- मनश्चिकित्सा वास्तव में क्या है, और चिकित्सात्मक संबंध स्वयं आधा उपचार कैसे करता है
- व्यवहार चिकित्सा, संज्ञानात्मक चिकित्सा और मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा अलग-अलग तरीके से कष्ट को कैसे समझती और उसका उपचार कैसे करती हैं
- प्रत्येक चिकित्सा की नामित तकनीकें: क्रमिक विसंवेदनीकरण, RET, संज्ञानात्मक पुनःसंरचना, सेवार्थी-केंद्रित परावर्तन, और अधिक
- हर मनश्चिकित्सक को माननी होने वाली नैतिक व्यवस्थाएँ, और योग-ध्यान जैसी वैकल्पिक चिकित्साएँ कैसे मदद करती हैं
- मानसिक रूप से बीमार रोगी का पुनःस्थापन लक्षण कम होने के बाद कैसे किया जाता है
अशर्त सकारात्मक आदरक्रमिक विसंवेदनीकरणटोकन अर्थव्यवस्था
RETसंज्ञानात्मक पुनःसंरचनाआत्मसिद्धिउद्बोधक चिकित्सा
कैथार्सिसपुनःस्थापन
यह NCERT अध्याय मनश्चिकित्सा को तीन ऐतिहासिक परिवारों में बाँटता है: मनोगतिक, व्यवहार और
अस्तित्वपरक। CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम में यूनिट V (चिकित्सा उपागम) के ये विषय दिए गए हैं:
मनश्चिकित्सा की प्रकृति एवं प्रक्रिया (चिकित्सात्मक संबंध); चिकित्सा के प्रकार (व्यवहार,
संज्ञानात्मक, मानवतावादी-अस्तित्वपरक और वैकल्पिक चिकित्सा, स्वास्थ्य-लाभ में योगदान देने वाले
कारक, नैतिक सिद्धांत); और मानसिक रोगियों का पुनःस्थापन। इस सूची में मनोगतिक चिकित्सा का नाम नहीं है।
पुस्तक में मनोगतिक चिकित्सा का अपना अलग अनुभाग नहीं है, पर पुस्तक तीनों परिवारों की तुलना छह
प्राचलों पर करती है, इसलिए नीचे की सारणी में उसका स्तंभ अध्याय का हिस्सा है।
इस अध्याय में दवा/बायोमेडिकल उपचार पर अलग खंड नहीं है; पुस्तक वैकल्पिक चिकित्सा को
‘पारंपरिक औषध-उपचार’ की वैकल्पिक संभावनाएँ कहती है।
CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम में यूनिट V (यह अध्याय) के 70 अंकों के सिद्धांत प्रश्नपत्र में 9 अंक हैं।
30 अंकों का प्रैक्टिकल (प्रैक्टिकल फ़ाइल और केस प्रोफ़ाइल 10, मौखिक परीक्षा 5, दो मनोवैज्ञानिक
परीक्षण 15) अलग से आंका जाता है और यह नोट्स उसका हिस्सा नहीं हैं।
1मनश्चिकित्सा की प्रकृति एवं प्रक्रिया
मनश्चिकित्सा उपचार चाहने वाले (सेवार्थी) और उपचार करने वाले (चिकित्सक) के बीच एक ऐच्छिक संबंध
है, जिसका उद्देश्य सेवार्थी की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करने में मदद करना है।
यह संबंध सेवार्थी के विश्वास को बनाने में सहायक होता है ताकि समस्याओं पर मुक्त रूप से चर्चा हो सके।
मनश्चिकित्सा दुरनुकूलक व्यवहारों को बदलने, वैयक्तिक कष्ट को कम करने और सेवार्थी को अपने पर्यावरण से
बेहतर अनुकूलन करने में मदद करती है: जिसमें वैवाहिक, व्यावसायिक और सामाजिक समायोजन शामिल है।
1.1 चार अभिलक्षण
व्यवस्थित अनुप्रयोग
हर चिकित्सा किसी सिद्धांत के नियमों का व्यवस्थित रूप से अनुप्रयोग करती है: यह कोई मनमानी सलाह नहीं है।
केवल प्रशिक्षित व्यक्ति
केवल विशेषज्ञ पर्यवेक्षण में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति ही मनश्चिकित्सा कर सकता है। एक
अप्रशिक्षित व्यक्ति अनजाने में लाभ से अधिक हानि पहुँचा सकता है।
चिकित्सक और सेवार्थी
सेवार्थी वह है जो सहायता चाहता है और प्राप्त करता है: चिकित्सात्मक प्रक्रिया में ध्यान का मुख्य केंद्र।
गोपनीय, गत्यात्मक संबंध
चिकित्सक और सेवार्थी की अंतःक्रिया से चिकित्सात्मक संबंध बनता और सुदृढ़ होता है: गोपनीय, अंतर्वैयक्तिक
और परिवर्तन का वास्तविक माध्यम।
“मनश्चिकित्सा की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र का वर्णन कीजिए” NCERT पुस्तक का समीक्षात्मक प्रश्न 1 है।
पहले परिभाषा लिखें, फिर सभी 4 अभिलक्षण अलग-अलग बिंदुओं में।
1.2 मनश्चिकित्सा के दस उद्देश्य
पुस्तक इन्हें एक सूची के रूप में देती है: इन्हें अलग-अलग विचारों के बजाय एक सूची के रूप में याद करें:
2चिकित्सात्मक संबंध
सेवार्थी और चिकित्सक के बीच के विशेष संबंध को चिकित्सात्मक संबंध (या चिकित्सात्मक मैत्री)
कहा जाता है: न तो क्षणिक परिचय, न ही स्थायी संबंध।
2.1 चिकित्सात्मक मैत्री के दो घटक
घटक 1: संविदात्मक
- दो इच्छुक व्यक्ति
- एक साझेदारी में प्रवेश करते हैं
- उद्देश्य: सेवार्थी को समस्याओं पर विजय पाने में मदद
घटक 2: सीमित अवधि
- तब तक चलती है जब तक सेवार्थी अपनी समस्याओं का सामना करने में समर्थ न हो
- और अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में न ले ले
यह मैत्री विश्वास तथा भरोसे पर आधारित संबंध है। उच्च विश्वास सेवार्थी को अपना बोझ हलका करने
में सक्षम बनाता है। चिकित्सक स्वीकृति, तदनुभूति, सच्चाई और गर्मजोशी दिखाकर इसे बढ़ावा देता है: सेवार्थी
जो भी बताए, उसका मूल्यांकन किए बिना।
अशर्त सकारात्मक आदर चिकित्सक की सेवार्थी के प्रति निरंतर सकारात्मक भावना है, चाहे सेवार्थी
कुछ भी कहे या किया हो: चिकित्सक अपनी गर्मजोशी वापस नहीं लेता, भले ही सेवार्थी अशिष्ट व्यवहार करे या
“ग़लत” बातें बताए।
2.2 तदनुभूति, सहानुभूति और बौद्धिक समझ

छात्र तदनुभूति और सहानुभूति को एक समझ लेते हैं। सहानुभूति = दूसरे के कष्ट के प्रति दया और करुणा, पर
दूसरे व्यक्ति की तरह अनुभव नहीं कर पाना। तदनुभूति = समझना और सेवार्थी जैसा ही अनुभव करना।
बौद्धिक समझ भावशून्य होती है: व्यक्ति दूसरे की तरह अनुभव नहीं कर पाता और उसे सहानुभूति भी
नहीं होती।
चिकित्सात्मक मैत्री के लिए यह भी ज़रूरी है कि चिकित्सक सेवार्थी की हर बात की नियमबद्ध गोपनीयता
रखे, और सेवार्थी के विश्वास का किसी भी तरह अनुचित लाभ न उठाए। अंततः यह एक व्यावसायिक संबंध है।
3मनश्चिकित्सा का वर्गीकरण
यद्यपि हर मनश्चिकित्सा का उद्देश्य कष्ट दूर करना और प्रभावी व्यवहार को बढ़ावा देना है, वे संप्रत्ययों,
विधियों और तकनीकों में एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। NCERT मनश्चिकित्सा को तीन व्यापक समूहों में बाँटता
है: इनके कालानुक्रम को याद रखें:
पुस्तक में मनोगतिक चिकित्सा की तकनीकों का अलग अनुभाग नहीं है। यह केवल दो जगह आती है: ऊपर के
कालानुक्रम में, और नीचे की छह-प्राचल तुलना में।
NCERT इन तीनों को छह प्राचलों पर वर्गीकृत करता है। सारणी को वैसे ही याद करें जैसे पुस्तक में है:
| प्राचल | मनोगतिक चिकित्सा | व्यवहार चिकित्सा | अस्तित्वपरक चिकित्सा |
|---|---|---|---|
| समस्या का कारण | अंतःमनोद्वंद्व, अर्थात व्यक्ति के मानस में विद्यमान द्वंद्व | व्यवहार एवं संज्ञान का दोषपूर्ण अधिगम | अपने जीवन और अस्तित्व के अर्थ से संबंधित प्रश्न |
| कारण कैसे उत्पन्न हुआ | बाल्यावस्था की अतृप्त इच्छाएँ तथा बाल्यावस्था के अनसुलझे भय अंतःमनोद्वंद्व उत्पन्न करते हैं | दोषपूर्ण अनुबंधन, अधिगम, चिंतन: दुरनुकूलक व्यवहार | अकेलेपन, विसंबंधन, अस्तित्व की व्यर्थता की वर्तमान भावनाएँ |
| मुख्य उपचार विधि | मुक्त साहचर्य विधि और स्वप्न को बताने की विधि से भावनाएँ-विचार प्राप्त करना; इनकी व्याख्या सेवार्थी के समक्ष, ताकि वह अपने द्वंद्वों का सामना और समाधान कर सके | दोषपूर्ण अनुबंधन पहचानना; वैकल्पिक व्यवहारात्मक प्रासंगिकता स्थापित करना | सकारात्मक, स्वीकारात्मक, अनिर्णयात्मक पर्यावरण; सेवार्थी स्वयं समाधान तक पहुँचता है |
| चिकित्सात्मक संबंध की प्रकृति | चिकित्सक सेवार्थी की अपेक्षा उसके अंतःमनोद्वंद्व को ज़्यादा अच्छी तरह समझता है, इसलिए वह सेवार्थी के विचारों-भावनाओं की व्याख्या करता है | चिकित्सक दोषपूर्ण प्रतिरूप पहचानकर सेवार्थी के लिए सही प्रतिरूप बताता है | चिकित्सक केवल गर्मजोशी भरा, तदनुभूतिक संबंध देता है; सेवार्थी स्वयं अन्वेषण करता है |
| सेवार्थी को मुख्य लाभ | संवेगात्मक अंतर्दृष्टि: द्वंद्वों को बौद्धिक रूप से समझना, संवेगात्मक रूप से स्वीकारना और उनकी ओर अपने संवेग बदलना; लक्षण दूर होते हैं, कष्ट कम होता है | दोषपूर्ण व्यवहार/चिंतन को अनुकूली प्रतिरूपों में बदलना | व्यक्तिगत संवृद्धि: स्व, आकांक्षाओं, संवेगों की बढ़ती समझ |
| उपचार की अवधि | क्लासिकी मनोविश्लेषण कई वर्षों तक; कई आधुनिक रूपांतर 10-15 सत्रों में पूरे | छोटी; कुछ महीनों में पूरी | छोटी; कुछ महीनों में पूरी |
4नैदानिक निरूपण: सेवार्थी की समस्या समझने के चरण
नैदानिक निरूपण का संबंध उपचार के लिए प्रयुक्त चिकित्सात्मक मॉडल के अनुरूप सेवार्थी की समस्या के
निरूपण से है। बिना नैदानिक निरूपण के मनश्चिकित्सा आरंभ करना उपयुक्त नहीं है।
एक सेवार्थी नौकरी पर बने रहने में असमर्थ है और अपने उच्च अधिकारियों का सामना नहीं कर पाता।
व्यवहार चिकित्सा का नैदानिक निरूपण इसे बताता है: आग्रहिता (अपनी बात
स्पष्ट व उचित रूप से रखने का कौशल) कौशलों की कमी + दुश्चिंता। लक्ष्य-क्षेत्र अब स्पष्ट हैं:
आग्रहिता सिखाना और दुश्चिंता कम करना, केवल “काम में समस्या है” नहीं।
निरूपण एक सतत प्रक्रिया है: चिकित्सा के दौरान नई नैदानिक अंतर्दृष्टि मिलने पर पुनः निरूपण की
आवश्यकता हो सकती है। सामान्यतः पहले एक-दो सत्र प्रारंभिक निरूपण के लिए पर्याप्त सामग्री देते हैं।
5व्यवहार चिकित्सा
व्यवहार चिकित्सा मानती है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट दोषपूर्ण व्यवहार या चिंतन प्रतिरूपों से उत्पन्न
होता है। यह सेवार्थी के वर्तमान व्यवहार और विचारों पर केंद्रित है: अतीत का महत्व केवल इतना है
कि दोषपूर्ण प्रतिरूप कैसे शुरू हुआ, इसे कभी फिर से जिया नहीं जाता। केवल वर्तमान के दोषपूर्ण प्रतिरूप
सुधारे जाते हैं।
इसका आधार अधिगम-सिद्धांत का नैदानिक अनुप्रयोग है। यह कोई एक एकीकृत सिद्धांत नहीं, बल्कि
विशिष्ट तकनीकों का विशाल समुच्चय है, जो सेवार्थी के लक्षणों और निदान के अनुसार चुना जाता है: दुर्भीति
(किसी वस्तु या स्थिति का अविवेकी, अत्यधिक भय) के उपचार के लिए एक तकनीक-समुच्चय, क्रोध-प्रस्फोटन के
लिए दूसरा।
5.1 व्यवहार विश्लेषण: क्या उपचारित करना है यह पता लगाना
एक नवयुवक धूम्रपान करता है और छुड़ाना चाहता है। अपक्रियात्मक व्यवहार: धूम्रपान। पूर्ववर्ती
कारक: वार्षिक परीक्षा की तैयारी करते समय शुरू हुआ: दुश्चिंता उत्पन्न करने वाली स्थिति। संपोषण
कारक: धूम्रपान से मिलने वाली दुश्चिंता से राहत, जो इस क्रियाप्रसूत अनुक्रिया को बनाए रखती है।
5.2 उपचार पैकेज: पूर्ववर्ती और अनुवर्ती संक्रिया
उद्देश्य: दोषपूर्ण व्यवहार समाप्त करना और अनुकूली व्यवहार से प्रतिस्थापित करना, दो प्रकार की संक्रियाओं
के माध्यम से:
पूर्ववर्ती संक्रिया
- व्यवहार से पहले घटित होने वाली किसी चीज़ को बदलती है
- प्रबलन मूल्य बदलने पर स्थापक संक्रिया कहलाती है
अनुवर्ती संक्रिया
- व्यवहार के बाद घटित होने वाली किसी चीज़ को बदलती है
- उदा., वांछित व्यवहार के लिए बच्चे की प्रशंसा करना
एक बच्चा रात का खाना खाने में परेशान करता है। पूर्ववर्ती संक्रिया: चायकाल में भोजन घटाना: इससे
रात के भोजन की भूख और प्रबलन मूल्य बढ़ता है। अनुवर्ती संक्रिया: ठीक से भोजन करने पर बच्चे की
प्रशंसा करना। दोनों मिलकर रात का भोजन करने की अनुक्रिया स्थापित करते हैं।
5.3 व्यवहारात्मक तकनीकें
सिद्धांत: इन तकनीकों का सिद्धांत है सेवार्थी के भाव-प्रबोधन स्तर को कम करना, प्राचीन अनुबंधन या
क्रियाप्रसूत अनुबंधन द्वारा प्रबलन की भिन्न-भिन्न प्रासंगिकता से व्यवहार को बदलना, और यदि आवश्यकता हो तो
प्रतिस्थानिक अधिगम प्रक्रिया का भी उपयोग करना। व्यवहार परिष्करण की दो मुख्य तकनीकें हैं: निषेधात्मक
प्रबलन तथा विमुखी अनुबंधन। इस सारांश में तकनीकें इस क्रम में दी गई हैं: नीचे प्रबलन पर आधारित पाँच, फिर
विश्रांति की विधियाँ, क्रमिक विसंवेदनीकरण तथा मॉडलिंग, आगे अपने-अपने उपखंड में:
एक मद्यव्यसनी को शराब सूँघते समय हल्का बिजली का झटका दिया जाता है। बार-बार जोड़े जाने से शराब की
गंध ही अप्रिय हो जाती है (झटके की पीड़ा से जुड़ी होने के कारण), और व्यक्ति शराब छोड़ देता है।
एक बच्चा नियमित रूप से गृहकार्य नहीं करता। माँ जब भी बच्चा तय समय पर गृहकार्य करता है तो उसका
मनपसंद पकवान बना देती है। मनपसंद पकवान का सकारात्मक प्रबलन तय समय पर गृहकार्य करने के व्यवहार को
बढ़ा देता है।
व्यवहार-संबंधी समस्याओं वाले व्यक्ति को हर बार वांछित व्यवहार होने पर एक टोकन दिया जाता है। टोकन
संगृहीत कर किसी पुरस्कार से बदले जाते हैं, जैसे रोगी के लिए कोई सैर या बच्चे के लिए कोई
इनाम।
एक लड़की सिनेमा दिखाने के लिए रोती-रूठती है। माता-पिता उसे केवल तभी ले जाते हैं जब वह न रूठे
और न रोए, और रोने-रूठने पर उसकी उपेक्षा करते हैं। परिणाम: शिष्टतापूर्वक कहने का वांछित व्यवहार
बढ़ता है; रोना-रूठना घटता है।
पुस्तक विभेदक प्रबलन की दो विधियाँ देती है: (क) वांछित व्यवहार के लिए सकारात्मक प्रबलन और अवांछित
व्यवहार के लिए निषेधात्मक प्रबलन, दोनों एक साथ; (ख) वांछित व्यवहार के लिए सकारात्मक प्रबलन और अवांछित
व्यवहार की उपेक्षा। दूसरी विधि कम कष्टकर तथा समान रूप से प्रभावी है।
5.4 विश्रांति की विधियाँ
दुश्चिंता सेवार्थी के भाव-प्रबोधन स्तर को बढ़ाकर दोषपूर्ण व्यवहार (धूम्रपान, अधिक भोजन, अध्ययन में
असमर्थता) के लिए पूर्ववर्ती कारक का काम करती है: इसलिए दुश्चिंता कम करने से ये व्यवहार भी कम होते हैं।
प्रगामी पेशीय विश्रांति: सेवार्थी को किसी पेशी समूह (जैसे अग्रबाहु) को तान कर तनाव के प्रति
जागरूक होना, फिर उसे मुक्त करना सिखाया जाता है: बार-बार अभ्यास से पूरे शरीर को विश्रांत करना सीख जाता है।
पुस्तक में प्रगामी पेशीय विश्रांति के साथ ध्यान को भी विश्रांति की अवस्था उत्पन्न करने वाली दूसरी
विधि के रूप में जोड़ा गया है (ध्यान की चर्चा वैकल्पिक चिकित्सा वाले खंड में अलग से की गई है)।
5.5 क्रमिक विसंवेदनीकरण: दुर्भीति और अविवेकी भय के लिए
वोल्प द्वारा प्रतिपादित। सेवार्थी और चिकित्सक मिलकर दुश्चिंता-उत्पादक स्थितियों का एक पदानुक्रम
बनाते हैं, कम से अधिक भय तक।

चिकित्सक सेवार्थी को विश्रांत करता है, जो सबसे कम दुश्चिंता वाली स्थिति की कल्पना करता है, ज़रा-सा भी
तनाव होने पर रुक जाता है। सत्रों के साथ सेवार्थी विश्रांत रहते हुए अधिक गंभीर स्थितियों की कल्पना करने
लगता है और क्रमशः विसंवेदनशील हो जाता है।
अन्योन्य प्रावरोध का सिद्धांत: दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक ही समय उपस्थित हों तो कमज़ोर शक्ति
अवरुद्ध हो जाती है। पहले विश्रांति की अनुक्रिया विकसित की जाती है, और वह दुश्चिंता को अवरुद्ध करती है जैसे-जैसे
सेवार्थी अधिक भयावह दृश्यों की कल्पना करता है।
मॉडलिंग: सेवार्थी किसी भूमिका-प्रतिरूप या चिकित्सक (जो पहले भूमिका-प्रतिरूप की तरह कार्य करता
है) को देखकर एक विशेष तरीके से व्यवहार करना सीखता है, प्रतिस्थानिक अधिगम के द्वारा; व्यवहार में छोटे
बदलावों को क्रमशः पुरस्कृत किया जाता है।
6संज्ञानात्मक चिकित्सा
संज्ञानात्मक चिकित्साएँ मनोवैज्ञानिक कष्ट का कारण अविवेकी विचारों और विश्वासों में खोजती हैं।
6.1 अल्बर्ट एलिस: संवेग तर्क चिकित्सा (RET)
केंद्रीय धारणा: अविवेकी विश्वास पूर्ववर्ती घटनाओं और उनके परिणामों के बीच मध्यस्थता करते हैं।
अविवेकी विश्वास “चाहिए”/”अनिवार्य” विचारों से भरे होते हैं, जिनके पक्ष में पर्यावरण में आनुभविक प्रमाण न भी हो: जैसे “किसी को
हर एक का प्यार हर समय मिलना चाहिए”, या “मनुष्य की तंगहाली बाह्य घटनाओं के कारण होती है जिस पर किसी का
नियंत्रण नहीं होता”। ये विश्वास प्रश्नावली और साक्षात्कार से आंके जाते हैं।
चिकित्सक अविवेकी विश्वासों का खंडन सौम्य, अनिदेशात्मक प्रश्न पूछकर करता है: जाँच-पड़ताल या
निदेशात्मक कभी नहीं। उदाहरण प्रश्न: “क्यों हर कोई तुम्हें प्यार करे?”, “तुम्हारे लिए सफल होना क्या अर्थ
रखता है?” सेवार्थी धीरे-धीरे अविवेकी विश्वास-तंत्र को तर्कमूलक विश्वास-तंत्र से बदल देता है, जिससे कष्ट में कमी
आती है।
6.2 आरन बेक की संज्ञानात्मक चिकित्सा
बाल्यावस्था में माता-पिता द्वारा उपेक्षित बच्चा मूल स्कीमा “मैं वांछित नहीं हूँ” विकसित करता है। बाद में
जीवनकाल के दौरान, अध्यापक द्वारा सबके सामने हँसी उड़ाई जाने की निर्णायक घटना इस स्कीमा को सक्रिय कर देती है, जिससे
“मैं मूर्ख हूँ” जैसे नकारात्मक स्वचालित विचार उत्पन्न होते हैं।
चिकित्सक सौम्य, बिना धमकी वाले प्रश्नों से नकारात्मक स्वचालित विचारों को उलटता है, जिससे
संज्ञानात्मक पुनःसंरचना प्राप्त होती है: जो दुश्चिंता और अवसाद को घटाती है।
मनोगतिक चिकित्सा के विपरीत संज्ञानात्मक चिकित्सा अधिक मुक्त है (चिकित्सक अपनी विधि सेवार्थी से
साझा करता है) और अल्पकालिक, 10-20 सत्रों की।
6.3 संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (CBT)
वर्तमान में सबसे लोकप्रिय चिकित्सा। शोध ने निर्णायक रूप से CBT को दुश्चिंता, अवसाद, आतंक-दौरा,
सीमावर्ती व्यक्तित्व आदि के लिए एक संक्षिप्त, प्रभावोत्पादक उपचार सिद्ध किया है।
जैविक पक्ष
विश्रांति की विधियों द्वारा संबोधित
मनोवैज्ञानिक पक्ष
व्यवहार + संज्ञानात्मक चिकित्सा तकनीकों द्वारा संबोधित
सामाजिक पक्ष
पर्यावरण में परिवर्तन द्वारा संबोधित
यह जैव-मनोसामाजिक उपागम ही CBT को व्यापक, प्रयोग में आसान, कई विकारों पर लागू और प्रमाणित
प्रभावोत्पादकता वाली चिकित्सा बनाता है।
मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा की धारणा है कि मनोवैज्ञानिक कष्ट व्यक्ति के अकेलेपन,
विसंबंधन (दूसरों तथा अपने वास्तविक स्व से कटा हुआ महसूस करना) तथा जीवन का अर्थ समझने एवं
यथार्थ संतुष्टि प्राप्त करने में अयोग्यता की भावनाओं के कारण उत्पन्न होता है। मनुष्य व्यक्तिगत
संवृद्धि और आत्मसिद्धि की इच्छा से अभिप्रेरित होते हैं। समाज और परिवार द्वारा इन आवश्यकताओं को
बाधित करने पर मनोवैज्ञानिक कष्ट उत्पन्न होता है।
आत्मसिद्धि एक सहज शक्ति है जो व्यक्ति को अधिक जटिल, संतुलित और समाकलित (बिना खंडित हुए
संपूर्ण) होने के लिए प्रेरित करती है।
रोगोपचार तब होता है जब सेवार्थी आत्मसिद्धि की बाधाओं को पहचानकर दूर कर पाता है, मुक्त संवेगात्मक
अभिव्यक्ति के माध्यम से, एक अनुज्ञात्मक, अनिर्णयात्मक, स्वीकृतिपूर्ण वातावरण में। सेवार्थी को अपने व्यवहार
पर नियंत्रण की स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व दोनों हैं; चिकित्सक केवल सुगमकर्ता है।
7.1 अस्तित्वपरक चिकित्सा: विक्टर फ्रेंकल की उद्बोधक चिकित्सा
विक्टर फ्रेंकल, एक मनोरोगविज्ञानी और तंत्रिकाविज्ञानी, ने उद्बोधक चिकित्सा प्रतिपादित की
(“लॉगोस” ग्रीक में “आत्मा” है: उद्बोधक चिकित्सा का अर्थ है “आत्मा का उपचार”)। जीवन-संकट की स्थितियों
में भी अर्थ खोजने की प्रक्रिया को फ्रेंकल अर्थ निर्माण कहते हैं: अपने अस्तित्व की आध्यात्मिक सत्य
की खोज।
जैसे अचेतन (मन का वह भाग जिसमें मूल प्रवृत्तियाँ व अनुभव होते हैं, जिनके प्रति व्यक्ति जागरूक
नहीं होता) मूल प्रवृत्तियों का भंडार है, वैसे ही फ्रेंकल एक आध्यात्मिक अचेतन मानते हैं: प्रेम,
सौंदर्यात्मक अभिज्ञता और जीवन-मूल्यों का भंडार। तंत्रिकातापी दुश्चिंताएँ तब उत्पन्न होती हैं जब
जीवन की समस्याएँ अस्तित्व के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या आध्यात्मिक पक्षों से जुड़ती हैं। फ्रेंकल ने
अर्थहीनता की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक दुश्चिंताओं पर बल दिया; इसे अस्तित्व दुश्चिंता, अर्थात
आध्यात्मिक मूल की तंत्रिकातापी दुश्चिंता, कहा जा सकता है।
उद्बोधक चिकित्सा का लक्ष्य: सेवार्थी को परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना जीवन में अर्थवत्ता और
उत्तरदायित्व बोध प्राप्त करने में मदद करना। चिकित्सक निष्कपट है, अपनी भावनाएँ/मूल्य साझा करता है, “आज और अभी” पर ज़ोर देता है, और
अन्यारोपण (सेवार्थी द्वारा किसी अन्य व्यक्ति, प्रायः माता-पिता, के प्रति अपनी भावनाओं को
अनजाने में चिकित्सक पर आरोपित करना) को सक्रिय रूप से हतोत्साहित करता है।
7.2 सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा: कार्ल रोज़र्स
कार्ल रोज़र्स ने वैज्ञानिक निग्रह को व्यष्टीकृत पद्धति से जोड़ा, और स्व के संप्रत्यय को
मनश्चिकित्सा में लाए: स्वतंत्रता और वरण को अस्तित्व का केंद्र मानते हुए।
तदनुभूति
सेवार्थी के अनुभव को अपना समझकर समझना
अशर्त सकारात्मक आदर
सेवार्थी जैसा है, वैसा ही पूर्ण स्वीकार
परावर्तन
सेवार्थी के कथनों को दोहराकर स्पष्टीकरण माँगना
तदनुभूति चिकित्सक और सेवार्थी के बीच सांवेगिक अनुनाद की स्थिति बनाती है। अशर्त सकारात्मक आदर (ऐसी
हार्दिकता जो सेवार्थी के प्रकट किए पर निर्भर नहीं) से सेवार्थी सुरक्षित महसूस कर अपनी भावनाएँ अन्वेषित कर पाता है। चिकित्सक केवल सुगमकर्ता है: सेवार्थी ही
अपना वास्तविक स्व बनता है।
7.3 गेस्टाल्ट चिकित्सा: फ्रेडरिक और लॉरा पर्ल्स
जर्मन “गेस्टाल्ट” का अर्थ है “समग्र”। फ्रेडरिक (फ्रिट्ज) पर्ल्स ने अपनी पत्नी लॉरा पर्ल्स
के साथ यह चिकित्सा दी। लक्ष्य: सेवार्थी की आत्म-जागरूकता और आत्म-स्वीकृति बढ़ाना। सेवार्थी को
जागरूकता से अवरुद्ध शारीरिक प्रक्रियाओं और संवेगों को पहचानना सिखाया जाता है, अपनी भावनाओं और द्वंद्वों
के बारे में कल्पनाओं को अभिव्यक्त करके: यह समूहों में भी प्रयुक्त हो सकती है।
8मनश्चिकित्सा में स्वास्थ्य-लाभ में योगदान देने वाले कारक
8.1 अविशिष्ट कारक: रोगी और चिकित्सक चर
कैथार्सिस (भाव-विरेचन) प्रारंभिक सत्रों में, जब समस्या समझी जा रही होती है, भावनात्मक बोझ हलका
करने की प्रक्रिया है: इसके अपने स्वास्थ्य-लाभकारी गुण हैं।
कारक 1 का पुस्तक का उदाहरण: यदि दुश्चिंतित सेवार्थी को स्वस्थ करने के लिए व्यवहार पद्धति और
संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा अपनाई जाती है, तो विश्रांति की विधियाँ और संज्ञानात्मक पुनःसंरचना
स्वास्थ्य-लाभ में बहुत बड़ा योगदान देती हैं।
रोगी चर
- परिवर्तन के लिए अभिप्रेरणा
- उपचार से सुधार की प्रत्याशा
चिकित्सक चर
- सकारात्मक स्वभाव
- अनसुलझे संवेगात्मक द्वंद्वों की अनुपस्थिति
- अच्छा मानसिक स्वास्थ्य
9मनश्चिकित्सा के नैतिक सिद्धांत
9.1 हर चिकित्सक को माननी होने वाली छह व्यवस्थाएँ
✓ हर चिकित्सक को यह करना चाहिए
- सुविज्ञ सहमति लेनी चाहिए
- सेवार्थी की गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए
- व्यक्तिगत कष्ट कम करना हर प्रयास का लक्ष्य होना चाहिए
- चिकित्सक-सेवार्थी संबंध की अखंडता बनाए रखनी चाहिए
- मानव अधिकार एवं गरिमा का आदर करना चाहिए
- व्यावसायिक सक्षमता और कौशल होने चाहिए
✗ इनका उल्लंघन न करें
- बिना व्यावसायिक प्रशिक्षण के अभ्यास न करें
- गोपनीयता न तोड़ें
- सेवार्थी के विश्वास का अनुचित लाभ न उठाएँ
10वैकल्पिक चिकित्सा
पारंपरिक औषध-उपचार या मनश्चिकित्सा की वैकल्पिक संभावनाएँ: योग, ध्यान, ऐक्यूपंक्चर, वनौषधि। पिछले
25 वर्षों में योग और ध्यान ने उपचार कार्यक्रमों के रूप में सर्वाधिक लोकप्रियता पाई है।
10.1 योग और ध्यान
योग
- प्राचीन भारतीय पद्धति, पातंजलि के योग सूत्र के अष्टांग योग
में विस्तृत - आज सामान्यतः: आसन और/या प्राणायाम
ध्यान
- श्वास, वस्तु, विचार या मंत्र पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास
- विपश्यना (सतर्कता-आधारित): कोई नियत वस्तु नहीं; शारीरिक संवेदनाओं और विचारों का निष्क्रिय
प्रेक्षण
सुदर्शन क्रिया योग (SKY): तीव्र गति से श्वास लेने की तकनीक, जो अत्यधिक वायु-संचार करती है;
कम-जोखिम, कम-खर्च; दबाव, दुश्चिंता, अभिघातज उत्तर दबाव विकार (PTSD), अवसाद, दबाव-संबंधी चिकित्सा रोग, मादक द्रव्यों के दुरुपयोग
और अपराधियों के पुनःस्थापन में सहायक। NIMHANS, भारत के शोध से पता चला है कि SKY अवसाद को कम
करता है, मद्यव्यसनी रोगियों में भी। अनिद्रा का उपचार योग से किया गया है: योग नींद आने की अवधि को कम
करता है तथा निद्रा की गुणवत्ता को बढ़ाता है। कुशल योग शिक्षक द्वारा उचित प्रशिक्षण तथा प्रतिदिन 30 मिनट
तक का अभ्यास इसके लाभ को बढ़ा सकता है।
कुंडलिनी योग (अमेरिका में सिखाया जाने वाला): प्राणायाम को मंत्रों के उच्चारण से जोड़ता है।
अरैखिक विज्ञान संस्थान, कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो, अमेरिका ने इसे मनोग्रहित-बाध्यता
विकार (OCD) के उपचार में प्रभावी पाया। सतर्कता-आधारित/विपश्यना ध्यान संवेगात्मक उद्दीपकों के बेहतर
प्रक्रमण में मदद कर अवसाद के दोहराव को रोक सकता है।
11मानसिक रोगियों का पुनःस्थापन
मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार के दो घटक हैं:
11.1 कम तीव्र बनाम गंभीर विकार
कम तीव्र विकार
- सामान्यीकृत दुश्चिंता, प्रतिक्रियात्मक अवसाद, दुर्भीति
- लक्षण-कमी = बेहतर जीवन-गुणवत्ता
गंभीर विकार (जैसे मनोविदलता)
- लक्षणों में कमी आना जीवन की गुणवत्ता में सुधार से
संबंधित नहीं हो सकता - कई रोगियों में नकारात्मक लक्षण: अनभिरुचि, प्रेरणा की कमी
पुनःस्थापन का उद्देश्य रोगी को सशक्त बनाना है ताकि वह यथासंभव समाज का उत्पादक सदस्य बन सके।
व्यावसायिक चिकित्सा
मोमबत्ती बनाना, कागज़ की थैली बनाना, बुनाई: कार्य-अनुशासन बनाता है।
सामाजिक कौशल प्रशिक्षण
भूमिका-निर्वाह, अनुकरण, अनुदेश: सामाजिक समूह में कार्य करने का कौशल विकसित करता है।
संज्ञानात्मक पुनःप्रशिक्षण
अवधान, स्मृति और अधिशासी प्रकार्यों में सुधार।
व्यावसायिक प्रशिक्षण
पर्याप्त सुधार के बाद: उत्पादक रोज़गार के लिए आवश्यक कौशल।
मनश्चिकित्सा एक ही उपचार नहीं है: NCERT स्वयं कहता है कि लगभग 400 प्रकार की मनश्चिकित्सा होती
हैं, पर हर एक में चिकित्सक, चिकित्सात्मक संबंध और चिकित्सा की प्रक्रिया ही वास्तविक परिवर्तन के कारक
हैं।
सारांश, NCERT मनोविज्ञान अध्याय 5
- क्या मैं मनश्चिकित्सा के 4 अभिलक्षण और चिकित्सात्मक मैत्री के 2 घटक बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं तदनुभूति, सहानुभूति और बौद्धिक समझ में भेद अपने शब्दों में समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं व्यवहारात्मक तकनीकों को उदाहरण सहित बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं बेक की मूल स्कीमा → निर्णायक घटना → नकारात्मक स्वचालित विचार → विकृति की श्रृंखला बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मुझे RET, उद्बोधक चिकित्सा, सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा और गेस्टाल्ट चिकित्सा के प्रवर्तक याद हैं?
- क्या मैं मनश्चिकित्सा के सभी 6 नैतिक मानक सूचीबद्ध कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि मनोविदलता में लक्षणों में कमी से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होना आवश्यक क्यों नहीं है?
- मनश्चिकित्सा = ऐच्छिक, गोपनीय संबंध जिसका उद्देश्य सेवार्थी की मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान है
- मनोवैज्ञानिक कष्ट से पीड़ित वयस्कों के लिए मनश्चिकित्सा की प्रधान पद्धति व्यक्तिगत मनश्चिकित्सा है; चिकित्सक को व्यावसायिक प्रशिक्षण आवश्यक है
- चिकित्सात्मक मैत्री = संविदात्मक + सीमित अवधि; विश्वास, तदनुभूति, अशर्त सकारात्मक आदर, गोपनीयता चाहिए
- 3 परिवार, कालानुक्रम: मनोगतिक → व्यवहार → अस्तित्वपरक (छह प्राचलों पर तुलना: कारण, कारण का प्रादुर्भाव, विधि, संबंध, लाभ, अवधि)
- व्यवहार चिकित्सा: व्यवहार विश्लेषण (अपक्रियात्मक/पूर्ववर्ती/संपोषण कारक) → उपचार पैकेज (पूर्ववर्ती + अनुवर्ती संक्रिया); तकनीकें = निषेधात्मक प्रबलन, विमुखी अनुबंधन, सकारात्मक प्रबलन, टोकन अर्थव्यवस्था, विभेदक प्रबलन, विश्रांति, क्रमिक विसंवेदनीकरण (वोल्प, अन्योन्य प्रावरोध), मॉडलिंग
- संज्ञानात्मक चिकित्सा: एलिस का RET (पू.वि.प. विश्लेषण, अनिदेशात्मक प्रश्न) और बेक की चिकित्सा (मूल स्कीमा → नकारात्मक स्वचालित विचार → संज्ञानात्मक पुनःसंरचना); CBT = जैव-मनोसामाजिक, आज सबसे लोकप्रिय
- मानवतावादी-अस्तित्वपरक: आत्मसिद्धि केंद्रीय विचार है; फ्रेंकल की उद्बोधक चिकित्सा (अर्थ निर्माण, आध्यात्मिक अचेतन), रोज़र्स की सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा (तदनुभूति, अशर्त सकारात्मक आदर, परावर्तन), पर्ल्स की गेस्टाल्ट चिकित्सा (आत्म-जागरूकता)
- स्वास्थ्य-लाभ कारक: तकनीक, मैत्री, कैथार्सिस, अविशिष्ट रोगी/चिकित्सक चर
- 6 नैतिक मानक; वैकल्पिक चिकित्सा = योग, ध्यान (विपश्यना), SKY (NIMHANS), कुंडलिनी योग (UCSD, OCD)
- पुनःस्थापन: व्यावसायिक चिकित्सा, सामाजिक कौशल प्रशिक्षण, संज्ञानात्मक पुनःप्रशिक्षण, व्यावसायिक प्रशिक्षण
“प्रतिरोध” NCERT की अपनी “प्रमुख पद” सूची में शामिल है, हालाँकि अध्याय का मुख्य पाठ इसे
परिभाषित नहीं करता। इसका सामान्य अर्थ (पुस्तक में परिभाषा नहीं) है सेवार्थी का कष्टदायक सामग्री का सामना
करने के प्रति अचेतन विरोध; यह मनोगतिक चिकित्सा का संप्रत्यय है।