- दबाव असल में है क्या, और एक ही घटना किसी के लिए चुनौती और किसी दूसरे के लिए ख़तरा क्यों बन जाती है
- शरीर दबाव पर शरीरक्रियात्मक (शरीर के अंदर), संवेगात्मक (भावनाओं में), संज्ञानात्मक (सोच में) और व्यवहारात्मक (व्यवहार में) रूप से कैसे प्रतिक्रिया करता है, और सामान्य अनुकूलन संलक्षण (GAS) क्या है
- दबाव प्रतिरक्षक तंत्र को कैसे कमज़ोर करता है और लंबे समय में स्वास्थ्य को कैसे नुकसान पहुँचाता है
- दबाव का सामना करने के अलग-अलग तरीके, और कौन-सी तकनीकें असल में दबाव को नियंत्रित करती हैं
- वे जीवन कौशल और कारक जो सकारात्मक स्वास्थ्य और स्थिति स्थापन (resilience) बनाते हैं
CBSE कक्षा 12 मनोविज्ञान बोर्ड परीक्षा में इस अध्याय की थ्योरी का भार 9 अंक है (सात यूनिट में से यूनिट III)। कक्षा 12 मनोविज्ञान में 30 अंकों का प्रायोगिक (practical) घटक भी है (एक केस प्रोफाइल फ़ाइल, पाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षण देना और उनकी व्याख्या करना, और वाइवा वॉइस)। ये नोट्स केवल 70 अंकों के थ्योरी पेपर को कवर करते हैं।
1दबाव की प्रकृति, प्रकार और स्रोत
राज कल सुबह होने वाली अपनी अंतिम परीक्षा से पहले रात एक बजे तक पढ़ता रहता है, फिर सो नहीं पाता, ठीक से तैयारी न करने के लिए खुद को कोसता है, और परीक्षा हॉल में धड़कते दिल और “खाली” दिमाग़ के साथ पहुँचता है।
आप में से कुछ लोगों ने राज के समान कभी-न-कभी अनुभव किया होगा। जीवन में चुनौतियाँ लगातार आती रहती हैं, पर हर चुनौती दबाव उत्पन्न करने वाली नहीं होती; बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि उस चुनौती को कैसे देखा जाता है।
1.1 दबाव क्या है?
दबाव (stress) शब्द दो लैटिन शब्दों से बना है: strictus (कसा हुआ या तंग) और stringere (कसना)। यही वह कसावट है जो दबाव में रहने वाले लोग अपनी मांसपेशियों और साँस में महसूस करते हैं।
दबावकारक (stressor) वे घटनाएँ हैं जो शरीर से दबाव अनुक्रिया (response) करवाती हैं। किसी बाहरी दबावकारक के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को तनाव (strain) कहते हैं।
दबाव (stress) को किसी उद्दीपक (stimulus) घटना के प्रति जीव द्वारा दी गई उन अनुक्रियाओं के प्रतिमान (pattern) के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जो उसकी समस्थिति (homeostasis, यानी शरीर का संतुलन) को बिगाड़ देती है और उसकी सामना करने की क्षमता से आगे निकल जाती है। हैंस सेल्ये, जिन्हें “आधुनिक दबाव शोध का जनक” कहा जाता है, ने दबाव को “किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट (non-specific) अनुक्रिया” बताया, यानी शरीर हर कारण पर लगभग एक जैसे शरीरक्रियात्मक ढंग से प्रतिक्रिया करता है। कई शोधकर्ता इससे सहमत नहीं हैं, क्योंकि अलग-अलग दबावकारक और अलग-अलग व्यक्ति असल में अलग-अलग तरह की दबाव-प्रतिक्रिया दिखाते हैं।
पुस्तक का चित्र 3.1 (दबाव का मनोवैज्ञानिक अर्थ) यह क्रम दिखाता है: दबावकारक (घटना) से दबाव पैदा होता है, और बाहरी दबावकारक के प्रति प्रतिक्रिया को तनाव (strain) कहते हैं।
यूस्ट्रेस (eustress)
- दबाव का वह स्तर जो आपके लिए अच्छा है
- सर्वोत्तम प्रदर्शन के लिए व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी में से एक
- छोटे-मोटे संकटों को संभालने में मदद करता है
व्यथा (distress)
- यूस्ट्रेस समय के साथ व्यथा में बदल सकता है
- शरीर की टूट-फूट का कारण बनती है
- दबाव का हानिकारक, नुकसानदायक रूप
दबाव आमतौर पर दो चरणों में बनता है: पहले घटना को आँकना (प्राथमिक मूल्यांकन) और फिर अपने साधनों को परखना (द्वितीयक मूल्यांकन), जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है:

दबाव बिजली जैसा है: यह ऊर्जा देता है, भाव-प्रबोधन बढ़ाता है और प्रदर्शन को प्रभावित करता है। पर अगर विद्युत धारा बहुत तेज़ हो तो बल्ब फ़्यूज़ हो सकते हैं और उपकरण खराब हो सकते हैं; इसी तरह ज़्यादा दबाव प्रदर्शन बिगाड़ देता है, और बहुत कम दबाव में व्यक्ति सुस्त और कम अभिप्रेरित रह जाता है। हर दबाव बुरा नहीं होता; “क्या दबाव हमेशा नुकसानदायक होता है?” जैसे प्रश्न में यही उपमा लिखिए।
दबाव सिर्फ़ व्यक्ति के अंदर या सिर्फ़ वातावरण में नहीं बैठा होता, बल्कि यह एक चलती हुई प्रक्रिया है: व्यक्ति लगातार अपने सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण के साथ लेन-देन करता रहता है, हर घटना को परखता है, और सामने आई चीज़ का सामना करने की कोशिश करता है।
1.2 दबाव प्रक्रिया: मूल्यांकन, साधन और घटना के आयाम
लेज़ारस का दबाव का संज्ञानात्मक सिद्धांत बताता है कि एक ही घटना किसी एक व्यक्ति को दबाव में क्यों डाल देती है और दूसरे को नहीं: व्यक्ति की अनुक्रिया बहुत सीमा तक इस पर निर्भर करती है कि घटना को कैसे देखा और आँका जाता है और उससे निपटने के लिए कितने साधन उपलब्ध हैं। परिणाम घटना पर भी निर्भर करता है: उसकी तीव्रता, अवधि, जटिलता और भविष्यकथनीयता पर (नीचे के चार आयाम)।
प्राथमिक मूल्यांकन किसी नई या बदलती हुई परिस्थिति को सकारात्मक, तटस्थ या नकारात्मक मानकर देखना है। नकारात्मक घटनाओं को नुकसान (पहले ही हो चुकी क्षति), खतरा (आगे संभावित क्षति) या चुनौती (सामना कर पाने का, यहाँ तक कि घटना से फ़ायदा उठा पाने का भरोसा) के रूप में आँका जाता है। द्वितीयक मूल्यांकन इस बात का आकलन है कि इस नुकसान, खतरे या चुनौती से निपटने के लिए अपने साधन और क्षमताएँ कितनी हैं।
ये मूल्यांकन आत्मनिष्ठ (subjective) होते हैं और इन पर निर्भर करते हैं: मिलती-जुलती परिस्थितियों का पूर्व अनुभव (पहले भी अच्छे से संभाल लिया था तो अब कम डरावना लगता है), नियंत्रणीयता की भावना (घटना की शुरुआत या नतीजे पर नियंत्रण होने का भरोसा दबाव को कम करता है), और आत्मविश्वास/आत्म-दक्षता (self-efficacy) (यही तय कर सकता है कि वही घटना “खतरे” जैसी लगे या “चुनौती” जैसी)।
तीव्रता
कम तीव्रता बनाम अधिक तीव्रता। ज़्यादा तीव्र दबाव ज़्यादा नुकसानदेह है
अवधि
अल्पकालिक बनाम दीर्घकालिक। लंबे समय तक चला दबाव ज़्यादा भारी पड़ता है
जटिलता
कम जटिल बनाम अधिक जटिल। जटिल दबाव ज़्यादा मुश्किल होता है
भविष्यकथनीयता (predictability)
अचानक आया बनाम पहले से अनुमानित। अनपेक्षित दबाव ज़्यादा भारी लगता है
किसी दबाव का परिणाम इस पर भी निर्भर करता है कि इन आयामों पर उस विशिष्ट दबावपूर्ण अनुभव का स्थान क्या है: प्रायः अधिक तीव्र, दीर्घकालिक, जटिल और अप्रत्याशित दबाव अधिक नकारात्मक परिणाम देते हैं। दबाव के प्रति व्यक्ति की सुभेद्यता (vulnerability) कई और बातों पर भी निर्भर करती है: शारीरिक स्वास्थ्य और संरचना, मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ (मानसिक स्वास्थ्य, स्वभाव, आत्म-अवधारणा), सांस्कृतिक संदर्भ जो यह तय करता है कि किस तरह की प्रतिक्रिया “उम्मीद के मुताबिक” मानी जाएगी, और उपलब्ध साधन (पैसा, सामाजिक कौशल, सामना करने का तरीका, सहयोग-तंत्र)।
1.3 शरीर की प्रतिक्रिया: शरीरक्रियात्मक पथ
शरीरक्रियात्मक स्तर पर, हाइपोथैलेमस दो पथों से दबाव अनुक्रिया शुरू करता है:
शरीरक्रियात्मक
एड्रीनलीन और कॉर्टिसोल बढ़ जाते हैं; हृदय गति, रक्तचाप, चयापचय ऊपर चला जाता है
संवेगात्मक
भय, दुश्चिंता, उलझन (embarrassment), क्रोध, अवसाद, यहाँ तक कि नकार (denial) भी
व्यवहारात्मक
संघर्ष (दबावकारक का मुकाबला) या पलायन (खतरनाक घटना से पीछे हट जाना); घटना के अनुसार लगभग असीमित रूप ले सकता है
संज्ञानात्मक
घटना के नुकसान/खतरे/नियंत्रणीयता को लेकर मान्यताएँ; ध्यान केंद्रित न कर पाना; बार-बार आने वाले, अनचाहे या भयावह विचार
शारीरिक, संवेगात्मक और व्यवहारात्मक चेतावनी-संकेत व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होते हैं: ध्यान केंद्रित न कर पाना, स्मृति ह्रास, गलत निर्णयन, विसंगति, अनियमित उपस्थिति तथा समय पालन, आत्म-सम्मान में कमी, दुर्बल दीर्घकालिक योजना, अचानक व्यग्र ऊर्जा का फट पड़ना, भावदशा में भारी परिवर्तन, भावात्मक विस्फोट, आकुलता, दुश्चिंता, भय, अवसाद, नींद और खाने में कठिनाई, औषधियों का दुरुपयोग, और पेट खराब होना, सिरदर्द या कमर दर्द जैसे शारीरिक रोग। कोई भी लक्षण दबाव की प्रबलता बता सकता है, जिसका निराकरण न किया जाए तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। (क्रियाकलाप 3.1: अपने ऊपर लागू होने वाले लक्षणों पर निशान लगाइए और छोटे समूह में चर्चा कीजिए कि इन्हें कैसे घटाया जाए।)
1.4 दबाव के प्रकार
तीनों प्रकार एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। कुंठा (frustration) ज़रूरतों और उद्देश्यों के रुक जाने से पैदा होती है (सामाजिक भेदभाव, कम अंक)। द्वंद्व (conflict) असंगत ज़रूरतों, उद्देश्यों या मूल्यों के बीच होता है (डांस पढ़ूँ या मनोविज्ञान?)। सामाजिक दबाव व्यक्ति-व्यक्ति में बहुत अलग होता है: एक पार्टी अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए दबाव है, तो घर पर रहना बहिर्मुखी व्यक्ति के लिए दबाव बन जाता है।
1.5 दबाव के स्रोत
जीवन घटनाएँ
बड़े बदलाव, चाहे योजना बनाकर हों (घर बदलना) या अचानक (रिश्ता टूटना), जो रोज़मर्रा को बिगाड़ देते हैं। थोड़े ही समय में कई घटनाएँ घट जाएँ तो उनका सामना करना कठिन हो जाता है
परेशान करने वाली घटनाएँ (hassles)
निजी, रोज़ की झुँझलाहटें: शोरगुल वाला माहौल, आना-जाना, झगड़ालू पड़ोसी, ट्रैफ़िक। अकेले झेलनी पड़े तो ये बहुत भारी पड़ती हैं
अभिघातज (traumatic) घटनाएँ
अग्निकांड, रेलगाड़ी या सड़क दुर्घटना, लूट, भूकंप, सुनामी। असर देर से सामने आ सकता है और दुश्चिंता, अतीतावलोकन, स्वप्न या अंतर्वेधी विचारों के रूप में बना रह सकता है; पेशेवर मदद ज़रूरी हो सकती है
होम्स तथा राहे ने दबाव मापने की मूल जीवन-घटना मापनी बनाई थी। सिंह, कौर तथा कौर ने भारतीय जनसंख्या के लिए इसे ढालकर संभावित दबावपूर्ण जीवन घटना मापनी (Presumptive Stressful Life Events Scale, PSLES) बनाई, जो 51 मदों की स्व-निर्धारण प्रश्नावली है; हर जीवन घटना को गंभीरता के आधार पर एक संख्यात्मक “औसत दबाव अंक” दिया गया है।
| जीवन घटना | औसत दबाव अंक |
|---|---|
| परिवार के किसी क़रीबी सदस्य की मृत्यु | 66 |
| अप्रत्याशित दुर्घटना या आघात | 53 |
| परिवार के किसी सदस्य की बीमारी | 52 |
| किसी मित्र से रिश्ता टूटना | 47 |
| परीक्षा देना | 43 |
| खाने-पीने की आदतों में बदलाव | 27 |
इसी मापनी के कुछ और उदाहरण अंक: जीवनसाथी की मृत्यु को 95, व्यक्तिगत बीमारी/चोट को 56, और सोने की आदतों में बदलाव को 33 अंक दिए गए हैं। बिना बीमार पड़े एक व्यक्ति साल में औसतन जितनी दबावपूर्ण जीवन घटनाएँ झेल लेता है, वह संख्या लगभग दो है। इसमें सकारात्मक तथा नकारात्मक, दोनों प्रकार की घटनाएँ शामिल की जाती हैं, क्योंकि दोनों तरह के परिवर्तन दबाव उत्पन्न करते हैं। जीवन घटनाओं और किसी विशेष बीमारी के बीच निम्न स्तर का ही सहसंबंध (correlation) पाया जाता है, यानी साहचर्य कमज़ोर है, और यह भी चर्चा का विषय है कि जीवन घटनाएँ बीमारी लाती हैं या दबाव ही जीवन घटनाओं और बीमारी को जन्म देता है। अधिकांश जीवन घटनाओं का प्रभाव व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्न होता है; इसलिए वह आयु जब घटना का प्रथम अनुभव हुआ, घटना की आवृत्ति, उसकी अवधि तथा सामाजिक अवलंब का अध्ययन ज़रूरी है।
क्रियाकलाप 3.2: अपने दो सहपाठियों के साथ पिछले एक वर्ष की दबावपूर्ण घटनाओं को 1 से 5 तक क्रम दीजिए, तीनों में समान घटनाएँ चुनिए, और देखिए कि उनसे निपटने के लिए आपके पास कितनी योग्यता, कौशल और पारिवारिक अवलंब है।
2दबाव का मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों और स्वास्थ्य पर प्रभाव
2.1 दबाव के चार प्रभाव
संवेगात्मक
मिज़ाज के उतार-चढ़ाव, अनियमित व्यवहार जो परिवार और दोस्तों से दूरी बढ़ा देता है; घटता आत्मविश्वास गहरी संवेगात्मक समस्याओं के दुष्चक्र में बदल सकता है
शरीरक्रियात्मक
बढ़ा हुआ एड्रीनलीन और कॉर्टिसोल हृदय गति, रक्तचाप, चयापचय बदल देता है: थोड़ी देर के लिए फ़ायदेमंद, लंबे समय में नुकसानदेह। उदाहरण: एपिनेफ़्रीन और नॉरएपिनेफ़्रीन छोड़ना, पाचक तंत्र की धीमी गति, फेफड़ों में वायुमार्ग का विस्तार, हृदयगति में वृद्धि तथा रक्त-वाहिकाओं का सिकुड़ना
संज्ञानात्मक
मानसिक अधिभार, ध्यान लगाने में कमी, अल्पकालिक स्मृति घटना; घर, करियर या काम में ग़लत फ़ैसले
व्यवहारात्मक
कम पौष्टिक भोजन, कैफ़ीन, सिगरेट, मद्य तथा उपशामक (tranquillisers) जैसी औषधियों का अत्यधिक सेवन; निद्रा-प्रतिरूप बिगड़ना, अनुपस्थिति, कार्य निष्पादन गिरना। उपशामक औषधियाँ व्यसन बन सकती हैं और एकाग्रता में कठिनाई, समन्वय में कमी तथा चक्कर जैसे प्रभाव ला सकती हैं
यह एक आम परिघटना है: परीक्षा से पहले, उसके दौरान या बाद में तनाव या बेचैनी महसूस होना। सामान्य मात्रा में यह प्रेरित कर सकती है और ध्यान तेज़ कर सकती है। परीक्षा दुश्चिंता को “मूल्यांकन आशंका” (evaluative apprehension) या “मूल्यांकन दबाव” कहकर अभिलक्षित किया जाता है। परीक्षा के दबाव से परीक्षण दुश्चिंता (test anxiety) उत्पन्न हो सकती है, जो परीक्षा के निष्पादन पर बुरा असर डालती है: जिन विद्यार्थियों में परीक्षण दुश्चिंता प्रबल होती है, वे मूल्यांकन वाली स्थितियों को अपने लिए व्यक्तिगत ख़तरा मानते हैं, तनावग्रस्त और उत्तेजित बने रहते हैं, और उनके नकारात्मक स्व-केंद्रित विचार ध्यान भटका देते हैं। काम में पूरी तरह जुटने की बजाय वे भीतर ही भीतर उलझ जाते हैं, उपलब्ध संकेतों को नज़रअंदाज़ या ग़लत समझ बैठते हैं, या ध्यान का अवरोध महसूस करते हैं, जिससे उनका प्रदर्शन उनकी असली क्षमता से नीचे रह जाता है।
परीक्षा दुश्चिंता को संभालने के लिए किताब यह सुझाव देती है: पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय दीजिए, अपनी ख़ूबियों और कमज़ोरियों की समीक्षा कीजिए, शिक्षकों/सहपाठियों से मुश्किलें साझा कीजिए, पुनरावृत्ति की समय-सारणी बनाइए, अपने नोट्स संक्षिप्त कीजिए, पुनरावृत्ति को फैला कर कीजिए, और सबसे ज़रूरी, परीक्षा के दिन शांत रहिए।
दबाव तथा स्वास्थ्य
अनेक विद्यार्थी परीक्षा-काल में बीमार पड़ जाते हैं (पेट में खराबी, शरीर में दर्द, वमन, अतिसार, बुखार), और जो लोग अपने निजी जीवन में दुखी होते हैं, वे खुश लोगों की अपेक्षा बार-बार बीमार पड़ते हैं। दीर्घकालिक दैनिक दबाव व्यक्ति का ध्यान अपनी देखभाल से हटा सकता है। लंबे समय तक चलता दबाव परिश्रांति (exhaustion) (लगातार थकान, कमज़ोरी, ऊर्जा में कमी: शारीरिक) और चिड़चिड़ापन, दुश्चिंता, असहायता, निराशा (मानसिक) पैदा करता है। शारीरिक, संवेगात्मक और मनोवैज्ञानिक थकावट की इस स्थिति को बर्नआउट कहा जाता है। दबाव प्रतिरक्षक तंत्र में परिवर्तन लाकर बीमार होने की संभावना भी बढ़ाता है: हृदयवाहिका विकार, उच्च रक्तचाप तथा मनोदैहिक विकारों (अल्सर, दमा, एलर्जी, सरदर्द) के विकास में दबाव की भूमिका बताई जाती है।
2.2 सामान्य अनुकूलन संलक्षण (General Adaptation Syndrome, GAS)

सेल्ये ने प्रयोगशाला में पशुओं को लंबे समय तक अलग-अलग दबावकारकों (गर्मी, एक्स-रे, इंसुलिन इंजेक्शन) के सामने रखा और अस्पताल के मरीज़ों को भी देखा, ताकि यह समझा जा सके कि शरीर लंबे समय तक चलने वाले दबाव पर कैसे प्रतिक्रिया करता है: सबमें शरीर की प्रतिक्रिया का एक जैसा प्रतिमान दिखा। उन्होंने इसे सामान्य अनुकूलन संलक्षण कहा।
सेल्ये के मॉडल को आख़िरी सच मानकर मत लिखिए: इसकी आलोचना यह कहकर की जाती है कि इसमें मनोवैज्ञानिक कारकों को बहुत कम जगह दी गई है। व्यक्ति असल में दबाव पर कैसे प्रतिक्रिया करता है, यह उसकी सोच, व्यक्तित्व और शारीरिक बनावट से काफ़ी हद तक तय होता है।
2.3 दबाव और प्रतिरक्षक तंत्र
मनस्तंत्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान (psychoneuroimmunology) मन, मस्तिष्क और प्रतिरक्षक तंत्र के बीच के संबंधों का अध्ययन करता है, ख़ासकर प्रतिरक्षा पर दबाव के असर का। प्रतिरक्षक तंत्र की श्वेत रक्त कोशिकाएँ (ल्यूकोसाइट्स) वायरस जैसे बाह्य तत्वों (एंटीजेन) को पहचानकर नष्ट करती हैं, और रोगप्रतिकारकों (antibodies) का निर्माण भी होता है।
टी-कोशिकाएँ
बाहरी आक्रमणकारियों को सीधे नष्ट करती हैं
टी-सहायक कोशिकाएँ
प्रतिरक्षात्मक क्रियाओं में वृद्धि करती हैं; एड्स का कारक वायरस HIV इन्हीं कोशिकाओं पर हमला करता है
बी-कोशिकाएँ
रोगप्रतिकारकों (antibodies) का निर्माण करती हैं
प्राकृतिक रूप से नष्ट करने वाली कोशिकाएँ
वायरस और ट्यूमर, दोनों से लड़ती हैं
दबाव के कारण प्राकृतिक रूप से नष्ट करने वाली कोशिकाओं की कोशिका-विषाक्तता प्रभावित हो सकती है, जो संक्रमणों तथा कैंसर से रक्षा में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसमें भारी कमी अत्यधिक दबावग्रस्त लोगों में पाई गई है: महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बैठने वाले विद्यार्थी, शोकसंतप्त व्यक्ति और गंभीर रूप से अवसादग्रस्त लोग। जिन लोगों को सामाजिक अवलंब मिलता है, उनकी प्रतिरक्षा-क्रियाशीलता बेहतर पाई जाती है, और प्रतिरक्षक तंत्र के परिवर्तन उन लोगों के स्वास्थ्य को अधिक प्रभावित करते हैं जिनका प्रतिरक्षक तंत्र पहले से दुर्बल है। पुस्तक का चित्र 3.4 (दबाव का बीमारी से संबंध) यह अनुक्रम दिखाता है: नकारात्मक संवेग → दबाव हार्मोन का स्राव → प्रतिरक्षक तंत्र दुर्बल → मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित। मनोवैज्ञानिक दबाव के साथ आने वाले नकारात्मक संवेग (अवसाद, शत्रुता, गुस्सा, आक्रामकता) समय के साथ जमा होते जाते हैं और आतंक हमले (panic attacks) या जुनूनी व्यवहार को न्यौता दे सकते हैं; चिंता कभी-कभी एक शारीरिक अनुभूति के रूप में सामने आती है, जिसे व्यक्ति दिल के दौरे के लिए ग़लत समझ बैठता है। नकारात्मक मनःस्थिति दुर्बल स्वास्थ्य परिणामों से संबद्ध पाई गई है, और निराशा की भावनाओं का संबंध रोगों के और बिगड़ने, चोट के जोखिम और मृत्यु से है।
2.4 जीवन शैली
दबाव व्यक्ति को एक अस्वस्थ जीवन शैली की ओर धकेल सकता है, यानी फ़ैसलों और व्यवहारों का वह पूरा प्रतिमान जो स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता तय करता है। दबावग्रस्त व्यक्ति ख़ुद को रोगजनकों (pathogens) के ज़्यादा संपर्क में लाते हैं, कम पौष्टिक खाते हैं, कम सोते हैं, और धूम्रपान या शराब के दुरुपयोग की ओर ज़्यादा झुकते हैं। ऐसी आदतें धीरे-धीरे बनती हैं क्योंकि ये तुरंत राहत देती हैं, जबकि इनका दीर्घकालिक नुकसान नज़रअंदाज़ हो जाता है। अध्ययन बताते हैं कि स्वास्थ्यवर्धक व्यवहार (संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पारिवारिक अवलंब) अच्छे स्वास्थ्य में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3दबाव का सामना करना
3.1 समस्या-केंद्रित बनाम संवेग-केंद्रित सामना करना
अब यह मान्यता बढ़ती जा रही है कि मनोवैज्ञानिक कुशल-क्षेम (well-being), सामाजिक कार्यशीलता और स्वास्थ्य इस पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति दबाव का सामना कैसे करता है, न कि दबाव कितना है।
सामना करना (coping) दबाव के प्रति एक गत्यात्मक (dynamic), स्थिति-विशिष्ट प्रतिक्रिया है: दबावपूर्ण परिस्थितियों या घटनाओं के प्रति ठोस अनुक्रियाओं का एक सेट, जिसका मक़सद समस्या हल करना और दबाव घटाना है। लेज़ारस और फ़ोकमैन ने सामना करने को व्यक्तित्व का कोई स्थिर गुण नहीं, बल्कि एक गत्यात्मक प्रक्रिया माना: संज्ञानात्मक और व्यवहारात्मक प्रयास जो लगातार बदलते रहते हैं, ताकि दबावपूर्ण घटना की माँगों पर क़ाबू पाया जा सके, उन्हें घटाया जा सके या सहा जा सके।
समस्या-केंद्रित सामना करना
- समस्या पर ही सीधा वार करता है
- जानकारी जुटाता है, घटना या अपनी मान्यताओं/प्रतिबद्धताओं को बदलता है
- घटना के ख़तरे के मूल्य को घटाता है
- जैसे: “मैंने कार्रवाई की योजना बनाई और उस पर चला”
संवेग-केंद्रित सामना करना
- संवेगात्मक उथल-पुथल को सीमित करने की कोशिश करता है
- घटना को बदलने की कोशिश न के बराबर
- उम्मीद बनाए रखता है, संवेगात्मक प्रतिक्रिया संभालता है
- जैसे: “मैंने कुछ ऐसा किया जिससे मन हल्का हो गया”
दबावपूर्ण परिस्थिति में दोनों ज़रूरी हैं, पर शोध बताते हैं कि लोग आम तौर पर समस्या-केंद्रित युक्तियों का अपेक्षाकृत अधिक बार उपयोग करते हैं।
क्रियाकलाप 3.3 में पाँच कथनों (जैसे “मैं अपने संवेगों को खुले और प्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्त करता हूँ”) को 5 (सदा) से 1 (कभी नहीं) तक अंक दिए जाते हैं; प्राप्तांक जितना अधिक, सामना करने की योग्यता उतनी अधिक। क्रियाकलाप 3.4 पूछता है कि आठ व्यवहारों में कौन-से समस्या-केंद्रित हैं: वार्षिक परीक्षा के लिए आवश्यक पुस्तकों का अध्ययन और बड़े आघात के बाद प्रदर्शन सुधारने का प्रयास स्पष्ट रूप से समस्या-केंद्रित हैं; मित्र के साथ समस्या की चर्चा तब समस्या-केंद्रित है जब उद्देश्य सूचना या सलाह पाना हो, और तब संवेग-केंद्रित जब उद्देश्य केवल मन हल्का करना हो।
3.2 एंडलर और पार्कर (Endler and Parker) की तीन सामना करने की युक्तियाँ
एंडलर और पार्कर ने सामना करने की तीन अलग युक्तियाँ बताईं:
कृत्य-अभिविन्यस्त (task-oriented)
परिस्थिति और विकल्पों के बारे में जानकारी जुटाना, प्राथमिकताएँ तय करना, और समस्या पर सीधी कार्रवाई करना
संवेग-अभिविन्यस्त (emotion-oriented)
उम्मीद बनाए रखना, संवेगों पर नियंत्रण रखना, गुस्सा/कुंठा बाहर निकालना, या यह मान लेना कि कुछ भी बदला नहीं जा सकता
परिहार-अभिविन्यस्त (avoidance-oriented)
परिस्थिति की गंभीरता को नकारना या कम करके आँकना; दबावपूर्ण विचारों का सचेतन दमन और उनके स्थान पर आत्म-रक्षित विचार लाना
3.3 दबाव प्रबंधन की तकनीकें
दबाव को “चुपचाप मार डालने वाला” कहा जाता है: यह उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अल्सर, मधुमेह और यहाँ तक कि कैंसर से भी जुड़ा है, यही वजह है कि स्कूल, दफ़्तर और समुदाय अब इसे प्रबंधित करने में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं।
विश्रांति तकनीकें
यह एक सक्रिय कौशल है जो दबाव के लक्षणों तथा उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोग जैसी बीमारियों के प्रभावों को कम करता है; शरीर के निचले हिस्से से शुरू होकर चेहरे की मांसपेशियों तक जाती है; गहरी साँस लेने के साथ मांसपेशी-विश्रांति
ध्यान (meditation)
योगिक विधि: सीखी हुई तकनीकों से ध्यान को दोबारा केंद्रित करना, ताकि चेतना की एक बदली हुई अवस्था तक पहुँचा जा सके, जहाँ बाहरी उद्दीपन का पूरी तरह भान न रहे
बायोफीडबैक
तीन चरण: किसी अनुक्रिया (जैसे हृदय गति) के प्रति जागरूकता बनाना → शांत परिस्थितियों में उसे नियंत्रित करना सीखना → उस नियंत्रण को रोज़मर्रा के जीवन में उतारना
सर्जनात्मक मानस-प्रत्यक्षीकरण (creative visualization)
एक यथार्थवादी लक्ष्य की ओर कल्पना और मनोदृश्य का प्रयोग, शांत मन और बंद आँखों के साथ, ताकि आत्मविश्वास और सर्जनात्मक ऊर्जा बने
संज्ञानात्मक-व्यवहारात्मक तकनीकें
मीचेनबॉम की दबाव संचारण प्रशिक्षण (Stress Inoculation Training), जो नकारात्मक तथा अविवेकी विचारों के स्थान पर तीन चरणों में सकारात्मक तथा सविवेक विचार लाती है: आकलन, दबाव-न्यूनीकरण तकनीकें, और प्रयोग व अनुगमन
व्यायाम
हृदय की कार्यक्षमता, फेफड़ों की कार्यक्षमता, रक्त-संचार और प्रतिरक्षा को बेहतर करता है। हफ़्ते में कम से कम 4 बार, 30 मिनट, वार्म-अप, व्यायाम और कूल-डाउन के साथ
4सकारात्मक स्वास्थ्य और कुशल-क्षेम को बढ़ावा देना
4.1 दृढ़ता: दबाव-प्रतिरोधी व्यक्तित्व
यह संभव नहीं है कि हम जीवन में कुछ समय के लिए तीव्र दबाव उत्पन्न करने वाले किसी व्यक्तिगत संकट का अनुभव किए बिना निकल जाएँ। जो लोग इससे सकारात्मक तरीक़े से निकल जाते हैं, उनमें आमतौर पर रचनात्मक अभिवृत्तियाँ और मज़बूत संवेगात्मक/सामाजिक अवलंब होता है। इस तरह दबाव को संभालना ठीक वैसा ही है जैसे किसी बीमारी के ख़िलाफ़ टीका लगवाना: व्यक्ति भविष्य के संकटों के लिए “दबाव के लिए फ़िट” बन जाता है।
दृढ़ता (hardiness) कोबासा (Kobasa) द्वारा दी गई एक दबाव-प्रतिरोधी व्यक्तित्व गुण की अवधारणा है, यानी अपने बारे में, दुनिया के बारे में और दोनों के आपसी संबंध के बारे में मान्यताओं का एक सेट, जो उन लोगों में पाया जाता है जिनका दबाव ज़्यादा है पर बीमारी कम। इसमें “तीन Cs” शामिल हैं:
प्रतिबद्धता (Commitment)
काम, परिवार, शौक और सामाजिक जीवन के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता
नियंत्रण (Control)
अपने जीवन पर उद्देश्य और दिशा का बोध
चुनौती (Challenge)
जीवन के बदलावों को ख़तरे की बजाय सामान्य और सकारात्मक मानना
ये गुण सबमें स्वाभाविक रूप से नहीं होते; कई लोगों को कुछ ख़ास जीवन कौशल दोबारा सीखने पड़ते हैं।
4.2 जीवन कौशल
आग्रहिता (Assertiveness)
अपने भाव, ज़रूरतें और विचार स्पष्ट और आत्मविश्वास से बताना: बिना संकोच के “नहीं” कह पाने या भावनाएँ खुलकर व्यक्त करने की क्षमता
समय प्रबंधन
आप अपना समय जैसे बिताते हैं, वही आपके जीवन की गुणवत्ता तय करता है। समय का प्रबंधन और प्रत्यायोजन (delegate) सीखने से दबाव घटता है; समय-दबाव कम करने का प्रमुख तरीका समय के प्रत्यक्षण में परिवर्तन लाना है। प्रमुख नियम: समय उन कामों में लगाइए जिन्हें आप महत्व देते हैं या जो लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक हों, यथार्थवादी संतुलन के साथ
सविवेक चिंतन (Rational thinking)
विकृत चिंतन और अविवेकी विश्वासों को चुनौती दीजिए; बार-बार आने वाले नकारात्मक विचारों को निकाल बाहर कीजिए; सकारात्मक कथन बनाइए
संबंधों में सुधार
संप्रेषण ही कुंजी है: सुनना, अपने भाव व्यक्त करना, और दूसरों के नज़रिए को स्वीकार करना, भले ही वह अलग हो
स्वयं की देखभाल
स्वस्थ, फ़िट और शांत बने रहना शरीर और मन को तैयार करता है; धीमी, पेट से ली गई (उदरीय) साँस सबसे विश्रांतिकारी प्रतिमान है
असहायक आदतों पर विजय
पूर्णतावाद, परिहार और विलंबन (procrastination, यानी टालमटोल) अल्पकाल में राहत देते हैं पर व्यक्ति को दीर्घकाल में दबाव के प्रति ज़्यादा सुभेद्य बना देते हैं
स्थिति स्थापन (resilience) एक गत्यात्मक विकासात्मक प्रक्रिया है: चुनौतीपूर्ण जीवन-परिस्थितियों में सकारात्मक समायोजन बनाए रखना, या दबाव और प्रतिकूलता के सामने “उबर आने” की क्षमता। हाल ही में इसे तीन साधनों के रूप में परिभाषित किया गया है:
स्थिति स्थापित बच्चे को इनमें से एक से ज़्यादा साधन चाहिए होते हैं; अगर किसी बच्चे में सिर्फ़ बहुत सारा आत्म-सम्मान (मैं हूँ) हो, पर मुड़ने के लिए कोई न हो (मेरे पास हैं का अभाव) और समस्या-समाधान की क्षमता न हो (मैं समर्थ हूँ का अभाव), तो वह बच्चा स्थिति स्थापित नहीं बन पाता। अध्ययन दिखाते हैं कि ग़रीबी और सामाजिक नुकसान के बीच भी कई बच्चे सक्षम, संवेदनशील वयस्कों में बदल जाते हैं।
4.3 सकारात्मक स्वास्थ्य
पूर्ण शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कुशल-क्षेम की अवस्था ही स्वास्थ्य है, न कि केवल रोग अथवा अशक्तता का अभाव। सकारात्मक स्वास्थ्य के अंतर्गत ये निर्मितियाँ आती हैं: एक स्वस्थ शरीर; उच्च गुणवत्ता वाले व्यक्तिगत रिश्ते; जीवन में उद्देश्य का बोध; आत्म-सम्मान और जीवन के कामों पर महारत; और दबाव, आघात व बदलाव के प्रति स्थिति स्थापन।
आहार
संतुलित आहार मूड ऊपर उठाता है, ऊर्जा देता है, प्रतिरक्षा मज़बूत करता है। दिन में तीन मुख्य, विविध भोजन। दबाव में लोग वसा, नमक और चीनी से भरपूर “आराम देने वाले भोजन” चाहने लगते हैं
व्यायाम
बेहतर स्वास्थ्य और कम तनाव/दुश्चिंता/अवसाद से लगातार जुड़ा हुआ। खिंचाव वाले व्यायाम (योग) शांत करते हैं; एरोबिक व्यायाम (जॉगिंग, तैराकी) सक्रियता बढ़ाते हैं
सकारात्मक अभिवृत्ति
वास्तविकता का सटीक बोध, उद्देश्य का बोध, दूसरों के नज़रिए के प्रति सहनशीलता, सफलता का श्रेय लेना और असफलता की ज़िम्मेदारी स्वीकारना, नए विचारों के लिए खुलापन, और विनोदी स्वभाव
सकारात्मक चिंतन
आशावादी लोग अनुकूल नतीजों की उम्मीद रखते हैं, समस्या-केंद्रित सामना करना अपनाते हैं और मदद माँगते हैं। निराशावादी लोग विपत्ति की आशंका पालते हैं और लक्ष्य छोड़ देते हैं, या दबाव के होने से ही इनकार कर देते हैं
सामाजिक अवलंब
ऐसे लोगों का होना जो आपकी परवाह करते हैं, आपको महत्व देते हैं और आपसे प्यार करते हैं। प्रत्यक्षित (perceived) अवलंब (गुणवत्ता) कुशल-क्षेम से जुड़ा है; सामाजिक जालक्रम (network, मात्रा) नहीं, क्योंकि बड़ा जालक्रम बनाए रखना खुद ही बहुत माँग वाला काम है
मूर्त अवलंब
- भौतिक सहायता: पैसा, सामान, सेवाएँ
- जैसे: अनुपस्थित रहे किसी मित्र को अपने नोट्स देना
सूचनात्मक अवलंब
- दबावपूर्ण घटना के बारे में तथ्य
- जैसे: पहले वैसी ही परीक्षा दे चुके किसी मित्र की सलाह
सामाजिक अवलंब दबाव के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है: जिन लोगों को परिवार तथा मित्रों से अधिक अवलंब मिलता है, वे दबावपूर्ण अनुभव में कम दबाव महसूस कर सकते हैं और उसका सामना अधिक सफलता से कर सकते हैं। तीसरे तरह का अवलंब, सांवेगिक अवलंब, यह भरोसा दिलाना है कि व्यक्ति को प्यार किया जाता है, महत्व दिया जाता है और उसकी परवाह की जाती है। सामाजिक अवलंब को दबावपूर्ण समय में अवसाद या दुश्चिंता जैसी मनोवैज्ञानिक पीड़ा को असरदार ढंग से घटाते हुए पाया गया है, और इसके मानसिक-स्वास्थ्य फ़ायदे सहायता देने वाले और सहायता पाने वाले, दोनों तक पहुँचते हैं।
सकारात्मक स्वास्थ्य के लिए समाज में चतुर्दिक समरसता स्थापित करना भी आवश्यक है, और धूम्रपान, मद्य, मादक द्रव्यों जैसे अस्वास्थ्यकर पलायन वाले मार्गों से बचना चाहिए।
क्रियाकलाप 3.5: पड़ोस के किसी ऐसे बच्चे से बात कीजिए जो किसी गंभीर दुर्घटना या आघात से गुज़रा हो, और पहचानिए कि किन कारकों ने उसे सामना करने में मदद की।
- दबाव व्यक्ति और वातावरण के बीच चलता रहने वाला लेन-देन है, सिर्फ़ उद्दीपक या अनुक्रिया नहीं; सेल्ये ने इसे “किसी भी माँग के प्रति शरीर की अविशिष्ट अनुक्रिया” कहा था
- प्राथमिक मूल्यांकन घटना को नुकसान/खतरा/चुनौती के रूप में पढ़ता है; द्वितीयक मूल्यांकन अपने साधनों को उसके सामने परखता है
- दबाव के तीन प्रकार: भौतिक/पर्यावरणी, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक। तीन स्रोत: जीवन घटनाएँ, परेशान करने वाली घटनाएँ, अभिघातज घटनाएँ
- दबाव के चार प्रभाव: संवेगात्मक, शरीरक्रियात्मक, संज्ञानात्मक, व्यवहारात्मक
- GAS की तीन अवस्थाएँ: सचेत प्रतिक्रिया → प्रतिरोध → परिश्रांति
- दबाव प्रतिरक्षक तंत्र को कमज़ोर करता है (मनस्तंत्रिका प्रतिरक्षा विज्ञान), प्राकृतिक-नष्ट-करने-वाली-कोशिकाओं की सक्रियता घटाकर
- सामना करना समस्या-केंद्रित या संवेग-केंद्रित हो सकता है (लेज़ारस और फ़ोकमैन); एंडलर और पार्कर ने अलग से तीन युक्तियाँ बताईं: कृत्य-, संवेग- और परिहार-अभिविन्यस्त
- दबाव प्रबंधन: विश्रांति, ध्यान, बायोफीडबैक, सर्जनात्मक मानस-प्रत्यक्षीकरण, संज्ञानात्मक-व्यवहारात्मक तकनीकें (मीचेनबॉम), व्यायाम
- दृढ़ता = तीन Cs (प्रतिबद्धता, नियंत्रण, चुनौती)। स्थिति स्थापन = मेरे पास हैं, मैं हूँ, मैं समर्थ हूँ
- सकारात्मक स्वास्थ्य आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभिवृत्ति, सकारात्मक चिंतन और सामाजिक अवलंब पर टिका है; समाज में समरसता चाहिए और धूम्रपान, मद्य, मादक द्रव्यों जैसे पलायन-मार्गों से बचना है
- क्या मैं सेल्ये की दबाव की परिभाषा और उसकी एक आलोचना बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं प्राथमिक और द्वितीयक मूल्यांकन में उदाहरण सहित फ़र्क़ बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं GAS की तीनों अवस्थाएँ क्रम से गिना सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं प्रतिरक्षक तंत्र की चारों कोशिकाओं के नाम और उनका काम बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं समस्या-केंद्रित और संवेग-केंद्रित सामना करने में फ़र्क़ समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं दृढ़ता के तीनों Cs और स्थिति स्थापन के तीनों साधन गिना सकता/सकती हूँ?