सामाजिक आंदोलन (पुस्तक 2, अध्याय 8) की प्रश्नावली के पूर्ण समाधान, पुस्तक के अपने शब्दों में, और उसके बाद पाठ के बीच पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न।
प्र. एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ कोई सामाजिक आंदोलन न हुआ हो, चर्चा करें। ऐसे समाज की कल्पना आप कैसे करते हैं, इसका भी आप वर्णन कर सकते हैं।
उत्तर: जिस समाज में कोई सामाजिक आंदोलन कभी न हुआ हो, वहाँ राज्य या पहले से सत्ता में बैठे लोग जो भी तय करें, वह पीढ़ी दर पीढ़ी बिना चुनौती के चलता रहेगा। आज जो अधिकार बिल्कुल सामान्य लगते हैं, वे ऐसे समाज में नहीं होते: कार्यदिवस का आठ घंटे से अधिक न होना, समान काम के लिए स्त्री-पुरुष को समान मज़दूरी, तथा मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा और पेंशन का अधिकार, ये सामाजिक आंदोलनों से प्राप्त हुए, अपने आप नहीं मिले। भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय संविधान द्वारा दिए गए प्रमुख अधिकारों में से एक है (बॉक्स 8.1); परंतु ब्रिटेन में मतदान का अधिकार पहले केवल संपत्ति के स्वामियों तक सीमित था, और चार्टरवाद ने 1839 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की माँग उठाई थी, जिसके बाद भी 1918 में यह अधिकार केवल आंशिक रूप से मिला; सभी वयस्क महिलाओं के मताधिकार के लिए सफ्रागेट्स के आंदोलन का कड़ा विरोध हुआ और उसे निर्ममता से कुचल दिया गया।
अपने देश में, 19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा राष्ट्रीय आंदोलन के बिना सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह का प्रचार करने वाले सुधारकों का सामाजिक बहिष्कार तथा बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रखने जैसी प्रथाओं को कभी चुनौती न मिलती। दलित आंदोलन के बिना अस्पृश्यता के कलंक को कोई संगठित चुनौती ही न मिलती। चिपको आंदोलन के बिना वनों की कटाई तथा उससे आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के बीच के संबंध की कोई संगठित स्मृति ही न होती, और किसान तथा जनजातीय आंदोलनों के बिना बटाईदारों तथा आदिवासियों की विशिष्ट शिकायतें सार्वजनिक बहस या राज्य की नीति में कभी न आतीं।
ऐसा समाज ज़रूरी नहीं कि शिकायतों से मुक्त हो; वह केवल एक ऐसा समाज होगा जहाँ शिकायतें निजी, असंगठित तथा कुछ भी बदलने में असमर्थ रह जाती हैं। जैसा पुस्तक का अपना निष्कर्ष कहता है, सामाजिक आंदोलन इसलिए उठते हैं क्योंकि व्यक्ति तथा सामाजिक समूह अपनी दशा बदलना चाहते हैं, और ऐसा करते हुए वे स्वयं को तथा समाज, दोनों को बदल देते हैं; बिना किसी ऐसे सामूहिक प्रयास के समाज आज से कहीं अधिक स्थिर तथा असमान होता।
प्र. निम्न पर लघु टिप्पणी लिखें: (क) महिलाओं के आंदोलन (ख) जनजातीय आंदोलन
उत्तर (क) महिलाओं के आंदोलन: 19वीं सदी के सामाजिक-सुधार आंदोलनों ने महिलाओं से जुड़े अनेक मुद्दे उठाए, और 20वीं सदी के प्रारंभ में विमेंस इंडिया एसोसिएशन (1917), नेशनल काउंसिल फॉर विमेन इन इंडिया (1925) तथा ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस (1926) जैसे महिला संगठनों में वृद्धि हुई, जिनका कार्यक्षेत्र सीमित “महिला कल्याण” से बढ़कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता तक फैल गया। महिलाओं ने पुरुषों के साथ कृषिक संघर्षों में भी भाग लिया, जैसे तिभागा आंदोलन, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष तथा महाराष्ट्र में वर्ली जनजाति का बंधुआ दासत्व-विरोधी विद्रोह। 1947 के बाद आंदोलन में एक शिथिलता आई, जिसे कार्यकर्ताओं के राष्ट्र-निर्माण में लगने या विभाजन के आघात से समझाया जाता है, इससे पहले कि 1970 के दशक के मध्य में “दूसरे चरण” में इसका नवीनीकरण हुआ, नई संगठनात्मक रणनीतियों तथा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे मुद्दों के साथ, भूमि अधिकार तथा रोज़गार की पुरानी चिंताओं के साथ-साथ। यह मान्यता भी है कि सभी महिलाओं का उत्पीड़न एक समान नहीं है; पुस्तक कहती है कि स्त्री तथा पुरुष दोनों प्रबल लिंग-पहचान द्वारा बाध्य हैं, और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना को जेंडर दृष्टि से समतावादी समाज को मूर्त रूप देने में सहायक प्रयास बताती है।
उत्तर (ख) जनजातीय आंदोलन: जनजातीय आंदोलनों में कुछ साझे मुद्दे हैं, परंतु महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भेद भी हैं। पुस्तक झारखंड को मुख्य उदाहरण के रूप में लेती है, जो सन् 2000 में दक्षिण बिहार से अलग कर बनाया गया: इस आंदोलन का करिश्माई नेता बिरसा मुंडा था, एक आदिवासी जिसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध बड़ा विद्रोह किया, और बाद में साक्षर आदिवासियों ने अपने इतिहास पर शोध-लेखन कर एक साझी झारखंडी पहचान बनाई, आंशिक रूप से “दिक्कुओं” (प्रवासी व्यापारी तथा महाजन) के प्रति साझी घृणा के आधार पर। आंदोलन ने सिंचाई तथा गोलीबारी क्षेत्रों के लिए भूमि अधिग्रहण, रुकी हुई सर्वेक्षण तथा पुनर्वास की कार्यवाही, बंद कर दिए गए कैंप, ऋण-किराया वसूली तथा वन उत्पाद के राष्ट्रीयकरण के विरुद्ध प्रदर्शन किए। पूर्वोत्तर में स्वतंत्रता के बाद की राज्य-निर्माण प्रक्रिया ने अपनी पृथक पहचान के प्रति सचेत पर्वतीय जनजातियों में अशांति पैदा की, और पहले की अलगाव की प्रवृत्ति अब भारतीय संविधान के दायरे में ही स्वायत्तता की खोज द्वारा प्रस्थापित हो गई है। देश भर में जनजातीय लोगों का वन-भूमि से विस्थापन इन आंदोलनों को जोड़ने वाला साझा पारिस्थितिकीय सूत्र है, साथ ही सांस्कृतिक तथा आर्थिक मुद्दे भी हैं।
प्र. भारत में पुराने तथा नए सामाजिक आंदोलनों में स्पष्ट भेद करना कठिन है, विवेचना कीजिए।
उत्तर: पुस्तक स्वयं एक स्पष्ट वैचारिक भेद प्रस्तुत करती है: पुराने सामाजिक आंदोलन, जैसे पूँजीवादी पश्चिम के कामगार वर्ग के आंदोलन, शक्ति संबंधों के पुनर्गठन को अपना लक्ष्य मानते थे और राजनीतिक दलों के दायरे में काम करते थे, जैसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन चलाया। नए सामाजिक आंदोलन सत्ता के पुनर्वितरण के बारे में नहीं बल्कि स्वच्छ पर्यावरण जैसे जीवन-गुणवत्ता के मुद्दों के बारे में हैं, केवल वर्गीय आधार पर संगठित नहीं होते, और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय विस्तार के होते हैं, जैसे सिएटल में विश्व व्यापार संगठन के विरुद्ध हुआ विशाल विरोध, जिसका आयोजन आंशिक रूप से इंटरनेट-आधारित नेटवर्क से हुआ (बॉक्स 8.4)। पुराने तथा नए आंदोलन अब विश्व सामाजिक फोरम जैसे नए मैत्री संगठनों में मिलकर भी काम कर रहे हैं।
परंतु भारत में यह रेखा बार-बार धुंधली हो जाती है। रजनी कोठारी 1970 के दशक की भारतीय सामाजिक-आंदोलन भरमार को अभिजात वर्ग द्वारा राज्य पर अधिकार तथा दलीय चुनावी प्रतिनिधित्व की विफलता का परिणाम बताते हैं, इसलिए लोग गैर-दलीय राजनीतिक संगठनों में शामिल हुए, जो रूप में “नए” हैं परंतु मूलतः सत्ता के, यानी “पुराने”, मुद्दे से जुड़े हैं। महिलाओं का आंदोलन नगरीय मध्यवर्गीय महिलावादी तथा गरीब कृषक महिलाओं, दोनों को शामिल करता है, इसलिए यह वर्ग के आर-पार संगठित है, फिर भी यह भूमि अधिकार तथा रोज़गार जैसे बहुत ठोस मुद्दों पर भी अभियान चलाता है, केवल पहचान पर नहीं। झारखंड आंदोलन जैसे जनजातीय आंदोलन पहचान तथा सांस्कृतिक चेतना (“नए” आंदोलन की विशेषता) को भूमि तथा संसाधनों की “पुरानी” माँग, और अंततः पृथक राज्य के रूप में राजनीतिक सत्ता की माँग के साथ जोड़ते हैं। इसी तरह चिपको आंदोलन ने जीवन-निर्वहन की “पुरानी” आर्थिक चिंता को वन-संरक्षण की “नई” पारिस्थितिकीय चिंता के साथ जोड़ा। भारतीय सामाजिक आंदोलन लगातार वर्ग, पहचान, पारिस्थितिकी तथा राज्य पर माँगों को एक ही आंदोलन में इस तरह मिला देते हैं कि पुराने-नए का भेद दो अलग खानों के बजाय एक स्पेक्ट्रम के दो सिरों की तरह अधिक काम करता है।
प्र. पर्यावरणीय आंदोलन प्रायः आर्थिक एवं पहचान के मुद्दों को भी साथ लेकर चलते हैं, विवेचना कीजिए।
उत्तर: पुस्तक का अपना उदाहरण, चिपको आंदोलन, यह बात सीधे दर्शाता है। हिमालय की तलहटी में गाँववासियों ने ओक तथा रोहोडैंड्रोन के जंगल बचाने के लिए पेड़ों से चिपककर सरकारी ठेकेदारों को कटाई से रोका, और पुस्तक इसे “लाल” (आर्थिक) तथा “हरे” (पारिस्थितिकीय) मुद्दे के संयोग के रूप में बताती है: गाँववासियों की जीवन-निर्वहन अर्थव्यवस्था, जो ईंधन, चारा तथा दैनिक आवश्यकताओं के लिए जंगल पर निर्भर थी, सरकार की मुनाफ़े की अर्थव्यवस्था के विरुद्ध खड़ी थी, जो लकड़ी बेचना चाहती थी। साथ ही, प्राकृतिक जंगलों की कटाई से क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ तथा भूस्खलन हुए थे। 1970 की अलकनंदा घाटी की बाढ़, जिसे पुस्तक अनपेक्षित भारी वर्षा का परिणाम बताती है, वह मोड़ थी जिसके बाद गाँववासी वनों की कटाई, भूस्खलन तथा बाढ़ के बीच के संबंध को देखने लगे; इससे आंदोलन को एक पारिस्थितिकीय प्रेरणा भी मिली, जो आर्थिक प्रेरणा से अलग नहीं की जा सकती।
चिपको में एक पहचान तथा राजनीतिक आयाम भी था: इसने मैदानी क्षेत्रों की सुदूर सरकार के प्रति पर्वतीय गाँववासियों के रोष को व्यक्त किया, जो उनकी चिंताओं के प्रति उदासीन तथा शत्रुतापूर्ण प्रतीत होती थी, एक क्षेत्रीय पहचान का मुद्दा, जो आर्थिक तथा पारिस्थितिकीय, दोनों से अलग था। जनजातीय आंदोलन भी यही पैटर्न दिखाते हैं: पुस्तक कहती है कि जनजातीय लोगों का वन-भूमि से विस्थापन जनजातीय आंदोलनों के केंद्र में एक पारिस्थितिकीय मुद्दा है, परंतु इसी प्रकार पहचान के सांस्कृतिक मुद्दे तथा असमानता जैसे आर्थिक मुद्दे भी इन्हीं आंदोलनों में मौजूद हैं। यही वजह है कि पुस्तक पारिस्थितिकीय आंदोलनों को इस बात का अच्छा उदाहरण मानती है कि नए सामाजिक आंदोलन एक ही धुरी पर संगठित नहीं होते: सामाजिक असमानता के प्रश्न, पारिस्थितिकी तथा पहचान जैसे अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ, एक ही आंदोलन में साथ-साथ मौजूद हो सकते हैं।
प्र. कृषक एवं नव किसान आंदोलनों के मध्य अंतर बताइए।
उत्तर:
| कृषक आंदोलन | नव किसान आंदोलन |
|---|---|
| औपनिवेशिक काल से पहले तक जाते हैं; 1858-1914 का दौर स्थानीय, बिखरा तथा विशिष्ट शिकायतों तक सीमित था (जैसे बंगाल विद्रोह 1859-62, साहूकारों के विरुद्ध 1875 का दक्कन विद्रोह) | 1970 के दशक में पंजाब तथा तमिलनाडु में शुरू हुए |
| “कृषक” शामिल थे, प्रायः भूमि-राजस्व, नील की खेती या सामंती दशाओं से जुड़े (चंपारन, बारदोली, तिभागा, तेलंगाना) | पुस्तक के शब्दों में “कृषक के स्थान पर किसान” शामिल थे, यानी वे लोग जो वस्तुओं के उत्पादन तथा खरीद, दोनों में बाज़ार से जुड़े होते हैं |
| अनेक स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े या किसान सभाओं तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे संगठनों से संगठित हुए | क्षेत्रीय आधार पर संगठित तथा स्पष्ट रूप से दल-रहित, दृढ़ता से राज्य-विरोधी तथा नगर-विरोधी विचारधारा वाले |
| माँगें भूमि, किराया, कर्ज़ तथा किसानों-मज़दूरों की आर्थिक शोषण से मुक्ति पर केंद्रित | माँगें “मूल्य तथा संबंधित मुद्दों” पर केंद्रित: कीमत वसूली, लाभप्रद कीमतें, कृषि निवेश की कीमतें, कर्ज़ों की वापसी |
| तरीकों में सत्याग्रह-शैली का असहयोग, भूमि-राजस्व न देना, तथा नक्सलबाड़ी की तरह सशस्त्र विद्रोह शामिल था | सड़कों-रेलमार्गों को बंद करना तथा राजनीतिज्ञों-प्रशासकों के गाँव-प्रवेश की मनाही जैसे नए तरीके अपनाए |
| भूमि तथा राजस्व पर सत्ता के पुनर्गठन के “पुराने” सामाजिक आंदोलन पैटर्न के केंद्र में | बाद में पर्यावरण तथा महिला मुद्दे भी अपनाए, इसलिए विश्वस्तर के “नए सामाजिक आंदोलनों” का भाग माने जा सकते हैं |
पाठ के भीतर के क्रियाकलाप और प्रश्न
अध्याय पाठ के बीच में भी प्रश्न पूछता है: पाँच क्रियाकलाप बॉक्स, जनहित के मुद्दों और आंदोलनों के वर्गीकरण पर दो प्रश्न, और बॉक्स 8.8 का एक चर्चा प्रश्न। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों सहित। जहाँ क्रियाकलाप तुलना करने, पता लगाने या जानकारी एकत्र करने को कहता है, वहाँ उत्तर बताता है कि एक अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए; इसे अपनी खोज के साथ मिलाकर उपयोग करें।
प्र. अपने जीवन की अपनी दादी/नानी के जीवन से तुलना कीजिए। यह आपके जीवन से किस प्रकार भिन्न है। आपके जीवन में ऐसे कौन से अधिकार हैं जिन्हें आप सहज भाव से स्वीकार करते हैं, और जो उनको प्राप्त नहीं थे, चर्चा करें।
उत्तर: बहुत सी दादी/नानी ऐसे अधिकारों के बिना बड़ी हुईं जिन्हें आज के विद्यार्थी सहज मान लेते हैं: स्कूल जाने और जितना चाहें उतना पढ़ने का अधिकार, बाल विवाह न होने और विवाह-साथी चुनने या मना करने का अधिकार, घर के बाहर काम करने और समान काम के लिए समान वेतन पाने का अधिकार, संपत्ति रखने और विरासत पाने का अधिकार, मतदान करने और चुनाव लड़ने का अधिकार, तथा दहेज और हिंसा के विरुद्ध क़ानूनी सुरक्षा। इनमें से कुछ अधिकार स्वतंत्रता के बाद ही मिले (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार संविधान से आया), और बहुत से उन संघर्षों से जिनका अध्याय वर्णन करता है, 19वीं सदी के समाज सुधार से लेकर दहेज, यौन उत्पीड़न और भूमि अधिकारों पर महिला आंदोलन के अभियानों तक। अध्याय का तर्क यही है कि हम प्रायः मान लेते हैं कि जिन अधिकारों का हम उपभोग करते हैं वे यूँ ही प्राप्त हो गए, जबकि वे सामाजिक आंदोलनों से मिले हैं।
प्र. सामाजिक आंदोलनों से समाज किस तरह बदलता है तथा कैसे एक सामाजिक आंदोलन अन्य सामाजिक आंदोलनों को जन्म देता है, इसके किसी उदाहरण के बारे में सोचने का प्रयास कीजिए।
उत्तर: पुस्तक का अपना संकेत: सामाजिक परिवर्तन लाने में भारतीय संविधान की भूमिका, जो हम अध्याय 3 में पढ़ चुके हैं; राष्ट्रीय आंदोलन के बीच बने इस संविधान ने आगे सामाजिक परिवर्तन लाने में बड़ी भूमिका निभाई। दूसरा उदाहरण: सती के विरुद्ध और विधवा पुनर्विवाह तथा बालिका शिक्षा के पक्ष में 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों ने समाज को बदला, और आगे चलकर प्रारंभिक महिला संगठनों (WIA 1917, AIWC 1926) तथा बाद के महिला आंदोलन को जन्म दिया। इसी तरह जोतिबा फुले की प्रेरणा से शुरू हुआ जाति-विरोधी आंदोलन गैर-ब्राह्मण आंदोलनों से आगे बढ़ा और फिर डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में विकसित हुआ (बॉक्स 8.7)।
प्र. ऐसे ही अन्य मुद्दों के बारे में सोचिए जिन्हें सामाजिक आंदोलनों ने पूर्व तथा वर्तमान में उठाया हो।
उत्तर: पुस्तक के उदाहरणों (जनजातीय लोगों के लिए जंगल के उपयोग का अधिकार, तथा विस्थापित लोगों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति का अधिकार) के अलावा सामाजिक आंदोलनों ने ये मुद्दे उठाए हैं: सती और अस्पृश्यता का उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह और बालिका शिक्षा, मज़दूरों का वेतन और काम के घंटे, बटाईदारों का उपज में हिस्सा (तिभागा), जंगलों और पर्यावरण की रक्षा (चिपको), सूचना का अधिकार, पृथक राज्य (झारखंड), दहेज और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, तथा किसानों के लिए लाभप्रद कीमतें।
प्र. विभिन्न सामाजिक आंदोलनों की एक सूची बनाइए जिनके बारे में आपने सुना अथवा पढ़ा हो। वे क्या परिवर्तन लाना चाहते थे? वे किन परिवर्तन को रोकना चाहते थे?
उत्तर: लाए जाने वाले और रोके जाने वाले परिवर्तनों के साथ एक अच्छी सूची:
- चिपको आंदोलन: जंगलों और गाँववासियों की जीविका की रक्षा चाहता था; पेड़ों की व्यावसायिक कटाई रोकना चाहता था।
- दलित आंदोलन: समानता, आत्मसम्मान और अस्पृश्यता का उन्मूलन चाहता है; जातिगत भेदभाव और अपमान रोकना चाहता है।
- महिला आंदोलन: समान अधिकार, भूमि अधिकार और रोज़गार चाहता है; दहेज, यौन उत्पीड़न और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकना चाहता है।
- नव किसान आंदोलन: लाभप्रद कीमतें और सस्ते कृषि निवेश चाहते हैं; कम ख़रीद-कीमतों से होने वाली आय की हानि रोकना चाहते हैं।
- झारखंड आंदोलन: पृथक राज्य चाहता था; भूमि अधिग्रहण और वन उत्पादों के राष्ट्रीयकरण का विरोध करता था।
- प्रतिरोधी आंदोलन (जैसे धर्म सभा) इसका उलटा दिखाते हैं: वे परिवर्तन रोककर यथापूर्व स्थिति बनाए रखना चाहते हैं।
प्र. क्या आप इन सामाजिक आंदोलनों को ऊपर दी गई श्रेणियों के आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं?
उत्तर: पुस्तक के अपने उदाहरणों के आधार पर: नारायण गुरु के नेतृत्व में इज़हावा समुदाय का आंदोलन प्रतिदानात्मक है; भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का आंदोलन और सूचना के अधिकार का अभियान सुधारवादी हैं; रूस की बोल्शेविक क्रांति और भारत का नक्सली आंदोलन क्रांतिकारी हैं। पर जैसा पुस्तक आगे कहती है, वर्गीकरण करते समय पता चलता है कि बहुत से आंदोलनों में प्रतिदानात्मक, सुधारवादी तथा क्रांतिकारी तत्व एक साथ मिले होते हैं, और किसी आंदोलन की दिशा समय के साथ बदल भी सकती है; उदाहरण के लिए बॉक्स 8.7 दलित आंदोलन में तीनों प्रकार के तत्व पाता है, पर कुल मिलाकर उसे सुधारवादी मानता है।
प्र. अपने क्षेत्र में पर्यावरण प्रदूषण के कुछ उदाहरणों का पता लगाइए, चर्चा कीजिए। आप अपने उन उदाहरणों की पोस्टर प्रदर्शनी भी लगा सकते हैं।
उत्तर: अपने क्षेत्र के उदाहरण लिखिए, जैसे: वाहनों, कारख़ानों या ईंट-भट्ठों से धुआँ और धूल; पराली या कूड़ा जलाना; नदी, तालाब या झील में बिना साफ़ किया सीवर और औद्योगिक कचरा; प्लास्टिक कचरा और खुले में कूड़ा फेंकना; शोर प्रदूषण; और पेड़ों की कटाई। हर उदाहरण के लिए कारण, प्रभावित लोग और उठाए जा रहे कदम लिखिए। इन्हें अध्याय से जोड़िए: प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग करने वाला विकास का प्रारूप, औद्योगिक प्रदूषण, और अध्याय में नामित सरकारी कार्यक्रम जैसे नमामि गंगे और स्वच्छ भारत अभियान। पोस्टर में चित्र, कारण, प्रभाव और सुझाया गया उपाय दिखाया जा सकता है।
प्र. एक महीने तक रोज़ाना समाचार पढ़ें। रेडियो अथवा दूरदर्शन पर किसी समाचार प्रसारण को सुनें। मज़दूरों से संबंधित उठाए गए तथा चर्चित मुद्दों को लिखें। चर्चा करें।
उत्तर: समाचारों में मज़दूरों से जुड़े आम मुद्दे हैं: वेतन और महँगाई भत्ता, नौकरी की सुरक्षा और ठेका तथा अस्थायी काम का बढ़ना, इकाइयों का बंद होना और छँटनी, निजीकरण और विनिवेश, श्रम क़ानूनों में बदलाव, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन, काम के घंटे और सुरक्षा, तथा असंगठित और गिग कामगारों के अधिकार। चर्चा में इन्हें अध्याय से जोड़िए: मज़दूर संघ (जैसे एटक और इंटक) इन मुद्दों को हड़तालों और अभियानों से उठाते हैं; भूमंडलीकरण में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सस्ते और लचीले श्रम की तलाश करती हैं; और अध्याय बताता है कि पुराने तथा नए आंदोलन अब विश्व सामाजिक फोरम जैसे नए मैत्री संगठनों में मिलकर काम कर रहे हैं।
प्र. 2019 में, भारत सरकार ने उच्च जातियों के बीच आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की। यह उपरोक्त उद्धरण से कैसे भिन्न है? चर्चा करें।
उत्तर: जी.बी. पंत का उद्धरण दबाए हुए वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों की विशेष देखभाल की बात करता है, यानी सामाजिक और जाति-आधारित पिछड़ेपन से पहचाने गए समूह, ताकि जंजीर की सबसे कमज़ोर कड़ियाँ सशक्त हों। 2019 का आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर है और उच्च जातियों के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए है, जिनकी पहचान जाति के बजाय आर्थिक मानदंड से होती है। इसलिए आधार अलग है (आर्थिक कमज़ोरी बनाम सामाजिक और जातिगत पिछड़ापन), और लाभार्थी भी अलग हैं। दोनों में साझा बात पंत के रूपक का यही विचार है कि स्वस्थ राजनीति के लिए हर कमज़ोर वर्ग, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग सहित, को सामान्य स्तर पर लाना ज़रूरी है।