छोटा मेरा खेत और बगुलों के पंख — उमाशंकर जोशी

इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • उमाशंकर जोशी का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और भारतीय साहित्य में उनका योगदान
  • ‘छोटा मेरा खेत’ कविता में रचना-प्रक्रिया को कृषि-रूपक से समझाने की पूरी युक्ति
  • ‘बगुलों के पंख’ कविता में सौंदर्य के चित्रात्मक वर्णन और कवि के मन पर उसके प्रभाव से सौंदर्य-बोध कराने की युक्ति
  • रूपक अलंकार और बिंब में अंतर पहचानना, दोनों कविताओं से उदाहरण देना
  • दोनों कविताओं की आवृत्ति (पहली पंक्ति या उसके भाव की अंत में पुनरावृत्ति) शैली को समझना
  • अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
उमाशंकर जोशीरूपक अलंकारबिंबकृषि-रूपकअक्षयपात्रआवृत्ति

1 कवि परिचय: उमाशंकर जोशी

चित्र 1 गुजराती कवि उमाशंकर जोशी। चित्र: Apurva Madia / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0
चित्र 1 गुजराती कवि उमाशंकर जोशी। चित्र: Apurva Madia / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0

उमाशंकर जोशी मूलतः गुजराती भाषा के कवि थे, पर उनका साहित्यिक योगदान गुजराती की सीमा लाँघकर पूरे भारतीय साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने बीसवीं सदी की गुजराती कविता और साहित्य को एक नयी भंगिमा (मुद्रा/अंदाज़) और नया स्वर दिया। यहाँ पढ़ी जाने वाली दोनों कविताएँ मूलतः गुजराती में लिखी गई थीं, हिंदी में इनका रूपांतरण रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल ने किया है।

1911गुजरात में जन्म
1947 से‘संस्कृति’ नामक पत्रिका का संपादन आरंभ किया
जीवन-भरकविता, एकांकी, कहानी, उपन्यास, निबंध, हर विधा में लेखन; आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने पर जेल-यात्रा
1988निधन
परीक्षा संकेत

दोनों कविताओं का हिंदी रूपांतरण रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल ने किया है, यह नाम याद रखें।

1.1 परंपरा का ज्ञान और अनुवाद-कार्य

पाठ के अनुसार जोशी जी को परंपरा का गहरा ज्ञान था। उन्होंने कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् और भवभूति के उत्तररामचरित, दोनों संस्कृत के क्लासिक नाटकों का गुजराती में अनुवाद किया। ऐसे अनुवाद गुजराती साहित्य की अभिव्यक्ति-क्षमता को बढ़ाने वाले थे।

1.2 काव्य-शैली की विशेषता

बतौर कवि उमाशंकर जी ने गुजराती कविता को प्रकृति से जोड़ा, आम ज़िंदगी के अनुभव से परिचित कराया और उसे एक नयी शैली दी। जीवन के सामान्य प्रसंगों पर सामान्य बोलचाल की भाषा में कविता लिखने वाले भारतीय आधुनिकतावादी कवियों में वे अन्यतम (सबसे आगे) माने जाते हैं। कविता के साथ-साथ साहित्य की दूसरी विधाओं में भी, खासकर साहित्य-आलोचना में, उनका योगदान बहुमूल्य है। निबंधकार के रूप में भी वे गुजराती साहित्य में बेजोड़ माने जाते हैं।

1.3 प्रमुख रचनाएँ (विधावार)

उमाशंकर जोशी की रचनाएँ
काव्य संग्रहविश्व शांति, गंगोत्री, निशीथ, प्राचीना, आतिथ्य, वसंत वर्षा, महाप्रस्थान
एकांकीअभिज्ञा
कहानीसापनाभारा, शहीद
उपन्यासश्रावणी मेणो, विसामो
निबंधपारकांजण्या
संपादनगोष्ठी, उघाड़ीबारी, क्लांतकवि, म्हारासॉनेट, स्वप्नप्रयाण
क्या आप जानते हैं?

जोशी जी उन साहित्यिक व्यक्तित्वों में हैं जिनका भारत की आज़ादी की लड़ाई से रिश्ता रहा। आज़ादी की लड़ाई के दौरान वे जेल भी गए थे।

2 कविता 1: छोटा मेरा खेत

यह कविता खेती के रूपक में कवि-कर्म (रचना-प्रक्रिया) के हर चरण को बाँधने की कोशिश के रूप में पढ़ी जा सकती है। कागज़ का पन्ना, जिस पर रचना शब्दबद्ध होती है, कवि को एक चौकोर खेत की तरह लगता है।

Learn by heartपरिभाषा 1

रूपक अलंकार वह अलंकार है जिसमें उपमेय (जिसकी उपमा दी जा रही है) पर उपमान (जिससे उपमा दी जा रही है) का इस प्रकार आरोप कर दिया जाता है कि दोनों में कोई भेद ही न रहे, यानी “यह वही है” कह दिया जाता है, “यह उसके जैसा है” नहीं। ‘छोटा मेरा खेत’ में कागज़ के पन्ने को सीधे “खेत” कह दिया गया है, “खेत जैसा पन्ना” नहीं, यही रूपक है।

पूरी कविता: छोटा मेरा खेत

छोटा मेरा खेत चौकोना
कागज़ का एक पन्ना,
कोई अंधड़ कहीं से आया
क्षण का बीज वहाँ बोया गया।

कल्पना के रसायनों को पी
बीज गल गया निःशेष;
शब्द के अंकुर फूटे,
पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।

झूमने लगे फल,
रस अलौकिक,
अमृत धाराएँ फूटतीं
रोपाई क्षण की,
कटाई अनंतता की
लुटते रहने से जरा भी नहीं कम होती।

रस का अक्षय पात्र सदा का
छोटा मेरा खेत चौकोना।

2.1 कृषि-रूपक: रचना-प्रक्रिया के चार चरण

पूरी कविता रचना-प्रक्रिया (कवि-कर्म) को खेती के एक चक्र की तरह दिखाती है। हर कृषि-शब्द के पीछे रचना-प्रक्रिया का एक ठोस चरण छिपा है:

1 · बीज बोनाकोई अंधड़ (पाठ के अनुसार आशय भावनात्मक आँधी से) आता है, कागज़ रूपी खेत में एक क्षण का बीज (रचना का प्रारंभिक विचार) बो देता है
→
2 · बीज का गलनाकल्पना के रसायन (पोषण) पीकर बीज पूरी तरह गल जाता है, यानी मूल विचार रचना-प्रक्रिया में घुल-मिल जाता है
↑
कवि-कर्म का चक्र
↓
4 · अक्षय रसरचना का रस (आनंद) कभी चुकता नहीं, “लुटते रहने” (बाँटने) से भी कम नहीं होता, और कविता के अंत में पहली पंक्ति फिर आती है
←
3 · अंकुर से फल तकबीज से शब्द के अंकुर फूटते हैं, फिर पल्लव-पुष्प खिलते हैं, अंततः फल झूमने लगते हैं और अलौकिक रस-धारा फूट पड़ती है, यही पूर्ण रचना है

2.2 अंतरा-वार सरल भावार्थ

1

खेत, अंधड़ और बीज

कागज़ का चौकोर पन्ना ही कवि का खेत है। कोई अंधड़ (पाठ के अनुसार आशय भावनात्मक आँधी से) कहीं से आता है और उसके प्रभाव से किसी क्षण उस खेत में बीज बोया जाता है। पाठ के अनुसार यह बीज-रचना विचार और अभिव्यक्ति का हो सकता है। “क्षण का बीज” से संकेत मिलता है कि बीज एक क्षण में बोया जाता है।

2

बीज का गलना, अंकुर का फूटना

कल्पना रूपी रसायन को पीकर बीज पूरी तरह गल जाता है (निःशेष = बिना कुछ बचे)। इसी से शब्दों के अंकुर फूटते हैं, और रचना पल्लव-पुष्पों (कोमल पत्तों-फूलों) से विशेष रूप से लद जाती है।

3

फल, रस और अक्षयपात्र

फल झूमने लगते हैं, उनमें से अलौकिक (जो सांसारिक न हो) रस फूटता है। “रोपाई क्षण की” (बोना पल-भर में हुआ) पर “कटाई अनंतता की” (कटाई, यानी पढ़ा जाना, अनंत काल तक चलता है)। पाठ के अनुसार उत्तम साहित्य कालजयी होता है और असंख्य पाठकों द्वारा असंख्य बार पढ़ा जाता है; यही उत्तम साहित्य की विशेषता है: “लुटते रहने से जरा भी नहीं कम होती”।

4

पहली पंक्ति की वापसी

कविता के अंत में “छोटा मेरा खेत चौकोना” फिर से आता है। “रस का अक्षय पात्र सदा का”: खेत (कागज़ का पन्ना) सदा के लिए रस का अक्षय (कभी न चुकने वाला) पात्र है। पहली पंक्ति की वापसी से कविता गोलाकार लगती है।

रूपक की पूरी शब्दावली एक नज़र में
खेत = कागज़ का पन्ना  ·  अंधड़ = भावनात्मक आँधी  ·  बीज = विचार  ·  अंकुर = शब्द  ·  फल/रस = पूर्ण रचना
प्रत्येक कृषि-शब्द रचना-प्रक्रिया के एक ठोस चरण का रूपक है, अभ्यास प्रश्न “कविता के साथ” (प्रश्न 1-2) का उत्तर-स्रोत
Learn by heartपरिभाषा 2

अक्षयपात्र का शाब्दिक अर्थ है वह पात्र (बर्तन) जो कभी खाली न हो, जिसमें से लगातार निकालने पर भी सामग्री कम न हो (महाभारत की कथा से जुड़ा प्रचलित प्रतीक; पाठ की पंक्ति “रस का अक्षय पात्र सदा का” में यह रूपक अलंकार है)। यहाँ कवि साहित्य के रस को अक्षयपात्र कहते हैं; पाठ के अनुसार “खेत में पैदा होने वाला अन्न कुछ समय के बाद समाप्त हो जाता है, किंतु साहित्य का रस कभी चुकता नहीं।”

पाठ का अंतर

पाठ अन्न और रस में फ़र्क़ करता है: खेत में पैदा होने वाला अन्न कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है, पर साहित्य का रस कभी नहीं चुकता।

3 कविता 2: बगुलों के पंख

यह एक सुंदर दृश्य की कविता है। सौंदर्य का अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न करने के लिए कवियों ने कई युक्तियाँ अपनाई हैं, जिनमें सबसे प्रचलित है: सौंदर्य के ब्यौरों का चित्रात्मक वर्णन करने के साथ-साथ अपने मन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का भी वर्णन करना। वस्तुगत (जो बाहर दिखे) और आत्मगत (जो भीतर महसूस हो) के इस संयोग की युक्ति पाठक को मूल सौंदर्य के काफ़ी निकट ले जाती है। जोशी जी की इस कविता में ठीक यही हुआ है।

Learn by heartपरिभाषा 3

बिंब शब्दों के माध्यम से बनाया गया वह चित्र है जो किसी दृश्य, ध्वनि, रंग, गंध या स्पर्श को पाठक की इंद्रियों में सीधे साकार कर देता है, मानो पाठक स्वयं वह दृश्य देख या अनुभव कर रहा हो। ‘बगुलों के पंख’ में कजरारे बादल, पाँती-बँधे सफ़ेद बगुले और साँझ की सतेज श्वेत काया का वर्णन एक ऐसा ही दृश्य-बिंब रचता है। (पाठ के ‘कविता के आसपास’ प्रश्न 1 में भी बिंब की यही बात कही गई है: जब कवि दृश्यों, चित्रों, ध्वनि-योजना अथवा रूप-रस-गंध को हमारे ऐन्द्रिक अनुभवों में साकार कर देता है।)

पूरी कविता: बगुलों के पंख

नभ में पाँती-बँधे बगुलों के पंख,
चुराए लिए जातीं वे मेरी आँखें।
कजरारे बादलों की छाई नभ छाया,
तैरती साँझ की सतेज श्वेत काया।
हौले हौले जाती मुझे बाँध निज माया से।
उसे कोई तनिक रोक रक्खो।
वह तो चुराए लिए जाती मेरी आँखें
नभ में पाँती-बँधी बगुलों की पाँखें।

3.1 पंक्ति-वार सरल भावार्थ

पंक्ति 1-2आकाश में पंक्तिबद्ध (कतार में) उड़ते बगुलों के पंख कवि की आँखों को मानो चुरा ले जाते हैं, यानी वह दृश्य उसकी नज़र को पूरी तरह बाँध लेता है।
↓
पंक्ति 3-4काले (कजरारे) बादलों से छाए आकाश में साँझ (शाम) की तेजयुक्त श्वेत काया मानो तैर रही है। पाठ के अनुसार उड़ते सफ़ेद बगुले “कजरारे बादलों के ऊपर तैरती साँझ की श्वेत काया के समान प्रतीत होते हैं”, और यह दृश्य इतना नयनाभिराम है कि कवि और सब कुछ भूलकर उसी में अटका-सा रह जाता है।
↓
पंक्ति 5-6यह दृश्य धीरे-धीरे (हौले-हौले) कवि को अपनी माया (मोहजाल) में बाँधता जाता है। कवि कहता है, “उसे कोई तनिक रोक रक्खो”; पाठ के अनुसार वह इस माया से अपने को बचाने की गुहार लगाता है।
↓
पंक्ति 7-8कविता पहली पंक्तियों के भाव को दोहराते हुए समाप्त होती है, बगुलों की पाँती (कतार) फिर से कवि की आँखें चुराए लिए जाती है, दृश्य का सम्मोहन बना रहता है।

3.2 दृश्य के ब्यौरे और कवि पर प्रभाव

कजरारे बादल

  • रंग: गहरा काला
  • आकाश में पृष्ठभूमि की तरह छाए हुए
  • इन्हीं के ऊपर बगुले उड़ते दिखते हैं

श्वेत बगुले व साँझ की काया

  • रंग: चमकीला सफ़ेद
  • काले बादलों के ऊपर तैरते-से प्रतीत होते हैं
  • कवि की आँखें “चुराए लिए जाती” हैं, उसे अपनी माया में बाँधते हैं
परीक्षा संकेत

‘बगुलों के पंख’ पर उत्तर में काले बादलों की पृष्ठभूमि, श्वेत बगुलों का दृश्य और उसका कवि पर प्रभाव, तीनों लिखें। पाठ की युक्ति यही है: सौंदर्य के ब्यौरों का चित्रात्मक वर्णन और मन पर उसके प्रभाव का वर्णन (वस्तुगत और आत्मगत का संयोग)।

4 दोनों कविताओं की तुलना

छोटा मेरा खेत

  • 4 अंतरे, विस्तृत कृषि-रूपक पर आधारित
  • केंद्रीय भाव: रचना-प्रक्रिया की व्याख्या, साहित्य का रस अक्षय है
  • प्रमुख अलंकार: रूपक अलंकार

बगुलों के पंख

  • 1 अंतरा, 8 पंक्तियों की छोटी दृश्य-कविता
  • केंद्रीय भाव: प्राकृतिक सौंदर्य का मोहक प्रभाव
  • प्रमुख तकनीक: दृश्य-बिंब (सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन और कवि के मन पर उसका प्रभाव)

दोनों कविताओं में एक साझा तकनीक भी है: आवृत्ति (पुनरावृत्ति) : दोनों कविताएँ अपनी पहली पंक्ति (या भाव) को अंत में दोहराकर समाप्त होती हैं, जिससे रचना गोलाकार (चक्रीय) प्रतीत होती है, मानो बात वहीं लौट आई हो जहाँ से शुरू हुई थी।

याद रखने की तरकीब

खेत में मुख्यतः रूपक, बगुलों में मुख्यतः बिंब

“छोटा मेरा खेत” का मुख्य अलंकार रूपक है (कागज़ को सीधे खेत कह दिया गया); “बगुलों के पंख” का मुख्य काव्य-गुण दृश्य-बिंब है (सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन)। ध्यान रहे, “छोटा मेरा खेत” में भी “झूमने लगे फल” जैसी दृश्य-पंक्तियाँ (बिंब) हैं।

कला की बात

पाठ का ‘कला की बात’ अभ्यास पूछता है कि ‘बगुलों के पंख’ पढ़ने पर मन में कैसे चित्र उभरते हैं, और उन्हें किसी अन्य कला-माध्यम (जैसे चित्र, संगीत, नृत्य) में व्यक्त करने को कहता है।

5 शब्दार्थ (कठिन शब्द)

NCERT का यह पाठ अपनी ओर से कोई शब्दार्थ सूची नहीं देता। नीचे दोनों कविताओं के कठिन शब्दों के अर्थ दिए गए हैं:

शब्द अर्थ
चौकोना चौकोर, चार बराबर भुजाओं वाला
अंधड़ तेज़ आँधी (पाठ के अनुसार यहाँ आशय भावनात्मक आँधी से)
निःशेष पूरी तरह, बिना कुछ बचे हुए
पल्लव-पुष्प कोमल पत्ते और फूल
नमित झुका हुआ, लदा हुआ (भार से)
अलौकिक जो सांसारिक/लौकिक न हो, दिव्य
अक्षय जो कभी क्षय (कम) न हो, कभी न चुकने वाला
नभ आकाश
पाँती-बँधे पंक्ति में बँधे हुए, कतारबद्ध
कजरारे काजल जैसे काले
सतेज तेजयुक्त, चमकीला
श्वेत काया सफ़ेद शरीर/रूप
हौले हौले धीरे-धीरे
निज माया अपना मोहजाल/सम्मोहन
तनिक थोड़ा, ज़रा-सा
पाँखें पंख (काव्यात्मक रूप)
सभी परिभाषाएँ एक साथ
रूपक अलंकारउपमेय पर उपमान का ऐसा आरोप कि दोनों में भेद न रहे (“यह वही है”)
अक्षयपात्रकभी न चुकने वाला पात्र, साहित्य के रस के लिए प्रयुक्त रूपक
बिंबशब्दों से बना ऐसा चित्र जो दृश्य/ध्वनि/रंग को इंद्रियों में साकार कर दे
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं उमाशंकर जोशी का जन्म-निधन वर्ष और दोनों अनुवादकों के नाम बिना देखे लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘छोटा मेरा खेत’ के कृषि-रूपक की पूरी शब्दावली (खेत, अंधड़, बीज, अंकुर, फल) समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘रस का अक्षय पात्र’ का अर्थ अपने शब्दों में लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं ‘बगुलों के पंख’ का दृश्य-बिंब और कवि पर उसका प्रभाव समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं रूपक और बिंब में अंतर करते हुए दोनों कविताओं से एक-एक उदाहरण दे सकता हूँ?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • उमाशंकर जोशी: जन्म 1911, निधन 1988, गुजराती कवि; अनुवादक: रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल
  • जोशी ने कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् व भवभूति के उत्तररामचरित का गुजराती अनुवाद किया; 1947 से ‘संस्कृति’ पत्रिका का संपादन
  • छोटा मेरा खेत: रूपक, खेत=कागज़, अंधड़=भावनात्मक आँधी, बीज=विचार, अंकुर=शब्द, फल/रस=रचना; रस कभी नहीं चुकता (अक्षयपात्र)
  • बगुलों के पंख: दृश्य-बिंब, कजरारे बादलों पर उड़ते सफ़ेद बगुले, साँझ की सतेज श्वेत काया जैसे; कवि उसी में अटका रह जाता है और इस माया से बचने की गुहार लगाता है
  • दोनों कविताएँ पहली पंक्ति (या उसके भाव) की अंत में पुनरावृत्ति (आवृत्ति) से गोलाकार संरचना बनाती हैं