NCERT पाठ्यपुस्तक मनोविज्ञान, अध्याय 5 “चिकित्सा उपागम” के सभी नौ समीक्षात्मक प्रश्नों के पूर्ण हल, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के भीतर छपे तीन क्रियाकलाप (क्रियाकलाप 5.1 से 5.3) तथा नैदानिक निरूपण पर बॉक्स 5.1। पहले स्वयं उत्तर देने का प्रयास करें, फिर यहाँ जाँचें।
1 प्रकृति, विषय-क्षेत्र और चिकित्सात्मक संबंध
प्र. मनश्चिकित्सा की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र का वर्णन कीजिए। मनश्चिकित्सा में चिकित्सात्मक संबंध के महत्त्व को उजागर कीजिए।
उत्तर: मनश्चिकित्सा उपचार चाहने वाले (सेवार्थी) और चिकित्सक के बीच एक ऐच्छिक संबंध है, जिसका उद्देश्य सेवार्थी की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करने में मदद करना है, ताकि विश्वास बनने पर समस्याओं पर मुक्त रूप से चर्चा हो सके। इसका विषय-क्षेत्र दुरनुकूलक व्यवहारों को बदलना, वैयक्तिक कष्ट को कम करना, और सेवार्थी को अपने पर्यावरण से बेहतर अनुकूलन में मदद करना है, जिसमें वैवाहिक, व्यावसायिक और सामाजिक समायोजन शामिल है। हर मनश्चिकित्सात्मक उपागम के चार अभिलक्षण होते हैं: सिद्धांत-आधारित नियमों का व्यवस्थित अनुप्रयोग, केवल प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा अभ्यास (अप्रशिक्षित व्यक्ति अनजाने में लाभ से अधिक हानि पहुँचा सकता है), चिकित्सक-सेवार्थी अंतःक्रिया जिसमें सेवार्थी ध्यान का मुख्य केंद्र है, और एक गोपनीय, अंतर्वैयक्तिक, गत्यात्मक संबंध। चिकित्सात्मक संबंध (मैत्री) इसका केंद्र है: इसके दो घटक हैं, संविदात्मक (दो इच्छुक व्यक्ति साझेदारी में प्रवेश करते हैं) और सीमित अवधि (तब तक चलती है जब तक सेवार्थी अपना जीवन नियंत्रित करने में समर्थ न हो)। यह मानवीय संबंध ही परिवर्तन का वास्तविक माध्यम है: यह विश्वास तथा भरोसे पर आधारित, चिकित्सक की तदनुभूति, सच्चाई, गर्मजोशी और अशर्त सकारात्मक आदर पर निर्मित होना चाहिए, तथा नियमबद्ध रूप से गोपनीय और व्यावसायिक बना रहना चाहिए।
2 मनश्चिकित्सा के प्रकार और उनका आधार
प्र. मनश्चिकित्सा के विभिन्न प्रकार कौन-से हैं? किस आधार पर इनका वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर: अध्याय मनश्चिकित्सा को तीन व्यापक समूहों में बाँटता है, उनके आविर्भाव के कालानुक्रम में: मनोगतिक चिकित्सा (पहले), व्यवहार चिकित्सा (दूसरे), और अस्तित्वपरक चिकित्सा, जिसे “तीसरी शक्ति” भी कहा जाता है (सबसे अंत में)। इनका वर्गीकरण छह प्राचलों पर किया गया है: समस्या का कारण, कारण कैसे उत्पन्न हुआ, उपचार की मुख्य विधि, चिकित्सात्मक संबंध की प्रकृति, सेवार्थी को मुख्य लाभ, और उपचार की अवधि। इन प्राचलों पर: (1) कारण। मनोगतिक: अंतःमनोद्वंद्व, अर्थात व्यक्ति के मानस में विद्यमान द्वंद्व; व्यवहार: व्यवहार एवं संज्ञान का दोषपूर्ण अधिगम; अस्तित्वपरक: अपने जीवन और अस्तित्व के अर्थ से संबंधित प्रश्न। (2) कारण का प्रादुर्भाव। मनोगतिक: बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाएँ तथा अनसुलझे भय; व्यवहार: दोषपूर्ण अनुबंधन प्रतिरूप, दोषपूर्ण अधिगम तथा दोषपूर्ण चिंतन एवं विश्वास; अस्तित्वपरक: अकेलेपन, विसंबंधन और अस्तित्व की व्यर्थता के बोध से जुड़ी वर्तमान भावनाएँ। (3) उपचार की मुख्य विधि। मनोगतिक: मुक्त साहचर्य विधि और स्वप्न को बताने की विधि, जिनसे प्राप्त सामग्री की व्याख्या सेवार्थी के समक्ष की जाती है ताकि वह अपने द्वंद्वों का सामना और समाधान कर सके; व्यवहार: दोषपूर्ण अनुबंधन प्रतिरूप की पहचान कर वैकल्पिक व्यवहारात्मक प्रासंगिकता नियत करना, और संज्ञानात्मक विधियों से दोषपूर्ण चिंतन को चुनौती देना; अस्तित्वपरक: सकारात्मक, स्वीकारात्मक तथा अनिर्णयात्मक पर्यावरण, जिसमें सेवार्थी व्यक्तिगत संवृद्धि से समाधान तक पहुँचता है। (4) चिकित्सात्मक संबंध। मनोगतिक: चिकित्सक सेवार्थी के अंतःमनोद्वंद्व को उससे बेहतर समझता है और उसके विचारों-भावनाओं की व्याख्या करता है; व्यवहार: चिकित्सक दोषपूर्ण प्रतिरूप पहचानकर अनुकूली प्रतिरूप जानता है; अस्तित्वपरक: चिकित्सक केवल गर्मजोशी भरा, तदनुभूतिक संबंध देता है जिसमें सेवार्थी स्वयं अन्वेषण करता है। (5) मुख्य लाभ। मनोगतिक: संवेगात्मक अंतर्दृष्टि; व्यवहार: दोषपूर्ण व्यवहार और विचारों के प्रतिरूपों को अनुकूली प्रतिरूपों में बदलना; मानवतावादी: व्यक्तिगत संवृद्धि। (6) अवधि। क्लासिकी मनोविश्लेषण कई वर्षों तक चल सकता है, हालाँकि मनोगतिक चिकित्सा के कई आधुनिक रूपांतर 10-15 सत्रों में पूरे हो जाते हैं; व्यवहार, संज्ञानात्मक व्यवहार तथा अस्तित्वपरक चिकित्साएँ कुछ महीनों में पूरी हो जाती हैं।
3 व्यवहार चिकित्सा में प्रयुक्त तकनीकें
प्र. व्यवहार चिकित्सा में प्रयुक्त विभिन्न तकनीकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: व्यवहार चिकित्सा अधिगम-सिद्धांत का नैदानिक अनुप्रयोग है, जो व्यवहार विश्लेषण (सेवार्थी और परिवार का साक्षात्कार कर अपक्रियात्मक व्यवहार, उसके पूर्ववर्ती कारक और संपोषण कारक की पहचान) के माध्यम से लागू होती है, इसके बाद पूर्ववर्ती संक्रिया (व्यवहार से पहले की चीज़ बदलना) और अनुवर्ती संक्रिया (बाद की चीज़ बदलना) से बना उपचार पैकेज आता है। पूर्ववर्ती संक्रिया जब किसी परिणाम के प्रबलन मूल्य को घटाकर या बढ़ाकर की जाती है, तो उसे स्थापक संक्रिया कहते हैं (जैसे चायकाल में भोजन की मात्रा घटाना, ताकि रात के भोजन का प्रबलन मूल्य बढ़े)। इन तकनीकों का सिद्धांत है सेवार्थी के भाव-प्रबोधन स्तर को कम करना, प्राचीन या क्रियाप्रसूत अनुबंधन द्वारा व्यवहार को बदलना, और आवश्यकता हो तो प्रतिस्थानिक अधिगम का उपयोग करना। व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीकें निषेधात्मक प्रबलन और विमुखी अनुबंधन हैं। नामित तकनीकें हैं: निषेधात्मक प्रबलन (पीड़ादायक उद्दीपक से बचना, जैसे ठंड से बचने ऊनी कपड़े पहनना); विमुखी अनुबंधन (अवांछित अनुक्रिया को बार-बार विमुखी परिणाम से जोड़ना, जैसे हल्का झटका + शराब की गंध); सकारात्मक प्रबलन (दुर्लभ अनुकूली व्यवहार बढ़ाने के लिए पुरस्कार, जैसे समय पर गृहकार्य के लिए मनपसंद पकवान); टोकन अर्थव्यवस्था (वांछित व्यवहार के लिए मिले टोकन संगृहीत किए जाते हैं और किसी पुरस्कार, जैसे बाहर घुमाने ले जाना, से बदले जाते हैं); विभेदक प्रबलन (अवांछित व्यवहार घटाना और वांछित व्यवहार बढ़ाना, एक साथ: वांछित के लिए सकारात्मक और अवांछित के लिए निषेधात्मक प्रबलन, या वांछित के लिए सकारात्मक प्रबलन और अवांछित की उपेक्षा, जो कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रभावी है; जैसे सिनेमा/लड़की उदाहरण); विश्रांति की विधियाँ, जैसे प्रगामी पेशीय विश्रांति और ध्यान, दुश्चिंता कम करने के लिए जो दोषपूर्ण व्यवहार का पूर्ववर्ती कारक है (प्रगामी पेशीय विश्रांति में सेवार्थी कुछ पेशी समूहों, जैसे अग्रबाहु, को तानना और फिर तनाव मुक्त करना सीखता है; पुनरावृत्त अभ्यास से वह शरीर की सारी पेशियों को विश्रांत करना सीख जाता है); क्रमिक विसंवेदनीकरण (वोल्प द्वारा प्रतिपादित, दुर्भीति के लिए, भय-पदानुक्रम और अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत का उपयोग करते हुए); और मॉडलिंग (भूमिका-प्रतिरूप या चिकित्सक को देखकर प्रतिस्थानिक अधिगम से सीखना, छोटे बदलावों को क्रमशः पुरस्कृत करते हुए)।
4 संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है
प्र. उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए कि संज्ञानात्मक विकृति किस प्रकार घटित होती है।
उत्तर: आरन बेक की संज्ञानात्मक चिकित्सा के अनुसार, परिवार और समाज से बाल्यावस्था के अनुभव मूल स्कीमाएँ (विश्वास-और-क्रिया-प्रतिरूप तंत्र) विकसित करते हैं। उदाहरण के लिए, माता-पिता द्वारा उपेक्षित बच्चा मूल स्कीमा “मैं वांछित नहीं हूँ” विकसित कर लेता है। जीवन में बाद में एक निर्णायक घटना घटित होती है, जैसे स्कूल में अध्यापक द्वारा सबके सामने हँसी उड़ाई जाना, जो इस मूल स्कीमा को सक्रिय कर देती है, जिससे नकारात्मक स्वचालित विचार उत्पन्न होते हैं (“कोई मुझे प्यार नहीं करता”, “मैं कुरूप हूँ”, “मैं मूर्ख हूँ”)। ये नकारात्मक स्वचालित विचार संज्ञानात्मक विकृतियों से अभिलक्षित होते हैं: सामान्य प्रकृति के चिंतन-प्रतिरूप जो वास्तविकता को नकारात्मक रूप से विकृत करते हैं, जिन्हें अपक्रियात्मक संज्ञानात्मक संरचना कहते हैं और जो सामाजिक यथार्थ के बारे में संज्ञान की त्रुटियाँ उत्पन्न करते हैं। इन विचारों का बार-बार होना दुश्चिंता और अवसाद की भावनाएँ विकसित करता है। चिकित्सक सौम्य, बिना धमकी वाले प्रश्नों से सेवार्थी के विश्वासों और विचारों का खंडन करता है, जिससे संज्ञानात्मक पुनःसंरचना प्राप्त होती है, जो बदले में दुश्चिंता और अवसाद को घटाती है।
5 व्यक्तिगत संवृद्धि और आत्मसिद्धि पर आधारित चिकित्साएँ
प्र. कौन-सी चिकित्सा सेवार्थी को व्यक्तिगत संवृद्धि चाहने एवं अपनी संभाव्यताओं की सिद्धि के लिए प्रेरित करती है? उन चिकित्साओं की चर्चा कीजिए जो इस सिद्धांत पर आधारित हैं।
उत्तर: मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा इस सिद्धांत पर आधारित है: मनुष्य व्यक्तिगत संवृद्धि और आत्मसिद्धि की इच्छा से अभिप्रेरित होते हैं, एक सहज शक्ति जो व्यक्ति को अधिक जटिल, संतुलित और समाकलित बनने के लिए प्रेरित करती है। जब समाज और परिवार इस आवश्यकता को बाधित करते हैं तो मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न होता है; रोगोपचार के लिए मुक्त संवेगात्मक अभिव्यक्ति, एक अनुज्ञात्मक, अनिर्णयात्मक, स्वीकृतिपूर्ण वातावरण में आवश्यक है, जिसमें सेवार्थी को अपने व्यवहार पर नियंत्रण की स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व दोनों हैं, चिकित्सक केवल सुगमकर्ता है। इस सिद्धांत पर आधारित तीन नामित चिकित्साएँ हैं: (i) अस्तित्वपरक चिकित्सा, अर्थात विक्टर फ्रेंकल की उद्बोधक चिकित्सा (“आत्मा का उपचार”), जो “अर्थ निर्माण” के माध्यम से सेवार्थी को अर्थ खोजने में मदद करती है, आध्यात्मिक मूल की अस्तित्व दुश्चिंता को संबोधित करते हुए, अन्यारोपण को हतोत्साहित करते हुए और “आज और अभी” पर ज़ोर देते हुए; (ii) सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा, कार्ल रोज़र्स की चिकित्सा, जो तदनुभूति, अशर्त सकारात्मक आदर और परावर्तन के माध्यम से सेवार्थी को अपनी विघटित भावनाओं से पुनः जुड़ने और अपना वास्तविक स्व बनने में मदद करती है; और (iii) गेस्टाल्ट चिकित्सा, फ्रेडरिक और लॉरा पर्ल्स द्वारा दी गई, जो सेवार्थी को अपनी भावनाओं और द्वंद्वों के बारे में कल्पनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित कर उसकी आत्म-जागरूकता और आत्म-स्वीकृति बढ़ाती है, और समूहों में भी प्रयुक्त हो सकती है।
6 स्वास्थ्य-लाभ के कारक और वैकल्पिक चिकित्सा
प्र. मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ के लिए किन कारकों का योगदान होता है? कुछ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की गणना कीजिए।
उत्तर: मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ के लिए चार कारक योगदान देते हैं: चिकित्सक द्वारा अपनाई गई तकनीकें और उनका परिपालन (जैसे CBT में विश्रांति और संज्ञानात्मक पुनःसंरचना); चिकित्सात्मक मैत्री स्वयं, जिसके स्वास्थ्य-लाभकारी गुण चिकित्सक की नियमित उपलब्धता, गर्मजोशी और तदनुभूति से आते हैं; कैथार्सिस (भाव-विरेचन), अर्थात प्रारंभिक सत्रों में समस्या समझते समय होने वाला भावनात्मक बोझ हलका होना; और अविशिष्ट कारक, जो सभी पद्धतियों/सेवार्थियों/चिकित्सकों में घटित होते हैं, रोगी चर (परिवर्तन की अभिप्रेरणा, सुधार की प्रत्याशा) और चिकित्सक चर (सकारात्मक स्वभाव, अनसुलझे संवेगात्मक द्वंद्वों की अनुपस्थिति, अच्छा मानसिक स्वास्थ्य) में बँटे। वैकल्पिक चिकित्सा, पारंपरिक औषध-उपचार या मनश्चिकित्सा के विकल्प के रूप में, योग, ध्यान, ऐक्यूपंक्चर और वनौषधि शामिल करती है। योग (पातंजलि के योग सूत्र के अष्टांग योग में विस्तृत) आज सामान्यतः आसन और/या प्राणायाम है; ध्यान श्वास, वस्तु, विचार या मंत्र पर केंद्रित होता है, और विपश्यना (सतर्कता-आधारित) ध्यान में कोई नियत वस्तु नहीं होती। सुदर्शन क्रिया योग (SKY), एक तीव्र-श्वसन तकनीक, दबाव, दुश्चिंता, PTSD, अवसाद, दबाव-संबंधी चिकित्सा रोग और मादक द्रव्यों के दुरुपयोग के लिए उपयोग की जाती है, और NIMHANS, भारत के शोध ने दिखाया है कि यह अवसाद कम करता है; कुंडलिनी योग, प्राणायाम और मंत्रोच्चार को जोड़कर, अरैखिक विज्ञान संस्थान, कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो, अमेरिका द्वारा मनोग्रहित-बाध्यता विकार के उपचार में प्रभावी पाया गया है।
7 मानसिक रोगियों के पुनःस्थापन की तकनीकें
प्र. मानसिक रोगियों के पुनःस्थापन के लिए कौन-सी तकनीकों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर: पुनःस्थापन का उद्देश्य रोगी को यथासंभव समाज का उत्पादक सदस्य बनाने के लिए सशक्त बनाना है, विशेषकर तब जब गंभीर विकारों (जैसे मनोविदलता) में लक्षणों में कमी आना जीवन की गुणवत्ता में सुधार से संबंधित नहीं हो सकता, क्योंकि अनभिरुचि और प्रेरणा की कमी जैसे नकारात्मक लक्षण बने रहते हैं। इसकी तकनीकें हैं: व्यावसायिक चिकित्सा, मोमबत्ती बनाना, कागज़ की थैली बनाना, बुनाई जैसे कौशल सिखाकर रोगी में कार्य-अनुशासन बनाना; सामाजिक कौशल प्रशिक्षण, भूमिका-निर्वाह, अनुकरण और अनुदेश के माध्यम से अंतर्वैयक्तिक कौशल विकसित करना ताकि रोगी सामाजिक समूह में कार्य कर सके; संज्ञानात्मक पुनःप्रशिक्षण, अवधान, स्मृति और अधिशासी प्रकार्यों में सुधार लाना; और पर्याप्त सुधार आ जाने पर व्यावसायिक प्रशिक्षण, जो उत्पादक रोज़गार आरंभ करने के लिए आवश्यक कौशलों में मदद करता है।
8 छिपकली/तिलचटे की दुर्भीति: सामाजिक अधिगम और मनोविश्लेषण की व्याख्या
प्र. छिपकली/तिलचटा के दुर्भीति भय का सामाजिक अधिगम सिद्धांतकार किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा? इसी दुर्भीति का एक मनोविश्लेषक किस प्रकार स्पष्टीकरण करेगा?
उत्तर: एक सामाजिक अधिगम सिद्धांतकार, इस अध्याय की व्यवहार-चिकित्सा रूपरेखा के भीतर काम करते हुए, इस दुर्भीति को जन्मजात भय के बजाय दोषपूर्ण अधिगम का मामला मानकर समझाएगा। अध्याय की अपनी व्यवहार-विश्लेषण विधि तीन बातें पहचानती है: अपक्रियात्मक व्यवहार (भय की अनुक्रिया स्वयं, इतनी तीव्र कि व्यक्ति की सामान्य गतिविधियाँ बाधित होती हैं), पूर्ववर्ती कारक (एक ऐसी घटना जिसने व्यक्ति को इस भय के लिए प्रवृत्त किया, जैसे किसी और को छिपकली/तिलचटे पर तीव्र भय या घृणा से प्रतिक्रिया करते देखना, क्योंकि प्रेक्षण द्वारा भी भय अर्जित किया जा सकता है, या स्वयं का कोई वास्तव में डरावना अनुभव), और संपोषण कारक (हर बार भयभीत वस्तु से बचने या भागने पर मिलने वाली राहत, जो निषेधात्मक प्रबलन का एक रूप है और परिहार व्यवहार को बनाए रखती है)। इस प्रकार इस दुर्भीति का उपचार अध्याय की अपनी नामित तकनीक से किया जाएगा: क्रमिक विसंवेदनीकरण, जिसमें छिपकली/तिलचटे से जुड़ी स्थितियों का कम से अधिक भय तक का एक पदानुक्रम बनाया जाता है, और व्यक्ति को विश्रांत रहते हुए, अन्योन्य प्रावरोध के सिद्धांत के माध्यम से, क्रमशः विसंवेदनशील किया जाता है।
मनोविश्लेषक का स्पष्टीकरण: एक मनोविश्लेषक इसी दुर्भीति को मनोगतिक दृष्टिकोण से समझाएगा, जिसका वर्णन अध्याय तीनों प्रकार की मनश्चिकित्साओं की तुलना करते समय करता है। मनोगतिक चिकित्सा के अनुसार अंतःमनोद्वंद्व, अर्थात व्यक्ति के मानस में विद्यमान द्वंद्व, मनोवैज्ञानिक समस्याओं के स्रोत होते हैं, और ये द्वंद्व बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाओं तथा बाल्यावस्था के अनसुलझे भय से उत्पन्न होते हैं। इसलिए छिपकली/तिलचटे के भय को सीखी हुई अनुक्रिया नहीं, बल्कि ऐसे ही किसी अचेतन द्वंद्व का बाहरी लक्षण माना जाएगा। उपचार के लिए मनोविश्लेषक मुक्त साहचर्य विधि और स्वप्न को बताने की विधि से सेवार्थी के विचार और भावनाएँ सामने लाएगा, और इस सामग्री की व्याख्या सेवार्थी के समक्ष करेगा, ताकि वह अपने द्वंद्व का सामना और समाधान कर सके। इसका लक्ष्य संवेगात्मक अंतर्दृष्टि है: द्वंद्व को बौद्धिक रूप से समझना, संवेगात्मक रूप से स्वीकार करना और उसके प्रति अपने संवेग बदलना, जिसके परिणामस्वरूप लक्षण (दुर्भीति) कम हो जाते हैं।
9 संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा किन समस्याओं के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है
प्र. किस प्रकार की समस्याओं के लिए संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा सबसे उपयुक्त मानी जाती है?
उत्तर: संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT) दुश्चिंता, अवसाद, आतंक-दौरा, सीमावर्ती व्यक्तित्व इत्यादि विभिन्न मनोवैज्ञानिक विकारों के लिए एक संक्षिप्त और प्रभावोत्पादक उपचार है; शोध ने इसे निर्णायक रूप से सिद्ध किया है, और यह आजकल सर्वाधिक प्रचलित मनश्चिकित्सा भी है। यह इन समस्याओं के लिए इसलिए उपयुक्त है क्योंकि यह जैव-मनोसामाजिक उपागम अपनाती है: कष्ट के जैविक पक्षों को विश्रांति की विधियों से, मनोवैज्ञानिक पक्षों को व्यवहार और संज्ञानात्मक चिकित्सा तकनीकों से, और सामाजिक पक्षों को पर्यावरण में परिवर्तन से संबोधित करती है। यह संयोजन ही CBT को एक व्यापक तकनीक बनाता है जो प्रयोग में आसान, विविध विकारों पर लागू और प्रमाणित प्रभावोत्पादकता वाली है।
10 अध्याय के भीतर के क्रियाकलाप (क्रियाकलाप 5.1 से 5.3)
अध्याय के भीतर तीन क्रियाकलाप बॉक्स छपे हैं। तीनों में आपको स्वयं कुछ करना है, इसलिए उनका कोई एक तय आदर्श उत्तर नहीं है; नीचे बताया गया है कि एक अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए और हर क्रियाकलाप अध्याय के किस भाग का अभ्यास कराता है।
प्र. हो सकता है कि आपके किसी सहपाठी या मित्र या किसी दूरदर्शन धारावाहिक के आपके मनपसंद पात्र ने हाल ही में जीवन की एक नकारात्मक या अभिघातज घटना का अनुभव किया हो (उदाहरणार्थ किसी प्रिय की मृत्यु, किसी महत्वपूर्ण संबंध या मित्रता का टूटना) जिसे आप जानते हैं। अपने को दूसरे के स्थान पर रखकर यह जानने का प्रयास कीजिए कि वह व्यक्ति कैसा अनुभव कर रहा है, वह क्या सोच रहा है तथा पूरी स्थिति के प्रति उसके परिप्रेक्ष्य को जानने का प्रयास कीजिए। इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि वह व्यक्ति कैसा अनुभव कर रहा है। (नोट – यह अभ्यास कक्षा में किया जाना चाहिए जिससे किसी कष्टप्रद अनुभव से उबरने में अध्यापक विद्यार्थी की मदद कर सके।)
उत्तर (मार्गदर्शन): यह क्रियाकलाप तदनुभूति का अभ्यास है। घटना का वर्णन कीजिए, फिर उत्तम पुरुष में लिखिए कि वह व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा होगा और क्या सोच रहा होगा, मानो यह आपके साथ हो रहा हो। अपने उत्तर को अध्याय के इस अंतर से जाँचिए: सहानुभूति में व्यक्ति दूसरे के कष्ट के प्रति करुणा और दया रखता है, परंतु दूसरे जैसा महसूस नहीं कर पाता; बौद्धिक समझ में न भावना होती है न सहानुभूति; तदनुभूति में व्यक्ति दूसरे की दशा को समझता है और उसी की तरह महसूस करता है, अर्थात अपने को दूसरे के स्थान पर रखकर देखता है। अध्याय के अनुसार तदनुभूति चिकित्सात्मक संबंध को समृद्ध करती है और उसे स्वास्थ्यकर संबंध में बदल देती है।
प्र. कुछ ऐसी संस्थाओं के बारे में सूचना एकत्र कीजिए जो मनोरोग/मनश्चिकित्सात्मक सहायता प्रदान करती हैं।
उत्तर (मार्गदर्शन): जो संस्थाएँ आपको मिलें (उदाहरण के लिए, आपके ज़िले के किसी सरकारी अस्पताल या मेडिकल कॉलेज का मनोरोग विभाग, या राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिकाविज्ञान संस्थान (निमहांस), जिसका उल्लेख अध्याय में है), उनमें से हर एक के लिए एक छोटी तालिका बनाइए: नाम और स्थान, वहाँ कौन काम करते हैं (मनोरोग चिकित्सक, नैदानिक मनोवैज्ञानिक, परामर्शदाता), और वहाँ कौन-सी सहायता मिलती है, अध्याय के ही शब्दों में: मनश्चिकित्सा (व्यवहार, संज्ञानात्मक, संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा, मानवतावादी-अस्तित्वपरक), योग और ध्यान जैसी वैकल्पिक चिकित्साएँ, और पुनःस्थापन (व्यावसायिक चिकित्सा, सामाजिक कौशल प्रशिक्षण, संज्ञानात्मक पुनःप्रशिक्षण और व्यावसायिक प्रशिक्षण)। यह भी लिखिए कि अध्याय के अनुसार केवल वे व्यक्ति मनश्चिकित्सा कर सकते हैं जिन्होंने कुशल पर्यवेक्षण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया हो, और सूचित सहमति तथा गोपनीयता जैसे नैतिक मानकों का पालन आवश्यक है।
प्र. आपका मित्र परीक्षा से पहले बहुत अधीर और आतंकित महसूस कर रहा है। वह ऊपर-नीचे चहलकदमी कर रहा है, अध्ययन करने में असमर्थ है तथा उसे लगता है कि उसने जो कुछ सीखा था वह सब भूल गया है। अंतःश्वसन (गहरा श्वास लेना), उसे कुछ समय (5-10 सेकण्ड) तक रोककर रखना, फिर निःश्वसन (श्वास निकालना) द्वारा विश्राम करने में उसकी मदद कीजिए। उसे यह क्रिया 5-10 बार दोहराने के लिए कहिए। उसे अपने श्वसन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए भी कहिए। स्वयं आप भी कभी अधीरता महसूस करने पर यह अभ्यास कर सकते हैं।
उत्तर (मार्गदर्शन): चरणों का ठीक-ठीक पालन कीजिए: गहरा श्वास लीजिए, 5-10 सेकण्ड रोकिए, श्वास निकालिए, 5-10 बार दोहराइए, और ध्यान श्वसन पर रखिए। यह विश्रांति की एक सरल विधि है। अध्याय (बॉक्स 5.2) बताता है कि दुश्चिंता सेवार्थी के भाव-प्रबोधन के स्तर को बढ़ाती है और दोषपूर्ण व्यवहार, जैसे पढ़ाई पर ध्यान न लगा पाना, के पूर्ववर्ती कारक का काम करती है, तथा दुश्चिंता का स्तर घटाने के लिए विश्रांति की विधियों का उपयोग किया जाता है। संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा भी कष्ट के जैविक पक्ष के लिए विश्रांति की विधियों का उपयोग करती है, और श्वास पर ध्यान केंद्रित करना ध्यान (मेडिटेशन) का भी अंग है।
11 बॉक्स 5.1: सेवार्थी की समस्या के निरूपण के चरण
मनश्चिकित्सा की प्रक्रिया का प्रारंभ सेवार्थी की समस्या के निरूपण से होता है। नैदानिक निरूपण का संबंध उपचार के लिए प्रयुक्त चिकित्सात्मक मॉडल के अनुरूप सेवार्थी की समस्या के निरूपण से है। इसके तीन लाभ हैं:
1. समस्या की समझ: चिकित्सक सेवार्थी द्वारा अनुभव किए जा रहे कष्टों के पूर्ण निहितार्थ समझ पाता है।
2. उपचार के लिए लक्ष्य-क्षेत्रों की पहचान: जैसे यदि कोई सेवार्थी किसी नौकरी पर बने रहने में असमर्थता के लिए मदद चाहता है और उच्च अधिकारियों का सामना न कर पाने की बात कहता है, तो व्यवहार चिकित्सा में नैदानिक निरूपण इसे दुश्चिंता तथा आग्रहिता कौशलों में कमी बताएगा; लक्ष्य-क्षेत्र हैं अपने आपको निश्चयात्मक रूप से व्यक्त करने में असमर्थता तथा बढ़ी हुई दुश्चिंता।
3. उपचार के लिए तकनीक का वरण या चुनाव: यह इस पर निर्भर करता है कि चिकित्सक किस चिकित्सात्मक व्यवस्था में प्रशिक्षित है; फिर भी तकनीकों का चुनाव, उनका समय-निर्धारण और परिणाम की प्रत्याशाएँ नैदानिक निरूपण पर निर्भर करती हैं।
नैदानिक निरूपण एक सतत प्रक्रिया है; चिकित्सा के दौरान अंतर्दृष्टि मिलने पर पुनः निरूपण की आवश्यकता हो सकती है। सामान्यतः पहले एक या दो सत्रों में प्रारंभिक नैदानिक निरूपण के लिए पर्याप्त सामग्री मिल जाती है। बिना नैदानिक निरूपण के मनश्चिकित्सा आरंभ करना उपयुक्त नहीं होता।