कक्षा 12 समाजशास्त्र बुक 2 अध्याय 8 सामाजिक आंदोलन के नोट्स हिंदी में

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इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • सामाजिक आंदोलन एक साधारण विरोध से कैसे अलग है, और “प्रतिरोधी आंदोलन” किसे कहते हैं
  • दुर्खाइम से लेकर ई.पी. थॉमसन तक, समाजशास्त्र स्वयं सामाजिक आंदोलनों में रुचि क्यों रखता है
  • सामाजिक आंदोलनों के तीन प्रकार, और “पुराने” तथा “नए” सामाजिक आंदोलनों में अंतर
  • चिपको आंदोलन, पुस्तक का अपना पारिस्थितिकीय आंदोलन का उदाहरण
  • किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़ा वर्ग, जनजातीय एवं महिला आंदोलन, पुस्तक की अपनी घटनाओं और तिथियों सहित
  • इस अध्याय पर “अंतर बताइए” और “विवेचना कीजिए” जैसे प्रश्नों का उत्तर पुस्तक के अपने उदाहरणों से कैसे दें
सामाजिक आंदोलनप्रतिरोधी आंदोलनप्रतिदानात्मकसुधारवादीक्रांतिकारीनागरिक समाजचिपको आंदोलननक्सलबाड़ीदलितदिक्कुझारखंड
परीक्षा स्थिति: रिवीज़न से पहले यह जान लें
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CBSE 10 (80 अंक के सैद्धांतिक प्रश्नपत्र में से) परीक्षा में शामिल, 2026-27 पाठ्यक्रम (इकाई 15, सामाजिक आंदोलन)

CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम में इस इकाई के अंतर्गत ये विषय हैं: सामाजिक आंदोलन की अवधारणा, सिद्धांत तथा वर्गीकरण; पर्यावरणीय आंदोलन; वर्ग-आधारित आंदोलन (मज़दूर, किसान); जाति-आधारित आंदोलन (दलित आंदोलन, पिछड़े वर्ग/जातियाँ, उच्च जातियों की प्रतिक्रिया की प्रवृत्तियाँ); जनजातीय आंदोलन; तथा स्वतंत्र भारत में महिलाओं के आंदोलन। अन्य बोर्ड के विद्यार्थी अपने बोर्ड का वर्तमान पाठ्यक्रम देख लें।

1सामाजिक आंदोलन क्या है?

विश्व भर में बड़ी संख्या में विद्यार्थी तथा कार्यालय-कर्मी अपने काम पर पाँच या छह दिन ही जाते हैं तथा सप्ताहांत में विश्राम करते हैं। फिर भी बहुत थोड़े लोगों को इस बात का आभास है कि यह छुट्टी का दिन मज़दूरों के एक लंबे संघर्ष का परिणाम है। कार्यदिवस का आठ घंटे से अधिक न होना, समान काम के लिए स्त्री-पुरुष को समान मज़दूरी, तथा मज़दूरों का सामाजिक सुरक्षा एवं पेंशन का अधिकार, ये सभी सामाजिक आंदोलनों के द्वारा ही प्राप्त हुए। सामाजिक आंदोलनों ने उस विश्व को आकार दिया है जिसमें हम रहते हैं, और वे निरंतर ऐसा कर रहे हैं।

बॉक्स 8.1: मतदान का अधिकार

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय संविधान के प्रमुख अधिकारों में से एक है। ब्रिटेन में भी पहले मतदान का अधिकार केवल संपत्ति के स्वामियों तक सीमित था। चार्टरवाद, इंग्लैंड में संसदीय प्रतिनिधित्व से संबंधित एक सामाजिक आंदोलन, ने सन् 1839 में पीपुल्स चार्टर पर 12.50 लाख से अधिक हस्ताक्षर एकत्रित किए, तथा सन् 1842 में 32.5 लाख हस्ताक्षर एकत्रित किए, जो एक छोटे देश के लिए बहुत बड़ी संख्या थी। फिर भी प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ही, सन् 1918 में, 21 वर्ष से अधिक आयु के सभी पुरुषों, तथा 30 वर्ष से अधिक आयु की विवाहिताओं, गृहस्वामिनियों तथा विश्वविद्यालयी स्नातक महिलाओं को अंततः मतदान का अधिकार मिला। जब सफ्रागेट आंदोलनकारियों ने सभी वयस्क महिलाओं के मताधिकार की माँग उठाई, तो उनका कड़ा विरोध हुआ और उनके आंदोलन को निर्ममता से कुचल दिया गया।

आप 19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों, जाति तथा लिंग भेद के विरुद्ध संघर्षों, और भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से परिचित हैं जिससे 1947 में स्वतंत्रता मिली। एशिया, अफ्रीका तथा अमेरिका के अनेक राष्ट्रवादी आंदोलनों ने भी औपनिवेशिक शासन का अंत किया। समाजवादी आंदोलनों, संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन (1950-60 का दशक) तथा दक्षिणी अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी संघर्ष ने विश्व को मौलिक रूप से बदला है। सामाजिक आंदोलन केवल समाजों को नहीं बदलते, वे अन्य सामाजिक आंदोलनों को प्रेरणा भी देते हैं। सामाजिक परिवर्तन लाने में भारतीय संविधान की भूमिका की कहानी, जो हम अध्याय 3 में पढ़ चुके हैं, भी यही संकेत देती है।

रटने योग्यपरिभाषा 1

सामाजिक आंदोलन में एक लंबे समय तक निरंतर सामूहिक गतिविधि की आवश्यकता होती है, जो प्रायः राज्य के विरुद्ध होकर राज्य की नीति या व्यवहार में परिवर्तन की माँग करती है। स्वतःस्फूर्त तथा असंगठित विरोध को सामाजिक आंदोलन नहीं कहा जा सकता; सामूहिक गतिविधि में कुछ हद तक संगठन आवश्यक है, जिसमें नेतृत्व तथा एक ऐसी संरचना होती है जो सदस्यों के पारस्परिक संबंध, निर्णय-प्रक्रिया तथा उनका अनुपालन तय करती है। भाग लेने वालों के उद्देश्य तथा विचारधाराएँ साझी होती हैं, और आंदोलन का परिवर्तन लाने (या रोकने) का एक सामान्य रुख होता है। ये लक्षण स्थायी नहीं होते, आंदोलन की जीवन-अवधि में बदल सकते हैं।

सामाजिक आंदोलन प्रायः किसी जनहित के मुद्दे में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से उठते हैं, जैसे जनजातीय लोगों के लिए जंगल के उपयोग का अधिकार, या विस्थापित लोगों के पुनर्वास एवं क्षतिपूर्ति का अधिकार। जबकि सामाजिक आंदोलन सामाजिक परिवर्तन लाना चाहते हैं, कभी-कभी यथापूर्व स्थिति बनाए रखने के लिए प्रतिरोधी आंदोलन जन्म लेते हैं।

1

सती प्रथा

राजा राममोहन राय ने सतीप्रथा का विरोध कर ब्रह्म समाज बनाया; सतीप्रथा के प्रतिरक्षकों ने धर्म सभा बनाकर अंग्रेज़ों से सती के विरुद्ध कानून न बनाने की याचिका दी।

2

बालिका शिक्षा

जब सुधारवादियों ने बालिकाओं के लिए शिक्षा की माँग की, तो बहुत से लोगों ने इसे “समाज के लिए विनाशकारी” बताकर विरोध किया।

3

विधवा पुनर्विवाह

विधवा पुनर्विवाह का प्रचार करने वाले सुधारकों का सामाजिक बहिष्कार किया गया।

4

जाति और विद्यालय

जब तथाकथित “निम्न जाति” के बच्चों ने स्कूलों में नाम लिखवाया, तो कुछ “उच्च जाति” परिवारों ने अपने बच्चों को स्कूलों से निकाल लिया।

5

किसान एवं दलित

किसान आंदोलनों को प्रायः क्रूरता से दबाया गया; दलितों के सामाजिक आंदोलनों से उनके विरुद्ध बदले की कार्यवाही हुई।

6

आरक्षण

शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण देने के प्रस्तावों से भी प्रतिरोधी आंदोलनों का जन्म हुआ।

सामाजिक आंदोलन आसानी से समाज को नहीं बदल सकते, क्योंकि यह संरक्षित हितों तथा मूल्यों, दोनों के विरुद्ध होते हैं, इसलिए इनका विरोध स्वाभाविक है। परंतु कुछ समय बाद परिवर्तन होते भी हैं।

विरोध सामूहिक गतिविधि का सबसे मूर्त रूप है, परंतु सामाजिक आंदोलन समान रूप से महत्वपूर्ण अन्य तरीकों से भी कार्य करता है। आंदोलनकारी लोगों को संबंधित मुद्दों पर प्रेरित करने के लिए सभाएँ करते हैं, जिससे साझा सोच तथा सामूहिक एजेंडा को आगे बढ़ाने की सहमति बनती है। सामाजिक आंदोलन प्रचार योजनाएँ भी बनाते हैं, जिनमें सरकार, संचार तथा जनमत बनाने वालों पर दबाव डाला जाता है। सामाजिक आंदोलन विरोध के विभिन्न साधन भी विकसित करते हैं, जैसे मोमबत्ती या मशाल जुलूस, काले कपड़े का प्रयोग, नुक्कड़ नाटक, गीत तथा कविताएँ। गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अहिंसा, सत्याग्रह तथा चरखे के प्रयोग जैसे नए तरीके अपनाए।

बॉक्स 8.2: सत्याग्रह की झाँकी

महात्मा गांधी ने भारत में कपास उगाने वालों तथा बुनकरों की जीविका के समर्थन में, जो सरकार की मिल-निर्मित कपड़ों की नीति से नष्ट हो रही थी, हाथ से कता तथा बुना वस्त्र खादी पहना। नमक बनाने के लिए बहुचर्चित डांडी यात्रा अंग्रेज़ों की उन कर नीतियों के विरुद्ध एक विरोध था, जिनमें उपभोक्ताओं पर साम्राज्य को लाभ पहुँचाने के लिए भारी बोझ डाला गया था। गांधी ने प्रतिदिन के जन उपभोग की चीज़ों, कपड़ा और नमक को, प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया।

2सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक आंदोलन

सामान्य रूप से सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक आंदोलन में अंतर करना महत्वपूर्ण है। सामाजिक परिवर्तन निरंतर रूप से आगे बढ़ता रहता है, यह असंख्य व्यक्तियों तथा सामूहिक गतिविधियों का सम्मिलित परिणाम है। सामाजिक आंदोलन किसी विशिष्ट उद्देश्य की ओर निर्देशित होते हैं, इसमें लंबा तथा निरंतर सामाजिक प्रयास शामिल होता है।

संस्कृतीकरण तथा पाश्चात्यीकरण को सामाजिक परिवर्तन के रूप में, तथा 19वीं सदी के सामाजिक सुधारकों के प्रयासों को सामाजिक आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है।

पुस्तक का अपना उदाहरण, दोनों में अंतर स्पष्ट करने के लिए।

3समाजशास्त्र और सामाजिक आंदोलन

प्रारंभ से ही समाजशास्त्र विषय सामाजिक आंदोलनों में रुचि लेता रहा है। फ्रांसिसी क्रांति राजतंत्र को उखाड़ फेंकने तथा “स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता” स्थापित करने के लिए चलाए गए अनेक सामाजिक आंदोलनों की एक हिंसात्मक परिणति थी। ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के दौरान भी बहुत उथल-पुथल हुई। गाँवों से नगरों में काम खोजने आए गरीब मज़दूरों तथा कारीगरों ने उन अमानवीय जीवन-स्थितियों का विरोध किया, जिनमें रहने को वे बाध्य थे; इंग्लैंड के खाद्य दंगों को प्रायः सरकार ने दबाया, और कुलीन वर्ग ने इन विरोधों को स्थापित व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना।

एमिल दुर्खाइम का दृष्टिकोण

  • सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की चिंता
  • श्रम के विभाजन, धार्मिक जीवन तथा आत्महत्या पर लेखन इसी चिंता को दर्शाते हैं, कि सामाजिक संरचनाएँ सामाजिक एकीकरण को कैसे संभव बनाती हैं
  • सामाजिक आंदोलनों को अव्यवस्था फैलाने वाली शक्तियों के रूप में देखा गया

कार्ल मार्क्स से प्रभावित विद्वान

  • इतिहासकार ई.पी. थॉमसन ने दर्शाया कि “जनसंकुल” तथा “भीड़” अराजक गुंडों द्वारा बनाई हुई नहीं थी
  • उनमें भी अपनी “नैतिक अर्थव्यवस्था” थी, यानी सही-गलत की एक साझी समझ जो उनकी गतिविधियों को दिशा देती थी
  • नगरीय गरीब लोगों के पास विरोध करने के उपयुक्त कारण थे, प्रायः यही उनका गुस्सा प्रकट करने का एकमात्र तरीका था

4सामाजिक आंदोलनों के प्रकार

सामाजिक आंदोलनों को तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है।

सामाजिक आंदोलन
प्रतिदानात्मक (रूपांतरणकारी)व्यक्तिगत सदस्यों की चेतना तथा गतिविधियों में परिवर्तन, जैसे केरल के इज़हावा समुदाय ने नारायण गुरु के नेतृत्व में अपनी सामाजिक प्रथाएँ बदलीं
सुधारवादीवर्तमान सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था में धीमे, प्रगतिशील परिवर्तन, जैसे 1960 के दशक में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, और हाल का सूचना के अधिकार अभियान
क्रांतिकारीसामाजिक संबंधों का आमूल रूपांतरण, प्रायः राजसत्ता पर अधिकार करके, जैसे रूस की बोल्शेविक क्रांति तथा भारत का नक्सली आंदोलन

बहुत से आंदोलनों में प्रतिदानात्मक, सुधारवादी तथा क्रांतिकारी तत्व एक साथ मिले होते हैं, और एक आंदोलन की अभिमुखता समय के साथ बदल सकती है, जैसे प्रारंभ में क्रांतिकारी उद्देश्य वाला आंदोलन बाद में सुधारवादी बन जाए। एक आंदोलन जन-गतिशीलता तथा सामूहिक विरोध की अवस्था से प्रारंभ होकर अधिक संस्थात्मक बन सकता है, समाजवैज्ञानिक इसे “सामाजिक आंदोलन संगठन” की ओर बढ़ना कहते हैं।

परीक्षा संकेत: व्याख्या सदा विवादित रहती है

सामाजिक आंदोलन को कैसे देखा और वर्गीकृत किया जाता है, यह सदैव निरूपण का विषय रहा है, और भिन्न-भिन्न वर्गों में भिन्न होता है। उदाहरण के लिए, 1857 में जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के लिए “गदर” अथवा “विद्रोह” था, वह भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए “स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम” था। गदर वैध सत्ता, यानी ब्रिटिश राज, के विरुद्ध एक अवज्ञा की कार्यवाही थी; स्वतंत्रता के लिए संघर्ष उस सत्ता की वैधानिकता को ही चुनौती देता था।

5पुराने और नए सामाजिक आंदोलन

पूँजीवादी पश्चिम में कामगार वर्ग के आंदोलन राज्य से बेहतर वेतन, बेहतर जीवन-दशा, सामाजिक सुरक्षा, मुफ़्त स्कूली शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा प्राप्त कर रहे थे; यह वह काल भी था जब समाजवादी आंदोलन नए प्रकार के राज्य तथा समाज स्थापित कर रहे थे। पुराने सामाजिक आंदोलनों ने शक्ति संबंधों के पुनर्गठन को केंद्रीय लक्ष्य माना, और वे राजनीतिक दलों के दायरे में काम करते थे: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन चलाया, चीन की साम्यवादी पार्टी ने चीनी क्रांति का नेतृत्व किया।

कुछ लोग मानते हैं कि मज़दूर संघों तथा कामगारों के दलों द्वारा चलाई गई वर्ग-आधारित राजनीतिक कार्यवाही अब पतनोन्मुख है। दूसरे तर्क देते हैं कि धनी पश्चिम में कल्याणकारी राज्य के कारण वर्ग-आधारित शोषण तथा असमानता जैसे मुद्दे अब केंद्रीय चिंता नहीं रहे, इसलिए “नए” सामाजिक आंदोलन सत्ता के वितरण को बदलने के बारे में न होकर, स्वच्छ पर्यावरण जैसे जीवन की गुणवत्ता के मुद्दों के बारे में हैं।

रजनी कोठारी और भारत में सामाजिक आंदोलन

राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी भारत में 1970 के दशक में सामाजिक आंदोलनों की भरमार को लोगों के संसदीय लोकतंत्र से बढ़ते असंतोष का कारण मानते हैं। उनका तर्क है कि राज्य की संस्थाओं पर अभिजात वर्ग का अधिकार हो गया है, इसलिए राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी प्रतिनिधित्व गरीबों की आवाज़ सुनवाने का प्रभावी तरीका नहीं रह गया। औपचारिक राजनीतिक व्यवस्था से छूटे लोग सामाजिक आंदोलनों अथवा गैर-दलीय राजनीतिक संगठनों से जुड़ जाते हैं, ताकि राज्य पर बाहर से दबाव डाल सकें।

आज व्यापक अर्थ में नागरिक समाज शब्द का प्रयोग राजनीतिक दलों तथा मज़दूर संघों वाले पुराने सामाजिक आंदोलनों, और गैर सरकारी संगठनों, महिलाओं के समूहों, पर्यावरण समूहों तथा जनजातीय आंदोलनकारियों वाले नए संगठनों, दोनों के लिए किया जाता है।

भूमंडलीकरण उद्योग, कृषि, संस्कृति तथा संचार के क्षेत्र में लोगों के जीवन का पुनर्गठन कर रहा है। फर्में प्रायः पारराष्ट्रीय होती हैं, तथा उन पर विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के विनियम लागू होते हैं। पर्यावरण तथा स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, तथा परमाणु युद्ध के भय भी भूमंडलीय प्रकृति के हैं, इसलिए बहुत से नए सामाजिक आंदोलन विस्तार में अंतर्राष्ट्रीय होते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि पुराने तथा नए आंदोलन विश्व सामाजिक फोरम जैसे नए मैत्री संगठनों में मिलकर काम कर रहे हैं, जो भूमंडलीकरण के संकटों पर जागरूकता फैलाते हैं।

बॉक्स 8.4: सामाजिक आंदोलन वैश्विक होते जा रहे हैं

सूचना युग में विश्व भर के सामाजिक आंदोलन विशाल क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क में एकजुट हो रहे हैं: गैर सरकारी संगठन, धार्मिक तथा मानवतावादी समूह, मानवाधिकार समितियाँ, उपभोक्ता संरक्षण अधिवक्ता तथा पर्यावरण आंदोलनकारी, सभी इसमें शामिल हैं। सिएटल में विश्व व्यापार संगठन के विरुद्ध हुए विशाल विरोध का आयोजन आंशिक रूप से इंटरनेट-आधारित नेटवर्क द्वारा किया गया था।

नए सामाजिक आंदोलन केवल आर्थिक असमानता के “पुराने” मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, न ही वे केवल वर्गीय आधार पर संगठित हैं। पहचान की राजनीति, सांस्कृतिक चिंताएँ तथा आकांक्षाएँ इन आंदोलनों की रचना के आवश्यक तत्व हैं, जिनकी जड़ वर्ग-आधारित असमानता में ढूँढ़ना कठिन है। प्रायः ये आंदोलन वर्ग की सीमाओं के आर-पार भागीदारों को एकजुट करते हैं, जैसे महिलाओं के आंदोलन में नगरीय मध्यवर्गीय महिलावादी तथा गरीब कृषक महिलाएँ दोनों शामिल होती हैं, और पृथक राज्य-दर्जे की माँग करने वाले क्षेत्रीय आंदोलन भी एक समान वर्ग-पहचान न रखने वाले विभिन्न समूहों को साथ लाते हैं।

भारत में पुराने और नए आंदोलनों की अस्पष्टता

भारत में “पुराने” तथा “नए” सामाजिक आंदोलनों के बीच स्पष्ट रेखा खींचना कठिन है। पुस्तक के अपने उदाहरण इसका कारण दिखाते हैं: महिला आंदोलन में मध्यवर्गीय महिलावादी तथा गरीब कृषक महिलाएँ दोनों शामिल हैं; चिपको आंदोलन जीवन-निर्वहन (आर्थिक) मुद्दे को पारिस्थितिकीय मुद्दे से जोड़ता है; और जनजातीय आंदोलनों में पहचान, असमानता तथा वन (पारिस्थितिकीय) मुद्दे साथ-साथ हैं। अध्याय के अंत की प्रश्नावली में यही प्रश्न विवेचना के लिए पूछा गया है।

6पारिस्थितिकीय आंदोलन: चिपको आंदोलन

आधुनिक काल में सबसे अधिक ज़ोर विकास पर दिया गया है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित उपयोग की चिंता बढ़ी है। विकास का यह प्रतिरूप इस आलोचना का भी शिकार हुआ है कि यह सभी वर्गों के लाभान्वित होने की मान्यता रखता है, जबकि बड़े बाँध लोगों को उनके घरों तथा आजीविका से अलग कर देते हैं, और उद्योग कृषकों को उनकी भूमि से।

चिपको आंदोलन, हिमालय की तलहटी में, पुस्तक का पारिस्थितिकीय आंदोलन का अपना उदाहरण है, जो दर्शाता है कि आर्थिक तथा पारिस्थितिकीय हित किस तरह आपस में जुड़े होते हैं। रामचंद्र गुहा की पुस्तक अनक्वाइट वुड्स के अनुसार, गाँववासी अपने गाँवों के निकट ओक तथा रोहोडैंड्रोन के जंगलों को बचाने के लिए एक साथ आगे आए। जब सरकारी जंगल ठेकेदार पेड़ काटने आए, तो बड़ी संख्या में महिलाओं सहित गाँववासी आगे बढ़े और कटाई रोकने के लिए पेड़ों से चिपक गए।

“लाल” मुद्दा: जीवन-निर्वहन

  • गाँववासी ईंधन के लिए लकड़ी, चारा तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए जंगल पर निर्भर थे
  • उनकी जीवन-निर्वहन की अर्थव्यवस्था सरकार की मुनाफ़े की अर्थव्यवस्था के विपरीत खड़ी थी, जो लकड़ी बेचकर राजस्व कमाना चाहती थी

“हरा” मुद्दा: पारिस्थितिकी

  • प्राकृतिक जंगलों की कटाई से क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ तथा भूस्खलन हुए
  • गाँववासी जंगल को अपनी उत्तरजीविता के लिए, तथा सबको लाभ देने वाली पारिस्थितिकीय संपदा के रूप में भी, महत्व देते थे

चिपको आंदोलन ने मैदानी क्षेत्रों में स्थित उस सुदूर सरकार के प्रति पर्वतीय गाँववासियों के रोष को भी व्यक्त किया, जो उनकी चिंताओं के प्रति उदासीन प्रतीत होती थी। वातावरण की बेहतरी के लिए पेड़ों का होना आवश्यक है, और स्वस्थ पर्यावरण साफ़ पानी पर भी निर्भर करता है। इसके आलोक में, भारत सरकार ने 2014 से “एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन” (नमामि गंगे) तथा “स्वच्छ भारत अभियान” के माध्यम से व्यवस्थित प्रयास शुरू किए हैं।

फ़ोटो रेनी दस्ते की जीवित सदस्याएँ, चिपको आंदोलन की 30वीं वर्षगांठ के पुनर्मिलन में, 2004। चित्र: Ceti / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0
फ़ोटो रेनी दस्ते की जीवित सदस्याएँ, चिपको आंदोलन की 30वीं वर्षगांठ के पुनर्मिलन में, 2004। चित्र: Ceti / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0
बॉक्स 8.3: चिपको आंदोलन, विस्तार से

सन् 1970 की अनपेक्षित भारी वर्षा के कारण स्मृति में सबसे विनाशकारी बाढ़ आई। अलकनंदा घाटी में पानी ने 100 वर्ग किलोमीटर भूमि को डुबा दिया, धातु के 6 पुल तथा 10 किलोमीटर की मोटर सड़क बहा दी, 24 बसें तथा अन्य कई वाहन बहा दिए; 366 घर गिर गए और 500 एकड़ खड़ी धान की फ़सल नष्ट हो गई, तथा मानव एवं पशु जीवन की भी बहुत क्षति हुई। गाँववासी वनों की अंधाधुंध कटाई, भूस्खलन तथा बाढ़ के बीच के संबंध को देखने लगे; यह देखा गया कि भूस्खलन से सबसे अधिक प्रभावित गाँव वे थे जो सीधे उन जंगलों के नीचे स्थित थे जहाँ पेड़ों की कटाई की गई थी।

गाँववासियों का मामला चमोली ज़िले के एक सहकारी संगठन दशौली ग्राम स्वराज्य संघ ने उठाया। प्रारंभिक विरोधों के बावजूद सरकार ने नवंबर में जंगलों की वार्षिक नीलामी कर दी, जिसमें दिए जाने वाले भूखंडों में से एक रेनी जंगल था। जोशीमठ से रेनी जा रहे ठेकेदार के आदमियों को रेनी से पहले ही एक छोटी लड़की ने देख लिया, जो भाग कर गाँव की महिला मंडल की प्रमुख गौरा देवी के पास पहुँची। गौरा देवी ने दूसरी गृहिणियों को इकट्ठा किया और जंगल पहुँचीं; मज़दूरों से कटाई न करने की याचना करने पर पहले गालियाँ तथा धमकियाँ मिलीं, परंतु जब महिलाओं ने झुकने से इंकार कर दिया, तो अंततः पुरुषों को लौटना पड़ा।

7वर्ग-आधारित आंदोलन: किसान एवं मज़दूर

7.1 किसान आंदोलन

किसान आंदोलन अथवा कृषक संघर्ष औपनिवेशिक काल से पहले के दिनों में ही शुरू हो गए थे। सन् 1858 से 1914 के बीच के आंदोलन स्थानीय, बिखरे हुए तथा विशिष्ट शिकायतों तक सीमित रहे, जिनमें प्रसिद्ध हैं नील की खेती के विरुद्ध 1859-62 का बंगाल विद्रोह, तथा साहूकारों के विरुद्ध 1875 का “दक्कन विद्रोह”। इनसे जुड़े कुछ मुद्दे आगे भी बने रहे और महात्मा गांधी के नेतृत्व में आंशिक रूप से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।

1917-18चंपारन सत्याग्रह, गांधीजी के नेतृत्व में, नील की खेती के विरुद्ध
1920ब्रिटिश सरकार की वन-नीतियों के विरुद्ध प्रतिरोध आंदोलन; कुछ क्षेत्रों में स्थानीय शासकों के विरुद्ध भी लोग उठ खड़े हुए
1928, सूरत ज़िलाबारदोली सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन का हिस्सा, भूमि-कर न देने का एक “कर-विरोधी” अभियान
1929बिहार प्रांतीय किसान सभा, पहला किसान संगठन
1936अखिल भारतीय किसान सभा बनी, किसानों, कामगारों तथा सभी शोषित वर्गों की आर्थिक शोषण से मुक्ति की माँग
1946-47तिभागा आंदोलन: बंगाल/उत्तरी बिहार के बटाईदारों ने प्रथागत आधे के बजाय पैदावार का दो-तिहाई हिस्सा माँगा, किसान सभा तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) का समर्थन प्राप्त
1946-51तेलंगाना आंदोलन, हैदराबाद रियासत की सामंती दशाओं के विरुद्ध, CPI के नेतृत्व में

पुस्तक के अनुसार स्वतंत्रता के समय “दो मुख्य किसान आंदोलन” देखने को मिलते थे: तिभागा तथा तेलंगाना।

बॉक्स 8.5: नक्सलबाड़ी (सिलिगुड़ी उपमंडल)

कानू सान्याल के बाद के दावों के अनुसार, मार्च से अप्रैल 1967 तक सभी गाँव वाले संगठित हो चुके थे; 15,000 से 20,000 तक किसान पूर्णकालिक आंदोलनकारियों के रूप में नामांकित हुए। हर गाँव में किसान समितियाँ बनीं और सशस्त्र गार्ड में बदल गईं। उन्होंने किसान समितियों के नाम पर ज़मीनें अधिग्रहित कीं, ज़मीन के प्रलेख जला दिए, बंधक कर्ज़ निरस्त किए, दमनकारी भूस्वामियों के लिए मृत्युदंड की घोषणा की, भूस्वामियों से बंदूकें छीनकर सशस्त्र टोलियाँ बनाईं, तीर-धनुष तथा भाले जैसे परंपरागत हथियारों से स्वयं को सुसज्जित किया, और गाँवों की देखभाल के लिए समानांतर प्रशासन बनाया। स्रोत: सुमंता बनर्जी, “नक्सलबाड़ी एंड द लेफ्ट मूवमेंट,” संपादक घनश्याम शाह, सोशल मूवमेंट्स एंड द स्टेट (सेज, दिल्ली, 2002), पृष्ठ 125-192।

नए किसान आंदोलन 1970 के दशक में पंजाब तथा तमिलनाडु में शुरू हुए। ऊपर बताए किसान आंदोलनों से अलग, ये क्षेत्रीय आधार पर संगठित, दल-रहित थे, और इनमें पुस्तक के शब्दों में “कृषक के स्थान पर किसान” जुड़े थे; पुस्तक किसान उन्हें कहती है जो वस्तुओं के उत्पादन और खरीद, दोनों रूपों में बाज़ार से जुड़े होते हैं। इनकी विचारधारा प्रबल रूप से राज्य-विरोधी तथा नगर-विरोधी थी, और माँगों का केंद्र “मूल्य तथा संबंधित मुद्दे” थे, जैसे कीमत वसूली, लाभप्रद कीमतें, कृषि निवेश की कीमतें, तथा कर्ज़ों की वापसी। इन्होंने सड़कों-रेलमार्गों को बंद करने तथा राजनीतिज्ञों-प्रशासकों के गाँव में प्रवेश की मनाही जैसे नए तरीके अपनाए। समय के साथ किसान आंदोलनों ने पर्यावरण तथा महिला मुद्दों को भी अपने कार्यक्रम में शामिल किया, इसलिए इन्हें विश्वस्तर के “नए सामाजिक आंदोलनों” का एक भाग माना जा सकता है।

बॉक्स 8.6: एक गुरिल्ला कार्यवाही

गुरिल्ला आंदोलन की शुरुआत बोड्डापाडु के निकट मैदानी क्षेत्र में गरुड़भद्रा में एक अमीर भूस्वामी की ज़मीन से फ़सल जबरन काटने से हुई, 24 नवंबर 1968 को। इससे अधिक महत्वपूर्ण कार्यवाही अगले दिन पहाड़ी क्षेत्र के पैडागोतिली गाँव, पार्वतीपुरम एजेंसी क्षेत्र में हुई, जहाँ लगभग 250 गिरिजन (क्षेत्र के जनजातीय लोगों के लिए प्रयुक्त शब्द) तीर, धनुष तथा भालों से लैस होकर एक भूस्वामी-सह-साहूकार के घर पर धावा बोल गए और उसका जमा किया हुआ धान, चावल, अन्य खाद्यान्न तथा लगभग 20,000 रुपये मूल्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया, तथा उसके प्रलेख भी अधिग्रहित कर लिए।

7.2 मज़दूरों का आंदोलन

भारत में कारखानों से उत्पादन 1860 के दशक के प्रारंभ में शुरू हुआ, उस औपनिवेशिक व्यापार पद्धति के अंतर्गत जिसमें भारत से कच्चा माल लिया जाता था और यूनाइटेड किंगडम में बना माल वापस उपनिवेश में बेचा जाता था। इसीलिए कारखाने बंदरगाह वाले शहरों कलकत्ता (कोलकाता) और बंबई (मुंबई) में, तथा बाद में मद्रास (चेन्नई) में भी स्थापित किए गए; आसाम में चाय बागान सन् 1839 के आसपास ही लगाए जाने लगे थे। औपनिवेशिक काल के प्रारंभ में मज़दूरी बहुत सस्ती थी, क्योंकि सरकार ने वेतन या कार्य-दशाओं के लिए कोई नियम नहीं बनाए थे।

मज़दूर संघ बाद में बने, परंतु कामगारों ने पहले भी विरोध किया, हालाँकि वह विरोध संपोषित होने के बजाय अधिक स्वतःस्फूर्त था। कुछ राष्ट्रवादी नेताओं ने मज़दूरों को उपनिवेश-विरोधी आंदोलन में भी शामिल किया। युद्ध से उद्योगों का विस्तार हुआ, परंतु इससे खाद्य की कमी तथा कीमतों में तीव्र वृद्धि जैसी परेशानियाँ भी बढ़ीं, जिससे हड़तालों की लहर चली।

1

1917 की हड़ताल लहर

सितंबर-अक्तूबर 1917 में करीब 30 प्रामाणिक हड़तालें हुईं, बंबई की कपड़ा मिलों में; कलकत्ता के पटसन कामगारों ने काम रोका; मद्रास की बकिंघम तथा कर्नाटक मिल (बिन्नी की) के कामगारों ने वेतन-वृद्धि के लिए काम रोका; अहमदाबाद की कपड़ा मिल के कामगारों ने 50 प्रतिशत वेतन-वृद्धि की माँग की (भौमिक 2004)।

2

पहला मज़दूर संघ, 1918

अप्रैल 1918 में मद्रास में बी.पी. वाडिया, एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा थियोसॉफिकल सोसायटी के सदस्य, ने बनाया। उसी वर्ष महात्मा गांधी ने टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (TLA) की स्थापना की।

3

एटक (AITUC), 1920

बंबई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनी, विभिन्न विचारधाराओं वाला व्यापक संगठन: साम्यवादी (एस.ए. डांगे, एम.एन. राय), नरम दल (एम. जोशी, वी.वी. गिरी), तथा राष्ट्रवादी (लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू)।

4

भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC), 1947

ब्रिटिश राज के अंतिम दिनों में साम्यवादियों ने एटक पर काफ़ी नियंत्रण कर लिया था। मई 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक अन्य संघ, भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) बनाई, जिससे राजनीतिक दलों की तर्ज़ पर और विभाजनों का रास्ता खुला; 1960 के दशक के अंत से क्षेत्रीय दलों ने भी अपने संघ बनाने शुरू किए।

सन् 1966-67 में अर्थव्यवस्था में भारी मंदी आई, जिससे उत्पादन तथा रोज़गार में कमी हुई और सर्वत्र असंतोष फैला। 1974 में रेल कर्मचारियों की एक बड़ी हड़ताल हुई। राज्य तथा मज़दूर संघों के बीच प्रतिरोध तीव्र हो गया।

8जाति-आधारित आंदोलन: दलित एवं पिछड़ा वर्ग

8.1 दलित आंदोलन

दलितों के सामाजिक आंदोलनों की व्याख्या मात्र आर्थिक शोषण अथवा राजनीतिक दबाव के संदर्भ में संतोषजनक रूप से नहीं की जा सकती, यद्यपि ये पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। यह मानव के रूप में पहचान पाने, आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्णय पाने, और अस्पृश्यता द्वारा उपलक्षित कलंक को समाप्त करने का संघर्ष है, इसे “स्पर्श के लिए संघर्ष” भी कहा जाता है।

रटने योग्यपरिभाषा 2

“दलित” शब्द आमतौर पर मराठी, हिंदी, गुजराती तथा अन्य भारतीय भाषाओं में गरीब तथा उत्पीड़ित लोगों के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसका नए (राजनीतिक) संदर्भ में पहला प्रयोग मराठी में, 1970 के दशक के प्रारंभ में, बाबासाहेब अंबेडकर के अनुयायी नव-बौद्ध आंदोलनकारियों ने किया। यह उन लोगों के लिए है जिन्हें ऊपर के लोगों ने जान-बूझकर तोड़ा और धराशायी किया; इस शब्द में ही प्रदूषण, कर्म तथा न्यायोचित जाति संस्तरण की अस्वीकृति निहित है।

देश में आज या अतीत में कभी भी एक संगठित दलित आंदोलन नहीं रहा; विभिन्न आंदोलनों ने अलग-अलग विचारधाराओं के इर्द-गिर्द दलितों से जुड़े अलग-अलग मुद्दे उठाए हैं। फिर भी सभी एक दलित पहचान की बात करते हैं, चाहे उसका अर्थ सबके लिए एक-सा न हो, समानता, आत्मसम्मान तथा अस्पृश्यता उन्मूलन की एक साझी खोज में (शाह 2001:194)।

आंदोलन क्षेत्र
सतनामी आंदोलन (चमारों का) छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाके, पूर्वी मध्य प्रदेश
आदि धर्म आंदोलन पंजाब
महार आंदोलन महाराष्ट्र
जाटवों की सामाजिक-राजनीतिक गतिशीलता आगरा
ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन दक्षिण भारत

समसामयिक काल में दलित आंदोलन ने जनमंडल में एक ऐसा स्थान प्राप्त कर लिया है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, और इसके साथ प्रचुर दलित साहित्य भी सामने आया है। दलित लेखक अपने ही अनुभवों तथा दृष्टिकोण पर आधारित अपनी कल्पनाशीलता के प्रयोग पर अड़े रहते हैं, क्योंकि बहुत से लोग मानते हैं कि मुख्यधारा समाज की उच्च सामाजिक कल्पनाशीलता सत्य को प्रकट करने के बजाय छुपाएगी। दलित साहित्य सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्रांति का आह्वान करता है। कुछ लोग सम्मान तथा पहचान के सांस्कृतिक संघर्ष पर बल देते हैं, तो कुछ अन्य समाज की संरचनात्मक तथा आर्थिक विशेषताओं को भी इसमें शामिल करते हैं।

बॉक्स 8.7: दलित आंदोलन का वर्गीकरण

समाजशास्त्रियों ने दलित आंदोलनों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया तो पाया कि ये तीनों प्रकारों, सुधारवादी, प्रतिदानात्मक तथा क्रांतिकारी, में आते हैं। जाति-विरोधी आंदोलन 19वीं सदी में जोतिबा फुले की प्रेरणा से शुरू हुआ, 1920 के दशक में महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु के गैर-ब्राह्मण आंदोलनों द्वारा आगे बढ़ाया गया, और फिर डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में विकसित हुआ; इसमें तीनों प्रकार की विशेषताएँ थीं, अपनी सर्वोत्तम दशा में यह समाज के संदर्भ में क्रांतिकारी तथा व्यक्तियों के संदर्भ में प्रतिदानात्मक था।

आंशिक संदर्भ में, “अंबेडकरोत्तर दलित आंदोलन” में क्रांतिकारी परिपाटी रही है, जिसने जीवन के वैकल्पिक तरीके दिए, गौमांस त्याग से लेकर धर्म परिवर्तन तक, तथा जाति उत्पीड़न एवं आर्थिक शोषण समाप्त करने के मौलिक लक्ष्य से लेकर अनुसूचित जाति के सदस्यों को सामाजिक गतिशीलता देने के सीमित लक्ष्य तक कार्य किया। परंतु कुल मिलाकर यह आंदोलन एक सुधारवादी आंदोलन रहा है: इसने जाति के आधार पर गतिशीलता तो दी, परंतु जाति को नष्ट करने के केवल आधे-अधूरे प्रयास किए; इसने कुछ वास्तविक, यद्यपि सीमित, सामाजिक बदलाव प्राप्त किए, विशेषकर शिक्षित दलितों के लिए, परंतु यह अब तक भी संतोषप्रद रूप से विश्व में सर्वाधिक गरीब आम जनता के गरीबी उन्मूलन के लिए समाज को परिवर्तित करने में असफल रहा है।

8.2 पिछड़े वर्ग/जातियों के आंदोलन

पिछड़ी जातियों/वर्गों का राजनीतिक इकाइयों के रूप में उदय औपनिवेशिक तथा उपनिवेशोत्तर, दोनों संदर्भों में हुआ। औपनिवेशिक राज्य प्रायः जाति के आधार पर संरक्षण बाँटता था, इसलिए लोगों का संस्थागत जीवन में सामाजिक-राजनीतिक पहचान के लिए अपनी जाति में बने रहना अर्थपूर्ण था, जिससे समान रूप से स्थित जाति-समूह स्वयं को संगठित कर एक “समानांतर विस्तार” बनाने लगे। इस प्रकार जाति अपनी कर्मकांडी विषयवस्तु छोड़कर राजनीतिक गतिशीलता के लिए अधिकाधिक पंथनिरपेक्ष होती गई।

“पिछड़े वर्ग” शब्द देश के विभिन्न भागों में 19वीं सदी के अंत से प्रयोग हो रहा है, अधिक व्यापक रूप से मद्रास प्रेसीडेंसी में 1872 से, रियासती मैसूर में 1918 से, तथा बंबई प्रेसीडेंसी में 1925 से। 1920 के दशक से देश के विभिन्न भागों में जाति के मुद्दे पर बहुत से संगठन उठ खड़े हुए, जिनमें संयुक्त प्रोविंस हिंदू बैकवर्ड क्लासेस लीग, अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग फेडरेशन, तथा अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग लीग शामिल थे। सन् 1954 तक पिछड़े वर्गों के लिए काम करने वाले 88 संगठन गिने गए।

बॉक्स 8.8: जी.बी. पंत, तथा एक चर्चा-बिंदु

मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों आदि पर सलाहकार समिति के गठन का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए जी.बी. पंत ने कहा: “हमें दबाए हुए वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों की विशेष देखभाल करनी होगी… जंजीर की शक्ति का आकलन उसकी सर्वाधिक कमज़ोर कड़ी द्वारा किया जाता है, और इसलिए जब तक सबसे कमज़ोर कड़ी को सशक्त नहीं किया जाता, हमें एक स्वस्थ राजनीति नहीं प्राप्त होगी।” सन् 2019 में भारत सरकार ने उच्च जातियों में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की; पुस्तक विद्यार्थियों से पूछती है कि यह पंत के उपरोक्त उद्धरण से कैसे भिन्न है।

9जनजातीय आंदोलन: झारखंड और पूर्वोत्तर

देश भर में फैले विभिन्न जनजातीय समूहों के मुद्दे समान हो सकते हैं, परंतु उनके आपसी भेद भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जनजातीय आंदोलनों में से कई मध्य भारत की तथाकथित “जनजातीय बेल्ट” में स्थित रहे हैं: छोटानागपुर तथा संथाल परगना के संथाल, हो, ओरांव तथा मुंडा, यह क्षेत्र आज के झारखंड का मुख्य भाग बनाता है।

9.1 झारखंड

सन् 2000 में दक्षिण बिहार से अलग कर बनाया गया झारखंड भारत के नव-निर्मित राज्यों में से एक है, परंतु इसकी स्थापना के पीछे एक सदी से अधिक का प्रतिरोध है। इस आंदोलन का करिश्माई नेता बिरसा मुंडा था, एक आदिवासी जिसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक बड़ा विद्रोह किया; मृत्यु के बाद बिरसा इस आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक बन गया, जिसके बारे में कहानियाँ तथा गीत पूरे झारखंड में गाए जाते हैं। दक्षिण बिहार में काम कर रहे ईसाई मिशनरियों ने साक्षरता फैलाई, जिसके बाद साक्षर आदिवासियों ने अपने इतिहास, मिथकों, प्रथाओं तथा सांस्कृतिक व्यवहारों पर शोध तथा लेखन किया, जिससे एक संगठित संजातीय चेतना तथा साझी झारखंडी पहचान बनी।

साक्षर आदिवासी सरकारी नौकरियाँ भी पाने लगे, जिससे समय के साथ एक मध्यवर्गीय आदिवासी बौद्धिक नेतृत्व उभरा, जिसने पृथक राज्य की माँग को रूप दिया तथा भारत एवं विदेश में इसका प्रचार किया। दक्षिण बिहार के आदिवासी “दिक्कुओं” से घृणा करते थे, जो प्रवासी व्यापारी तथा महाजन थे जिन्होंने वहाँ बसकर मूल निवासियों की संपदा हड़प ली थी। खनन तथा औद्योगिक परियोजनाओं का अधिकांश लाभ इन्हीं दिक्कुओं को मिलता था, जबकि आदिवासी भूमि छिनती जा रही थी। हाशिये पर धकेले जाने तथा अन्याय के इसी बोध ने साझी झारखंडी पहचान तथा सामूहिक कार्यवाही को गति दी, जिसके परिणामस्वरूप अंततः पृथक राज्य बना।

1

भूमि अधिग्रहण

बड़ी सिंचाई परियोजनाओं तथा गोलीबारी क्षेत्रों के लिए

2

सर्वेक्षण एवं पुनर्वास

रुकी हुई सर्वेक्षण तथा पुनर्वास की कार्यवाही, बंद कर दिए गए कैंप

3

कर्ज़ वसूली

ऋण, किराया तथा सहकारी बकाया वसूली का प्रतिकार किया गया

4

वन उत्पाद राष्ट्रीयकरण

इसका बहिष्कार किया गया

9.2 पूर्वोत्तर

स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार द्वारा शुरू की गई राज्य-निर्माण प्रक्रिया ने क्षेत्र के प्रमुख पर्वतीय ज़िलों में अशांति पैदा कर दी। अपनी पृथक पहचान तथा पारंपरिक स्वायत्तता के प्रति सचेत जनजातियाँ असम के प्रशासनिक तंत्र में शामिल किए जाने को लेकर अनिश्चित थीं। इस क्षेत्र में संजातीयता का उदय एक शक्तिशाली, अपरिचित प्रणाली के संपर्क में आने से उत्पन्न नई परिस्थिति का प्रत्युत्तर है; भारतीय मुख्यधारा से लंबे समय तक अलग रहने के कारण इन जनजातियों ने अपना विश्व-दृष्टिकोण तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ बाहरी प्रभाव से काफ़ी हद तक बचाकर रखीं। पहले की अलगाव की प्रवृत्ति अब भारतीय संविधान के दायरे में ही स्वायत्तता की खोज द्वारा प्रस्थापित हो गई है (नांगबरी 2003: 115)।

देश के विभिन्न भागों के जनजातीय आंदोलनों को जोड़ने वाला एक प्रमुख मुद्दा है, जनजातीय लोगों का वन-भूमि से विस्थापन। इस अर्थ में पारिस्थितिकीय मुद्दे जनजातीय आंदोलनों के केंद्र में हैं, ठीक वैसे ही जैसे पहचान के सांस्कृतिक मुद्दे तथा असमानता जैसे आर्थिक मुद्दे भी हैं। यह हमें भारत में पुराने तथा नए सामाजिक आंदोलनों की अस्पष्टता के प्रश्न की ओर वापस ले जाता है।

10महिलाओं का आंदोलन

आप 19वीं सदी के सामाजिक-सुधार आंदोलनों से भलीभाँति परिचित हैं, जिन्होंने महिलाओं से जुड़े अनेक मुद्दे उठाए। 20वीं सदी के प्रारंभ में राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर पर महिलाओं के संगठनों में वृद्धि देखी गई।

संगठन स्थापना वर्ष
विमेंस इंडिया एसोसिएशन (WIA) 1917
नेशनल काउंसिल फॉर विमेन इन इंडिया (NCWI) 1925
ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC) 1926

इनमें से कई संगठनों की शुरुआत सीमित कार्यक्षेत्र से हुई, जो समय के साथ विस्तृत हुआ। जैसे ए.आई.डब्ल्यू.सी. का प्रारंभिक विचार था कि “महिला कल्याण” तथा “राजनीति” आपस में असंबद्ध हैं, परंतु कुछ वर्ष बाद उसके एक अध्यक्षीय भाषण में कहा गया: “क्या भारतीय पुरुष अथवा स्त्री स्वतंत्र हो सकते हैं यदि भारत गुलाम रहे? हम अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता जोकि सभी महान सुधारों का आधार है, के बारे में चुप कैसे रह सकते हैं?” (चौधरी 1993: 149)

यह दोनों तरफ़ से तर्क दिया जा सकता है कि क्या यह सक्रियता का दौर एक “सामाजिक आंदोलन” था। इसमें संगठन, विचारधारा, नेतृत्व, साझी समझ तथा किसी जनहित के मुद्दे पर परिवर्तन लाने का लक्ष्य, सभी मौजूद थे। इन प्रयासों ने मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाया जहाँ महिलाओं के प्रश्न की उपेक्षा नहीं की जा सकती थी।

10.1 कृषिक संघर्ष तथा क्रांतियाँ

प्रायः यह मान लिया जाता है कि केवल मध्यवर्गीय शिक्षित महिलाएँ ही सामाजिक आंदोलनों में भाग लेती हैं। संघर्ष का एक हिस्सा महिलाओं की भागीदारी के भुला दिए गए इतिहास को याद करना रहा है, क्योंकि औपनिवेशिक काल में महिलाओं ने पुरुषों के साथ जनजातीय तथा ग्रामीण संघर्षों में भाग लिया: बंगाल में तिभागा आंदोलन, निज़ाम के पूर्व-शासन के विरुद्ध तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष, तथा महाराष्ट्र में बंधुआ दासत्व के विरुद्ध वर्ली जनजाति का विद्रोह।

10.2 1947 के बाद

प्रायः यह प्रश्न उठता है कि यदि 1947 से पहले एक सक्रिय महिला आंदोलन था, तो बाद में उसका क्या हुआ। एक स्पष्टीकरण यह है कि राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने वाली अनेक महिला कार्यकर्ता राष्ट्र-निर्माण के काम में लग गईं। दूसरे लोग इस ठहराव के लिए विभाजन के आघात को उत्तरदायी मानते हैं।

1970 के दशक के मध्य में भारत में महिला आंदोलन का नवीनीकरण हुआ, जिसे कुछ लोग इसका “दूसरा चरण” कहते हैं। बहुत सी चिंताएँ वही रहीं, फिर भी संगठनात्मक रणनीति तथा विचारधारा, दोनों में परिवर्तन आया। इस दौरान महिलाओं के विरुद्ध हिंसा जैसे नए मुद्दों पर ध्यान दिया जाने लगा। जैसे, स्कूल के प्रवेश-फ़ॉर्म में अब पिता तथा माता, दोनों के नाम होते हैं, जो पहले हमेशा सच नहीं था। महिला आंदोलन के अभियानों से महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन भी हुए हैं; भूमि अधिकार तथा रोज़गार के मुद्दे यौन-उत्पीड़न तथा दहेज के विरुद्ध अधिकारों की माँग के साथ-साथ लड़े गए हैं।

परीक्षा संकेत: हर महिला का उत्पीड़न एक-सा नहीं है

यह मान्यता भी है कि सभी महिलाएँ पुरुषों की तुलना में किसी न किसी रूप में असुविधाजनक स्थिति में हैं, परंतु सबका उत्पीड़न समान स्तर या प्रकार का नहीं है, एक शिक्षित मध्यवर्गीय महिला की चिंताएँ एक किसान महिला से अलग होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक दलित महिला की चिंताएँ एक “उच्च जाति” की महिला से अलग होती हैं।

यह मान्यता भी बढ़ रही है कि स्त्री तथा पुरुष, दोनों ही प्रबल लिंग-पहचान से बंधे हैं। पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुषों को लगता है कि उन्हें ताकतवर तथा सफल होना चाहिए, और अपनी भावनाएँ प्रकट करना “पुरुषोचित” नहीं माना जाता। तब यह विचार आता है कि स्त्री एवं पुरुष दोनों को स्वतंत्र होने का अधिकार समान रूप से मिलना चाहिए; निःसंदेह यह इस विचार पर निर्भर है कि सच्ची स्वतंत्रता तभी संभव होगी जब कोई अन्याय न हो। जेंडर दृष्टि से समतावादी समाज मुख्यतः दो कारकों पर आधारित है: बहुउद्देश्यीय भूमिकाएँ निभाने वाली शिक्षित महिलाएँ, तथा एक बेहतर लिंगानुपात। भारत सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना को पुस्तक जेंडर दृष्टि से समतावादी समाज को मूर्त रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताती है।

सामाजिक आंदोलन इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि व्यक्ति तथा सामाजिक समूह अपनी दशा को बदलना चाहते हैं। ऐसा करते हुए वे स्वयं को तथा समाज, दोनों को बदल देते हैं।

निष्कर्ष: पुस्तक का अपना समापन विचार, कक्षा XI की पहली पुस्तक के आरंभिक विषय, व्यक्ति तथा समाज के द्वंद्वात्मक संबंध, की ओर लौटते हुए।

त्वरित रिवीज़न: परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • सामाजिक आंदोलन को निरंतर, संगठित सामूहिक गतिविधि तथा साझे लक्ष्य चाहिए; प्रतिरोधी आंदोलन यथापूर्व स्थिति की रक्षा करते हैं (सती, बालिका शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-विद्यालय, आरक्षण)
  • सामाजिक परिवर्तन निरंतर है; सामाजिक आंदोलन विशिष्ट लक्ष्यों की ओर निर्देशित होते हैं, संस्कृतीकरण/पाश्चात्यीकरण बनाम 19वीं सदी के सुधार आंदोलन
  • दुर्खाइम ने आंदोलनों को अव्यवस्था के रूप में देखा; मार्क्स-प्रभावित विद्वानों (ई.पी. थॉमसन) ने “भीड़” के पीछे एक “नैतिक अर्थव्यवस्था” देखी
  • तीन प्रकार: प्रतिदानात्मक (नारायण गुरु), सुधारवादी (राज्य पुनर्गठन, RTI), क्रांतिकारी (बोल्शेविक, नक्सली); बहुत से आंदोलनों में तीनों तत्व मिले होते हैं
  • पुराने आंदोलन = राजनीतिक-दल ढाँचा, सत्ता का पुनर्वितरण; नए आंदोलन = जीवन-गुणवत्ता/पहचान के मुद्दे, वर्ग-सीमाओं के आर-पार, नागरिक समाज, भूमंडलीकरण, विश्व सामाजिक फोरम; रजनी कोठारी का 1970 के दशक का विश्लेषण
  • चिपको आंदोलन: गुहा की अनक्वाइट वुड्स, जीवन-निर्वहन बनाम मुनाफ़ा अर्थव्यवस्था, लाल/हरे मुद्दे, 1970 की बाढ़, दशौली ग्राम स्वराज्य संघ, रेनी जंगल, गौरा देवी
  • किसान आंदोलन: बंगाल विद्रोह 1859-62, दक्कन विद्रोह (1875), 1920 का वन-नीति विरोधी प्रतिरोध, बारदोली/चंपारन सत्याग्रह, किसान सभाएँ (1929, 1936), तिभागा (1946-47), तेलंगाना (1946-51), नए किसान आंदोलन (1970 का दशक), नक्सलबाड़ी (1967)
  • मज़दूर आंदोलन: 1917 हड़ताल लहर, पहला मज़दूर संघ 1918 (बी.पी. वाडिया), TLA (गांधी), AITUC (1920), INTUC (1947), 1966-67 मंदी, 1974 रेल हड़ताल
  • दलित आंदोलन: शब्द की उत्पत्ति 1970 के दशक के आरंभ के अंबेडकरवादी प्रयोग से; सतनामी, आदि धर्म, महार, जाटव, ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन; “कुल मिलाकर” सुधारवादी (बॉक्स 8.7)
  • पिछड़ा वर्ग आंदोलन: मद्रास 1872, मैसूर 1918, बंबई 1925; 1954 तक 88 संगठन; जी.बी. पंत का भाषण (बॉक्स 8.8)
  • जनजातीय आंदोलन: झारखंड (बिरसा मुंडा, दिक्कु, 2000), पूर्वोत्तर (अलगाव की प्रवृत्ति से स्वायत्तता की खोज, नांगबरी 2003); दोनों में पारिस्थितिकीय मुद्दे केंद्रीय
  • महिला आंदोलन: WIA (1917), NCWI (1925), AIWC (1926); कृषिक संघर्ष (तिभागा, तेलंगाना, वर्ली); 1947 के बाद शिथिलता और 1970 के मध्य का “दूसरा चरण”
परीक्षा से पहले स्वयं जाँच लें
  • क्या मुझे सामाजिक आंदोलन के चार लक्षण याद हैं, और दो प्रतिरोधी आंदोलनों के उदाहरण?
  • क्या मैं तीनों प्रकार के सामाजिक आंदोलन एक-एक उदाहरण सहित बता सकता/सकती हूँ, और पुराने-नए आंदोलनों का अंतर समझा सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं चिपको आंदोलन की कहानी क्रम से, 1970 की बाढ़ के आँकड़ों तथा रेनी जंगल की घटना सहित, सुना सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं किसान आंदोलन तथा नए किसान आंदोलन में अंतर, नामों एवं तिथियों सहित, बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं पुस्तक के अपने शब्दों में बता सकता/सकती हूँ कि दलित आंदोलन को “कुल मिलाकर” सुधारवादी क्यों कहा गया है?
  • क्या मुझे झारखंड आंदोलन के मुद्दे तथा “दिक्कु” शब्द का अर्थ याद है?
  • क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि सभी महिलाओं का उत्पीड़न एक समान क्यों नहीं है?
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