्रांत रहते हुए, अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत का उपयोग करते हुए (पहले विकसित की गई विश्रांति की अनुक्रिया दुश्चिंता को अवरुद्ध करती है)।