कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 4 कार्यपालिका महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. कार्यपालिका किसे कहते हैं?

उत्तर: सरकार का वह अंग जो विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों और नीतियों को लागू करने और प्रशासन चलाने का काम मुख्य रूप से करता है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका में एक फ़र्क़ बताइए।

उत्तर: राजनीतिक कार्यपालिका (सरकार का प्रधान और मंत्री) चुनाव के साथ बदलती रहती है, जबकि स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाही) सरकार बदलने पर भी बनी रहती है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. पॉकेट वीटो क्या है?

उत्तर: राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक को बिना किसी समय-सीमा के अनिश्चित काल तक लंबित रखने की अनौपचारिक शक्ति, क्योंकि संविधान में इसकी कोई समय-सीमा तय नहीं है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. 91वें संविधान संशोधन (2003) ने क्या तय किया?

उत्तर: मंत्रिपरिषद् का आकार लोक सभा या विधानसभा के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. सामूहिक उत्तरदायित्व का क्या मतलब है?

उत्तर: पूरी मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति ज़िम्मेदार है, एक मंत्री पर अविश्वास प्रस्ताव भी पूरी मंत्रिपरिषद् को गिरा देता है।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया का इकलौता आधार क्या है?

उत्तर: संविधान का उल्लंघन ही महाभियोग का इकलौता आधार है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. UPSC क्या करता है?

उत्तर: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) केंद्र सरकार के लिए सिविल सेवकों की भर्ती की प्रक्रिया संचालित करता है।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. नेहरू ने प्रधानमंत्री को क्या कहा था?

उत्तर: नेहरू ने प्रधानमंत्री को सरकार का ‘लिंचपिन’ यानी धुरी बताया था।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. अध्यक्षात्मक और संसदीय कार्यपालिका में क्या फ़र्क़ है?

उत्तर: अध्यक्षात्मक व्यवस्था में राष्ट्रपति देश का प्रधान और सरकार का प्रधान, दोनों होता है, जैसे अमेरिका में। संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति या सम्राट सिर्फ़ औपचारिक प्रमुख होता है, असली शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् के पास होती है, जैसे भारत में।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. राष्ट्रपति का चुनाव किस तरह होता है?

उत्तर: राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है, जनता सीधे वोट नहीं देती। निर्वाचित सांसद और विधायक समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति से राष्ट्रपति चुनते हैं।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद् के रिश्ते के बारे में क्या कहता है?

उत्तर: अनुच्छेद 74(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिपरिषद् होगी जो राष्ट्रपति को सलाह देगी, और राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार काम करेगा। राष्ट्रपति पुनर्विचार माँग सकता है, पर पुनर्विचार के बाद आई सलाह मानने के लिए बाध्य है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. 1986 के पोस्ट ऑफिस विधेयक का उदाहरण देकर पॉकेट वीटो समझाइए।

उत्तर: 1986 में संसद ने पास किया भारतीय पोस्ट ऑफिस (संशोधन) विधेयक प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करता था। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया। उनके बाद वेंकटरमण ने इसे लौटाया, पर तब तक सरकार बदल चुकी थी और नई सरकार ने इसे दोबारा पेश ही नहीं किया, इसलिए यह कभी क़ानून नहीं बना।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. उपराष्ट्रपति की भूमिका के दो पहलू बताइए।

उत्तर: 1. उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है।
2. राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने से ख़ाली हो जाए, तो नया राष्ट्रपति चुने जाने तक उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बनता है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. मंत्री बनने की दो शर्तें बताइए।

उत्तर: 1. प्रधानमंत्री और सभी मंत्रियों का संसद सदस्य होना ज़रूरी है।
2. अगर कोई बिना सांसद हुए मंत्री या प्रधानमंत्री बनता है, तो उसे 6 महीने के भीतर संसद का चुनाव जीतना पड़ता है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. बेगम एजाज़ रसूल के सुझाव को समझाइए, और क्या वह अपनाया गया?

उत्तर: बेगम एजाज़ रसूल ने स्विस पद्धति का सुझाव दिया था, जिसमें विधायिका एकल संक्रमणीय मत से मंत्रियों को चुनती, ताकि सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिले। यह सुझाव अपनाया नहीं गया, भारत में मंत्रियों का चुनाव प्रधानमंत्री ख़ुद करता है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. IAS-IPS अधिकारियों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण कैसे काम करता है?

उत्तर: IAS और IPS अधिकारी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं। वे किसी ख़ास राज्य में काम करते हैं, केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भी जा सकते हैं, पर सिर्फ़ केंद्र सरकार ही उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. कार्यपालिका के तीन प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: 1. अध्यक्षात्मक व्यवस्था: राष्ट्रपति देश का प्रधान और सरकार का प्रधान, दोनों होता है, जैसे अमेरिका और ब्राज़ील में।
2. संसदीय व्यवस्था: राष्ट्रपति या सम्राट सिर्फ़ औपचारिक प्रमुख होता है, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल असली शक्ति रखते हैं, जैसे भारत, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन में।
3. अर्द्ध-अध्यक्षात्मक व्यवस्था: राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों के पास असली रोज़मर्रा की शक्तियाँ होती हैं, जैसे फ्रांस, रूस और श्रीलंका में।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. भारत ने अध्यक्षात्मक की जगह संसदीय कार्यपालिका क्यों चुनी?

उत्तर: 1. भारत को 1919 और 1935 के अधिनियमों से संसदीय व्यवस्था चलाने का पहले से अनुभव था, जिसने दिखाया कि जनप्रतिनिधि इसमें कार्यपालिका को असरदार ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं।
2. अध्यक्षात्मक व्यवस्था में राष्ट्रपति सारी शक्ति का स्रोत बन जाता है, जिससे व्यक्ति-पूजा (personality cult) का ख़तरा रहता है।
3. संविधान निर्माता एक मज़बूत कार्यपालिका चाहते थे, पर साथ ही व्यक्ति-पूजा के विरुद्ध पर्याप्त सुरक्षा भी चाहते थे।
4. संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका विधायिका के प्रति नियमित रूप से जवाबदेह रहती है, इसलिए यही तरीक़ा केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर अपनाया गया।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. राष्ट्रपति की तीन विवेकाधीन शक्तियाँ समझाइए।

उत्तर: 1. सलाह पर पुनर्विचार माँगना: राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह लौटाकर पुनर्विचार माँग सकता है, पर पुनर्विचार के बाद वही सलाह आए तो माननी पड़ती है।
2. वीटो और पॉकेट वीटो: धन विधेयक छोड़कर बाक़ी विधेयक राष्ट्रपति लौटा सकता है, और चूँकि कोई समय-सीमा तय नहीं है इसलिए वह विधेयक को अनिश्चित काल तक लंबित भी रख सकता है (पॉकेट वीटो)।
3. प्रधानमंत्री चुनने में विवेक: जब चुनाव के बाद किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब राष्ट्रपति को अपने विवेक से तय करना पड़ता है कि किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. 1986 के पोस्ट ऑफिस विधेयक और 1998 के नारायणन-वाजपेयी उदाहरण से राष्ट्रपति के विवेक को समझाइए।

उत्तर: 1. पोस्ट ऑफिस विधेयक (1986): प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने वाले इस विधेयक पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कोई फ़ैसला नहीं लिया। बाद के राष्ट्रपति वेंकटरमण ने इसे लौटाया, पर तब तक सरकार बदल चुकी थी और नई गठबंधन सरकार ने इसे दोबारा पेश ही नहीं किया, इस तरह यह विधेयक कभी क़ानून नहीं बन सका, पॉकेट वीटो का असली उदाहरण।
2. मार्च 1998 का उदाहरण: चुनाव में भाजपा और सहयोगियों को 251 सीटें मिलीं, बहुमत से 21 कम। राष्ट्रपति नारायणन ने वाजपेयी से संबंधित दलों के समर्थन-पत्र माँगे और 10 दिन में विश्वास मत हासिल करने की सलाह दी, यह प्रधानमंत्री चुनने में विवेकाधीन शक्ति के इस्तेमाल का उदाहरण है।
3. दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि राष्ट्रपति का विवेक राजनीतिक हालात से जुड़ा है, अस्थिर सरकारों और गठबंधनों के दौर में यह भूमिका ज़्यादा दिखती है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. गठबंधन युग (1989 के बाद) ने प्रधानमंत्री पद को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर: 1. प्रधानमंत्री चुनने में राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ी, क्योंकि अक्सर किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता था।
2. गठबंधन साझेदारों से लगातार सलाह-मशविरा ज़रूरी हुआ, जिससे प्रधानमंत्री का अधिकार घटा।
3. मंत्री और उनके विभाग चुनने की प्रधानमंत्री की आज़ादी सीमित हुई, क्योंकि गठबंधन दलों को भी हिस्सा देना पड़ता था।
4. नीतियाँ और कार्यक्रम अब सिर्फ़ प्रधानमंत्री तय नहीं करता, सहयोगी दलों से बातचीत और समझौते के बाद बनते हैं, जिससे प्रधानमंत्री की भूमिका नेता से ज़्यादा मध्यस्थ (negotiator) जैसी हो गई है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. भारतीय नौकरशाही की चार विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: 1. इसमें अखिल भारतीय सेवाएँ, राज्य सेवाएँ, स्थानीय निकायों के कर्मचारी और सार्वजनिक उपक्रमों का स्टाफ़ शामिल है।
2. संघ लोक सेवा आयोग केंद्र के लिए और राज्य लोक सेवा आयोग राज्यों के लिए भर्ती करते हैं, दोनों योग्यता के आधार पर निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करते हैं।
3. नौकरशाही से राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने की अपेक्षा है, यानी सरकार बदलने पर भी वह नई नीतियाँ ईमानदारी से लागू करती है।
4. सिविल सेवा में SC, ST के साथ अब महिलाओं, OBC और EWS के लिए भी आरक्षण है, ताकि नौकरशाही समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व कर सके।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. नौकरशाही से जुड़ी दो समस्याएँ और सूचना के अधिकार की भूमिका समझाइए।

उत्तर: 1. समस्या एक: नौकरशाही इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि आम नागरिक सरकारी अधिकारी से डरते हैं और उसे असंवेदनशील पाते हैं।
2. समस्या दो: बहुत ज़्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप नौकरशाही को नेताओं के हाथ का औज़ार बना सकता है, जबकि बहुत कम राजनीतिक नियंत्रण उसे जनता के प्रति असंवेदनशील बना सकता है।
3. कई लोग मानते हैं कि सिविल सेवकों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने और नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।
4. उम्मीद है कि सूचना का अधिकार (RTI) जैसे उपाय नौकरशाही को थोड़ा और उत्तरदायी और पारदर्शी बना सकते हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. भारत में राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति को विस्तार से समझाइए, उसके औपचारिक और विवेकाधीन दोनों पहलुओं के साथ।

उत्तर: 1. औपचारिक रूप से संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, और उसके पास कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक और आपातकालीन शक्तियों की बड़ी सूची है।
2. अनुच्छेद 74(1) के अनुसार व्यवहार में राष्ट्रपति ये शक्तियाँ मंत्रिपरिषद् की बाध्यकारी सलाह पर ही इस्तेमाल करता है।
3. राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है, 5 वर्ष के लिए, समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति से, और उसे केवल संविधान के उल्लंघन के आधार पर महाभियोग से हटाया जा सकता है।
4. फिर भी राष्ट्रपति पूरी तरह शक्तिहीन नहीं है, कम से कम तीन मौक़ों पर वह अपने विवेक का इस्तेमाल करता है: सलाह पर पुनर्विचार माँगना, वीटो/पॉकेट वीटो का प्रयोग, और जब बहुमत साफ़ न हो तब प्रधानमंत्री चुनने में विवेक।
5. नेहरू के शब्दों में राष्ट्रपति को असली शक्ति नहीं, बल्कि गरिमा और अधिकार का पद दिया गया है।
6. राष्ट्रपति की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि मंत्रिपरिषद् कभी भी गिर सकती है, ऐसे में एक तय कार्यकाल वाला प्रमुख चाहिए जो नई सरकार बनवा सके और देश का प्रतीक बना रहे।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. 1986 के भारतीय पोस्ट ऑफिस (संशोधन) विधेयक और मार्च 1998 के उदाहरण से राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियों को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. पॉकेट वीटो का उदाहरण (1986): प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने वाला यह विधेयक संसद ने पारित किया, पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने अपने कार्यकाल में इस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया।
2. उनके बाद राष्ट्रपति वेंकटरमण ने विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को लौटाया, पर तब तक सरकार बदल चुकी थी।
3. 1989 में आई नई गठबंधन सरकार ने विधेयक को दोबारा संसद में पेश ही नहीं किया, यानी विधेयक कभी क़ानून नहीं बन सका। यह दिखाता है कि संविधान में कोई समय-सीमा न होने से राष्ट्रपति के पास एक असरदार अनौपचारिक वीटो शक्ति आ जाती है।
4. प्रधानमंत्री चुनने का विवेक (1998): मार्च 1998 के चुनाव में भाजपा और सहयोगियों को 251 सीटें मिलीं, बहुमत से 21 कम।
5. राष्ट्रपति नारायणन ने गठबंधन के नेता वाजपेयी से संबंधित दलों के समर्थन के काग़ज़ माँगे, और उन्हें शपथ लेने के 10 दिन के भीतर विश्वास मत साबित करने की सलाह भी दी।
6. दोनों उदाहरण साथ मिलकर दिखाते हैं कि राष्ट्रपति का विवेक तय प्रक्रियाओं से बँधा तो है, पर राजनीतिक अस्थिरता के दौर में यह वास्तविक और असरदार बन जाता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. प्रधानमंत्री की शक्ति के स्रोत क्या हैं, और गठबंधन युग ने इस शक्ति को कैसे प्रभावित किया है?

उत्तर: 1. प्रधानमंत्री की शक्ति कई स्रोतों से आती है: मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण, लोक सभा का नेतृत्व, नौकरशाही पर पकड़, मीडिया तक पहुँच, चुनावों में व्यक्तित्व का प्रचार, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रीय नेता की छवि।
2. आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का बहुमत रहने से प्रधानमंत्री की स्थिति लगभग अटल रही।
3. 1989 के बाद कई बार किसी दल को अकेले बहुमत नहीं मिला, जिससे गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, और कई सरकारें पूरा कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाईं।
4. इसके चार असर हुए: प्रधानमंत्री चुनने में राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ी, गठबंधन साझेदारों से बातचीत ज़रूरी होने से प्रधानमंत्री का अधिकार घटा, मंत्री और विभाग चुनने पर पाबंदियाँ आईं, और नीतियाँ अब बातचीत व समझौते से बनने लगीं।
5. इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका सरकार के नेता से ज़्यादा एक मध्यस्थ (negotiator) जैसी हो गई है।
6. फिर भी, जब भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता है, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् की स्थिति फिर से बेहद मज़बूत हो जाती है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. भारतीय नौकरशाही की भूमिका, ढाँचा और उससे जुड़ी समस्याओं को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. नौकरशाही (सिविल सेवा) प्रधानमंत्री और मंत्रियों की नीति बनाने में मदद करती है और रोज़मर्रा का प्रशासन चलाती है, यह विधायिका द्वारा अपनाई नीतियों के विरुद्ध काम नहीं कर सकती।
2. भारतीय नौकरशाही में अखिल भारतीय सेवाएँ, राज्य सेवाएँ, स्थानीय निकायों के कर्मचारी और सार्वजनिक उपक्रमों का स्टाफ़ शामिल है।
3. संघ लोक सेवा आयोग केंद्र के लिए और राज्य लोक सेवा आयोग राज्यों के लिए योग्यता के आधार पर भर्ती करते हैं, साथ ही SC, ST, महिला, OBC और EWS के लिए आरक्षण भी है।
4. IAS और IPS अधिकारी राज्यों की उच्च नौकरशाही की रीढ़ हैं, केंद्र सरकार इन्हें नियुक्त करती है और सिर्फ़ केंद्र ही इनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है, जिससे राज्यों के प्रशासन पर केंद्र की पकड़ मज़बूत रहती है।
5. समस्याएँ: नौकरशाही अक्सर इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि नागरिक उससे डरते हैं और उसे असंवेदनशील पाते हैं, जबकि बहुत ज़्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप उसे नेताओं का औज़ार बना सकता है।
6. सूचना का अधिकार (RTI) जैसे उपायों से उम्मीद है कि नौकरशाही नागरिकों के प्रति ज़्यादा जवाबदेह और पारदर्शी बनेगी।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
मान लीजिए प्रधानमंत्री किसी राज्य में दलितों के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों को रोकने में राज्य सरकार की नाकामी के चलते वहाँ ‘राष्ट्रपति शासन’ लगाना चाहते हैं। राष्ट्रपति की राय अलग है, वे कहते हैं कि राष्ट्रपति शासन का प्रावधान बहुत सोच-समझकर, कम ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस स्थिति में राष्ट्रपति के सामने कई विकल्प हैं: (क) प्रधानमंत्री से कह दें कि वे आदेश पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, (ख) प्रधानमंत्री को बर्ख़ास्त कर दें, (ग) प्रधानमंत्री से कहें कि वे उस राज्य में CRPF भेजें, (घ) प्रधानमंत्री के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रेस बयान दें, (ङ) प्रधानमंत्री से मामले पर चर्चा करें और उन्हें समझाने की कोशिश करें, पर अगर वे अड़े रहें तो आदेश पर हस्ताक्षर कर दें।

(क) 1 अंक राष्ट्रपति शासन लगाने का आदेश कौन जारी करता है?
उत्तर: राष्ट्रपति शासन का आदेश राष्ट्रपति जारी करते हैं, मंत्रिपरिषद् की सलाह पर।

(ख) 2 अंक विकल्प (क) और (ख), दोनों संवैधानिक रूप से कितने उचित हैं?
उत्तर: विकल्प (क) असंवैधानिक है, अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की पुनर्विचार के बाद आई सलाह मानने के लिए बाध्य है, हस्ताक्षर से इनकार नहीं कर सकते। विकल्प (ख) भी ग़लत है, संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री तभी तक पद पर रहता है जब तक लोक सभा का बहुमत उसके साथ है, राष्ट्रपति उसे मनमाने ढंग से बर्ख़ास्त नहीं कर सकते।

(ग) 3 अंक इस स्थिति में राष्ट्रपति के लिए सबसे उचित रास्ता कौन-सा है, और क्यों?
उत्तर: विकल्प (ङ) सबसे उचित है। यह ठीक वही रास्ता है जो राष्ट्रपति की पहली विवेकाधीन शक्ति है, यानी सलाह पर पुनर्विचार माँगना। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से खुलकर चर्चा कर सकते हैं और अपनी असहमति ज़ाहिर कर सकते हैं, यह अनुरोध अपने आप में काफ़ी वज़न रखता है, पर अगर प्रधानमंत्री अपनी बात पर अड़े रहें तो अंततः राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद् की सलाह माननी ही पड़ती है, क्योंकि वे लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार के निर्णय को स्थायी रूप से रोक नहीं सकते।

केस स्टडी
1986 में संसद ने भारतीय पोस्ट ऑफिस (संशोधन) विधेयक पारित किया, जिसकी आलोचना हुई क्योंकि यह प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करता था। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने पूरे अपने बचे कार्यकाल में इस विधेयक पर हस्ताक्षर करने या इसे लौटाने, दोनों में से कोई क़दम नहीं उठाया। उनके उत्तराधिकारी वेंकटरमण ने बाद में इसे पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेज दिया, पर तब तक सत्ता बदल चुकी थी, और 1989 में सत्ता में आई गठबंधन सरकार ने इसे संसद में दोबारा कभी नहीं रखा।

(क) 1 अंक पोस्ट ऑफिस विधेयक की आलोचना किस आधार पर हुई?
उत्तर: यह प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करता था।

(ख) 2 अंक राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने क्या किया, और इसका क्या असर हुआ?
उत्तर: उन्होंने विधेयक पर अपने पूरे कार्यकाल में कोई फ़ैसला नहीं लिया, न स्वीकृति दी, न पुनर्विचार के लिए लौटाया। इससे विधेयक अनिश्चित काल तक लंबित रह गया, यानी उन्होंने अनौपचारिक रूप से पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया।

(ग) 3 अंक इस पूरे प्रकरण से संविधान की एक कमज़ोरी के बारे में क्या पता चलता है, और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?
उत्तर: यह पता चलता है कि संविधान में राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक को स्वीकृति देने या पुनर्विचार के लिए लौटाने की कोई समय-सीमा तय नहीं है। इससे राष्ट्रपति के पास एक अनौपचारिक पर बेहद असरदार वीटो शक्ति आ जाती है, जिसका इस्तेमाल यहाँ एक विधेयक को स्थायी रूप से रोकने के लिए हुआ। इसे ठीक करने का एक तरीक़ा यह हो सकता है कि संविधान में संशोधन करके राष्ट्रपति के लिए विधेयक पर फ़ैसला लेने की एक तय समय-सीमा (जैसे कुछ महीने) निर्धारित कर दी जाए, ताकि कोई भी विधेयक अनिश्चित काल तक लंबित न रह सके।