1इतिहासकार और सामंतवाद
1.1 इस अध्याय में क्या है
यह अध्याय पश्चिमी यूरोप में नौवीं से सोलहवीं सदी के बीच हुए सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक बदलावों के बारे में है। रोमन साम्राज्य के पतन के बाद पूर्वी और मध्य यूरोप के जर्मन कबीले इटली, स्पेन और फ्रांस में बस गए। कोई एक सत्ता न होने से लड़ाई-झगड़े आम बात हो गए, और अपनी भूमि बचाना ही जीवन का सबसे बड़ा सवाल बन गया। ईसाई धर्म, जो चौथी सदी से रोमन साम्राज्य का राजधर्म था, रोम के पतन के बाद भी टिका रहा और मध्य-उत्तरी यूरोप तक फैल गया। इसी दौर में चर्च खुद भी एक बड़ा ज़मींदार और राजनीतिक ताक़त बन गया।
इसी पृष्ठभूमि से निकलती है “तीन वर्ग” की अवधारणा, जिसके नाम पर यह पूरा अध्याय टिका है: ईसाई पादरी, भूमिधारक अभिजात और किसान। इन तीनों वर्गों के बीच का रिश्ता सदियों में कैसे बदला, यही इस अध्याय की असली कहानी है।
1.2 इतिहासकारों को कैसे पता चलता है? मार्क ब्लॉक और उनके स्रोत
पिछले सौ सालों में यूरोपीय इतिहासकारों ने अकेले एक-एक गाँव के इतिहास पर भी बारीक काम किया है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि मध्यकाल से बहुत सारी सामग्री बची है: दस्तावेज़, ज़मीन के रिकॉर्ड, कीमतें, अदालती मामले। चर्चों में जन्म, मृत्यु और विवाह के रिकॉर्ड रखे जाते थे, जिनसे परिवारों और जनसंख्या की बनावट समझी जा सकी; चर्चों के अभिलेखों से व्यापारी संगठनों का पता चलता है, और गीत-कहानियों से त्योहारों और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। इन सबकी मदद से इतिहासकार लंबे समय के बदलाव (जैसे जनसंख्या वृद्धि) और छोटे समय की घटनाएँ (जैसे किसान विद्रोह) दोनों को समझ पाते हैं।
मार्क ब्लॉक (1886-1944) सामंतवाद पर काम करने वाले शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण फ्रांसीसी इतिहासकारों में से एक थे। उनका मानना था कि इतिहास सिर्फ राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और बड़े लोगों की जीवनियों तक सीमित नहीं है; उन्होंने भूगोल और आम लोगों के सामूहिक व्यवहार को समझने पर ज़ोर दिया। उनकी किताब सामंती समाज 900 से 1300 के बीच के यूरोपीय, ख़ासकर फ्रांसीसी, समाज की सामाजिक बनावट, भूमि-प्रबंधन और लोक-संस्कृति का बारीक विवरण देती है।
यह मत लिखिए कि मार्क ब्लॉक की मृत्यु स्वाभाविक या बुढ़ापे में हुई। NCERT साफ़ बताती है कि उनका काम अचानक रुक गया: दूसरे विश्वयुद्ध में नाज़ियों ने उन्हें गोली मारकर मार डाला, क्योंकि वे फ्रांसीसी प्रतिरोध आंदोलन के सक्रिय सदस्य थे।
1.3 सामंतवाद है क्या?
सामंतवाद इतिहासकारों का दिया हुआ नाम है उन आर्थिक, कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक रिश्तों के लिए जो मध्यकालीन यूरोप में मौजूद थे। यह जर्मन शब्द फ़्यूड से बना है, जिसका मतलब है “भूमि का एक टुकड़ा”, और यह उस तरह के समाज को बताता है जो पहले मध्यकालीन फ्रांस में, और बाद में इंग्लैंड व दक्षिणी इटली में विकसित हुआ।
आर्थिक नज़रिए से देखें तो सामंतवाद का मतलब है लॉर्ड और किसान के रिश्ते पर टिका हुआ खेती का एक तरीका। किसान अपनी ज़मीन के साथ-साथ लॉर्ड की ज़मीन पर भी काम करते थे, बदले में लॉर्ड उन्हें सैनिक सुरक्षा देता था; लॉर्ड का किसानों पर व्यापक न्यायिक अधिकार भी होता था। यानी सामंतवाद सिर्फ आर्थिक नहीं था, यह जीवन के सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं में भी उतना ही गहरा फैला था। इसकी जड़ें रोमन साम्राज्य और फ्रांस के राजा शार्लमेन (742-814) के दौर तक जाती हैं, लेकिन यूरोप के बड़े हिस्से में जीवन के एक स्थापित तरीके के रूप में सामंतवाद ग्यारहवीं सदी में ही उभर पाया।
कॉन्स्टैंटिनोपल में पूर्वी चर्च के प्रधान का भी बाइज़ेंटियम के सम्राट से वैसा ही घनिष्ठ रिश्ता था जैसा पश्चिमी यूरोप में पोप का राजाओं से था। “चर्च और राजा का गहरा जुड़ाव” सिर्फ फ्रांस की बात नहीं थी।
1.4 फ्रांस और इंग्लैंड: राजनीतिक पृष्ठभूमि
गॉल, जो रोमन साम्राज्य का एक प्रांत था, में दो लंबी तटरेखाएँ, पहाड़, लंबी नदियाँ, जंगल और खेती के लिए अच्छे मैदान थे। जर्मनी के एक कबीले फ्रैंक ने गॉल को अपना नाम देकर उसे “फ्रांस” बना दिया। छठी सदी से यह ईसाई फ्रैंकिश राजाओं का राज्य था, जिनका चर्च से गहरा रिश्ता था, और यह रिश्ता 800 ई. में और मज़बूत हो गया जब पोप ने राजा शार्लमेन को “पवित्र रोमन सम्राट” की उपाधि दी।
एक संकरे जलमार्ग के पार इंग्लैंड-स्कॉटलैंड का द्वीप था, जिसे ग्यारहवीं सदी में फ्रांस के प्रांत नारमंडी के एक राजकुमार ने जीत लिया था, यह पूरी कहानी खंड 5 में है।
1.5 तीन वर्ग: एक झलक
फ्रांसीसी पादरियों का मानना था कि हर व्यक्ति अपने काम के हिसाब से तीन “वर्गों” में से किसी एक का सदस्य होता है। एक बिशप ने इसे यूँ कहा: “यहाँ नीचे कुछ लोग प्रार्थना करते हैं, कुछ लड़ते हैं, और बाकी काम करते हैं…” इस तरह समाज के तीन वर्ग बने: पादरी, अभिजात और किसान।
“कौन अपने सारे पशुओं को, गाय-गधे-भेड़-बकरी सबको, बिना किसी फ़र्क के एक ही अस्तबल में रखने की सोचेगा? इसलिए मनुष्यों में भी अंतर बनाना ज़रूरी है, ताकि वे एक-दूसरे को नष्ट न कर दें… ईश्वर भी अपने रेवड़ में, स्वर्ग हो या धरती, फ़र्क रखता है। सबको उसका प्यार मिलता है, पर सब बराबर नहीं हैं।”
बिंगेन की आबेस हिल्डेगार्ड, बारहवीं सदी, तीन वर्गों वाली सोच को एक स्वाभाविक, ईश्वर-प्रदत्त व्यवस्था बताते हुए
पहला वर्ग: पादरी
पादरी, बिशप और भिक्षु। इन्होंने खुद को पहले नंबर पर रखा क्योंकि ये सबकी आत्मा के लिए प्रार्थना करते थे।
दूसरा वर्ग: अभिजात
राजा, अभिजात और नाइट। ज़मीन पर नियंत्रण रखते थे और उसकी रक्षा के लिए लड़ते थे।
तीसरा वर्ग: किसान
स्वतंत्र किसान और सर्फ। वह अनाज उगाते थे जिससे बाकी दो वर्ग जीते थे।
2अभिजात वर्ग
2.1 वैसलेज
असल में मध्यकालीन समाज में सबसे केंद्रीय भूमिका अभिजात वर्ग की थी, क्योंकि ज़मीन उन्हीं के हाथ में थी, और यह नियंत्रण वैसलेज नाम की एक प्रथा से चलता था। फ्रांस के राजा अपनी प्रजा से वैसलेज के ज़रिए ही जुड़े थे, यह प्रथा फ्रैंक जैसे जर्मन मूल के लोगों में आम थी। बड़े भू-स्वामी यानी अभिजात राजा के दास (वैसल) होते थे, और किसान भू-स्वामियों के दास।
वैसलेज में एक अभिजात राजा को अपना सेन्योर (यानी लॉर्ड, “लॉर्ड” शब्द का मूल अर्थ है “रोटी देने वाला”) मान लेता था, और दोनों एक-दूसरे से वचन लेते थे: लॉर्ड दास (वैसल) की रक्षा करेगा, और बदले में दास उसके प्रति वफ़ादार रहेगा। इस समारोह में चर्च में बाइबल की शपथ ली जाती थी, और दास को उस ज़मीन के प्रतीक के तौर पर एक लिखित पत्र, या एक छड़ी, या मिट्टी का एक ढेला दिया जाता था।
अभिजात की हैसियत बहुत खास थी: अपनी संपत्ति पर हमेशा के लिए पूरा नियंत्रण, “सामंती सेना” खड़ी करने का अधिकार, अपनी खुद की अदालत, और यहाँ तक कि अपना सिक्का चलाने का अधिकार भी। वह अपनी ज़मीन पर बसे हर व्यक्ति का मालिक था, उसका अपना घर, निजी खेत और चरागाह, और उसके किरायेदार-किसानों के घर-खेत, यह सब मिलकर एक मेनर कहलाता था।
2.2 मेनर की जागीर
लॉर्ड का अपना मेनर-भवन होता था, और वह दर्जनों से लेकर सैकड़ों गाँवों तक पर नियंत्रण रख सकता था। किसी छोटी जागीर में दर्जन भर परिवार होते थे, बड़ी जागीर में पचास-साठ। रोज़मर्रा की हर ज़रूरत की चीज़ जागीर पर ही मिल जाती थी: खेतों में अनाज उगता था, लोहार-बढ़ई औज़ार और हथियार ठीक करते थे, राजमिस्त्री इमारतों की देखभाल करते थे। स्त्रियाँ सूत कातती-बुनती थीं, और बच्चे लॉर्ड के मदिरा-संपीडक में काम करते थे। जागीर में शिकार के लिए जंगल, पशुओं-घोड़ों के लिए चरागाह, एक चर्च और सुरक्षा के लिए एक दुर्ग भी होता था।

तेरहवीं सदी से कुछ दुर्गों को बड़ा बनाकर नाइट के परिवार के रहने लायक बनाया जाने लगा। इंग्लैंड में नॉरमन विजय से पहले दुर्गों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी, वहाँ ये सामंत-व्यवस्था के साथ राजनीतिक और सैनिक शक्ति के केंद्र के रूप में विकसित हुए। लेकिन कोई भी मेनर पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकता था: नमक, चक्की का पाट और धातु के बर्तन बाहर से ही आते थे, और शानो-शौकत की चीज़ें चाहने वाले लॉर्ड को साज़-सामान, वाद्य यंत्र और गहने भी कहीं और से मँगवाने पड़ते थे।
किताब का क्रियाकलाप 1 आपसे पूछता है कि पेशे, भाषा, धन और शिक्षा के आधार पर समाज की श्रेणियों पर चर्चा करें, और मध्यकालीन फ्रांस की तुलना मेसोपोटामिया व रोमन साम्राज्य से करें। यह सिर्फ चर्चा के लिए है, रटने की बात नहीं, पर इतना समझ लीजिए कि तीनों समाजों में लोगों को काम के आधार पर बाँटा गया था (कौन प्रार्थना करता है, कौन लड़ता है, कौन काम करता है), भले ही वर्गों के नाम अलग रहे हों।
2.3 नाइट और फ़ीफ़
नौवीं सदी से यूरोप में छोटे-छोटे स्थानीय युद्ध आम हो गए, और अब शौकिया किसान-सैनिक काफ़ी नहीं थे, अच्छी अश्वसेना चाहिए थी। यहीं से एक नया वर्ग अहम हो गया: नाइट। ये लॉर्ड से उसी तरह जुड़े थे जैसे लॉर्ड राजा से जुड़ा था।
फ़ीफ़ वह ज़मीन थी, आमतौर पर 1,000 से 2,000 एकड़ या उससे भी ज़्यादा, जो लॉर्ड सैनिक सेवा के बदले नाइट को देता था। यह उत्तराधिकार में मिल सकती थी, और इसमें नाइट के परिवार के लिए घर, एक चर्च, और साथ में एक पनचक्की व मदिरा-संपीडक भी शामिल होते थे: इसकी ज़मीन को किसान ही जोतते थे, बिल्कुल मेनर की तरह। बदले में नाइट अपने लॉर्ड को एक तय शुल्क देता था और युद्ध में उसकी तरफ़ से लड़ने का वचन देता था।

अपने हुनर को बनाए रखने के लिए नाइट रोज़ बाड़बंदी और पुतलों से लड़ाई का अभ्यास करते थे। एक नाइट एक से ज़्यादा लॉर्डों की सेवा कर सकता था, पर उसकी पहली वफ़ादारी हमेशा अपने ही लॉर्ड के प्रति होती थी। बारहवीं सदी से फ्रांस में गायक-चारण एक मेनर से दूसरे मेनर घूमकर बहादुर राजाओं और नाइटों की, आधी सच्ची-आधी गढ़ी हुई, कहानियाँ गाकर सुनाते थे, यह उस दौर का सबसे लोकप्रिय मनोरंजन था जब पढ़े-लिखे लोग कम थे। कई मेनरों के बड़े हॉल के ऊपर एक संकरी छज्जेदार गैलरी होती थी, जिसे गायक दीर्घा कहते थे, जहाँ से गायक भोज करते अभिजातों का मनोरंजन करते थे।
“अगर मेरा प्यारा लॉर्ड मारा जाए, तो उसकी किस्मत में मैं भी शामिल होऊँगा, / अगर उसे फाँसी दी जाए, तो मुझे भी उसके साथ लटका दो। / अगर उसे दाँव पर जलाया जाए, तो मैं भी उसके साथ जलूँगा; / और अगर वह डुबाया जाए, तो मुझे भी उसके साथ डुबा दो।”
डून दे मयान्स, तेरहवीं सदी की फ्रांसीसी कविता (गाई जाने वाली), नाइट की अपने लॉर्ड के प्रति वफ़ादारी पर
3पादरी वर्ग
3.1 कैथोलिक चर्च की ताक़त
कैथोलिक चर्च के अपने कानून थे, राजाओं से मिली ज़मीनें थीं, और वह खुद कर वसूल सकता था: यानी यह एक ऐसी ताक़तवर संस्था थी जो राजा पर निर्भर नहीं थी। पश्चिमी चर्च का मुखिया पोप था, जो रोम में रहता था; बिशप और पादरी यूरोप के ईसाइयों का मार्गदर्शन करते थे और पहला “वर्ग” बनाते थे। ज़्यादातर गाँवों का अपना चर्च होता था, जहाँ लोग हर रविवार पादरी का उपदेश सुनने और साथ में प्रार्थना करने जमा होते थे।
हर कोई पादरी नहीं बन सकता था। सर्फ पर पाबंदी थी, शारीरिक रूप से अक्षम लोगों पर भी, और स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं; जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे। बिशप “धार्मिक अभिजात” कहलाते थे: लॉर्ड की तरह उनके पास भी विशाल जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे।
टीथ चर्च का वह अधिकार था जिससे उसे किसानों की साल भर की उपज का दसवाँ हिस्सा मिलता था। अमीर लोगों से मिलने वाला दान भी चर्च की कमाई का एक ज़रिया था, यह अपने और अपने मृत रिश्तेदारों के परलोक-कल्याण के लिए दिया जाता था।
दिलचस्प बात यह है कि चर्च की कुछ रस्में सामंती तौर-तरीकों की नकल थीं: प्रार्थना के वक्त हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर घुटनों पर बैठना बिल्कुल वैसा ही था जैसे नाइट अपने लॉर्ड के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेते वक्त करता था, और ईश्वर के लिए “लॉर्ड” शब्द का इस्तेमाल भी सामंती संस्कृति से ही आया। इस तरह सामंतवाद और धर्म की दुनिया एक-दूसरे के रीति-रिवाज और प्रतीक साझा करती थीं।
3.2 भिक्षु और मठ
गाँवों-नगरों में रहने वाले आम पादरियों के अलावा, कुछ गहरे धार्मिक ईसाई अकेले रहना पसंद करते थे, और इसके लिए वे ऐबी या मठ नाम के धार्मिक समुदायों में, अक्सर आबादी से बहुत दूर, रहते थे। सबसे मशहूर दो मठ थे इटली में 529 में बना सेंट बेनेडिक्ट का मठ और बरगंडी में 910 में बना क्लूनी।

भिक्षु जीवनभर मठ में रहने, और अपना समय प्रार्थना, अध्ययन और खेती जैसे शारीरिक श्रम में बिताने का व्रत लेते थे। पादरी बनने के उलट, यह जीवन पुरुष (मोंक) और स्त्री (नन) दोनों के लिए खुला था, हालाँकि कुछ अपवादों को छोड़कर हर मठ एक ही लिंग के लोगों के लिए होता था, और भिक्षु-भिक्षुणी भी शादी नहीं करते थे। दस-बीस लोगों के छोटे समुदाय से बढ़ते-बढ़ते मठ सैकड़ों लोगों के बड़े समुदाय बन गए, जिनके साथ स्कूल-कॉलेज और अस्पताल भी जुड़े होते थे। आबेस हिल्डेगार्ड, अपनी लेखनी के अलावा, एक कुशल संगीतज्ञ भी थीं, जिन्होंने चर्च में सामूहिक प्रार्थना-गायन को बढ़ावा दिया। तेरहवीं सदी से फ्रायर नाम के कुछ भिक्षु किसी एक मठ में टिकने के बजाय जगह-जगह घूमकर उपदेश देने और दान पर गुज़ारा करने लगे।
दो मशहूर मठ, दो नंबर: 529 और 910
सेंट बेनेडिक्ट का मठ, इटली में, यानी 5-2-9। क्लूनी, बरगंडी में, यानी 9-1-0। दोनों को साथ में बोलिए, याद रह जाएगा।
| बेनेडिक्टीन नियमावली के कुछ अध्याय (कुल 73) | क्या कहा गया |
|---|---|
| अध्याय 6 | भिक्षुओं को बोलने की इजाज़त कम ही दी जानी चाहिए |
| अध्याय 7 | विनम्रता का मतलब है आज्ञापालन |
| अध्याय 33 | किसी भी भिक्षु के पास निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए |
| अध्याय 47 | आलस्य आत्मा का दुश्मन है, इसलिए भिक्षु-भिक्षुणियों को तय समय पर शारीरिक श्रम और पवित्र पाठ करना चाहिए |
| अध्याय 48 | मठ ऐसा बनना चाहिए कि उसकी हद के अंदर ही सब कुछ मिल जाए: पानी, चक्की, बाग़, कार्यशाला |
चौदहवीं सदी तक आते-आते मठवाद के फ़ायदे और मक़सद पर शक होने लगा था। इंग्लैंड में लैंग्लैंड की कविता पियर्स प्लाउमैन (1360-70) में कुछ भिक्षुओं की आरामदेह-विलासी ज़िंदगी की तुलना साधारण किसानों, चरवाहों और मज़दूरों के “शुद्ध विश्वास” से की गई; चॉसर की कैंटरबरी टेल्स में एक नन, एक भिक्षु और एक फ्रायर का हास्यपूर्ण चित्रण मिलता है।
3.3 चर्च और समाज
ईसाई बनने के बावजूद यूरोपवासियों ने जादू-टोने और लोक-परंपराओं पर पुराना विश्वास पूरी तरह नहीं छोड़ा। क्रिसमस (25 दिसंबर) ने एक पुराने पूर्व-रोमन, सौर-पंचांग पर आधारित त्योहार की जगह ले ली; ईस्टर, जिसकी तारीख चंद्र-पंचांग से तय होती थी, ने एक पुराने वसंतोत्सव की जगह ली और यीशु के सूली पर चढ़ने व पुनर्जीवित होने का प्रतीक बना। गाँव वाले अपनी पुरानी रस्म के तहत गाँव की ज़मीन का दौरा करते रहे, पर अब गाँव को “पैरिश” (एक पादरी की देखरेख वाला इलाका) कहने लगे। काम में डूबे किसान “पवित्र दिनों” यानी छुट्टियों का स्वागत करते थे, भले ही ये दिन प्रार्थना के लिए तय थे, अक्सर लोग इन्हें मौज-मस्ती और दावतों में बिताते थे। तीर्थयात्रा, यानी शहीदों की समाधियों या बड़े चर्चों की लंबी यात्राएँ, ईसाई जीवन का एक अहम हिस्सा थीं।
“अप्रैल में जब मीठी बारिश गिरती है… तब लोगों के मन में तीर्थयात्रा की चाह जागती है, और यात्री दूर के संतों के मंदिरों को खोजने निकल पड़ते हैं… और ख़ासकर इंग्लैंड के हर कोने से लोग कैंटरबरी की अपनी यात्रा पर चल पड़ते हैं।”
जोफरी चॉसर (1340-1400 के आसपास), द कैंटरबरी टेल्स, मध्यकालीन तीर्थयात्रा पर
4किसान वर्ग
4.1 स्वतंत्र किसान और सर्फ
बाकी दोनों वर्गों को पालने वाले लोगों की सबसे बड़ी संख्या यही थी। खेती करने वाले दो तरह के थे: स्वतंत्र किसान और सर्फ (यह शब्द अंग्रेज़ी क्रिया “सर्व” यानी “सेवा करना” से बना है)।
स्वतंत्र किसान
- लॉर्ड के काश्तकार के रूप में अपनी ज़मीन रखते थे
- पुरुषों को सैनिक सेवा देनी पड़ती थी (साल में कम से कम 40 दिन)
- हफ़्ते के कुछ दिन लॉर्ड की जागीर पर काम के लिए तय करने पड़ते थे
- बिना मज़दूरी के दूसरे काम भी करने पड़ते थे: गड्ढे खोदना, लकड़ी इकट्ठा करना, सड़क ठीक करना
- “टैली” नाम का सीधा कर देते थे, जिससे पादरी-अभिजात दोनों मुक्त थे
सर्फ
- जिस ज़मीन पर खेती करते थे वह लॉर्ड की ही होती थी, उनकी नहीं
- ज़्यादातर उपज सीधे लॉर्ड के पास जाती थी; कोई मज़दूरी नहीं मिलती थी
- लॉर्ड की इजाज़त के बिना जागीर छोड़ ही नहीं सकते थे
- लॉर्ड की चक्की, तंदूर और मदिरा-संपीडक ही, शुल्क देकर, इस्तेमाल कर सकते थे
- शादी के लिए भी लॉर्ड की मंज़ूरी और शुल्क ज़रूरी था
सर्फ (हिंदी में कृषि-दास) एक ऐसा किसान था जो लॉर्ड की ज़मीन से बँधा होता था और बिना इजाज़त उसे छोड़ नहीं सकता था; उसे लॉर्ड की चक्की, तंदूर और मदिरा-संपीडक शुल्क देकर ही इस्तेमाल करने होते थे। टैली वह सीधा कर था जो राजा कभी-कभी सिर्फ किसानों पर लगाते थे, पादरी और अभिजात इससे मुक्त थे।
खेत के काम के अलावा स्त्रियों और बच्चों के ज़िम्मे और भी काम थे: सूत कातना, कपड़ा बुनना, मोमबत्ती बनाना, और लॉर्ड की मदिरा के लिए अंगूर निचोड़ना।
5इंग्लैंड
इंग्लैंड में सामंतवाद ग्यारहवीं सदी से ही विकसित हुआ। मध्य यूरोप से आए एंजिल और सैक्सन छठी सदी में इंग्लैंड में बस गए थे, “इंग्लैंड” नाम खुद “एंजिल-लैंड” का ही बदला हुआ रूप है। ग्यारहवीं सदी में नारमंडी के ड्यूक विलियम ने सेना लेकर इंग्लिश चैनल पार किया और सैक्सन राजा को हरा दिया। यहीं से फ्रांस और इंग्लैंड के बीच ज़मीन और व्यापार को लेकर बार-बार लड़ाई होने लगी।
आज की इंग्लैंड की महारानी भी विलियम प्रथम की ही वंशज हैं, यानी 1066 की एक विजय आज भी राजपरिवार को जोड़े हुए है।
विलियम प्रथम ने पूरी ज़मीन का सर्वे और नक्शा बनवाया, और इसे अपने साथ आए 180 नॉरमन अभिजातों में बाँट दिया। ये लॉर्ड राजा के मुख्य काश्तकार बन गए, राजा को सैनिक मदद देते थे, और तय संख्या में नाइट भी देने पड़ते थे। लेकिन यूरोप के बाकी हिस्सों से उलट, इंग्लैंड में अभिजातों को अपने नाइटों को निजी लड़ाई में इस्तेमाल करने की मनाही थी। एंग्लो-सैक्सन किसान इस नई व्यवस्था में अलग-अलग स्तर के भू-स्वामियों के काश्तकार बन गए।
6भूमि, जलवायु और नयी तकनीक
6.1 जलवायु और पुरानी दो-खेत व्यवस्था
पाँचवीं से दसवीं सदी तक ज़्यादातर यूरोप घने जंगलों से ढका था, इसलिए खेती के लिए ज़मीन सीमित थी, हालाँकि नाराज़ किसान चाहें तो जंगल में भागकर छिप सकते थे। इसी दौर में यूरोप कड़ाके की ठंड के एक लंबे दौर से गुज़र रहा था: लंबी और सख़्त सर्दियाँ, फ़सल उगाने का छोटा मौसम, और कम पैदावार।
ग्यारहवीं सदी से यूरोप में गर्मी का एक नया दौर शुरू हुआ: फ़सल उगाने का मौसम लंबा हो गया, हल चलाना आसान हो गया, और यूरोप के कई हिस्सों में जंगल की सीमा पीछे खिसकने लगी, जिससे खेती की ज़मीन बढ़ने की गुंजाइश बनी।
शुरुआती दौर की खेती-तकनीक बेहद पुरानी थी: बैलों से खींचा जाने वाला लकड़ी का हल ही एकमात्र सहारा था, जो ज़मीन की सतह को बस खुरच भर पाता था। खेती में बहुत मेहनत लगती थी, ज़मीन को अक्सर चार साल में एक बार हाथ से खोदा जाता था। किसान दो-खेत व्यवस्था अपनाते थे, जो कि नाकाफ़ी थी: आधी ज़मीन पर सर्दियों का गेहूँ बोया जाता था, बाकी आधी परती छोड़ी जाती थी, अगले साल परती ज़मीन पर राई बोई जाती और बाकी परती छोड़ी जाती। इससे मिट्टी धीरे-धीरे कमज़ोर होती गई और अकाल आम बात बन गए। लॉर्ड फिर भी अपनी आय बढ़ाने पर अड़े रहते थे, और किसान चुपचाप विरोध करते थे: वे अपने ही खेतों पर ज़्यादा वक्त देते, बेगार से बचते, और साझा चरागाह-जंगल को लेकर लॉर्ड से टकराते।
6.2 ग्यारहवीं सदी से नयी कृषि तकनीक
ग्यारहवीं सदी तक कई तकनीकी बदलाव सामने आते हैं। लकड़ी के साधारण हल की जगह लोहे की भारी नोक वाले हल और साँचेदार पटरे आने लगे, जो ज़्यादा गहराई तक खोद पाते थे और ऊपरी मिट्टी को सही से पलट देते थे, जिससे मिट्टी के पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल हो सका। गर्दन की जगह अब कंधे पर जुआ बाँधा जाने लगा, जिससे जानवर ज़्यादा ताक़त लगा सकते थे, और घोड़ों के खुरों पर लोहे की नाल लगने से उनके खुर सुरक्षित हो गए। खेती में हवा और पानी की शक्ति का इस्तेमाल भी बढ़ा, अनाज पीसने और अंगूर निचोड़ने के लिए ज़्यादा चक्कियाँ लगने लगीं।
तीन-खेत व्यवस्था ने पुरानी दो-खेत व्यवस्था की जगह ली: ज़मीन को तीन हिस्सों में बाँटकर किसान हर खेत का इस्तेमाल तीन में से दो साल कर सकते थे, यानी शरद में एक फ़सल, डेढ़ साल बाद बसंत में दूसरी फ़सल, और तीसरा हिस्सा परती छोड़कर, हर साल बारी बदलते हुए। इससे किसान लोगों के लिए गेहूँ-राई, लोगों और घोड़ों दोनों के लिए मटर-सेम-दाल-जौ उगा पाते थे, और साथ ही ज़मीन के एक तिहाई हिस्से को आराम भी मिल जाता था।
नतीजा तुरंत दिखा: खाद्य उत्पादन लगभग दुगुना हो गया। मटर-सेम जैसी फलियों के ज़्यादा इस्तेमाल से यूरोपीय लोगों को बेहतर प्रोटीन और जानवरों को अच्छा चारा मिलने लगा। किसान अब कम ज़मीन में ज़्यादा उगा पा रहे थे: तेरहवीं सदी तक एक किसान के खेत का औसत आकार लगभग 100 एकड़ से घटकर 20-30 एकड़ रह गया, और छोटी जोत को कम मेहनत में बेहतर तरीके से जोता जा सकता था, जिससे किसानों को दूसरे कामों के लिए वक्त मिला। किसानों ने खेती की ज़मीन बढ़ाने, तीन-खेत व्यवस्था अपनाने और गाँव में लोहार की दुकानें खोलने में खुद पहल की, जबकि महँगी पनचक्की-पवनचक्की ज़्यादातर पैसे वाले लॉर्ड ही लगवाते थे। ग्यारहवीं सदी से सामंतवाद की नींव रहे निजी रिश्ते कमज़ोर पड़ने लगे, क्योंकि अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे नकदी पर टिकने लगी: लॉर्ड सेवा की जगह नकद लगान लेना पसंद करने लगे, और किसान अपनी फ़सल व्यापारियों को पैसे में बेचने लगे। इंग्लैंड में तो 1270 से 1320 के बीच कृषि-मूल्य दुगुने हो गए।

7नगर और चौदहवीं सदी का संकट
7.1 नगरों का विकास
खेती के विस्तार के साथ-साथ जनसंख्या भी बढ़ी: यूरोप की आबादी लगभग 1000 में 4.2 करोड़ से बढ़कर 1200 में 6.2 करोड़, और 1300 में 7.3 करोड़ हो गई। बेहतर भोजन का मतलब था लंबी उम्र, तेरहवीं सदी तक एक औसत यूरोपीय आठवीं सदी के मुकाबले 10 साल ज़्यादा जी सकता था (हालाँकि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों-लड़कियों की उम्र कम रहती थी, क्योंकि पुरुषों को बेहतर खाना मिलता था)।
रोमन साम्राज्य के पतन के बाद उसके नगर वीरान हो गए थे, पर ग्यारहवीं सदी से जैसे-जैसे खेती बढ़ी और ज़्यादा आबादी को सहारा दे पाई, नगर फिर से बसने लगे। जिन किसानों के पास बेचने लायक अतिरिक्त अनाज होता था, उन्हें बेचने की जगह चाहिए थी, इससे हाट-मेले और छोटे बाज़ार-केंद्र बनने लगे, जो धीरे-धीरे नगर जैसा रूप लेने लगे: एक चौक, एक चर्च, दुकानों वाली सड़कें, और नगर चलाने वालों के लिए एक दफ़्तर। नगर में लोग सेवा की जगह लॉर्ड को कर देते थे।
“नगर की हवा स्वतंत्र बनाती है” एक मशहूर कहावत थी: अगर कोई सर्फ एक साल और एक दिन तक नगर में छिपा रह जाए तो वह आज़ाद हो जाता था। नगरों में स्वतंत्र किसान, भागे हुए सर्फ (जो अकुशल मज़दूरी करते थे), दुकानदार, व्यापारी और बाद में साहूकार-वकील जैसे कुशल लोग भी बसने लगे। बड़े नगरों की आबादी करीब 30,000 तक होती थी, इतनी कि इन्हें एक संभावित “चौथा वर्ग” तक कहा गया।
श्रेणी (गिल्ड) हर हुनर या उद्योग का अपना संगठन था, जो उत्पाद की गुणवत्ता, कीमत और बिक्री पर नज़र रखता था। “श्रेणी सभागार” हर नगर की एक इमारत होती थी, जहाँ समारोह होते और सभी श्रेणियों के मुखिया औपचारिक रूप से मिलते थे।
ग्यारहवीं सदी तक पश्चिम एशिया के साथ नए व्यापार-मार्ग बन रहे थे; स्कैंडिनेवियाई व्यापारी फ़र और शिकारी बाज़ के बदले कपड़ा लेने दक्षिण की तरफ़ आते थे, और अंग्रेज़ व्यापारी राँगा बेचने आते थे। बारहवीं सदी तक फ्रांस में व्यापार-शिल्प बढ़ने लगा, और कारीगर अब एक मेनर से दूसरे मेनर भटकने की बजाय एक ही जगह बस जाना बेहतर समझने लगे। जैसे-जैसे व्यापार फैला, नगर के व्यापारी अमीर और ताक़तवर होते गए, और अभिजातों को टक्कर देने लगे।
7.2 कैथीड्रल-नगर
अमीर व्यापारी अक्सर चर्चों को दान देकर अपना पैसा खर्च करते थे। बारहवीं सदी से फ्रांस में कैथीड्रल नाम के बड़े चर्च बनने लगे, ये मठों की संपत्ति होते थे पर इन्हें बनाने में कई लोगों का श्रम, सामान और पैसा लगता था। पत्थर से बने ये कैथीड्रल पूरे होने में सालों लगाते थे, और जैसे-जैसे बनते जाते, आसपास का इलाका ज़्यादा बसता जाता; बनकर तैयार होने पर ये तीर्थ-स्थल बन जाते, और इनके चारों ओर छोटे नगर बस जाते।
कैथीड्रल इस तरह बनाए जाते थे कि पादरी की आवाज़ और भिक्षुओं का गायन साफ़ सुनाई दे, और घंटियाँ दूर तक लोगों को प्रार्थना के लिए बुला सकें। खिड़कियों में रंगीन शीशे लगते थे, जो दिन में सूरज की रोशनी से अंदर चमकदार दिखते और रात में मोमबत्तियों की रोशनी से बाहर से भी दिखाई देते; इन शीशों पर बनी तस्वीरें बाइबल की कहानियाँ सुनातीं, जिन्हें अनपढ़ लोग भी “पढ़” सकते थे।
“…हमने अलग-अलग इलाकों के कुशल कारीगरों से तरह-तरह की शानदार नयी खिड़कियाँ बनवाईं… इनकी रक्षा के लिए हमने एक शिल्पकार और एक सुनार नियुक्त किए… जो कभी भी इन कलाकृतियों की देखभाल में कोताही न करें।”
एबट सुगेर (1081-1151), पेरिस के पास सेंट डेनिस के ऐबी के पुनर्निर्माण के बारे में लिखते हुए
7.3 चौदहवीं सदी के संकट के तीन कारण
चौदहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप का आर्थिक विस्तार धीमा पड़ गया, इसकी तीन आपस में जुड़ी वजहें थीं।
ब्लैक डैथ 1347 से 1350 के बीच पश्चिमी यूरोप में फैली ब्यूबोनिक प्लेग की महामारी थी, जो व्यापारी जहाज़ों पर सवार चूहों के ज़रिए आई। आधुनिक अनुमान के मुताबिक इसमें यूरोप की करीब 20% आबादी मारी गई, कुछ जगहों पर यह आँकड़ा 40% तक भी पहुँचा।
“कितने ही बहादुर पुरुष और सुंदर स्त्रियाँ अपने परिवार के साथ नाश्ता करके उसी रात परलोक में अपने पुरखों के साथ भोजन कर रहे थे!… वे हज़ारों की तादाद में रोज़ बीमार पड़ते और बिना किसी मदद के मर जाते… पवित्र कब्रिस्तान इतनी लाशों के लिए काफ़ी नहीं थे, इसलिए सैकड़ों शव बड़े-बड़े गड्ढों में डालकर, जहाज़ के माल की तरह, ऊपर से थोड़ी मिट्टी डाल दी जाती थी।”
जिओवानी बोकाचियो (1313-75), इतालवी लेखक, ब्लैक डैथ के बारे में
व्यापार-केंद्र होने के कारण नगर सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए, और मठ-आश्रम जैसे बंद समुदायों में एक व्यक्ति के बीमार पड़ते ही लगभग सब बीमार हो जाते थे। प्लेग ने सबसे ज़्यादा शिशुओं, जवानों और बुज़ुर्गों की जान ली, और 1360-70 के दशक में इसकी छोटी लहरें फिर आईं। यूरोप की आबादी 1300 के 7.3 करोड़ से घटकर 1400 में 4.5 करोड़ रह गई।
7.4 सामाजिक असंतोष और किसान विद्रोह
आबादी घटने से मज़दूरों की भारी कमी हो गई: खरीदार कम होने से कृषि-मूल्य गिरे, जबकि मज़दूरी तेज़ी से बढ़ी, इंग्लैंड में ब्लैक डैथ के बाद कृषि-मज़दूरी में 250 प्रतिशत तक इज़ाफ़ा हुआ, और बचे हुए मज़दूर पुरानी दर से दुगुनी मज़दूरी माँग सकते थे। इससे लॉर्ड की आमदनी बुरी तरह घटी, और बेबस होकर कई लॉर्डों ने नकद लगान छोड़कर पुरानी बेगार-सेवा फिर लागू करने की कोशिश की। किसानों ने इसका हिंसक विरोध किया: 1323 में फ़्लैंडर्स, 1358 में फ्रांस, और 1381 में इंग्लैंड में विद्रोह भड़के।
ये विद्रोह बेरहमी से कुचल दिए गए, फिर भी दिलचस्प बात यह है कि ये सबसे ज़्यादा हिंसक उन्हीं इलाकों में हुए जो पहले के आर्थिक विस्तार से सबसे ज़्यादा फले-फूले थे, यानी किसान अपनी पहले की कमाई को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे। कड़े दमन के बावजूद पुराने सामंती रिश्ते पूरी तरह वापस नहीं लाए जा सके: नकदी पर टिकी अर्थव्यवस्था अब इतनी आगे बढ़ चुकी थी कि उसे पलटा नहीं जा सकता था।
7.5 समयरेखा: ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी
8राजनीतिक बदलाव
8.1 “नए शासकों” का उदय
पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में यूरोपीय राजाओं ने अपनी सैनिक और आर्थिक ताक़त बढ़ाई, और ऐसे मज़बूत राज्य बनाए जो यूरोप के लिए उतने ही अहम थे जितने उस दौर के आर्थिक बदलाव। इतिहासकार इन शासकों को “नए शासक” कहते हैं।
| शासक | राज्य |
|---|---|
| लुई ग्यारहवें (1461-83) | फ्रांस |
| ईसाबेला और फ़रडीनेंड | स्पेन |
| हेनरी सप्तम | इंग्लैंड |
| मैक्समिलन | ऑस्ट्रिया |
किताब इस दौर को “नए शासक” (New Monarchy) कहती है और इसे अलग से, हर राज्य के हिसाब से बताती है, किसी एक शासक के अपने शासनकाल के हिसाब से नहीं:
| राज्य | नए शासकों का दौर |
|---|---|
| फ्रांस | 1461-1559 |
| स्पेन | 1474-1556 |
| इंग्लैंड | 1485-1547 |
ये निरंकुश शासक स्थायी सेना, स्थायी नौकरशाही और राष्ट्रीय कर-व्यवस्था खड़ी करते गए, और स्पेन-पुर्तगाल ने समुद्र-पार विस्तार भी शुरू किया। इनकी कामयाबी की सबसे बड़ी वजह थी वैसलेज और सामंतशाही की पुरानी व्यवस्था का बिखरना, साथ में धीमी आर्थिक वृद्धि, जिसने राजाओं को पहली बार अपनी ताक़त बढ़ाने का असली मौका दिया। सामंती सेना की जगह अब बंदूक-तोप से लैस प्रशिक्षित पैदल सेना ने ले ली, जो सीधे राजा के अधीन थी, और अभिजातों का विरोध राजा की इस नई ताक़त के सामने टूटता चला गया।
याद रखिए “शाही निरंकुशता” को “सामंतवाद का ही एक बदला हुआ रूप” क्यों कहा जाता है: वही लॉर्ड वर्ग जो सामंतवाद में शासक थे, नए दौर में भी राजनीति पर छाए रहे, बस अब वे राजा के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि स्थायी प्रशासनिक पदों वाले वफ़ादार अधिकारी बन गए।
अभिजात वर्ग ने चतुराई से पाला बदला, नए शासन के विरोधी की जगह वे जल्दी ही राजभक्त बन गए, और उन्हें प्रशासनिक सेवा में स्थायी पद मिल गए। अब राजा किसी ऐसे पिरामिड के शिखर पर नहीं था जो निजी वफ़ादारी पर टिका हो; वह अब एक बड़े दरबारी समाज और आश्रयदाता-अनुयायी तंत्र के केंद्र में था, जहाँ आश्रय पाने का ज़रिया पैसा बन गया था। इससे व्यापारियों और साहूकारों जैसे ग़ैर-अभिजात लोगों को भी दरबार में जगह मिलने लगी, क्योंकि वे राजाओं को कर्ज़ देते थे, जिससे राजा सैनिकों को तनख्वाह देते थे, यानी नयी राज्य-व्यवस्था में ग़ैर-सामंती तत्वों के लिए भी जगह बन गई।
8.2 फ्रांस और इंग्लैंड: अलग-अलग राहें
फ्रांस
- 1614: बालक राजा लुई तेरहवें के दौर में एस्टेट्स जनरल की सभा बुलाई गई, इसमें पादरी, अभिजात और “बाकी सब” के लिए तीन अलग सदन थे
- इसके बाद लगभग दो सदी तक, 1789 तक, दोबारा नहीं बुलाई गई
- राजा तीनों वर्गों के साथ अपनी ताक़त बाँटना नहीं चाहते थे
- आज: गणतंत्र
इंग्लैंड
- 1066 से भी पहले एंग्लो-सैक्सन लोगों की एक महान परिषद थी, जिसकी सलाह के बिना राजा कर नहीं लगा सकता था
- यही आगे चलकर पार्लियामेंट बनी: हाउस ऑफ लॉर्ड्स (लॉर्ड और पादरी) और हाउस ऑफ कामन्स (नगर और गाँव)
- चार्ल्स प्रथम ने 11 साल (1629-40) बिना पार्लियामेंट बुलाए राज किया, बाद में उन्हें मृत्युदंड दिया गया और गणतंत्र बना; फिर राजतंत्र लौटा, पर शर्त यह थी कि पार्लियामेंट नियमित बुलाई जाएगी
- आज: राजतंत्र
एस्टेट्स जनरल फ्रांस की शाही सलाहकार सभा थी, जिसमें पादरी, अभिजात और “बाकी सब” के लिए तीन अलग सदन थे। पार्लियामेंट इंग्लैंड की वैसी ही संस्था थी, जिसमें हाउस ऑफ लॉर्ड्स (लॉर्ड और पादरी) और हाउस ऑफ कामन्स (नगर और गाँव का प्रतिनिधित्व) शामिल थे।
आज फ्रांस में गणतंत्र है और इंग्लैंड में राजतंत्र, और इसकी वजह सीधे सत्रहवीं सदी के बाद दोनों देशों के इतिहास की अलग-अलग दिशाओं में जाना है।
- मध्यकालीन यूरोप के “तीन वर्ग” थे: पादरी (जो प्रार्थना करते थे), अभिजात (जो लड़ते थे) और किसान (जो काम करते थे)
- मार्क ब्लॉक ने सामंतवाद के अध्ययन की शुरुआत की, यह एक भूमि-आधारित व्यवस्था थी जिसकी जड़ें रोम और शार्लमेन के दौर तक जाती हैं, पर पूरी तरह स्थापित 11वीं सदी में ही हुई
- अभिजात वैसलेज के ज़रिए ज़मीन रखते थे; लॉर्ड के मेनर में उसके अपने खेत और किसानों के खेत दोनों होते थे, साथ में फ़ीफ़ रखने वाले नाइट भी सेवा देते थे
- चर्च (पहला वर्ग) टीथ वसूलता और पल्ली-जीवन चलाता था; भिक्षु-भिक्षुणी सेंट बेनेडिक्ट (529) और क्लूनी (910) जैसे मठों में अलग रहते थे
- किसान (तीसरा वर्ग) या तो स्वतंत्र थे (श्रम-सेवा और सैनिक-सेवा देते) या सर्फ (लॉर्ड की ज़मीन से बँधे, चक्की-तंदूर-मदिरा-संपीडक शुल्क देकर इस्तेमाल करते)
- इंग्लैंड में सामंतवाद 1066 की नॉरमन विजय के बाद ही आया; विलियम प्रथम ने 180 नॉरमन अभिजातों में ज़मीन बाँटी
- नयी तकनीक (लोहे का हल, तीन-खेत व्यवस्था) ने 11वीं सदी से खाद्य उत्पादन लगभग दुगुना कर दिया, जिससे जनसंख्या और नगर दोनों बढ़े, और शायद एक “चौथा वर्ग” भी बना
- 14वीं सदी में संकट आया: खराब जलवायु, मुद्रा की कमी, और ब्लैक डैथ (1347-50), जिसने यूरोप की करीब 20% आबादी ली और फ़्लैंडर्स (1323), फ्रांस (1358), इंग्लैंड (1381) में किसान विद्रोह भड़काए
- 15वीं सदी से “नए शासकों” (लुई ग्यारहवें, हेनरी सप्तम, ईसाबेला-फ़रडीनेंड) ने स्थायी सेना और कर-व्यवस्था वाले केंद्रीकृत राज्य बनाए, सामंती सेना की जगह ली
- फ्रांस की एस्टेट्स जनरल 1614 से 1789 तक दोबारा नहीं बुलाई गई; इंग्लैंड की पार्लियामेंट चार्ल्स प्रथम के मृत्युदंड के बाद और मज़बूत हुई, यही वजह है कि आज फ्रांस गणतंत्र है और इंग्लैंड राजतंत्र
- क्या मैं सामंतवाद को परिभाषित कर सकता/सकती हूँ, और बता सकता/सकती हूँ कि यह सिर्फ आर्थिक क्यों नहीं था?
- क्या मैं वैसलेज को समझा सकता/सकती हूँ और उसकी रस्म का वर्णन कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं बता सकता/सकती हूँ कि मेनर की जागीर में क्या-क्या होता था, और यह पूरी तरह आत्मनिर्भर क्यों नहीं थी?
- क्या मैं फ़ीफ़ को समझा सकता/सकती हूँ, और नाइट को बदले में क्या देना पड़ता था?
- क्या मैं टीथ बता सकता/सकती हूँ, और यह भी कि पादरी कौन नहीं बन सकता था?
- क्या मैं स्वतंत्र किसान और सर्फ का फ़र्क समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं तीन-खेत व्यवस्था और उससे उत्पादन क्यों बढ़ा, यह समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं “नगर की हवा स्वतंत्र बनाती है” और श्रेणी (गिल्ड) का काम समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं 14वीं सदी के संकट के तीन कारण और ब्लैक डैथ की तारीखें बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि फ्रांस और इंग्लैंड की सरकार अलग-अलग क्यों बनीं?
- 3 अंकफ्रांस के शुरुआती सामंती समाज की दो विशेषताएँ बताइए।
- 4 अंकजनसंख्या के स्तर में लंबे समय के बदलावों ने यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को कैसे प्रभावित किया?
- 3 अंकनाइट एक अलग वर्ग क्यों बने, और उनका महत्व कब कम हुआ?
- 3 अंकमध्यकालीन मठों का क्या काम था?
- 6 अंकमध्यकालीन फ्रांस के किसी नगर में एक कारीगर के एक दिन की कल्पना करके उसका वर्णन कीजिए।
- 6 अंकफ्रांस के सर्फ और रोम के दास की जीवन-दशाओं की तुलना कीजिए।
- 4 अंकबताइए कि तीन-खेत व्यवस्था दो-खेत व्यवस्था से किस तरह बेहतर थी, और इसके क्या असर पड़े।
- 4 अंकचौदहवीं सदी के यूरोपीय संकट के तीन कारण कौन-से थे?
- 1 अंक“सामंतवाद” शब्द जिस जर्मन शब्द से बना है उसका अर्थ है:
(क) एक लॉर्ड(ख) भूमि का एक टुकड़ा(ग) एक सैनिक(घ) एक वचन - 1 अंककिसान की साल भर की उपज के दसवें हिस्से पर चर्च के अधिकार को कहा जाता था:
(क) टैली(ख) फ़ीफ़(ग) टीथ(घ) श्रेणी-शुल्क - 1 अंकबरगंडी में 910 में बना कौन-सा मठ मध्यकालीन यूरोप के सबसे मशहूर मठों में से एक बना?
(क) सेंट बेनेडिक्ट का मठ(ख) क्लूनी(ग) कैंटरबरी(घ) कारटेस - 1 अंकब्लैक डैथ ने पश्चिमी यूरोप को किन वर्षों में तबाह किया?
(क) 1315-17(ख) 1338-1461(ग) 1347-50(घ) 1381
CBSE के हर अभिकथन-कारण (A-R) प्रश्न में यही चार विकल्प होते हैं: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या करता है; (ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की व्याख्या नहीं करता; (ग) A सही है, पर R ग़लत है; (घ) A ग़लत है, पर R सही है। पहले तय कीजिए A सही है या नहीं, फिर R, फिर यह कि R वाकई A को समझाता है या नहीं।
कारण (R): सर्फ लॉर्ड की ज़मीन से बँधा होता था और बिना लॉर्ड की इजाज़त के जागीर छोड़ नहीं सकता था।
कारण (R): ये विद्रोह उन्हीं इलाकों में सबसे तीव्र थे जो पहले के आर्थिक विस्तार से सबसे ज़्यादा फले-फूले थे, क्योंकि किसान अपनी पहले की कमाई बचाने की कोशिश कर रहे थे।