इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक के अपने अर्थ में सामाजिक आंदोलन क्या है?
उत्तर: सामाजिक आंदोलन समय के साथ निरंतर सामूहिक गतिविधि है, जो प्रायः राज्य के विरुद्ध होकर, कुछ हद तक संगठन, नेतृत्व तथा साझे उद्देश्यों तथा विचारधाराओं के साथ चलती है।
प्र. राजा राममोहन राय के सतीप्रथा-विरोधी अभियान के विरुद्ध बना एक प्रतिरोधी आंदोलन बताइए।
उत्तर: धर्म सभा, जो सतीप्रथा के प्रतिरक्षकों ने बनाई और अंग्रेज़ों से सती के विरुद्ध कानून न बनाने की याचिका दी।
प्र. चिपको आंदोलन पर पुस्तक ‘अनक्वाइट वुड्स’ किसने लिखी?
उत्तर: रामचंद्र गुहा।
प्र. चिपको आंदोलन में गाँववासियों का मामला किस सहकारी संगठन ने उठाया?
उत्तर: दशौली ग्राम स्वराज्य संघ, चमोली ज़िले का संगठन।
प्र. बिहार प्रांतीय किसान सभा किस वर्ष बनी?
उत्तर: 1929 में।
प्र. भारत का पहला मज़दूर संघ किसने और कहाँ बनाया?
उत्तर: बी.पी. वाडिया ने, अप्रैल 1918 में मद्रास में।
प्र. विभिन्न भारतीय भाषाओं में ‘दलित’ शब्द का सामान्य अर्थ क्या है?
उत्तर: गरीब तथा उत्पीड़ित व्यक्ति।
प्र. झारखंड दक्षिण बिहार से अलग कर किस वर्ष बनाया गया?
उत्तर: 2000 में।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक आंदोलन में संक्षेप में अंतर बताइए।
उत्तर: सामाजिक परिवर्तन निरंतर तथा चालू रहता है, यह असंख्य व्यक्तियों तथा सामूहिक गतिविधियों का सम्मिलित परिणाम है। सामाजिक आंदोलन, इसके विपरीत, किसी विशिष्ट उद्देश्य की ओर निर्देशित होता है और इसमें लंबा, निरंतर तथा संगठित सामाजिक प्रयास शामिल होता है।
प्र. पुस्तक में बताए गए किन्हीं दो प्रतिरोधी आंदोलनों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर: (1) राजा राममोहन राय के सतीप्रथा-विरोधी अभियान के विरुद्ध बनी धर्म सभा। (2) विधवा पुनर्विवाह का प्रचार करने वाले सुधारकों का सामाजिक बहिष्कार। (आरक्षण-विरोधी प्रतिरोधी आंदोलन, अथवा ‘निम्न जाति’ के बच्चों के स्कूल में नाम लिखवाने पर कुछ ‘उच्च जाति’ के बच्चों को उनके परिवारों द्वारा स्कूल से निकाल लेना, भी स्वीकार्य है।)
प्र. ई.पी. थॉमसन के शोध ने ‘जनसंकुल’ तथा ‘भीड़’ के बारे में क्या दर्शाया?
उत्तर: थॉमसन ने दर्शाया कि जनसंकुल तथा भीड़ अराजक गुंडों द्वारा बनाई हुई नहीं थी; उनमें भी एक ‘नैतिक अर्थव्यवस्था’ थी, यानी सही-गलत की एक साझी समझ जो उनकी गतिविधियों को दिशा देती थी, और नगरीय गरीब लोगों के पास विरोध के अपने उपयुक्त कारण थे।
प्र. ‘सामाजिक आंदोलन संगठन’ की ओर बढ़ने का क्या अर्थ है?
उत्तर: यह तब होता है जब एक आंदोलन जन-गतिशीलता तथा सामूहिक विरोध की अवस्था से आगे बढ़कर अधिक संस्थात्मक बन जाता है, यानी स्वतःस्फूर्त लहर के बजाय एक स्थायी संगठनात्मक ढाँचा अपना लेता है।
प्र. चिपको आंदोलन में ‘लाल’ तथा ‘हरे’ मुद्दे क्या थे?
उत्तर: ‘लाल’ मुद्दा गाँववासियों की जीवन-निर्वहन अर्थव्यवस्था (ईंधन, चारा तथा दैनिक आवश्यकताओं के लिए जंगल पर निर्भरता) तथा सरकार की मुनाफ़े की अर्थव्यवस्था (लकड़ी बेचने की इच्छा) के बीच का टकराव था। ‘हरा’ मुद्दा पारिस्थितिकीय निरंतरता का था: प्राकृतिक जंगलों की कटाई से क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ तथा भूस्खलन हुए थे।
प्र. बारदोली सत्याग्रह (1928) तथा चंपारन सत्याग्रह (1917-18) में क्या समानता थी?
उत्तर: दोनों गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सत्याग्रह थे: बारदोली भूमि-कर न देने का एक ‘कर-विरोधी’ अभियान था, असहयोग आंदोलन का हिस्सा; चंपारन नील की खेती के विरुद्ध था; दोनों ने किसान शिकायतों को आंशिक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
प्र. 1920 में बनी एटक में कौन-कौन-सी विचारधाराएँ शामिल थीं?
उत्तर: एटक एक व्यापक-आधारित संगठन था: साम्यवादी (एस.ए. डांगे, एम.एन. राय के नेतृत्व में), नरम दल (एम. जोशी, वी.वी. गिरी) तथा राष्ट्रवादी (लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू सहित)।
प्र. दलित आंदोलन को ‘स्पर्श के लिए संघर्ष’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि इसे मात्र आर्थिक शोषण अथवा राजनीतिक दबाव के संदर्भ में संतोषजनक रूप से नहीं समझा जा सकता, हालाँकि ये पहलू भी महत्वपूर्ण हैं; यह मानव के रूप में पहचान, आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्णय पाने, तथा अस्पृश्यता के कलंक को समाप्त करने का संघर्ष है।
प्र. पिछड़ा वर्ग आंदोलन में ‘समानांतर विस्तार’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: औपनिवेशिक राज्य जाति के आधार पर संरक्षण बाँटता था, इसलिए समान रूप से स्थित जाति-समूहों के सामाजिक-राजनीतिक पहचान के लिए स्वयं को संगठित करने की प्रवृत्ति को ‘समानांतर विस्तार’ कहा गया।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. सामाजिक आंदोलनों के तीन प्रकार एक-एक उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर: प्रतिदानात्मक (रूपांतरणकारी) आंदोलन व्यक्तिगत सदस्यों की चेतना तथा गतिविधियों में परिवर्तन का लक्ष्य रखते हैं; उदाहरण है केरल का इज़हावा समुदाय, नारायण गुरु के नेतृत्व में। सुधारवादी आंदोलन वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में धीमे, प्रगतिशील परिवर्तन का प्रयास करते हैं; पुस्तक के उदाहरण हैं 1960 के दशक का भाषा-आधारित राज्य पुनर्गठन तथा सूचना के अधिकार का अभियान। क्रांतिकारी आंदोलन सामाजिक संबंधों का आमूल रूपांतरण चाहते हैं, प्रायः राजसत्ता पर अधिकार करके; उदाहरण हैं रूस की बोल्शेविक क्रांति तथा भारत का नक्सली आंदोलन। बहुत से आंदोलनों में तीनों तत्व एक साथ मिले होते हैं, और आंदोलन की जीवन-अवधि में अभिमुखता बदल सकती है, कभी-कभी अधिक संस्थात्मक ‘सामाजिक आंदोलन संगठन’ की ओर।
प्र. पुस्तक के अनुसार पुराने तथा नए सामाजिक आंदोलन कैसे भिन्न हैं?
उत्तर: पुराने सामाजिक आंदोलन, जैसे पूँजीवादी पश्चिम के कामगार वर्ग के आंदोलन, शक्ति संबंधों के पुनर्गठन को केंद्रीय लक्ष्य मानते थे और राजनीतिक दलों के दायरे में काम करते थे, जैसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन चलाया। नए सामाजिक आंदोलन सत्ता के पुनर्वितरण के बारे में नहीं बल्कि स्वच्छ पर्यावरण जैसे जीवन-गुणवत्ता के मुद्दों के बारे में हैं; ये केवल वर्गीय आधार पर संगठित नहीं होते, प्रायः वर्ग-सीमाओं के आर-पार भागीदारों को एकजुट करते हैं (जैसे महिला आंदोलन में नगरीय मध्यवर्गीय महिलावादी तथा गरीब कृषक महिलाएँ दोनों शामिल हैं), और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय विस्तार के होते हैं, विश्व सामाजिक फोरम जैसे नए गठबंधनों में पुराने आंदोलनों के साथ मिलकर काम करते हुए।
प्र. चिपको आंदोलन की रेनी जंगल घटना का वर्णन कीजिए।
उत्तर: प्रारंभिक विरोधों के बावजूद सरकार ने नवंबर में जंगलों की वार्षिक नीलामी कर दी, जिसमें रेनी जंगल भी एक भूखंड था। जोशीमठ से रेनी जा रहे ठेकेदार के आदमियों को एक छोटी लड़की ने देख लिया, जो भागकर गाँव की महिला मंडल की प्रमुख गौरा देवी के पास पहुँची। गौरा देवी ने दूसरी गृहिणियों को इकट्ठा कर जंगल पहुँचकर मज़दूरों से कटाई न करने की याचना की; पहले उन्हें गालियाँ तथा धमकियाँ मिलीं, परंतु जब महिलाओं ने झुकने से इंकार कर दिया, तो अंततः पुरुषों को लौटना पड़ा और जंगल बच गया।
प्र. 1918 से 1947 तक भारत में मज़दूर संघवाद के विकास को पुस्तक की अपनी तिथियों के साथ बताइए।
उत्तर: पहला मज़दूर संघ अप्रैल 1918 में मद्रास में बी.पी. वाडिया ने बनाया; उसी वर्ष गांधीजी ने टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन बनाई। 1920 में बंबई में व्यापक-आधारित अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) बनी, जिसमें साम्यवादी, नरम दल तथा राष्ट्रवादी शामिल थे। ब्रिटिश राज के अंतिम दिनों में साम्यवादियों ने एटक पर काफ़ी नियंत्रण कर लिया था। मई 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक अन्य संघ, भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस, बनाया, जिससे राजनीतिक दलों की तर्ज़ पर और विभाजनों का रास्ता खुला, तथा 1960 के दशक के अंत से क्षेत्रीय दलों ने भी अपने संघ बनाने शुरू किए।
प्र. बॉक्स 8.7 दलित आंदोलन को ‘कुल मिलाकर’ सुधारवादी आंदोलन क्यों बताता है?
उत्तर: जोतिबा फुले की 19वीं सदी की प्रेरणा, गैर-ब्राह्मण आंदोलनों तथा डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में जाति-विरोधी आंदोलन में तीनों प्रकार, सुधारवादी, प्रतिदानात्मक तथा क्रांतिकारी, की विशेषताएँ थीं, और अंबेडकरोत्तर आंदोलन ने जीवन के वैकल्पिक तरीके देकर क्रांतिकारी परिपाटी दिखाई। परंतु बॉक्स 8.7 का अंतिम निष्कर्ष है कि यह कुल मिलाकर एक सुधारवादी आंदोलन रहा है: इसने जाति के आधार पर गतिशीलता तो दी, परंतु जाति नष्ट करने के केवल आधे-अधूरे प्रयास किए; इसने कुछ वास्तविक, यद्यपि सीमित, बदलाव प्राप्त किए, विशेषकर शिक्षित दलितों के लिए, परंतु व्यापक जनसमूह को गंभीर गरीबी से बाहर निकालने में असफल रहा।
प्र. झारखंड आंदोलन के नेताओं ने किन मुद्दों के विरुद्ध प्रदर्शन किए?
उत्तर: उन्होंने प्रदर्शन किया: (1) बड़ी सिंचाई परियोजनाओं तथा गोलीबारी क्षेत्रों के लिए भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध; (2) रुकी हुई सर्वेक्षण तथा पुनर्वास की कार्यवाही और बंद कर दिए गए कैंपों के विरुद्ध; (3) ऋण, किराया तथा सहकारी बकाया वसूली के विरुद्ध, जिसका उन्होंने प्रतिकार किया; (4) वन उत्पाद के राष्ट्रीयकरण के विरुद्ध, जिसका उन्होंने बहिष्कार किया।
प्र. 1947 के बाद महिला आंदोलन में दिखी शिथिलता के क्या स्पष्टीकरण पुस्तक देती है?
उत्तर: एक स्पष्टीकरण यह है कि राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल रही अनेक महिला कार्यकर्ता स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र-निर्माण के काम में लग गईं, जिससे एक स्वतंत्र महिला आंदोलन जारी नहीं रह सका। दूसरा स्पष्टीकरण विभाजन के आघात को इस ठहराव का कारण बताता है। आंदोलन का नवीनीकरण 1970 के दशक के मध्य में हुआ, जिसे कुछ लोग इसका ‘दूसरा चरण’ कहते हैं, संगठनात्मक रणनीति तथा विचारधारा, दोनों में बदलाव के साथ।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. किसान आंदोलन तथा नए किसान आंदोलन में उदाहरण सहित अंतर बताइए।
उत्तर: किसान आंदोलन औपनिवेशिक काल से पहले के दिनों में ही शुरू हो गए थे। 1858 से 1914 के बीच ये प्रायः स्थानीय, बिखरे तथा विशिष्ट शिकायतों तक सीमित रहे, जैसे बंगाल का नील-विरोधी विद्रोह (1859-62) तथा साहूकारों के विरुद्ध दक्कन विद्रोह (1875); बाद में कुछ आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन से आंशिक रूप से जुड़ गए (चंपारन 1917-18, बारदोली 1928), और किसान संगठन बने (बिहार प्रांतीय किसान सभा 1929, अखिल भारतीय किसान सभा 1936)। स्वतंत्रता के समय दो मुख्य किसान आंदोलन देखने को मिले: तिभागा (1946-47) तथा तेलंगाना (1946-51)। इसके विपरीत, नए किसान आंदोलन 1970 के दशक में पंजाब तथा तमिलनाडु में शुरू हुए; ये क्षेत्रीय आधार पर संगठित तथा दल-रहित थे, इनमें पुस्तक के शब्दों में ‘कृषक के स्थान पर किसान’ (जो उत्पादन तथा खरीद, दोनों में बाज़ार से जुड़े होते हैं) शामिल थे, और इनकी विचारधारा भूमि-राजस्व या सामंती शिकायतों के बजाय दृढ़ता से राज्य-विरोधी, नगर-विरोधी तथा मूल्य-केंद्रित थी। इनके तरीकों में सड़क-रेल अवरोध तथा राजनीतिज्ञों-प्रशासकों के गाँव-प्रवेश की मनाही शामिल थी। समय के साथ किसान आंदोलनों ने पर्यावरण तथा महिला मुद्दे भी अपना लिए, इसलिए इन्हें विश्वस्तर के ‘नए सामाजिक आंदोलनों’ का भाग माना जा सकता है, जबकि पुराने किसान आंदोलन ‘पुराने’ वर्ग-आधारित पैटर्न के अधिक निकट थे।
प्र. चिपको आंदोलन के उदाहरण से बताइए कि पारिस्थितिकीय आंदोलन प्रायः आर्थिक तथा अन्य मुद्दों को कैसे साथ लेकर चलते हैं।
उत्तर: रामचंद्र गुहा की पुस्तक अनक्वाइट वुड्स में वर्णित चिपको आंदोलन में, बड़ी संख्या में महिलाओं सहित गाँववासियों ने हिमालय की तलहटी में ओक तथा रोहोडैंड्रोन के जंगल बचाने के लिए पेड़ों से चिपककर सरकारी ठेकेदारों को कटाई से रोका। दाँव पर था आर्थिक ‘लाल’ मुद्दा: गाँववासियों की जीवन-निर्वहन अर्थव्यवस्था (ईंधन, चारा तथा दैनिक आवश्यकताओं के लिए जंगल पर निर्भरता) बनाम सरकार की मुनाफ़े की अर्थव्यवस्था, जो लकड़ी बेचना चाहती थी। इसके साथ पारिस्थितिकीय ‘हरा’ मुद्दा भी था: प्राकृतिक जंगलों की कटाई से क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ तथा भूस्खलन हुए थे। अनपेक्षित भारी वर्षा के कारण आई 1970 की अलकनंदा घाटी की बाढ़ ने 100 वर्ग किलोमीटर भूमि डुबो दी, 6 पुल तथा 10 किलोमीटर सड़क बहा दी, 366 घर गिरा दिए तथा 500 एकड़ फ़सल नष्ट कर दी; इसके बाद गाँववासी वनों की कटाई, भूस्खलन तथा बाढ़ के बीच के संबंध को देखने लगे। आंदोलन का एक तीसरा, राजनीतिक आयाम भी था: मैदानी क्षेत्रों की सुदूर सरकार के प्रति पर्वतीय गाँववासियों का रोष। यह दर्शाता है कि एक पारिस्थितिकीय आंदोलन कैसे आर्थिक, पारिस्थितिकीय तथा राजनीतिक-प्रतिनिधित्व के मुद्दे साथ ले जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे पुस्तक कहती है कि नए सामाजिक आंदोलन प्रायः पहचान, पर्यावरण तथा असमानता के मुद्दे एक साथ लेकर चलते हैं, न कि केवल एक वर्गीय माँग।
प्र. दलित आंदोलन का अर्थ, उदाहरण तथा पुस्तक का अपना निष्कर्ष बताइए।
उत्तर: ‘दलित’ शब्द का अर्थ गरीब तथा उत्पीड़ित व्यक्ति है, जिसे 1970 के दशक के प्रारंभ में बाबासाहेब अंबेडकर के नव-बौद्ध अनुयायियों ने पहली बार नए संदर्भ में प्रयोग किया, जो प्रदूषण, कर्म तथा न्यायोचित जाति-संस्तरण को अस्वीकार करता है। देश में कभी एक संगठित दलित आंदोलन नहीं रहा; अलग-अलग आंदोलनों ने अलग-अलग मुद्दे उठाए हैं, जिनमें सतनामी आंदोलन (चमार, छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाके, पूर्वी मध्य प्रदेश), आदि धर्म आंदोलन (पंजाब), महार आंदोलन (महाराष्ट्र), आगरा के जाटवों की गतिशीलता, तथा ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन (दक्षिण भारत) शामिल हैं, सभी समानता, आत्मसम्मान तथा अस्पृश्यता उन्मूलन की साझी खोज में। बॉक्स 8.7 जोतिबा फुले की 19वीं सदी की प्रेरणा से लेकर 1920 के दशक के गैर-ब्राह्मण आंदोलनों तथा डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व तक जाति-विरोधी आंदोलन का पता लगाता है, और निष्कर्ष निकालता है कि क्रांतिकारी तथा प्रतिदानात्मक तत्व होने के बावजूद, यह आंदोलन कुल मिलाकर सुधारवादी रहा है: इसने शिक्षित दलितों के लिए कुछ वास्तविक, यद्यपि सीमित, बदलाव लाए, परंतु जाति को नष्ट करने में तथा व्यापक जनसमूह को गंभीर गरीबी से बाहर निकालने में असफल रहा।
प्र. 20वीं सदी के प्रारंभ से लेकर ‘दूसरे चरण’ तक भारत में महिला आंदोलन के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर: 20वीं सदी के प्रारंभ में राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर पर महिला संगठनों में वृद्धि हुई: विमेंस इंडिया एसोसिएशन (1917), नेशनल काउंसिल फॉर विमेन इन इंडिया (1925) तथा ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस (1926)। ए.आई.डबल्यू.सी. की शुरुआत इस विचार से हुई कि ‘महिला कल्याण’ तथा ‘राजनीति’ असंबद्ध हैं, परंतु बाद के एक अध्यक्षीय भाषण में पूछा गया, ‘क्या भारतीय पुरुष अथवा स्त्री स्वतंत्र हो सकते हैं यदि भारत गुलाम रहे?’, जो इस विचार में आए बदलाव को दिखाता है। महिलाओं ने पुरुषों के साथ कृषिक संघर्षों में भी भाग लिया, जैसे तिभागा आंदोलन, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष, तथा महाराष्ट्र का वर्ली जनजाति विद्रोह। 1947 के बाद आंदोलन में शिथिलता आई, जिसे या तो कार्यकर्ताओं के राष्ट्र-निर्माण कार्य में लगने से, या विभाजन के आघात से समझाया जाता है, इससे पहले कि 1970 के दशक के मध्य में इसका नवीनीकरण हुआ, जिसे कुछ लोग इसका ‘दूसरा चरण’ कहते हैं, नई संगठनात्मक रणनीतियों तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे नए मुद्दों के साथ, भूमि अधिकार तथा रोज़गार जैसी पुरानी चिंताओं के साथ-साथ। यह मान्यता भी है कि सभी महिलाओं का उत्पीड़न एक समान नहीं है। पुस्तक कहती है कि स्त्री तथा पुरुष दोनों प्रबल लिंग-पहचान द्वारा बाध्य हैं, दोनों को स्वतंत्र होने का अधिकार समान रूप से मिलना चाहिए, और निःसंदेह यह इस विचार पर निर्भर है कि सच्ची स्वतंत्रता तभी संभव होगी जब कोई अन्याय न हो; बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना जेंडर दृष्टि से समतावादी समाज को मूर्त रूप देने में सहायक प्रयास है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक पुस्तक की अपनी परिभाषा के आधार पर, क्या मीरा के पड़ोसी अभी जो कर रहे हैं वह पहले से ही एक सामाजिक आंदोलन है? क्यों या क्यों नहीं?
उत्तर: अभी पूरी तरह नहीं, पुस्तक की परिभाषा के अनुसार: सामाजिक आंदोलन के लिए समय के साथ निरंतर, संगठित सामूहिक गतिविधि चाहिए, जिसमें नेतृत्व तथा साझे उद्देश्य हों। मीरा के पड़ोसी अभी केवल सभाएँ करना तथा समिति बनाने की बात शुरू कर रहे हैं, जो पुस्तक द्वारा वर्णित प्रारंभिक, गतिशील अवस्था है, अभी पूर्ण रूप से संगठित, निरंतर आंदोलन नहीं।
(ख) 2 अंक पुस्तक की अपनी शब्दावली का प्रयोग करते हुए बताइए कि मीरा के गाँव का बाँध-विरोध किन दो प्रकार के मुद्दों को (चिपको आंदोलन की तरह) साथ लेकर चल रहा है।
उत्तर: आर्थिक (‘लाल’) मुद्दा, क्योंकि बाँध परिवारों को उनकी भूमि तथा वन-संसाधनों (ईंधन, चारा) से विस्थापित करेगा जिन पर वे निर्भर हैं; तथा पारिस्थितिकीय (‘हरा’) मुद्दा, क्योंकि बाँध के जलाशय के लिए जंगल तथा प्राकृतिक संसाधन नष्ट होंगे, ठीक वैसे ही जैसे पुस्तक चिपको आंदोलन में परस्पर जुड़े ‘लाल’ तथा ‘हरे’ मुद्दों की बात करती है।
(ग) 3 अंक यदि मीरा के गाँव का विरोध एक निरंतर आंदोलन बन जाए, तो पुस्तक के मानदंडों के आधार पर यह ‘पुराने’ या ‘नए’ सामाजिक आंदोलन के अधिक निकट होगा? समझाइए।
उत्तर: पुस्तक के मानदंडों के आधार पर यह मिश्रित है: विस्थापन, भूमि और क्षतिपूर्ति की माँग राज्य से भूमि तथा संसाधनों पर संघर्ष के ‘पुराने’ पैटर्न से जुड़ती है, जबकि जंगल तथा जीवन-गुणवत्ता की पारिस्थितिकीय चिंता ‘नए’ आंदोलन की विशेषता है। पुस्तक स्वयं कहती है कि भारत में पुराने तथा नए आंदोलनों में अस्पष्टता है, और सामाजिक असमानता के प्रश्न अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ-साथ उठ सकते हैं। इसलिए अच्छा उत्तर इसे मिश्रित बताकर यह स्पष्ट करता है कि कौन-सा पक्ष प्रबल है: यदि विरोध मुख्यतः पर्यावरण तथा जीवन-गुणवत्ता पर केंद्रित रहे तो यह ‘नए’ के निकट होगा; यदि मुख्यतः भूमि और क्षतिपूर्ति पर, तो ‘पुराने’ के निकट।
(घ) 4 अंक चिपको आंदोलन के अपने इतिहास को आदर्श मानकर बताइए कि मीरा का गाँव किस तरह के विरोध तथा संगठन अपना सकता है, और प्रत्येक क्यों कारगर हो सकता है।
उत्तर: चिपको के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, गाँववासी दशौली ग्राम स्वराज्य संघ जैसा एक स्थानीय संगठन बना सकते हैं, ताकि विरोध को स्वतःस्फूर्त होने के बजाय नेतृत्व तथा संरचना मिले। वे चिपको के पेड़ों से चिपकने जैसा एक प्रतीकात्मक, ध्यान खींचने वाला तरीका अपना सकते हैं, जो मानवीय क़ीमत को स्पष्ट रूप से दिखाता है। गौरा देवी की तरह विशेष रूप से महिलाओं को संगठित करना कारगर हो सकता है: पुस्तक बताती है कि चिपको में बड़ी संख्या में महिलाएँ शामिल थीं, और रेनी में महिलाओं ने तुरंत कार्यवाही की तथा झुकने से इंकार कर दिया। अंततः, चिपको की तरह विरोध को आर्थिक तथा पारिस्थितिकीय दोनों रूपों में प्रस्तुत करना, केवल एक मुद्दे की तुलना में एक व्यापक गठबंधन बनाएगा, क्योंकि इससे सीधे विस्थापित परिवार तथा केवल जंगल की पारिस्थितिकीय चिंता रखने वाले लोग, दोनों एक ही आंदोलन से जुड़ सकते हैं।